श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1131–1140

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1131–1140

पृष्ठ 1131

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सर्वात्मना विदधते खलु भावयोगम् । ते मे न दण्डमर्हन्त्यथ यद्यमीषां स्यात् पातकं तदपि हन्त्युरुगायवादः ॥२६ ते देवसिद्धपरिगीतपवित्रगाथा ये साधवः समदृशो भगवत्प्रपन्नाः । तान् नोपसीदत हरेर्गदयाभिगुप्तान् नैषां वयं न च वयः प्रभवाम दण्डे ॥ २७

तानानयध्वमसतो विमुखान् मुकुन्द-पादारविन्दमकरन्दरसादजस्रम् ।

निष्किञ्चनैः परमहंसकुलै रसज्ञे-र्जुष्टाद् गृहे निरयवर्त्मनि बद्धतृष्णान् ॥२८

जिह्वा न वक्ति भगवद्गुणनामधेयं चेतश्च न स्मरति तच्चरणारविन्दम् । कृष्णाय नो नमति यच्छिर एकदापि तानानयध्वमसतोऽकृतविष्णुकृत्यान् ॥२९ तत् क्षम्यतां स भगवान् पुरुषः पुराणो नारायणः स्वपुरुषैर्यदसत्कृतं नः । बड़े - बड़े विद्वानोंकी बुद्धि कभी भगवान्की मायासे मोहित हो जाती है । वे कर्मोंके मीठे-मीठे फलोंका वर्णन करनेवाली अर्थवादरूपिणी वेदवाणीमें ही मोहित हो जाते हैं और यज्ञ-यागादि बड़े - बड़े कर्मोंमें ही संलग्न रहते हैं तथा इस सुगमातिसुगम भगवन्नामकी महिमाको नहीं जानते । यह कितने खेदकी बात है ॥ २५ ॥

प्रिय दूतो! बुद्धिमान् पुरुष ऐसा विचार कर भगवान् अनन्तमें ही सम्पूर्ण अन्तःकरणसे अपना भक्तिभाव स्थापित करते हैं । वे मेरे दण्डके पात्र नहीं हैं । पहली बात तो यह है कि वे पाप करते ही नहीं, परन्तु यदि कदाचित् संयोगवश कोई पाप बन भी जाय, तो उसे भगवान्का गुणगान तत्काल नष्ट कर देता है ॥२६ ॥

जो समदर्शी साधु भगवान्‌को ही अपना साध्य और साधन दोनों समझकर उनपर निर्भर हैं, बड़े - बड़े देवता और सिद्ध उनके पवित्र चरित्रोंका प्रेमसे गान करते रहते हैं । मेरे दूतो! भगवान्की गदा उनकी सदा रक्षा करती रहती है । उनके पास तुमलोग कभी भूलकर भी मत फटकना । उन्हें दण्ड देनेकी सामर्थ्य न हममें है और न साक्षात् कालमें ही ॥२७ ॥

बड़े - बड़े परमहंस दिव्य रसके लोभसे सम्पूर्ण जगत् और शरीर आदिसे भी अपनी ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1132

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अहंता - ममता हटाकर, अकिंचन होकर निरन्तर भगवान् मुकुन्दके पादारविन्दका मकरन्द - रस पान करते रहते हैं । जो दुष्ट उस दिव्य रससे विमुख हैं और नरकके दरवाजे घर - गृहस्थीकी तृष्णाका बोझा बाँधकर उसे ढो रहे हैं, उन्हींको मेरे पास बार - बार लाया करो ॥२८ ॥

जिनकी जीभ भगवान्‌के गुणों और नामोंका उच्चारण नहीं करती, जिनका चित्त उनके चरणारविन्दोंका चिन्तन नहीं करता और जिनका सिर एक बार भी भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें नहीं झुकता, उन भगवत्सेवाविमुख पापियोंको ही मेरे पास लाया करो ॥२९ ॥ आज

मेरे दूतोंने भगवान्के पार्षदोंका अपराध करके स्वयं भगवान्‌का ही तिरस्कार किया है । यह मेरा ही अपराध है । पुराणपुरुष भगवान् नारायण हमलोगोंका यह अपराध क्षमा करें । हम अज्ञानी होनेपर भी हैं उनके निजजन और उनकी आज्ञा पानेके लिये अंजलि बाँधकर सदा उत्सुक रहते हैं । अतः परम महिमान्वित भगवान्‌के लिये यही योग्य है कि वे क्षमा कर दें । मैं उन सर्वान्तर्यामी एकरस अनन्त प्रभुको नमस्कार करता हूँ ॥३० ॥

स्वानामहो न विदुषां रचिताञ्जलीनां क्षान्तिर्गरीयसि नमः पुरुषाय भूम्ने ॥ ३०

तस्मात् सङ्कीर्तनं विष्णोर्जगन्मङ्गलमंहसाम् ।

महतामपि कौरव्य विद्ध्यैकान्तिकनिष्कृतिम् ॥३१

शृण्वतां गुणतां वीर्याण्युद्दामानि हरेर्मुहुः ।

यथा सुजातया भक्त्या शुद्ध्येन्नात्मा व्रतादिभिः ॥३२

कृष्णाङ्घ्रिपद्ममधुलिण् न पुनर्विसृष्ट-मायागुणेषु रमते वृजिनावहेषु ।

अन्यस्तु कामहत आत्मरजः प्रमार्ष्ट-मीत कर्म यत एव रजः पुनः स्यात् ॥३३

इत्थं स्वभर्तृगदितं भगवन्महित्वं संस्मृत्य विस्मितधियो यमकिङ्करास्ते । नैवाच्युताश्रयजनं प्रति शङ्कमाना द्रष्टुं च बिभ्यति ततः प्रभृति स्म राजन् ॥३४

इतिहासमिमं गुह्यं भगवान् कुम्भसम्भवः ।

कथयामास मलय आसीनो हरिमर्चयन् ॥३५

[ श्रीशुकदेवजी कहते हैं— ] परीक्षित्! इसलिये तुम ऐसा समझ लो कि बड़े - से - बड़े पापोंका सर्वोत्तम, अन्तिम और पाप - वासनाओंको भी निर्मूल कर डालनेवाला प्रायश्चित्त यही ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1133

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है कि केवल भगवान्के गुणों, लीलाओं और नामोंका कीर्तन किया जाय । इसीसे संसारका कल्याण हो सकता है || ३१ || जो लोग बार - बार भगवान्‌के उदार और कृपापूर्ण चरित्रोंका श्रवण - कीर्तन करते हैं, उनके हृदयमें प्रेममयी भक्तिका उदय हो जाता है । उस भक्तिसे जैसी आत्मशुद्धि होती है, वैसी कृच्छ्र- चान्द्रायण आदि व्रतोंसे नहीं होती ॥ ३२ ॥ जो मनुष्य

भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके चरणारविन्द - मकरन्द - रसका लोभी भ्रमर है, वह स्वभावसे ही मायाके आपातरम्य, दुःखद और पहलेसे ही छोड़े हुए विषयोंमें फिर नहीं रमता । किन्तु जो लोग उस दिव्य रससे विमुख हैं, कामनाओंने जिनकी विवेकबुद्धिपर पानी फेर दिया है, वे अपने पापोंका मार्जन करनेके लिये पुनः प्रायश्चित्तरूप कर्म ही करते हैं । इससे होता यह है कि उनके कर्मोंकी वासना मिटती नहीं और वे फिर वैसे ही दोष कर बैठते है ॥३३ ॥

परीक्षित्! जब यमदूतोंने अपने स्वामी धर्मराजके मुखसे इस प्रकार भगवान्की महिमा सुनी और उसका स्मरण किया, तब उनके आश्चर्यकी सीमा न रही । तभीसे वे धर्मराजकी बातपर विश्वास करके अपने नाशकी आशंकासे भगवान्‌के आश्रित भक्तोंके पास नहीं जाते और तो क्या, वे उनकी ओर आँख उठाकर देखनेमें भी डरते हैं ॥३४ ॥

प्रिय परीक्षित्! यह इतिहास परम गोपनीय - अत्यन्त रहस्यमय है । मलयपर्वतपर विराजमान भगवान् अगस्त्यजीने श्रीहरिकी पूजा करते समय मुझे यह सुनाया था ॥३५ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे यमपुरुषसंवादे तृतीयोऽध्यायः ॥३ ॥

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पृष्ठ 1134

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अथ चतुर्थोऽध्यायः दक्षके द्वारा भगवान्‌की स्तुति और भगवान्‌का प्रादुर्भाव राजोवाच

देवासुरनृणां सर्गो नागानां मृगपक्षिणाम् ।

सामासिकस्त्वया प्रोक्तो यस्तु स्वायम्भुवेऽन्तरे ॥१

तस्यैव व्यासमिच्छामि ज्ञातुं ते भगवन् यथा ।

अनुसर्गं यया शक्त्या ससर्ज भगवान् परः ॥२

सूत उवाच

इति सम्प्रश्नमाकर्ण्य राजर्षेर्बादरायणिः ।

प्रतिनन्द्य महायोगी ' जगाद मुनिसत्तमाः ॥ ३

श्रीशुक उवाच

यदा प्रचेतसः पुत्रा दश प्राचीनबर्हिषः ।

अन्तःसमुद्रादुन्मग्ना ददृशुर्गां द्रुमैर्वृताम् ॥४

द्रुमेभ्यः २ क्रुध्यमानास्ते तपोदीपितमन्यवः ।

मुखतो वायुमग्निं च ससृजुस्तद्दिधक्षया ॥५

ताभ्यां निर्दह्यमानांस्तानुपलभ्य कुरूद्वह ।

राजोवाच महान् सोमो मन्युं प्रशमयन्निव ॥६

मा द्रुमेभ्यो महाभागा दीनेभ्यो द्रोग्धुमर्हथ ।

विवर्धयिषवो यूयं प्रजानां पतयः स्मृताः ॥७

अहो प्रजापतिपतिर्भगवान् हरिरव्ययः ।

वनस्पतीनोषधीश्च ससर्जोर्जमिषं विभुः ॥८

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पृष्ठ 1135

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राजा परीक्षित्ने पूछा— भगवन्! आपने संक्षेपसे ( तीसरे स्कन्धमें ) इस बातका वर्णन किया कि स्वायम्भुव मन्वन्तरमें देवता, असुर, मनुष्य, सर्प और पशु - पक्षी आदिकी सृष्टि कैसे हुई || १ || अब मैं उसीका विस्तार जानना चाहता हूँ । प्रकृति आदि कारणोंके भी परम कारण भगवान् अपनी जिस शक्तिसे जिस प्रकार उसके बादकी सृष्टि करते हैं, उसे जाननेकी भी मेरी इच्छा है ॥२ ॥

सूतजी कहते हैं — शौनकादि ऋषियो! परम योगी व्यासनन्दन श्रीशुकदेवजीने राजर्षि परीक्षित्का यह सुन्दर प्रश्न सुनकर उनका अभिनन्दन किया और इस प्रकार कहा ॥३ ॥

श्रीशुकदेवजीने कहा- राजा प्राचीनबर्हिके दस लड़के - जिनका नाम प्रचेता था— जब समुद्रसे बाहर निकले, तब उन्होंने देखा कि हमारे पिताके निवृत्तिपरायण हो जानेसे सारी पृथ्वी पेड़ोंसे घिर गयी है ॥४ ॥ उन्हें वृक्षोंपर बड़ा क्रोध आया । उनके तपोबलने तो मानो

क्रोधकी आगमें आहुति ही डाल दी । बस, उन्होंने वृक्षोंको जला डालनेके लिये अपने मुखसे वायु और अग्निकी सृष्टि की ॥५ ॥

परीक्षित्! जब प्रचेताओंकी छोड़ी हुई अग्नि और वायु उन वृक्षोंको जलाने लगी, तब वृक्षोंके राजाधिराज चन्द्रमाने उनका क्रोध शान्त करते हुए इस प्रकार कहा ॥६ ॥

' महाभाग्यवान् प्रचेताओ! ये वृक्ष बड़े दीन हैं । आपलोग इनसे द्रोह मत कीजिये; क्योंकि आप तो प्रजाकी अभिवृद्धि करना चाहते हैं और सभी जानते हैं कि आप प्रजापति हैं ॥७ ॥

महात्मा प्रचेताओ! प्रजापतियोंके अधिपति अविनाशी भगवान् श्रीहरिने सम्पूर्ण वनस्पतियों और ओषधियोंको प्रजाके हितार्थ उनके खान - पानके लिये बनाया है ॥८ ॥

अन्नं चराणामचरा ह्यपदः पादचारिणाम् ।

अहस्ता हस्तयुक्तानां द्विपदां च चतुष्पदः ॥९

यूयं च पित्रान्वादिष्टा ' देवदेवेन चानघाः ।

प्रजासर्गाय हि कथं वृक्षान् निर्दग्धुमर्हथ ॥१०

आतिष्ठत सतां मार्गं कोपं यच्छत दीपितम् ।

पित्रा पितामहेनापि जुष्टं वः प्रपितामहैः ॥११

तोकानां पितरौ बन्धू दृशः पक्ष्म स्त्रियाः पतिः ।

पतिः प्रजानां भिक्षूणां गृह्यज्ञानां बुधः सुहृत् ॥१२

अन्तर्देहेषु भूतानामात्माऽऽस्ते हरिरीश्वरः ।

सर्वं तद्धिष्ण्यमीक्षध्वमेवं वस्तोषितो ह्यसौ ॥१३

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पृष्ठ 1136

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यः समुत्पतितं देह आकाशान्मन्युमुल्बणम् ।

आत्मजिज्ञासया यच्छेत् स गुणानतिवर्तते ॥१४

अलं दग्धैर्द्रुमैर्दीनैः खिलानां शिवमस्तु वः ।

वार्क्षी ह्येषा वरा कन्या पत्नीत्वे प्रतिगृह्यताम् ॥१५

इत्यामन्त्र्य वरारोहां कन्यामाप्सरसीं नृप ।

सोमो राजा ययौ दत्त्वा ते धर्मेणोपयेमिरे ॥१६

संसारमें पाँखोंसे उड़नेवाले चर प्राणियोंके भोजन फल- पुष्पादि अचर पदार्थ हैं । पैरसे चलनेवालोंके घास - तृणादि बिना पैरवाले पदार्थ भोजन हैं; हाथवालोंके वृक्ष - लता आदि बिना हाथवाले और दो पैरवाले मनुष्यादिके लिये धान, गेहूँ आदि अन्न भोजन हैं । चार पैरवाले बैल, ऊँट आदि खेती प्रभृतिके द्वारा अन्नकी उत्पत्तिमें सहायक हैं || ९ || निष्पाप प्रचेताओ! आपके पिता और देवाधिदेव भगवान्ने आपलोगोंको यह आदेश दिया है कि प्रजाकी सृष्टि करो । ऐसी स्थितिमें आप वृक्षोंको जला डालें, यह कैसे उचित हो सकता है ॥१० ॥ आपलोग

अपना क्रोध शान्त करें और अपने पिता, पितामह, प्रपितामह आदिके द्वारा सेवित सत्पुरुषोंके मार्गका अनुसरण करें || ११ || जैसे माँ - बाप बालकोंकी, पलकें नेत्रोंकी, पति पत्नीकी, गृहस्थ भिक्षुकोंकी और ज्ञानी अज्ञानियोंकी रक्षा करते हैं और उनका हित चाहते हैं – वैसे ही प्रजाकी रक्षा और हितका उत्तरदायी राजा होता है ॥१२ ॥ प्रचेताओ! समस्त

प्राणियोंके हृदयमें सर्वशक्तिमान् भगवान् आत्माके रूपमें विराजमान हैं । इसलिये आपलोग सभीको भगवान्‌का निवासस्थान समझें । यदि आप ऐसा करेंगे तो भगवान्‌को प्रसन्न कर लेंगे ॥१३ ॥ जो पुरुष हृदयके उबलते हुए भयंकर क्रोधको आत्मविचारके द्वारा शरीरमें ही

शान्त कर लेता है, बाहर नहीं निकलने देता, वह कालक्रमसे तीनों गुणोंपर विजय प्राप्त कर लेता है ॥१४ ॥ प्रचेताओ! इन दीन - हीन वृक्षोंको और न जलाइये; जो कुछ बच रहे हैं, उनकी

रक्षा कीजिये । इससे आपका भी कल्याण होगा । इस श्रेष्ठ कन्याका पालन इन वृक्षोंने ही किया है, इसे आपलोग पत्नीके रूपमें स्वीकार कीजिये ' ॥१५ ॥

परीक्षित्! वनस्पतियोंके राजा चन्द्रमाने प्रचेताओंको इस प्रकार समझा - बुझाकर उन्हें प्रम्लोचा अप्सराकी सुन्दरी कन्या दे दी और वे वहाँसे चले गये । प्रचेताओंने धर्मानुसार उसका पाणिग्रहण किया ॥१६ ॥

तेभ्यस्तस्यां समभवद्दक्षः प्राचेतसः किल ।

यस्य प्रजाविसर्गेण लोका आपूरितास्त्रयः ॥ १७

यथा ससर्ज भूतानि दक्षो दुहितृवत्सलः ।

रेतसा मनसा चैव तन्ममावहितः शृणु ॥१८

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पृष्ठ 1137

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मनसैवासृजत्पूर्वं प्रजापतिरिमाः प्रजाः ।

देवासुरमनुष्यादीन्नभःस्थलजलौकसः ॥१९

तमबृंहितमालोक्य प्रजासर्गं प्रजापतिः ।

विन्ध्यपादानुपव्रज्य सोऽचरद् दुष्करं तपः ॥ २०

तत्राघमर्षणं नाम तीर्थं पापहरं परम् ।

उपस्पृश्यानुसवनं तपसातोषयद्धरिम् ॥२१

अस्तौषीद्धंसगुह्येन भगवन्तमधोक्षजम् ।

तुभ्यं तदभिधास्यामि कस्यातुष्यद् यतो हरिः ॥२२

प्रजापतिरुवाच नमः परायावितथानुभूतये

गुणत्रयाभासनिमित्तबन्धवे ।

अदृष्टधाम्ने गुणतत्त्वबुद्धिभि-र्निवृत्तमानाय दधे स्वयम्भुवे ॥२३

न यस्य सख्यं पुरुषोऽवैति सख्युः

सखा वसन् संवसतः पुरेऽस्मिन् ।

गुणो यथा गुणिनो व्यक्तदृष्टे-स्तस्मै महेशाय नमस्करोमि ॥२४

उन्हीं प्रचेताओंके द्वारा उस कन्याके गर्भसे प्राचेतस् दक्षकी उत्पत्ति हुई । फिर दक्षकी प्रजा - सृष्टिसे तीनों लोक भर गये ॥ १७ ॥ इनका अपनी पुत्रियोंपर बड़ा प्रेम था । इन्होंने जिस

प्रकार अपने संकल्प और वीर्यसे विविध प्राणियोंकी सृष्टि की, वह मैं सुनाता हूँ, तुम सावधान होकर सुनो ॥१८ ॥

परीक्षित्! पहले प्रजापति दक्षने जल, थल और आकाशमें रहनेवाले देवता, असुर एवं मनुष्य आदि प्रजाकी सृष्टि अपने संकल्पसे ही की ॥१९ ॥ जब उन्होंने देखा कि वह सृष्टि बढ़

नहीं रही है, तब उन्होंने विन्ध्याचलके निकटवर्ती पर्वतोंपर जाकर बड़ी घोर तपस्या की ॥२० ॥ वहाँ एक अत्यन्त श्रेष्ठ तीर्थ है, उसका नाम है- अघमर्षण । वह सारे पापोंको धो

बहाता है । प्रजापति दक्ष उस तीर्थमें त्रिकाल स्नान करते और तपस्याके द्वारा भगवान्की आराधना करते ॥२१ || प्रजापति दक्षने इन्द्रियातीत भगवान्‌की ' हंसगुह्य ' नामक स्तोत्रसे स्तुति की थी । उसीसे भगवान् उनपर प्रसन्न हुए थे । मैं तुम्हें वह स्तुति सुनाता हूँ ॥२२ ॥

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पृष्ठ 1138

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दक्ष प्रजापतिने इस प्रकार स्तुति की - भगवन्! आपकी अनुभूति, आपकी चित्-शक्ति अमोघ है । आप जीव और प्रकृतिसे परे, उनके नियन्ता और उन्हें सत्तास्फूर्ति देनेवाले हैं । जिन जीवोंने त्रिगुणमयी सृष्टिको ही वास्तविक सत्य समझ रखा है, वे आपके स्वरूपका साक्षात्कार नहीं कर सके हैं; क्योंकि आपतक किसी भी प्रमाणकी पहुँच नहीं है - आपकी कोई अवधि, कोई सीमा नहीं है । आप स्वयंप्रकाश और परात्पर हैं । मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥२३ ॥ यों तो जीव और ईश्वर एक - दूसरेके सखा हैं तथा इसी शरीरमें इकट्ठे ही

निवास करते हैं; परन्तु जीव सर्वशक्तिमान् आपके सख्यभावको नहीं जानता — ठीक वैसे ही, जैसे रूप, रस, गन्ध आदि विषय अपने प्रकाशित करनेवाली नेत्र, घ्राण आदि इन्द्रियवृत्तियोंको नहीं जानते । क्योंकि आप जीव और जगत्के द्रष्टा हैं, दृश्य नहीं । महेश्वर! मैं आपके श्रीचरणोंमें नमस्कार करता हूँ ॥२४ ॥

देहोऽसवोऽक्षा मनवो भूतमात्रा नात्मानमन्यं च विदुः परं यत् । सर्वं पुमान् वेद गुणांश्च तज्ज्ञो वेद सर्वज्ञमनन्तमीडे ॥२५ यदोपरामो मनसो नामरूप-रूपस्य दृष्टस्मृतिसम्प्रमोषात् । य ईयते केवलया स्वसंस्थया ’ हंसाय तस्मै शुचिसद्मने नमः ॥२६ मनीषिणोऽन्तर्हृदि संनिवेशितं स्वशक्तिभिर्नवभिश्च त्रिवृद्भिः । वह्निं यथा दारुणि पाञ्चदश्यं मनीषया निष्कर्षन्ति गूढम् ॥२७ स वै ममाशेषविशेषमाया-निषेधनिर्वाणसुखानुभूतिः । स सर्वनामा स च विश्वरूपः प्रसीदतामनिरुक्तात्मशक्तिः ॥२८ यद्यन्निरुक्तं वचसा निरूपितं धियाक्षभिर्वा मनसा वोत यस्य । मा भूत् स्वरूपं गुणरूपं हि तत्तत् सवै गुणापायविसर्गलक्षणः ॥२९ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1139

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देह, प्राण, इन्द्रिय, अन्तःकरणकी वृत्तियाँ, पंचमहाभूत और उनकी तन्मात्राएँ — ये सब जड होनेके कारण अपनेको और अपनेसे अतिरिक्तको भी नहीं जानते । परन्तु जीव इन सबको और इनके कारण सत्त्व, रज और तम - इन तीन गुणोंको भी जानता है । परन्तु वह भी दृश्य अथवा ज्ञेयरूपसे आपको नहीं जान सकता । क्योंकि आप ही सबके ज्ञाता और अनन्त हैं । इसलिये प्रभो! मैं तो केवल आपकी स्तुति करता हूँ ॥ २५ ॥ जब समाधिकालमें

प्रमाण, विकल्प और विपर्ययरूप विविध ज्ञान और स्मरणशक्तिका लोप हो जानेसे इस नाम-रूपात्मक जगत्का निरूपन करनेवाला मन उपरत हो जाता है, उस समय बिना मनके भी केवल सच्चिदानन्दमयी अपनी स्वरूपस्थितिके द्वारा आप प्रकाशित होते रहते हैं । प्रभो! आप शुद्ध हैं और शुद्ध हृदय - मन्दिर ही आपका निवासस्थान है । आपको मेरा नमस्कार है ॥२६ ॥ जैसे याज्ञिक लोग काष्ठमें छिपे हुए अग्निको ' सामिधेनी ' नामके पन्द्रह मन्त्रोंके

द्वारा प्रकट करते हैं, वैसे ही ज्ञानी पुरुष अपनी सत्ताईस शक्तियोंके भीतर गूढभावसे छिपे हुए आपको अपनी शुद्ध बुद्धिके द्वारा हृदयमें ही ढूँढ़ निकालते हैं ॥ २७ ॥ जगत्में जितनी

भिन्नताएँ देख पड़ती हैं, वे सब मायाकी ही हैं । मायाका निषेध कर देनेपर केवल परम सुखके साक्षात्कारस्वरूप आप ही अवशेष रहते हैं । परन्तु जब विचार करने लगते हैं, तब आपके स्वरूपमें मायाकी उपलब्धि - निर्वचन नहीं हो सकता । अर्थात् माया भी आप ही हैं । अतः सारे नाम और सारे रूप आपके ही हैं । प्रभो! आप मुझपर प्रसन्न होइये । मुझे आत्मप्रसादसे पूर्ण कर दीजिये || २८ || प्रभो! जो कुछ वाणीसे कहा जाता है अथवा जो कुछ मन, बुद्धि और इन्द्रियोंसे ग्रहण किया जाता है, वह आपका स्वरूप नहीं है; क्योंकि वह तो गुणरूप है और आप गुणोंकी उत्पत्ति और प्रलयके अधिष्ठान हैं । आपमें केवल उनकी प्रतीतिमात्र है ॥२९ ॥

यस्मिन् यतो येन च यस्य यस्मै यद् यो यथा कुरुते कार्यते च ' । परावरेषां परमं प्राक् प्रसिद्धं तद् ब्रह्म तद्धेतुरनन्यदेकम् ॥३० यच्छक्तयो वदतां वादिनां वै विवादसंवादभुवो भवन्ति । कुर्वन्ति चैषां मुहुरात्ममोहं तस्मै नमोऽनन्तगुणाय भूम्ने ॥३१ अस्तीति नास्तीति च वस्तुनिष्ठयो-रेकस्थयोर्भिन्नविरुद्धधर्मयोः । अवेक्षितं किञ्चन योगसांख्ययोः समं परं ह्यनुकूलं बृहत्तत् ॥३२ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1140

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 1140 का मूल पृष्ठ
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योऽनुग्रहार्थं भजतां पादमूल-मनामरूपो भगवाननन्तः ।

नामानि रूपाणि च जन्मकर्मभि-र्भेजे स मह्यं परमः प्रसीदतु ॥३३

भगवन्! आपमें ही यह सारा जगत् स्थित है; आपसे ही निकला है और आपने — और किसीके सहारे नहीं - अपने आपसे ही इसका निर्माण किया है । यह आपका ही है और आपके लिये ही है । इसके रूपमें बननेवाले भी आप हैं और बनानेवाले भी आप ही हैं । बनने-बनानेकी विधि भी आप ही हैं । आप ही सबसे काम लेनेवाले भी हैं । जब कार्य और कारणका भेद नहीं था, तब भी आप स्वयंसिद्ध स्वरूपसे स्थित थे । इसीसे आप सबके कारण भी हैं । सच्ची बात तो यह है कि आप जीव जगत्के भेद और स्वगतभेदसे सर्वथा रहित एक, अद्वितीय हैं । आप स्वयं ब्रह्म हैं । आप मुझपर प्रसन्न हों ॥ ३० ॥ प्रभो! आपकी ही शक्तियाँ

वादी - प्रतिवादियोंकेविवाद और संवाद ( ऐकमत्य ) ) - - का विषय होती हैं और उन्हें बार - बार मोहमें डाल दिया करती हैं । आप अनन्त अप्राकृत कल्याण- गुणगणोंसे युक्त एवं स्वयं अनन्त हैं । मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ३१ ॥ भगवन्! उपासकलोग कहते हैं कि हमारे प्रभु

हस्त - पादादिसे युक्त साकार - विग्रह हैं और सांख्यवादी कहते हैं कि भगवान् हस्त - पादादि विग्रहसे रहित - निराकार हैं । यद्यपि इस प्रकार वे एक ही वस्तुके दो परस्परविरोधी धर्मोंका वर्णन करते हैं, परन्तु फिर भी उसमें विरोध नहीं है । क्योंकि दोनों एक ही परम वस्तुमें स्थित हैं । बिना आधारके हाथ - पैर आदिका होना सम्भव नहीं और निषेधकी भी कोई - न - कोई अवधि होनी ही चाहिये । आप वही आधार और निषेधकी अवधि हैं । इसलिये आप साकार, निराकार दोनोंसे ही अविरुद्ध सम परब्रह्म हैं ॥ ३२ ॥ प्रभो! आप अनन्त हैं । आपका न तो

कोई प्राकृत नाम है और न कोई प्राकृत रूप; फिर भी जो आपके चरणकमलोंका भजन करते हैं, उनपर अनुग्रह करनेके लिये आप अनेक रूपोंमें प्रकट होकर अनेकों लीलाएँ करते हैं तथा उन - उन रूपों एवं लीलाओंके अनुसार अनेकों नाम धारण कर लेते हैं । परमात्मन्! आप मुझपर कृपा - प्रसाद कीजिये ॥३३ ॥

यः प्राकृतैर्ज्ञानपथैर्जनानां यथाशयं देहगतो विभाति । यथानिलः पार्थिवमाश्रितो गुणं स ईश्वरो मे कुरुतान्मनोरथम् ॥ ३४ श्रीशुक उवाच

इति स्तुतः संस्तुवतः स तस्मिन्नघमर्षणे ।

आविरासीत् कुरुश्रेष्ठ भगवान् भक्तवत्सलः ॥३५

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