श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1141–1150

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1141–1150

पृष्ठ 1141

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कृतपादः सुपर्णांसे प्रलम्बाष्टमहाभुजः ।

चक्रशङ्खासिचर्मेषुधनुःपाशगदाधरः ॥३६

पीतवासा घनश्यामः प्रसन्नवदनेक्षणः ।

वनमालानिवीताङ्गो लसच्छ्रीवत्सकौस्तुभः ॥ ३७

महाकिरीटकटकः स्फुरन्मकरकुण्डलः ।

काञ्च्यङ्गुलीयवलयनूपुराङ्गदभूषितः ॥ ३८

त्रैलोक्यमोहनं रूपं बिभ्रत् त्रिभुवनेश्वरः ।

वृतो नारदनन्दाद्यैः पार्षदैः सुरयूथपैः ॥ ३ ९

स्तूयमानोऽनुगायद्भिः सिद्धगन्धर्वचारणैः ।

रूपं तन्महदाश्चर्यं विचक्ष्यागतसाध्वसः ॥४०

ननाम दण्डवद् भूमौ प्रहृष्टात्मा प्रजापतिः ।

न किञ्चनोदीरयितुमशकत् तीव्रया मुदा ।

आपूरितमनोद्वारैर्हृदिन्य इव निर्झरैः ॥४१

तं तथावनतं भक्तं प्रजाकामं प्रजापतिम् ।

चित्तज्ञः सर्वभूतानामिदमाह जनार्दनः ॥४२

लोगोंकी उपासनाएँ प्रायः साधारण कोटिकी होती हैं । अतः आप सबके हृदयमें रहकर उनकी भावनाके अनुसार भिन्न - भिन्न देवताओंके रूपमें प्रतीत होते रहते हैं — ठीक वैसे ही जैसे हवा गन्धका आश्रय लेकर सुगन्धित प्रतीत होती है; परन्तु वास्तवमें सुगन्धित नहीं होती । ऐसे सबकी भावनाओंका अनुसरण करनेवाले प्रभु मेरी अभिलाषा पूर्ण करें ॥३४ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! विन्ध्याचलके अघमर्षण तीर्थमें जब प्रजापति दक्षने इस प्रकार स्तुति की, तब भक्तवत्सल भगवान् उनके सामने प्रकट हुए ॥३५ ॥ उस समय

भगवान् गरुड़के कंधोंपर चरण रखे हुए थे । विशाल एवं हृष्ट - पुष्ट आठ भुजाएँ थीं; उनमें चक्र, शंख, तलवार, ढाल, बाण, धनुष, पाश और गदा धारण किये हुए थे ॥ ३६ ॥ वर्षाकालीन

मेघके समान श्यामल शरीरपर पीताम्बर फहरा रहा था । मुखमण्डल प्रफुल्लित था । नेत्रोंसे प्रसादकी वर्षा हो रही थी । घुटनोंतक वनमाला लटक रही थी । वक्षःस्थलपर सुनहरी रेखा-श्रीवत्सचिह्न और गलेमें कौस्तुभमणि जगमगा रही थी ॥ ३७ ॥ बहुमूल्य किरीट, कंगन,

मकराकृति कुण्डल, करधनी, अँगूठी, कड़े, नूपुर और बाजूबंद अपने - अपने स्थानपर सुशोभित थे ॥३८ ॥ त्रिभुवनपति भगवान्ने त्रैलोक्यविमोहन रूप धारण कर रखा था । नारद,

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पृष्ठ 1142

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नन्द, सुनन्द आदि पार्षद उनके चारों ओर खड़े थे । इन्द्र आदि देवेश्वरगण स्तुति कर रहे थे तथा सिद्ध, गन्धर्व और चारण भगवान्‌के गुणोंका गान कर रहे थे । यह अत्यन्त आश्चर्यमय और अलौकिक रूप देखकर दक्षप्रजापति कुछ सहम गये ॥३९ -४० ॥ प्रजापति दक्षने आनन्दसे भरकर भगवान्के चरणोंमें साष्टांग प्रणाम किया । जैसे झरनोंके जलसे नदियाँ भर जाती हैं, वैसे ही परमानन्दके उद्रेकसे उनकी एक - एक इन्द्रिय भर गयी और आनन्दपरवश हो जानेके कारण वे कुछ भी बोल न सके ॥४१ ॥ परीक्षित्! प्रजापति दक्ष अत्यन्त नम्रतासे

झुककर भगवान्के सामने खड़े हो गये । भगवान् सबके हृदयकी बात जानते ही हैं, उन्होंने दक्ष प्रजापतिकी भक्ति और प्रजावृद्धिकी कामना देखकर उनसे यों कहा ॥४२ ॥

श्रीभगवानुवाच

प्राचेतस महाभाग संसिद्धस्तपसा भवान् ।

यच्छ्रद्धया मत्परया मयि भावं परं गतः ॥४३

प्रीतोऽहं ते प्रजानाथ यत्तेऽस्योद्बृंहणं तपः ।

ममैष कामो भूतानां यद् भूयासुर्विभूतयः ॥ ४४

ब्रह्मा भवो भवन्तश्च मनवो विबुधेश्वराः ।

विभूतयो ममता भूतानां भूतिहेतवः ॥ ४५

तपो मे हृदयं ब्रह्मंस्तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः ।

अङ्गानि क्रतवो जाता धर्म आत्मासवः सुराः ॥४६

अहमेवासमेवाग्रे नान्यत् किञ्चान्तरं बहिः ।

संज्ञानमात्रमव्यक्तं प्रसुप्तमिव विश्वतः ॥४७

मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतो गुणविग्रहः ।

यदाऽऽसीत् तत एवाद्यः स्वयम्भूः समभूदजः ॥४८

स वै यदा महादेवो मम वीर्योपबृंहितः ।

खिलमिवात्मानमुद्यतः सर्गकर्मणि ॥४९

अथ मेऽभिहितो देवस्तपोऽतप्यत दारुणम् ।

नव विश्वसृजो युष्मान् येनादावसृजद्विभुः ॥५०

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पृष्ठ 1143

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एषा पञ्चजनस्याङ्ग दुहिता वै प्रजापतेः ।

असिक्नी नाम पत्नीत्वे प्रजेश प्रतिगृह्यताम् ॥५१

मिथुनव्यवायधर्मस्त्वं प्रजासर्गमिमं पुनः ।

मिथुनव्यवायधर्मिण्यां भूरिशो भावयिष्यसि ॥ ५२

त्वत्तोऽधस्तात् प्रजाः सर्वा मिथुनीभूय मायया ।

मदीयया भविष्यन्ति हरिष्यन्ति च मे बलिम् ॥५३

श्रीभगवान्ने कहा — परम भाग्यवान् दक्ष! अब तुम्हारी तपस्या सिद्ध हो गयी, क्योंकि मुझपर श्रद्धा करनेसे तुम्हारे हृदयमें मेरे प्रति परम प्रेमभावका उदय हो गया है ॥४३ ॥

प्रजापते! तुमने इस विश्वकी वृद्धिके लिये तपस्या की है, इसलिये मैं तुमपर प्रसन्न हूँ । क्योंकि यह मेरी ही इच्छा है कि जगत्के समस्त प्राणी अभिवृद्ध और समृद्ध हों ॥४४ ॥ ब्रह्मा, शंकर,

तुम्हारे जैसे प्रजापति, स्वायम्भुव आदि मनु तथा इन्द्रादि देवेश्वर – ये सब मेरी विभूतियाँ हैं और सभी प्राणियोंकी अभिवृद्धि करनेवाले हैं || ४५ ॥ ब्रह्मन्! तपस्या मेरा हृदय है, विद्या शरीर है, कर्म आकृति है, यज्ञ अंग हैं, धर्म मन है और देवता प्राण हैं ॥ ४६ ॥ जब यह सृष्टि

नहीं थी, तब केवल मैं ही था और वह भी निष्क्रियरूपमें । बाहर - भीतर कहीं भी और कुछ न था । न तो कोई द्रष्टा था और न दृश्य । मैं केवल ज्ञानस्वरूप और अव्यक्त था । ऐसा समझ लो, मानो सब ओर सुषुप्ति - ही - सुषुप्ति छा रही हो ॥ ४७ ॥ प्रिय दक्ष! मैं अनन्त गुणोंका आधार

एवं स्वयं अनन्त हूँ । जब गुणमयी मायाके क्षोभसे यह ब्रह्माण्ड - शरीर प्रकट हुआ, तब इसमें अयोनिज आदिपुरुष ब्रह्मा उत्पन्न हुए || ४८ || जब मैंने उनमें शक्ति और चेतनाका संचार किया तब देवशिरोमणि ब्रह्मा सृष्टि करनेके लिये उद्यत हुए । परन्तु उन्होंने अपनेको सृष्टिकार्यमें असमर्थ - सा पाया ॥४९ ॥ उस समय मैंने उन्हें आज्ञा दी कि तप करो । तब उन्होंने

घोर तपस्या की और उस तपस्याके प्रभावसे पहले - पहल तुम नौ प्रजापतियोंकी सृष्टि की ॥५० ॥

प्रिय दक्ष! देखो, यह पंचजन प्रजापतिकी कन्या असिक्नी है । इसे तुम अपनी पत्नीके रूपमें ग्रहण करो ॥५१ ॥ अब तुम गृहस्थोचित स्त्रीसहवासरूप धर्मको स्वीकार करो । यह

असिक्नी भी उसी धर्मको स्वीकार करेगी । तब तुम इसके द्वारा बहुत - सी प्रजा उत्पन्न कर सकोगे ॥५२ ॥ प्रजापते! अबतक तो मानसी सृष्टि होती थी, परन्तु अब तुम्हारे बाद सारी

प्रजा मेरी मायासे स्त्री - पुरुषके संयोगसे ही उत्पन्न होगी तथा मेरी सेवामें तत्पर रहेगी ॥५३ ॥

श्रीशुक उवाच इत्युक्त्वा मिषतस्तस्य भगवान् विश्वभावनः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1144

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स्वप्नोपलब्धार्थ इव तत्रैवान्तर्दधे हरिः ॥ ५४ श्रीशुकदेवजी कहते हैं— विश्वके जीवनदाता भगवान् श्रीहरि यह कहकर दक्षके सामने ही इस प्रकार अन्तर्धान हो गये, जैसे स्वप्नमें देखी हुई वस्तु स्वप्न टूटते ही लुप्त हो जाती है ॥५४ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे चतुर्थोऽध्यायः || ४ || १. प्रा ० पा ० — यथायोगी । २. प्रा ० पा ० - वृक्षेभ्यः । १. प्रा ० पा ० — त्वादिष्टा । २. प्रा ० पा ० - लोकानां पितरौ । ३. प्रा ० पा ० – भूतानां शास्तास्ते । १.प्रा ० पा ० — स्वसंज्ञया । १. प्रा ० पा ० – वा ० । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1145

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अथ पञ्चमोऽध्यायः श्रीनारदजीके उपदेशसे दक्षपुत्रोंकी विरक्ति तथा नारदजीको दक्षका शाप श्रीशुक उवाच

तस्यां स पाञ्चजन्यां वै विष्णुमायोपबृंहितः ।

हर्यश्वसंज्ञानयुतं पुत्रानजनयद् विभुः ॥ १

अपृथग्धर्मशीलास्ते सर्वे दाक्षायणा नृप ।

पित्रा प्रोक्ताः प्रजासर्गे प्रतीचीं प्रययुर्दिशम् ॥२

तत्र नारायणसरस्तीर्थं सिन्धुसमुद्रयोः ।

सङ्गमो यत्र सुमहन्मुनिसिद्धनिषेवितम् ॥३

तदुपस्पर्शनादेव विनिर्धूतमलाशयाः ।

धर्मे पारमहंस्ये च प्रोत्पन्नमतयोऽप्युत ॥४

तेपिरे तप एवोग्रं पित्रादेशेन यन्त्रिताः ।

प्रजाविवृद्धये यत्तान् देवर्षिस्तान् ददर्श ह ॥५

उवाच चाथ हर्यश्वाः कथं स्रक्ष्यथ वै प्रजाः ।

अदृष्ट्वान्तं भुवो यूयं बालिशा बत पालकाः ॥६

तथैकपुरुषं राष्ट्रं बिलं चादृष्टनिर्गमम् ।

बहुरूपां स्त्रियं चापि पुमांसं पुंश्चलीपतिम् ॥७

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! भगवान्‌के शक्तिसंचारसे दक्ष प्रजापति परम समर्थ हो गये थे । उन्होंने पंचजनकी पुत्री असिक्नीसे हर्यश्व नामके दस हजार पुत्र उत्पन्न किये ॥१ ॥

राजन्! दक्षके ये सभी पुत्र एक आचरण और एक स्वभावके थे । जब उनके पिता दक्षने उन्हें सन्तान उत्पन्न करनेकी आज्ञा दी, तब वे तपस्या करनेके विचारसे पश्चिम दिशाकी ओर गये ॥२ ॥ पश्चिम दिशामें सिन्धुनदी और समुद्रके संगमपर नारायण - सर नामका एक महान्

तीर्थ है । बड़े - बड़े मुनि और सिद्ध पुरुष वहाँ निवास करते हैं ॥३ ॥

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पृष्ठ 1146

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नारायण - सरमें स्नान करते ही हर्यश्वोंके अन्तःकरण शुद्ध हो गये, उनकी बुद्धि भागवतधर्ममें लग गयी । फिर भी अपने पिता दक्षकी आज्ञासे बँधे होनेके कारण वे उग्र तपस्या ही करते रहे । जब देवर्षि नारदने देखा कि भागवतधर्ममें रुचि होनेपर भी ये प्रजावृद्धिके लिये ही तत्पर हैं, तब उन्होंने उनके पास आकर कहा – ' अरे हर्यश्वो! तुम प्रजापति हो तो क्या हुआ । वास्तवमें तो तुमलोग मूर्ख ही हो । बतलाओ तो, जब तुमलोगोंने पृथ्वीका अन्त ही नहीं देखा, तब सृष्टि कैसे करोगे? बड़े खेदकी बात है! ॥४-६ ॥ देखो - एक ऐसा देश है, जिसमें एक ही पुरुष है । एक ऐसा बिल है, जिससे बाहर निकलनेका रास्ता ही नहीं है । एक ऐसी स्त्री है, जो बहुरूपिणी है । एक ऐसा पुरुष है, जो व्यभिचारिणीका पति है । एक ऐसी नदी है, जो आगे - पीछे दोनों ओर बहती है । एक ऐसा विचित्र घर है, जो पचीस पदार्थोंसे बना है । एक ऐसा हंस है, जिसकी कहानी बड़ी विचित्र है । एक ऐसा चक्र है, जो छुरे एवं वज्रसे बना हुआ है और अपने - आप घूमता रहता है । मूर्ख हर्यश्वो! जबतक तुमलोग अपने सर्वज्ञ पिताके उचित आदेशको समझ नहीं लोगे और इन उपर्युक्त वस्तुओंको देख नहीं लोगे, तबतक उनके आज्ञानुसार सृष्टि कैसे कर सकोगे? ' ॥७ - ९ ॥

नदीमुभयतोवाहां पञ्चपञ्चाद्भुतं गृहम् ।

क्वचिद्धंसं चित्रकथं क्षौरपव्यं स्वयं भ्रमिम् ॥८

कथं स्वपितुरादेशमविद्वांसो विपश्चितः ।

अनुरूपमविज्ञाय अहो सर्गं करिष्यथ ॥ ९

श्रीशुक उवाच

तन्निशम्याथ हर्यश्वा औत्पत्तिकमनीषया ।

वाचःकूटं º तु देवर्षेः स्वयं विममृशुर्धिया ॥१०

भूः क्षेत्रं जीवसंज्ञं यदनादि निजबन्धनम् ।

अदृष्ट्वा तस्य निर्वाणं किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥ ११

एक एवेश्वरस्तुर्यो भगवान् स्वाश्रयः परः ।

तमदृष्ट्वाभवं पुंसः किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥१२

पुमान् नैवैति यद् गत्वा बिलस्वर्गं ३ गतो यथा ।

प्रत्यग्धामाविद इह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥१३

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पृष्ठ 1147

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नानारूपाऽऽत्मनो बुद्धिः स्वैरिणीव गुणान्विता ।

तन्निष्ठामगतस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥१४

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! हर्यश्व जन्मसे ही बड़े बुद्धिमान् थे । वे देवर्षि नारदकी यह पहेली, ये गूढ़ वचन सुनकर अपनी बुद्धिसे स्वयं ही विचार करने लगे – ॥१० ॥

‘ ( देवर्षि नारदका कहना तो सच है ) यह लिंगशरीर ही जिसे साधारणतः जीव कहते हैं, पृथ्वी है और यही आत्माका अनादि बन्धन है । इसका अन्त ( विनाश ) देखे बिना मोक्षके अनुपयोगी कर्मोंमें लगे रहने से क्या लाभ है? ॥ ११ ॥ सचमुच ईश्वर एक ही है । वह जाग्रत्

आदि तीनों अवस्थाओं और उनके अभिमानियोंसे भिन्न, उनका साक्षी तुरीय है । वही सबका आश्रय है, परन्तु उसका आश्रय कोई नहीं है । वही भगवान् हैं । उस प्रकृति आदिसे अतीत, नित्यमुक्त परमात्माको देखे बिना भगवान्‌के प्रति असमर्पित कर्मोंसे जीवको क्या लाभ है? ॥१२ ॥ जैसे मनुष्य बिलरूप पातालमें प्रवेश करके वहाँसे नहीं लौट पाता — वैसे ही जीव

जिसको प्राप्त होकर फिर संसारमें नहीं लौटता, जो स्वयं अन्तर्ज्योतिःस्वरूप है, उस परमात्माको जाने बिना विनाशवान् स्वर्ग आदि फल देनेवाले कर्मोंको करनेसे क्या लाभ है? ॥१३ ॥

यह अपनी बुद्धि ही बहुरूपिणी और सत्त्व, रज आदि गुणोंको धारण करनेवाली व्यभिचारिणी स्त्रीके समान है । इस जीवनमें इसका अन्त जाने बिना - विवेक प्राप्त किये बिना अशान्तिको अधिकाधिक बढ़ानेवाले कर्म करनेका प्रयोजन ही क्या है? || १४ || यह बुद्धि ही कुलटा स्त्रीके समान है । इसके संगसे जीवरूप पुरुषका ऐश्वर्य — इसकी स्वतन्त्रता नष्ट हो गयी है । इसीके पीछे - पीछे वह कुलटा स्त्रीके पतिकी भाँति न जाने कहाँ - कहाँ भटक रहा है । इसकी विभिन्न गतियों, चालोंको जाने बिना ही विवेकरहित कर्मोंसे क्या सिद्धि मिलेगी? ॥१५ ॥

तत्सङ्गभ्रंशितैश्वर्यं संसरन्तं कुभार्यवत् ।

तद्गतीरबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥१५

सृष्ट्यप्ययकरीं मायां वेलाकूलान्तवेगिताम् ।

मत्तस्य तामविज्ञस्य ' किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥१६

पञ्चविंशतितत्त्वानां पुरुषोऽद्भुतदर्पणम् ।

अध्यात्ममबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥१७

ऐश्वरं शास्त्रमुत्सृज्य बन्धमोक्षानुदर्शनम् ।

विविक्तपदमज्ञाय ' किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥१८

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पृष्ठ 1148

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कालचक्रं भ्रमिस्तीक्ष्णं सर्वं निष्कर्षयज्जगत् ।

स्वतन्त्रमबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥१९

माया ही दोनों ओर बहनेवाली नदी है । यह सृष्टि भी करती है और प्रलय भी । जो लोग इससे निकलनेके लिये तपस्या, विद्या आदि तटका सहारा लेने लगते हैं, उन्हें रोकनेके लिये क्रोध, अहंकार आदिके रूपमें वह और भी वेगसे बहने लगती है । जो पुरुष उसके वेगसे विवश एवं अनभिज्ञ है, वह मायिक कर्मोंसे क्या लाभ उठावेगा? ॥१६ ॥

ये पचीस तत्त्व ही एक अद्भुत घर है । पुरुष उनका आश्चर्यमय आश्रय है । वही समस्त कार्य - कारणात्मक जगत्का अधिष्ठाता है । यह बात न जानकर सच्चा स्वातन्त्र्य प्राप्त किये बिना झूठी स्वतन्त्रतासे किये जानेवाले कर्म व्यर्थ ही हैं ॥१७ ॥

भगवान्का स्वरूप बतलानेवाला शास्त्र हंसके समान नीर - क्षीर विवेकी है । वह बन्ध-मोक्ष, चेतन और जडको अलग - अलग करके दिखा देता है । ऐसे अध्यात्मशास्त्ररूप हंसका आश्रय छोड़कर उसे जाने बिना बहिर्मुख बनानेवाले कर्मोंसे लाभ ही क्या है? ॥१८ ॥

यह काल ही एक चक्र है । यह निरन्तर घूमता रहता है । इसकी धार छुरे और वज्रके समान तीखी है और यह सारे जगत्को अपनी ओर खींच रहा है । इसको रोकनेवाला कोई नहीं, यह परम स्वतन्त्र है । यह बात न जानकर कर्मोंके फलको नित्य समझकर जो लोग सकामभावसे उनका अनुष्ठान करते हैं, उन्हें उन अनित्य कर्मोंसे क्या लाभ होगा? ॥१९ ॥

शास्त्रस्य पितुरादेशं यो न वेद निवर्तकम् ।

कथं तदनुरूपाय गुणविश्रम्भ्युपक्रमेत् ॥ २०

इति व्यवसिता राजन् हर्यश्वा एकचेतसः ।

प्रययुस्तं परिक्रम्य पन्थानमनिवर्तनम् ॥२१

स्वरब्रह्मणि निर्भातहृषीकेशपदाम्बुजे ।

अखण्डं चित्तमावेश्य लोकाननुचरन्मुनिः ॥२२

नाशं निशम्य पुत्राणां नारदाच्छीलशालिनाम् ।

अन्वतप्यत कः शोचन् सुप्रजस्त्वं शुचां पदम् ॥२३

सरं भूयः पाञ्चजन्यायामजेन परिसान्त्वितः ।

पुत्रानजनयद् दक्षः शबलाश्वान् सहस्रशः ॥ २४

तेऽपि पित्रा समादिष्टाः प्रजासर्गे धृतव्रताः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1149

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नारायणसरो जग्मुर्यत्र सिद्धाः स्वपूर्वजाः ॥ २५

तदुपस्पर्शनादेव विनिर्धूतमलाशयाः ।

जपन्तो ब्रह्म परमं तेपुस्तेऽत्र महत् तपः ॥२६

अब्भक्षाः कतिचिन्मासान् कतिचिद्वायुभोजनाः ।

आराधयन् मन्त्रमिममभ्यस्यन्त इडस्पतिम् ॥२७

ॐ नमो नारायणाय पुरुषाय महात्मने ।

विशुद्धसत्त्वधिष्ण्याय महाहंसाय धीमहि ॥ २८

शास्त्र ही पिता है; क्योंकि दूसरा जन्म शास्त्र के द्वारा ही होता है और उसका आदेश कर्मोंमें लगना नहीं, उनसे निवृत्त होना है । इसे जो नहीं जानता, वह गुणमय शब्द आदि विषयोंपर विश्वास कर लेता है । अब वह कर्मोंसे निवृत्त होनेकी आज्ञाका पालन भला कैसे कर सकता है? ' ॥२० ॥ परीक्षित्! हर्यश्वोंने एक मतसे यही निश्चय किया और नारदजीकी

परिक्रमा करके वे उस मोक्षपथके पथिक बन गये, जिसपर चलकर फिर लौटना नहीं पड़ता ॥२१ ॥ इसके बाद देवर्षि नारद स्वरब्रह्ममे - संगीतलहरीमें अभिव्यक्त हुए, भगवान्

श्रीकृष्णचन्द्रके चरणकमलोंमें अपने चित्तको अखण्डरूपसे स्थिर करके लोक - लोकान्तरोंमें विचरने लगे ॥२२ ॥

परीक्षित्! जब दक्षप्रजापतिको मालूम हुआ कि मेरे शीलवान् पुत्र नारदके उपदेशसे कर्तव्यच्युत हो गये हैं, तब वे शोकसे व्याकुल हो गये । उन्हें बड़ा पश्चात्ताप हुआ । सचमुच अच्छी सन्तानका होना भी शोकका ही कारण है ॥२३ ॥ ब्रह्माजीने दक्षप्रजापतिको बड़ी

सान्त्वना दी । तब उन्होंने पंचजन - नन्दिनी असिक्नीके गर्भसे एक हजार पुत्र और उत्पन्न किये । उनका नाम था शबलाश्व ॥२४ ॥ वे भी अपने पिता दक्षप्रजापतिकी आज्ञा पाकर

प्रजासृष्टिके उद्देश्यसे तप करनेके लिये उसी नारायणसरोवरपर गये, जहाँ जाकर उनके बड़े भाइयोंने सिद्धि प्राप्त की थी || २५ || शबलाश्वोंने वहाँ जाकर उस सरोवरमें स्नान किया । स्नानमात्रसे ही उनके अन्तःकरणके सारे मल धुल गये । अब वे परब्रह्मस्वरूप प्रणवका जप करते हुए महान् तपस्यामें लग गये || २६ || कुछ महीनोंतक केवल जल और कुछ महीनोंतक केवल हवा पीकर ही उन्होंने ' हम नमस्कारपूर्वक ओंकारस्वरूप भगवान् नारायणका ध्यान करते हैं, जो विशुद्धचित्तमें निवास करते हैं सबके अन्तर्यामी हैं तथा सर्वव्यापक एवं परमहंसस्वरूप हैं ।’— इस मन्त्रका अभ्यास करते हुए मन्त्राधिपति भगवान्की आराधना की ॥२७-२८ ॥

इति तानपि राजेन्द्र प्रतिसर्गधियो मुनिः ।

उपेत्य नारदः प्राह वाचःकूटानि पूर्ववत् ॥२९

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पृष्ठ 1150

श्रीमद्भागवत महापुराण - १, पृष्ठ 1150 का मूल पृष्ठ
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दाक्षायणाः संशृणुत गदतो निगमं मम ।

अन्विच्छतानुपदवीं भ्रातॄणां भ्रातृवत्सलाः ॥३०

भ्रातॄणां प्रायणं भ्राता योऽनुतिष्ठति धर्मवित् ।

स पुण्यबन्धुः पुरुषो मरुद्भिः सह मोदते ॥ ३१

एतावदुक्त्वा प्रययौ नारदोऽमोघदर्शनः ।

तेऽपि चान्वगमन्मार्गं भ्रातॄणामेव मारिष ॥३२

सध्रीचीनं प्रतीचीनं परस्यानुपथं गताः ।

नाद्यापि ते निवर्तन्ते पश्चिमा यामिनीरिव ॥ ३३

एतस्मिन् काल उत्पातान् बहून् पश्यन् प्रजापतिः ।

पूर्ववन्नारदकृतं पुत्रनाशमुपाशृणोत् ॥३४

चुक्रोध नारदायासौ पुत्रशोकविमूर्च्छितः ।

देवर्षिमुपलभ्याह रोषाद्विस्फुरिताधरः ॥ ३५

दक्ष उवाच

अहो असाधो साधूनां साधुलिङ्गेन नस्त्वया ।

असाध्वकार्यर्भकाणां भिक्षोर्मार्गः प्रदर्शितः ॥३६

ऋणैस्त्रिभिरमुक्तानाममीमांसितकर्मणाम् ।

विघातः श्रेयसः पाप लोकयोरुभयोः कृतः ॥३७

परीक्षित्! इस प्रकार दक्षके पुत्र शबलाश्व प्रजासृष्टिके लिये तपस्यामें संलग्न थे । उनके पास भी देवर्षि नारद आये और उन्होंने पहलेके समान ही कूट वचन कहे ॥ २ ९ ॥ उन्होंने कहा — ‘ दक्षप्रजापतिके पुत्रो! मैं तुमलोगोंको जो उपदेश देता हूँ, उसे सुनो । तुमलोग तो अपने भाइयोंसे बड़ा प्रेम करते हो । इसलिये उनके मार्गका अनुसन्धान करो || ३० || जो धर्मज्ञ भाई अपने बड़े भाइयोंके श्रेष्ठ मार्गका अनुसरण करता है, वही सच्चा भाई है! वह पुण्यवान् पुरुष परलोकमें मरुद्गणोंके साथ आनन्द भोगता है ॥३१ ॥ परीक्षित्! शबलाश्वोंको इस प्रकार

उपदेश देकर देवर्षि नारद वहाँसे चले गये और उन लोगोंने भी अपने भाइयोंके मार्गका ही अनुगमन किया; क्योंकि नारदजीका दर्शन कभी व्यर्थ नहीं जाता ॥ ३२ । । वे उस पथके पथिक बने, जो अन्तर्मुखी वृत्तिसे प्राप्त होनेयोग्य, अत्यन्त सुन्दर और भगवत्प्राप्तिके ****** ebook converter DEMO Watermarks *******