श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 151–160

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 151–160

पृष्ठ 151

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प्रेमार्द्रचित्ता हरिमूचिरे ते ॥८८

नगाहगाथासु च सर्वभक्तै-रेभिस्त्वया भाव्यमिति प्रयत्नात् ।

मनोरथोऽयं परिपूरणीय-स्तथेति चोक्त्वान्तरधीयताच्युतः ॥ ८ ९

सूतजी कहते हैं - श्रीशुकदेवजी इस प्रकार कह ही रहे थे कि उस सभाके बीचोबीच प्रह्लाद, बलि, उद्धव और अर्जुन आदि पार्षदोंके सहित साक्षात् श्रीहरि प्रकट हो गये । तब देवर्षि नारदने भगवान् और उनके भक्तोंकी यथोचित पूजा की ॥८४ ॥

भगवान्‌को प्रसन्न देखकर देवर्षिने उन्हें एक विशाल सिंहासनपर बैठा दिया और सब लोग उनके सामने संकीर्तन करने लगे । उस कीर्तनको देखनेके लिये श्रीपार्वतीजीके सहित महादेवजी और ब्रह्माजी भी आये ॥ ८५ ॥

कीर्तन आरम्भ हुआ । प्रह्लादजी तो चंचलगति ( फुर्तीले ) होनेके कारण करताल बजाने लगे, उद्धवजीने झाँझें उठा लीं, देवर्षि नारद वीणाकी ध्वनि करने लगे, स्वर - विज्ञान ( गान-विद्या ) में कुशल होनेके कारण अर्जुन राग अलापने लगे, इन्द्रने मृदंग बजाना आरम्भ किया, सनकादि बीच - बीचमें जयघोष करने लगे और इन सबके आगे शुकदेवजी तरह - तरहकी सरस अंगभंगी करके भाव बताने लगे ॥ ८६ ॥

इन सबके बीचमें परम तेजस्वी भक्ति, ज्ञान और वैराग्य नटोंके समान नाचने लगे । ऐसा अलौकिक कीर्तन देखकर भगवान् प्रसन्न हो गये और इस प्रकार कहने लगे- ॥८७ ॥

‘ मैं तुम्हारी इस कथा और कीर्तनसे बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हारे भक्तिभावने इस समय मुझे अपने वशमें कर लिया है । अतः तुमलोग मुझसे वर माँगो ' । भगवान्‌के ये वचन सुनकर सब लोग बड़े प्रसन्न हुए और प्रेमार्द्रचित्तसे भगवान्से कहने लगे ॥८८ ॥

‘ भगवन्! हमारी यह अभिलाषा है कि भविष्यमें भी जहाँ - कहीं सप्ताह- कथा हो, वहाँ आप इन पार्षदोंके सहित अवश्य पधारें । हमारा यह मनोरथ पूर्ण कर दीजिये ' । भगवान् ‘ तथास्तु ' कहकर अन्तर्धान हो गये ॥८९ ॥

ततोऽनमत्तच्चरणेषु नारद-स्तथा शुकादीनपि तापसांश्च । अथ प्रहृष्टाः परिनष्टमोहाः सर्वे ययुः पीतकथामृतास्ते ॥९ ० भक्तिः सुताभ्यां सह रक्षिता सा

शास्त्रे स्वकीयेऽपि तदा शुकेन ।

अतो हरिर्भागवतस्य सेवना-च्चित्तं समायाति हि वैष्णवानाम् ॥९ १

दारिद्रयदुःखज्वरदाहितानां

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मायापिशाचीपरिमर्दितानाम् । संसारसिन्धौ परिपातितानां क्षेमाय वै भागवतं प्रगर्जति ॥९ २ शौनक उवाच

शुकेनोक्तं कदा राज्ञे गोकर्णेन कदा पुनः ।

सुरर्षये कदा ब्राह्मैश्छिन्धि मे संशयं त्विमम् ॥९ ३

सूत उवाच

आकृष्णनिर्गमात्रिंशद्वर्षाधिकगते कलौ ।

नवमीतो नभस्ये च कथारम्भं शुकोऽकरोत् ॥९ ४

परीक्षिच्छ्रवणान्ते च कलौ वर्षशतद्वये ।

शुद्धे शुचौ नवम्यां च धेनुजोऽकथयत्कथाम् ॥९ ५

तस्मादपि कलौ प्राप्ते त्रिंशद्वर्षगते सति ।

ऊचुरूर्जे सिते पक्षे नवम्यां ब्रह्मणः सुताः ॥ ९ ६

इत्येतत्ते समाख्यातं यत्पृष्टोऽहं त्वयानघ ।

कलौ भागवती वार्ता भवरोगविनाशिनी ॥९ ७

कृष्णप्रियं सकलकल्मषनाशनं च मुक्त्येकहेतुमिह भक्तिविलासकारि । सन्तः कथानकमिदं पिबतादरेण लोके हि तीर्थपरिशीलनसेवया किम् ॥९ ८ इसके पश्चात् नारदजीने भगवान् तथा उनके पार्षदोंके चरणोंको लक्ष्य करके प्रणाम किया और फिर शुकदेवजी आदि तपस्वियोंको भी नमस्कार किया । कथामृतका पान करनेसे सब लोगोंको बड़ा ही आनन्द हुआ, उनका सारा मोह नष्ट हो गया । फिर वे सब लोग अपने-अपने स्थानोंको चले गये ॥ ९ ० ॥ उस समय शुकदेवजीने भक्तिको उसके पुत्रोंसहित अपने शास्त्रमें स्थापित कर दिया । इसीसे भागवतका सेवन करनेसे श्रीहरि वैष्णवोंके हृदयमें आ विराजते हैं ॥९ १ ॥ जो लोग दरिद्रताके दुःखज्वरकी ज्वालासे दग्ध हो रहे हैं, जिन्हें माया-पिशाचीने रौंद डाला है तथा जो संसारसमुद्रमें डूब रहे हैं, उनका कल्याण करनेके लिये श्रीमद्भागवत सिंहनाद कर रहा है ॥९ २ ॥ शौनकजीने पूछा — सूतजी! शुकदेवजीने राजा परीक्षित्को, गोकर्णने धुन्धुकारीको और सनकादिने नारदजीको किस - किस समय यह ग्रन्थ सुनाया था - मेरा यह संशय दूर

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कीजिये! ॥९ ३ ॥ सूतजीने कहा — भगवान् श्रीकृष्णके स्वधामगमनके बाद कलियुगके तीस वर्षसे कुछ अधिक बीत जानेपर भाद्रपद मासकी शुक्ला नवमीको शुकदेवजीने कथा आरम्भ की थी ॥९ ४ ॥ राजा परीक्षित्के कथा सुननेके बाद कलियुगके दो सौ वर्ष बीत जानेपर आषाढ़ मासकी शुक्ला नवमीको गोकर्णजीने यह कथा सुनायी थी ॥ ९ ५ ॥ इसके पीछे कलियुगके तीस वर्ष और निकल जानेपर कार्तिक शुक्ला नवमीसे सनकादिने कथा आरम्भ की

थी ॥९ ६ ॥ निष्पाप शौनकजी! आपने जो कुछ पूछा था, उसका उत्तर मैंने आपको दे दिया ।

इस कलियुगमें भागवतकी कथा भवरोगकी रामबाण औषध है ॥ ९ ७ ॥

संतजन! आपलोग आदरपूर्वक इस कथामृतका पान कीजिये । यह श्रीकृष्णको अत्यन्त प्रिय, सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला मुक्तिका एकमात्र कारण और भक्तिको बढ़ानेवाला है । लोकमें अन्य कल्याणकारी साधनोंका विचार करने और तीर्थोंका सेवन करनेसे क्या होगा ॥९ ८ ॥ स्वपुरुषमपि वीक्ष्य पाशहस्तं वदति यमः किल तस्य कर्णमूले । परिहर भगवत्कथासु मत्तान् प्रभुरहमन्यनृणां न वैष्णवानाम् ॥९९ असारे संसारे विषयविषसङ्गाकुलधियः क्षणार्धं क्षेमार्थं पिबत शुकगाथातुलसुधाम् । किमर्थं व्यर्थं भो व्रजत कुपथे कुत्सितकथे परीक्षित्साक्षी यच्छ्रवणगतमुक्त्युक्तिकथने ॥१००

रसप्रवाहसंस्थेन श्रीशुकेनेरिता कथा ।

कण्ठे सम्बध्यते येन स वैकुण्ठप्रभुर्भवेत् ॥१०१

इति च परमगुह्यं सर्वसिद्धान्तसिद्धं सपदि निगदितं ते शास्त्रपुञ्जं विलोक्य । जगति शुककथातो निर्मलं नास्ति किञ्चित् पिब परसुखहेतोर्द्वादशस्कन्धसारम् ॥ १०२ एतां यो नियततया शृणोति भक्त्या यश्चैनां कथयति शुद्धवैष्णवाग्रे । तौ सम्यग्विधिकरणात्फलं लभेते याथार्थ्यान्न हि भुवने किमप्यसाध्यम् ॥१०३ अपने दूतको हाथमें पाश लिये देखकर यमराज उसके कानमें कहते हैं — ‘ देखो, जो भगवान्की कथा - वार्तामें मत्त हो रहे हों, उनसे दूर रहना; मैं औरोंको ही दण्ड देनेकी शक्ति

पृष्ठ 154

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रखता हूँ, वैष्णवोंको नहीं ' ॥९९ ॥

इस असार संसारमें विषयरूप विषकी आसक्तिके कारण व्याकुल बुद्धिवाले पुरुषो! अपने कल्याणके उद्देश्यसे आधे क्षणके लिये भी इस शुककथारूप अनुपम सुधाका पान करो । प्यारे भाइयो! निन्दित कथाओंसे युक्त कुपथमें व्यर्थ ही क्यों भटक रहे हो? इस कथाके कानमें प्रवेश करते ही मुक्ति हो जाती है, इस बातके साक्षी राजा परीक्षित् हैं ॥ १०० ॥

श्रीशुकदेवजीने प्रेमरसके प्रवाह में स्थित होकर इस कथाको कहा था । इसका जिसके कण्ठसे सम्बन्ध हो जाता है, वह वैकुण्ठका स्वामी बन जाता है ॥ १०१ ॥ शौनकजी! मैंने

अनेक शास्त्रोंको देखकर आपको यह परम गोप्य रहस्य अभी - अभी सुनाया है । सब शास्त्रोंके सिद्धान्तोंका यही निचोड़ है । संसारमें इस शुकशास्त्रसे अधिक पवित्र और कोई वस्तु नहीं है; अतः आपलोग परमानन्दकी प्राप्तिके लिये इस द्वादशस्कन्धरूप रसका पान करें ॥ १०२ ॥

जो पुरुष नियमपूर्वक इस कथाका भक्तिभावसे श्रवण करता है और जो शुद्धान्तःकरण भगवद्भक्तोंके सामने इसे सुनाता है, वे दोनों ही विधिका पूरा - पूरा पालन करनेके कारण इसका यथार्थ फल पाते हैं— उनके लिये त्रिलोकीमें कुछ भी असाध्य नहीं रह जाता ॥ १०३ ॥

इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखण्डे श्रीमद्भागवतमाहात्म्ये श्रवणविधिकथनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६ ॥

॥ समाप्तमिदं श्रीमद्भागवतमाहात्म्यम् ॥ ॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥ ॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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॥ ॐ तत्सत् ॥ ॥ श्रीगणेशायः नमः ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराणम् प्रथमः स्कन्धः अथ प्रथमोऽध्यायः श्रीसूतजीसे शौनकादि ऋषियोंका प्रश्न मङ्गलाचरण जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरत-श्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट् तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूरयः । तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि ॥१ धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम् । श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किं वा परैरीश्वरः सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ॥२ जिससे इस जगत्की सृष्टि, स्थिति और प्रलय होते हैं — क्योंकि वह सभी सद्रूप पदार्थोंमें अनुगत है और असत् पदार्थोंसे पृथक् है; जड नहीं, चेतन है; परतन्त्र नहीं, स्वयंप्रकाश है; जो ब्रह्मा अथवा हिरण्यगर्भ नहीं, प्रत्युत उन्हें अपने संकल्पसे ही जिसने उस वेदज्ञानका दान

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किया है; जिसके सम्बन्धमें बड़े - बड़े विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं; जैसे तेजोमय सूर्यरश्मियोंमें जलका, जलमें स्थलका और स्थलमें जलका भ्रम होता है, वैसे ही जिसमें यह त्रिगुणमयी जाग्रत् - स्वप्न सुषुप्तिरूपा सृष्टि मिथ्या होनेपर भी अधिष्ठान - सत्तासे सत्यवत् प्रतीत हो रही है, उस अपनी स्वयंप्रकाश ज्योतिसे सर्वदा और सर्वथा माया और मायाकार्यसे पूर्णतः मुक्त रहनेवाले परम सत्यरूप परमात्माका हम ध्यान करते हैं || १ || महामुनि व्यासदेवके द्वारा निर्मित इस श्रीमद्भागवतमहापुराणमें मोक्षपर्यन्त फलकी कामनासे रहित परम धर्मका निरूपण हुआ है । इसमें शुद्धान्तःकरण सत्पुरुषोंके जाननेयोग्य उस वास्तविक वस्तु परमात्माका निरूपण हुआ है, जो तीनों तापोंका जड़से नाश करनेवाली और परम कल्याण देनेवाली है । अब और किसी साधन या शास्त्रसे क्या प्रयोजन । जिस समय भी सुकृती पुरुष इसके श्रवणकी इच्छा करते हैं, ईश्वर उसी समय अविलम्ब उनके हृदयमें आकर बन्दी बन जाता है ॥२ ॥

निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम् । पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ॥३ रसके मर्मज्ञ भक्तजन! यह श्रीमद्भागवत वेदरूप कल्पवृक्षका पका हुआ फल है । श्रीशुकदेवरूप तोतेके * मुखका सम्बन्ध हो जानेसे यह परमानन्दमयी सुधासे परिपूर्ण हो गया है । इस फलमें छिलका, गुठली आदि त्याज्य अंश तनिक भी नहीं है । यह मूर्तिमान् रस है ।

जबतक शरीरमें चेतना रहे, तबतक इस दिव्य भगवद्रसका निरन्तर बार - बार पान करते रहो ।

यह पृथ्वीपर ही सुलभ है ॥३ ॥

कथाप्रारम्भ

नैमिषेऽनिमिषक्षेत्रे ऋषयः शौनकादयः ।

सत्रं स्वर्गाय लोकाय सहस्रसममासत ॥ ४

त एकदा तु मुनयः प्रातर्हुतहुताग्नयः ।

सत्कृतं सूतमासीनं पप्रच्छुरिदमादरात् ॥५

ऋषय ऊचुः त्वया खलु पुराणानि सेतिहासानि चानघ आख्यातान्यप्यधीतानि धर्मशास्त्राणि यान्युत ॥६

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यानि वेदविदां श्रेष्ठो भगवान् बादरायणः ।

अन्ये च मुनयः सूत परावरविदो विदुः ॥७

वेत्थ त्वं सौम्य तत्सर्वं तत्त्वतस्तदनुग्रहात् ।

ब्रूयुः स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवो गुह्यमप्युत ॥८

तत्र तत्राञ्जसाऽऽयुष्मन् भवता यद्विनिश्चितम् ।

पुंसामेकान्ततः श्रेयस्तन्नः शंसितुमर्हसि ॥९

प्रायेणाल्पायुषः सभ्य कलावस्मिन् युगे जनाः ।

मन्दाः सुमन्दमतयो मन्दभाग्या ह्युपद्रुताः ॥ १०

एक बार भगवान् विष्णु एवं देवताओंके परम पुण्यमय क्षेत्र नैमिषारण्यमें शौनकादि ऋषियोंने भगवत्प्राप्तिकी इच्छासे सहस्र वर्षोंमें पूरे होनेवाले एक महान् यज्ञका अनुष्ठान किया ॥४ ॥ एक दिन उन लोगोंने प्रातःकाल अग्निहोत्र आदि नित्यकृत्योंसे निवृत्त होकर

सूतजीका पूजन किया और उन्हें ऊँचे आसनपर बैठाकर बड़े आदरसे यह प्रश्न किया ॥५ ॥

ऋषियोंने कहा – सूतजी! आप निष्पाप हैं । आपने समस्त इतिहास, पुराण और धर्मशास्त्रोंका विधिपूर्वक अध्ययन किया है तथा उनकी भलीभाँति व्याख्या भी की है ॥६ ॥

वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवान् बादरायणने एवं भगवान्के सगुण - निर्गुण रूपको जाननेवाले दूसरे मुनियोंने जो कुछ जाना है - उन्हें जिन विषयोंका ज्ञान है, वह सब आप वास्तविक रूपमें जानते हैं । आपका हृदय बड़ा ही सरल और शुद्ध है, इसीसे आप उनकी कृपा और अनुग्रहके पात्र हुए हैं । गुरुजन अपने प्रेमी शिष्यको गुप्त से - गुप्त बात भी बता दिया करते हैं ॥७-८ ॥ आयुष्मन्! आप कृपा करके यह बतलाइये कि उन सब शास्त्रों, पुराणों और गुरुजनोंके उपदेशोंमें कलियुगी जीवोंके परम कल्याणका सहज साधन आपने क्या निश्चय किया है ॥९ ॥ आप संत - समाजके भूषण हैं । इस कलियुगमें प्रायः लोगोंकी आयु कम हो गयी है ।

साधन करनेमें लोगोंकी रुचि और प्रवृत्ति भी नहीं है । लोग आलसी हो गये हैं । उनका भाग्य तो मन्द है ही, समझ भी थोड़ी है । इसके साथ ही वे नाना प्रकारकी विघ्न - बाधाओंसे घिरे हुए भी रहते हैं ॥१० ॥ शास्त्र भी बहुत - से हैं । परन्तु उनमें एक निश्चित साधनका नहीं, अनेक

प्रकारके कर्मोंका वर्णन है । साथ ही वे इतने बड़े हैं कि उनका एक अंश सुनना भी कठिन है । आप परोपकारी हैं । अपनी बुद्धिसे उनका सार निकालकर प्राणियोंके परम कल्याणके लिये हम श्रद्धालुओंको सुनाइये, जिससे हमारे अन्तःकरणकी शुद्धि प्राप्त हो ॥११ ॥

भूरीणि भूरिकर्माणि श्रोतव्यानि विभागशः ।

अतः साधोऽत्र यत्सारं समुद्धृत्य मनीषया ।

ब्रूहि नः श्रद्दधानानां येनात्मा सम्प्रसीदति ॥ ११

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पृष्ठ 158

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सूत जानासि भद्रं ते भगवान् सात्वतां पतिः ।

देवक्यां वसुदेवस्य जातो यस्य चिकीर्षया ॥१२

तन्नः शुश्रूषमाणानामर्हस्यङ्गानुवर्णितुम् ।

यस्यावतारो भूतानां क्षेमाय च भवाय च ॥१३

आपन्नः संसृतिं घोरां यन्नाम विवशो गृणन् ।

ततः सद्यो विमुच्येत यद्बिभेति स्वयं भयम् ॥१४

यत्पादसंश्रयाः सूत मुनयः प्रशमायनाः ।

सद्यः पुनन्त्युपस्पृष्टाः स्वर्धुन्यापोऽनुसेवया ॥ १५

को वा भगवतस्तस्य पुण्यश्लोकेड्यकर्मणः ।

शुद्धिकामो न शृणुयाद्यशः कलिमलापहम् ॥१६

तस्य कर्माण्युदाराणि परिगीतानि सूरिभिः ।

ब्रूहि नः श्रद्दधानानां लीलया दधतः कलाः ॥ १७

अथाख्याहि हरेर्धीमन्नवतारकथाः शुभाः ।

लीला विदधतः स्वैरमीश्वरस्यात्ममायया ॥१८

वयं तु न वितृप्याम उत्तमश्लोकविक्रमे ।

यच्छृण्वतां रसज्ञानां स्वादु स्वादु पदे पदे ॥१९

प्यारे सूतजी! आपका कल्याण हो । आप तो जानते ही हैं कि यदुवंशियोंके रक्षक भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण वसुदेवकी धर्मपत्नी देवकीके गर्भसे क्या करनेकी इच्छासे अवतीर्ण हुए थे ॥१२ ॥ हम उसे सुनना चाहते हैं । आप कृपा करके हमारे लिये उसका वर्णन

कीजिये; क्योंकि भगवान्‌का अवतार जीवोंके परम कल्याण और उनकी भगवत्प्रेममयी समृद्धिके लिये ही होता है ॥१३ ॥ यह जीव जन्म - मृत्युके घोर चक्रमें पड़ा हुआ है - इस

स्थितिमें भी यदि वह कभी भगवान्के मंगलमय नामका उच्चारण कर ले तो उसी क्षण उससे मुक्त हो जाय; क्योंकि स्वयं भय भी भगवान्से डरता रहता है ॥१४ ॥ सूतजी! परम विरक्त

और परम शान्त मुनिजन भगवान्‌के श्रीचरणोंकी शरणमें ही रहते हैं, अतएव उनके स्पर्शमात्रसे संसारके जीव तुरन्त पवित्र हो जाते हैं । इधर गंगाजीके जलका बहुत दिनोंतक सेवन किया जाय, तब कहीं पवित्रता प्राप्त होती है ॥ १५ ॥ ऐसे पुण्यात्मा भक्त जिनकी

लीलाओंका गान करते रहते हैं, उन भगवान्का कलिमलहारी पवित्र यश भला आत्मशुद्धिकी

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इच्छावाला ऐसा कौन मनुष्य होगा, जो श्रवण न करे ॥ १६ ॥ वे लीलासे ही अवतार धारण

करते हैं । नारदादि महात्माओंने उनके उदार कर्मोंका गान किया है । हम श्रद्धालुओंके प्रति आप उनका वर्णन कीजिये ॥१७ ॥

बुद्धिमान् सूतजी! सर्वसमर्थ प्रभु अपनी योगमायासे स्वच्छन्द लीला करते हैं । आप उन श्रीहरिकी मंगलमयी अवतार कथाओंका अब वर्णन कीजिये ॥१८ ॥ पुण्यकीर्ति भगवान्की

लीला सुननेसे हमें कभी भी तृप्ति नहीं हो सकती; क्योंकि रसज्ञ श्रोताओंको पद - पदपर भगवान्की लीलाओंमें नये - नये रसका अनुभव होता है ॥ १ ९ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण अपनेको छिपाये हुए थे, लोगोंके सामने ऐसी चेष्टा करते थे मानो कोई मनुष्य हों । परन्तु उन्होंने बलरामजीके साथ ऐसी लीलाएँ भी की हैं, ऐसा पराक्रम भी प्रकट किया है, जो मनुष्य नहीं कर सकते ॥२० ॥ कलियुगको आया जानकर इस वैष्णवक्षेत्रमें हम दीर्घकालीन सत्रका

संकल्प करके बैठे हैं । श्रीहरिकी कथा सुननेके लिये हमें अवकाश प्राप्त है ॥ २१ ॥ यह

कलियुग अन्तःकरणकी पवित्रता और शक्तिका नाश करनेवाला है । इससे पार पाना कठिन है । जैसे समुद्रसे पार जानेवालोंको कर्णधार मिल जाय, उसी प्रकार इससे पार पानेकी इच्छा रखनेवाले हम लोगोंसे ब्रह्माने आपको मिलाया है ॥२२ ॥ धर्मरक्षक, ब्राह्मणभक्त, योगेश्वर

भगवान् श्रीकृष्णके अपने धाममें पधार जानेपर धर्मने अब किसकी शरण ली है — यह बताइये ॥२३ ॥

कृतवान् किल वीर्याणि सह रामेण केशवः ।

अतिमर्त्यानि भगवान् गूढः कपटमानुषः ॥२०

कलिमागतमाज्ञाय क्षेत्रेऽस्मिन् वैष्णवे वयम् ।

आसीना दीर्घसत्रेण कथायां सक्षणा हरेः ॥२१

त्वं नः संदर्शितो धात्रा दुस्तरं निस्तितीर्षताम् ।

कलिं सत्त्वहरं पुंसां कर्णधार इवार्णवम् ॥२२

ब्रूहि योगेश्वरे कृष्णे ब्रह्मण्ये धर्मवर्मणि ।

स्वां काष्ठामधुनोपेते धर्मः कं शरणं गतः ॥२३

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे नैमिषीयोपाख्याने प्रथमोऽध्यायः ॥१ ॥

* यह प्रसिद्ध है कि तोतेका काटा हुआ फल अधिक मीठा होता है ।

पृष्ठ 160

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