श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1251–1260

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1251–1260

पृष्ठ 1251

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इनका नाम वृत्रासुर हुआ और वहाँ भी ये भगवत् - स्वरूपके ज्ञान एवं भक्तिसे परिपूर्ण ही रहे ॥ ३८ ॥ तुमने मुझसे पूछा था कि वृत्रासुरका दैत्ययोनिमें जन्म क्यों हुआ और उसे

भगवान्की ऐसी भक्ति कैसे प्राप्त हुई । उसका पूरा - पूरा विवरण मैंने तुम्हें सुना दिया ॥ ३ ९ ॥ महात्मा चित्रकेतुका यह पवित्र इतिहास केवल उनका ही नहीं, समस्त विष्णुभक्तोंका माहात्म्य है; इसे जो सुनता है, वह समस्त बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है ॥४० ॥ जो पुरुष

प्रातःकाल उठकर मौन रहकर श्रद्धाके साथ भगवान्‌का स्मरण करते हुए इस इतिहासका पाठ करता है, उसे परमगतिकी प्राप्ति होती है ॥४१ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे चित्रकेतुशापो नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥१७ ॥

१. प्रा ० पा ० – स्ववि ० । २. प्रा ० पा०-१. प्रा ० पा ० — श्रद्धावान् । –आर्यमुख्यः सत्सभायां ।

पृष्ठ 1252

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अथाष्टादशोऽध्यायः अदिति और दितिकी सन्तानोंकी तथा मरुद्गणोंकी उत्पत्तिका वर्णन श्रीशुक उवाच

पृश्निस्तु पत्नी सवितुः सावित्रीं व्याहृतिं त्रयीम् ।

अग्निहोत्रं पशुं सोमं चातुर्मास्यं महामखान् ॥१

सिद्धिर्भगस्य भार्याङ्ग महिमानं विभुं प्रभुम् ।

आशिषं च वरारोहां कन्यां प्रासूत सुव्रताम् ॥२

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! सविताकी पत्नी पृश्निके गर्भसे आठ सन्तानें हुईं-सावित्री, व्याहृति, त्रयी, अग्निहोत्र, पशु, सोम, चातुर्मास्य और पंचमहायज्ञ ॥१ ॥ भगकी

पत्नी सिद्धिने महिमा, विभु और प्रभु - ये तीन पुत्र और आशिष् नामकी एक कन्या उत्पन्न की । यह कन्या बड़ी सुन्दरी और सदाचारिणी थी ॥२ ॥

धातुः कुहूः सिनीवाली राका चानुमतिस्तथा ।

सायं दर्शमथ प्रातः पूर्णमासमनुक्रमात् ॥३

अग्नीन् पुरीष्यानाधत्त क्रियायां समनन्तरः ।

चर्षणी वरुणस्यासीद्यस्यां जातो भृगुः पुनः ॥४

वाल्मीकिश्च महायोगी वल्मीकादभवत्किल ।

अगस्त्यश्च वसिष्ठश्च मित्रावरुणयोर्ऋषी ॥ ५

रेतः सिषिचतुः कुम्भे उर्वश्याः सन्निधौ द्रुतम् ।

रेवत्यां मित्र उत्सर्गमरिष्टं पिप्पलं व्यधात् ॥६

पौलोम्यामिन्द्र आधत्त त्रीन् पुत्रानिति नः श्रुतम् ।

जयन्तमृषभं तात तृतीयं मीढुषं प्रभुः ॥७

उरुक्रमस्य देवस्य मायावामनरूपिणः ।

कीर्तौ पत्न्यां बृहच्छ्लोकस्तस्यासन् सौभगादयः ॥८

पृष्ठ 1253

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तत्कर्मगुणवीर्याणि काश्यपस्य महात्मनः ।

पश्चाद्वक्ष्यामहेऽदित्यां यथा वावततार ह ॥९

अथ कश्यपदायादान् दैतेयान् कीर्तयामि ते ।

यत्र भागवतः श्रीमान् प्रह्रादो बलिरेव च ॥ १०

दितेर्द्वावेव दायादौ दैत्यदानववन्दितौ ।

हिरण्यकशिपुर्नाम हिरण्याक्षश्च कीर्तितौ ॥ ११

धाताकी चार पत्नियाँ थीं- कुहू, सिनीवाली, राका और अनुमति । उनसे क्रमशः सायं, दर्श, प्रातः और पूर्णमास – ये चार पुत्र हुए ॥३ ॥

धाताके छोटे भाईका नाम था- विधाता, उनकी पत्नी क्रिया थी । उससे पुरीष्य नामके पाँच अग्नियोंकी उत्पत्ति हुई । वरुणजीकी पत्नीका नाम चर्षणी था । उससे भृगुजीने पुनः जन्म ग्रहण किया । इसके पहले वे ब्रह्माजीके पुत्र थे ॥४ ॥

महायोगी वाल्मीकिजी भी वरुणके पुत्र थे । वल्मीकसे पैदा होनेके कारण ही उनका नाम वाल्मीकि पड़ गया था । उर्वशीको देखकर मित्र और वरुण दोनोंका वीर्य स्खलित हो गया था । उसे उन लोगोंने घड़े में रख दिया । उसीसे मुनिवर अगस्त्य और वसिष्ठजीका जन्म हुआ । मित्रकी पत्नी थी रेवती । उसके तीन पुत्र हुए- उत्सर्ग, अरिष्ट और पिप्पल ॥५-६ ॥ प्रिय परीक्षित्! देवराज इन्द्रकी पत्नी थीं पुलोमनन्दिनी शची । उनसे हमने सुना है, उन्होंने तीन पुत्र उत्पन्न किये — जयन्त, ऋषभ और मीढ्वान् ॥७ ॥ स्वयं भगवान् विष्णु ही ( बलिपर

अनुग्रह करने और इन्द्रका राज्य लौटानेके लिये ) मायासे वामन ( उपेन्द्र ) - के रूपमें अवतीर्ण हुए थे । उन्होंने तीन पग पृथ्वी माँगकर तीनों लोक नाप लिये थे । उनकी पत्नीका नाम था

कीर्ति । उससे बृहच्छ्लोक नामका पुत्र हुआ । उसके सौभग आदि कई सन्तानें हुईं ॥८ ॥

कश्यपनन्दन भगवान् वामनने माता अदितिके गर्भसे क्यों जन्म लिया और इस अवतारमें उन्होंने कौन - से गुण, लीलाएँ और पराक्रम प्रकट किये - इसका वर्णन मैं आगे ( आठवें स्कन्धमें ) करूँगा ॥९ ॥

प्रिय परीक्षित्! अब मैं कश्यपजीकी दूसरी पत्नी दितिसे उत्पन्न होनेवाली उस सन्तानपरम्पराका वर्णन सुनाता हूँ, जिसमें भगवान्‌के प्यारे भक्त श्रीप्रह्लादजी और बलिका जन्म हुआ ॥१० ॥ दितिके दैत्य और दानवोंके वन्दनीय दो ही पुत्र हुए- हिरण्यकशिपु और

हिरण्याक्ष । इनकी संक्षिप्त कथा मैं तुम्हें ( तीसरे स्कन्धमें ) सुना चुका हूँ ॥११ ॥

हिरण्यकशिपोर्भार्या कयाधुर्नाम दानवी ।

जम्भस्य तनया दत्ता सुषुवे चतुरः सुतान् ॥१२

संह्रादं प्रागनुह्रादं ह्रादं ' प्रह्रादमेव च ।

पृष्ठ 1254

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तत्स्वसा सिंहिका नाम राहुं विप्रचितोऽग्रहीत् ॥१३

शिरोऽहरद्यस्य हरिश्चक्रेण पिबतोऽमृतम् ।

संह्रादस्य कृतिर्भार्यासूत े पञ्चजनं ततः ॥१४

ह्रादस्य धमनिर्भार्यासूत वातापिमिल्वलम् ।

योऽगस्त्याय त्वतिथये पेचे वातापिमिल्वलः ॥१५

अनुह्रादस्य सूर्म्यायां ३ बाष्कलो महिषस्तथा ।

विरोचनस्तु प्राह्रादिर्देव्यास्तस्याभवद्बलिः ॥१६

बाणज्येष्ठं पुत्रशतमशनायां ततोऽभवत् ।

तस्यानुभावः सुश्लोक्यः पश्चादेवाभिधास्यते ॥ १७

बाण आराध्य गिरिशं लेभे तद्गणमुख्यताम् ।

यत्पार्श्वे भगवानास्ते ह्यद्यापि पुरपालकः ॥ १८

मरुतश्च दितेः पुत्राश्चत्वारिंशन्नवाधिकाः ।

त आसन्नप्रजाः सर्वे नीता इन्द्रेण सात्मताम् ॥१९

राजोवाच

कथं त आसुरं भावमपोह्यौत्पत्तिकं गुरो ।

इन्द्रेण प्रापिताः सात्म्यं किं तत्साधु कृतं हि तैः ॥२०

इमे श्रद्दधते ब्रह्मन्नृषयो हि मया सह ।

परिज्ञानाय भगवंस्तन्नो व्याख्यातुमर्हसि ॥२१

हिरण्यकशिपुकी पत्नी दानवी कयाधु थी । उसके पिता जम्भने उसका विवाह हिरण्यकशिपुसे कर दिया था । कयाधुके चार पुत्र हुए - संह्राद, अनुह्लाद, ह्राद और प्रह्लाद । इनकी सिंहिका नामकी एक बहिन भी थी । उसका विवाह विप्रचित्ति नामक दानवसे हुआ । उससे राहु नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई ॥१२-१३ ॥ यह वही राहु है, जिसका सिर अमृतपानके समय मोहिनीरूपधारी भगवान्ने चक्रसे काट लिया था । संह्रादकी पत्नी थी कृति । उससे पंचजन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥१४ ॥

ह्रादकी पत्नी थी धमनि । उसके दो पुत्र हुए - वातापि और इल्वल । इस इल्वलने ही

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महर्षि अगस्त्यके आतिथ्यके समय वातापिको पकाकर उन्हें खिला दिया था ॥१५ ॥

अनुह्रादकी पत्नी सूर्म्या थी, उसके दो पुत्र हुए- बाष्कल और महिषासुर । प्रह्लादका पुत्र था विरोचन । उसकी पत्नी देवीके गर्भसे दैत्यराज बलिका जन्म हुआ ॥ १६ ॥ बलिकी पत्नीका

नाम अशना था । उससे बाण आदि सौ पुत्र हुए । दैत्यराज बलिकी महिमा गान करनेयोग्य है । उसे मैं आगे ( आठवें स्कन्धमें ) सुनाऊँगा || १७ || बलिका पुत्र बाणासुर भगवान् शंकरकी आराधना करके उनके गणोंका मुखिया बन गया । आज भी भगवान् शंकर उसके नगरकी रक्षा करनेके लिये उसके पास ही रहते हैं ॥ १८ ॥ दितिके हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्षके

अतिरिक्त उनचास पुत्र और थे । उन्हें मरुद्गण कहते हैं । वे सब निःसन्तान रहे । देवराज इन्द्रने उन्हें अपने ही समान देवता बना लिया ॥ १ ९ ॥ राजा परीक्षित्ने पूछा- भगवन्! मरुद्गणने ऐसा कौन - सा सत्कर्म किया था, जिसके कारण वे अपने जन्मजात असुरोचित भावको छोड़ सके और देवराज इन्द्रके द्वारा देवता बना लिये गये? ॥२० ॥ ब्रह्मन्! मेरे साथ यहाँकी सभी ऋषिमण्डली यह बात जाननेके लिये

अत्यन्त उत्सुक हो रही है । अतः आप कृपा करके विस्तारसे वह रहस्य बतलाइये ॥२१ ॥

सूत उवाच तद्विष्णुरातस्य स बादरायणि-र्वचो निशम्यादृतमल्पमर्थवत् । सभाजयन् संनिभृतेन चेतसा जगाद सत्रायण सर्वदर्शनः ॥२२ श्रीशुक उवाच

हतपुत्रा दितिः शक्रपार्ष्णिग्राहेण विष्णुना ।

मन्युना शोकदीप्तेन ज्वलन्ती पर्यचिन्तयत् ॥२३

कदा नु भ्रातृहन्तारमिन्द्रियाराममुल्बणम् ।

अक्लिन्नहृदयं पापं घातयित्वा शये सुखम् ॥ २४

कृमिविड्भस्मसंज्ञाऽऽसीद्यस्येशाभिहितस्य च ।

भूतध्रुक् तत्कृते स्वार्थं किं वेद निरयो यतः ॥ २५

आशासानस्य तस्येदं ध्रुवमुन्नद्धचेतसः ।

मदशोषक इन्द्रस्य भूयाद्येन सुतो हि मे ॥२६

पृष्ठ 1256

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इति भावेन सा भर्तुराचचारासकृत्प्रियम् ।

शुश्रूषयानुरागेण प्रश्रयेण दमेन च ॥२७

भक्त्या परमया राजन् मनोज्ञैर्वल्गुभाषितैः ।

मनो जग्राह भावज्ञा सुस्मितापाङ्गवीक्षणैः ॥२८

एवं स्त्रिया जडीभूतो विद्वानपि विदग्धया ।

बाढमित्याह विवशो न तच्चित्रं हि योषिति ॥२९

सूतजी कहते हैं - शौनकजी! राजा परीक्षित्का प्रश्न थोड़े शब्दोंमें बड़ा सारगर्भित था । उन्होंने बड़े आदरसे पूछा भी था । इसलिये सर्वज्ञ श्रीशुकदेवजी महाराजने बड़े ही प्रसन्न चित्तसे उनका अभिनन्दन करके यों कहा ॥२२ ॥

श्रीशुकदेवजी कहने लगे - परीक्षित्! भगवान् विष्णुने इन्द्रका पक्ष लेकर दितिके दोनों पुत्र हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्षको मार डाला । अतः दिति शोककी आगसे उद्दीप्त क्रोधसे जलकर इस प्रकार सोचने लगी ॥२३ ॥

' सचमुच इन्द्र बड़ा विषयी, क्रूर और निर्दयी है । राम! राम! उसने अपने भाइयोंको ही मरवा डाला । वह दिन कब होगा, जब मैं भी उस पापीको मरवाकर आरामसे सोऊँगी ॥२४ ॥

लोग राजाओंके, देवताओंके शरीरको ' प्रभु ' कहकर पुकारते हैं; परन्तु एक दिन वह् कीड़ा, विष्ठा या राखका ढेर हो जाता है, इसके लिये जो दूसरे प्राणियोंको सताता है, उसे अपने सच्चे स्वार्थ या परमार्थका पता नहीं है; क्योंकि इससे तो नरकमें जाना पड़ेगा ॥२५ ॥

मैं समझती हूँ इन्द्र अपने शरीरको नित्य मानकर मतवाला हो रहा है । उसे अपने विनाशका पता ही नहीं है । अब मैं वह उपाय करूँगी, जिससे मुझे ऐसा पुत्र प्राप्त हो, जो इन्द्रका घमण्ड चूर - चूर कर दे ' ॥२६ ॥ दिति अपने मनमें ऐसा विचार करके सेवा - शुश्रूषा, विनय - प्रेम और

जितेन्द्रियता आदिके द्वारा निरन्तर अपने पतिदेव कश्यपजीको प्रसन्न रखने लगी ॥२७ ॥ वह

अपने पतिदेवके हृदयका एक - एक भाव जानती रहती थी और परम प्रेमभाव, मनोहर एवं मधुर भाषण तथा मुसकानभरी तिरछी चितवनसे उनका मन अपनी ओर आकर्षित करती रहती थी ॥२८ ॥ कश्यपजी महाराज बड़े विद्वान् और विचारवान् होनेपर भी चतुर दिति

सेवासे मोहित हो गये और उन्होंने विवश होकर यह स्वीकार कर लिया कि ' मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा । ' स्त्रियोंके सम्बन्धमें यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है ॥ २ ९ ॥

विलोक्यैकान्तभूतानि भूतान्यादौ प्रजापतिः ।

स्त्रियं चक्रे स्वदेहार्धं यया पुंसां मतिर्हता ॥ ३०

एवं शुश्रूषितस्तात भगवान् कश्यपः स्त्रिया ।

प्रहस्य परमप्रीतो दितिमाहाभिनन्द्य च ॥३१

पृष्ठ 1257

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कश्यप उवाच

वरं वरय वामोरु प्रीतस्तेऽहमनिन्दिते ।

स्त्रिया भर्तरि सुप्रीते कः काम इह चागमः ॥३२

पतिरेव हि नारीणां दैवतं परमं स्मृतम् ।

मानसः सर्वभूतानां वासुदेवः श्रियः पतिः ॥३३

स एव देवतालिङ्गैर्नामरूपविकल्पितैः ।

इज्यते भगवान् पुम्भिः स्त्रीभिश्च पतिरूपधृक् ॥३४

तस्मात्पतिव्रता नार्यः श्रेयस्कामाः सुमध्यमे ।

यजन्तेऽनन्यभावेन पतिमात्मानमीश्वरम् ॥३५

सोऽहं त्वयार्चितो भद्रे ईदृग्भावेन भक्तितः ।

तत्ते सम्पादये काममसतीनां सुदुर्लभम् ॥३६

दितिरुवाच

वरदो ” यदि मे ब्रह्मन् पुत्रमिन्द्रहणं वृणे ।

अमृत्युं मृतपुत्राहं येन मे घातितौ सुतौ ॥३७

सृष्टिके प्रभातमें ब्रह्माजीने देखा कि सभी जीव असंग हो रहे हैं, तब उन्होंने अपने आधे शरीरसे स्त्रियोंकी रचना की और स्त्रियोंने पुरुषोंकी मति अपनी ओर आकर्षित कर ली ॥३० ॥ हाँ, तो भैया! मैं कह रहा था कि दितिने भगवान् कश्यपकी बड़ी सेवा की । इससे

वे उसपर हुए मुसकराकर बहुत ही प्रसन्न हुए । उन्होंने दितिका अभिनन्दन करते उससे कहा ॥३१ ॥

कश्यपजीने कहा — अनिन्द्यसुन्दरी प्रिये! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ । तुम्हारी जो इच्छा हो, मुझसे माँग लो । पतिके प्रसन्न हो जानेपर पत्नीके लिये लोक या परलोकमें कौन - सी अभीष्ट वस्तु दुर्लभ है ॥३२ ॥ शास्त्रोंमें यह बात स्पष्ट कही गयी है कि पति ही स्त्रियोंका परमाराध्य

इष्टदेव है । प्रिये! लक्ष्मीपति भगवान् वासुदेव ही समस्त प्राणियोंके हृदयमें विराजमान हैं ॥३३ ॥

विभिन्न देवताओंके रूपमें नाम और रूपके भेदसे उन्हींकी कल्पना हुई है । सभी पुरुष —चाहे किसी भी देवताकी उपासना करें— उन्हींकी उपासना करते हैं । ठीक वैसे ही स्त्रियोंके

लिये भगवान्ने पतिका रूप धारण किया है । वे उनकी उसी रूपमें पूजा करती हैं ॥३४ ॥

पृष्ठ 1258

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इसलिये प्रिये! अपना कल्याण चाहनेवाली पतिव्रता स्त्रियाँ अनन्य प्रेमभावसे अपने पतिदेवकी ही पूजा करती हैं; क्योंकि पतिदेव ही उनके परम प्रियतम आत्मा और ईश्वर हैं ॥३५ ॥ कल्याणी! तुमने बड़े प्रेमभावसे, भक्तिसे मेरी वैसी ही पूजा की है । अब मैं तुम्हारी

सब अभिलाषाएँ पूर्ण कर दूँगा । असतियोंके जीवनमें ऐसा होना अत्यन्त दुर्लभ है ॥३६ ॥

दितिने कहा — ब्रह्मन्! इन्द्रने विष्णुके हाथों मेरे दो पुत्र मरवाकर मुझे निपूती बना दिया है । इसलिये यदि आप मुझे मुँहमाँगा वर देना चाहते हैं तो कृपा करके एक ऐसा अमर पुत्र दीजिये, जो इन्द्रको मार डाले ॥३७ ॥

निशम्य तद्वचो विप्रो विमनाः पर्यतप्यत ।

अहो अधर्मः सुमहानद्य मे समुपस्थितः ॥३८

अहो अद्येन्द्रियारामो योषिन्मय्येह मायया ।

गृहीतचेताः कृपणः पतिष्ये नरके ध्रुवम् ॥३९

कोऽतिक्रमोऽनुवर्तन्त्याः स्वभावमिह योषितः ।

धिङ् मां बताबुधं स्वार्थे यदहं त्वजितेन्द्रियः ॥४०

शरत्पद्मोत्सवं वक्त्रं वचश्च श्रवणामृतम् ।

हृदयं क्षुरधाराभं स्त्रीणां को वेद चेष्टितम् ॥४१

न हि कश्चित्प्रियः स्त्रीणामञ्जसा स्वाशिषात्मनाम् ।

पतिं पुत्रं भ्रातरं वा घ्नन्त्यर्थे घातयन्ति च ॥४२

प्रतिश्रुतं ददामीति वचस्तन्न मृषा भवेत् ।

वधं नार्हति चेन्द्रोऽपि तत्रेदमुपकल्पते ॥४३

इति संचिन्त्य भगवान्मारीचः कुरुनन्दन ।

उवाच किञ्चित् कुपित आत्मानं च विगर्हयन् ॥४४

कश्यप उवाच

पुत्रस्ते भविता भद्रे इन्द्रहा देवबान्धवः ।

संवत्सरं व्रतमिदं यद्यञ्जो धारयिष्यसि ॥४५

परीक्षित्! दितिकी बात सुनकर कश्यपजी खिन्न होकर पछताने लगे । वे मन - ही - मन कहने लगे — ‘ हाय! हाय! आज मेरे जीवनमें बहुत बड़े अधर्मका अवसर आ पहुँचा ॥३८ ॥

पृष्ठ 1259

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देखो तो सही, अब मैं इन्द्रियोंके विषयोंमें सुख मानने लगा हूँ । स्त्रीरूपिणी मायाने मेरे चित्तको अपने वशमें कर लिया है । हाय! हाय! आज मैं कितनी दीन - हीन अवस्थामें हूँ । अवश्य ही अब मुझे नरकमें गिरना पड़ेगा ॥ ३ ९ ॥ इस स्त्रीका कोई दोष नहीं है; क्योंकि इसने अपने जन्मजात स्वभावका ही अनुसरण किया है । दोष मेरा है - जो मैं अपनी इन्द्रियोंको अपने वशमें न रख सका, अपने सच्चे स्वार्थ और परमार्थको न समझ सका । मुझ मूढको बार - बार धिक्कार है ॥४० ॥ सच है, स्त्रियोंके चरित्रको कौन जानता है । इनका मुँह तो ऐसा होता है

जैसे शरऋतुका खिला हुआ कमल । बातें सुननेमें ऐसी मीठी होती हैं, मानो अमृत घोल रखा हो । परन्तु हृदय, वह तो इतना तीखा होता है कि मानो छुरेकी पैनी धार हो ॥४१ ॥

इसमें सन्देह नहीं कि स्त्रियाँ अपनी लालसाओंकी कठपुतली होती हैं । सच पूछो तो वे किसीसे प्यार नहीं करतीं । स्वार्थवश वे अपने पति, पुत्र और भाईतकको मार डालती हैं या मरवा डालती हैं ॥४२ ॥ अब तो मैं कह चुका हूँ कि जो तुम माँगोगी, दूँगा । मेरी बात झूठी

नहीं होनी चाहिये । परन्तु इन्द्र भी वध करनेयोग्य नहीं है । अच्छा, अब इस विषयमें मैं यह युक्ति करता हूँ ' ॥४३ ॥

प्रिय परीक्षित्! सर्वसमर्थ कश्यपजीने इस प्रकार मन - ही - मन अपनी भर्त्सना करके दोनों बात बनानेका उपाय सोचा और फिर तनिक रुष्ट होकर दितिसे कहा ॥४४ ॥

कश्यपजी बोले — कल्याणी! यदि तुम मेरे बतलाये हुए व्रतका एक वर्षतक विधिपूर्वक पालन करोगी तो तुम्हें इन्द्रको मारनेवाला पुत्र प्राप्त होगा । परन्तु यदि किसी प्रकार नियमोंमें त्रुटि हो गयी तो वह देवताओंका मित्र बन जायगा ॥४५ ॥

दितिरुवाच

धारयिष्ये व्रतं ब्रह्मन्ब्रूहि कार्याणि यानि मे ।

यानि चेह निषिद्धानि न व्रतं घ्नन्ति यानि तु ॥४६

कश्यप उवाच

न हिंस्याद्भूतजातानि न शपेन्नानृतं वदेत् ।

नच्छिन्द्यान्नखरोमाणि न स्पृशेद्यदमङ्गलम् ॥४७

नाप्सु स्नायान्न कुप्येत न सम्भाषेत दुर्जनैः ।

न वसीताधौतवासः स्रजं च विधृतां क्वचित् ॥४८

नोच्छिष्टं चण्डिकान्नं च सामिषं वृषलाहृतम् ।

भुञ्जीतोदक्यया दृष्टं पिबेदञ्जलिना त्वपः ॥४९

पृष्ठ 1260

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नोच्छिष्टास्पृष्टसलिला सन्ध्यायां मुक्तमूर्धजा ।

अनर्चितासंयतवाङ्नासंवीता बहिश्चरेद् ॥५०

नाधौतपादाप्रयता नार्द्रपान्नो ' उदक्शिराः ।

शयीत नापराङ्नान्यैर्न ± नग्ना न च सन्ध्ययोः ॥५१

धौतवासाः शुचिर्नित्यं सर्वमङ्गलसंयुता ।

पूजयेत्प्रातराशात्प्राग्गोविप्रान् श्रियमच्युतम् ॥ ५२

स्त्रियो वीरवतीश्चार्चेत्स्रग्गन्धबलिमण्डनैः ।

पतिं चार्य्योपतिष्ठेत ध्यायेत्कोष्ठगतं च तम् ॥५३

सांवत्सरं पुंसवनं व्रतमेतदविप्लुतम् ।

धारयिष्यसि चेत्तुभ्यं शक्रहा भविता सुतः ॥५४

दितिने कहा — ब्रह्मन्! मैं उस व्रतका पालन करूंगी । आप बतलाइये कि मुझे क्या - क्या करना चाहिये, कौन - कौनसे काम छोड़ देने चाहिये और कौन - से काम ऐसे हैं, जिनसे व्रत भंग नहीं होता ॥ ४६ ॥

कश्यपजीने उत्तर दिया - प्रिये! इस व्रतमें किसी भी प्राणीको मन, वाणी या क्रियाके द्वारा सताये नहीं, किसीको शाप या गाली न दे, झूठ न बोले, शरीरके नख और रोएँ न काटे और किसी भी अशुभ वस्तुका स्पर्श न करे || ४७ || जलमें घुसकर स्नान न करे, क्रोध न करे, दुर्जनोंसे बातचीत न करे, बिना धुला वस्त्र न पहने और किसीकी पहनी हुई माला न पहने ॥४८ ॥ जूठा न खाय, भद्रकालीका प्रसाद या मांसयुक्त अन्नका भोजन न करे । शूद्रका

लाया हुआ और रजस्वलाका देखा हुआ अन्न भी न खाय और अंजलिसे जलपान न करे ॥४९ ॥ जूठे मुँह, बिना आचमन किये, सन्ध्याके समय, बाल खोले हुए, बिना शृंगारके,

वाणीका संयम किये बिना और बिना चद्दर ओढ़े घरसे बाहर न निकले ॥ ५० ॥

बिना पैर धोये, अपवित्र अवस्थामें गीले पाँवोंसे, उत्तर या पश्चिम सिर करके, दूसरेके साथ, नग्नावस्थामें तथा सुबह - शाम सोना नहीं चाहिये ॥ ५१ ॥ इस प्रकार इन निषिद्ध

कर्मोंका त्याग करके सर्वदा पवित्र रहे, धुला वस्त्र धारण करे और सभी सौभाग्यके चिह्नोंसे सुसज्जित रहे । प्रातःकाल कलेवा करनेके पहले ही गाय, ब्राह्मण, लक्ष्मीजी और भगवान् नारायणकी पूजा करे ॥५२ ॥

इसके बाद पुष्पमाला, चन्दनादि सुगन्धद्रव्य, नैवेद्य और आभूषणादिसे सुहागिनी स्त्रियोंकी पूजा करे तथा पतिकी पूजा करके उसकी सेवामें संलग्न रहे और यह भावना करती रहे कि पतिका तेज मेरी कोखमें स्थित है ॥ ५३ ॥ प्रिये! इस व्रतका नाम ' पुंसवन ' है । यदि