श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1001–1010

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1001–1010

पृष्ठ 1001

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वेदात्मतत्त्वं भ्रमतीह तावत् ॥१५ न यावदेतन्मन आत्मलिङ्गं

संसारतापावपनं जनस्य ।

यच्छोकमोहामयरागलोभ-वैरानुबन्धं ममतां विधत्ते ॥१६

भ्रातृव्यमेनं तददभ्रवीर्य-मुपेक्षयाध्येधितमप्रमत्तः । गुरोहरश्चरणोपासनास्त्रो जहि व्यलीकं स्वयमात्ममोषम् ॥१७ ये मनकी ग्यारह वृत्तियाँ द्रव्य ( विषय ), स्वभाव, आशय ( संस्कार ), कर्म और कालके द्वारा सैकड़ों, हजारों और करोड़ों भेदोंमें परिणत हो जाती हैं । किन्तु इनकी सत्ता क्षेत्रज्ञ आत्माकी सत्तासे ही है, स्वतः या परस्पर मिलकर नहीं है ॥ ११ ॥ ऐसा होनेपर भी मनसे

क्षेत्रज्ञका कोई सम्बन्ध नहीं है । यह तो जीवकी ही मायानिर्मित उपाधि है । यह प्रायः संसारबन्धनमें डालनेवाले अविशुद्ध कर्मोंमें ही प्रवृत्त रहता है । इसकी उपर्युक्त वृत्तियाँ प्रवाहरूपसे नित्य ही रहती हैं; जाग्रत् और स्वप्नके समय वे प्रकट हो जाती हैं और सुषुप्तिमें छिप जाती हैं । इन दोनों ही अवस्थाओं में क्षेत्रज्ञ, जो विशुद्ध चिन्मात्र है, मनकी इन वृत्तियोंको साक्षीरूपसे देखता रहता है ॥१२ ॥

यह क्षेत्रज्ञ परमात्मा सर्वव्यापक, जगत्का आदिकारण, परिपूर्ण, अपरोक्ष, स्वयंप्रकाश, अजन्मा, ब्रह्मादिका भी नियन्ता और अपने अधीन रहनेवाली मायाके द्वारा सबके अन्तःकरणोंमें रहकर जीवोंको प्रेरित करनेवाला समस्त भूतोंका आश्रयरूप भगवान् वासुदेव है ॥१३ ॥ जिस प्रकार वायु सम्पूर्ण स्थावर - जंगम प्राणियोंमें प्राणरूपसे प्रविष्ट होकर उन्हें

प्रेरित करती है, उसी प्रकार वह परमेश्वर भगवान् वासुदेव सर्वसाक्षी आत्मस्वरूपसे इस सम्पूर्ण प्रपंचमें ओत - प्रोत है ॥१४ ॥ राजन्! जबतक मनुष्य ज्ञानोदयके द्वारा इस मायाका

तिरस्कार कर, सबकी आसक्ति छोड़कर तथा काम - क्रोधादि छः शत्रुओंको जीतकर आत्मतत्त्वको नहीं जान लेता और जबतक वह आत्माके उपाधिरूप मनको संसार-र - दुःखका क्षेत्र नहीं समझता, तबतक वह इस लोकमें यों ही भटकता रहता है, क्योंकि यह चित्त उसके शोक, मोह, रोग, राग, लोभ और वैर आदिके संस्कार तथा ममताकी वृद्धि करता रहता है ॥१५-१६ ॥ यह मन ही तुम्हारा बड़ा बलवान् शत्रु है । तुम्हारे उपेक्षा करनेसे इसकी शक्ति और भी बढ़ गयी है । यह यद्यपि स्वयं तो सर्वथा मिथ्या है, तथापि इसने तुम्हारे आत्मस्वरूपको आच्छादित कर रखा है । इसलिये तुम सावधान होकर श्रीगुरु और हरिके चरणोंकी उपासनाके अस्त्रसे इसे मार डालो ॥१७ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे ब्राह्मणरहूगणसंवादे एकादशोऽध्यायः ॥११ ॥

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पृष्ठ 1002

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१. प्रा ० पा ० — नात्मविदां वरिष्ठः । २. प्रा ० पा ० – व्यवहारमेतं । ३. प्रा ० ८ गरीयसीरपि । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1003

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अथ द्वादशोऽध्यायः रहूगणका प्रश्न और भरतजीका समाधान रहूगण उवाच नमो नमः कारणविग्रहाय

स्वरूपतुच्छीकृतविग्रहाय ।

नमोऽवधूत द्विजबन्धुलिङ्ग-निगूढनित्यानुभवाय तुभ्यम् ॥ १

ज्वरामयार्तस्य यथागदं सत्

निदाघदग्धस्य यथा हिमाम्भः ।

कुदेहमानाहिविदष्टदृष्टे-ब्रह्मन् वचस्तेऽमृतमौषधं मे ॥ २

तस्माद्भवन्तं मम संशयार्थं

प्रक्ष्यामि पश्चादधुना सुबोधम् ।

अध्यात्मयोगग्रथितं तवोक्त-माख्याहि कौतूहलचेतसो मे ॥३

यदाह योगेश्वर दृश्यमानं क्रियाफलं सद्व्यवहारमूलम् । न ह्यञ्जसा तत्त्वविमर्शनाय भवानमुष्मिन् भ्रमते मनो मे ॥ ४ ब्राह्मण उवाच अयं जनो नाम चलन् पृथिव्यां

यः पार्थिवः पार्थिव कस्य हेतोः ।

तस्यापि चाङ्घ्रयोरधि गुल्फजङ्घा-जानूरुमध्योरशिरोधरांसाः ॥५

राजा रहूगणने कहा — भगवन्! मैं आपको नमस्कार करता हूँ । आपने जगत्का उद्धार करनेके लिये ही यह देह धारण की है । योगेश्वर! अपने परमानन्दमय स्वरूपका अनुभव करके आप इस स्थूलशरीरसे उदासीन हो गये हैं तथा एक जड ब्राह्मणके वेषसे अपने नित्यज्ञानमय स्वरूपको जनसाधारणकी दृष्टिसे ओझल किये हुए हैं । मैं आपको बार - बार ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1004

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नमस्कार करता हूँ ॥१ || ब्रह्मन्! जिस प्रकार ज्वरसे पीड़ित रोगीके लिये मीठी ओषधि और धूपसे तपे हुए पुरुषके लिये शीतल जल अमृततुल्य होता है, उसी प्रकार मेरे लिये, जिसकी विवेकबुद्धिको देहाभिमानरूप विषैले सर्पने डस लिया है, आपके वचन अमृतमय ओषधिके समान हैं ॥२ ॥ देव! मैं आपसे अपने संशयोंकी निवृत्ति तो पीछे कराऊँगा । पहले तो इस

समय आपने जो अध्यात्म- योगमय उपदेश दिया है, उसीको सरल करके समझाइये, उसे समझनेकी मुझे बड़ी उत्कण्ठा है ॥३ ॥

योगेश्वर! आपने जो यह कहा कि भार उठानेकी क्रिया तथा उससे जो श्रमरूप फल होता है, वे दोनों ही प्रत्यक्ष होनेपर भी केवल व्यवहारमूलके ही हैं, वास्तवमें सत्य नहीं है — वे तत्त्वविचारके सामने कुछ भी नहीं ठहरते - सो इस विषयमें मेरा मन चक्कर खा रहा है, आपके इस कथनका मर्म मेरी समझमें नहीं आ रहा है ॥ ४ ॥

जडभरतने कहा — पृथ्वीपते! यह देह पृथ्वीका विकार है, पाषाणादिसे इसका क्या भेद है? जब यह किसी कारणसे पृथ्वीपर चलने लगता है, तब इसके भारवाही आदि नाम पड़ जाते हैं । इसके दो चरण हैं; उनके ऊपर क्रमशः टखने, पिंडली, घुटने, जाँघ, कमर, वक्षःस्थल, गर्दन और कंधे आदि अंग हैं ॥ ५ ॥

अंसेऽधि दाव शिबिका च यस्यां सौवीरराजेत्यपदेश आस्ते । यस्मिन् भवान् रूढनिजाभिमानो राजास्मि सिन्धुष्विति दुर्मदान्धः ॥ ६ शोच्यानिमांस्त्वमधिकष्टदीनान् विष्ट्या निगृह्णन्निरनुग्रहोऽसि । जनस्य गोप्तास्मि विकत्थमानो न शोभसे वृद्धसभासु धृष्टः ॥७ यदा क्षितावेव चराचरस्य विदाम निष्ठां प्रभवं च नित्यम् । तन्नामतोऽन्यद् व्यवहारमूलं निरूप्यतां सत् क्रिययानुमेयम् ॥८ एवं निरुक्तं क्षितिशब्दवृत्त-मसन्निधानात्परमाणवो ये । अविद्यया मनसा कल्पितास्ते येषां समूहेन कृतो विशेषः ॥९ एवं कृशं स्थूलमणुर्बृहद्यद् ' असच्च सज्जीवमजीवमन्यत् । द्रव्यस्वभावाशयकालकर्म ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1005

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नाम्नाजयावेहि कृतं द्वितीयम् ॥१० ज्ञानं विशुद्धं परमार्थमेक-मनन्तरं त्वबहिर्ब्रह्म सत्यम् । प्रत्यक् प्रशान्तं भगवच्छब्दसंज्ञं यद्वासुदेवं कवयो वदन्ति ॥११ रहूगणैतत्तपसा न याति

न चेज्यया निर्वपणाद् गृहाद्वा ।

न च्छन्दसा नैव जलाग्निसूर्यै-विना महत्पादरजोऽभिषेकम् ॥१२

कंधोंके ऊपर लकड़ीकी पालकी रखी हुई है; उसमें भी सौवीरराज नामका एक पार्थिव विकार ही है, जिसमें आत्मबुद्धिरूप अभिमान करनेसे तुम ' मैं सिन्धु देशका राजा हूँ ' इस प्रबल मदसे अंधे हो रहे हो ॥६ ॥ किन्तु इसीसे तुम्हारी कोई श्रेष्ठता सिद्ध नहीं होती,

वास्तवमें तो तुम बड़े क्रूर और धृष्ट ही हो । तुमने इन बेचारे दीन - दुःखिया कहारोंको बेगारमें पकड़कर पालकीमें जोत रखा है और फिर महापुरुषों की सभा में बढ़- बढ़कर बातें बनाते हो कि मैं लोकोंकी रक्षा करनेवाला हूँ । यह तुम्हें शोभा नहीं देता ॥७ ॥ हम देखते हैं कि सम्पूर्ण

चराचर भूत सर्वदा पृथ्वीसे ही उत्पन्न होते हैं और पृथ्वीमें ही लीन होते हैं; अतः उनके क्रियाभेदके कारण जो अलग - अलग नाम पड़ गये हैं- बताओ तो, उनके सिवा व्यवहारका और क्या मूल है? ॥८ ॥

इस प्रकार ' पृथ्वी ' शब्दका व्यवहार भी मिथ्या ही है; वास्तविक नहीं है; क्योंकि यह अपने उपादानकारण सूक्ष्म परमाणुओंमें लीन हो जाती है । और जिनके मिलनेसे पृथ्वीरूप कार्यकी सिद्धि होती है, वे परमाणु अविद्यावश मनसे ही कल्पना किये हुए हैं । वास्तवमें उनकी भी सत्ता नहीं है ॥९ ॥ इसी प्रकार और भी जो कुछ पतला - मोटा, छोटा - बड़ा, कार्य-कारण तथा चेतन और अचेतन आदि गुणोंसे युक्त द्वैत - प्रपंच है – उसे भी द्रव्य, स्वभाव,

आशय, काल और कर्म आदि नामोंवाली भगवान्की मायाका ही कार्य समझो ॥१० ॥

विशुद्ध परमार्थरूप, अद्वितीय तथा भीतर - बाहरके भेदसे रहित परिपूर्ण ज्ञान ही सत्य वस्तु है । वह सर्वान्तर्वर्ती और सर्वथा निर्विकार है । उसीका नाम ' भगवान् ' है और उसीको पण्डितजन ‘ वासुदेव ' कहते हैं ॥११ ॥ रहूगण! महापुरुषोंके चरणोंकी धूलिसे अपनेको

नहलाये बिना केवल तप, यज्ञादि वैदिक कर्म, अन्नादिके दान, अतिथिसेवा, दीनसेवा आदि गृहस्थोचित धर्मानुष्ठान, वेदाध्ययन अथवा जल, अग्नि या सूर्यकी उपासना आदि किसी भी साधनसे यह परमात्मज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता ॥१२ ॥

यत्रोत्तमश्लोकगुणानुवादः प्रस्तूयते ग्राम्यकथाविघातः । निषेव्यमाणोऽनुदिनं मुमुक्षो-****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1006

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र्मतिं सतीं यच्छति वासुदेवे ॥१३ अहं पुरा भरतो नाम राजा विमुक्तदृष्टश्रुतसङ्गबन्धः । आराधनं भगवत ईहमानो मृगोऽभवं मृगसङ्गाद्धतार्थः ॥ १४ सा मां स्मृतिर्मृगदेहेऽपि वीर कृष्णार्चनप्रभवा नो जहाति । अथो अहं जनसङ्गादसङ्गो विशङ्कमानोऽविवृतश्चरामि ॥१५ तस्मान्नरोऽसङ्गसुसङ्गजात-ज्ञानासिने हैव विवृक्णमोहः । हरिं तदीहाकथनश्रुताभ्यां लब्धस्मृतिर्यात्यतिपारमध्वनः ॥१६ इसका कारण यह है कि महापुरुषोंके समाजमें सदा पवित्रकीर्ति श्रीहरिके गुणोंकी चर्चा होती रहती है, जिससे विषयवार्ता तो पास ही नहीं फटकने पाती और जब भगवत्कथाका नित्यप्रति सेवन किया जाता है, तब वह मोक्षाकांक्षी पुरुषकी शुद्ध बुद्धिको भगवान् वासुदेवमें लगा देती है ॥१३ ॥

पूर्वजन्ममें मैं भरत नामका राजा था । ऐहिक और पारलौकिक दोनों प्रकारके विषयोंसे विरक्त होकर भगवान्की आराधनामें ही लगा रहता था; तो भी एक मृगमें आसक्ति हो जानेसे मुझे परमार्थसे भ्रष्ट होकर अगले जन्ममें मृग बनना पड़ा || १४ | किन्तु भगवान् श्रीकृष्णकी आराधनाके प्रभावसे उस मृगयोनिमें भी मेरी पूर्वजन्मकी स्मृति लुप्त नहीं हुई । इसीसे अब मैं जनसंसर्गसे डरकर सर्वदा असंगभावसे गुप्तरूपसे ही विचरता रहता हूँ ॥१५ ॥ सारांश यह है

कि विरक्त महापुरुषोंके सत्संगसे प्राप्त ज्ञानरूप खड्गके द्वारा मनुष्यको इस लोकमें ही अपने मोहबन्धनको काट डालना चाहिये । फिर श्रीहरिकी लीलाओंके कथन और श्रवणसे भगवत्स्मृति बनी रहनेके कारण वह सुगमतासे ही संसारमार्गको पार करके भगवान्को प्राप्त कर सकता है ॥१६ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे ब्राह्मणरहूगणसंवादे द्वादशोऽध्यायः ॥१२ ॥

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पृष्ठ 1007

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पृष्ठ 1008

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अथ त्रयोदशोऽध्यायः भवाटवीका वर्णन और रहूगणका संशयनाश ब्राह्मण उवाच दुरत्ययेऽध्वन्यजया निवेशितो रजस्तमःसत्त्वविभक्तकर्मदृक् । स एष सार्थोऽर्थपरः परिभ्रमन् भवाटवीं याति न शर्म विन्दति ॥ १ जडभरतने कहा — राजन्! यह जीवसमूह सुखरूप धनमें आसक्त देश - देशान्तरमें घूम-फिरकर व्यापार करनेवाले व्यापारियोंके दलके समान है । इसे मायाने दुस्तर प्रवृत्तिमार्गमें लगा दिया है; इसलिये इसकी दृष्टि सात्त्विक, राजस, तामस भेदसे नाना प्रकारके कर्मोंपर ही जाती है । उन कर्मोंमें भटकता - भटकता यह संसाररूप जंगलमें पहुँच जाता है । वहाँ इसे तनिक भी शान्ति नहीं मिलती ॥१ ॥

यस्यामिमे षण्नरदेव दस्यवः सार्थं विलुम्पन्ति कुनायकं बलात् । गोमायवो यत्र हरन्ति सार्थिकं प्रमत्तमाविश्य यथोरणं वृकाः ॥२ प्रभूतवीरुत्तृणगुल्मगह्वरे कठोरदंशैर्मशकैरुपद्रुतः । क्वचित्तु गन्धर्वपुरं प्रपश्यति क्वचित्क्वचिच्चाशुरयोल्मुकग्रहम् ॥ ३ निवासतोयद्रविणात्मबुद्धि-स्ततस्ततो धावति भो अटव्याम् । क्वचिच्च वात्योत्थितपांसुधूम्रा दिशो न जानाति रजस्वलाक्षः ॥४ अदृश्यझिल्लीस्वनकर्णशूल उलूकवाग्भिर्व्यथितान्तरात्मा । अपुण्यवृक्षान् श्रयते क्षुधार्दितो मरीचितोयान्यभिधावति क्वचित् ॥५ क्वचिद्वितोयाः सरितोऽभियाति परस्परं चालषते निरन्धः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1009

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आसाद्य दावं क्वचिदग्नितप्तो निर्विद्यते क्व च यक्षैर्हृतासुः ॥६ शूरैर्हृतस्वः क्व च निर्विण्णचेताः शोचन् विमुह्यन्नुपयाति कश्मलम् । क्वचिच्च गन्धर्वपुरं प्रविष्टः प्रमोदते निर्वृतवन्मुहूर्तम् ॥७ चलन् क्वचित्कण्टकशर्कराङ्घ्रि-र्नगारुरुक्षुर्विमना इवास्ते । पदे पदेऽभ्यन्तरवह्निनार्दितः कौटुम्बिकः क्रुध्यति वै जनाय ॥८ महाराज! उस जंगलमें छ: डाकू हैं । इस वणिक्- -समाजका नायक बड़ा दुष्ट है । उसके नेतृत्वमें जब यह वहाँ पहुँचता है, तब ये लुटेरे बलात् इसका सब माल - मत्ता लूट लेते हैं तथा भेड़िये जिस प्रकार भेड़ोंके झुंडमें घुसकर उन्हें खींच ले जाते हैं, उसी प्रकार इसके साथ रहनेवाले गीदड़ ही इसे असावधान देखकर इसके धनको इधर - उधर खींचने लगते हैं ॥२ ॥

वह जंगल बहुत - सी लता, घास और झाड़ - झंखाड़के कारण बहुत दुर्गम हो रहा है । उसमें तीव्र डाँस और मच्छर इसे चैन नहीं लेने देते । वहाँ इसे कभी तो गन्धर्वनगर दीखने लगता है और कभी - कभी चमचमाता हुआ अति चंचल अगिया - बेताल आँखोंके सामने आ जाता है ॥३ ॥

यह वणिक् - समुदाय इस वनमें निवासस्थान, जल और धनादिमें आसक्त होकार इधर - उधर भटकता रहता है । कभी बवंडरसे उठी हुई धूलके द्वारा जब सारी दिशाएँ धूमाच्छादित - सी हो जाती हैं और इसकी आँखोंमें भी धूल भर जाती है, तो इसे दिशाओंका ज्ञान भी नहीं रहता ॥४ ॥ कभी इसे दिखायी न देनेवाले झींगुरोंका कर्णकटु शब्द सुनायी देता है, कभी

उल्लुओंकी बोलीसे इसका चित्त व्यथित हो जाता है । कभी इसे भूख सताने लगती है तो यह निन्दनीय वृक्षोंका ही सहारा टटोलने लगता है और कभी प्याससे व्याकुल होकर मृगतृष्णाकी ओर दौड़ लगाता है । । ५ ॥ कभी जलहीन नदियोंकी ओर जाता है, कभी अन्न न मिलनेपर आपसमें एक - दूसरेसे भोजनप्राप्तिकी इच्छा करता है, कभी दावानलमें घुसकर अग्निसे झुलस जाता है और कभी यक्षलोग इसके प्राण खींचने लगते हैं तो यह खिन्न होने लगता है ॥६ ॥ कभी अपनेसे अधिक बलवानुलोग इसका धन छीन लेते हैं, तो यह दुःखी होकर

शोक और मोहसे अचेत हो जाता है और कभी गन्धर्वनगरमें पहुँचकर घड़ीभरके लिये सब दुःख भूलकर खुशी मनाने लगता है || ७ || कभी पर्वतोंपर चढ़ना चाहता है तो काँटे और कंकड़ोंद्वारा पैर चलनी हो जानेसे उदास हो जाता है । कुटुम्ब बहुत बढ़ जाता है और उदरपूर्तिका साधन नहीं होता तो भूखकी ज्वालासे सन्तप्त होकर अपने ही बन्धु - बान्धवोंपर खीझने लगता है ॥८ ॥

क्वचिन्निगीर्णोऽजगराहिना जनो नावैति किञ्चिद्विपिनेऽपविद्धः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1010

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दष्टः स्म शेते क्व च दन्दशूकै-धोऽन्धकूपे पतितस्तमित्रे ॥ ९ कर्हि स्म चित्क्षुद्ररसान् विचिन्वं-स्तन्मक्षिकाभिर्व्यथितो विमानः । तत्रातिकृच्छ्रात्प्रतिलब्धमानो ’ बलाद्विलुम्पन्त्यथ तं ततोऽन्ये ॥१० क्वचिच्च शीतातपवातवर्ष-प्रतिक्रियां कर्तुमनीश आस्ते । क्वचिन्मिथो विपणन् यच्च किञ्चिद् विद्वेषमृच्छत्युत वित्तशाठ्यात् ॥११ क्वचित्क्वचित्क्षीणधनस्तु तस्मिन् शय्यासनस्थानविहारहीनः । याचन् परादप्रतिलब्धकामः पारक्यदृष्टिर्लभतेऽवमानम् ॥१२

अन्योन्यवित्तव्यतिषङ्गवृद्ध'-वैरानुबन्धो विवहन्मिथश्च ।

अध्वन्यमुष्मिन्नुरुकृच्छ्रवित्त-बाधोपसर्गैर्विहरन् विपन्नः ॥१३

तांस्तान् विपन्नान् स हि तत्र तत्र विहाय जातं परिगृह्य सार्थः । आवर्ततेऽद्यापि न कश्चिदत्र वीराध्वनः पारमुपैति योगम् ॥ १४ कभी अजगर सर्पका ग्रास बनकर वनमें फेंके हुए मुर्देके समान पड़ा रहता है । उस समय इसे कोई सुध - बुध नहीं रहती । कभी दूसरे विषैले जन्तु इसे काटने लगते हैं तो उनके विषके प्रभावसे अंधा होकर किसी अंधे कुएँ में गिर पड़ता है और घोर दुःखमय अन्धकारमें बेहोश पड़ा रहता है || ९ || कभी मधु खोजने लगता है तो मक्खियाँ इसके नाकमें दम कर देती हैं और इसका सारा अभिमान नष्ट हो जाता है । यदि किसी प्रकार अनेकों कठिनाइयोंका सामना करके वह मिल भी गया तो बलात् दूसरे लोग उसे छीन लेते हैं ॥१० ॥ कभी शीत,

घाम, आँधी और वर्षासे अपनी रक्षा करनेमें असमर्थ हो जाता है । कभी आपसमें थोड़ा - बहुत व्यापार करता है, तो धनके लोभसे दूसरोंको धोखा देकर उनसे वैर ठान लेता है ॥११ ॥

कभी - कभी उस संसारवनमें इसका धन नष्ट हो जाता है तो इसके पास शय्या, आसन, रहनेके लिये स्थान और सैर - सपाटेके लिये सवारी आदि भी नहीं रहते । तब दूसरोंसे याचना करता है; माँगनेपर भी दूसरेसे जब उसे अभिलषित वस्तु नहीं मिलती, तब परायी वस्तुओंपर अनुचित ****** ebook converter DEMO Watermarks *******