श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1241–1250
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1241–1250
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एवं जागरणादीनि जीवस्थानानि चात्मनः ।
मायामात्राणि विज्ञाय तद्द्रष्टारं परं स्मरेत् ॥५४
येन प्रसुप्तः पुरुषः स्वापं वेदात्मनस्तदा ।
सुखं च निर्गुणं ब्रह्म तमात्मानमवेहि माम् ॥५५
उभयं स्मरतः पुंसः प्रस्वापप्रतिबोधयोः ।
अन्वेति व्यतिरिच्येत तज्ज्ञानं ब्रह्म तत् परम् ॥५६
यदेतद्विस्मृतं पुंसो मद्भावं भिन्नमात्मनः ।
ततः संसार एतस्य देहाद्देहो मृतेर्मृतिः ॥५७
लब्ध्वेह मानुषीं योनिं ज्ञानविज्ञानसम्भवाम् ।
आत्मानं यो न बुद्ध्येत न क्वचिच्छममाप्नुयात् ॥ ५८
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! जब विद्याधरोंके अधिपति चित्रकेतुने अनन्तभगवान्की इस प्रकार स्तुति की, तब उन्होंने प्रसन्न होकर उनसे कहा ॥४९ ॥
श्रीभगवान्ने कहा — चित्रकेतो! देवर्षि नारद और महर्षि अंगिराने तुम्हें मेरे सम्बन्धमें जिस विद्याका उपदेश दिया है, उससे और मेरे दर्शनसे तुम भलीभाँति सिद्ध हो चुके हो ॥५० ॥ मैं ही समस्त प्राणियोंके रूपमें हूँ, मैं ही उनका आत्मा हूँ और मैं ही पालनकर्ता
भी हूँ । शब्दब्रह्म ( वेद ) और परब्रह्म दोनों ही मेरे सनातन रूप हैं ॥ ५१ ॥ आत्मा कार्य-कारणात्मक जगत्में व्याप्त है और कार्य - कारणात्मक जगत् आत्मामें स्थित है तथा इन
दोनोंमें मैं अधिष्ठानरूपसे व्याप्त हूँ और मुझमें ये दोनों कल्पित हैं ॥ ५२ ॥ जैसे स्वप्नमें सोया
हुआ पुरुष स्वप्नान्तर होनेपर सम्पूर्ण जगत्को अपनेमें ही देखता है और स्वप्नान्तर टूट जानेपर स्वप्नमें ही जागता है तथा अपनेको संसारकै एक कोनेमें स्थित देखता है, परन्तु वास्तवमें वह भी स्वप्न ही है, वैसे ही जीवकी जाग्रत् आदि अवस्थाएँ परमेश्वरकी ही माया हैं - यों जानकर सबके साक्षी मायातीत परमात्माका ही स्मरण करना चाहिये ॥५३-५४ ॥ सोया हुआ पुरुष जिसकी सहायतासे अपनी निद्रा और उसके अतीन्द्रिय सुखका अनुभव करता है, वह ब्रह्म मैं ही हूँ, उसे तुम अपनी आत्मा समझो || ५५ || पुरुष निद्रा और जागृति – इन दोनों अवस्थाओंका अनुभव करनेवाला है । वह उन अवस्थाओंमें अनुगत होनेपर भी वास्तवमें उनसे पृथक् है । वह सब अवस्थाओंमें रहनेवाला अखण्ड एकरस ज्ञान ही ब्रह्म है, वही परब्रह्म है ॥५६ ॥ जब जीव मेरे स्वरूपको भूल जाता है, तब वह अपनेको अलग मान बैठता
है; इसीसे उसे संसारके चक्कर में पड़ना पड़ता है और जन्म - पर- जन्म तथा मृत्यु - पर - मृत्यु प्राप्त होती है ॥५७ ॥ यह मनुष्ययोनि ज्ञान और विज्ञानका मूल स्रोत है । जो इसे पाकर भी
अपने आत्मस्वरूप परमात्माको नहीं जान लेता, उसे कहीं किसी भी योनिमें शान्ति नहीं मिल ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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सकती ॥५८ ॥
स्मृत्वेहायां परिक्लेशं ततः फलविपर्ययम् ।
अभयं चाप्यनीहायां सङ्कल्पाद्विरमेत्कविः ॥५९
सुखाय दुःखमोक्षाय कुर्वाते दम्पती क्रियाः ।
ततोऽनिवृत्तिरप्राप्तिर्दुःखस्य च सुखस्य च ॥६०
एवं विपर्ययं बुद्ध्वा नृणां विज्ञाभिमानिनाम् ।
आत्मनश्च गतिं सूक्ष्मां स्थानत्रयविलक्षणाम् ॥६१
दृष्टश्रुताभिर्मात्राभिर्निर्मुक्तः स्वेन तेजसा ।
ज्ञानविज्ञानसन्तुष्टो मद्भक्तः पुरुषो भवेत् ॥ ६२
एतावानेव मनुजैर्योगनैपुणबुद्धिभिः ।
स्वार्थः सर्वात्मना ज्ञेयो यत्परात्मैकदर्शनम् ॥६३
त्वमेतच्छ्रद्धया राजन्नप्रमत्तो वचो मम ।
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नो धारयन्नाशु सिध्यसि ॥६४
श्रीशुक उवाच
आश्वास्य भगवानित्थं चित्रकेतुं जगद्गुरुः ।
पश्यतस्तस्य विश्वात्मा ततश्चान्तर्दधे हरिः ॥६५
राजन्! सांसारिक सुखके लिये जो चेष्टाएँ की जाती हैं, उनमें श्रम है, क्लेश है और जिस परम सुखके उद्देश्यसे वे की जाती हैं, उसके ठीक विपरीत परम दुःख देती हैं; किन्तु कर्मोंसे निवृत्त हो जानेमें किसी प्रकारका भय नहीं है - यह सोचकर बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि किसी प्रकारके कर्म अथवा उनके फलोंका संकल्प न करे ॥५९ ॥ जगत्के सभी
स्त्री-पी - पुरुष इसलिये कर्म करते हैं कि उन्हें सुख मिले और उनका दुःखोंसे पिण्ड छूटे; परन्तु उन कर्मोंसे न तो उनका दुःख दूर होता है और न उन्हें सुखकी ही प्राप्ति होती है ॥६० ॥
जो मनुष्य अपने बहुत बड़ा बुद्धिमान् मानकर कर्मके पचड़ोंमें पड़े हुए हैं, उनको विपरीत फल मिलता है - यह बात समझ लेनी चाहिये; साथ ही यह भी जान लेना चाहिये कि आत्माका स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है, जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति – इन तीनों अवस्थाओं तथा इनके अभिमानियोंसे विलक्षण है ॥ ६१ ॥ यह जानकर इस लोकमें देखे और परलोकके सुने हुए
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विषय - भोगोंसे विवेकबुद्धिके द्वारा अपना पिण्ड छुड़ा ले और ज्ञान तथा विज्ञानमें ही सन्तुष्ट रहकर मेरा भक्त हो जाय ॥ ६२ ॥
जो लोग योगमार्गका तत्त्व समझनेमें निपुण हैं, उनको भलीभाँति समझ लेना चाहिये कि जीवका सबसे बड़ा स्वार्थ और परमार्थ केवल इतना ही है कि वह ब्रह्म और आत्माकी एकताका अनुभव कर ले ॥ ६३ ॥ राजन्! यदि तुम मेरे इस उपदेशको सावधान होकर
श्रद्धाभावसे धारण करोगे तो ज्ञान एवं विज्ञानसे सम्पन्न होकर शीघ्र ही सिद्ध हो जाओगे ॥६४ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - राजन्! जगद्गुरु विश्वात्मा भगवान् श्रीहरि चित्रकेतुको इस प्रकार समझा - बुझाकर उनके सामने ही वहाँसे अन्तर्धान हो गये ॥ ६५ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे चित्रकेतोः परमात्मदर्शनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥१६ ॥
१. प्रा ० पा ० – मुहुः । २. प्रा ० पा ० - सेवय ० । ३. प्रा ० पा ० - लयावनादीनि । १. प्रा ० पा ० – त्वद्दर्शिनानृ ० । २. प्रा ० पा ० – तत्केन । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथ सप्तदशोऽध्यायः चित्रकेतुको पार्वतीजीका शाप श्रीशुक उवाच
यतश्चान्तर्हितोऽनन्तस्तस्यै कृत्वा दिशे नमः ।
विद्याधरश्चित्रकेतुश्चचार गगनेचरः ॥१
स लक्षं वर्षलक्षाणामव्याहतबलेन्द्रियः ।
स्तूयमानो महायोगी मुनिभिः सिद्धचारणैः ॥२
कुलाचलेन्द्रद्रोणीषु नानासङ्कल्पसिद्धिषु ।
रेमे विद्याधरस्त्रीभिर्गापयन् हरिमीश्वरम् ॥३
एकदा स ' विमानेन विष्णुदत्तेन भास्वता ।
गिरिशं ददृशे गच्छन् परीतं सिद्धचारणैः ॥४
आलिङ्ग्याङ्कीकृतां देवीं बाहुना मुनिसंसदि ।
उवाच देव्याः शृण्वत्या जहासोच्चैस्तदन्तिके ॥५
चित्रकेतुरुवाच
एष लोकगुरुः साक्षाद्धर्मं वक्ता शरीरिणाम् ।
आस्ते मुख्यः सभायां वै मिथुनीभूय भार्यया ॥ ६
जटाधरस्तीव्रतपा ब्रह्मवादिसभापतिः ।
अङ्कीकृत्य स्त्रियं चास्ते गतह्रीः प्राकृतो यथा ॥७
प्रायशः प्राकृताश्चापि स्त्रियं रहसि बिभ्रति ।
अयं महाव्रतधरो बिभर्ति सदसि स्त्रियम् ॥८
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! विद्याधर चित्रकेतु, जिस दिशामें भगवान् र अन्तर्धान हुए थे, उसे नमस्कार करके आकाशमार्गसे स्वच्छन्द विचरने लगे ॥१ ॥
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महायोगी चित्रकेतु करोड़ों वर्षोंतक सब प्रकारके संकल्पोंको पूर्ण करनेवाली सुमेरु पर्वतकी घाटियोंमें विहार करते रहे । उनके शरीरका बल और इन्द्रियोंकी शक्ति अक्षुण्ण रही । बड़े - बड़े मुनि, सिद्ध, चारण उनकी स्तुति करते रहते । उनकी प्रेरणासे विद्याधरोंकी स्त्रियाँ उनके पास सर्वशक्तिमान् भगवान्के गुण और लीलाओंका गान करती रहतीं ॥२-३ ॥ एक दिन चित्रकेतु भगवान् के दिये हुए तेजोमय विमानपर सवार होकर कहीं जा रहे थे । इसी समय उन्होंने देखा कि भगवान् शङ्कर बड़े - बड़े मुनियोंकी सभा में सिद्ध - चारणोंके बीच बैठेहुए हैं और साथ ही भगवती पार्वतीको अपनी गोदमें बैठाकर एक हाथसे उन्हें आलिंगन किये हुए हैं, यह देखकर चित्रकेतु विमानपर चढ़े हुए ही उनके पास चले गये और भगवती पार्वतीको सुना - सुनाकर जोरसे हँसने और कहने लगे ॥४-५ ॥ चित्रकेतुने कहा – अहो! ये सारे जगत्के धर्मशिक्षक और गुरुदेव हैं । ये समस्त प्राणियोंमें श्रेष्ठ हैं । इनकी यह दशा है कि भरी सभामें अपनी पत्नीको शरीरसे चिपकाकर बैठे हुए हैं ॥६ ॥ जटाधारी, बहुत बड़े तपस्वी एवं ब्रह्मवादियोंके सभापति होकर भी साधारण
पुरुषके समान निर्लज्जतासे गोदमें स्त्री लेकर बैठे हैं ॥७ ॥
प्राय: साधारण पुरुष भी एकान्तमें ही स्त्रियोंके साथ उठते - बैठते हैं, परन्तु ये इतने बड़े व्रतधारी होकर भी उसे भरी सभामें लिये बैठे हैं ॥८ ॥
श्रीशुक उवाच
भगवानपि तच्छ्रुत्वा प्रहस्यागाधधीर्नृप ।
तूष्णीं बभूव सदसि सभ्याश्च तदनुव्रताः ॥९
इत्यतद्वीर्यविदुषि ब्रुवाणे बह्वशोभनम् ।
रुषाऽऽह देवी धृष्टाय निर्जितात्माभिमानिने ॥ १०
पार्वत्युवाच
अयं किमधुना लोके शास्ता दण्डधरः प्रभुः ।
अस्मद्विधानां दुष्टानां निर्लज्जानां च विप्रकृत् ॥११
न वेद धर्मं किल पद्मयोनि-र्न ब्रह्मपुत्रा भृगुनारदाद्याः । न वै कुमारः कपिलो मनुश्च ये नो निषेधन्त्यतिवर्तिनं हरम् ॥१२ एषामनुध्येयपदाब्जयुग्मं ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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जगद्गुरुं मङ्गलमङ्गलं स्वयम् । यः क्षत्रबन्धुः परिभूय सूरीन् प्रशास्ति धृष्टस्तदयं हि दण्ड्यः ॥१३
नायमर्हति वैकुण्ठपादमूलोपसर्पणम् ।
सम्भावितमतिः स्तब्धः साधुभिः पर्युपासितम् ॥१४
अतः पापीयसीं योनिमासुरीं याहि दुर्मते ।
यथेह भूयो महतां न कर्ता पुत्र किल्बिषम् ॥ १५
श्रीशुक उवाच
एवं शप्तश्चित्रकेतुर्विमानादवरुह्य सः ।
प्रसादयामास सतीं मूर्ध्ना नम्रेण भारत ॥१६
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! भागवान् शंकरकी बुद्धि अगाध है । चित्रकेतुका यह कटाक्ष सुनकर वे हँसने लगे, कुछ भी बोले नहीं । उस सभामें बैठे हुए उनके अनुयायी सदस्य भी चुप रहे । चित्रकेतुको भगवान् शंकरका प्रभाव नहीं मालूम था । इसीसे वे उनके लिये कुछ बुरा - भला बक थे । उन्हें इस बातका घमण्ड हो गया था कि ' मैं जितेन्द्रिय हूँ । ' पार्वतीजीने उनकी यह धृष्टता देखकर क्रोधसे कहा — ॥ ९ -१० ॥ पार्वतीजी बोलीं – अहो! हम जैसे दुष्ट और निर्लज्जोंका दण्डके बलपर शासन एवं तिरस्कार करनेवाला प्रभु इस संसारमें यही है क्या? ॥ ११ ॥ जान पड़ता है कि ब्रह्माजी, भृगु,
नारद आदि उनके पुत्र, सनकादि परमर्षि, कपिलदेव और मनु आदि बड़े - बड़े महापुरुष धर्मका रहस्य नहीं जानते । तभी तो वे धर्ममर्यादाका उल्लंघन करनेवाले भगवान् शिवको इस कामसे नहीं रोकते ॥१२ ॥
ब्रह्मा आदि समस्त महापुरुष जिनके चरणकमलोंका ध्यान करते रहते हैं, उन्हीं मंगलोंको मंगल बनानेवाले साक्षात् जगद्गुरु भगवान्का और उनके अनुयायी महात्माओंका इस अधम क्षत्रियने तिरस्कार किया और शासन करनेकी चेष्टा की है । इसलिये यह ढीठ सर्वथा दण्डका पात्र है ॥१३ ॥
इसे अपने बड़प्पनका घमण्ड है । यह मूर्ख भगवान् श्रीहरिके उन चरणकमलोंमें रहनेयोग्य नहीं है, जिनकी उपासना बड़े - बड़े सत्पुरुष किया करते हैं ॥१४ ॥
[ चित्रकेतुको सम्बोधन कर ] अतः दुर्मते! तुम पापमय असुरयोनिमें जाओ । ऐसा होनेसे बेटा! तुम फिर कभी किसी महापुरुषका अपराध नहीं कर सकोगे ॥१५ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं— परीक्षित्! जब पार्वतीजीने इस प्रकार चित्रकेतुको शाप दिया, ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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तब वे विमानसे उतर पड़े और सिर झुकाकर उन्हें प्रसन्न करने लगे ॥१६ ॥
चित्रकेतुरुवाच
प्रतिगृह्णामि ते शापमात्मनोऽञ्जलिनाम्बिके ।
देवैर्मर्त्याय यत्प्रोक्तं पूर्वदिष्टं हि तस्य तत् ॥१७
संसारचक्र एतस्मिञ्जन्तुरज्ञानमोहितः ।
भ्राम्यन् सुखं च दुःखं च भुङ्क्ते सर्वत्र सर्वदा ॥१८
नैवात्मा न परश्चापि कर्ता स्यात् सुखदुःखयोः ।
कर्तारं मन्यतेऽप्राज्ञ आत्मानं परमेव च ॥१९
गुणप्रवाह एतस्मिन् कः शापः को न्वनुग्रहः ।
कः स्वर्गो नरकः को वा किं सुखं दुःखमेव वा ॥२०
एकः सृजति भूतानि भगवानात्ममायया ।
एषां बन्धं च मोक्षं च सुखं दुःखं च निष्कलः ॥२१
न तस्य कश्चिद्दयितः प्रतीपो न ज्ञातिबन्धुर्न परो न च स्वः । समस्य सर्वत्र निरञ्जनस्य सुखे न रागः कुत एव रोषः ॥२२ तथापि तच्छक्तिविसर्ग एषां सुखाय दुःखाय हिताहिताय । बन्धाय मोक्षाय च मृत्युजन्मनोः शरीरिणां संसृतयेऽवकल्पते ॥२३
अथ प्रसादये न त्वां शापमोक्षाय भामिनि ।
यन्मन्यसे असाधूक्तं मम तत्क्षम्यतां सति ॥२४
श्रीशुक उवाच इति प्रसाद्य गिरिशौ चित्रकेतुररिन्दम । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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जगाम स्वविमानेन पश्यतोः स्मयतोस्तयोः ॥२५ चित्रकेतुने कहा – माता पार्वतीजी! मैं बड़ी प्रसन्नतासे अपने दोनों हाथ जोड़कर आपका शाप स्वीकार करता हूँ । क्योंकि देवतालोग मनुष्योंके लिये जो कुछ कह देते हैं, वह उनके प्रारब्धानुसार मिलनेवाले फलकी पूर्वसूचनामात्र होती है ॥१७ ॥
देवि! यह जीव अज्ञानसे मोहित हो रहा है और इसी कारण इस संसारचक्रमें भटकता रहता है तथा सदा - सर्वदा सर्वत्र सुख और दुःख भोगता रहता है ॥१८ ॥ माताजी! सुख और
दुःखको देनेवाला न तो अपना आत्मा है और न कोई दूसरा । जो अज्ञानी हैं, वे ही अपनेको अथवा दूसरेको सुख - दुःखका कर्ता माना करते हैं ॥१९ ॥ यह जगत् सत्त्व, रज आदि
गुणोंका स्वाभाविक प्रवाह है । इसमें क्या शाप, क्या अनुग्रह, क्या स्वर्ग, क्या नरक और क्या सुख, क्या दुःख || २० || एकमात्र परिपूर्णतम भगवान् ही बिना किसीकी सहायताके अपनी आत्मस्वरूपिणी मायाके द्वारा समस्त प्राणियोंकी तथा उनके बन्धन, मोक्ष और सुख - दुःखकी रचना करते हैं ॥२१ ॥ माताजी! भगवान् श्रीहरि सबमें सम और माया आदि मलसे रहित हैं । उनका कोई
प्रिय - अप्रिय, जाति - बन्धु, अपना पराया नहीं है । जब उनका सुखमें राग ही नहीं है, तब उनमें रागजन्य क्रोध तो हो ही कैसे सकता है ॥२२ ॥
तथापि उनकी मायाशक्तिके कार्य पाप और पुण्य ही प्राणियोंके सुख - दुःख, हित-अहित, बन्ध - मोक्ष, मृत्यु- जन्म और आवागमनके कारण बनते हैं ॥ २३ ॥ पतिप्राणा देवि! मैं
शापसे मुक्त होनेके लिये आपको प्रसन्न नहीं कर रहा हूँ । मैं तो यह चाहता हूँ कि आपको मेरी जो बात अनुचित प्रतीत हुई हो, उसके लिये क्षमा करें ॥ २४ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! विद्याधर चित्रकेतु भगवान् शंकर और पार्वतीजीको इस प्रकार प्रसन्न करके उनके सामने ही विमानपर सवार होकर वहाँसे चले गये । इससे उन लोगोंको बड़ा विस्मय हुआ ॥२५ ॥
ततस्तु भगवान् रुद्रो रुद्राणीमिदमब्रवीत् ।
देवर्षिदैत्यसिद्धानां पार्षदानां च शृण्वताम् ॥२६
श्रीरुद्र उवाच
दृष्टवत्यसि सुश्रोणि हरेरद्भुतकर्मणः ।
माहात्म्यं भृत्यभृत्यानां निःस्पृहाणां महात्मनाम् ॥२७
नारायणपराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति ।
स्वर्गापवर्गनरकेष्वपि तुल्यार्थदर्शिनः ॥२८
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देहिनां देहसंयोगाद् द्वन्द्वानीश्वरलीलया ।
सुखं दुःखं मृतिर्जन्म शापोऽनुग्रह एव च ॥२९
अविवेककृतः पुंसो ह्यर्थभेद इवात्मनि ।
गुणदोषविकल्पश्च भिदेव स्रजिवत्कृतः ॥ ३०
वासुदेवे भगवति भक्तिमुद्वहतां नृणाम् ।
ज्ञानवैराग्यवीर्याणां नेह कश्चिद् व्यपाश्रयः ॥ ३१
नाहं विरिञ्चो न कुमारनारदौ न ब्रह्मपुत्रा मुनयः सुरेशाः । विदाम यस्येहितमंशकांशका न तत्स्वरूपं पृथगीशमानिनः ॥३२
न ह्यस्यास्ति प्रियः कश्चिन्नाप्रियः स्वः परोऽपि वा ।
आत्मत्वात्सर्वभूतानां सर्वभूतप्रियो हरिः ॥ ३३
तस्य चायं महाभागश्चित्रकेतुः प्रियोऽनुगः ।
सर्वत्र समदृक् शान्तो ह्यहं चैवाच्युतप्रियः ॥ ३४
तस्मान्न विस्मयः कार्यः पुरुषेषु महात्मसु ।
महापुरुषभक्तेषु शान्तेषु समदर्शिषु ॥३५
तब भगवान् शंकरने देवता, ऋषि, दैत्य, सिद्ध और पार्षदोंके सामने ही भगवती पार्वतीजीसे यह बात कही ॥२६ ॥
भगवान् शंकरने कहा— सुन्दरि! दिव्यलीला - विहारी भगवान्के निःस्पृह और उदारहृदय दासानुदासोंकी महिमा तुमने अपनी आँखों देख ली ॥२७ ॥
जो लोग भगवान्के शरणागत होते हैं, वे किसीसे भी नहीं डरते । क्योंकि उन्हें स्वर्ग, मोक्ष और नरकोंमें भी एक ही वस्तुके- केवल भगवान्के ही समानभावसे दर्शन होते हैं ॥ २८ ॥ जीवोंको भगवान्की लीलासे ही देहका संयोग होनेके कारण सुख - दुःख, जन्म-मरण और शाप - अनुग्रह आदि द्वन्द्व प्राप्त होते हैं ॥२९ ॥ जैसे स्वप्नमें भेद - भ्रमसे सुख - दुःख
आदिकी प्रतीति होती है और जाग्रत् अवस्थामें भ्रमवश मालामें ही सर्पबुद्धि हो जाती है— वैसे ही मनुष्य अज्ञानवश आत्मामें देवता, मनुष्य आदिका भेद तथा गुण - दोष आदिकी कल्पना कर लेता है || ३० || जिनके पास ज्ञान और वैराग्यका बल है और जो भगवान् वासुदेवके चरणोंमें भक्तिभाव रखते हैं, उनके लिये इस जगत्में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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जिसे वे हेय या उपादेय समझकर राग - द्वेष करें || ३१ || मैं, ब्रह्माजी, सनकादि, नारद, ब्रह्माजीके पुत्र भृगु आदि मुनि और बड़े - बड़े देवता - कोई भी भगवान्की लीलाका रहस्य नहीं जान पाते । ऐसी अवस्थामें जो उनके नन्हे - से - नन्हे अंश हैं और अपनेको उनसे अलग ईश्वर मान बैठे हैं, वे उनके स्वरूपको जान ही कैसे सकते हैं? || ३२ || भगवान्को न कोई प्रिय है और न अप्रिय । उनका न कोई अपना है और न पराया । वे सभी प्राणियोंके आत्मा हैं, इसलिये सभी प्राणियोंके प्रियतम हैं ॥ ३३ ॥ प्रिये! यह परम भाग्यवान् चित्रकेतु उन्हींका प्रिय
अनुचर, शान्त एवं समदर्शी है और मैं भी भगवान् श्रीहरिका ही प्रिय ॥३४ ॥ इसलिये तुम्हें
भगवान्के प्यारे भक्त, शान्त, समदर्शी, महात्मा पुरुषोंके सम्बन्धमें किसी प्रकारका आश्चर्य नहीं करना चाहिये ॥ ३५ ॥
श्रीशुक उवाच
इति श्रुत्वा भगवतः शिवस्योमाभिभाषितम् ।
बभूव शान्तधी ` राजन् देवी विगतविस्मया ॥३६
इति भागवतो देव्याः प्रतिशप्तुमलन्तमः ।
मूर्ध्ना सञ्जगृहे शापमेतावत्साधुलक्षणम् ॥३७
जज्ञे त्वष्टुर्दक्षिणाग्नौ दानवीं योनिमाश्रितः ।
वृत्र इत्यभिविख्यातो ज्ञानविज्ञानसंयुतः ॥३८
एतत्ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
वृत्रस्यासुरजातेश्च कारणं भगवन्मतेः ॥ ३ ९
इतिहासमिमं पुण्यं चित्रकेतोर्महात्मनः ।
माहात्म्यं विष्णुभक्तानां श्रुत्वा बन्धाद्विमुच्यते ॥४०
य एतत्प्रातरुत्थाय श्रद्धया ' वाग्यतः पठेत् ।
इतिहासं हरिं स्मृत्वा स याति परमां गतिम् ॥४१
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! भगवान् शंकरका यह भाषण सुनकर भगवती पार्वतीकी चित्तवृत्ति शान्त हो गयी और उनका विस्मय जाता रहा ॥ ३६ ॥ भगवान्के
परमप्रेमी भक्त चित्रकेतु भी भगवती पार्वतीको बदलेमें शाप दे सकते थे, परन्तु उन्होंने उन्हें शाप न देकर उनका शाप सिर चढ़ा लिया! यही साधु पुरुषका लक्षण है ॥ ३७ ॥
यही विद्याधर चित्रकेतु दानवयोनिका आश्रय लेकर त्वष्टाके दक्षिणाग्निसे पैदा हुए । वहाँ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******