श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1121–1130
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1121–1130
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* वस्तुकी स्वाभाविक शक्ति इस बातकी प्रतीक्षा नहीं करती कि यह मुझपर श्रद्धा रखता है कि नहीं, जैसे अग्नि या अमृत । हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तैरपि स्मृतः । अनिच्छयापि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः ॥ ' दुष्टचित्त मनुष्यके द्वारा स्मरण किये जानेपर भी भगवान् श्रीहरि पापोंको हर लेते हैं । अनजानमें या अनिच्छासे स्पर्श करनेपर भी अग्नि जलाती ही है । ' भगवान्के नामका उच्चारण केवल पापको ही निवृत्त करता है, इसका और कोई फल नहीं है, यह धारणा भ्रमपूर्ण है; क्योंकि शास्त्रमें कहा है—
सकृदुच्चरितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम् । बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति ॥
' जिसने हरि’— ये दो अक्षर एक बार भी उच्चारण कर लिये, उसने मोक्ष प्राप्त करनेके लिये परिकर बाँध लिया, फेंट कस ली । ' इस वचनसे यह सिद्ध होता है कि भगवन्नाम मोक्षका भी साधन है । मोक्षके साथ - ही - साथ यह धर्म, अर्थ और कामका भी साधन है; क्योंकि ऐसे अनेक प्रमाण मिलते हैं, जिनमें त्रिवर्ग - सिद्धिका भी नाम ही कारण बतलाया गया है— न गङ्गा न गयासेतुर्न काशी न च पुष्करम् । जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम् ॥
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः । अधीतास्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयम् ॥
अश्वमेधादिभिर्यज्ञैर्नरमेधैः सदक्षिणैः । यजितं तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयम् ॥
प्राणप्रयाणपाथेयं संसारव्याधिभेषजम् । दुःखक्लेशपरित्राणं हरिरित्यक्षरद्वयम् ॥
‘ जिसकी जिह्वाके नोकपर ' हरि ' ये दो अक्षर बसते हैं, उसे गंगा, गया, सेतुबन्ध, काशी और पुष्करकी कोई आवश्यकता नहीं, अर्थात् उनकी यात्रा, स्नान आदिका फल भगवन्नामसे ही मिल जाता है । जिसने ' हरि ' इन दो अक्षरोंका उच्चारण कर लिया, उसने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेदका अध्ययन कर लिया । जिसने ' हरि ' ये दो अक्षर उच्चारण किये, उसने दक्षिणाके सहित अश्वमेध आदि यज्ञोंके द्वारा यजन कर लिया । ' हरि ' ये दो अक्षर मृत्युके पश्चात् परलोकके मार्गमें प्रयाण करनेवाले प्राणोंके लिये पाथेय ( मार्गके लिये भोजनकी सामग्री ) हैं, संसाररूप रोगके लिये सिद्ध औषध हैं और जीवनके दुःख और क्लेशोंके लिये परित्राण हैं । ' -इन वचनोंसे यह सिद्ध होता है कि भगवन्नाम अर्थ, धर्म, काम – इन तीन वर्गोंका भी साधक है । यह बात ‘ हरि ', ' नारायण ' आदि कुछ विशेष नामोंके सम्बन्धमें ही नहीं है, प्रत्युत सभी नामोंके सम्बन्धमें है; क्योंकि स्थान - स्थानपर यह बात सामान्यरूपसे कही गयी है कि अनन्तके नाम, विष्णुके नाम, हरिके नाम इत्यादि । भगवान्के सभी नामोंमें एक ही शक्ति है । नाम - संकीर्तन आदिमें वर्ण - आश्रम आदिका भी नियम नहीं है— ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः स्त्रियः शूद्रान्त्यजातयः । यत्र तत्रानुकुर्वन्ति विष्णोर्नामानुकीर्तनम् । सर्वपापविनिर्मुक्तास्तेऽपि यान्ति ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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सनातनम् ॥ हैं । ’ यथा— X X X X कृष्णेति मङ्गलं नाम यस्य वाचि प्रवर्तते महापातककोटयः ॥ च ॥ X X भस्मीभवन्ति सद्यस्तु वेदपाठसहस्राणि प्रादक्षिण्यं भुवः शतम् । कृष्णनामजपस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ****** ebook converter DEMO Watermarks ******* ' ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री, शूद्र, अन्त्यज आदि जहाँ - तहाँ विष्णुभगवान्के नामका अनुकीर्तन करते रहते हैं, वे भी समस्त पापोंसे मुक्त होकर सनातन परमात्माको प्राप्त होते नाम - संकीर्तनमें देश - काल आदिके नियम भी नहीं हैं—
न देशकालनियमः शौचाशौचविनिर्णयः । परं संकीर्तनादेव राम रामेति मुच्यते ॥
न देशनियमो राजन्न कालनियमस्तथा । विद्यते नात्र संदेहो विष्णोर्नामानुकीर्तने ॥
कालोऽस्ति यज्ञे दाने वा स्नाने कालोऽस्ति सज्जपे । विष्णुसंकीर्तने कालो नास्त्यत्र पृथिवीपते ॥ गच्छंस्तिष्ठन्स्वपन्वापि पिबन्भुञ्जञ्जपंस्तथा । कृष्ण कृष्णेति संकीर्त्य मुच्यते पापकञ्चुकात् ॥ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा । यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥ ‘ देश - कालका नियम नहीं है, शौच - अशौच आदिका निर्णय करनेकी भी आवश्यकता नहीं है । केवल ' राम ' यह संकीर्तन करनेमात्रसे जीव मुक्त हो जाता है । × × × भगवान्के नामका संकीर्तन करनेमें न देशका नियम है और न तो कालका । इसमें कोई सन्देह नहीं । राजन्! यज्ञ, दान, तीर्थस्नान अथवा विधिपूर्वक जपके लिये शुद्ध कालकी अपेक्षा है, परन्तु भगवन्नामके इस संकीर्तनमें काल - शुद्धिकी कोई आवश्यकता नहीं है । चलते - फिरते, खड़े रहते — सोते, खाते - पीते और जप करते हुए भी ' कृष्ण - कृष्ण ' ऐसा संकीर्तन करके मनुष्य पापके केंचुलसे छूट जाता है । xx अपवित्र हो या पवित्र - सभी अवस्थाओंमें ( चाहे किसी भी अवस्थामें ) जो कमलनयन भगवान्का स्मरण करता है, वह बाहर - भीतर पवित्र हो जाता है । ' सर्वेषामपि यज्ञानां लक्षणानि व्रतानि च । तीर्थस्नानानि सर्वाणि तपांस्यनशनानि
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‘ जिसकी जिह्वापर ‘ कृष्ण - कृष्ण - कृष्ण ' यह मंगलमय नाम नृत्य करता रहता है, उसकी कोटि - कोटि महापातकराशि तत्काल भस्म हो जाती है । सारे यज्ञ, लाखों व्रत, सर्वतीर्थ - स्नान, तप, अनेकों उपवास, हजारों वेद - पाठ, पृथ्वीकी सैकड़ों प्रदक्षिणा कृष्णनाम - जपके सोलहवें हिस्सेके बराबर भी नहीं हो सकतीं । ' भगवन्नामके कीर्तनमें ही यह फल हो, सो बात नहीं । उनके श्रवण और स्मरणमें भी वही फल है । दशम स्कन्धके अन्तमें कहेंगे ' जिनके नामका स्मरण और उच्चारण अमंगलघ्न है । ' शिवगीता और पद्मपुराणमें कहा है— आश्चर्ये वा भये शोके क्षते वा मम नाम यः । व्याजेन वा स्मरेद्यस्तु स याति परमां गतिम् ॥ प्रयागे चाप्रयाणे च यन्नाम स्मरतां नृणाम् । सद्यो नश्यति पापौघो नमस्तस्मै चिदात्मने ॥ ' भगवान् कहते हैं कि आश्चर्य, भय, शोक, क्षत ( चोट लगने ) आदिके अवसरपर जो मेरा नाम बोल उठता है, या किसी व्याजसे स्मरण करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है । मृत्यु या जीवन – चाहे जब कभी भगवान्का नाम स्मरण करनेवाले मनुष्योंकी पापराशि तत्काल नष्ट हो जाती है । उन चिदात्मा प्रभुको नमस्कार है । ' ' इतिहासोत्तम ' में कहा गया है— श्रुत्वा नामानि तत्रस्थास्तेनोक्तानि हरेर्द्विज । नारका नरकान्मुक्ताः सद्य एव महामुने । ‘ महामुनि ब्राह्मणदेव! भक्तराजके मुखसे नरकमें रहनेवाले प्राणियोंने श्रीहरिके नामका श्रवण किया और वे तत्काल नरकसे मुक्त हो गये । ' यज्ञ - यागादिरूप धर्म अपने अनुष्ठानके लिये जिस पवित्र देश, काल, पात्र, शक्ति, सामग्री, श्रद्धा, मन्त्र, दक्षिणा आदिकी अपेक्षा रखता है, इस कलियुगमें उसका सम्पन्न होना अत्यन्त कठिन है । भगवन्नाम संकीर्तनके द्वारा उसका फल अनायास ही प्राप्त किया जा सकता है । भगवान् शंकर पार्वतीके प्रति कहते हैं— ईशोऽहं सर्वजगतां नाम्नां विष्णोर्हि जापकः । सत्यं सत्यं वदाम्येव हरेर्नान्या गतिर्नृणाम् ॥ ‘ सम्पूर्ण जगत्का स्वामी होनेपर भी मैं विष्णुभगवान्के नामका ही जप करता हूँ । मैं तुमसे सत्य - सत्य कहता हूँ, भगवान्को छोड़कर जीवोंके लिये अन्य कर्मकाण्ड आदि कोई भी गति नहीं है । ' श्रीमद्भागवतमें ही यह बात आगे आनेवाली है कि सत्ययुगमें ध्यानसे, त्रेतामें यज्ञसे और द्वापरमें अर्चा - पूजासे जो फल मिलता है, कलियुगमें वह केवल भगवन्नामसे मिलता है । और भी है कि कलियुग दोषोंका निधि है, परन्तु इसमें एक महान् गुण यह है कि श्रीकृष्ण - संकीर्तनमात्रसे ही जीव बन्धनमुक्त होकर परमात्माको प्राप्त कर लेता है । इस प्रकार एक बारके नामोच्चारणकी भी अनन्त महिमा शास्त्रोंमें कही गयी है । यहाँ मूल प्रसंगमें ही — ‘ एकदापि ' कहा गया है; ' सकृदुच्चरितम् ' का उल्लेख किया जा चुका है । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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बार - बार जो नामोच्चारणका विधान है, वह आगे और पाप न उत्पन्न हो जायँ, इसके लिये है । ऐसे भी वचन मिलते हैं कि भगवान्के नामका उच्चारण करनेसे भूत, वर्तमान और भविष्यके सारे ही पाप भस्म हो जाते है, यथा-वर्तमानं च यत् पापं यद् भूतं यद् भविष्यति । तत्सर्वं निर्दहत्याशु गोविन्दानलकीर्तनम् ॥ फिर भी भगवत्प्रेमी जीवको पापोंके नाशपर अधिक दृष्टि नहीं रखनी चाहिये; उसे तो भक्ति - भावकी दृढ़ताके लिये, भगवान्के चरणोंमें अधिकाधिक प्रेम बढ़ता जाय, इस दृष्टिसे अहर्निश नित्य - निरन्तर भगवान् के मधुर - मधुर नाम जपते जाना चाहिये । जितनी अधिक निष्कामता होगी, उतनी ही उतनी नामकी पूर्णता प्रकट होती जायगी, अनुभवमें आती जायगी । अनेक तार्किकोंके मनमें यह कल्पना उठती है कि नामकी महिमा वास्तविक नहीं है, अर्थवादमात्र है । उनके मनमें यह धारणा तो हो ही जाती है कि शराबकी एक बूँद भी पतित बनानेके लिये पर्याप्त है, परंतु यह विश्वास नहीं होता कि भगवान्का एक नाम भी परम कल्याणकारी है । शास्त्रोंमें भगवन्नाम - महिमाको अर्थवाद समझना पाप बताया है । X X X X X X X X X X X X X ' जो मनुष्य मेरे नाम - कीर्तनके विविध फल सुनकर उसपर श्रद्धा नहीं करता और उसे अर्थवाद मानता है, उसको संसारके विविध घोर तापोंसे पीड़ित होना पड़ता है और उसे मैं अनेक दुःखोंमें डाल देता हूँ । ' x x x ' जो मनुष्य भगवान् के नाममें अर्थवादकी सम्भावना करता है, वह मनुष्योंमें अत्यन्त पापी है और उसे नरकमें गिरना पड़ता है । ' ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पुराणेष्वर्थवादत्वं ये वदन्ति नराधमाः । तैरर्जितानि पुण्यानि तद्वदेव भवन्ति हि ॥
मन्नामकीर्तनफलं विविधं निशम्य न श्रद्दधाति मनुते यदुतार्थवादम् ।
यो मानुषस्तमिह दुःखचये क्षिपामि संसारघोरविविधार्तिनिपीडिताङ्गम् ॥
अर्थवादं हरेर्नाम्नि संभावयति यो नरः । स पापिष्ठो मनुष्याणां नरके पतति स्फुटम् ॥ ‘ जो नराधम पुराणोंमें अर्थवादकी कल्पना करते हैं उनके द्वारा उपार्जित पुण्य वैसे ही हो जाते हैं । '
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अथ तृतीयोऽध्यायः यम और यमदूतोंका संवाद राजोवाच निशम्य देव: स्वभटोपवर्णितं
प्रत्याह किं तान् प्रति धर्मराजः ।
एवं हताज्ञो विहतान्मुरारे-नैदेशिकैर्यस्य वशे जनोऽयम् ॥१
यमस्य देवस्य न दण्डभङ्गः कुतश्चनर्षे श्रुतपूर्व आसीत् । एतन्मुने वृश्चति लोकसंशयं न हि त्वदन्य इति मे विनिश्चितम् ॥२ श्रीशुक उवाच
भगवत्पुरुषै राजन् याम्याः प्रतिहतोद्यमाः ।
पतिं विज्ञापयामासुर्यमं संयमनीपतिम् ॥३
यमदूता ऊचुः
कति सन्तीह शास्तारो जीवलोकस्य वै प्रभो ।
त्रैविध्यं कुर्वतः कर्म फलाभिव्यक्तिहेतवः ॥४
यदि स्युर्बहवो लोके शास्तारो दण्डधारिणः ।
कस्य स्यातां न वा कस्य मृत्युश्चामृतमेव वा ॥ ५
किन्तु शास्तृबहुत्वे स्याद्बहूनामिह कर्मिणाम् ।
शास्तृत्वमुपचारो हि यथा मण्डलवर्तिनाम् ॥ ६
अतस्त्वमेको भूतानां सेश्वराणामधीश्वरः ।
शास्ता दण्डधरो नॄणां शुभाशुभविवेचनः ॥७
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तस्य ते विहतो दण्डो न लोके वर्ततेऽधुना ।
चतुर्भिरद्भुतैः सिद्धैराज्ञा ते विप्रलम्भिता ॥८
राजा परीक्षित्ने पूछा – भगवन्! देवाधिदेव धर्मराजके वशमें सारे जीव हैं और भगवान्के पार्षदोंने उन्हींकी आज्ञा भंग कर दी तथा उनके दूतोंको अपमानित कर दिया । जब उनके दूतोंने यमपुरीमें जाकर उनसे अजामिलका वृत्तान्त कह सुनाया, तब सब कुछ सुनकर उन्होंने अपने दूतोंसे क्या कहा? || १ || ऋषिवर! मैंने पहले यह बात कभी नहीं सुनी कि किसीने किसी भी कारणसे धर्मराजके शासनका उल्लंघन किया हो । भगवन्! इस विषयमें लोग हु सन्देह करेंगे और उसका निवारण आपके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं कर सकता, ऐसा मेरा निश्चय है ॥ २ ॥
श्रीशुकदेवजीने कहा- परीक्षित्! जब भगवान्के पार्षदोंने यमदूतोंका प्रयत्न विफल कर दिया, तब उन लोगोंने संयमनीपुरीके स्वामी एवं अपने शासक यमराजके पास जाकर निवेदन किया ॥३ ॥
यमदूतोंने कहा — प्रभो! संसारके जीव तीन प्रकारके कर्म करते हैं - पाप, पुण्य अथवा दोनोंसे मिश्रित । इन जीवोंको उन कर्मोंका फल देनेवाले शासक संसारमें कितने हैं? ॥४ ॥
यदि संसारमें दण्ड देनेवाले बहुत - से शासक हों, तो किसे सुख मिले और किसे दुःख — इसकी व्यवस्था एक - सी न हो सकेगी ॥५ ॥ संसारमें कर्म करनेवालोंके अनेक होनेके कारण यदि
उनके शासक भी अनेक हों, तो उन शासकोंका शासकपना नाममात्रका ही होगा, जैसे एक सम्राट्के अधीन बहुत - से नाममात्रके सामन्त होते हैं ॥ ६ ॥ इसलिये हम तो ऐसा समझते हैं
कि अकेले आप ही समस्त प्राणियों और उनके स्वामियोंके भी अधीश्वर हैं । आप ही मनुष्योंके पाप और पुण्यके निर्णायक, दण्डदाता और शासक हैं ॥७ ॥ प्रभो! अबतक संसारमें कहीं
भी आपके द्वारा नियत किये हुए दण्डकी अवहेलना नहीं हुई थी; किन्तु इस समय चार अद्भुत सिद्धोंने आपकी आज्ञाका उल्लंघन कर दिया है ॥८ ॥
नीयमानं तवादेशादस्माभिर्यातनागृहान् ।
व्यमोचयन् पातकिनं छित्त्वा पाशान् प्रसह्य ॥९
तांस्ते वेदितुमिच्छामो यदि नो मन्यसे क्षमम् ।
नारायणेत्यभिहिते मा भैरित्याययुर्द्रुतम् ॥१०
श्रीशुक उवाच
इति देवः स आपृष्टः प्रजासंयमनो यमः ।
प्रीतः स्वदूतान् प्रत्याह स्मरन् पादाम्बुजं हरेः ॥११
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यम उवाच परो मदन्यो जगतस्तस्थुषश्च ओतं प्रोतं पटवद्यत्र विश्वम् । यदंशतोऽस्य स्थितिजन्मनाशा नस्योतवद् यस्य वशे च लोकः ॥१२ यो नामभिर्वाचि जनान्निजायां
बध्नाति तन्त्यामिव दामभिर्गाः ।
यस्मै बलिं त इमे नामकर्म-निबन्धबद्धाश्चकिता वहन्ति ॥१३
अहं महेन्द्रो निर्ऋतिः प्रचेताः सोमोऽग्निरीशः पवनोऽर्को विरिञ्चः । आदित्यविश्वे वसवोऽथ साध्या मरुद्गणा रुद्रगणाः ससिद्धाः ॥१४ अन्ये च ये विश्वसृजोऽमरेशा भृग्वादयोऽस्पृष्टरजस्तमस्काः । यस्येहितं न विदुः स्पृष्टमायाः सत्त्वप्रधाना अपि किं ततोऽन्ये ॥१५ प्रभो! आपकी आज्ञासे हमलोग एक पापीको यातनागृहकी ओर ले जा रहे थे, परन्तु उन्होंने बलपूर्वक आपके फंदे काटकर उसे छुड़ा दिया ॥९ ॥ हम आपसे उनका रहस्य
जानना चाहते हैं । यदि आप हमें सुननेका अधिकारी समझें तो कहें । प्रभो! बड़े ही आश्चर्यकी बात हुई कि इधर तो अजामिलके मुँहसे ' नारायण! ' यह शब्द निकला और उधर वे ' डरो मत, डरो मत! ' कहते हुए झटपट वहाँ आ पहुँचे ॥१० ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- जब दूतोंने इस प्रकार प्रश्न किया, तब देवशिरोमणि प्रजाके शासक भगवान् यमराजने प्रसन्न होकर श्रीहरिके चरणकमलोंका स्मरण करते हुए उनसे कहा ॥११ ॥
यमराजने कहा — दूतो! मेरे अतिरिक्त एक और ही चराचर जगत्के स्वामी हैं । उन्हींमें यह सम्पूर्ण जगत् सूतमें वस्त्रके समान ओत - प्रोत है । उन्हींके अंश ब्रह्मा, विष्णु और शंकर इस जगत्की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय करते हैं । उन्हींने इस सारे जगत्को नथे हुए समान अपने अधीन कर रखा है ॥१२ ॥ मेरे प्यारे दूतो! जैसे किसान अपने बैलोंको पहले
छोटी - छोटी रस्सियोंमें बाँधकर फिर उन रस्सियोंको एक बड़ी आड़ी रस्सीमें बाँध देते है, वैसे ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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ही जगदीश्वर भगवान्ने भी ब्राह्मणादि वर्ण और ब्रह्मचर्य आदि आश्रमरूप छोटी - छोटी नामकी रस्सियोंमें बाँधकर फिर सब नामोंको वेदवाणीरूप बड़ी रस्सीमें बाँध रखा है । इस प्रकार सारे जीव नाम एवं कर्मरूप बन्धनमें बँधे हुए भयभीत होकर उन्हें ही अपना सर्वस्व भेंट कर रहे हैं ॥१३ ॥ दूतो! मैं, इन्द्र, निर्ऋति, वरुण, चन्द्रमा, अग्नि, शंकर, वायु, सूर्य, ब्रह्मा,
बारहों आदित्य, विश्वेदेवता, आठों वसु, साध्य, उनचास मरुत्, सिद्ध, ग्यारहों रुद्र, रजोगुण एवं तमोगुणसे रहित भृगु आदि प्रजापति और बड़े - बड़े देवता – सब - के - सब सत्त्वप्रधान होनेपर भी उनकी मायाके अधीन हैं तथा भगवान् कब क्या किस रूपमें करना चाहते हैं—
इस बातको नहीं जानते । तब दूसरोंकी तो बात ही क्या है ॥१४-१५ ॥
यं वै न गोभिर्मनसासुभिर्वा हृदा गिरा वासुभृतो विचक्षते । आत्मानमन्तर्हृदि सन्तमात्मनां चक्षुर्यथैवाकृतयस्ततः परम् ॥१६ तस्यात्मतन्त्रस्य हरेरधीशितुः
परस्य मायाधिपतेर्महात्मनः ।
प्रायेण दूता इह वै मनोहरा-श्चरन्ति तद्रूपगुणस्वभावाः ॥१७
भूतानि विष्णोः सुरपूजितानि दुर्दर्शलिङ्गानि महाद्भुतानि । रक्षन्ति तद्भक्तिमतः परेभ्यो मत्तश्च मर्त्यानथ सर्वतश्च ॥१८ धर्मं तु साक्षाद्भगवत्प्रणीतं न वै विदुरृषयो नापि देवाः । न सिद्धमुख्या असुरा मनुष्याः कुतश्च विद्याधरचारणादयः ॥१९
स्वयम्भूर्नारदः शम्भूः कुमारः कपिलो मनुः ।
प्रह्रादो जनको भीष्मो बलिर्वैयासकिर्वयम् ॥२०
द्वादशैते विजानीमो धर्मं भागवतं भटाः ।
गुह्यं विशुद्धं दुर्बोधं यं ज्ञात्वामृतमश्नुते ॥२१
एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसां धर्मः परः स्मृतः ।
भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभिः ॥२२
नामोच्चारणमाहात्म्यं हरेः पश्यत पुत्रकाः ।
अजामिलोऽपि येनैव मृत्युपाशादमुच्यत ॥२३
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एतावतालमघनिर्हरणाय पुंसां सङ्कीर्तनं भगवतो गुणकर्मनाम्नाम् । विक्रुश्य पुत्रमघवान् यदजामिलोऽपि नारायणेति म्रियमाण इयाय मुक्तिम् ॥२४ दूतो! जिस प्रकार घट, पट आदि रूपवान् पदार्थ अपने प्रकाशक नेत्रको नहीं देख सकते — वैसे ही अन्तःकरणमें अपने साक्षीरूपसे स्थित परमात्माको कोई भी प्राणी इन्द्रिय, मन, प्राण, हृदय या वाणी आदि किसी भी साधनके द्वारा नहीं जान सकता ॥१६ ॥ वे प्रभु
सबके स्वामी और स्वयं परम स्वतन्त्र हैं । उन्हीं मायापति पुरुषोत्तमके दूत उन्हींके समान परम मनोहर रूप, गुण और स्वभावसे सम्पन्न होकर इस लोकमें प्रायः विचरण किया करते हैं ॥१७ ॥
विष्णुभगवान्के सुरपूजित एवं परम अलौकिक पार्षदोंका दर्शन बड़ा दुर्लभ है । वे भगवान्के भक्तजनोंको उनके शत्रुओंसे, मुझसे और अग्नि आदि सब विपत्तियोंसे सर्वथा सुरक्षित रखते हैं ॥१८ ॥
स्वयं भगवान्ने ही धर्मकी मर्यादाका निर्माण किया है । उसे न तो ऋषि जानते हैं और न देवता या सिद्धगण ही । ऐसी स्थितिमें मनुष्य, विद्याधर, चारण और असुर आदि तो जान ही कैसे सकते हैं ॥१९ ॥
भगवान्के द्वारा निर्मित भागवतधर्म परम शुद्ध और अत्यन्त गोपनीय है । उसे जानना बहुत ही कठिन है । जो उसे जान लेता है, वह भगवत्स्वरूपको प्राप्त हो जाता है । दूतो! भागवतधर्मका रहस्य हम बारह व्यक्ति ही जानते हैं - ब्रह्माजी, देवर्षि नारद, भगवान् शंकर, सनत्कुमार, कपिलदेव, स्वायम्भुव मनु, प्रह्लाद, जनक, भीष्मपितामह, बलि, शुकदेवजी और मैं ( धर्मराज ) ॥२०-२१ ॥ इस जगत्में जीवोंके लिये बस, यही सबसे बड़ा कर्तव्य - परम धर्म है कि वे नाम - कीर्तन आदि उपायोंसे भगवान्के चरणोंमें भक्तिभाव प्राप्त कर लें || २२ || प्रिय दूतो! भगवान्के नामोच्चारणकी महिमा तो देखो, अजामिल - जैसा पापी भी एक बार नामोच्चारण करनेमात्रसे मृत्युपाशसे छुटकारा पा गया ॥२३ ॥ भगवान्के गुण, लीला और
नामोंका भलीभाँति कीर्तन मनुष्योंके पापोंका सर्वथा विनाश कर दे, यह कोई उसका बहुत बड़ा फल नहीं है, क्योंकि अत्यन्त पापी अजामिलने मरनेके समय चंचल चित्तसे अपने पुत्रका नाम ' नारायण ' उच्चारण किया । इस नामाभासमात्रसे ही उसके सारे पाप तो क्षीण हो ही गये, मुक्तिकी प्राप्ति भी हो गयी ॥२४ ॥
प्रायेण वेद तदिदं न महाजनोऽयं देव्या विमोहितमतिर्बत माययालम् । त्रय्यां जडीकृतमतिर्मधुपुष्पितायां वैतानिके महति कर्मणि युज्यमानः ॥२५ एवं विमृश्य सुधियो भगवत्यनन्ते ****** ebook converter DEMO Watermarks *******