श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 991–1000

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 991–1000

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अथ दशमोऽध्यायः जडभरत और राजा रहूगणकी भेंट श्रीशुक उवाच अथ सिन्धुसौवीरपते रहूगणस्य व्रजत इक्षुमत्यास्तटे तत्कुलपतिना शिबिकावाह े - पुरुषान्वेषणसमये दैवेनोपसादितः स द्विजवर उपलब्ध एष पीवा युवा संहननाङ्गो गोखरवधुरं वोढुमलमिति पूर्वविष्टिगृहीतैः सह गृहीतः प्रसभमतदर्ह ' उवाह शिबिकां स महानुभावः ॥१ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - राजन्! एक बार सिन्धुसौवीर देशका स्वामी राजा रहूगण पालकीपर चढ़कर जा रहा था । जब वह इक्षुमती नदीके किनारे पहुँचा तब उसकी पालकी उठानेवाले कहारोंके जमादारको एक कहारकी आवश्यकता पड़ी । कहारकी खोज करते समय दैववश उसे ये ब्राह्मणदेवता मिल गये । इन्हें देखकर उसने सोचा, ' यह मनुष्य हृष्ट - पुष्ट, जवान और गठीले अंगोंवाला है । इसलिये यह तो बैल या गधेके समान अच्छी तरह बोझा ढो सकता है । ' यह सोचकर उसने बेगारमें पकड़े हुए अन्य कहारोंके साथ इन्हें भी बलात् पकड़कर पालकीमें जोड़ दिया । महात्मा भरतजी यद्यपि किसी प्रकार इस कार्यके योग्य नहीं थे, तो भी वे बिना कुछ बोले चुपचाप पालकीको उठा ले चले ॥१ ॥

यदा हि द्विजवरस्येषुमात्रावलोकानुगतेर्न समाहिता पुरुषगतिस्तदा विषमगतां स्वशिबिकां रहूगण उपधार्य पुरुषानधिवहत आह हे वोढारः साध्वतिक्रमत किमिति विषममुह्यते यानमिति ॥२ ॥

अथ त ईश्वरवचः सोपालम्भमुपाकर्ण्योपाय - तुरीयाच्छङ्कितमनसस्तं

विज्ञापयाम्बभूवुः ॥३ ॥ न वयं नरदेव प्रमत्ता भवन्नियमानुपथाः साध्वेव वहामः ।

अयमधुनैव नियुक्तोऽपि न द्रुतं व्रजति नानेन सह वोढुमु ह वयं पारयाम इति ॥४ ॥

सांसर्गिको दोष एव नूनमेकस्यापि सर्वेषां सांसर्गिकाणां भवितुमर्हतीति निश्चित्य निशम्य कृपणवचो राजा रहूगण उपासितवृद्धोऽपि निसर्गेण बलात्कृत ईषदुत्थितमन्युरविस्पष्टब्रह्मतेजसं जातवेदसमिव रजसाऽऽवृतमतिराह || ५ || अहो कष्टं भ्रातर्व्यक्तमुरु परिश्रान्तो दीर्घमध्वानमेक एव ऊहिवान् सुचिरं नातिपीवा न संहननाङ्गो जरसा चोपद्रुतो भवान् सखे नो एवापर एते संघट्टिन इति बहु विप्रलब्धोऽप्यविद्यया रचित - द्रव्यगुणकर्माशयस्वचरमकलेवरेऽवस्तुनि संस्थानविशेषेऽहंममेत्यनध्यारोपितमिथ्याप्रत्ययो ब्रह्मभूतस्तूष्णीं शिबिकां पूर्ववदुवा || ६ || वे द्विजवर, कोई जीव पैरोंतले दब न जाय - इस डरसे आगेकी एक बाण पृथ्वी देखकर चलते थे । इसलिये दूसरे कहारोंके साथ उनकी चालका मेल नहीं खाता था; अतः जब ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

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पालकी टेढ़ी - सीधी होने लगी, तब यह देखकर राजा रहूगणने पालकी उठानेवालोंसे कहा – ' अरे कहारो! अच्छी तरह चलो, पालकीको इस प्रकार ऊँची - नीची करके क्यों चलते हो? ' ॥२ ॥

तब अपने स्वामीका यह आक्षेपयुक्त वचन सुनकर कहारोंको डर लगा कि कहीं राजा उन्हें दण्ड न दें । इसलिये उन्होंने राजासे इस प्रकार निवेदन किया || ३ || ' महाराज! यह हमारा प्रमाद नहीं है, हम आपकी नियममर्यादाके अनुसार ठीक - ठीक ही पालकी ले चल रहे हैं । यह एक नया कहार अभी - अभी पालकीमें लगाया गया है, तो भी यह जल्दी - जल्दी नहीं चलता । हमलोग इसके साथ पालकी नहीं ले जा सकते ' ॥४ ॥

कहारोंके ये दीन वचन सुनकर राजा रहूगणने सोचा, ' संसर्गसे उत्पन्न होनेवाला दोष एक व्यक्तिमें होनेपर भी उससे सम्बन्ध रखनेवाले सभी पुरुषोंमें आ सकता है । इसलिये यदि इसका प्रतीकार न किया गया तो धीरे - धीरे ये सभी कहार अपनी चाल बिगाड़ लेंगे । ' ऐसा सोचकर राजा रहूगणको कुछ क्रोध हो आया । यद्यपि उसने महापुरुषोंका सेवन किया था, तथापि क्षत्रियस्वभाववश बलात् उसकी बुद्धि रजोगुणसे व्याप्त हो गयी और वह उन द्विजश्रेष्ठसे, जिनका ब्रह्मतेज भस्मसे ढके हुए अग्निके समान प्रकट नहीं था, इस प्रकार व्यंगसे भरे वचन कहने लगा || ५ || ' अरे भैया! बड़े दुःखकी बात है, अवश्य ही तुम बहुत थक गये हो । ज्ञात होता है, तुम्हारे इन साथियोंने तुम्हें तनिक भी सहारा नहीं लगाया । इतनी दूरसे तुम अकेले ही बड़ी देरसे पालकी ढोते चले आ रहे हो । तुम्हारा शरीर भी तो विशेष मोटा - ताजा और हट्टा - कट्टा नहीं है और मित्र! बुढ़ापेने अलग तुम्हें दबा रखा है । ' इस प्रकार बहुत ताना मारनेपर भी वे पहले की ही भाँति चुपचाप पालकी उठाये चलते रहे! उन्होंने इसका कुछ भी बुरा न माना; क्योंकि उनकी दृष्टिमें तो पंचभूत, इन्द्रिय और अन्तःकरणका संघात यह अपना अन्तिम शरीर अविद्याका ही कार्य था । वह विविध अंगोंसे युक्त दिखायी देनेपर भी वस्तुतः था ही नहीं, इसलिये उसमें उनका मैं मेरेपनका मिथ्या अध्यास सर्वथा निवृत्त हो गया था और वे ब्रह्मरूप हो गये थे ॥ ६ ॥

अथ पुनः स्वशिबिकायां विषमगतायां प्रकुपित उवाच रहूगणः किमिदमरे त्वं जीवन्मृतो मां कदर्थीकृत्य भर्तृशासनमतिचरसि प्रमत्तस्य च ते करोमि चिकित्सां दण्डपाणिरिव जनताया यथा प्रकृतिं स्वां भजिष्यस इति ॥ ७ ॥

एवं बह्वबद्धमपि भाषमाणं नरदेवाभिमानं रजसा तमसानुविद्धेन मदेन तिरस्कृता - शेषभगवत्प्रियनिकेनं पण्डितमानिनं स भगवान् ब्राह्मणो ब्रह्मभूतः सर्वभूतसुहृदात्मा योगेश्वरचर्यायां नातिव्युत्पन्नमतिं स्मयमान इव विगतस्मय इदमाह ॥८ ॥

ब्राह्मण उवाच त्वयोदितं व्यक्तमविप्रलब्धं भर्तुः स मे स्याद्यदि वीर भारः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

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गन्तुर्यदि स्यादधिगम्यमध्वा पीवेति राशौ न विदां प्रवादः ॥९ स्थौल्यं कार्यं व्याधय आधयश्च क्षुत्तृड्भयं कलिरिच्छा जरा च । निद्रा रतिर्मन्युरहंमदः शुचो देहेन जातस्य हि मे न सन्ति ॥१० ( किन्तु ) पालकी अब भी सीधी चालसे नहीं चल रही है - यह देखकर राजा रहूगण क्रोधसे आग - बबूला हो गया और कहने लगा, ' अरे! यह क्या? क्या तू जीता ही मर गया है? तू मेरा निरादर करके ( मेरी ) आज्ञाका उल्लंघन कर रहा है! मालूम होता है, तू सर्वथा प्रमादी है । अरे! जैसे दण्डपाणि यमराज जन - समुदायको उसके अपराधोंके लिये दण्ड देते हैं, उसी

प्रकार मैं भी अभी तेरा इलाज किये देता हूँ । तब तेरे होश ठिकाने आ जायँगे ' ॥७ ॥

रहूगणको राजा होनेका अभिमान था, इसलिये वह इसी प्रकार बहुत - सी अनाप - शनाप बातें बोल गया । वह अपनेको बड़ा पण्डित समझता था, अतः रज - तमयुक्त अभिमानके वशीभूत होकर उसने भगवान् के अनन्य प्रीतिपात्र भक्तवर भरतजीका तिरस्कार कर डाला । योगेश्वरोंकी विचित्र कहनी - करनीका तो उसे कुछ पता ही न था । उसकी ऐसी कच्ची बुद्धि देखकर वे सम्पूर्ण प्राणियोंके सुहृद् एवं आत्मा, ब्रह्मभूत ब्राह्मणदेवता मुसकराये और बिना किसी प्रकारका अभिमान किये इस प्रकार कहने लगे ॥ ८ ॥

जडभरतने कहा — राजन्! तुमने जो कुछ कहा वह यथार्थ है । उसमें कोई उलाहना नहीं है । यदि भार नामकी कोई वस्तु है तो ढोनेवालेके लिये है, यदि कोई मार्ग है तो वह चलनेवालेके लिये है । मोटापन भी उसीका है, यह सब शरीरके लिये कहा जाता है, आत्माके लिये नहीं । ज्ञानीजन ऐसी बात नहीं करते ॥ ९ ॥ स्थूलता, कृशता, आधि, व्याधि, भूख,

प्यास, भय, कलह, इच्छा, बुढ़ापा, निद्रा, प्रेम, क्रोध, अभिमान और शोक – ये सब धर्म देहाभिमानको लेकर उत्पन्न होनेवाले जीवमें रहते हैं; मुझमें इनका लेश भी नहीं है ॥१० ॥

जीवन्मृतत्वं नियमेन राजन् आद्यन्तवद्यद्विकृतस्य दृष्टम् । स्वस्वाम्यभावो ध्रुव ईड्य यत्र तर्ह्यच्यतेऽसौ विधिकृत्ययोगः ॥११ विशेषबुद्धेर्विवरं मनाक् च पश्याम यन्न व्यवहारतोऽन्यत् । क ईश्वरस्तत्र किमीशितव्यं तथापि राजन् करवाम किं ते ॥१२ उन्मत्तमत्तजडवत्स्वसंस्थां गतस्य मे वीर चिकित्सितेन । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

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अर्थः कियान् भवता शिक्षितेन स्तब्धप्रमत्तस्य च पिष्टपेषः ॥१३ श्रीशुक उवाच एतावदनुवादपरिभाषया प्रत्युदीर्य मुनिवर उपशमशील उपरतानात्म्यनिमित्त उपभोगेन कर्मारब्धं व्यपनयन् राजयानमपि तथोवाह || १४ || स चापि पाण्डवेय सिन्धुसौवीरपति - स्तत्त्वजिज्ञासायां सम्यक् श्रद्धयाधिकृताधिकार-स्तद्धृदयग्रन्थिमोचनं द्विजवच आश्रुत्य बहुयोगग्रन्थसम्मतं त्वरयावरुह्य शिरसा पादमूलमुपसृतः क्षमापयन् विगतनृपदेवस्मय उवाच ॥१५ ॥

कस्त्वं निगूढश्चरसि द्विजानां बिभर्षि सूत्रं कतमोऽवधूतः । कस्यासि कुत्रत्य इहापि कस्मात् क्षेमाय नश्चेदसि नोत शुक्लः ॥१६ राजन्! तुमने जो जीने - मरनेकी बात कही - सो जितने भी विकारी पदार्थ हैं, उन सभीमें नियमितरूपसे ये दोनों बातें देखी जाती हैं; क्योंकि वे सभी आदि - अन्तवाले हैं । यशस्वी नरेश! जहाँ स्वामी - सेवकभाव स्थिर हो, वहीं आज्ञापालनादिका नियम भी लागू हो सकता है ॥११ ॥ तुम राजा हो और मैं प्रजा हूँ ' इस प्रकारकी भेदबुद्धिके लिये मुझे व्यवहारके

सिवा और कहीं तनिक भी अवकाश नहीं दिखायी देता । परमार्थदृष्टिसे देखा जाय तो किसे स्वामी कहें और किसे सेवक? फिर भी राजन्! तुम्हें यदि स्वामित्वका अभिमान है तो कहो, मैं तुम्हारी क्या सेवा करूँ ॥१२ ॥ वीरवर! मैं मत्त, उन्मत्त और जड़के समान अपनी ही

स्थितिमें रहता हूँ । मेरा इलाज करके तुम्हें क्या हाथ लगेगा? यदि मैं वास्तवमें जड और प्रमादी ही हूँ, तो भी मुझे शिक्षा देना पिसे हुएको पीसनेके समान व्यर्थ ही होगा ॥१३ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! मुनिवर जडभरत यथार्थ तत्त्वका उपदेश करते हुए इतना उत्तर देकर मौन हो गये । उनका देहात्मबुद्धिका हेतुभूत अज्ञान निवृत्त हो चुका था, इसलिये वे परम शान्त हो गये थे । अतः इतना कहकर भोगद्वारा प्रारब्धक्षय करनेके लिये वे फिर पहलेके ही समान उस पालकीको कन्धेपर लेकर चलने लगे ॥१४ ॥ सिन्धु - सौवीरनरेश

रहूगण भी अपनी उत्तम श्रद्धाके कारण तत्त्वजिज्ञासाका पूरा अधिकारी था । जब उसने उन द्विजश्रेष्ठके अनेकों योग - ग्रन्थोंसे समर्थित और हृदयकी ग्रन्थिका छेदन करनेवाले ये वाक्य सुने, तब वह तत्काल पालकीसे उतर पड़ा । उसका राजमद सर्वथा दूर हो गया और वह उनके चरणोंमें सिर रखकर अपना अपराध क्षमा कराते हुए इस प्रकार कहने लगा ॥१५ ॥ ‘ देव!

आपने द्विजोंका चिह्न यज्ञोपवीत धारण कर रखा है, बतलाइये इस प्रकार प्रच्छन्नभावसे विचरनेवाले आप कौन हैं? क्या आप दत्तात्रेय आदि अवधूतोंमेंसे कोई हैं? आप किसके पुत्र हैं, आपका कहाँ जन्म हुआ है और यहाँ कैसे आपका पदार्पण हुआ है? यदि आप हमारा ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

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कल्याण करने पधारे हैं, तो क्या आप साक्षात् सत्त्वमूर्ति भगवान् कपिलजी ही तो नहीं हैं? ॥१६ ॥

नाहं विशङ्के सुरराजवज्रा-न्न त्र्यक्षशूलान्न यमस्य दण्डात् ।

नाग्न्यर्कसोमानिलवित्तपास्त्रा-च्छङ्के भृशं ब्रह्मकुलावमानात् ॥१७

तद् ब्रूह्यसङ्गो जडवन्निगूढ-विज्ञानवीर्यो विचरस्यपारः । वचांसि योगग्रथितानि साधो न नः क्षमन्ते मनसापि भेत्तुम् ॥१८ अहं च योगेश्वरमात्मतत्त्व-विदां मुनीनां परमं गुरुं वै । प्रष्टुं प्रवृत्तः किमिहारणं तत् साक्षाद्धरिं ज्ञानकलावतीर्णम् ॥१९ स वै भवाल्लोँकनिरीक्षणार्थ-मव्यक्तलिङ्गो विचरत्यपिस्वित् । योगेश्वराणां गतिमन्धबुद्धिः कथं विचक्षीत गृहानुबन्धः ॥२० दृष्टः श्रमः कर्मत आत्मनो वै भर्तुर्गन्तुर्भवतश्चानुमन्ये । यथासतोदानयनाद्यभावात् समूल इष्टो व्यवहारमार्गः ॥२१ स्थाल्यग्नितापात्पयसोऽभिताप-स्तत्तापतस्तण्डुलगर्भरन्धिः । देहेन्द्रियास्वाशयसन्निकर्षात् तत्संसृतिः पुरुषस्यानुरोधात् ॥२२ शास्ताभिगोप्ता नृपतिः प्रजानां यः किङ्करो वै न पिनष्टि पिष्टम् । स्वधर्ममाराधनमच्युतस्य यदीहमानो विजहात्यघौघम् ॥२३ मुझे इन्द्रके वज्रका कोई डर नहीं है, न मैं महादेवजीके त्रिशूलसे डरता हूँ और न यमराजके दण्डसे । मुझे अग्नि, सूर्य, चन्द्र, वायु और कुबेरके अस्त्र - शस्त्रोंका भी कोई भय ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

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नहीं है; परन्तु मैं ब्राह्मणकुलके अपमानसे बहुत ही डरता हूँ ॥१७ ॥ अतः कृपया बतलाइये,

इस प्रकार अपने विज्ञान और शक्तिको छिपाकर मूर्खोकी भाँति विचरनेवाले आप कौन हैं? विषयोंसे तो आप सर्वथा अनासक्त जान पड़ते हैं । मुझे आपकी कोई थाह नहीं मिल रही है । साधो! आपके योगयुक्त वाक्योंकी बुद्धिद्वारा आलोचना करनेपर भी मेरा सन्देह दूर नहीं होता ॥१८ ॥ मैं आत्मज्ञानी मुनियोंके परम गुरु और साक्षात् श्रीहरिकी ज्ञानशक्तिके अवतार

योगेश्वर भगवान् कपिलसे यह पूछनेके लिये जा रहा था कि इस लोकमें एकमात्र शरण लेनेयोग्य कौन है ॥१९ ॥ क्या आप वे कपिलमुनि ही हैं, जो लोकोंकी दशा देखनेके लिये इस

प्रकार अपना रूप छिपाकर विचर रहे हैं? भला, घरमें आसक्त रहनेवाला विवेकहीन पुरुष योगेश्वरोंकी गति कैसे जान सकता है? ॥२० ॥

मैंने युद्धादि कर्मोंमें अपनेको श्रम होते देखा है, इसलिये मेरा अनुमान है कि बोझा ढोने और मार्गमें चलनेसे आपको भी अवश्य ही होता होगा । मुझे तो व्यवहारमर्ग भी सत्य ही जान पड़ता है; क्योंकि मिथ्या घड़ेसे जल लाना आदि कार्य नहीं होता ॥२१ ॥ ( देहादिके धर्मोंका

आत्मापर कोई प्रभाव ही नहीं होता, ऐसी बात भी नहीं है ) चूल्हेपर रखी हुई बटलोई जब अग्निसे तपने लगती है, तब उसका जल भी खौलने लगता है और फिर उस जलसे चावलका भीतरी भाग भी पक जाता है । इसी प्रकार अपनी उपाधिके धर्मोंका अनुवर्तन करनेके कारण देह, इन्द्रिय, प्राण और मनकी सन्निधिसे आत्माको भी उनके धर्म श्रमादिका अनुभव होता ही है ॥२२ ॥ आपने जो दण्डादिकी व्यर्थता बतायी, सो राजा तो प्रजाका शासन और पालन

करनेके लिये नियुक्त किया हुआ उसका दास ही है । उसका उन्मत्तादिको दण्ड देना पिसे हुएको पीसने के समान व्यर्थ नहीं हो सकता; क्योंकि अपने धर्मका आचरण करना भगवान्‌की सेवा ही है, उसे करनेवाला व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण पापराशिको नष्ट कर देता है ॥२३ ॥

तन्मे भवान्नरदेवाभिमान-मदेन तुच्छीकृतसत्तमस्य । कृषीष्ट मैत्रीदृशमार्तबन्धो यथा तरे सदवध्यानमंहः ॥२४ न विक्रिया विश्वसुहृत्सखस्य साम्येन वीताभिमतेस्तवापि । महद्विमानात् स्वकृताद्धि मादृङ् नङ्क्ष्यत्यदूरादपि शूलपाणिः ॥२५ ‘ दीनबन्धो! राजत्वके अभिमानसे उन्मत्त होकर मैंने आप - जैसे परम साधुकी अवज्ञा की है । अब आप ऐसी कृपादृष्टि कीजिये, जिससे इस साधु - अवज्ञारूप अपराधसे मैं मुक्त हो जाऊँ ॥२४ ॥ आप देहाभिमानशून्य और विश्वबन्धु श्रीहरिके अनन्य भक्त हैं; इसलिये सबमें

समान दृष्टि होनेसे इस मानापमानके कारण आपमें कोई विकार नहीं हो सकता तथापि एक महापुरुषका अपमान करनेके कारण मेरे जैसा पुरुष साक्षात् त्रिशूलपाणि महादेवजीके ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

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समान प्रभावशाली होनेपर भी, अपने अपराधसे अवश्य थोड़े ही कालमें नष्ट हो जायगा ' ॥२५ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे दशमोऽध्यायः ॥१० ॥

१. प्रा ० पा ० — सिन्धुपते । २. प्रा ० पा ० — शिबिकावाहक ० । ३. प्रा ० पा०-पुरुषान्वेषसमये । ४. प्रा ० पा ० - यावान् संहननांगो । ५ प्रा ० पा ० - मतदर्पण ० । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

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अथैकादशोऽध्यायः राजा रहूगणको भरतजीका उपदेश ब्राह्मण उवाच अकोविदः कोविदवादवादान् वदस्यथो नातिविदां ” वरिष्ठः । न सूरयो हि व्यवहारमेनं तत्त्वावमर्शेन सहामनन्ति ॥१ तथैव राजन्नुरुगार्हमेध-वितानविद्योरुविजृम्भितेषु । न वेदवादेषु हि तत्त्ववादः प्रायेण शुद्धो नु चकास्ति साधुः ॥२ न तस्य तत्त्वग्रहणाय साक्षाद् वरीयसीरपि वाचः समासन् । स्वप्ने निरुक्त्या गृहमेधिसौख्यं न यस्य हेयानुमितं स्वयं स्यात् ॥३ जडभरतने कहा — राजन्! तुम अज्ञानी होनेपर भी पण्डितोंके समान ऊपर - ऊपरकी तर्क - वितर्कयुक्त बात कह रहे हो । इसलिये श्रेष्ठ ज्ञानियोंमें तुम्हारी गणना नहीं हो सकती । तत्त्वज्ञानी पुरुष इस अविचारसिद्ध स्वामी - सेवक आदि व्यवहारको तत्त्वविचारके समय सत्यरूपसे स्वीकार नहीं करते ॥१ ॥ लौकिक व्यवहारके समान ही वैदिक व्यवहार भी सत्य

नहीं है, क्योंकि वेदवाक्य भी अधिकतर गृहस्थजनोचित यज्ञविधिके विस्तारमें ही व्यस्त हैं, राग - द्वेषादि दोषोंसे रहित विशुद्ध तत्त्वज्ञानकी पूरी - पूरी अभिव्यक्ति प्रायः उनमें भी नहीं हुई है ॥२ ॥ जिसे गृहस्थोचित यज्ञादि कर्मोंसे प्राप्त होनेवाला स्वर्गादि सुख स्वप्नके समान हेय

नहीं जान पड़ता, उसे तत्त्वज्ञान करानेमें साक्षात् उपनिषद् - वाक्य भी समर्थ नहीं है ॥३ ॥

यावन्मनो रजसा पूरुषस्य सत्त्वेन वा तमसा वानुरुद्धम् । चेतोभिराकृतिभिरातनोति निरङ्कुशं कुशलं चेतरं वा ॥४ स वासनात्मा विषयोपरक्तो गुणप्रवाहो विकृतः षोडशात्मा । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

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बिभ्रत्पृथङ्नामभि रूपभेद-मन्तर्बहिष्ट्वं च पुरैस्तनोति ॥५ दुःखं सुखं व्यतिरिक्तं च तीव्रं कालोपपन्नं फलमाव्यनक्ति । आलिङ्ग्य मायारचितान्तरात्मा स्वदेहिनं संसृतिचक्रकूटः ॥६ तावानयं व्यवहारः सदाविः क्षेत्रज्ञसाक्ष्यो भवति स्थूलसूक्ष्मः । तस्मान्मनो लिङ्गमदो वदन्ति गुणागुणत्वस्य परावरस्य ॥७ गुणानुरक्तं व्यसनाय जन्तोः क्षेमाय नैर्गुण्यमथो मनः स्यात् । यथा प्रदीपो घृतवर्तिमश्नन् शिखाः सधूमा भजति ह्यन्यदा स्वम् । पदं तथा गुणकर्मानुबद्धं वृत्तीर्मनः श्रयतेऽन्यत्र तत्त्वम् ॥८ एकादशासन्मनसो हि वृत्तय आकूतयः पञ्च धियोऽभिमानः । मात्राणि कर्माणि पुरं च तासां वदन्ति हैकादश वीर भूमीः ॥९ गन्धाकृतिस्पर्शरसश्रवांसि विसर्गरत्यर्त्यभिजल्पशिल्पाः । एकादशं स्वीकरणं ममेति शय्यामहं द्वादशमेक आहुः ॥१० जबतक मनुष्यका मन सत्त्व, रज अथवा तमोगुणके वशीभूत रहता है, तबतक वह बिना किसी अंकुशके उसकी ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियोंसे शुभाशुभ कर्म कराता रहता है ॥४ ॥ यह मन वासनामय, विषयासक्त, गुणोंसे प्रेरित, विकारी और भूत एवं इन्द्रियरूप

सोलह कलाओंमें मुख्य है । यही भिन्न - भिन्न नामोंसे देवता और मनुष्यादिरूप धारण करके शरीररूप उपाधियोंके भेदसे जीवकी उत्तमता और अधमताका कारण होता है ॥५ ॥ यह

मायामय मन संसारचक्रमें छलनेवाला है, यही अपनी देहके अभिमानी जीवसे मिलकर उसे कालक्रमसे प्राप्त हुए सुख - दुःख और इनसे व्यतिरिक्त मोहरूप अवश्यम्भावी फलोंकी अभिव्यक्ति करता है ॥ ६ ॥ जबतक यह मन रहता है, तभीतक जाग्रत और स्वप्नावस्थाका

व्यवहार प्रकाशित होकर जीवका दृश्य बनता है । इसलिये पण्डितजन मनको ही त्रिगुणमय ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1000

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अधम संसारका और गुणातीत परमोत्कृष्ट मोक्षपदका कारण बताते हैं ॥ ७ ॥

विषयासक्त मन जीवको संसार - संकटमें डाल देता है, विषयहीन होनेपर वही उसे शान्तिमय मोक्षपद प्राप्त करा देता है । जिस प्रकार घीसे भीगी हुई बत्तीको खानेवाले दीपकसे तो धुएँवाली शिखा निकलती रहती है और जब घी समाप्त हो जाता है तब वह अपने कारण अग्नितत्त्वमें लीन हो जाता है— उसी प्रकार विषय और कर्मोंसे आसक्त हुआ मन तरह-तरहकी वृत्तियोंका आश्रय लिये रहता है और इनसे मुक्त होनेपर वह अपने तत्त्वमें लीन हो जाता है ॥८ ॥

वीरवर! पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय और एक अहंकार- ये ग्यारह मनकी वृत्तियाँ हैं तथा पाँच प्रकारके कर्म, पाँच तन्मात्र और एक शरीर – ये ग्यारह उनके आधारभूत विषय कहे जाते हैं || ९ || गन्ध, रूप, स्पर्श, रस और शब्द - ये पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके विषय हैं; मलत्याग, सम्भोग, गमन, भाषण और लेना - देना आदि व्यापार - ये पाँच कर्मेन्द्रियोंके विषय हैं तथा शरीरको ' यह मेरा है ' इस प्रकार स्वीकार करना अहंकारका विषय है । कुछ लोग अहंकारको मनकी बारहवीं वृत्ति और उसके आश्रय शरीरको बारहवाँ विषय मानते हैं ॥१० ॥

द्रव्यस्वभावाशयकर्मकालै-रेकादशामी मनसो विकाराः । सहस्रशः शतशः कोटिशश्च क्षेत्रज्ञतो न मिथो न स्वतः स्युः ॥११ क्षेत्रज्ञ एता मनसो विभूती-र्जीवस्य मायारचितस्य नित्याः । आविर्हिताः क्वापि तिरोहिताश्च शुद्ध विचष्टे विशुद्धकर्तुः ॥ १२ क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः पुराणः साक्षात्स्वयंज्योतिरजः परेशः । नारायणो भगवान् वासुदेवः स्वमाययाऽऽत्मन्यवधीयमानः ॥ १३ यथानिलः स्थावरजङ्गमाना-मात्मस्वरूपेण निविष्ट ईशेत् । एवं परो भगवान् वासुदेवः क्षेत्रज्ञ आत्मेदमनुप्रविष्टः ॥१४ न यावदेतां तनुभृन्नरेन्द्र विधूय मायां वयुनोदयेन । विमुक्तसङ्गो जितषट्सपत्नो ****** ebook converter DEMO Watermarks *******