श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1571–1580

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1571–1580

पृष्ठ 1571

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यदृच्छयोपपन्नेन संतुष्टो वर्तते सुखम् ।

नासंतुष्टस्त्रिभिर्लोकैरजितात्मोपसादितैः ॥२४

पुंसोऽयं संसृतेर्हेतुरसंतोषोऽर्थकामयोः ।

यदृच्छयोपपन्नेन संतोषो मुक्तये स्मृतः ॥ २५

यदृच्छालाभतुष्टस्य तेजो विप्रस्य वर्धते ।

तत् प्रशाम्यत्यसंतोषादम्भसेवाशुशुक्षणिः ॥ २६

तस्मात् त्रीणि पदान्येव वृणे त्वद् वरदर्षभात् ।

एतावतैव सिद्धोऽहं वित्तं यावत्प्रयोजनम् ॥ २७

ब्रह्मचारीजी! जो एक बार कुछ माँगनेके लिये मेरे पास आ गया, उसे फिर कभी किसीसे कुछ माँगनेकी आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिये । अतः अपनी जीविका चलानेके लिये तुम्हें जितनी भूमिकी आवश्यकता हो, उतनी मुझसे माँग लो ॥२० ॥

श्रीभगवान्ने कहा — राजन्! संसारके सब - के - सब प्यारे विषय एक मनुष्यकी कामनाओंको भी पूर्ण करनेमें समर्थ नहीं हैं, यदि वह अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला-सन्तोषी न हो ॥ २१ ॥

जो तीन पग भूमिसे सन्तोष नहीं कर लेता, उसे नौ वर्षोंसे युक्त एक द्वीप भी दे दिया जाय तो भी वह सन्तुष्ट नहीं हो सकता । क्योंकि उसके मनमें सातों द्वीप पानेकी इच्छा बनी ही रहेगी ॥२२ ॥

मैंने सुना है कि पृथु, गय आदि नरेश सातों द्वीपोंके अधिपति थे; परन्तु उतने धन और भोगकी सामग्रियोंके मिलनेपर भी वे तृष्णाका पार न पा सके ॥२३ ॥

जो कुछ प्रारब्धसे मिल जाय, उसीसे सन्तुष्ट हो रहनेवाला पुरुष अपना जीवन सुखसे व्यतीत करता है । परन्तु अपनी इन्द्रियोंको वशमें न रखनेवाला तीनों लोकोंका राज्य पानेपर भी दुःखी ही रहता है । क्योंकि उसके हृदयमें असन्तोषकी आग धधकती रहती है ॥२४ ॥

धन और भोगोंसे सन्तोष न होना ही जीवके जन्म - मृत्युके चक्कर में गिरनेका कारण है ।

तथा जो कुछ प्राप्त हो जाय, उसीमें सन्तोष कर लेना मुक्तिका कारण है ॥२५ ॥

जो ब्राह्मण स्वयंप्राप्त वस्तुसे ही सन्तुष्ट हो रहता है, उसके तेजकी वृद्धि होती है । उसके असन्तोषी हो जानेपर उसका तेज वैसे ही शान्त हो जाता है जैसे जलसे अग्नि ॥२६ ॥

इसमें सन्देह नहीं कि आप मुँहमाँगी वस्तु देनेवालोंमें शिरोमणि हैं । इसलिये मैं आपसे केवल तीन पग भूमि ही माँगता हूँ । इतनेसे ही मेरा काम बन जायगा । धन उतना ही संग्रह करना चाहिये, जितनेकी आवश्यकता हो ॥२७ ॥

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पृष्ठ 1572

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श्रीशुक उवाच

इत्युक्तः स हसन्नाह वाञ्छातः प्रतिगृह्यताम् ।

वामनाय महीं दातुं जग्राह जलभाजनम् ॥२८

विष्णवे क्ष्मां प्रदास्यन्तमुशना असुरेश्वरम् ।

जानंश्चिकीर्षितं विष्णोः शिष्यं प्राह विदां वरः ॥२९

शुक्र उवाच

एष वैरोचने साक्षाद् भगवान्विष्णुरव्ययः ।

कश्यपाददितेर्जातो देवानां कार्यसाधकः ॥३०

प्रतिश्रुतं त्वयैतस्मै यदनर्थमजानता ।

न साधु मन्ये दैत्यानां महानुपगतोऽनयः ॥ ३१

एष ते स्थानमैश्वर्यं श्रियं तेजो यशः श्रुतम् ।

दास्यत्याच्छिद्य शक्राय मायामाणवको हरिः ॥३२

त्रिभिः क्रमैरिमाँल्लोकान्विश्वकायः क्रमिष्यति ।

सर्वस्वं विष्णवे दत्त्वा मूढ वर्तिष्यसे कथम् ॥ ३३

क्रमतो गां पदैकेन द्वितीयेन दिवं विभोः ।

खं च कायेन महता तार्तीयस्य कुतो गतिः ॥३४

निष्ठां ते नरके मन्ये ह्यप्रदातुः प्रतिश्रुतम् ।

प्रतिश्रुतस्य योऽनीशः प्रतिपादयितुं भवान् ॥३५

न तद्दानं प्रशंसन्ति येन वृत्तिर्विपद्यते ।

दानं यज्ञस्तपः कर्म लोके वृत्तिमतो यतः ॥३६

धर्माय यशसेऽर्थाय कामाय स्वजनाय च ।

पञ्चधा विभजन्वित्तमिहामुत्र च मोदते ॥३७

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- भगवान् के इस प्रकार कहनेपर राजा बलि हँस ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1573

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कहा— ' अच्छी बात है; जितनी तुम्हारी इच्छा हो, उतनी ही ले लो । ' यों कहकर वामनभगवान्को तीन पग पृथ्वीका संकल्प करनेके लिये उन्होंने जलपात्र उठाया ॥२८ ॥

शुक्राचार्यजी सब कुछ जानते थे । उनसे भगवान्‌की यह लीला भी छिपी नहीं थी । उन्होंने राजा बलिको पृथ्वी देनेके लिये तैयार देखकर उनसे कहा ॥२९ ॥

शुक्राचार्यजीने कहा — विरोचनकुमार! ये स्वयं अविनाशी भगवान् विष्णु हैं । देवताओंका काम बनानेके लिये कश्यपकी पत्नी अदितिके गर्भसे अवतीर्ण हुए हैं || ३० || तुमने यह अनर्थ न जानकर कि ये मेरा सब कुछ छीन लेंगे, इन्हें दान देनेकी प्रतिज्ञा कर ली है । यह तो दैत्योंपर बहुत बड़ा अन्याय होने जा रहा है । इसे मैं ठीक नहीं समझता ॥३१ ॥ स्वयं भगवान्

ही अपनी योगमायासे यह ब्रह्मचारी बनकर बैठे हुए हैं । ये तुम्हारा राज्य, ऐश्वर्य, लक्ष्मी, तेज और विश्वविख्यात कीर्ति - सब कुछ तुमसे छीनकर इन्द्रको दे देंगे ॥३२ ॥ ये विश्वरूप हैं ।

तीन पगमें तो ये सारे लोकोंको नाप लेंगे । मूर्ख! जब तुम अपना सर्वस्व ही विष्णुको दे डालोगे, तो तुम्हारा जीवन - निर्वाह कैसे होगा ॥३३ ॥ ये विश्वव्यापक भगवान् एक पगमें

पृथ्वी और दूसरे पगमें स्वर्गको नाप लेंगे । इनके विशाल शरीरसे आकाश भर जायगा । तब इनका तीसरा पग कहाँ जायगा? ॥ ३४ ॥ तुम उसे पूरा न कर सकोगे । ऐसी दशामें मैं

समझता हूँ कि प्रतिज्ञा करके पूरा न कर पानेके कारण तुम्हें नरकमें ही जाना पड़ेगा । क्योंकि तुम अपनी की हुई प्रतिज्ञाको पूर्ण करनेमें सर्वथा असमर्थ होओगे ॥ ३५ ॥ विद्वान् पुरुष उस

दानकी प्रशंसा नहीं करते, जिसके बाद जीवन - निर्वाहके लिये कुछ बचे ही नहीं । जिसका जीवन - निर्वाह ठीक - ठीक चलता है - वही संसारमें दान, यज्ञ, तप और परोपकारके कर्म कर सकता है ॥३६ ॥ जो मनुष्य अपने धनको पाँच भागों में बाँट देता है – कुछ धर्मके लिये, कुछ

यशके लिये, कुछ धनकी अभिवृद्धिके लिये, कुछ भोगोंके लिये और कुछ अपने स्वजनोंके लिये - वही इस लोक और परलोक दोनोंमें ही सुख पाता है ॥ ३७ ॥

अत्रापि बहृचैर्गीतं शृणु मेऽसुरसत्तम ।

सत्यमोमिति यत् प्रोक्तं यन्नेत्याहानृतं हि तत् ॥३८

सत्यं पुष्पफलं विद्यादात्मवृक्षस्य गीयते ।

वृक्षेऽजीवति तन्न स्वादनृतं मूलमात्मनः ॥३९

तद् यथा वृक्ष उन्मूलः शुष्यत्युद्वर्ततेऽचिरात् ।

एवं नष्टानृतः सद्य आत्मा शुष्येन्न संशयः ॥४०

पराग् रिक्तमपूर्णं वा अक्षरं यत् तदोमिति । यत् किञ्चिदोमिति ब्रूयात् तेन रिच्येत वै पुमान् भिक्षवे सर्वमोङ्कुर्वन्नालं कामेन चात्मने ॥४१ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1574

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अथैतत् पूर्णमभ्यात्मं यच्च नेत्यनृतं वचः ।

सर्वं नेत्यनृतं ब्रूयात् स दुष्कीर्तिः श्वसन्मृतः ॥४२

स्त्रीषु नर्मविवाहे च वृत्त्यर्थे प्राणसंकटे ।

गोब्राह्मणार्थे हिंसायां नानृतं स्याज्जुगुप्सितम् ॥४३

असुरशिरोमणे! यदि तुम्हें अपनी प्रतिज्ञा टूट जानेकी चिन्ता हो, तो मैं इस विषयमें तुम्हें कुछ ऋग्वेदकी श्रुतियोंका आशय सुनाता हूँ, तुम सुनो । श्रुति कहती है — ' किसीको कुछ देनेकी बात स्वीकार कर लेना सत्य है और नकार जाना अर्थात् अस्वीकार कर देना असत्य है ॥ ३८ ॥ यह शरीर एक वृक्ष है और सत्य इसका फल - फूल है । परन्तु यदि वृक्ष ही न रहे तो

फल - फूल कैसे रह सकते हैं? क्योंकि नकार जाना, अपनी वस्तु दूसरेको न देना, दूसरे शब्दोंमें अपना संग्रह बचाये रखना - यही शरीररूप वृक्षका मूल है ॥ ३ ९ ॥ जैसे जड़ न रहनेपर वृक्ष सूखकर थोड़े ही दिनोंमें गिर जाता है, उसी प्रकार यदि धन देनेसे अस्वीकार न किया जाय तो यह जीवन सूख जाता है - इसमें सन्देह नहीं || ४० || ' हाँ मैं दूंगा ' - यह वाक्य ही धनको दूर हटा देता है । इसलिये इसका उच्चारण ही अपूर्ण अर्थात् धनसे खाली कर देनेवाला है । यही कारण है कि जो पुरुष ' हाँ मैं दूँगा ' – ऐसा कहता है, वह धनसे खाली हो जाता है । जो याचकको सब कुछ देना स्वीकार कर लेता है, वह अपने लिये भोगकी कोई सामग्री नहीं रख सकता ॥४१ ॥ इसके विपरीत ' मैं नहीं दूँगा ' – यह जो अस्वीकारात्मक असत्य है, वह अपने

धनको सुरक्षित रखने तथा पूर्ण करनेवाला है । परन्तु ऐसा सब समय नहीं करना चाहिये । जो सबसे, सभी वस्तुओंके लिये नहीं करता रहता है, उसकी अपकीर्ति हो जाती है । वह तो जीवित रहनेपर भी मृतकके समान ही है ॥४२ ॥ स्त्रियोंको प्रसन्न करनेके लिये, हास-परिहासमें, विवाहमें, कन्या आदिकी प्रशंसा करते समय, अपनी जीविकाकी रक्षाके लिये,

प्राणसंकट उपस्थित होनेपर, गौ और ब्राह्मणके हितके लिये तथा किसीको मृत्युसे बचानेके लिये असत्य - भाषण भी उतना निन्दनीय नहीं है ॥४३ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धे वामनप्रादुर्भावे एकोनविंशोऽध्यायः ॥१९ ॥

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पृष्ठ 1575

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अथ विंशोऽध्यायः भगवान् वामनजीका विराट्रूप होकर दो ही पगसे पृथ्वी और स्वर्गको नाप लेना श्रीशुक उवाच

बलिरेवं गृहपतिः कुलाचार्येण भाषितः ।

तूष्णीं भूत्वा क्षणं राजन्नुवाचावहितो गुरुम् ॥१

बलिरुवाच

सत्यं भगवता प्रोक्तं धर्मोऽयं गृहमेधिनाम् ।

अर्थं कामं यशो वृत्तिं यो न बाधेत कर्हिचित् ॥२

स चाहं वित्तलोभेन ' प्रत्याचक्षे कथं द्विजम् ।

प्रतिश्रुत्य ददामीति प्राह्रादिः कितवो यथा ॥ ३

न ह्यसत्यात् परोऽधर्म इति होवाच भूरियम् ।

सर्वं सोढुमलं मन्ये ऋतेऽलीकपरं नरम् ॥४

नाहं बिभेमि निरयान्नाधन्यादसुखार्णवात् ।

न स्थानच्यवनान्मृत्योर्यथा विप्रप्रलम्भनात् ॥ ५

यद् यद्धास्यति लोकेऽस्मिन्संपरेतं धनादिकम् ।

तस्य त्यागे निमित्तं किं विप्रस्तुष्येन्न तेन चेत् ॥६

श्रेयः कुर्वन्ति भूतानां साधवो दुस्त्यजासुभिः ।

दध्यशिबिप्रभृतयः को विकल्पो धरादिषु ॥७

यैरियं बुभुजे ब्रह्मन्दैत्येन्द्रैरनिवर्तिभिः ।

तेषां कालोऽग्रसील्लोकान् न यशोऽधिगतं भुवि ॥८

श्रीशुकदेवजी कहते हैं— राजन्! जब कुलगुरु शुक्राचार्यने इस प्रकार कहा, तब आदर्श गृहस्थ राजा बलिने एक क्षण चुप रहकर बड़ी विनय और सावधानीसे शुक्राचार्यजीके प्रति यों कहा ॥१ ॥

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पृष्ठ 1576

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राजा बलिने कहा — भगवन्! आपका कहना सत्य है । गृहस्थाश्रममें रहनेवालोंके लिये वही धर्म है जिससे अर्थ, काम, यश और आजीविकामें कभी किसी प्रकार बाधा न पड़े || २ || परन्तु गुरुदेव! मैं प्रह्लादजीका पौत्र हूँ और एक बार देनेकी प्रतिज्ञा कर चुका हूँ । अतः अब मैं धनके लोभसे ठगकी भाँति इस ब्राह्मणसे कैसे कहूँ कि ' मैं तुम्हें नहीं दूँगा ' ॥३ ॥

इस पृथ्वीने कहा है कि ' असत्यसे बढ़कर कोई अधर्म नहीं है । मैं सब कुछ सहनेमें समर्थ हूँ, परन्तु झूठे मनुष्यका भार मुझसे नहीं सहा जाता ' ॥४ ॥

मैं नरकसे, दरिद्रतासे, दुःखके समुद्रसे, अपने राज्यके नाशसे और मृत्युसे भी उतना नहीं डरता, जितना ब्राह्मणसे प्रतिज्ञा करके उसे धोखा देनेसे डरता हूँ ॥ ५ ॥

इस संसारमें मर जानेके बाद धन आदि जो - जो वस्तुएँ साथ छोड़ देती हैं, यदि उनके द्वारा दान आदिसे ब्राह्मणोंको भी सन्तुष्ट न किया जा सका, तो उनके त्यागका लाभ ही क्या रहा? ॥६ ॥

दधीचि, शिबि आदि महापुरुषोंने अपने परम प्रिय दुस्त्यज प्राणोंका दान करके भी प्राणियोंकी भलाई की है । फिर पृथ्वी आदि वस्तुओंको देनेमें सोच - विचार करनेकी क्या आवश्यकता है? ॥७ || ब्रह्मन्! पहले युगमें बड़े - बड़े दैत्यराजोंने इस पृथ्वीका उपभोग किया है । पृथ्वीमें उनका सामना करनेवाला कोई नहीं था । उनके लोक और परलोकको तो काल खा गया, परन्तु उनका यश अभी पृथ्वीपर ज्यों - का - त्यों बना हुआ है ॥ ८ ॥

सुलभा युधि विप्रर्षे ह्यनिवृत्तास्तनुत्यजः ।

न तथा तीर्थ आयाते श्रद्धया ये धनत्यजः ॥९

मनस्विनः कारुणिकस्य शोभनं यदर्थिकामोपनयेन दुर्गतिः । कुतः पुनर्ब्रह्मविदां भवादृशां ततो वटोरस्य ददामि वाञ्छितम् ॥१० यजन्ति यज्ञक्रतुभिर्यमादृता भवन्त आम्नायविधानकोविदाः । स एव विष्णुर्वरदोऽस्तु वा परो दास्याम्यमुष्मै क्षितिमीप्सितां मुने ॥११

यदप्यसावधर्मेण मां बध्नीयादनागसम् ।

तथाप्येनं न हिंसिष्ये भीतं ब्रह्मतनुं रिपुम् ॥१२

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पृष्ठ 1577

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एष वा उत्तमश्लोको न जिहासति यद् यशः ।

हत्वा मैनां हरेद् युद्धे शयीत निहतो मया ॥ १३

श्रीशुक उवाच

एवमश्रद्धितं शिष्यमनादेशकरं गुरुः ।

शशाप दैवप्रहितः सत्यसन्धं मनस्विनम् ॥१४

दृढं पण्डितमान्यज्ञः स्तब्धोऽस्यस्मदुपेक्षया ।

मच्छासनातिगो यस्त्वमचिराद् भ्रश्यसे श्रियः ॥ १५

एवं शप्तः स्वगुरुणा सत्यान्न चलितो महान् ।

वामनाय ददावेनामर्चित्वोदकपूर्वकम् ॥१६

गुरुदेव! ऐसे लोग संसारमें बहुत हैं, जो युद्धमें पीठ न दिखाकर अपने प्राणोंकी बलि चढ़ा देते हैं; परन्तु ऐसे लोग बहुत दुर्लभ हैं, जो सत्पात्रके प्राप्त होनेपर श्रद्धाके साथ धनका दान करें ॥९ ॥ गुरुदेव! यदि उदार और करुणाशील पुरुष अपात्र याचककी कामना पूर्ण

करके दुर्गति भोगता है, तो वह दुर्गति भी उसके लिये शोभाकी बात होती है । फिर आप - जैसे ब्रह्मवेत्ता पुरुषोंको दान करनेसे दुःख प्राप्त हो तो उसके लिये क्या कहना है । इसलिये मैं इस ब्रह्मचारीकी अभिलाषा अवश्य पूर्ण करूँगा ॥१० ॥ महर्षे! वेदविधिके जाननेवाले आपलोग

बड़े आदरसे यज्ञ - यागादिके द्वारा जिनकी आराधना करते हैं — वे वरदानी विष्णु ही इस रूपमें हों अथवा कोई दूसरा हो, मैं इनकी इच्छाके अनुसार इन्हें पृथ्वीका दान करूँगा ॥११ ॥ यदि

मेरे अपराध न करनेपर भी ये अधर्मसे मुझे बाँध लेंगे, तब भी मैं इनका अनिष्ट नहीं चाहूँगा । क्योंकि मेरे शत्रु होनेपर भी इन्होंने भयभीत होकर ब्राह्मणका शरीर धारण किया है ॥ १२ ॥

यदि ये पवित्रकीर्ति भगवान् विष्णु ही हैं तो अपना यश नहीं खोना चाहेंगे ( अपनी माँगी हुई वस्तु लेकर ही रहेंगे ) ' । मुझे युद्धमें मारकर भी पृथ्वी छीन सकते हैं और यदि कदाचित् ये कोई दूसरे ही हैं, तो मेरे बाणोंकी चोटसे सदाके लिये रणभूमिमें सो जायँगे ॥१३ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं— जब शुक्राचार्यजीने देखा कि मेरा यह शिष्य गुरुके प्रति अश्रद्धालु है तथा मेरी आज्ञाका उल्लंघन कर रहा है, तब दैवकी प्रेरणासे उन्होंने राजा बलिको शाप दे दिया - यद्यपि वे सत्यप्रतिज्ञ और उदार होनेके कारण शापके पात्र नहीं थे ॥१४ ॥ शुक्राचार्यजीने कहा- ' मूर्ख! तू है तो अज्ञानी, परन्तु अपनेको बहुत बड़ा पण्डित

मानता है । तू मेरी उपेक्षा करके गर्व कर रहा है । तूने मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन किया है । इसलिये शीघ्र ही तू अपनी लक्ष्मी खो बैठेगा ' ॥ १५ ॥ राजा बलि बड़े महात्मा थे । अपने

गुरुदेवके शाप देनेपर भी वे सत्यसे नहीं डिगे । उन्होंने वामनभगवान्‌की विधिपूर्वक पूजा की और हाथमें जल लेकर तीन पग भूमिका सङ्कल्प कर दिया ॥१६ ॥

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पृष्ठ 1578

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विन्ध्यावलिस्तदाऽऽगत्य पत्नी जालकमालिनी ।

आनिन्ये कलशं हैममवनेजन्यपां भृतम् ॥१७

यजमानः स्वयं तस्य श्रीमत् पादयुगं मुदा ।

अवनिज्यावहन्मूर्ध्नि तदपो विश्वपावनीः ॥ १८

तदाऽसुरेन्द्रं दिवि देवतागणा गन्धर्वविद्याधरसिद्धचारणाः । तत्कर्म सर्वेऽपि गृणन्त आर्जवं प्रसूनवर्षैर्ववृषुर्मुदान्विताः ॥१९ दुर्मुहुर्दुन्दुभयः सहस्रशो गन्धर्वकिम्पुरुषकिन्नरा ' जगुः । मनस्विनानेन कृतं सुदुष्करं विद्वानदाद् यद् रिपवे जगत्त्रयम् ॥२० तद् वामनं रूपमवर्धताद्भुतं

हरेरनन्तस्य गुणत्रयात्मकम् ।

भूः खं दिशो द्यौर्विवराः पयोधय-स्तिर्यङ्नृदेवा ऋषयो यदासत ॥२१

काये बलिस्तस्य महाविभूतेः सहर्त्विगाचार्यसदस्य एतत् । ददर्श विश्वं त्रिगुणं गुणात्मके भूतेन्द्रियार्थाशयजीवयुक्तम् ॥२२

रसामचष्टाङ्घ्रितलेऽथ पादयो-र्महीं महीध्रान्पुरुषस्य जङ्घयोः ।

पतत्त्रिणो जानुनि विश्वमूर्ते-रूर्वोर्गणं मारुतमिन्द्रसेनः ॥ २३

सन्ध्यां विभोर्वाससि गुह्य ऐक्षत्

प्रजापतीञ्जघने आत्ममुख्यान् ।

नाभ्यां नभः कुक्षिषु सप्तसिन्धू-नुरुक्रमस्योरसि चर्क्षमालाम् ॥ २४

उसी समय राजा बलिकी पत्नी विन्ध्यावली, जो मोतियोंके गहनोंसे सुसज्जित थी, वहाँ आयी । उसने अपने हाथों वामनभगवान्‌के चरण पखारनेके लिये जलसे भरा सोनेका कलश लाकर दिया ॥१७ ॥

बलिने स्वयं बड़े आनन्दसे उनके सुन्दर - सुन्दर युगल चरणोंको धोया और उनके ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1579

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चरणोंका वह विश्वपावन जल अपने सिरपर चढ़ाया ॥१८ ॥

उस समय आकाशमें स्थित देवता, गन्धर्व, विद्याधर, सिद्ध, चारण - सभी लोग राजा बलिके इस अलौकिक कार्य तथा सरलताकी प्रशंसा करते हुए बड़े आनन्दसे उनके ऊपर दिव्य पुष्पोंकी वर्षा करने लगे ॥१९ ॥

एक साथ ही हजारों दुन्दुभियाँ बार - बार बजने लगीं । गन्धर्व, किम्पुरुष और किन्नर गान करने लगे — ' अहो धन्य है! इन उदारशिरोमणि बलिने ऐसा काम कर दिखाया, जो दूसरोंके लिये अत्यन्त कठिन है । देखो तो सही, इन्होंने जान - बूझकर अपने शत्रुको तीनों लोकोंका दान कर दिया! ' || २० || इसी समय एक बड़ी अद्भुत घटना घट गयी । अनन्त भगवान्‌का वह त्रिगुणात्मक वामनरूप बढ़ने लगा । वह यहाँतक बढ़ा कि पृथ्वी, आकाश, दिशाएँ, स्वर्ग, पाताल, समुद्र, पशु - पक्षी, मनुष्य, देवता और ऋषि- सब - के - सब उसीमें समा गये ॥२१ ॥

ऋत्विज्, आचार्य और सदस्योंके साथ बलिने समस्त ऐश्वर्योंके एकमात्र स्वामी भगवान्के उस त्रिगुणात्मक शरीरमें पंचभूत, इन्द्रिय, उनके विषय, अन्तःकरण और जीवोंके साथ वह सम्पूर्ण त्रिगुणमय जगत् देखा ॥२२ ॥

राजा बलिने विश्वरूपभगवान्‌के चरणतलमें रसातल, चरणोंमें पृथ्वी, पिंडलियोंमें पर्वत, घुटनोंमें पक्षी और जाँघोंमें मरुद्गणको देखा ॥२३ ॥

इसी प्रकार भगवान्‌के वस्त्रोंमें सन्ध्या, गुह्यस्थानोंमें प्रजापतिगण, जघनस्थलमें अपनेसहित समस्त असुरगण, नाभिमें आकाश, कोखमें सातों समुद्र और वक्षःस्थलमें नक्षत्रसमूह देखे ॥२४ ॥

हृद्यङ्ग धर्मं स्तनयोर्मुरारे-ऋतं च सत्यं च मनस्यथेन्दुम् । श्रियं च वक्षस्यरविन्दहस्तां कण्ठे च सामानि समस्तरेफान् ॥२५ इन्द्रप्रधानानमरान्भुजेषु

तत्कर्णयोः ककुभो द्यौश्च मूर्ध्नि ।

केशेषु मेघाञ्छ्वसनं नासिकाया-मक्ष्णोश्च सूर्यं वदने च वह्निम् ॥२६

वाण्यां च छन्दांसि रसे जलेशं भ्रुवोर्निषेधं च विधिं च पक्ष्मसु । अहश्च रात्रिं च परस्य पुंसो मन्युं ललाटेऽधर एव लोभम् ॥२७ स्पर्शे च कामं नृप रेतसोऽम्भः पृष्ठे त्वधर्मं क्रमणेषु यज्ञम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 1580

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छायासु मृत्युं हसिते च मायां तनूरुहेष्वोषधिजातयश्च ॥२८ नदीश्च नाडीषु शिला नखेषु बुद्धावजं देवगणानृषींश्च । प्राणेषु गात्रे स्थिरजङ्गमानि सर्वाणि भूतानि ददर्श वीरः ॥२९ सर्वात्मनीदं भुवनं निरीक्ष्य सर्वेऽसुराः कश्मलमापुरङ्ग । सुदर्शनं चक्रमसह्यतेजो धनुश्च शार्ङ्गं स्तनयित्नुघोषम् ॥३० पर्जन्यघोषो जलजः पाञ्चजन्यः

कौमोदकी विष्णुगदा तरस्विनी ।

विद्याधरोऽसिः शतचन्द्रयुक्त-स्तूणोत्तमावक्षयसायकौ च ॥३१

सुनन्दमुख्या उपतस्थुरीशं

पार्षदमुख्याः सहलोकपालाः ।

स्फुरत्किरीटाङ्गदमीनकुण्डल-श्रीवत्सरत्नोत्तममेखलाम्बरैः ॥३२

उन लोगोंको भगवान् के हृदयमें धर्म, स्तनोंमें ऋत ( मधुर ) और सत्य वचन, मनमें चन्द्रमा, वक्षःस्थलपर हाथोंमें कमल लिये लक्ष्मीजी, कण्ठमें सामवेद और सम्पूर्ण शब्दसमूह उन्हें दीखे ॥२५ ॥

बाहुओंमें इन्द्रादि समस्त देवगण, कानोंमें दिशाएँ, मस्तकमें स्वर्ग, केशोंमें मेघमाला, नासिकामें वायु, नेत्रोंमें सूर्य और मुखमें अग्नि दिखायी पड़े ॥२६ ॥

वाणीमें वेद, रसनामें वरुण, भौंहोंमें विधि और निषेध, पलकोंमें दिन और रात ।

विश्वरूपके ललाटमें क्रोध और नीचेके ओठमें लोभके दर्शन हुए ॥ २७ ॥

परीक्षित्! उनके स्पर्शमें काम, वीर्यमें जल, पीठमें अधर्म, पदविन्यासमें यज्ञ, छायामें मृत्यु, हँसीमें माया और शरीरके रोमोंमें सब प्रकारकी ओषधियाँ थीं ॥ २८ ॥

उनकी नाड़ियोंमें नदियाँ, नखोंमें शिलाएँ और बुद्धिमें ब्रह्मा, देवता एवं ऋषिगण दीख पड़े । इस प्रकार वीरवर बलिने भगवान्‌की इन्द्रियों और शरीरमें सभी चराचर प्राणियोंका दर्शन किया ॥२९ ॥

परीक्षित्! सर्वात्मा भगवान् में यह सम्पूर्ण जगत् देखकर सब - के - सब दैत्य अत्यन्त भयभीत हो गये । इसी समय भगवान्‌ के पास असह्य तेजवाला सुदर्शन चक्र, गरजते हुए ****** ebook converter DEMO Watermarks *******