श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1011–1020

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1011–1020

पृष्ठ 1011

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दृष्टि रखनेके कारण इसे बड़ा तिरस्कार सहना पड़ता है ॥१२ ॥

इस प्रकार व्यावहारिक सम्बन्धके कारण एक - दूसरेसे द्वेषभाव बढ़ जानेपर भी वह वणिक् - समूह आपसमें विवाहादि सम्बन्ध स्थापित करता है और फिर इस मार्गमें तरह-तरहके कष्ट और धनक्षय आदि संकटोंको भोगते - भोगते मृतकवत् हो जाता है ॥१३ ॥

साथियोंमेंसे जो - जो मरते जाते हैं, उन्हें जहाँ - का - तहाँ छोड़कर नवीन उत्पन्न हुओंको साथ लिये वह बनिजारोंका समूह बराबर आगे ही बढ़ता रहता है । वीरवर! उनमेंसे कोई भी प्राणी न तो आजतक वापस लौटा है और न किसीने इस संकटपूर्ण मार्गको पार करके परमानन्दमय योगकी ही शरण ली है ॥१४ ॥

मनस्विनो निर्जितदिग्गजेन्द्रा ममेति सर्वे भुवि बद्धवैराः । मृधे शयीरन्न तु तद्व्रजन्ति यन्न्यस्तदण्डो गतवैरोऽभियाति ॥१५ प्रसज्जति क्वापि लताभुजाश्रय-स्तदाश्रयाव्यक्तपदद्विजस्पृहः । क्वचित्कदाचिद्धरिचक्रतस्त्रसन् सख्यं विधत्ते बककङ्कगृध्रैः ॥१६ तैर्वञ्चितो हंसकुलं समाविश-न्नरोचयन् शीलमुपैति वानरान् । तज्जातिरासेन सुनिर्वृतेन्द्रियः १ परस्परोद्वीक्षणविस्मृतावधिः ॥१७ द्रुमेषु रंस्यन् सुतदारवत्सलो व्यवायदीनो विवशः स्वबन्धने । क्वचित्प्रमादागिरिकन्दरे पतन् वल्लीं गृहीत्वा गजभीत आस्थितः ॥१८ अतः कथञ्चित्स विमुक्त आपदः पुनश्च सार्थं प्रविशत्यरिन्दम । अध्वन्यमुष्मिन्नजया निवेशितो भ्रमञ्जनोऽद्यापि न वेद कश्चन ॥१९ रहूगण त्वमपि ह्यध्वनोऽस्य संन्यस्तदण्डः कृतभूतमैत्रः । असज्जितात्मा हरिसेवया शितं ज्ञानासिमादाय तरातिपारम् ॥२० ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1012

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जिन्होंने बड़े - बड़े दिक्पालोंको जीत लिया है, वे धीर - वीर पुरुष भी पृथ्वीमें ' यह मेरी है ' ऐसा अभिमान करके आपसमें वैर ठानकर संग्रामभूमिमें जूझ जाते हैं । तो भी उन्हें भगवान् विष्णुका वह अविनाशी पद नहीं मिलता, जो वैरहीन परमहंसोंको प्राप्त होता है ॥१५ ॥

इस भवाटवीमें भटकनेवाला यह बनिजारोंका दल कभी किसी लताकी डालियोंका आश्रय लेता है और उसपर रहनेवाले मधुरभाषी पक्षियोंके मोहमें फँस जाता है । कभी सिंहोंके समूहसे भय मानकर बगुला, कंक और गिद्धोंसे प्रीति करता है ॥१६ ॥ जब उनसे

धोखा उठाता है, तब हंसोंकी पंक्तिमें प्रवेश करना चाहता है; किन्तु उसे उनका आचार नहीं सुहाता, इसलिये वानरोंमें मिलकर उनके जातिस्वभावके अनुसार दाम्पत्य सुखमें रत रहकर विषयभोगोंसे इन्द्रियोंको तृप्त करता रहता है और एक - दूसरेका मुख देखते - देखते अपनी आयुकी अवधिको भूल जाता है ॥१७ ॥ वहाँ वृक्षोंमें क्रीडा करता हुआ पुत्र और स्त्रीके

स्नेहपाशमें बँध जाता है । इसमें मैथुनकी वासना इतनी बढ़ जाती है कि तरह - तरहके दुर्व्यवहारोंसे दीन होनेपर भी यह विवश होकर अपने बन्धनको तोड़नेका साहस नहीं कर सकता । कभी असावधानीसे पर्वतकी गुफामें गिरने लगता है तो उसमें रहनेवाले हाथीसे डरकर किसी लताके सहारे लटका रहता है ॥ १८ ॥ शत्रुदमन! यदि किसी प्रकार इसे उस

आपत्तिसे छुटकारा मिल जाता है, तो यह फिर अपने गोलमें मिल जाता है । जो मनुष्य मायाकी प्रेरणासे एक बार इस मार्गमें पहुँच जाता है, उसे भटकते - भटकते अन्ततक अपने परम पुरुषार्थका पता नहीं लगता ॥ १ ९ ॥ रहूगण! तुम भी इसी मार्गमें भटक रहे हो, इसलिये अब प्रजाको दण्ड देनेका कार्य छोड़कर समस्त प्राणियोंके सुहृद् हो जाओ और विषयोंमें अनासक्त होकर भगवत्सेवासे तीक्ष्ण किया हुआ ज्ञानरूप खड्ग लेकर इस मार्गको पार कर लो ॥२० ॥

राजोवाच अहो नृजन्माखिलजन्मशोभनं किं जन्मभिस्त्वपरैरप्यमुष्मिन् । न यद्धृषीकेशयशः कृतात्मनां महात्मनां वः प्रचुरः समागमः ॥२१ न ह्यद्भुतं त्वच्चरणाब्जरेणुभि-र्हतांहसो भक्तिरधोक्षजेऽमला । मौहूर्तिकाद्यस्य समागमाच्च मे दुस्तर्कमूलोऽपहतोऽविवेकः ॥ २२ नमो महद्भ्योऽस्तु नमः शिशुभ्यो

नमो युवभ्यो नम आ वटुभ्यः ।

ये ब्राह्मणा गामवधूतलिङ्गा-श्चरन्ति तेभ्यः शिवमस्तु राज्ञाम् ॥२३

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पृष्ठ 1013

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श्रीशुक उवाच इत्येवमुत्तरामातः स वै ब्रह्मर्षिसुतः सिन्धुपतय आत्मसतत्त्वं ' विगणयतः परानुभावः परमकारुणिकतयोपदिश्य रहूगणेन सकरुणमभि - वन्दितचरण आपूर्णार्णव इव निभृतकरणो - यिशयो धरणिमिमां विचचार || २४ || सौवीरपतिरपि सुजनसमवगतपरमात्मसतत्त्व आत्मन्यविद्याध्यारोपितां च देहात्ममतिं विससर्ज । एवं हि नृप भगवदाश्रिताश्रितानुभावः ४ ॥ २५ ॥

राजा रहूगणने कहा – अहो! समस्त योनियोंमें यह मनुष्यजन्म ही श्रेष्ठ है । अन्यान्य लोकोंमें प्राप्त होनेवाले देवादि उत्कृष्ट जन्मोंसे भी क्या लाभ है, जहाँ भगवान् हृषीकेशके पवित्र यशसे शुद्ध अन्तःकरणवाले आप - जैसे महात्माओंका अधिकाधिक समागम नहीं मिलता ॥२१ ॥

आपके चरणकमलोंकी रजका सेवन करनेसे जिनके सारे पाप ताप नष्ट हो गये हैं, उन महानुभावोंको भगवान्की विशुद्ध भक्ति प्राप्त होना कोई विचित्र बात नहीं है । मेरा तो आपके दो घड़ीके सत्संगसे ही सारा कुतर्कमूलक अज्ञान नष्ट हो गया है ॥ २२ ॥

ब्रह्मज्ञानियोंमें जो वयोवृद्ध हों, उन्हें नमस्कार है; जो शिशु हों, उन्हें नमस्कार है; जो युवा हों, उन्हें नमस्कार है । जो क्रीडारत बालक हों, उन्हें भी नमस्कार है । जो ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण अवधूतवेषसे पृथ्वीपर विचरते हैं, उनसे हम जैसे ऐश्वर्योन्मत्त राजाओंका कल्याण हो ॥२३ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं— उत्तरानन्दन! इस प्रकार उन परम प्रभावशाली ब्रह्मर्षिपुत्रने अपना अपमान करनेवाले सिन्धुनरेश रहूगणको भी अत्यन्त करुणावश आत्मतत्त्वका उपदेश दिया । तब राजा रहूगणने दीनभावसे उनके चरणोंकी वन्दना की । फिर वे परिपूर्ण समुद्रके समान शान्तचित्त और उपरतेन्द्रिय होकर पृथ्वीपर विचरने लगे ॥२४ ॥

उनके सत्संगसे परमात्मतत्त्वका ज्ञान पाकर सौवीरपति रहूगणने भी अन्तःकरणमें अविद्यावश आरोपित देहात्मबुद्धिको त्याग दिया । राजन्! जो लोग भगवदाश्रित अनन्य भक्तोंकी शरण ले लेते हैं, उनका ऐसा ही प्रभाव होता है— उनके पास अविद्या ठहर नहीं सकती ॥२५ ॥

राजोवाच यो ह वा इह बहुविदा महाभागवत त्वयाभिहितः परोक्षेण वचसा जीवलोकभवाध्वा स ह्यार्यमनीषया कल्पितविषयो नाञ्जसाव्युत्पन्न - लोकसमधिगमः । अथ तदेवैतद्दुरवगमं समवेतानुकल्पेन निर्दिश्यतामिति ॥२६ ॥

राजा परीक्षित्ने कहा – महाभागवत मुनिश्रेष्ठ! आप परम विद्वान् हैं । आपने रूपकादिके द्वारा अप्रत्यक्षरूपसे जीवोंके जिस संसाररूप मार्गका वर्णन किया है, उस ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1014

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विषयकी कल्पना विवेकी पुरुषोंकी बुद्धिने की है, वह अल्पबुद्धिवाले पुरुषोंकी समझमें सुगमतासे नहीं आ सकता । अतः मेरी प्रार्थना है कि इस दुर्बोध विषयको रूपकका स्पष्टीकरण करनेवाले शब्दोंसे खोलकर समझाइये ॥२६ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे त्रयोदशोऽध्यायः ॥१३ ॥

१. प्रा ० पा ० – तत्रातिकृच्छ्रं प्रति । २. प्रा ० पा०— – अन्योन्यकर्म । १. प्रा ० पा ० — सुनिर्जितेन्द्रियः । २. प्रा ० पा ० — मुष्मिन्नंजसा । १. प्रा ० पा०— –आत्मस्वतत्त्वं । २. प्रा ० पा ० – चरणः पूर्णार्णव इव । ३. प्रा ० पा ० — मिमां चचार । ४. प्रा ० पा ० — भगवदाश्रितानुभावः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1015

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य एष अथ चतुर्दशोऽध्यायः भवाटवीका स्पष्टीकरण स होवाच देहात्ममानिनां सत्त्वादिगुणविशेष-विकल्पितकुशलाकुशलसमवहारविनिर्मितविविध-देहावलिभिर्वियोगसंयोगाद्यनादिसंसारानुभवस्य द्वारभूतेन षडिन्द्रियवर्गेण तस्मिन्दुर्गाध्वव - दसुगमेऽध्वन्यापतित ईश्वरस्य भगवतो विष्णोर्वशवर्तिन्या मायया जीवलोकोऽयं यथा वणिक्सार्थोऽर्थपरः स्वदेहनिष्पादितकर्मानुभवः श्मशानवदशिवतमायां संसाराटव्यां तो नद्यापि विफलबहुप्रतियोगेहस्तत्तापोपशमनीं हरिगुरुचरणारविन्दमधुकरानुपदवीमवरुन्धे यस्यामु ह वा एते षडिन्द्रियनामानः कर्मणा दस्यव एव ते ॥१ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—- राजन्! देहाभिमानी जीवोंके द्वारा सत्त्वादि गुणोंके भेदसे शुभ, अशुभ और मिश्र - तीन प्रकारके कर्म होते रहते हैं । उन कर्मोंके द्वारा ही निर्मित नाना प्रकारके शरीरोंके साथ होनेवाला जो संयोग - वियोगादिरूप अनादि संसार जीवको प्राप्त होता है, उसके अनुभवके छः द्वार हैं - मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ । उनसे विवश होकर यह जीवसूह मार्ग भूलकर भयंकर वनमें भटकते हुए धनके लोभी बनिजारोंके समान परमसमर्थ भगवान् विष्णुके आश्रित रहनेवाली मायाकी प्रेरणासे बीहड़ वनके समान दुर्गम मार्ग में पड़कर संसार-वनमें जा पहुँचता है । यह वन श्मशानके समान अत्यन्त अशुभ है । इसमें भटकते हुए उसे अपने शरीरसे किये हुए कर्मोंका फल भोगना पड़ता है । यहाँ अनेकों विघ्नोंके कारण उसे अपने व्यापारमें सफलता भी नहीं मिलती; तो भी यह उसके श्रमको शान्त करनेवाले श्रीहरि एवं गुरुदेवके चरणारविन्द - मकरन्द - मधुके रसिक भक्त - भ्रमरोंके मार्गका अनुसरण नहीं करता । इस संसार - वनमें मनसहित छः इन्द्रियाँ ही अपने कर्मोंकी दृष्टिसे डाकुओंके समान हैं ॥१ ॥

तद्यथा पुरुषस्य धनं यत्किञ्चिद्धर्मौपयिकं बहुकृच्छ्राधिगतं साक्षात्परमपुरुषाराधनलक्षणो योऽसौ धर्मस्तं तु साम्पराय उदाहरन्ति । तद्धर्म्यं धनं दर्शनस्पर्शनश्रवणास्वादनावघ्राण े - सङ्कल्पव्यवसायगृहग्राम्योपभोगेन कुनाथस्य अजितात्मनो यथा सार्थस्य विलुम्पन्ति || २ || अथ च यत्र कौटुम्बिका दारापत्यादयो नाम्ना कर्मणा वृकसृगाला एवानिच्छतोऽपि कदर्यस्य कुटुम्बिन उरणकवत्संरक्ष्यमाणं मिषतोऽपि हरन्ति ॥३ ॥ यथा ह्यनुवत्सरं कृष्यमाणमप्यदग्धबीजं क्षेत्रं

पुनरेवावपनकाले गुल्मतृणवीरुद्भिर्गह्वरमिव भवत्येवमेव गृहाश्रमः कर्मक्षेत्रं यस्मिन्न हि कर्माण्युत्सीदन्ति यदयं कामकरण्ड एष आवसथः ॥४ ॥

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पृष्ठ 1016

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तत्र गतो ६ दंशमशकसमापसदैर्मनुजैः शलभशकुन्ततस्करमूषकादिभिरुपरुध्यमान- बहिः प्राणः क्वचित् परिवर्तमानोऽस्मि-न्नध्वन्यविद्याकामकर्मभिरुपरक्तमनसानुपपन्नार्थं नरलोकं गन्धर्वनगरमुपपन्नमिति मिथ्यादृष्टि - रनुपश्यति ॥ ५ ॥

पुरुष बहुत - सा कष्ट उठाकर जो धन कमाता है, उसका उपयोग धर्ममें होना चाहिये; वही धर्म यदि साक्षात् भगवान् परमपुरुषकी आराधनाके रूपमें होता है तो उसे परलोकमें निःश्रेयसका हेतु बतलाया गया है । किन्तु जिस मनुष्यका बुद्धिरूप सारथि विवेकहीन होता है और मन वशमें नहीं होता, उसके उस धर्मोपयोगी धनको ये मनसहित छः इन्द्रियाँ देखना, स्पर्श करना, सुनना, स्वाद लेना, सूँघना, संकल्प - विकल्प करना और निश्चय करना – इन वृत्तियोंके द्वारा गृहस्थोचित विषयभोगोंमें फँसाकर उसी प्रकार लूट लेती हैं, जिस प्रकार बेईमान मुखियाका अनुगमन करनेवाले एवं असावधान बनिजारोंके दलका धन चोर - डाकू लूट ले जाते हैं ॥२ ॥ ये ही नहीं, उस संसार - वनमें रहनेवाले उसके कुटुम्बी भी – जो नामसे

तो स्त्री - पुत्रादि कहे जाते हैं, किन्तु कर्म जिनके साक्षात् भेड़ियों और गीदड़ोंके समान होते हैं – उस अर्थलोलुप कुटुम्बीके धनको उसकी इच्छा न रहनेपर भी उसके देखते - देखते इस प्रकार छीन ले जाते हैं, जैसे भेड़िये गड़रियोंसे सुरक्षित भेड़ोंको उठा ले जाते हैं ॥३ ॥ जिस

प्रकार यदि किसी खेत बीजोंको अग्निद्वारा जला न दिया गया हो, तो प्रतिवर्ष जोतनेपर भी खेतीका समय आनेपर वह फिर झाड़ - झंखाड़, लता और तृण आदिसे गहन हो जाता है-उसी प्रकार यह गृहस्थाश्रम भी कर्मभूमि है, इसमें भी कर्मोंका सर्वथा उच्छेद कभी नहीं होता, क्योंकि यह घर कामनाओंकी पिटारी है ॥ ४ ॥

उस गृहस्थाश्रममें आसक्त हुए व्यक्तिके धनरूप बाहरी प्राणोंको डाँस और मच्छरोंके समान नीच पुरुषोंसे तथा टिड्डी, पक्षी, चोर और चूहे आदिसे क्षति पहुँचती रहती है । कभी इस मार्गमें भटकते - भटकते यह अविद्या, कामना और कर्मोंसे कलुषित हुए अपने चित्तसे दृष्टिदोषके कारण इस मर्त्य - लोकको, जो गन्धर्वनगरके समान असत् है, सत्य समझने लगता है ॥५ ॥

तत्र च क्वचिदातपोदकनिभान् विषयानुपधावति पानभोजनव्यवायादि-व्यसनलोलुपः ॥६ ॥ क्वचिच्चाशेषदोषनिषदनं पुरीषविशेषं तद्वर्णगुणनिर्मितमतिः

सुवर्णमुपादित्सत्यग्निकामकातर इवोल्मुक - पिशाचम् ॥७ ॥ अथ

कदाचिन्निवासपानीय - द्रविणाद्यनेकात्मोपजीवनाभिनिवेश एतस्यां संसाराटव्यामितस्ततः परिधावति || ८ || क्वचिच्च वात्यौपम्यया प्रमदयाऽऽरोहमारोपित- स्तत्कालरजसा रजनीभूत इवासाधुमर्यादो- रजस्वलाक्षोऽपि दिग्देवता अतिरजस्वलमतिर्न विजानाति || ९ || क्वचित्सकृदवगतविषयवैतथ्यः स्वयं पराभिध्यानेन विभ्रंशितस्मृतिस्तयैव मरीचि - तोयप्रायांस्तानेवाभिधावति ॥१० ॥

क्वचि दुलुकझिल्लीस्वनवदतिपरुषरभसाटोपं प्रत्यक्षं परोक्षं वा रिपुराजकुलनिर्भर्त्सितेनातिव्यथित कर्णमूलहृदयः ॥११ ॥

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पृष्ठ 1017

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स यदा दुग्धपूर्वसुकृतस्तदा कारस्करकाक-तुण्डाद्यपुण्यद्रुमलताविषोदपानवदुभयार्थशून्य - द्रविणाञ्जीवन्मृतान् जीवन्म्रियमाण उपधावति ॥१२ ॥

स्वयं फिर खान - पान और स्त्री - प्रसंगादि व्यसनोंमें फँसकर मृगतृष्णाके समान मिथ्या विषयोंकी ओर दौड़ने लगता है ॥६ ॥ कभी बुद्धिके रजोगुणसे प्रभावित होनेपर सारे

अनर्थोंकी जड़ अग्निके मलरूप सोनेको ही सुखका साधन समझकर उसे पानेके लिये लालायित हो इस प्रकार दौड़ - धूप करने लगता है, जैसे वनमें जाड़ेसे ठिठुरता हुआ पुरुष अग्निके लिये व्याकुल होकर उल्मुक पिशाचकी ( अगियाबेतालकी ) ओर उसे आग समझकर दौड़े ॥७ ॥ कभी इस शरीरको जीवित रखनेवाले घर, अन्न - जल और धन आदिमें अभिनिवेश

करके इस संसारारण्यमें इधर - उधर दौड़ - धूप करता रहता है || ८ || कभी बवंडरके समान आँखोंमें धूल झोंक देनेवाली स्त्री गोदमें बैठा लेती है, तो तत्काल रागान्ध - सा होकर सत्पुरुषोंकी मर्यादाका भी विचार नहीं करता । उस समय नेत्रोंमें रजोगुणकी धूल भर जानेसे बुद्धि ऐसी मलिन हो जाती है कि अपने कर्मोंके साक्षी दिशाओंके देवताओंको भी भुला देता है ॥९ ॥ कभी अपने - आप ही एकाध बार विषयोंका मिथ्यात्व जान लेनेपर भी अनादिकालसे

देहमें आत्मबुद्धि रहनेसे विवेक - बुद्धि नष्ट हो जानेके कारण उन मरुमरीचिकातुल्य विषयोंकी ओर ही फिर दौड़ने लगता है ॥१० ॥ कभी प्रत्यक्ष शब्द करनेवाले उल्लूके समान शत्रुओंकी

और परोक्षरूपसे बोलनेवाले झींगुरोंके समान राजाकी अति कठोर एवं दिलको दहला देनेवाली डरावनी डाँट - डपटसे इसके कान और मनको बड़ी व्यथा होती है ॥११ ॥

पूर्वपुण्य क्षीण हो जानेपर यह जीवित ही मुर्देके समान हो जाता है; और जो कारस्कर एवं काकतुण्ड आदि जहरीले फलोंवाले पापवृक्षों, इसी प्रकारकी दूषित लताओं और विषैले कुओंके समान हैं तथा जिनका धन इस लोक और परलोक दोनोंके ही काममें नहीं आता और जो जीते हुए भी मुर्देके समान हैं— उन कृपण पुरुषोंका आश्रय लेता है ॥१२ ॥

एकदासत्प्रसङ्गान्निकृतमतिर्व्युदकस्रोतः १ - स्खलनवदुभयतोऽपि दुःखदं पाखण्ड-मभियाति ॥१३ ॥ यदा तु परबाधयान्ध आत्मने नोपनमति तदा हि पितृपुत्रबर्हिष्मतः

पितृपुत्रान् वा स खलु भक्षयति ॥१४ ॥ क्वचिदासाद्य गृहं

दाववत्प्रियार्थविधुरमसुखोदर्क शोकाग्निना दह्यमानो भृशं निर्वेदमुपगच्छति ॥ १५ ॥

क्वचित्कालविषमितराजकुलरक्षसा ऽपहृतप्रियतमधनासुः प्रमृतकर इव विगतजीव-लक्षण आस्ते || १६ || कदाचिन्मनोरथोपगतपितृपितामहाद्यसत्सदिति स्वप्ननिर्वृतिलक्षणमनुभवति ॥१७ ॥

क्वचिद गृहाश्रमकर्मचोदनातिभारगिरिमारुरुक्षमाणो लोकव्यसनकर्षितमनाः कण्टकशर्कराक्षेत्रं प्रविशन्निव सीदति ॥१८ ॥ क्वचिच्चदुःसहेन कायाभ्यन्तरवह्निना गृहीतसारः ३

स्वकुटुम्बाय क्रुध्यति || १ ९ || स एव पुनर्निद्राजगरगृहीतोऽन्धे तमसि मग्नः शून्यारण्य इव शेते नान्यत् किञ्चन वेद शव इवापविद्धः ॥२० ॥

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पृष्ठ 1018

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कभी असत् पुरुषोंके संगसे बुद्धि बिगड़ जानेके कारण सूखी नदीमें गिरकर दुःखी होनेके समान इस लोक और परलोकमें दुःख देनेवाले पाखण्डमें फँस जाता है ॥१३ ॥

जब दूसरोंको सतानेसे उसे अन्न भी नहीं मिलता, तब वह अपने सगे पिता - पुत्रोंको अथवा पिता या पुत्र आदिका एक तिनका भी जिनके पास देखता है, उनको फाड़ खानेके लिये तैयार हो जाता है ॥१४ ॥

कभी दावानलके समान प्रिय विषयोंसे शून्य एवं परिणाममें दुःखमय घरमें पहुँचता है, तो वहाँ इष्टजनोंके वियोगादिसे उसके शोककी आग भड़क उठती है; उससे सन्तप्त होकर वह बहुत ही खिन्न होने लगता है ॥१५ ॥

कभी कालके समान भयंकर राजकुलरूप राक्षस इसके परम प्रिय धनरूप प्राणोंको हर लेता है, तो यह मरे हुएके समान निर्जीव हो जाता है ॥१६ ॥

कभी मनोरथके पदार्थोंके समान अत्यन्त असत् पिता- पितामह आदि सम्बन्धोंको सत्य समझकर उनके सहवाससे स्वप्नके समान क्षणिक सुखका अनुभव करता है ॥१७ ॥

गृहस्थाश्रमके लिये जिस कर्मविधिका महान् विस्तार किया गया है, उसका अनुष्ठान किसी पर्वतकी कड़ी चढ़ाईके समान ही है । लोगोंको उस ओर प्रवृत्त देखकर उनकी देखा-देखी जब यह भी उसे पूरा करनेका प्रयत्न करता है, तब तरह - तरह की कठिनाइयोंसे क्लेशित होकर काँटे और कंकड़ोंसे भरी भूमिमें पहुँचे हुए व्यक्तिके समान दुःखी हो जाता है ॥१८ ॥

कभी पेटकी असह्य ज्वालासे अधीर होकर अपने कुटुम्बपर ही बिगड़ने लगता है ॥१९ ॥ फिर जब निद्रारूप अजगरके चंगुलमें फँस जाता है, तब अज्ञानरूप घोर

अन्धकारमें डूबकर सूने वनमें फेंके हुए मुर्देके समान सोया पड़ा रहता है । उस समय इसे किसी बातकी सुधि नहीं रहती ॥२० ॥

कदाचिद् भग्नमानदंष्ट्रो दुर्जनदन्दशूकै - रलब्धनिद्राक्षणो व्यथितहृदयेनानुक्षीयमाण - विज्ञानोऽन्धकूपेऽन्धवत्पतति ॥२१ ॥ कर्हि स्म

चित्काममधुलवान् विचिन्वन् यदा परदारपरद्रव्याण्यवरुन्धानो राज्ञा स्वामिभिर्वा निहतः पतत्यपारे निरये || २२ || अथ च तस्मादुभयथापि हि कर्मास्मिन्नात्मनः संसारावपनमुदाहरन्ति || २३ || मुक्तस्ततो यदि बन्धाद्देवदत्त उपाच्छिनत्ति तस्मादपि विष्णुमित्र इत्यनवस्थितिः ॥२४ ॥ क्वचिच्च

शीतवाता-द्यनेकाधिदैविकभौतिकात्मीयानां दशानां प्रतिनिवारणेऽकल्पो दुरन्तचिन्तया विषण्ण आस्ते ॥२५ ॥

क्वचिन्मिथो व्यवहरन् यत्किञ्चिद्धनमन्येभ्यो वा काकिणिकामात्र मप्यपहरन् यत्किञ्चिद्वा विद्वेषमेति वित्तशाठ्यात् ॥२६ ॥

अध्वन्यमुष्मिन्निम उपसर्गास्तथा सुखदुःखरागद्वेषभयाभिमानप्रमादोन्मादशोक-मोहलोभमात्सर्येर्ष्यावमानक्षुत्पिपासाधि - व्याधिजन्मजरामरणादयः || २७ || कभी दुर्जनरूप काटनेवाले जीव इतना काटते - तिरस्कार करते हैं कि इसके गर्वरूप दाँत, जिनसे यह दूसरोंको काटता था, टूट जाते हैं । तब इसे अशान्तिके कारण नींद भी नहीं ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1019

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 1019 का मूल पृष्ठ
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आती तथा मर्मवेदनाके कारण क्षण - क्षणमें विवेक - शक्ति क्षीण होते रहनेसे अन्तमें अंधेकी भाँति यह नरकरूप अंधे कुएँ में जा गिरता है ॥२१ ॥

कभी विषयसुखरूप मधुकणोंको ढूंढते ढूँढते जब यह लुक - छिपकर परस्त्री या परधनको उड़ाना चाहता है, तब उनके स्वामी या राजाके हाथसे मारा जाकर ऐसे नरकमें जा गिरता है जिसका ओर - छोर नहीं है ॥ २२ ॥

इसीसे ऐसा कहते हैं कि प्रवृत्तिमार्गमें रहकर किये हुए लौकिक और वैदिक दोनों ही प्रकारके कर्म जीवको संसारकी ही प्राप्ति करानेवाले हैं ॥२३ ॥

यदि किसी प्रकार राजा आदिके बन्धनसे छूट भी गया, तो अन्याय से अपहरण किये हुए उन स्त्री और धनको देवदत्त नामका कोई दूसरा व्यक्ति छीन लेता है और उससे विष्णुमित्र नामका कोई तीसरा व्यक्ति झटक लेता है । इस प्रकार वे भोग एक पुरुषसे दूसरे पुरुषके पास जाते रहते हैं, एक स्थानपर नहीं ठहरते ॥२४ ॥

कभी - कभी शीत और वायु आदि अनेकों आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक दुःखकी स्थितियोंके निवारण करनेमें समर्थ न होनेसे यह अपार चिन्ताओंके कारण उदास हो जाता है ॥२५ ॥

कभी परस्पर लेन - देनका व्यवहार करते समय किसी दूसरेका थोड़ा सा - दमड़ीभर अथवा इससे भी कम धन चुरा लेता है तो इस बेईमानीके कारण उससे वैर ठन जाता है ॥२६ ॥

राजन्! इस मार्गमें पूर्वोक्त विघ्नोंके अतिरिक्त सुख - दुःख, राग - द्वेष, भय, अभिमान, प्रमाद, उन्माद, शोक, मोह, लोभ, मात्सर्य, ईर्ष्या, अपमान, क्षुधा पिपासा, आधि - व्याधि, जन्म, जरा और मृत्यु आदि और भी अनेकों विघ्न हैं ॥२७ ॥

क्वापि देवमायया स्त्रिया भुजलतोपगूढः प्रस्कन्नविवेकविज्ञानो यद्विहारगृहारम्भाकुल- हृदयस्तदाश्रयावसक्तसुतदुहितृकलत्रभाषिताव-लोकविचेष्टितापहृतहृदय आत्मानमजितात्मा -ऽपारेऽन्धे तमसि प्रहिणोति ॥२८ ॥

कदाचिदीश्वरस्य भगवतो विष्णोश्चक्रात्परमाण्वादिद्विपरार्धापवर्गकालो-पलक्षणात्परिवर्तितेन वयसा रंहसा हरत आब्रह्मतृणस्तम्बादीनां भूतानामनिमिषतो मिषतां वित्रस्तहृदयस्तमेवेश्वरं कालचक्रनिजायुधं साक्षाद्भगवन्तं यज्ञपुरुषमनादृत्य पाखण्डदेवताः कङ्कगृध्रबकवटप्राया आर्यसमयपरिहृताः साङ्केत्येनाभिधत्ते ॥ २ ९ || यदा पाखण्डिभिरात्मवञ्चितैस्तैरुरु वञ्चितो ब्रह्मकुलं समावसंस्तेषां शीलमुपनयनादिश्रौतस्मार्त - कर्मानुष्ठानेन भगवतो यज्ञपुरुषस्याराधनमेव तदरोचयन् शूद्रकुलं भजते निगमाचारेऽशुद्धितो यस्य मिथुनीभावः कुटुम्बभरणं यथा वानर - जातेः ॥३० ॥

तत्रापि निरवरोधः स्वैरेण विहरन्नतिकृपण- बुद्धिरन्योन्यमुखनिरीक्षणादिना ग्राम्यकर्मणैव विस्मृतकालावधिः ॥३१ ॥

( इस विघ्नबहुल मार्गमें इस प्रकार भटकता हुआ यह जीव ) किसी समय ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

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श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 1020 का मूल पृष्ठ
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देवमायारूपिणी स्त्रीके बाहुपाशमें पड़कर विवेकहीन हो जाता है । तब उसीके लिये विहारभवन आदि बनवानेकी चिन्तामें ग्रस्त रहता है तथा उसीके आश्रित रहनेवाले पुत्र, पुत्री और अन्यान्य स्त्रियोंके मीठे - मीठे बोल, चितवन और चेष्टाओंमें आसक्त होकर, उन्हींमें चित्त फँस जानेसे वह इन्द्रियोंका दास अपार अन्धकारमय नरकोंमें गिरता है ॥२८ ॥

कालचक्र साक्षात् भगवान् विष्णुका आयुध है । वह परमाणुसे लेकर द्विपरार्धपर्यन्त क्षण - घटी आदि अवयवोंसे युक्त है । वह निरन्तर सावधान रहकर घूमता रहता है, जल्दी-जल्दी बदलनेवाली बाल्य, यौवन आदि अवस्थाएँ ही उसका वेग हैं । उसके द्वारा वह ब्रह्मासे लेकर क्षुद्रातिक्षुद्र तृणपर्यन्त सभी भूतोंका निरन्तर संहार करता रहता है । कोई भी उसकी गतिमें बाधा नहीं डाल सकता । उससे भय मानकर भी जिनका यह कालचक्र निज आयुध है, उन साक्षात् भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना छोड़कर यह मन्दमति मनुष्य पाखण्डियोंके चक्करमें पड़कर उनके कंक, गिद्ध, बगुला और बटेरके समान आर्यशास्त्रबहिष्कृत देवताओंका आश्रय लेता है - जिनका केवल वेदबाह्य अप्रामाणिक आगमोंने ही उल्लेख किया है ॥२९ ॥ ये पाखण्डी तो स्वयं ही धोखेमें हैं; जब यह भी उनकी ठगाईमें आकर दुःखी

होता है, तब ब्राह्मणोंकी शरण लेता है । किन्तु उपनयन - संस्कारके अनन्तर श्रौतस्मार्तकर्मोंसे भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना करना आदि जो उनका शास्त्रोक्त आचार है, वह इसे अच्छा नहीं लगता; इसलिये वेदोक्त आचारके अनुकूल अपनेमें शुद्धि न होनेके कारण यह कर्मशून्य शूद्रकुलमें प्रवेश करता है, जिसका स्वभाव वानरोंके समान केवल कुटुम्बपोषण और स्त्रीसेवन करना ही है ॥ ३० ॥ वहाँ बिना रोक - टोक स्वच्छन्द विहार करनेसे इसकी बुद्धि

अत्यन्त दीन हो जाती है और एक - दूसरेका मुख देखना आदि विषय - भोगोंमें फँसकर इसे अपने मृत्युकालका भी स्मरण नहीं होता ॥ ३१ ॥

क्वचिद् द्रुमवदैहिकार्थेषु गृहेषु रंस्यन् यथा वानरः सुतदारवत्सलो व्यवायक्षणः ॥३२ ॥

एवमध्वन्यवरुन्धानो मृत्युगजभयात्तमसि गिरिकन्दरप्राये ॥३३ ॥

क्वचिच्छीतवाताद्यनेकदैविक - भौतिकात्मीयानां दुःखानां प्रतिनिवारणेऽकल्पो दुरन्तविषयविषण्ण आस्ते || ३४ || क्वचिन्मिथो व्यवहरन् यत्किञ्चिद्धनमुपयाति वित्तशाठ्येन ॥३५ ॥

क्वचित्क्षीणधनः शय्यासनाशनाद्युपभोग - विहीनो यावदप्रतिलब्धमनोरथोपगतादाने ऽवसितमतिस्ततस्ततोऽवमानादीनि जनादभिलभते ॥३६ || एवं वित्तव्यतिषङ्गविवृद्धवैरानुबन्धोऽपि पूर्ववासनया मिथ उद्वहत्यथापवहति ॥३७ ॥ एतस्मिन् संसाराध्वनि नानाक्लेशोपसर्गबाधित

आपन्नविपन्नो यत्र यस्तमु ह वावेतरस्तत्र विसृज्य जातं जातमुपादाय शोचन्मुह्यन् बिभ्यद्विवदन् क्रन्दन् संहृष्यन्गायन्नह्यमानः साधुवर्जितो नैवावर्ततेऽद्यापि यत आरब्ध एष नरलोकसार्थो यमध्वनः पारमुपदिशन्ति || ३८ || यदिदं योगानुशासनं न वा एतदवरुन्धते यन्न्यस्तदण्डा मुनय उपशमशीला उपर - तात्मानः समवगच्छन्ति ॥३९ ॥

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