श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1161–1170
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1161–1170
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तर्ह्येव प्रतिबुद्ध्येन्द्रो गुरुहेलनमात्मनः ।
गर्हयामास सदसि स्वयमात्मानमात्मना ॥१०
राजा परीक्षित्ने पूछा — भगवन्! देवाचार्य बृहस्पतिजीने अपने प्रिय शिष्य देवताओंको किस कारण त्याग दिया था? देवताओंने अपने गुरुदेवका ऐसा कौन - सा अपराध कर दिया था, आप कृपा करके मुझे बतलाइये ॥ १ ॥
श्रीशुकदेवजीने कहा- राजन्! इन्द्रको त्रिलोकीका ऐश्वर्य पाकर घमण्ड हो गया था । इस घमण्डके कारण वे धर्ममर्यादाका, सदाचारका उल्लंघन करने लगे थे । एक दिनकी बात है, वे भरी सभामें अपनी पत्नी शचीके साथ ऊँचे सिंहासनपर बैठे हुए थे, उनचास मरुद्गण, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, आदित्य, ऋभुगण, विश्वेदेव, साध्यगण और दोनों अश्विनीकुमार उनकी सेवामें उपस्थित थे । सिद्ध, चारण, गन्धर्व, ब्रह्मवादी मुनिगण, विद्याधर, अप्सराएँ, किन्नर, पक्षी और नाग उनकी सेवा और स्तुति कर रहे थे । सब ओर ललित स्वरसे देवराज इन्द्रकी कीर्तिका गान हो रहा था । ऊपरकी ओर चन्द्रमण्डलके समान सुन्दर श्वेत छत्र शोभायमान था । चँवर, पंखे आदि महाराजोचित सामग्रियाँ यथास्थान सुसज्जित थीं । इस दिव्य समाजमें देवराज बड़े ही सुशोभित हो रहे थे ॥ २-६ ॥ इसी समय देवराज इन्द्र और समस्त देवताओंके परम आचार्य बृहस्पतिजी वहाँ आये । उन्हें सुर - असुर सभी नमस्कार करते हैं । इन्द्रने देख लिया कि वे सभामें आये हैं, परन्तु वे न तो खड़े हुए और न आसन आदि देकर गुरुका सत्कार ही किया । यहाँतक कि वे अपने आसनसे हिले - डुलेतक नहीं ॥७-८ ॥ त्रिकालदर्शी समर्थ बृहस्पतिजीने देखा कि यह ऐश्वर्यमदका दोष है! बस, वे झटपट वहाँसे निकलकर चुपचाप अपने घर चले आये ॥९ ॥ परीक्षित्! उसी समय देवराज इन्द्रको चेत हुआ । वे समझ
गये कि मैंने अपने गुरुदेवकी अवहेलना की है । वे भरी सभामें स्वयं ही अपनी निन्दा करने लगे ॥१० ॥
अहो बत ममासाधु कृतं वै दभ्रबुद्धिना ।
यन्मयैश्वर्यमत्तेन गुरुः सदसि कात्कृतः ॥११
को गृध्येत् पण्डितो लक्ष्मीं त्रिविष्टपपतेरपि ।
ययाहमासुरं भावं नीतोऽद्य विबुधेश्वरः ॥१२
ये पारमेष्ठ्यं धिषणमधितिष्ठन् न कञ्चन ।
प्रत्युत्तिष्ठेदिति ब्रूयुर्धर्मं ते न परं विदुः ॥ १३
तेषां कुपथदेष्टृणां पततां तमसि ह्यधः ।
ये श्रद्दध्युर्वचस्ते वै मज्जन्त्यश्मप्लवा इव ॥१४
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अथाहममराचार्यमगाधधिषणं द्विजम् ।
प्रसादयिष्ये निशठः शीर्ष्णा तच्चरणं स्पृशन् ॥१५
एवं चिन्तयतस्तस्य मघोनो भगवान् गृहात् ।
बृहस्पतिर्गतोऽदृष्टां गतिमध्यात्ममायया ॥१६
गुरोर्नाधिगतः संज्ञां परीक्षन् भगवान् स्वराट् ।
ध्यायन् धिया सुरैर्युक्तः शर्म नालभतात्मनः ॥१७
तच्छ्रुत्वैवासुराः सर्व आश्रित्यौशनसं मतम् ।
देवान् प्रत्युद्यमं चक्रुर्दुर्मदा आततायिनः ॥ १८
तैर्विसृष्टेषुभिस्तीक्ष्णैर्निर्भिन्नाङ्गोरुबाहवः ।
ब्रह्माणं शरणं जग्मुः सहेन्द्रा नतकन्धराः ॥१९
तांस्तथाभ्यर्दितान् वीक्ष्य भगवानात्मभूरजः ।
कृपया परया देव उवाच परिसान्त्वयन् ॥२०
' हाय - हाय! बड़े खेदकी बात है कि भरी सभामें मूर्खतावश मैंने ऐश्वर्यके नशेमें चूर होकर अपने गुरुदेवका तिरस्कार कर दिया । सचमुच मेरा यह कर्म अत्यन्त निन्दनीय है ॥ ११ ॥ भला, कौन विवेकी पुरुष इस स्वर्गकी राजलक्ष्मीको पानेकी इच्छा करेगा? देखो
तो सही, आज इसीने मुझ देवराजको भी असुरोंके से रजोगुणी भावसे भर दिया ॥१२ ॥ जो
लोग यह कहते हैं कि सार्वभौम राजसिंहासनपर बैठा हुआ सम्राट् किसीके आनेपर राजसिंहासनसे न उठे, वे धर्मका वास्तविक स्वरूप नहीं जानते || १३ || ऐसा उपदेश करनेवाले कुमार्गकी ओर ले जानेवाले हैं । वे स्वयं घोर नरकमें गिरते हैं । उनकी बातपर जो लोग विश्वास करते हैं, वे पत्थरकी नावकी तरह डूब जाते हैं || १४ || मेरे गुरुदेव बृहस्पतिजी ज्ञानके अथाह समुद्र हैं । मैंने बड़ी शठता की । अब मैं उनके चरणोंमें अपना माथा टेककर उन्हें मनाऊँगा ' ॥१५ ॥
परीक्षित्! देवराज इन्द्र इस प्रकार सोच ही रहे थे कि भगवान् बृहस्पतिजी अपने घरसे निकलकर योगबलसे अन्तर्धान हो गये ॥ १६ ॥ देवराज इन्द्रने अपने गुरुदेवको बहुत ढूँढ़ा-ढुँढ़वाया; परन्तु उनका कहीं पता न चला । तब वे गुरुके बिना अपनेको सुरक्षित न समझकर
देवताओंके साथ अपनी बुद्धिके अनुसार स्वर्गकी रक्षाका उपाय सोचने लगे, परन्तु वे कुछ भी सोच न सके! उनका चित्त अशान्त ही बना रहा ॥१७ ॥ परीक्षित्! दैत्योंको भी देवगुरु
बृहस्पति और देवराज इन्द्रकी अनबनका पता लग गया । तब उन मदोन्मत्त और आततायी असुरोंने अपने गुरु शुक्राचार्यके आदेशानुसार देवताओंपर विजय पानेके लिये धावा बोल ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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दिया ॥१८ ॥ उन्होंने देवताओंपर इतने तीखे - तीखे बाणोंकी वर्षा की कि उनके मस्तक,
जंघा, बाहु आदि अंग कट - कटकर गिरने लगे । तब इन्द्रके साथ सभी देवता सिर झुकाकर ब्रह्माजीकी शरणमें गये ॥१९ ॥ स्वयम्भू एवं समर्थ ब्रह्माजीने देखा कि देवताओंकी तो
सचमुच बड़ी दुर्दशा हो रही है । अतः उनका हृदय अत्यन्त करुणासे भर गया । वे देवताओंको धीरज बँधाते कहने लगे ॥२० ॥
ब्रह्मोवाच
अहो बत सुरश्रेष्ठ ह्यभद्रं वः कृतं महत् ।
ब्रह्मिष्ठं ब्राह्मणं दान्तमैश्वर्यान्नाभ्यनन्दत ॥ २१
तस्यायमनयस्यासीत् परेभ्यो वः पराभवः ।
प्रक्षीणेभ्यः स्ववैरिभ्यः समृद्धानां च यत् सुराः ॥२२
मघवन् द्विषतः पश्य प्रक्षीणान् गुर्वतिक्रमात् ।
सम्प्रत्युपचितान् भूयः काव्यमाराध्य भक्तितः ।
आददीरन् निलयनं ममापि भृगुदेवताः ॥२३
त्रिविष्टपं किं गणयन्त्यभेद्य-मन्त्रा भृगूणामनुशिक्षितार्थाः । न विप्रगोविन्दगवीश्वराणां भवन्त्यभद्राणि नरेश्वराणाम् ॥२४ तद् विश्वरूपं भजताशु विप्रं तपस्विनं त्वाष्ट्रमथात्मवन्तम् । सभाजितोऽर्थान् स विधास्यते वो यदि क्षमिष्यध्वमुतास्य कर्म ॥ २५ श्रीशुक उवाच
त एवमुदिता राजन् ब्रह्मणा विगतज्वराः ।
ऋषिं त्वाष्ट्रमुपव्रज्य परिष्वज्येदमब्रुवन् ॥२६
देवा ऊचुः ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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वयं तेऽतिथयः प्राप्ता आश्रमं भद्रमस्तु ते ।
कामः सम्पाद्यतां तात पितॄणां समयोचितः ॥२७
ब्रह्माजीने कहा— देवताओ! यह बड़े खेदकी बात है । सचमुच तुमलोगोंने बहुत बुरा काम किया । हरे, हरे! तुमलोगोंने ऐश्वर्यके मदसे अंधे होकर ब्रह्मज्ञानी, वेदज्ञ एवं संयमी ब्राह्मणका सत्कार नहीं किया ॥ २१ ॥ देवताओ! तुम्हारी उसी अनीतिका यह फल है कि
आज समृद्धिशाली होनेपर भी तुम्हें अपने निर्बल शत्रुओंके सामने नीचा देखना पड़ा ॥ २२ ॥
देवराज! देखो, तुम्हारे शत्रु भी पहले अपने गुरुदेव शुक्राचार्यका तिरस्कार करनेके कारण अत्यन्त निर्बल हो गये थे, परन्तु अब भक्तिभावसे उनकी आराधना करके वे फिर धन - जनसे सम्पन्न हो गये हैं । देवताओ! मुझे तो ऐसा मालूम पड़ रहा है कि शुक्राचार्यको अपना आराध्यदेव माननेवाले ये दैत्यलोग कुछ दिनोंमें मेरा ब्रह्मलोक भी छीन लेंगे ॥२३ ॥
भृगुवंशियोंने इन्हें अर्थशास्त्र की पूरी - पूरी शिक्षा दे रखी है । ये जो कुछ करना चाहते हैं, उसका भेद तुमलोगोंको नहीं मिल पाता । उनकी सलाह बहुत गुप्त होती है । ऐसी स्थितिमें वे स्वर्गको तो समझते ही क्या हैं, वे चाहे जिस लोकको जीत सकते हैं । सच है, जो श्रेष्ठ मनुष्य ब्राह्मण, गोविन्द और गौओंको अपना सर्वस्व मानते हैं और जिनपर उनकी कृपा रहती है, उनका कभी अमंगल नहीं होता ॥ २४ ॥ इसलिये अब तुमलोग शीघ्र ही त्वष्टाके पुत्र विश्वरूपके पास
जाओ और उन्हींकी सेवा करो । वे सच्चे ब्राह्मण, तपस्वी और संयमी हैं । यदि तुमलोग उनके असुरोंके प्रति प्रेमको क्षमा कर सकोगे और उनका सम्मान करोगे, तो वे तुम्हारा काम बना देंगे ॥२५ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! जब ब्रह्माजीने देवताओंसे इस प्रकार कहा, तब उनकी चिन्ता दूर हो गयी । वे त्वष्टाके पुत्र विश्वरूप ऋषिके पास गये और उन्हें हृदयसे लगाकर यों कहने लगे ॥२६ ॥
देवताओंने कहा — बेटा विश्वरूप! तुम्हारा कल्याण हो । हम तुम्हारे आश्रमपर अतिथिके रूपमें आये हैं । हम एक प्रकारसे तुम्हारे पितर हैं । इसलिये तुम हमलोगोंकी समयोचित अभिलाषा पूर्ण करो ॥२७ ॥
पुत्राणां हि परो धर्मः पितृशुश्रूषणं सताम् ।
अपि पुत्रवतां ब्रह्मन् किमुत ब्रह्मचारिणाम् ॥ २८
आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः पिता मूर्तिः प्रजापतेः ।
भ्राता मरुत्पतेर्मूर्तिर्माता साक्षात् क्षितेस्तनुः ॥ २ ९
दयाया भगिनी मूर्तिर्धर्मस्यात्मातिथिः स्वयम् ।
अग्नेरभ्यागतो मूर्तिः सर्वभूतानि चात्मनः ॥३०
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तस्मात् पितॄणामार्तानामार्तिं परपराभवम् ।
तपसापनयंस्तात सन्देशं कर्तुमर्हसि ॥३१
वृणीमहे त्वोपाध्यायं ब्रह्मिष्ठं ब्राह्मणं गुरुम् ।
यथाञ्जसा विजेष्यामः सपत्नांस्तव तेजसा ॥३२
न गर्हयन्ति ह्यर्थेषु यविष्ठाङ्घ्रयभिवादनम् ।
छन्दोभ्योऽन्यत्र न ब्रह्मन् वयो ज्यैष्ठ्यस्य कारणम् ॥३३
ऋषिरुवाच
अभ्यर्थितः सुरगणैः पौरोहित्ये महातपाः ।
स विश्वरूपस्तानाह प्रसन्नः श्लक्ष्णया गिरा ॥३४
विश्वरूप उवाच विगर्हितं धर्मशीलैर्ब्रह्मवर्च उपव्ययम् ।
कथं नु मद्विधो नाथा लोकेशैरभियाचितम् ।
प्रत्याख्यास्यति तच्छिष्यः स एव स्वार्थ उच्यते ॥३५
अकिञ्चनानां हि धनं शिलोञ्छनं तेनेह निर्वर्तितसाधुसत्क्रियः । जिन्हें सन्तान हो गयी हो, उन सत्पुत्रोंका भी सबसे बड़ा धर्म यही है कि वे अपने पिता तथा अन्य गुरुजनोंकी सेवा करें । फिर जो ब्रह्मचारी हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है ॥२८ ॥ वत्स! आचार्य वेदकी, पिता ब्रह्माजीकी, भाई इन्द्रकी और माता साक्षात् पृथ्वीकी
मूर्ति होती है ॥२९ ॥ ( इसी प्रकार ) बहिन दयाकी, अतिथि धर्मकी, अभ्यागत अग्निकी और
जगत्के सभी प्राणी अपने आत्माकी ही मूर्ति - आत्मस्वरूप होते हैं ॥ ३० ॥ पुत्र! हम तुम्हारे
पितर हैं । इस समय शत्रुओंने हमें जीत लिया है । हम बड़े दुःखी हो रहे हैं । तुम अपने तपोबलसे हमारा यह दुःख, दारिद्रय, पराजय टाल दो । पुत्र! तुम्हें हमलोगोंकी आज्ञाका पालन करना चाहिये || ३१ || तुम ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण हो, अतः जन्मसे ही हमारे गुरु हो । हम तुम्हें आचार्यके रूपमें वरण करके तुम्हारी शक्तिसे अनायास ही शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर लेंगे ॥३२ ॥
पुत्र! आवश्यकता पड़नेपर अपनेसे छोटोंका पैर छूना भी निन्दनीय नहीं है । वेदज्ञानको छोड़कर केवल अवस्था बड़प्पनका कारण भी नहीं है ॥ ३३ ॥
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श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! जब देवताओंने इस प्रकार विश्वरूपसे पुरोहिती करनेकी प्रार्थना की, तब परम तपस्वी विश्वरूपने प्रसन्न होकर उनसे अत्यन्त प्रिय और मधुर शब्दोंमें कहा ॥३४ ॥
विश्वरूपने कहा- पुरोहितीका काम ब्रह्मतेजको क्षीण करनेवाला है । इसलिये धर्मशील महात्माओंने उसकी निन्दा की है । किन्तु आप मेरे स्वामी हैं और लोकेश्वर होकर भी मुझसे उसके लिये प्रार्थना कर रहे हैं । ऐसी स्थितिमें मेरे जैसा व्यक्ति भला, आपलोगोंको कोरा जवाब कैसे दे सकता है? मैं तो आपलोगोंका सेवक हूँ । आपकी आज्ञाओंका पालन करना ही मेरा स्वार्थ है ॥३५ ॥
देवगण! हम अकिंचन हैं । खेती कट जानेपर अथवा अनाजकी हाट उठ जानेपर उसमेंसे गिरे हुए कुछ दाने चुन लाते हैं और उसीसे अपने देवकार्य तथा पितृकार्य सम्पन्न कर लेते हैं । लोकपालो! इस प्रकार जब मेरी जीविका चल ही रही है, तब मैं पुरोहितीकी निन्दनीय वृत्ति क्यों करूँ? उससे तो केवल वे ही लोग प्रसन्न होते हैं, जिनकी बुद्धि बिगड़ गयी है ॥ ३६ ॥ जो काम आपलोग मुझसे कराना चाहते हैं वह निन्दनीय है- फिर भी मैं आपके
कामसे मुँह नहीं मोड़ सकता; क्योंकि आपलोगोंकी माँग ही कितनी है । इसलिये आपलोगोंका मनोरथ मैं तन - मन - धनसे पूरा करूंगा ॥३७ ॥
कथं विग नु करोम्यधीश्वराः पौरोधसं हृष्यति येन दुर्मतिः ॥३६
तथापि न प्रतिब्रूयां गुरुभिः प्रार्थितं कियत् ।
भवतां प्रार्थितं सर्वं प्राणैरर्थैश्च साधये ॥ ३७
श्रीशुक उवाच
तेभ्य एवं प्रतिश्रुत्य विश्वरूपो महातपाः ।
पौरोहित्यं वृतश्चक्रे परमेण समाधिना ॥३८
सुरद्विषां श्रियं गुप्तामीशनस्यापि विद्यया ।
आच्छिद्यादान्महेन्द्राय वैष्णव्या विद्यया विभुः ॥३९
यया गुप्तः सहस्राक्षो जिग्येऽसुरचमूर्विभुः ।
तां प्राह स महेन्द्राय विश्वरूप उदारधीः ॥४०
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! विश्वरूप बड़े तपस्वी थे । देवताओंसे ऐसी प्रतिज्ञा करके उनके वरण करनेपर वे बड़ी लगनके साथ उनकी पुरोहिती करने लगे ॥३८ ॥ यद्यपि
शुक्राचार्यने अपने नीतिबलसे असुरोंकी सम्पत्ति सुरक्षित कर दी थी, फिर भी समर्थ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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विश्वरूपने वैष्णवी विद्याके प्रभावसे उनसे वह सम्पत्ति छीनकर देवराज इन्द्रको दिला दी ॥३९ ॥ राजन्! जिस विद्यासे सुरक्षित होकर इन्द्रने असुरोंकी सेनापर विजय प्राप्त की
थी, उसका उदारबुद्धि विश्वरूपने ही उन्हें उपदेश किया था ॥४० ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे सप्तमोऽध्यायः ॥७ ॥
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अथाष्टमोऽध्यायः नारायणकवचका उपदेश राजोवाच
यया गुप्तः सहस्राक्षः सवाहान् रिपुसैनिकान् ।
क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियम् ॥१
भगवंस्तन्ममाख्याहि वर्म नारायणात्मकम् ।
यथाऽऽततायिनः शत्रून् येन गुप्तोऽजयन्मृधे ॥२
श्रीशुक उवाच
वृतः पुरोहितस्त्वाष्ट्रो महेन्द्रायानुपृच्छते ।
नारायणाख्यं वर्माह तदिहैकमनाः शृणु ॥३
विश्वरूप उवाच
धौताङ्घ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदङ्मुखः ।
कृतस्वाङ्गकरन्यासो मन्त्राभ्यां वाग्यतः शुचिः ॥४
राजा परीक्षितने पूछा— भगवन्! देवराज इन्द्रने जिससे सुरक्षित होकर शत्रुओंकी चतुरंगिणी सेनाको खेल - खेल में - अनायास ही जीतकर त्रिलोकीकी राजलक्ष्मीका उपभोग किया, आप उस नारायणकवचको मुझे सुनाइये और यह भी बतलाइये कि उन्होंने उससे सुरक्षित होकर रणभूमिमें किस प्रकार आक्रमणकारी शत्रुओं पर विजय प्राप्त की ॥१-२ ॥ श्रीशुकदेवजीने कहा- परीक्षित्! जब देवताओंने विश्वरूपको पुरोहित बना लिया, तब देवराज इन्द्रके प्रश्न करनेपर विश्वरूपने उन्हें नारायणकवचका उपदेश किया । तुम एकाग्रचित्तसे उसका श्रवण करो ॥३ ॥
विश्वरूपने कहा — देवराज इन्द्र! भयका अवसर उपस्थित होनेपर नारायणकवच धारण करके अपने शरीरकी रक्षा कर लेनी चाहिये । उसकी विधि यह है कि पहले हाथ - पैर धोकर आचमन करे, फिर हाथमें कुशकी पवित्री धारण करके उत्तर मुँह बैठ जाय । इसके बाद कवचधारणपर्यन्त और कुछ न बोलनेका निश्चय करके पवित्रतासे ' ॐ नमो नारायणाय ' और ‘ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ' – इन मन्त्रोंके द्वारा हृदयादि अंगन्यास तथा अंगुष्ठादि करन्यास करे । पहले ‘ ॐ नमो नारायणाय ' इस अष्टाक्षर मन्त्रके ॐ आदि आठ अक्षरोंका क्रमशः पैरों, ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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घुटनों, जाँघों, पेट, हृदय, वक्षःस्थल, मुख और सिरमें न्यास करे । अथवा पूर्वोक्त मन्त्रके मकारसे लेकर ॐकारपर्यन्त आठ अक्षरोंका सिरसे आरम्भ करके उन्हीं आठ अंगोंमें विपरीत क्रमसे न्यास करे ॥४-६ ॥
नारायणमयं वर्म सन्नह्येद् भय आगते ।
पादयोर्जानुनोरूर्वोरुदरे हृद्यथोरसि ॥५
मुखे शिरस्यानुपूर्व्यादोङ्कारादीनि विन्यसेत् ।
ॐ नमो नारायणायेति विपर्ययमथापि वा ॥६
करन्यासं ततः कुर्याद् द्वादशाक्षरविद्यया ।
प्रणवादियकारान्तमङ्गल्यङ्गुष्ठपर्वसु ॥७
न्यसेद्धृदय ओङ्कारं विकारमनु मूर्धनि ।
षकारं तु भ्रुवोर्मध्ये णकारं शिखया दिशेत् ॥८
वेकारं नेत्रयोर्युञ्ज्यान्नकारं सर्वसन्धिषु ।
मकारमस्त्रमुद्दिश्य मन्त्रमूर्तिर्भवेद् बुधः ॥ ९
सविसर्गं फडन्तं तत् सर्वदिक्षु विनिर्दिशेत् ।
ॐ विष्णवे नम इति ॥१०
आत्मानं परमं ध्यायेद् ध्येयं षट्शक्तिभिर्युतम् ।
विद्यातेजस्तपोमूर्तिमिमं मन्त्रमुदाहरेत् ॥ ११
ॐ हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षां
न्यस्ताङ्घ्रिपद्मः पतगेन्द्रपृष्ठे ।
दरारिचर्मासिगदेषुचाप-पाशान् दधानोऽष्टगुणोऽष्टबाहुः ॥१२
जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्ति-र्यादोगणेभ्यो वरुणस्य पाशात् । स्थलेषु मायावटुवामनोऽव्यात् त्रिविक्रमः खेऽवतु विश्वरूपः ॥१३ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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तदनन्तर ‘ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ' – इस द्वादशाक्षर मन्त्रके ॐ आदि बारह अक्षरोंका दायीं तर्जनीसे बायीं तर्जनीतक दोनों हाथकी आठ अँगुलियों और दोनों अँगूठोंकी दो - दो गाँठोंमें न्यास करे || ७ || फिर ' ॐ विष्णवे नमः ' इस मन्त्रके पहले अक्षर ' ॐ ' का हृदयमें ‘ वि ’ का ब्रह्मरन्ध्रमें, ' ब् ' का भौंहोंके बीचमें, ' ण ' का चोटीमें, ' वे ' का दोनों नेत्रोंमें और ' न ' का शरीरकी सब गाँठोंमें न्यास करे । तदनन्तर ' ॐ मः अस्त्राय फट् ' कहकर दिग्बन्ध करे । इस प्रकार न्यास करनेसे इस विधिको जाननेवाला पुरुष मन्त्रस्वरूप हो जाता है ॥८-१० ॥ इसके बाद समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी ज्ञान और वैराग्यसे परिपूर्ण इष्टदेव भगवान्का ध्यान करे और अपनेको भी तद्रूप ही चिन्तन करे । तत्पश्चात् विद्या, तेज और तपःस्वरूप इस कवचका पाठ करे – ॥११ ॥
' भगवान् श्रीहरि गरुड़जीकी पीठपर अपने चरणकमल रखे हुए हैं । अणिमादि आठों सिद्धियाँ उनकी सेवा कर रही हैं । आठ हाथोंमें शंख, चक्र, ढाल, तलवार, गदा, बाण, धनुष और पाश ( फंदा ) धारण किये हुए हैं । वे ही ॐकारस्वरूप प्रभु सब प्रकारसे, सब ओरसे मेरी रक्षा करें ॥१२ ॥ मत्स्यमूर्ति भगवान् जलके भीतर जलजन्तुओंसे और वरुणके पाशसे मेरी
रक्षा करें । मायासे ब्रह्मचारीका रूप धारण करनेवाले वामनभगवान् स्थलपर और विश्वरूप श्रीत्रिविक्रमभगवान् आकाशमें मेरी रक्षा करें ॥१३ ॥
दुर्गेष्वटव्याजिमुखादिषु प्रभुः पायान्नृसिंहोऽसुरयूथपारिः । विमुञ्चतो यस्य महाट्टहासं दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च गर्भाः ॥ १४ रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्पः स्वदंष्ट्रयोन्नीतधरो वराहः । रामोऽद्रिकूटेष्वथ विप्रवासे सलक्ष्मणोऽव्याद् भरताग्रजोऽस्मान् ॥१५ मामुग्रधर्मादखिलात् प्रमादा-न्नारायणः पातु नरश्च हासात् । दत्तस्त्वयोगादथ योगनाथः पायाद् गुणेशः कपिलः कर्मबन्धात् ॥१६ सनत्कुमारोऽवतु कामदेवा-द्धयशीर्षा मां पथि देवहेलनात् । देवर्षिवर्यः पुरुषार्चनान्तरात् कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात् ॥१७ जिनके घोर अट्टहाससे सब दिशाएँ गूँज उठी थीं और गर्भवती दैत्यपत्नियोंके गर्भ गिर गये थे, वे दैत्य - यूथपतियोंके शत्रु भगवान् नृसिंह किले, जंगल, रणभूमि आदि विकट स्थानोंमें ****** ebook converter DEMO Watermarks *******