श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 141–150

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 141–150

पृष्ठ 141

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तैयार रखे । इनके पीछे वक्ताके लिये भी एक दिव्य सिंहासनका प्रबन्ध करे ॥ १७ ॥ यदि

वक्ताका मुख उत्तरकी ओर रहे तो श्रोता पूर्वाभिमुख होकर बैठे और यदि वक्ता पूर्वाभिमुख रहे तो श्रोताको उत्तरकी ओर मुख करके बैठना चाहिये ॥१८ ॥ अथवा वक्ता और श्रोताको

पूर्वमुख होकर बैठना चाहिये । देश - काल आदिको जाननेवाले महानुभावोंने श्रोताके लिये ऐसा ही नियम बताया है ॥१९ ॥ जो वेद - शास्त्रकी स्पष्ट व्याख्या करनेमें समर्थ हो, तरह - तरहके

दृष्टान्त दे सकता हो तथा विवेकी और अत्यन्त निःस्पृह हो, ऐसे विरक्त और विष्णुभक्त ब्राह्मणको वक्ता बनाना चाहिये ॥२० ॥ श्रीमद्भागवतके प्रवचनमें ऐसे लोगोंको नियुक्त नहीं

करना चाहिये जो पण्डित होनेपर भी अनेक धर्मोंके चक्कर में पड़े हुए, स्त्री- लम्पट एवं पाखण्डके प्रचारक हों ॥२१ ॥ वक्ताके पास ही उसकी सहायताके लिये एक वैसा ही विद्वान्

और स्थापित करना चाहिये । वह भी सब प्रकारके संशयोंकी निवृत्ति करनेमें समर्थ और लोगोंको समझानेमें कुशल हो ॥२२ ॥

ऊर्ध्वं सप्तैव लोकाश्च कल्पनीयाः सविस्तरम् ।

तेषु विप्रा विरक्ताश्च स्थापनीयाः प्रबोध्य च ॥ १६

पूर्वं तेषामासनानि कर्तव्यानि यथोत्तरम् ।

वक्तुश्चापि तदा दिव्यमासनं परिकल्पयेत् ॥१७

उदङ्मुखो भवेद्वक्ता श्रोता वै प्राङ्मुखस्तदा ।

प्राङ्मुखश्चेद्भवेद्वक्ता श्रोता चोदङ्मुखस्तदा ॥ १८

अथवा पूर्वदिग्ज्ञेया पूज्यपूजकमध्यतः ।

श्रोतॄणामागमे प्रोक्ता देशकालादिकोविदैः ॥ १ ९

विरक्तो वैष्णवो विप्रो वेदशास्त्रविशुद्धिकृत् ।

दृष्टान्तकुशलो धीरो वक्ता कार्योऽतिनिःस्पृहः ॥२०

अनेकधर्मविभ्रान्ताः स्त्रैणाः पाखण्डवादिनः ।

शुकशास्त्रकथोच्चारे त्याज्यास्ते यदि पण्डिताः ॥२१

वक्तुः पार्श्वे सहायार्थमन्यः स्थाप्यस्तथाविधः ।

पण्डितः संशयच्छेत्ता लोकबोधनतत्परः ॥२२

वक्त्रा क्षौरं प्रकर्तव्यं दिनादर्वाग्व्रताप्तये ।

अरुणोदयेऽसौ निर्वर्त्य शौचं स्नानं समाचरेत् ॥२३

नित्यं संक्षेपतः कृत्वा संध्याद्यं स्वं प्रयत्नतः ।

कथाविघ्नविघाताय गणनाथं प्रपूजयेत् ॥२४

पितॄन् संतर्प्य शुद्ध्यर्थं प्रायश्चित्तं समाचरेत् ।

मण्डलं च प्रकर्तव्यं तत्र स्थाप्यो हरिस्तथा ॥२५

कृष्णमुद्दिश्य मन्त्रेण चरेत्पूजाविधिं क्रमात् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 142

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प्रदक्षिणनमस्कारान् पूजान्ते स्तुतिमाचरेत् ॥२६ कथा - प्रारम्भके दिनसे एक दिन पूर्व व्रत ग्रहण करनेके लिये वक्ताको क्षौर करा लेना चाहिये । तथा अरुणोदयके समय शौचसे निवृत्त होकर अच्छी तरह स्नान करे ॥ २३ ॥ और

संध्यादि अपने नित्यकर्मोंको संक्षेपसे समाप्त करके कथाके विघ्नोंकी निवृत्तिके लिये गणेशजीका पूजन करे ॥२४ ॥

तदनन्तर पितृगणका तर्पण कर पूर्व पापोंकी शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त करे और एक मण्डल बनाकर उसमें श्रीहरिको स्थापित करे ॥२५ ॥

फिर भगवान् श्रीकृष्णको लक्ष्य करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक क्रमशः षोडशोपचारविधिसे पूजन करे और उसके पश्चात् प्रदक्षिणा तथा नमस्कारादि कर इस प्रकार स्तुति करे ॥२६ ॥

संसारसागरे मग्नं दीनं मां करुणानिधे ।

कर्ममोहगृहीताङ्गं मामुद्धर भवार्णवात् ॥२७

श्रीमद्भागवतस्यापि ततः पूजा प्रयत्नतः ।

कर्तव्या विधिना प्रीत्या धूपदीपसमन्विता ॥२८

ततस्तु श्रीफलं धृत्वा नमस्कारं समाचरेत् ।

स्तुतिः प्रसन्नचित्तेन कर्तव्या केवलं तदा ॥२९

श्रीमद्भागवताख्योऽयं प्रत्यक्षः कृष्ण एव हि ।

स्वीकृतोऽसि मया नाथ मुक्त्यर्थं भवसागरे ॥३०

मनोरथो मदीयोऽयं सफलः सर्वथा त्वया ।

निर्विघ्नेनैव कर्तव्यो दासोऽहं तव केशव ॥३१

एवं दीनवचः प्रोच्य वक्तारं चाथ पूजयेत् ।

सम्भूष्य वस्त्रभूषाभिः पूजान्ते तं च संस्तवेत् ॥३२

शुकरूप प्रबोधज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।

एतत्कथाप्रकाशेन मदज्ञानं विनाशय ॥३३

तदग्रे नियमः पश्चात्कर्तव्यः श्रेयसे मुदा ।

सप्तरात्रं यथाशक्त्या धारणीयः स एव हि ॥३४

वरणं पञ्चविप्राणां कथाभङ्गनिवृत्तये ।

कर्तव्यं तैर्हरेर्जाप्यं द्वादशाक्षरविद्यया ॥ ३५

ब्राह्मणान् वैष्णवांश्चान्यांस्तथा कीर्तनकारिणः ।

नत्वा सम्पूज्य दत्ताज्ञः स्वयमासनमाविशेत् ॥३६

लोकवित्तधनागारपुत्रचिन्तां व्युदस्य च ।

कथाचित्तः शुद्धमतिः स लभेत्फलमुत्तमम् ॥३७

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पृष्ठ 143

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आसूर्योदयमारभ्य सार्धत्रिप्रहरान्तकम् ।

वाचनीया कथा सम्यग्धीरकण्ठं सुधीमता ॥ ३८

कथाविरामः कर्तव्यो मध्याह्ने घटिकाद्वयम् ।

तत्कथामनु कार्यं वै कीर्तनं वैष्णवैस्तदा ॥३९

‘ करुणानिधान! मैं संसारसागरमें डूबा हुआ और बड़ा दीन हूँ । कर्मोंके मोहरूपी ग्राहने मुझे पकड़ रखा है । आप इस संसारसागरसे मेरा उद्धार कीजिये || २७ ॥ इसके पश्चात् धूप-दीप आदि सामग्रियोंसे श्रीमद्भागवतकी भी बड़े उत्साह और प्रीतिपूर्वक विधि - विधान से पूजा करे ॥२८ ॥ फिर पुस्तकके आगे नारियल रखकर नमस्कार करे और प्रसन्नचित्तसे इस प्रकार

स्तुति करे – || २ ९ || ' श्रीमद्भागवतके रूपमें आप साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्र ही विराजमान हैं । नाथ! मैंने भवसागरसे छुटकारा पानेके लिये आपकी शरण ली है || ३० || मेरा यह मनोरथ

आप बिना किसी विघ्न - बाधाके सांगोपांग पूरा करें । केशव! मैं आपका दास हूँ ' ॥३१ ॥

इस प्रकार दीन वचन कहकर फिर वक्ताका पूजन करे । उसे सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे विभूषित करे और फिर पूजाके पश्चात् उसकी इस प्रकार स्तुति करे - || ३२ || ‘ शुकस्वरूप भगवन्! आप समझानेकी कलामें कुशल और सब शास्त्रोंमें पारंगत हैं; कृपया इस कथाको प्रकाशित करके मेरा अज्ञान दूर करें ' ॥ ३३ ॥ फिर अपने कल्याणके लिये प्रसन्नता - पूर्वक

उसके सामने नियम ग्रहण करे और सात दिनोंतक यथाशक्ति उसका पालन करे ॥३४ ॥

कथामें विघ्न न हो, इसके लिये पाँच ब्राह्मणोंको और वरण करे; वे द्वादशाक्षर मन्त्रद्वारा भगवान्के नामोंका जप करें ॥ ३५ ॥ फिर ब्राह्मण, अन्य विष्णुभक्त एवं कीर्तन करनेवालोंको

नमस्कार करके उनकी पूजा करे और उनकी आज्ञा पाकर स्वयं भी आसनपर बैठ जाय ॥३६ ॥ जो पुरुष लोक, सम्पत्ति, धन, घर और पुत्रादिकी चिन्ता छोड़कर शुद्धचित्तसे

केवल कथामें ही ध्यान रखता है, उसे इसके श्रवणका उत्तम फल मिलता है ॥३७ ॥

बुद्धिमान् वक्ताको चाहिये कि सूर्योदयसे कथा आरम्भ करके साढ़े तीन पहतक मध्यम स्वरसे अच्छी तरह कथा बाँचे ॥ ३८ ॥ दोपहरके समय दो घड़ीतक कथा बंद रखे । उस समय

कथाके प्रसंगके अनुसार वैष्णवोंको भगवान्‌के गुणोंका कीर्तन करना चाहिये - व्यर्थ बातें नहीं करनी चाहिये ॥३९ ॥ कथाके समय मल - मूत्र वेगको काबू में रखनेके लिये अल्पाहार

सुखकारी होता है; इसलिये श्रोता केवल एक ही समय हविष्यान्न भोजन करे || ४० || यदि शक्ति हो तो सातों दिन निराहार रहकर कथा सुने अथवा केवल घी या दूध पीकर सुखपूर्वक श्रवण करे ॥ ४१ ॥ अथवा फलाहार या एक समय ही भोजन करे । जिससे जैसा नियम

सुभीतेसे सध सके, उसीको कथाश्रवणके लिये ग्रहण करे ॥४२ ॥ मैं तो उपवासकी अपेक्षा

भोजन करना अच्छा समझता हूँ, यदि वह कथाश्रवणमें सहायक हो । यदि उपवाससे श्रवणमें बाधा पहुँचती हो तो वह किसी कामका नहीं ॥४३ ॥

मलमूत्रजयार्थं हि लघ्वाहारः सुखावहः ।

हविष्यान्नेन कर्तव्यो ह्येकवारं कथार्थिना ॥४०

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पृष्ठ 144

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उपोष्य सप्तरात्रं वै शक्तिश्चेच्छृणुयात्तदा ।

घृतपानं पयःपानं कृत्वा वै शृणुयात्सुखम् ॥४१

फलाहारेण वा भाव्यमेकभुक्तेन वा पुनः ।

सुखसाध्यं भवेद्यत्तु कर्तव्यं श्रवणाय तत् ॥४२

भोजनं तु वरं मन्ये कथाश्रवणकारकम्

तु ।

नोपवासो वरः प्रोक्तः कथाविघ्नकरो यदि ॥ ४३

सप्ताहव्रतिनां पुंसां नियमाञ्छृणु नारद ।

विष्णुदीक्षाविहीनानां नाधिकारः कथाश्रवे ॥ ४४

ब्रह्मचर्यमधःसुप्तिः पत्रावल्यां च भोजनम् ।

कथासमाप्तौ भुक्तिं च कुर्यान्नित्यं कथाव्रती ॥४५

द्विदलं मधु तैलं च गरिष्ठान्नं तथैव च ।

भावदुष्टं पर्युषितं जह्यान्नित्यं कथाव्रती ॥४६

कामं क्रोधं मदं मानं मत्सरं लोभमेव च ।

दम्भं मोहं तथा द्वेषं दूरयेच्च कथाव्रती ॥४७

वेदवैष्णवविप्राणां गुरुगोव्रतिनां तथा ।

स्त्रीराजमहतां निन्दां वर्जयेद्यः कथाव्रती ॥४८

रजस्वलान्त्यजम्लेच्छपतितव्रात्यकैस्तथा ।

द्विजद्विड्वेदबाह्यैश्च न वदेद्यः कथाव्रती ॥४९

सत्यं शौचं दयां मौनमार्जवं विनयं तथा ।

उदारमानसं तद्वदेवं कुर्यात्कथाव्रती ॥५०

दरिद्रश्च क्षयी रोगी निर्भाग्यः पापकर्मवान् ।

अनपत्यो मोक्षकामः शृणुयाच्च कथामिमाम् ॥५१

अपुष्पा काकवन्ध्या च वन्ध्या या च मृतार्भका ।

स्रवद्गर्भा च या नारी तया श्राव्या प्रयत्नतः ॥५२

एतेषु विधिना श्रावे तदक्षयतरं भवेत् ।

अत्युत्तमा कथा दिव्या कोटियज्ञफलप्रदा ॥५३

नारदजी! नियमसे सप्ताह सुननेवाले पुरुषोंके नियम सुनिये । विष्णुभक्तकी दीक्षासे रहित पुरुष कथाश्रवणका अधिकारी नहीं है ॥ ४४ ॥ जो पुरुष नियमसे कथा सुने, उसे

ब्रह्मचर्यसे रहना, भूमिपर सोना और नित्यप्रति कथा समाप्त होनेपर पत्तलमें भोजन करना चाहिये ॥४५ ॥ दाल, मधु, तेल, गरिष्ठ अन्न, भावदूषित पदार्थ और बासी अन्न — इनका उसे

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पृष्ठ 145

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सर्वदा ही त्याग करना चाहिये || ४६ || काम, क्रोध, मद, मान, मत्सर, लोभ, दम्भ, मोह और द्वेषको तो अपने पास भी नहीं फटकने देना चाहिये ॥ ४७ ॥ वह वेद, वैष्णव, ब्राह्मण, गुरु,

गोसेवक तथा स्त्री, राजा और महापुरुषोंकी निन्दासे भी बचे ॥४८ ॥ नियमसे कथा

सुननेवाले पुरुषको रजस्वला स्त्री, अन्त्यज, म्लेच्छ, पतित, गायत्रीहीन द्विज, ब्राह्मणोंसे द्वेष करनेवाले तथा वेदको न माननेवाले पुरुषोंसे बात नहीं करनी चाहिये ॥४९ ॥ सर्वदा सत्य,

शौच, दया, मौन, सरलता, विनय और उदारताका बर्ताव करना चाहिये || ५० || धनहीन, क्षयरोगी, किसी अन्य रोगसे पीड़ित, भाग्यहीन, पापी, पुत्रहीन और मुमुक्षु भी यह कथा श्रवण करे ॥५१ ॥ जिस स्त्रीका रजोदर्शन रुक गया हो, जिसके एक ही संतान होकर रह

गयी हो, जो बाँझ हो, जिसकी संतान होकर मर जाती हो अथवा जिसका गर्भ गिर जाता हो, वह यत्नपूर्वक इस कथाको सुने ॥५२ ॥ ये सब यदि विधिवत् कथा सुनें तो इन्हें अक्षय

फलकी प्राप्ति हो सकती है । यह अत्युत्तम दिव्य कथा करोड़ों यज्ञोंका फल देनेवाली है ॥५३ ॥

एवं कृत्वा व्रतविधिमुद्यापनमथाचरेत् ।

जन्माष्टमीव्रतमिव कर्तव्यं फलकाङ्क्षिभिः ॥५४

अकिञ्चनेषु भक्तेषु प्रायो नोद्यापनाग्रहः ।

श्रवणेनैव पूतास्ते निष्कामा वैष्णवा यतः ॥ ५५

एवं नगाहयज्ञेऽस्मिन् समाप्ते श्रोतृभिस्तदा ।

पुस्तकस्य च वक्तुश्च पूजा कार्यातिभक्तितः ॥५६

प्रसादतुलसीमाला श्रोतृभ्यश्चाथ दीयताम् ।

मृदङ्गतालललितं कर्तव्यं कीर्तनं ततः ॥५७

जयशब्दं नमःशब्दं शङ्खशब्दं च कारयेत् ।

विप्रेभ्यो याचकेभ्यश्च वित्तमन्नं च दीयताम् ॥५८

विरक्तश्चेद्भवेच्छ्रोता गीता वाच्या परेऽहनि ।

गृहस्थश्चेत्तदा होमः कर्तव्यः कर्मशान्तये ॥ ५ ९

प्रतिश्लोकं तु जुहुयाद्विधिना दशमस्य च । तु पायसं मधु सर्पिश्च तिलान्नादिकसंयुतम् ॥६०

अथवा हवनं कुर्याद्गायत्र्या सुसमाहितः ।

तन्मयत्वात्पुराणस्य परमस्य च तत्त्वतः ॥६१

होमाशक्तौ बुधो हौम्यं दद्यात्तत्फलसिद्धये ।

नानाच्छिद्रनिरोधार्थं न्यूनताधिकतानयोः ॥ ६२

दोषयोः प्रशमार्थं च पठेन्नामसहस्रकम् ।

तेन स्यात्सफलं सर्वं नास्त्यस्मादधिकं यतः ॥६३

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पृष्ठ 146

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द्वादश ब्राह्मणान् पश्चाद्भोजयेन्मधुपायसैः ।

दद्यात्सुवर्णं धेनुं च व्रतपूर्णत्वहेतवे ॥६४

शक्तौ पलत्रयमितं स्वर्णसिंहं विधाय च ।

तत्रास्य पुस्तकं स्थाप्यं लिखितं ललिताक्षरम् ॥६५

सम्पूज्यावाहनाद्यैस्तदुपचारैः सदक्षिणम् ।

वस्त्रभूषणगन्धाद्यैः पूजिताय यतात्मने ॥६६

इस प्रकार इस व्रतकी विधियोंका पालन करके फिर उद्यापन करे । जिन्हें इसके विशेष फलकी इच्छा हो, वे जन्माष्टमीव्रतके समान ही इस कथाव्रतका उद्यापन करें ॥५४ ॥ किन्तु

जो भगवान्‌के अकिंचन भक्त हैं, उनके लिये उद्यापनका कोई आग्रह नहीं है । वे श्रवणसे ही पवित्र हैं; क्योंकि वे तो निष्काम भगवद्भक्त हैं ॥ ५५ ॥

इस प्रकार जब सप्ताहयज्ञ समाप्त हो जाय, तब श्रोताओंको अत्यन्त भक्तिपूर्वक पुस्तक और वक्ताकी पूजा करनी चाहिये ॥ ५६ ॥ फिर वक्ता श्रोताओंको प्रसाद, तुलसी और

प्रसादी मालाएँ दे तथा सब लोग मृदंग और झाँझकी मनोहर ध्वनिसे सुन्दर कीर्तन करें ॥५७ ॥ जय - जयकार, नमस्कार और शंखध्वनिका घोष कराये तथा ब्राह्मण और

याचकोंको धन और अन्न दे ॥ ५८ ॥ श्रोता विरक्त हो तो कर्मकी शान्तिके लिये दूसरे दिन

गीतापाठ करे; गृहस्थ हो तो हवन करे ॥ ५ ९ ॥ उस हवनमें दशमस्कन्धका एक - एक श्लोक पढ़कर विधिपूर्वक खीर, मधु, घृत, तिल और अन्नादि सामग्रियोंसे आहुति दे ॥ ६० ॥

अथवा एकाग्रचित्तसे गायत्री मन्त्रद्वारा हवन करे; क्योंकि तत्त्वतः यह महापुराण गायत्रीस्वरूप ही है ॥६१ ॥ होम करनेकी शक्ति न हो तो उसका फल प्राप्त करनेके लिये

ब्राह्मणोंको हवनसामग्री दान करे तथा नाना प्रकारकी त्रुटियोंको दूर करनेके लिये और विधिमें फिर जो न्यूनाधिकता रह गयी हो, उसके दोषोंकी शान्तिके लिये विष्णुसहस्रनामका पाठ करे । उससे सभी कर्म सफल हो जाते हैं; क्योंकि कोई भी कर्म इससे बढ़कर नहीं है ॥६२-६३ ॥ फिर बारह ब्राह्मणोंको खीर और मधु आदि उत्तम उत्तम पदार्थ खिलाये तथा व्रतकी पूर्तिके लिये गौ और सुवर्णका दान करे ॥ ६४ ॥ सामर्थ्य हो तो तीन तोले सोनेका एक

सिंहासन बनवाये, उसपर सुन्दर अक्षरोंमें लिखी हुई श्रीमद्भागवतकी पोथी रखकर उसकी आवाहनादि विविध उपचारोंसे पूजा करे और फिर जितेन्द्रिय आचार्यको –— उसका वस्त्र, आभूषण एवं गन्धादिसे पूजनकर - दक्षिणाके सहित समर्पण कर दे ॥६५-६६ ॥ यों करनेसे वह बुद्धिमान् दाता जन्म - मरणके बन्धनों से मुक्त हो जाता है । यह सप्ताहपारायणकी विधि सब पापोंकी निवृत्ति करनेवाली है । इसका इस प्रकार ठीक - ठीक पालन करनेसे यह मंगलमय भागवतपुराण अभीष्ट फल प्रदान करता है तथा अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष - चारोंकी प्राप्तिका साधन हो जाता है — इसमें सन्देह नहीं ॥६७-६८ ॥ आचार्याय सुधीर्दत्त्वा मुक्तः स्याद्भवबन्धनैः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 147

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एवं कृते विधाने च सर्वपापनिवारणे ॥६७

फलदं स्यात्पुराणं तु श्रीमद्भागवतं शुभम् ।

धर्मकामार्थमोक्षाणां साधनं स्यान्न संशयः ॥६८

कुमारा ऊचुः

इति ते कथितं सर्वं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।

श्रीमद्भागवतेनैव भुक्तिमुक्ती करे स्थिते ॥६९

सूत उवाच

इत्युक्त्वा ते महात्मानः प्रोचुर्भागवतीं कथाम् ।

सर्वपापहरां पुण्यां भुक्तिमुक्तिप्रदायिनीम् ॥७०

शृण्वतां सर्वभूतानां सप्ताहं नियतात्मनाम् ।

यथाविधि ततो देवं तुष्टुवुः पुरुषोत्तमम् ॥७१

तदन्ते ज्ञानवैराग्यभक्तीनां पुष्टता परा ।

तारुण्यं परमं चाभूत्सर्वभूतमनोहरम् ॥७२

नारदश्च कृतार्थोऽभूत्सिद्धे स्वीये मनोरथे ।

पुलकीकृतसर्वाङ्गः परमानन्दसम्भृतः ॥७३

एवं कथां समाकर्ण्य नारदो भगवत्प्रियः ।

प्रेमगद्गदया वाचा तानुवाच कृताञ्जलिः ॥७४

नारद उवाच

धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि भवद्भिः करुणापरैः ।

अद्य मे भगवाल्लँब्धः सर्वपापहरो हरिः ॥ ७५

श्रवणं सर्वधर्मेभ्यो वरं मन्ये तपोधनाः ।

वैकुण्ठस्थो यतः कृष्णः श्रवणाद्यस्य लभ्यते ॥७६

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पृष्ठ 148

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सनकादि कहते हैं — नारदजी! इस प्रकार तुम्हें यह सप्ताह श्रवणकी विधि हमने पूरी-पूरी सुना दी, अब और क्या सुनना चाहते हो? इस श्रीमद्भागवतसे भोग और मोक्ष दोनों ही हाथ लग जाते हैं ॥६९ ॥

सूतजी कहते हैं— शौनकजी! यों कहकर महामुनि सनकादिने एक सप्ताहतक विधिपूर्वक इस सर्वपापनाशिनी, परम पवित्र तथा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली भागवतकथाका प्रवचन किया । सब प्राणियोंने नियमपूर्वक इसे श्रवण किया । इसके पश्चात् उन्होंने विधिपूर्वक भगवान पुरुषोत्तमकी स्तुति की ॥७०-७१ ॥ कथाके अन्तमें ज्ञान, वैराग्य और भक्तिको बड़ी पुष्टि मिली और वे तीनों एकदम तरुण होकर सब जीवोंका चित्त अपनी ओर आकर्षित करने लगे ॥७२ ॥ अपना मनोरथ पूरा होनेसे नारदजीको भी बड़ी प्रसन्नता

हुई, उनके सारे शरीरमें रोमाञ्च हो आया और वे परमानन्दसे पूर्ण हो गये ॥७३ ॥ इस प्रकार

कथा श्रवणकर भगवान्‌के प्यारे नारदजी हाथ जोड़कर प्रेमगद्गद वाणीसे सनकादिसे कहने लगे ॥७४ ॥

नारदजीने कहा — मैं धन्य हूँ, आपलोगोंने करुणा करके मुझे बड़ा ही अनुगृहीत किया है, आज मुझे सर्वपापहारी भगवान् श्रीहरिकी ही प्राप्ति हो गयी ॥७५ ॥ तपोधनो! मैं

श्रीमद्भागवतश्रवणको ही सब धर्मोंसे श्रेष्ठ मानता हूँ; क्योंकि जिसके श्रवणसे वैकुण्ठ ( गोलोक ) - विहारी श्रीकृष्णकी प्राप्ति होती है ॥७६ ॥

सूत उवाच

एवं ब्रुवति वै तत्र नारदे वैष्णवोत्तमे ।

परिभ्रमन् समायातः शुको योगेश्वरस्तदा ॥७७

तत्राययौ षोडशवार्षिकस्तदा व्यासात्मजो ज्ञानमहाब्धिचन्द्रमाः । कथावसाने निजलाभपूर्णः प्रेम्णा पठन् भागवतं शनैः शनैः ॥७८ दृष्ट्वा सदस्याः परमोरुतेजसं सद्यः समुत्थाय ददुर्महासनम् । प्रीत्या सुरर्षिस्तमपूजयत्सुखं स्थितोऽवदत्संशृणुतामलां गिरम् ॥ ७ ९ श्रीशुक उवाच निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 149

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पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ॥८० धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम् श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किं वा परैरीश्वरः सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ॥८१ श्रीमद्भागवतं पुराणतिलकं यद्वैष्णवानां धनं यस्मिन् पारमहंस्यमेवममलं ज्ञानं परं गीयते । यत्र ज्ञानविरागभक्तिसहितं नैष्कर्म्यमाविष्कृतं तच्छृण्वन् प्रपठन् विचारणपरो भक्त्या विमुच्येन्नरः ॥८२

स्वर्गे सत्ये च कैलासे वैकुण्ठे नास्त्ययं रसः ।

अतः पिबन्तु सद्भाग्या मा मा मुञ्चत कर्हिचित् ॥८३

सूतजी कहते हैं— शौनकजी! वैष्णवश्रेष्ठ नारदजी यों कह ही रहे थे कि वहाँ घूमते-फिरते योगेश्वर शुकदेवजी आ गये ॥ ७७ ॥ कथा समाप्त होते ही व्यासनन्दन श्रीशुकदेवजी

वहाँ पधारे । सोलह वर्षकी - सी आयु, आत्मलाभसे पूर्ण, ज्ञानरूपी महासागरका संवर्धन करनेके लिये चन्द्रमाके समान वे प्रेमसे धीरे - धीरे श्रीमद्भागवतका पाठ कर रहे थे ॥७८ ॥

परम तेजस्वी शुकदेवजीको देखकर सारे सभासद् झटपट खड़े हो गये और उन्हें एक ऊँचे आसनपर बैठाया । फिर देवर्षि नारदजीने उनका प्रेमपूर्वक पूजन किया । उन्होंने सुखपूर्वक बैठकर कहा — ‘ आपलोग मेरी निर्मल वाणी सुनिये ' ॥७९ ॥

श्रीशुकदेवजी बोले –- रसिक एवं भावुक जन! यह श्रीमद्भागवत वेदरूप कल्पवृक्षका परिपक्व फल है । श्रीशुकदेवरूप शुकके मुखका संयोग होनेसे अमृतरससे परिपूर्ण है । यह रस- - ही - रस है - इसमें न छिलका है न गुठली । यह इसी लोकमें सुलभ है । जबतक शरीरमें चेतना रहे तबतक आपलोग बार - बार इसका पान करें || ८० || महामुनि व्यासदेवने श्रीमद्भागवतमहापुराणकी रचना की है । इसमें निष्कपट - निष्काम परम धर्मका निरूपण है । इसमें शुद्धान्तःकरण सत्पुरुषोंके जानने योग्य कल्याणकारी वास्तविक वस्तुका वर्णन है, ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 150

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जिससे तीनों तापोंकी शान्ति होती है । इसका आश्रय लेनेपर दूसरे शास्त्र अथवा साधनकी आवश्यकता नहीं रहती । जब कभी पुण्यात्मा पुरुष इसके श्रवणकी इच्छा करते हैं, तभी ईश्वर अविलम्ब उनके हृदयमें अवरुद्ध हो जाता है ॥ ८१ ॥ यह भागवत पुराणोंका तिलक

और वैष्णवोंका धन है । इसमें परमहंसोंके प्राप्य विशुद्ध ज्ञानका ही वर्णन किया गया है; तथा ज्ञान, वैराग्य और भक्तिके सहित निवृत्तिमार्गको प्रकाशित किया गया है । जो पुरुष भक्तिपूर्वक इसके श्रवण, पठन और मननमें तत्पर रहता है, वह मुक्त हो जाता है ॥८२ ॥ यह

रस स्वर्गलोक, सत्यलोक, कैलास और वैकुण्ठमें भी नहीं है । इसलिये भाग्यवान् श्रोताओ! तुम इसका खूब पान करो; इसे कभी मत छोड़ो, मत छोड़ो ॥८३ ॥

सूत उवाच एवं ब्रुवाणे सति बादरायणौ

मध्ये सभायां हरिराविरासीत् ।

प्रह्लादबल्युद्धवफाल्गुनादिभि-वृतः सुरर्षिस्तमपूजयच्च तान् ॥८४

दृष्ट्वा प्रसन्नं महदासने हरिं ते चक्रिरे कीर्तनमग्रतस्तदा । भवो भवान्या कमलासनस्तु तत्रागमत्कीर्तनदर्शनाय ॥८५ प्रह्रादस्तालधारी तरलगतितया चोद्धवः कांस्यधारी वीणाधारी सुरर्षिः स्वरकुशलतया रागकर्तार्जुनोऽभूत् । इन्द्रोऽवादीन्मृदङ्गं जयजयसुकराः कीर्तने ते कुमारा यत्राग्रे भाववक्ता सरसरचनया व्यासपुत्रो बभूव ॥८६ नर्त मध्ये त्रिकमेव तत्र भक्त्यादिकानां नटवत्सुतेजसाम् । अलौकिकं कीर्तनमेतदीक्ष्य हरिः प्रसन्नोऽपि वचोऽब्रवीत्तत् ॥८७ मत्तो वरं भाववृताद् वृणुध्वं प्रीतः कथाकीर्तनतोऽस्मि साम्प्रतम् । श्रुत्वेति तद्वाक्यमतिप्रसन्नाः ****** ebook converter DEMO Watermarks *******