श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 291–300
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 291–300
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बहुत प्रसन्न हुए, उनका खेद मिट गया । उन्होंने शान्तचित्त होकर उनसे कहा— ॥२१ ॥
परीक्षित्ने कहा — धर्मका तत्त्व जाननेवाले वृषभदेव! आप धर्मका उपदेश कर रहे हैं । अवश्य ही आप वृषभके रूपमें स्वयं धर्म हैं । ( आपने अपनेको दुःख देनेवालेका नाम इसलिये नहीं बताया है कि ) अधर्म करनेवालेको जो नरकादि प्राप्त होते हैं, वे ही चुगली करनेवालेको भी मिलते हैं ॥२२ ॥ अथवा यही सिद्धान्त निश्चित है कि प्राणियोंके मन और वाणीसे
परमेश्वरकी मायाके स्वरूपका निरूपण नहीं किया जा सकता || २३ || धर्मदेव! सत्ययुगमें आपके चार चरण थे - तप, पवित्रता, दया और सत्य । इस समय अधर्मके अंश गर्व, आसक्ति और मदसे तीन चरण नष्ट हो चुके हैं || २४ || अब आपका चौथा चरण केवल ' सत्य ' ही बच रहा है । उसीके बलपर आप जी रहे हैं । असत्यसे पुष्ट हुआ यह अधर्मरूप कलियुग उसे भी ग्रास कर लेना चाहता है ॥ २५ ॥ ये गौ माता साक्षात् पृथ्वी हैं । भगवान्ने इनका भारी बोझ
उतार दिया था और ये उनके राशि - राशि सौन्दर्य बिखेरनेवाले चरणचिह्नोंसे सर्वत्र उत्सवमयी हो गयी थीं || २६ || अब ये उनसे बिछुड़ गयी हैं । वे साध्वी अभागिनीके समान नेत्रोंमें जल भरकर यह चिन्ता कर रही हैं कि अब राजाका स्वाँग बनाकर ब्राह्मणद्रोही शूद्र मुझे भोगेंगे ॥२७ ॥
इति धर्मं महीं चैव सान्त्वयित्वा महारथः ।
निशातमाददे खड्गं कलयेऽधर्महेतवे ॥२८
तं जिघांसुमभिप्रेत्य ' विहाय नृपलाञ्छनम् ।
तत्पादमूलं शिरसा समगाद् भयविह्वलः ॥२९
पतितं पादयोर्वीक्ष्य कृपया दीनवत्सलः ।
शरण्यो नावधीच्छ्लोक्य आह चेदं हसन्निव ॥ ३०
राजोवाच न ते गुडाकेशयशोधराणां बद्धाञ्जलेर्वैर् भयमस्ति किञ्चित् । न वर्तितव्यं भवता कथञ्चन क्षेत्रे मदीये त्वमधर्मबन्धुः ॥३१ त्वां वर्तमानं नरदेवदेहे-ष्वनु प्रवृत्तोऽयमधर्मपूगः । लोभोऽनृतं चौर्यमनार्यमहो ज्येष्ठा च माया कलहश्च दम्भः ॥३२ न वर्तितव्यं तदधर्मबन्धो धर्मेण सत्येन च वर्तितव्ये । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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ब्रह्मावर्ते यत्र यजन्ति यज्ञै-र्यज्ञेश्वरं यज्ञवितानविज्ञाः ॥३३ यस्मिन् हरिर्भगवानिज्यमान
इज्यामूर्तिर्यजतां शं तनोति ।
कामानमोघान् स्थिरजङ्गमाना-मन्तर्बहिर्वायुरिवैष आत्मा ॥३४
सूत उवाच
परीक्षितैवमादिष्टः स कलिर्जातवेपथुः ।
तमुद्यतासिमाहेदं दण्डपाणिमिवोद्यतम् ॥३५
महारथी परीक्षितने इस प्रकार धर्म और पृथ्वीको सान्त्वना दी । फिर उन्होंने अधर्मके कारणरूप कलियुगको मारनेके लिये तीक्ष्ण तलवार उठायी ॥२८ ॥
कलियुग ताड़ गया कि ये तो अब मुझे मार ही डालना चाहते हैं; अतः झटपट उसने अपने राजचिह्न उतार डाले और भयविह्वल होकर उनके चरणोंमें अपना सिर रख दिया ॥२९ ॥
परीक्षित् बड़े यशस्वी, दीनवत्सल और शरणागतरक्षक थे । उन्होंने जब कलियुगको अपने पैरोंपर पड़े देखा तो कृपा करके उसको मारा नहीं, अपितु हँसते हुए - से उससे कहा ॥३० ॥
परीक्षित् बोले — जब तू हाथ जोड़कर शरण आ गया, तब अर्जुनके यशस्वी वंशमें उत्पन्न हुए किसी भी वीरसे तुझे कोई भय नहीं है । परन्तु तू अधर्मका सहायक है, इसलिये तुझे मेरे राज्यमें बिलकुल नहीं रहना चाहिये || ३१ || तेरे राजाओंके शरीरमें रहनेसे ही लोभ, झूठ, चोरी, दुष्टता, स्वधर्म त्याग, दरिद्रता, कपट, कलह, दम्भ और दूसरे पापोंकी बढ़ती हो रही है ॥३२ ॥ अतः अधर्मके साथी! इस ब्रह्मावर्तमें तू एक क्षणके लिये भी न ठहरना;
क्योंकि यह धर्म और सत्यका निवासस्थान है । इस क्षेत्रमें यज्ञविधिके जाननेवाले महात्मा यज्ञोंके द्वारा यज्ञपुरुष- भगवान्की आराधना करते रहते हैं ॥३३ ॥
इस देशमें भगवान् श्रीहरि यज्ञोंके रूपमें निवास करते हैं, यज्ञोंके द्वारा उनकी पूजा होती है और वे यज्ञ करनेवालोंका कल्याण करते हैं । वे सर्वात्मा भगवान् वायुकी भाँति समस्त चराचर जीवोंके भीतर और बाहर एकरस स्थित रहते हुए उनकी कामनाओंको पूर्ण करते रहते हैं ॥३४ ॥
सूतजी कहते हैं - परीक्षित्की यह आज्ञा सुनकर कलियुग सिहर उठा । यमराजके समान मारनेके लिये उद्यत, हाथमें तलवार लिये हुए परीक्षित्से वह बोला – ॥३५ ॥
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कलिरुवाच
यत्र क्वचन ' वत्स्यामि सार्वभौम तवाज्ञया ।
लक्षये तत्र तत्रापि त्वामात्तेषुशरासनम् ॥३६
तन्मे धर्मभृतां श्रेष्ठ स्थानं निर्देष्टुमर्हसि ।
यत्रैव नियतो वत्स्य आतिष्ठंस्तेऽनुशासनम् ॥३७
सूत उवाच
अभ्यर्थितस्तदा तस्मै स्थानानि कलये ददौ ।
द्यूतं पानं स्त्रियः सूना यत्राधर्मश्चतुर्विधः ॥३८
पुनश्च याचमानाय जातरूपमदात्प्रभुः ।
ततोऽनृतं मदं कामं रजो वैरं च पञ्चमम् ॥३९
अमूनि पञ्च स्थानानि ह्यधर्मप्रभवः कलिः ।
औत्तरेयेण दत्तानि न्यवसत् तन्निदेशकृत् ॥४०
अथैतानि न सेवेत बुभूषुः पुरुषः क्वचित् ।
विशेषतो धर्मशीलो राजा लोकपतिर्गुरुः ॥४१
वृषस्य नष्टांस्त्रीन् पादान् तपः शौचं दयामिति ।
प्रतिसंदध आश्वास्य े महीं च समवर्धयत् ॥४२
स एष एतर्ह्यध्यास्त ' आसनं पार्थिवोचितम् ।
पितामहेनोपन्यस्तं राज्ञारण्यं विविक्षता ॥४३
आस्तेऽधुना स राजर्षिः कौरवेन्द्रश्रियोल्लसन् ।
गजाह्वये महाभागश्चक्रवर्ती बृहच्छ्रवाः ॥४४
कलिने कहा — सार्वभौम! आपकी आज्ञासे जहाँ कहीं भी मैं रहनेका विचार करता हूँ, वहीं देखता हूँ कि आप धनुषपर बाण चढ़ाये खड़े हैं ॥ ३६ ॥ धार्मिकशिरोमणे! आप मुझे वह
स्थान बतलाइये, जहाँ मैं आपकी आज्ञाका पालन करता हुआ स्थिर होकर रह सकूँ ॥३७ ॥
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सूतजी कहते हैं - कलियुगकी प्रार्थना स्वीकार करके राजा परीक्षित्ने उसे चार स्थान दिये – द्यूत, मद्यपान, स्त्री - संग और हिंसा । इन स्थानोंमें क्रमशः असत्य, मद, आसक्ति और निर्दयता — ये चार प्रकारके अधर्म निवास करते हैं ॥३८ ॥
उसने और भी स्थान माँगे । तब समर्थ परीक्षितने उसे रहनेके लिये एक और स्थान —'सुवर्ण ' ( धन ) — दिया । इस प्रकार कलियुगके पाँच स्थान हो गये -झूठ, मद, काम, वैर और रजोगुण ॥३९ ॥
परीक्षित्के दिये हुए इन्हीं पाँच स्थानोंमें अधर्मका मूल कारण कलि उनकी आज्ञाओंका पालन करता हुआ निवास करने लगा ॥ ४० ॥
इसलिये आत्मकल्याणकामी पुरुषको इन पाँचों स्थानोंका सेवन कभी नहीं करना चाहिये । धार्मिक राजा, प्रजावर्गके लौकिक नेता और धर्मोपदेष्टा गुरुओंको तो बड़ी सावधानीसे इनका त्याग करना चाहिये ॥४१ ॥
राजा परीक्षित्ने इसके बाद वृषभरूप धर्मके तीनों चरण - तपस्या, शौच और दया जोड़ दिये और आश्वासन देकर पृथ्वीका संवर्धन किया ॥४२ ॥
वे ही महाराजा परीक्षित् इस समय अपने राजसिंहासनपर, जिसे उनके पितामह महाराज युधिष्ठिरने वनमें जाते समय उन्हें दिया था, विराजमान हैं ॥।४३ ॥ वे परम यशस्वी सौभाग्यभाजन चक्रवर्ती सम्राट् राजर्षि परीक्षित् इस समय हस्तिनापुरमें कौरव - कुलकी राज्यलक्ष्मीसे शोभायमान हैं ॥४४ ॥
इत्थम्भूतानुभावोऽयमभिमन्युसुतो नृपः ।
यस्य पालयतः क्षोणीं यूयं सत्राय दीक्षिताः ॥४५
अभिमन्युनन्दन राजा परीक्षित् वास्तवमें ऐसे ही प्रभावशाली हैं, जिनके शासनकालमें आपलोग इस दीर्घकालीन यज्ञके लिये दीक्षित हुए हैं * ॥४५ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे कलिनिग्रहो नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥१७ ॥
१. प्रा ० पा ० — पीडितम् । २. प्रा ० पा ० — कृशां । १. प्रा ० पा ० - मातर्हिस्यन्ते । २. प्रा ० पा ० - राज्ञः । ३. प्रा ० पा ० चतुष्पदः । ४. प्रा ० पा ० - यतस्व । - इष्टात्ममूर्ति ० । १. प्रा ० पा ० — प्रेक्ष्य । २. प्रा ० पा ० - बद्धाञ्जलेस्ते । ३. प्रा ० पा०— १. प्रा ० पा ० — क्व चाथ । २. प्रा ० पा ० — मदः कामो । ३. प्रा ० पा ० – आस्थाय – ४. प्रा ० पा ० – एतदध्यास्त । * ४३ से ४५ तकके श्लोकोंमें महाराज परीक्षित्का वर्तमानके समान वर्णन किया गया ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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है । ‘ वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा ' ( पा ० सू ० ३। ३। १३१ ) इस पाणिनि - सूत्रके अनुसार वर्तमानके निकटवर्ती भूत और भविष्यके लिये भी वर्तमानका प्रयोग किया जा सकता है । जगद्गुरु श्रीवल्लभाचार्यजी महाराजने अपनी टीकामें लिखा है कि यद्यपि परीक्षित्की मृत्यु हो गयी थी, फिर भी उनकी कीर्ति और प्रभाव वर्तमानके समान ही विद्यमान थे । उनके प्रति अत्यन्त श्रद्धा उत्पन्न करनेके लिये उनकी दूरी यहाँ मिटा दी गयी है । उन्हें भगवान्का सायुज्य प्राप्त हो गया था, इसलिये भी सूतजीको वे अपने सम्मुख ही दीख रहे हैं । न केवल उन्हींको, बल्कि सबको इस बातकी प्रतीति हो रही है । ' आत्मा वै जायते पुत्र: ' इस श्रुतिके अनुसार जनमेजयके रूपमें भी वही राजसिंहासनपर बैठे हुए हैं । इन सब कारणोंसे वर्तमानके रूपमें उनका वर्णन भी कथाके रसको पुष्ट ही करता है । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथाष्टादशोऽध्यायः राजा परीक्षित्को शृंगी ऋषिका शाप सूत उवाच
यो वै द्रौण्यस्त्रविप्लुष्टो न मातुरुदरे मृतः ।
अनुग्रहाद् भगवतः कृष्णस्याद्भुतकर्मणः ॥ १
ब्रह्मकोपोत्थिताद् यस्तु तक्षकात्प्राणविप्लवात् ।
न सम्ममोहोरुभयाद् भगवत्यर्पिताशयः ॥ २
उत्सृज्य सर्वतः सङ्गं विज्ञाताजितसंस्थितिः ।
वैयासकेर्जहौ शिष्यो गङ्गायां स्वं कलेवरम् ॥३
नोत्तमश्लोकवार्तानां जुषतां तत्कथामृतम् ।
स्यात्सम्भ्रमोऽन्तकालेऽपि स्मरतां तत्पदाम्बुजम् ॥४
तावत्कलिर्न प्रभवेत् प्रविष्टोऽपीह सर्वतः ।
यावदीशो महानुर्व्यामाभिमन्यव एकराट् ॥५
सूतजी कहते हैं - अद्भुत कर्मा भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे राजा परीक्षित् अपनी माताकी कोखमें अश्वत्थामाके ब्रह्मास्त्रसे जल जानेपर भी मरे नहीं || १ || जिस समय ब्राह्मणके शापसे उन्हें डसनेके लिये तक्षक आया, उस समय वे प्राणनाशके महान् भयसे भी भयभीत नहीं हुए; क्योंकि उन्होंने अपना चित्त भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें समर्पित कर रखा था ॥२ ॥ उन्होंने सबकी आसक्ति छोड़ दी, गंगातटपर जाकर श्रीशुकदेवजीसे उपदेश ग्रहण
किया और इस प्रकार भगवान्के स्वरूपको जानकर अपने शरीरको त्याग दिया ॥ ३ । । जो लोग भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाकथा कहते रहते हैं, उस कथामृतका पान करते रहते हैं और इन दोनों ही साधनोंके द्वारा उनके चरण - कमलोंका स्मरण करते रहते हैं, उन्हें अन्तकालमें भी मोह नहीं होता ॥४ ॥ जबतक पृथ्वीपर अभिमन्युनन्दन महाराज परीक्षित् सम्राट् रहे, तबतक
चारों ओर व्याप्त हो जानेपर भी कलियुगका कुछ भी प्रभाव नहीं था ॥५ ॥ वैसे तो जिस
दिन, जिस क्षण श्रीकृष्णने पृथ्वीका परित्याग किया, उसी समय पृथ्वीमें अधर्मका मूलकारण कलियुग आ गया था || ६ || भ्रमरके समान सारग्राही सम्राट् परीक्षित् कलियुगसे कोई द्वेष नहीं रखते थे; क्योंकि इसमें यह एक बहुत बड़ा गुण है कि पुण्यकर्म तो संकल्पमात्रसे ही फलीभूत हो जाते हैं, परन्तु पापकर्मका फल शरीरसे करनेपर ही मिलता है; संकल्पमात्रसे नहीं || ७ || यह भेड़ियेके समान बालकोंके प्रति शूरवीर और धीर वीर पुरुषोंके लिये बड़ा भीरु है । यह प्रमादी मनुष्योंको अपने वशमें करनेके लिये ही सदा सावधान रहता है || ८ || शौनकादि ऋषियो! आपलोगोंको मैंने भगवान्की कथासे युक्त राजा परीक्षित्का पवित्र चरित्र ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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सुनाया । आपलोगोंने यही पूछा था ॥९ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण कीर्तन करनेयोग्य बहुत - सी
लीलाएँ करते हैं । इसलिये उनके गुण और लीलाओंसे सम्बन्ध रखनेवाली जितनी भी कथाएँ हैं, कल्याणकामी पुरुषोंको उन सबका सेवन करना चाहिये ॥१० ॥
यस्मिन्नहनि यर्ह्येव भगवानुत्ससर्ज गाम् ।
तदैवेहानुवृत्तोऽसावधर्मप्रभवः कलिः ॥ ६
नानुद्वेष्टि ' कलिं सम्राट् सारङ्ग इव सारभुक् ।
कुशलान्याशु सिद्ध्यन्ति नेतराणि कृतानि यत् ॥७
किं नु बालेषु शूरेण कलिना धीरभीरुणा ।
अप्रमत्तः प्रमत्तेषु यो वृको ' नृषु वर्तते ॥८
उपवर्णितमेतद् वः ३ पुण्यं पारीक्षितं मया ।
वासुदेवकथोपेतमाख्यानं यदपृच्छत ॥९
या याः कथा भगवतः कथनीयोरुकर्मणः ।
गुणकर्माश्रयाः पुम्भिः संसेव्यास्ता बुभूषुभिः ॥१०
ऋषय ऊचुः
सूत जीव समाः सौम्य शाश्वतीर्विशदं यशः ।
यस्त्वं शंससि कृष्णस्य मर्त्यानाममृतं हि नः ॥११
कर्मण्यस्मिन्ननाश्वासे धूमधूम्रात्मनां भवान् ।
आपाययति गोविन्दपादपद्मासवं मधु ॥१२
तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।
भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताशिषः ॥ १३
को नाम तृप्येद् रसवित्कथायां
महत्तमैकान्तपरायणस्य ।
नान्तं गुणानामगुणस्य जग्मु-र्योगेश्वरा ये भवपाद्ममुख्याः ॥१४
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ऋषियोंने कहा — सौम्यस्वभाव सूतजी! आप युग - युग जीयें; क्योंकि मृत्युके प्रवाहमें पड़े हुए हमलोगोंको आप भगवान् श्रीकृष्णकी अमृतमयी उज्ज्वल कीर्तिका श्रवण कराते हैं ॥ ११ ॥ यज्ञ करते - करते उसके धुएँसे हमलोगोंका शरीर धूमिल हो गया है । फिर भी इस
कर्मका कोई विश्वास नहीं है । इधर आप तो वर्तमानमें ही भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके चरणकमलोंका मादक और मधुर मधु पिलाकर हमें तृप्त कर रहे हैं ॥१२ ॥ भगवत् - प्रेमी
भक्तोंके लवमात्रके सत्संगसे स्वर्ग एवं मोक्षकी भी तुलना नहीं की जा सकती; फिर मनुष्योंके तुच्छ भोगोंकी तो बात ही क्या है || १३ || ऐसा कौन रस - मर्मज्ञ होगा, जो महापुरुषोंके एकमात्र जीवनसर्वस्व श्रीकृष्णकी लीला - कथाओंसे तृप्त हो जाय? समस्त प्राकृत गुणोंसे अतीत भगवान्के अचिन्त्य अनन्त कल्याणमय गुणगणोंका पार तो ब्रह्मा, शंकर आदि बड़े-बड़े योगेश्वर भी नहीं पा सके ॥१४ ॥ विद्वन्! आप भगवान्को ही अपने जीवनका ध्रुवतारा
मानते हैं । इसलिये आप सत्पुरुषोंके एकमात्र आश्रय भगवान्के उदार और विशुद्ध चरित्रोंका हम श्रद्धालु श्रोताओंके लिये विस्तारसे वर्णन कीजिये ॥१५ ॥ भगवान्के परम प्रेमी महाबुद्धि
परीक्षित्ने श्रीशुकदेवजीके उपदेश किये हुए जिस ज्ञानसे मोक्षस्वरूप भगवान्के चरणकमलोंको प्राप्त किया, आप कृपा करके उसी ज्ञान और परीक्षित्के परम पवित्र उपाख्यानका वर्णन कीजिये; क्योंकि उसमें कोई बात छिपाकर नहीं कही गयी होगी और भगवत्प्रेमकी अद्भुत योगनिष्ठाका निरूपण किया गया होगा । उसमें पद - पदपर भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाओंका वर्णन हुआ होगा । भगवान्के प्यारे भक्तोंको वैसा प्रसंग सुननेमें बड़ा रस मिलता है ॥१६-१७ ॥ तन्नो ' भवान् वै भगवत्प्रधानो महत्तमैकान्तपरायणस्य । हरेरुदारं चरितं विशुद्धं शुश्रूषतां नो वितनोतु विद्वन् ॥१५ स वै महाभागवतः परीक्षिद् येनापवर्गाख्यमदभ्रबुद्धिः । ज्ञानेन वैयासकिशब्दितेन भेजे खगेन्द्रध्वजपादमूलम् ॥१६ तन्नः परं पुण्यमसंवृतार्थ-माख्यानमत्यद्भुतयोगनिष्ठम् । आख्याह्यनन्ताचरितोपपन्नं पारीक्षितं भागवताभिरामम् ॥१७ सूत उवाच ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अहो वयं जन्मभृतोऽद्य हास्म वृद्धानुवृत्त्यापि विलोमजाताः । दौष्कुल्यमाधिं विधुनोति शीघ्रं महत्तमानामभिधानयोगः ॥१८ कुतः पुनर्गृणतो नाम तस्य महत्तमैकान्तपरायणस्य । योऽनन्तशक्तिर्भगवाननन्तो महद्गुणत्वाद् यमनन्तमाहुः ॥१९ एतावतालं ननु र सूचितेन
गुणैरसाम्यानतिशायनस्य ४ ।
हित्वेतरान् प्रार्थयतो विभूति-र्यस्याङ्घ्रिरेणुं जुषतेऽनभीप्सोः ॥ २०
सूतजी कहते हैं - अहो! विलोम * जातिमें उत्पन्न होनेपर भी महात्माओंकी सेवा करनेके कारण आज हमारा जन्म सफल हो गया । क्योंकि महापुरुषोंके साथ बातचीत करनेमात्रसे ही नीच कुलमें उत्पन्न होनेकी मनोव्यथा शीघ्र ही मिट जाती है ॥ १८ ॥
फिर उन लोगोंकी तो बात ही क्या है, जो सत्पुरुषोंके एकमात्र आश्रय भगवान्का नाम लेते हैं! भगवान्की शक्ति अनन्त है, वे स्वयं अनन्त हैं । वास्तवमें उनके गुणोंकी अनन्तताके कारण ही उन्हें अनन्त कहा गया है ॥१९ ॥
भगवान्के गुणोंकी समता भी जब कोई नहीं कर सकता, तब उनसे बढ़कर तो कोई हो ही कैसे सकता है । उनके गुणोंकी यह विशेषता समझानेके लिये इतना कह देना ही पर्याप्त है कि लक्ष्मीजी अपनेको प्राप्त करनेकी इच्छासे प्रार्थना करनेवाले ब्रह्मादि देवताओंको छोड़कर भगवान्के न चाहनेपर भी उनके चरणकमलोंकी रजका ही सेवन करती हैं ॥२० ॥
अथापि यत्पादनखावसृष्टं जगद्विरिञ्चोपहृतार्हणाम्भः । सेशं पुनात्यन्यतमो मुकुन्दात् को नाम लोके भगवत्पदार्थः ॥२१ यत्रानुरक्ताः सहसैव धीरा व्यपोह्य देहादिषु सङ्गमूढम् । व्रजन्ति तत्पारमहंस्यमन्त्यं ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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यस्मिन्नहिंसोपशमः स्वधर्मः ॥२२
अहं हि पृष्टोऽर्यमणो भवद्भि-राचक्ष आत्मावगमोऽत्र यावान् ।
नभः पतन्त्यात्मसमं पतत्त्रिण-स्तथा समं विष्णुगतिं विपश्चितः ॥२३
एकदा धनुरुद्यम्य विचरन् मृगयां वने ।
मृगाननुगतः श्रान्तः क्षुधितस्तृषितो भृशम् ॥२४
जलाशयमचक्षाणः प्रविवेश तमाश्रमम् ।
ददर्श मुनिमासीनं शान्तं मीलितलोचनम् ॥२५
प्रतिरुद्धेन्द्रियप्राणमनोबुद्धिमुपारतम् ।
स्थानत्रयात्परं प्राप्तं ब्रह्मभूतमविक्रियम् ॥ २६
विप्रकीर्णजटाच्छन्नं रौरवेणाजिनेन च ।
विशुष्यत्तालुरुदकं तथाभूतमयाचत ॥२७
अलब्धतृणभूम्यादिरसम्प्राप्तार्घ्यसूनृतः ।
अवज्ञातमिवात्मानं मन्यमानश्चुकोप ह ॥२८
ब्रह्माजीने भगवान्के चरणोंका प्रक्षालन करनेके लिये जो जल समर्पित किया था, वही उनके चरणनखोंसे निकलकर गंगाजीके रूपमें प्रवाहित हुआ । यह जल महादेवजीसहित सारे जगत्को पवित्र करता है । ऐसी अवस्थामें त्रिभुवनमें श्रीकृष्णके अतिरिक्त ‘ भगवान् ’ शब्दका दूसरा और क्या अर्थ हो सकता है ॥२१ ॥ जिनके प्रेमको प्राप्त करके धीर पुरुष बिना किसी
हिचकके देह - गेह आदिकी दृढ़ आसक्तिको छोड़ देते हैं और उस अन्तिम परमहंस - आश्रमको स्वीकार करते हैं, जिसमें किसीको कष्ट न पहुँचाना और सब ओरसे उपशान्त हो जाना ही स्वधर्म होता है ॥२२ ॥ सूर्यके समान प्रकाशमान महात्माओ! आपलोगोंने मुझसे जो कुछ
पूछा है, वह मैं अपनी समझके अनुसार सुनाता हूँ । जैसे पक्षी अपनी शक्तिके अनुसार आकाशमें उड़ते हैं, वैसे ही विद्वान्लोग भी अपनी - अपनी बुद्धिके अनुसार ही श्रीकृष्णकी लीलाका वर्णन करते हैं ॥२३ ॥
एक दिन राजा परीक्षित् धनुष लेकर वनमें शिकार खेलने गये हुए थे । हरिणोंके पीछे दौड़ते - दौड़ते वे थक गये और उन्हें बड़े जोरकी भूख और प्यास लगी ॥ २४ ॥ जब कहीं उन्हें
कोई जलाशय नहीं मिला, तब वे पासके ही एक ऋषिके आश्रममें घुस गये । उन्होंने देखा कि ****** ebook converter DEMO Watermarks *******