श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1151–1160
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1151–1160
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अनुकूल है । वे बीती हुई रात्रियोंके समान न तो उस मार्गसे अबतक लौटे हैं और न आगे लौटेंगे ही ॥३३ ॥
दक्षप्रजापतिने देखा कि आजकल बहुत - से अशकुन हो रहे हैं । उनके चित्तमें पुत्रोंके अनिष्टकी आशंका हो आयी । इतनेमें ही उन्हें मालूम हुआ कि पहलेकी भाँति अबकी बार भी नारदजीने मेरे पुत्रोंको चौपट कर दिया ॥ ३४ ॥ उन्हें अपने पुत्रोंकी कर्तव्यच्युतिसे बड़ा शोक
हुआ और वे नारदजीपर बड़े क्रोधित हुए । उनके मिलनेपर क्रोधके मारे दक्षप्रजापतिके होठ फड़कने लगे और वे आवेशमें भरकर नारदजीसे बोले ॥३५ ॥
दक्षप्रजापतिने कहा — ओ दुष्ट! तुमने झूठमूठ साधुओंका बाना पहन रखा है । हमारे भोले - भाले बालकोंको भिक्षुकोंका मार्ग दिखाकर तुमने हमारा बड़ा अपकार किया है ॥३६ ॥
अभी उन्होंने ब्रह्मचर्यसे ऋषि ऋण, यज्ञसे देव ऋण और पुत्रोत्पत्तिसे पितृ - ऋण नहीं उतारा था । उन्हें अभी कर्मफलकी नश्वरताके सम्बन्धमें भी कुछ विचार नहीं था । परन्तु पापात्मन्! तुमने उनके दोनों लोकोंका सुख चौपट कर दिया ॥३७ ॥
एवं त्वं निरनुक्रोशो बालानां मतिभिद्धरेः ।
पार्षदमध्ये चरसि यशोहा निरपत्रपः ॥ ३८
ननु भागवता नित्यं भूतानुग्रहकातराः ।
ऋते त्वां सौहृदघ्नं वै वैरङ्करमवैरिणाम् ॥ ३ ९
नेत्थं पुंसां विरागः स्यात् त्त्वया केवलिना मृषा ।
मन्यसे यद्युपशमं स्नेहपाशनिकृन्तनम् ॥४०
नानुभूय न जानाति पुमान् विषयतीक्ष्णताम् ।
निर्विद्येत स्वयं तस्मान्न तथा भिन्नधीः परैः ॥४१
यन्नस्त्वं कर्मसन्धानां साधूनां गृहमेधिनाम् ।
कृतवानसि दुर्मर्षं विप्रियं तव मर्षितम् ॥४२
तन्तुकृन्तन यन्नस्त्वमभद्रमचरः पुनः ।
तस्माल्लोकेषु ते मूढ न भवेद् भ्रमतः पदम् ॥४३
श्रीशुक उवाच
प्रतिजग्राह तद्वाढं नारदः साधुसम्मतः ।
एतावान् साधुवादो हि तितिक्षेतेश्वरः स्वयम् ॥४४
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सचमुच तुम्हारे हृदयमें दयाका नाम भी नहीं है । तुम इस प्रकार बच्चोंकी बुद्धि बिगाड़ते फिरते हो । तुमने भगवान्के पार्षदोंमें रहकर उनकी कीर्तिमें कलंक ही लगाया । सचमुच तुम बड़े निर्लज्ज हो ॥३८ ॥
मैं जानता हूँ कि भगवान्के पार्षद सदा - सर्वदा दुःखी प्राणियोंपर दया करनेके लिये व्यग्र रहते हैं । परन्तु तुम प्रेमभावका विनाश करनेवाले हो । तुम उन लोगोंसे भी वैर करते हो, जो किसीसे वैर नहीं करते ॥३९ ॥
यदि तुम ऐसा समझते हो कि वैराग्यसे ही स्नेहपाश - विषयासक्तिका बन्धन कट सकता है, तो तुम्हारा यह विचार ठीक नहीं है; क्योंकि तुम्हारे जैसे झूठमूठ वैराग्यका स्वाँग भरनेवालोंसे किसीको वैराग्य नहीं हो सकता ॥४० ॥
नारद! मनुष्य विषयोंका अनुभव किये बिना उनकी कटुता नहीं जान सकता । इसलिये उनकी दुःखरूपताका अनुभव होनेपर स्वयं जैसा वैराग्य होता है, वैसा दूसरोंके बहकानेसे नहीं होता ॥४१ ॥
हमलोग सद्गृहस्थ हैं, अपनी धर्ममर्यादाका पालन करते हैं । एक बार पहले भी तुमने
हमारा असह्य अपकार किया था । तब हमने उसे सह लिया ॥४२ ॥
तुम तो हमारी वंशपरम्पराका उच्छेद करनेपर ही उतारू हो रहे हो । तुमने फिर हमारे साथ वही दुष्टताका व्यवहार किया । इसलिये मूढ़! जाओ, लोक - लोकान्तरोंमें भटकते रहो । कहीं भी तुम्हारे लिये ठहरनेको ठौर नहीं होगी ॥४३ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! संतशिरोमणि देवर्षि नारदने ' बहुत अच्छा ' कहकर दक्षका शाप स्वीकार कर लिया । संसारमें बस, साधुता इसीका नाम है कि बदला लेनेकी शक्ति रहनेपर भी दूसरेको किया हुआ अपकार सह लिया जाय ॥४४ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे नारदशापो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५ ॥
१. प्रा ० पा ० — तद्वाचःकूटं देवर्षेः । २. प्रा ० पा ० – किं नु स्यात्कर्म ० । ३. प्रा ० पा०— बिलं सर्गं । १. प्रा ० पा ० — तदविज्ञस्य । २. प्रा ० पा ० - दर्शनम् । ३. प्रा ० पा ० – रूपम ० । १. प्रा ० पा०— ततः स पाञ्च ० । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथ षष्ठोऽध्यायः दक्षप्रजापतिकी साठ कन्याओंके वंशका विवरण श्रीशुक उवाच
ततः प्राचेतसोऽसिक्न्यामनुनीतः स्वयम्भुवा ।
षष्टिं संजनयामास दुहितृः पितृवत्सलाः ॥१
दश धर्माय कायेन्दोर्द्विषट् त्रिणव दत्तवान् ।
भूताङ्गिरः कृशाश्वेभ्यो द्वे द्वे तार्क्ष्याय चापराः ॥ २
नामधेयान्यमूषां त्वं सापत्यानां च मे शृणु ।
यासां प्रसूतिप्रसवैर्लोका आपूरितास्त्रयः ॥३
भानुर्लम्बा ककुब्जामिर्विश्वा साध्या मरुत्वती ।
वसुर्मुहूर्ता सङ्कल्पा धर्मपत्न्यः सुतान् शृणु ॥४
भानोस्तु देवऋषभ इन्द्रसेनस्ततो नृप ।
विद्योत आसील्लम्बायास्ततश्च स्तनयित्नवः ॥५
ककुभः सङ्कटस्तस्य कीकटस्तनयो यतः ।
भुवो दुर्गाणि जामेयः स्वर्गो नन्दिस्ततोऽभवत् ॥६
विश्वेदेवास्तु विश्वाया अप्रजांस्तान् प्रचक्षते ।
साध्योगणस्तु साध्याया अर्थसिद्धिस्तु तत्सुतः ॥७
मरुत्वांश्च जयन्तश्च मरुत्वत्यां बभूवतुः ।
जयन्तो वासुदेवांश उपेन्द्र इति यं विदुः ॥८
मौहूर्तिका देवगणा मुहूर्तायाश्च जज्ञिरे ।
ये वै फलं प्रयच्छन्ति भूतानां स्वस्वकालजम् ॥९
सङ्कल्पायाश्च सङ्कल्पः कामःसङ्कल्पजः स्मृतः ।
वसवोऽष्टौ वसोः पुत्रास्तेषां नामानि मे शृणु ॥१०
द्रोणः प्राणो ध्रुवोऽर्कोऽग्निर्दोषो वसुर्विभावसुः ।
द्रोणस्याभिमतेः पत्न्या हर्षशोकभयादयः ॥११
प्राणस्योर्जस्वती भार्या सह आयुः पुरोजवः ।
ध्रुवस्य भार्या धरणिरसूत विविधाः पुरः ॥१२
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श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! तदनन्तर ब्रह्माजीके बहुत अनुनय - विनय करनेपर दक्षप्रजापतिने अपनी पत्नी असिक्नीके गर्भसे साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं । वे सभी अपने पिता दक्षसे बहुत प्रेम करती थीं ॥१ ॥ दक्षप्रजापतिने उनमेंसे दस कन्याएँ धर्मको, तेरह कश्यपको,
सत्ताईस चन्द्रमाको, दो भूतको, दो अंगिराको, दो कृशाश्वको और शेष चार तार्क्ष्यनामधारी कश्यपको ही ब्याह दीं ॥२ ॥ परीक्षित्! तुम इन दक्षकन्याओं और इनकी सन्तानोंके नाम
मुझसे सुनो । इन्हींकी वंशपरम्परा तीनों लोकोंमें फैली हुई है ॥३ ॥
धर्मकी दस पत्नियाँ थीं— भानु, लम्बा, ककुभ्, जामि, विश्वा, साध्या, मरुत्वती, वसु, मुहूर्ता और संकल्पा । इनके पुत्रोंके नाम सुनो ॥४ ॥ राजन्! भानुका पुत्र देवऋषभ और
उसका इन्द्रसेन था । लम्बाका पुत्र हुआ विद्योत और उसके मेघगण || ५ || ककुभ्का पुत्र हुआ संकट, उसका कीकट और कीकटके पुत्र हुए पृथ्वीके सम्पूर्ण दुर्गों ( किलों ) -के अभिमानी देवता । जामिके पुत्रका नाम था स्वर्ग और उसका पुत्र हुआ नन्दी || ६ || विश्वाके विश्वेदेव हुए । उनके कोई सन्तान न हुई । साध्यासे साध्यगण हुए और उनका पुत्र हुआ अर्थसिद्धि ॥७ ॥
मरुत्वतीके दो पुत्र हुए - मरुत्वान् और जयन्त । जयन्त भगवान् वासुदेवके अंश हैं, जिन्हें लोग उपेन्द्र भी कहते हैं || ८ || मुहूर्तासे मूहूर्तके अभिमानी देवता उत्पन्न हुए । ये अपने-अपने मूहूर्तमें जीवोंको उनके कर्मानुसार फल देते हैं ॥९ ॥ संकल्पाका पुत्र हुआ संकल्प और
उसका काम । वसुके पुत्र आठों वसु हुए । उनके नाम मुझसे सुनो ॥१० ॥ द्रोण, प्राण, ध्रुव,
अर्क, अग्नि, दोष, वसु और विभावसु । द्रोणकी पत्नीका नाम है अभिमति । उससे हर्ष, शोक, भय आदिके अभिमानी देवता उत्पन्न हुए || ११ || प्राणकी पत्नी ऊर्जस्वतीके गर्भसे सह, आयु और पुरोजव नामके तीन पुत्र हुए । ध्रुवकी पत्नी धरणीने अनेक नगरोंके अभिमानी देवता उत्पन्न किये ॥१२ ॥
अर्कस्य वासना भार्या पुत्रास्तर्षादयः स्मृताः ।
अग्नेर्भार्या वसोर्धारा पुत्रा द्रविणकादयः ॥१३
स्कन्दश्च कृत्तिकापुत्रो ये विशाखादयस्ततः ।
दोषस्य शर्वरीपुत्रः शिशुमारो हरेः कला ॥१४
वसोराङ्गिरसीपुत्रो विश्वकर्मा कृतीपतिः ।
ततो मनुश्चाक्षुषोऽभूद् विश्वे साध्या मनोः सुताः ॥१५
विभावसोरसूतोषा व्युष्टं रोचिषमातपम् ।
पञ्चयामोऽथ भूतानि येन जाग्रति कर्मसु ॥१६
सरूपासूत भूतस्य भार्या रुद्रांश्च कोटिशः ।
रैवतोऽजो भवो भीमो वाम उग्रो वृषाकपिः ॥१७
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अजैकपादहिर्बुध्यो बहुरूपो महानिति ।
रुद्रस्य पार्षदाश्चान्ये घोरा भूतविनायकाः ॥ १८
प्रजापतेरङ्गिरसः स्वधा पत्नी पितॄनथ ।
अथर्वाङ्गिरसं वेदं पुत्रत्वे चाकरोत् सती ॥१९
कृशाश्वोऽर्चिषि भार्यायां धूम्रकेशमजीजनत् ।
धिषणायां वेदशिरो देवलं वयुनं मनुम् ॥२०
तार्क्ष्यस्य विनता कद्रूः पतङ्गी यामिनीति च ।
पतङ्ग्यसूत पतगान् यामिनी शलभानथ ॥२१
सुपर्णासूत गरुडं साक्षाद् यज्ञेशवाहनम् ।
सूर्यसूतमनूरुं च कद्रूर्नागाननेकशः ॥ २२
कृत्तिकादीनि नक्षत्राणीन्दोः पत्न्यस्तु भारत ।
दक्षशापात् सोऽनपत्यस्तासु यक्ष्मग्रहार्दितः ॥२३
अर्ककी पत्नी वासनाके गर्भसे तर्ष ( तृष्णा ) आदि पुत्र हुए । अग्नि नामक वसुकी पत्नी धाराके गर्भसे द्रविणक आदि बहुत - से पुत्र उत्पन्न हुए ॥१३ ॥ कृत्तिकापुत्र स्कन्द भी अग्निसे
ही उत्पन्न हुए । उनसे विशाख आदिका जन्म हुआ । दोषकी पत्नी शर्वरीके गर्भसे शिशुमारका जन्म हुआ । वह भगवान्का कलावतार है ॥ १४ ॥ वसुकी पत्नी आङ्गिरसीसे शिल्पकलाके
अधिपति विश्वकर्माजी हुए । विश्वकर्माके उनकी भार्या कृतीके गर्भसे चाक्षुष मनु हुए और उनके पुत्र विश्वेदेव एवं साध्यगण हुए ॥ १५ ॥ विभावसुकी पत्नी उषासे तीन पुत्र हुए — व्युष्ट,
रोचिष् और आतप । उनमेंसे आतपके पंचयाम ( दिवस ) नामक पुत्र हुआ, उसीके कारण सब जीव अपने - अपने कार्योंमें लगे रहते हैं ॥ १६ ॥ भूतकी पत्नी दक्षनन्दिनी सरूपाने कोटि-कोटि रुद्रगण उत्पन्न किये । इनमें रैवत, अज, भव, भीम, वाम, उग्र, वृषाकपि, अजैकपाद,
अहिर्बुध्न्य, बहुरूप, और महान् – ये ग्यारह मुख्य हैं । भूतकी दूसरी पत्नी भूतासे भयंकर भूत और विनायकादिका जन्म हुआ । ये सब ग्यारहवें प्रधान रुद्र महान्के पार्षद हुए ॥१७-१८ ॥ अंगिरा प्रजापतिकी प्रथम पत्नी स्वधाने पितृगणको उत्पन्न किया और दूसरी पत्नी सतीने अथर्वांगिरस नामक वेदको ही पुत्ररूपमें स्वीकार कर लिया ॥ १ ९ ॥ कृशाश्वकी पत्नी अर्चिसे धूम्रकेशका जन्म हुआ और धिषणासे चार पुत्र हुए - वेदशिरा, देवल, वयुन और मनु ॥२० ॥ तार्क्ष्यनामधारी कश्यपकी चार स्त्रियाँ थीं - विनता, कद्रू, पतंगी और यामिनी ।
पतंगीसे पक्षियोंका और यामिनीसे शलभों ( पतिंगों ) - का जन्म हुआ ॥२१ ॥ विनताके पुत्र
गरुड़ हुए, ये ही भगवान् विष्णुके वाहन हैं । विनताके ही दूसरे पुत्र अरुण हैं, जो भगवान् ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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सूर्यके सारथि हैं । कद्रूसे अनेकों नाग उत्पन्न हुए ॥२२ ॥
परीक्षित्! कृत्तिका आदि सत्ताईस नक्षत्रा - भिमानिनी देवियाँ चन्द्रमाकी पत्नियाँ हैं । रोहिणीसे विशेष प्रेम करनेके कारण चन्द्रमाको दक्षने शाप दे दिया, जिससे उन्हें क्षयरोग हो गया था । उन्हें कोई सन्तान नहीं हुई ॥ २३ ॥
पुन: प्रसाद्य तं सोमः कला लेभे क्षये दिताः ।
शृणु नामानि लोकानां मातॄणां शङ्कराणि च ॥२४
अथ कश्यपपत्नीनां यत्प्रसूतमिदं जगत् ।
अदितिर्दितिर्दनुः काष्ठा अरिष्टा सुरसा इला ॥ २५
मुनिः क्रोधवशा ताम्रा सुरभिः सरमा तिमिः ।
तिमेर्यादोगणा आसन् श्वापदाः सरमासुताः ॥२६
सुरभेर्महिषागावो ये चान्ये द्विशफा नृप ।
ताम्रायाः श्येनगृध्राद्या मुनेरप्सरसां गणाः ॥२७
दन्दशूकादयः सर्पा राजन् क्रोधवशात्मजाः ।
इलाहा भूरुहाः सर्वे यातुधानाश्च सौरसाः ॥२८
अरिष्टायाश्च गन्धर्वाः काष्ठाया द्विशफेतराः ।
सुता दनोरेकषष्टिस्तेषां प्राधानिकान् शृणु ॥२९
द्विमूर्धा शम्बरोऽरिष्टो हयग्रीवो विभावसुः ।
अयोमुखः शङ्कुशिराः स्वर्भानुः कपिलोऽरुणः ॥३०
पुलोमा वृषपर्वा च एकचक्रोऽनुतापनः ।
धूम्रकेशो विरूपाक्षो विप्रचित्तिश्च दुर्जयः ॥३१
स्वर्भानोः सुप्रभां कन्यामुवाह नमुचिः किल ।
वृषपर्वणस्तु शर्मिष्ठां ययातिर्नाहुषो बली ॥३२
वैश्वानरसुता याश्च चतस्रश्चारुदर्शनाः ।
उपदानवी हयशिरा पुलोमा कालका तथा ॥३३
उपदानवीं हिरण्याक्षः क्रतुर्हयशिरां नृप ।
पुलोमां कालकां च द्वे वैश्वानरसुते तु कः ॥३४
उपयेमेऽथ भगवान् कश्यपो ब्रह्मचोदितः ।
पौलोमाः कालकेयाश्च दानवा युद्धशालिनः ॥ ३५
तयोः षष्टिसहस्राणि यज्ञघ्नांस्ते पितुः पिता ।
जघान स्वर्गतो राजन्नेक इन्द्रप्रियङ्करः ॥३६
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उन्होंने दक्षको फिरसे प्रसन्न करके कृष्णपक्षकी क्षीण कलाओंके शुक्लपक्षमें पूर्ण होनेका वर तो प्राप्त कर लिया, ( परन्तु नक्षत्राभिमानी देवियोंसे उन्हें कोई सन्तान न हुई ) अब तुम कश्यपपत्नियोंके मंगलमय नाम सुनो । वे लोकमाताएँ हैं । उन्हींसे यह सारी सृष्टि उत्पन्न हुई है । उनके नाम हैं – अदिति, दिति, दनु, काष्ठा, अरिष्टा, सुरसा, इला, मुनि, क्रोधवशा, ताम्रा, सुरभि, सरमा और तिमि । इनमें तिमिके पुत्र हैं - जलचर जन्तु और सरमाके बाघ आदि हिंसक जीव ॥२४-२६ ॥ सुरभिके पुत्र हैं- भैंस, गाय तथा दूसरे दो खुरवाले पशु । ताम्राकी सन्तान हैं — बाज, गीध आदि शिकारी पक्षी । मुनिसे अप्सराएँ उत्पन्न हुईं ॥ २७ ॥ क्रोधवशाके
पुत्र हुए – साँप, बिच्छू आदि विषैले जन्तु । इलासे वृक्ष, लता आदि पृथ्वीमें उत्पन्न होनेवाली वनस्पतियाँ और सुरसासे यातुधान ( राक्षस ) ॥२८ ॥ अरिष्टासे गन्धर्व और काष्ठासे घोड़े आदि
एक खुवाले पशु उत्पन्न हुए । दनुके इकसठ पुत्र हुए । उनमें प्रधान- प्रधानके नाम सुनो ॥२९ ॥
द्विमूर्धा, शम्बर, अरिष्ट, हयग्रीव, विभावसु, अयोमुख, शंकुशिरा, स्वर्भानु, कपिल, अरुण, पुलोमा, वृषपर्वा, एकचक्र, अनुतापन, धूम्रकेश, विरूपाक्ष, विप्रचित्ति और दुर्जय ॥३०-३१ ॥ स्वर्भानुकी कन्या सुप्रभासे नमुचिने और वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठासे महाबली नहुषनन्दन ययातिने विवाह किया || ३२ || दनुके पुत्र वैश्वानरकी चार सुन्दरी कन्याएँ थीं । इनके नाम थे — उपदानवी, हयशिरा, पुलोमा और कालका ॥३३ ॥ इनमेंसे उपदानवीके
साथ हिरण्याक्षका और हयशिराके साथ क्रतुका विवाह हुआ । ब्रह्माजीकी आज्ञासे प्रजापति भगवान् कश्यपने ही वैश्वानरकी शेष दो पुत्रियों – पुलोमा और कालकाके साथ विवाह किया । उनसे पौलोम और कालकेय नामके साठ हजार रणवीर दानव हुए । इन्हींका दूसरा नाम निवातकवच था । ये यज्ञकर्ममें विघ्न डालते थे, इसलिये परीक्षित्! तुम्हारे दादा अर्जुनने अकेले ही उन्हें इन्द्रको प्रसन्न करनेके लिये मार डाला । यह उन दिनोंकी बात है, जब अर्जुन स्वर्गमें गये थे ॥३४-३६ हुए ॥
विप्रचित्तिः सिंहिकायां शतं चैकमजीजनत् ।
राहुज्येष्ठं केतुशतं ग्रहत्वं य उपागतः ॥३७
अथातः श्रूयतां वंशो योऽदितेरनुपूर्वशः ।
यत्र नारायणो देवः स्वांशेनावतरद् विभुः ॥३८
विवस्वानर्यमा पूषा त्वष्टाथ सविता भगः ।
धाता विधाता वरुणो मित्रः शक्र उरुक्रमः ॥३९
' ' वै विवस्वतः श्राद्धदेवं संज्ञासूयत वै मनुम् ।
मिथुनं च महाभागा यमं देवं यमीं तथा ।
सैव भूत्वाथ वडवा नासत्यौ सुषुवे भुवि ॥४०
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छाया शनैश्चरं लेभे सावर्णिं च मनुं ततः ।
कन्यां च तपतीं या वै वव्रे संवरणं पतिम् ॥४१
अर्यम्णो मातृका पत्नी तयोश्चर्षणयः सुताः ।
यत्र वै मानुषी जातिर्ब्रह्मणा चोपकल्पिता ॥४२
पूषानपत्यः पिष्टादो भग्नदन्तोऽभवत् पुरा ।
योऽसौ दक्षाय कुपितं जहास विवृतद्विजः ॥४३
त्वष्टुर्दैत्यानुजा भार्या रचना नाम कन्यका ।
संनिवेशस्तयोर्जज्ञे विश्वरूपश्च वीर्यवान् ॥४४
तं वव्रिरे सुरगणा स्वस्रीयं द्विषतामपि ।
विमतेन परित्यक्ता गुरुणाऽऽङ्गिरसेन यत् ॥४५
विप्रचित्तिकी पत्नी सिंहिकाके गर्भसे एक सौ एक पुत्र उत्पन्न हुए । उनमें सबसे बड़ा था राहु, जिसकी गणना ग्रहोंमें हो गयी । शेष सौ पुत्रोंका नाम केतु था ॥ ३७ ॥ परीक्षित्! अब
क्रमशः अदितिकी वंशपरम्परा सुनो । इस वंशमें सर्वव्यापक देवाधिदेव नारायणने अपने अंशसे वामनरूपमें अवतार लिया था ॥ ३८ ॥ अदितिके पुत्र थे - विवस्वान्, अर्यमा, पूषा,
त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र, इन्द्र और त्रिविक्रम ( वामन ) । यही बारह आदित्य कहलाये ॥३९ ॥ विवस्वान्की पत्नी महाभाग्यवती संज्ञाके गर्भसे श्राद्धदेव
( वैवस्वत ) मनु एवं यम यमीका जोड़ा पैदा हुआ! संज्ञाने ही घोड़ीका रूप धारण करके भगवान् सूर्यके द्वारा भूलोकमें दोनों अश्विनीकुमारोंको जन्म दिया ॥ ४० ॥
विवस्वान्की दूसरी पत्नी थी छाया । उसके शनैश्चर और सावर्णि मनु नामके दो पुत्र तथा
तपती नामकी एक कन्या उत्पन्न हुई । तपतीने संवरणको पतिरूपमें वरण किया ॥ ४१ ॥
अर्यमाकी पत्नी मातृका थी । उसके गर्भसे चर्षणी नामक पुत्र हुए । वे कर्तव्य - अकर्तव्यके ज्ञानसे युक्त थे । इसलिये ब्रह्माजीने उन्हींके आधारपर मनुष्यजातिकी ( ब्राह्मणादि वर्णोंकी ) कल्पना की ॥४२ ॥ पूषाके कोई सन्तान न हुई । प्राचीनकालमें जब शिवजी दक्षपर क्रोधित
हुए थे, तब पूषा दाँत दिखाकर हँसने लगे थे; इसलिये वीरभद्रने इनके दाँत तोड़ दिये थे । तबसे पूषा पिसा हुआ अन्न ही खाते हैं ॥४३ ॥ दैत्योंकी छोटी बहिन कुमारी रचना त्वष्टाकी
पत्नी थी । रचनाके गर्भसे दो पुत्र हुए - संनिवेश और पराक्रमी विश्वरूप ॥४४ ॥ इस प्रकार
विश्वरूप यद्यपि शत्रुओंके भानजे थे - फिर भी जब देवगुरु बृहस्पतिजीने इन्द्रसे अपमानित होकर देवताओंका परित्याग कर दिया, तब देवताओंने विश्वरूपको ही अपना पुरोहित बनाया था ॥४५ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे षष्ठोऽध्यायः ॥६ ॥
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अथ सप्तमोऽध्यायः बृहस्पतिजीके द्वारा देवताओंका त्याग और विश्वरूपका देवगुरुके रू राजोवाच
कस्य हेतोः परित्यक्ता आचार्येणात्मनः सुराः ।
एतदाचक्ष्व भगवञ्छिष्याणामक्रमं गुरौ ॥१
श्रीशुक उवाच
इन्द्रस्त्रिभुवनैश्वर्यमदोल्लङ्घितसत्पथः ।
मरुद्भिर्वसुभी रुद्रैरादित्यैर्ऋभुभिर्नृप ॥ २
विश्वेदेवैश्च साध्यैश्च नासत्याभ्यां परिश्रितः ।
सिद्धचारणगन्धर्वैर्मुनिभिर्ब्रह्मवादिभिः ॥३
विद्याधराप्सरोभिश्च किन्नरैः पतगोरगैः ।
निषेव्यमाणो मघवान् स्तूयमानश्च भारत ॥४
उपगीयमानो ललितमास्थानाध्यासनाश्रितः ।
पाण्डुरेणातपत्रेण चन्द्रमण्डलचारुणा ॥५
युक्तश्चान्यैः पारमेष्ठ्यैश्चामरव्यजनादिभिः ।
विराजमानः पौलोम्या सहार्धासनया भृशम् ॥ ६
स यदा परमाचार्यं देवानामात्मनश्च ह ।
नाभ्यनन्दत संप्राप्तं प्रत्युत्थानासनादिभिः ॥७
वाचस्पतिं मुनिवरं सुरासुरनमस्कृतम् ।
नोच्चचालासनादिन्द्रः पश्यन्नपि सभागतम् ॥८
ततो निर्गत्य सहसा कविराङ्गिरसः प्रभुः ।
आययौ स्वगृहं तूष्णीं विद्वान् श्रीमदविक्रियाम् ॥ ९
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