श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 301–310
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 301–310
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वहाँ आँखें बंद करके शान्तभावसे एक मुनि आसनपर बैठे हुए हैं ॥ २५ ॥ इन्द्रिय, प्राण, मन
और बुद्धिके निरुद्ध हो जानेसे वे संसारसे ऊपर उठ गये थे । जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति – तीनों अवस्थाओंसे रहित निर्विकार ब्रह्मरूप तुरीय पदमें वे स्थित थे || २६ ॥ उनका शरीर बिखरी हुई जटाओंसे और कृष्ण मृगचर्मसे ढका हुआ था । राजा परीक्षित्ने ऐसी ही अवस्थामें उनसे जल माँगा, क्योंकि प्याससे उनका गला सूखा जा रहा था ॥२७ ॥ जब राजाको वहाँ बैठनेके
लिये तिनकेका आसन भी न मिला, किसीने उन्हें भूमिपर भी बैठनेको न कहा — अर्घ्य और आदरभरी मीठी बातें तो कहाँसे मिलतीं - तब अपनेको अपमानित - सा मानकर वे क्रोधके वश हो गये ॥२८ ॥
अभूतपूर्वः सहसा क्षुत्तृड्भ्यामर्दितात्मनः ।
ब्राह्मणं प्रत्यभूद् ब्रह्मन् मत्सरो मन्युरेव च ॥ २ ९
स ' तु ब्रह्मऋषेरंसे गतासुमुरगं रुषा ।
विनिर्गच्छन्धनुष्कोट्या निधाय पुरमागमत् ॥३०
एष किं निभृताशेषकरणो मीलितेक्षणः ।
मृषासमाधिराहोस्वित्किं नु स्यात्क्षत्रबन्धुभिः ॥ ३१
तस्य पुत्रोऽतितेजस्वी विहरन् बालकोऽर्भकैः ।
राज्ञाघं प्रापितं तातं श्रुत्वा तत्रेदमब्रवीत् ॥३२
अहो अधर्मः पालानां पीन्नां बलिभुजामिव ।
स्वामिन्यघं यद् दासानां द्वारपानां शुनामिव ॥ ३३
ब्राह्मणैः क्षत्रबन्धुर्हि द्वारपालो निरूपितः ।
स कथं तद्गृहे द्वाःस्थः सभाण्डं भोक्तुमर्हति ॥३४
कृष्णे गते भगवति शास्तर्युत्पथगामिनाम् ।
तद्भिन्नसेतूनद्याहं ' शास्मि पश्यत मे बलम् ॥३५
इत्युक्त्वा रोषताम्राक्षो वयस्यानृषिबालकः ।
कौशिक्याप उपस्पृश्य वाग्वज्रं विससर्ज ह॥३६
इति ॰ लङ्घितमर्यादं तक्षकः सप्तमेऽहनि ।
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दङ्क्ष्यति स्म कुलाङ्गारं चोदितो मे ततद्रुहम् ॥ ३७ शौनकजी! वे भूख - प्याससे छटपटा रहे थे, इसलिये एकाएक उन्हें ब्राह्मणके प्रति ईर्ष्या और क्रोध हो आया । उनके जीवनमें इस प्रकारका यह पहला ही अवसर था ॥२९ ॥ वहाँसे
लौटते समय उन्होंने क्रोधवश धनुषकी नोकसे एक मरा साँप उठाकर ऋषिके गलेमें डाल दिया और अपनी राजधानीमें चले आये || ३० || उनके मनमें यह बात आयी कि इन्होंने जो अपने नेत्र बंद कर रखे हैं, सो क्या वास्तवमें इन्होंने अपनी सारी इन्द्रियवृत्तियोंका निरोध कर लिया है अथवा इन राजाओंसे हमारा क्या प्रयोजन है, यों सोचकर इन्होंने झूठ - मूठ समाधिका ढोंग रच रखा है ॥३१ ॥
उन शमीक मुनिका पुत्र बड़ा तेजस्वी था । वह दूसरे ऋषिकुमारोंके साथ पास ही खेल रहा था । जब उस बालकने सुना कि राजाने मेरे पिताके साथ दुर्व्यवहार किया है, तब वह इस प्रकार कहने लगा- ॥३२ ॥ ‘ ये नरपति कहलानेवाले लोग उच्छिष्टभोजी कौओंके समान
संड - मुसंड होकर कितना अन्याय करने लगे हैं! ब्राह्मणोंके दास होकर भी ये दरवाजेपर पहरा देनेवाले कुत्तेके समान अपने स्वामीका ही तिरस्कार करते हैं || ३३ || ब्राह्मणोंने क्षत्रियोंको चाहिये, घरमें अपना द्वारपाल बनाया है । उन्हें द्वारपर रहकर रक्षा करनी घुसकर स्वामी बर्तनोंमें खानेका उसे अधिकार नहीं है || ३४ || अतएव उन्मार्गगामियोंके शासक भगवान् श्रीकृष्णके परमधाम पधार जानेपर इन मर्यादा तोड़नेवालोंको आज मैं दण्ड देता हूँ । मेरा तपोबल देखो ' || ३५ || अपने साथी बालकोंसे इस प्रकार कहकर क्रोधसे लाल - लाल आँखोंवाले उस ऋषिकुमारने कौशिकी नदीके जलसे आचमन करके अपने वाणी - रूपी वज्रका प्रयोग किया ॥ ३६ ॥ ' कुलांगार परीक्षितने मेरे पिताका अपमान करके मर्यादाका
उल्लंघन किया है, इसलिये मेरी प्रेरणासे आजके सातवें दिन उसे तक्षक सर्प डस लेगा ' ॥३७ ॥
ततोऽभ्येत्याश्रमं बालो गले सर्पकलेवरम् ।
पितरं वीक्ष्य दुःखार्तो मुक्तकण्ठो रुरोद ह ॥३८
स वा आङ्गिरसो ब्रह्मन् श्रुत्वा सुतविलापनम् ।
उन्मील्य शनकैर्नेत्रे दृष्ट्वा स्वांसे मृतोरगम् ॥३९
विसृज्य पुत्रं पप्रच्छ वत्स कस्माद्धि रोदिषि ।
केन वा तेऽपकृतमित्युक्तः स न्यवेदयत् ॥ ४०
निशम्य शप्तमतदर्हं नरेन्द्रं
स ब्राह्मणो नात्मजमभ्यनन्दत् ।
अहो बतांहो महदज्ञ ते कृत-मल्पीयसि द्रोह उरुर्दमो धृतः ॥४१
न वै नृभिर्नरदेवं पराख्यं सम्मातुमर्हस्यविपक्वबुद्धे ।
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यत्तेजसा दुर्विषहेण गुप्ता विन्दन्ति भद्राण्यकुतोभयाः प्रजाः ॥४२ अलक्ष्यमाणे नरदेवनाम्नि
रथाङ्गपाणावयमङ्ग लोकः ।
तदा हि चौरप्रचुरो विनङ्क्ष्य-त्यरक्ष्यमाणोऽविवरूथवत् क्षणात् ॥४३
तदद्य नः पापमुपैत्यनन्वयं यन्नष्टनाथस्य वसोर्विलुम्पकात् । परस्परं घ्नन्ति शपन्ति वृञ्जते पशून स्त्रियोऽर्थान् पुरुदस्यवो जनाः ॥४४ तदाऽऽर्यधर्मश्च विलीयते नृणां वर्णाश्रमाचारयुतस्त्रयीमयः । ततोऽर्थकामाभिनिवेशितात्मनां शुनां कपीनामिव वर्णसङ्करः ॥४५ धर्मपालो नरपतिः स तु सम्राड् बृहच्छ्रवाः ।
साक्षान्महाभागवतो राजर्षिर्हयमेधयाट् ।
क्षुत्तृश्रमयुतो दीनो नैवास्मच्छापमर्हति ॥४६
इसके बाद वह बालक अपने आश्रमपर आया और अपने पिताके गलेमें साँप देखकर उसे बड़ा दुःख हुआ तथा वह ढाड़ मारकर रोने लगा || ३८ || विप्रवर शौनकजी! शमीक मुनिने अपने पुत्रका रोना - चिल्लाना सुनकर धीरे - धीरे अपनी आँखें खोली और देखा कि उनके गलेमें एक मरा साँप पड़ा है ॥ ३ ९ ॥ उसे फेंककर उन्होंने अपने पुत्रसे पूछा — ' बेटा! तुम क्यों रो रहे हो? किसने तुम्हारा अपकार किया है? ' उनके इस प्रकार पूछनेपर बालकने सारा हाल कह दिया || ४० || ब्रह्मर्षि शमीकने राजाके शापकी बात सुनकर अपने पुत्रका अभिनन्दन नहीं किया । उनकी दृष्टिमें परीक्षित शापके योग्य नहीं थे । उन्होंने कहा — ‘ ओह, मूर्ख बालक! तूने बड़ा पाप किया! खेद है कि उनकी थोड़ी - सी गलतीके लिये तूने उनको इतना बड़ा दण्ड दिया ॥४१ ॥ तेरी बुद्धि अभी कच्ची है । तुझे भगवत्स्वरूप राजाको
साधारण मनुष्योंके समान नहीं समझना चाहिये; क्योंकि राजाके दुस्सह तेजसे सुरक्षित और निर्भय रहकर ही प्रजा अपना कल्याण सम्पादन करती है ॥ ४२ ॥ जिस समय राजाका रूप
धारण करके भगवान् पृथ्वीपर नहीं दिखायी देंगे, उस समय चोर बढ़ जायँगे और अरक्षित भेड़ोंके समान एक क्षणमें ही लोगोंका नाश हो जायगा ॥४३ ॥ राजाके नष्ट हो जानेपर धन
आदि चुरानेवाले चोर जो पाप करेंगे, उसके साथ हमारा कोई सम्बन्ध न होनेपर भी वह हमपर भी लागू होगा । क्योंकि राजाके न रहनेपर लुटेरे बढ़ जाते हैं और वे आपसमें मार - पीट, गाली - गलौज करते हैं, साथ ही पशु, स्त्री और धन - सम्पत्ति भी लूट लेते हैं ॥४४ ॥ उस समय
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मनुष्योंका वर्णाश्रमाचार - युक्त वैदिक आर्यधर्म लुप्त हो जाता है, अर्थ - लोभ और काम-वासनाके विवश होकर लोग कुत्तों और बंदरोंके समान वर्णसंकर हो जाते हैं ॥४५ ॥ सम्राट्
परीक्षित् तो बड़े ही यशस्वी और धर्मधुरन्धर हैं । उन्होंने बहुत - से अश्वमेध यज्ञ किये हैं और वे भगवान्के परम प्यारे भक्त हैं; वे ही राजर्षि भूख - प्याससे व्याकुल होकर हमारे आश्रमपर आये थे, वे शापके योग्य कदापि नहीं हैं ॥ ४६ ॥
अपापेषु स्वभृत्येषु बालेनापक्वबुद्धिना ।
पापं कृतं तद्भगवान् सर्वात्मा क्षन्तुमर्हति ॥४७
तिरस्कृता विप्रलब्धाः शप्ताः क्षिप्ता हता अपि ।
नास्य तत् प्रतिकुर्वन्ति तद्भक्ताः प्रभवोऽपि हि ॥४८
इति पुत्रकृताघेन सोऽनुतप्तो महामुनिः ।
स्वयं विप्रकृतो राज्ञा नैवाघं तदचिन्तयत् ॥४९
प्रायशः साधवो लोके परैर्द्वन्द्वेषु योजिताः ।
न व्यथन्ति न हृष्यन्ति यत आत्माऽगुणाश्रयः ॥५०
इस नासमझ बालकने हमारे निष्पाप सेवक राजाका अपराध किया है, सर्वात्मा भगवान् कृपा करके इसे क्षमा करें ॥ ४७ ॥ भगवान्के भक्तोंमें भी बदला लेनेकी शक्ति होती है, परंतु
वे दूसरोंके द्वारा किये हुए अपमान, धोखेबाजी, गाली - गलौज, आक्षेप और मार - पीटका कोई बदला नहीं लेते ॥४८ ॥ महामुनि शमीकको पुत्रके अपराधपर बड़ा पश्चात्ताप हुआ । राजा
परीक्षित्ने जो उनका अपमान किया था, उसपर तो उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया ॥ ४ ९ ॥ महात्माओंका स्वभाव ही ऐसा होता है कि जगत्में जब दूसरे लोग उन्हें सुख - दुःखादि द्वन्द्वोंमें डाल देते हैं, तब भी वे प्रायः हर्षित या व्यथित नहीं होते; क्योंकि आत्माका स्वरूप तो गुणोंसे सर्वथा परे है ॥५० ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे विप्रशापोपलम्भनं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥१८ ॥
१. प्रा ० पा ० – नाभि ० । २. प्रा ० पा०–- नृपो । ३. प्रा ० पा ० — मेतद्धि । १. प्रा ० पा ० — ततो । २. प्रा ० पा ० – विद्वान् । ३. प्रा ० पा ० – बत । ४. प्रा ० पा०-रसाम्यैरति ० । * उच्च वर्णकी माता और निम्न वर्णके पितासे उत्पन्न संतानको ' विलोमज ' कहते हैं । सूत जातिकी उत्पत्ति इसी प्रकार ब्राह्मणी माता और क्षत्रिय पिताके द्वारा होनेसे उसे शास्त्रोंमें
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विलोम जाति माना गया है । १. प्रा ० पा ० — तस्य ब्रह्मर्षरंसे । २. प्रा ० पा ० - मागतः । ३. प्रा ० पा ० – गृहपालो । ४. प्रा ० पा ० — भङ्क्तु । ५. प्रा ० पा ० – सेतुमद्या ० । ६. प्रा ० पा ० – अतो । ७. प्रा ० पा०— पितृद्रुहम् । -
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अथैकोनविंशोऽध्यायः परीक्षित्का अनशनव्रत और शुकदेवजीका आगमन सूत उवाच महीपतिस्त्वथ तत्कर्म ग विचिन्तयन्नात्मकृतं सुदुर्मनाः । अहो मया नीचमनार्यवत्कृतं निरागसि ब्रह्मणि गूढतेजसि ॥ १ ध्रुवं ततो मे कृतदेवहेलनाद् दुरत्ययं व्यसनं नातिदीर्घात् । तदस्तु कामं त्वघनिष्कृताय ' मे यथा न कुर्यां पुनरेवमद्धार ॥२ अद्यैव राज्यं बलमृद्धको ३ प्रकोपितब्रह्मकुलानलो मे । दहत्वभद्रस्य पुनर्न मेऽभूत् ' पापीयसी धीर्द्विजदेवगोभ्यः ॥३ सूतजी कहते हैं— राजधानीमें पहुँचनेपर राजा परीक्षित्को अपने उस निन्दनीय कर्मके लिये बड़ा पश्चात्ताप हुआ । वे अत्यन्त उदास हो गये और सोचने लगे — ' मैंने निरपराध एवं अपना तेज छिपाये हुए ब्राह्मणके साथ अनार्य पुरुषोंके समान बड़ा नीच व्यवहार किया । यह बड़े खेदकी बात है ॥१ ॥ अवश्य ही उन महात्माके अपमानके फलस्वरूप शीघ्र से शीघ्र
मुझपर कोई घोर विपत्ति आवेगी । मैं भी ऐसा ही चाहता हूँ; क्योंकि उससे मेरे पापका प्रायश्चित्त हो जायगा और फिर कभी मैं ऐसा काम करनेका दुःसाहस नहीं करूँगा ॥२ ॥
ब्राह्मणोंकी क्रोधाग्नि आज ही मेरे राज्य, सेना और भरे - पूरे खजानेको जलाकर खाक कर दे –जिससे फिर कभी मुझ दुष्टकी ब्राह्मण, देवता और गौओंके प्रति ऐसी पापबुद्धि न हो ॥३ ॥
सचिन्तयन्नित्थमथा शृणोद् यथा
मुनेः सुतोक्तो निरृतिस्तक्षकाख्यः ।
स साधु मेने नचिरेण तक्षका-नलं प्रसक्तस्य विरक्तिकारणम् ॥४
अथो विहायेमममुं च लोकं
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विमर्शितौ हेयतया पुरस्तात् । कृष्णाङ्घ्रिसेवामधिमन्यमान उपाविशत् प्रायममर्त्यनद्याम् ॥ ५ या वै लसच्छ्रीतुलसीविमिश्र-कृष्णाङ्घ्रिरेण्वभ्यधिकाम्बुनेत्री । पुनाति लोकानुभयत्र सेशान् कस्ता न सेवेत मरिष्यमाणः ॥ ६ इति व्यवच्छिद्य स पाण्डवेयः प्रायोपवेशं प्रति विष्णुपद्याम् । दध्यौ मुकुन्दाङ्घ्रिमनन्यभावो मुनिव्रतो मुक्तसमस्तसङ्गः ॥७ तत्रोपजग्मुर्भुवनं पुनाना महानुभावा मुनयः सशिष्याः । प्रायेण तीर्थाभिगमापदेशैः स्वयं हि तीर्थानि पुनन्ति सन्तः ॥८ अत्रिर्वसिष्ठश्च्यवनः शरद्वा-नरिष्टनेमिर्भृगुरङ्गिराश्च । पराशरो गाधिसुतोऽथ राम उतथ्य इन्द्रप्रमदेध्मवाहौ ॥९ मेधातिथिर्देवल आर्ष्टिषेणो
भारद्वाजो गौतमः पिप्पलादः ।
मैत्रेय और्वः कवषः कुम्भयोनि-द्वैपायनो भगवान्नारदश्च ॥१०
अन्ये च देवर्षिब्रह्मर्षिवर्या
राजर्षिवर्या अरुणादयश्च ।
नानार्षेयप्रवरान् समेता-नभ्यर्च्य राजा शिरसा ववन्दे ॥११
वे इस प्रकार चिन्ता कर ही रहे थे कि उन्हें मालूम हुआ - ऋषिकुमारके शापसे तक्षक मुझे डसेगा । उन्हें वह धधकती हुई आगके समान तक्षकका डसना बहुत भला मालूम हुआ । उन्होंने सोचा कि बहुत दिनोंसे मैं संसारमें आसक्त हो रहा था, अब मुझे शीघ्र वैराग्य होनेका कारण प्राप्त हो गया । । ४ ॥ वे इस लोक और परलोकके भोगोंको तो पहलेसे ही तुच्छ और त्याज्य समझते थे । अब उनका स्वरूपतः त्याग करके भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी
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सेवाको ही सर्वोपरि मानकर आमरण अनशनव्रत लेकर वे गंगातटपर बैठ गये ॥५ ॥
गंगाजीका जल भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंका वह पराग लेकर प्रवाहित होता है, जो श्रीमती तुलसीकी गन्धसे मिश्रित है । यही कारण है कि वे लोकपालोंके सहित ऊपर - नीचेके समस्त लोकोंको पवित्र करती हैं । कौन ऐसा मरणासन्न पुरुष होगा, जो उनका सेवन न करेगा? ॥६ ॥
इस प्रकार गंगाजीके तटपर आमरण अनशनका निश्चय करके उन्होंने समस्त आसक्तियोंका परित्याग कर दिया और वे मुनियोंका व्रत स्वीकार करके अनन्यभावसे श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ध्यान करने लगे ॥ ७ ॥ उस समय त्रिलोकीको पवित्र करनेवाले
बड़े - बड़े महानुभाव ऋषि - मुनि अपने शिष्योंके साथ वहाँ पधारे । संतजन प्रायः तीर्थयात्राके बहाने स्वयं उन तीर्थस्थानोंको ही पवित्र करते हैं ॥८ ॥ उस समय वहाँपर अत्रि, वसिष्ठ,
च्यवन, शरद्वान्, अरिष्टनेमि, भृगु, अंगिरा, पराशर, विश्वामित्र, परशुराम, उतथ्य, इन्द्रप्रमद, इध्मवाह, मेधातिथि, देवल, आर्ष्टिषेण, भारद्वाज, गौतम, पिप्पलाद, मैत्रेय, और्व, कवष, अगस्त्य, भगवान् व्यास, नारद तथा इनके अतिरिक्त और भी कई श्रेष्ठ देवर्षि, ब्रह्मर्षि तथा अरुणादि राजर्षिवर्योंका शुभागमन हुआ । इस प्रकार विभिन्न गोत्रोंके मुख्य - मुख्य ऋषियोंको एकत्र देखकर राजाने सबका यथायोग्य सत्कार किया और उनके चरणोंपर सिर रखकर वन्दना की ॥९ -११ ॥ सुखोपविष्टेष्वथ तेषु भूयः कृतप्रणामः स्वचिकीर्षितं यत् । विज्ञापयामास विविक्तचेता उपस्थितोऽग्रेऽभिगृहीतपाणिः ॥१२ राजोवाच अहो वयं धन्यतमा नृपाणां महत्तमानुग्रहणीयशीलाः । राज्ञां कुलं ब्राह्मणपादशौचाद् दूराद् विसृष्टं बत गर्ह्यकर्म ॥१३ तस्यैव मेऽघस्य परावरेशो व्यासक्तचित्तस्य गृहेष्वभीक्ष्णम् । निर्वेदमूलो द्विजशापरूपो यत्र प्रसक्तो भयमाशु धत्ते ॥१४ तं मोपयातं प्रतियन्तु विप्रा गङ्गा च देवी धृतचित्तमीशे ।
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द्विजोपसृष्टः कुहकस्तक्षको वा दशत्वलं गायत विष्णुगाथाः ॥१५ पुनश्च भूयाद्भगवत्यनन्ते रतिः प्रसङ्गश्च तदाश्रयेषु । महत्सु यां यामुपयामि सृष्टिं मैत्र्यस्तु सर्वत्र नमो द्विजेभ्यः ॥१६ इति स्म राजाध्यवसाययुक्तः प्राचीनमूलेषु कुशेषु धीरः । उदङ्मुखो दक्षिणकूल आस्ते समुद्रपत्न्याः स्वसुतन्यस्तभारः ॥१७ जब सब लोग आरामसे अपने - अपने आसनोंपर बैठ गये, तब महाराज परीक्षित्ने उन्हें फिरसे प्रणाम किया और उनके सामने खड़े होकर शुद्ध हृदयसे अंजलि बाँधकर वे जो कुछ करना चाहते थे, उसे सुनाने लगे ॥१२ ॥
राजा परीक्षित्ने कहा— अहो! समस्त राजाओंमें हम धन्य हैं । धन्यतम हैं; क्योंकि अपने शील - स्वभावके कारण हम आप महापुरुषोंके कृपापात्र बन गये हैं । राजवंशके लोग प्रायः निन्दित कर्म करनेके कारण ब्राह्मणोंके चरण - धोवनसे दूर पड़ जाते हैं - यह कितने खेदकी बात है ॥१३ ॥ मैं भी राजा ही हूँ । निरन्तर देह - गेहमें आसक्त रहनेके कारण मैं भी पापरूप
ही हो गया हूँ । इसीसे स्वयं भगवान् ही ब्राह्मणके शापके रूपमें मुझपर कृपा करनेके लिये पधारे हैं । यह शाप वैराग्य उत्पन्न करनेवाला है । क्योंकि इस प्रकारके शापसे संसारासक्त पुरुष भयभीत होकर विरक्त हो जाया करते हैं ॥१४ ॥
ब्राह्मणो! अब मैंने अपने चित्तको भगवान्के चरणोंमें समर्पित कर दिया है । आपलोग और माँ गंगाजी शरणागत जानकर मुझपर अनुग्रह करें, ब्राह्मणकुमारके शापसे प्रेरित कोई दूसरा कपटसे तक्षकका रूप धरकर मुझे डस ले अथवा स्वयं तक्षक आकर डस ले; इसकी मुझे तनिक भी परवा नहीं है । आपलोग कृपा करके भगवान्की रसमयी लीलाओंका गायन करें ॥१५ ॥ मैं आप ब्राह्मणोंके चरणोंमें प्रणाम करके पुनः यही प्रार्थना करता हूँ कि मुझे
कर्मवश चाहे जिस योनिमें जन्म लेना पड़े, भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें मेरा अनुराग हो, उनके चरणाश्रित महात्माओंसे विशेष प्रीति हो और जगत् के समस्त प्राणियोंके प्रति मेरी
एक - सी मैत्री रहे । ऐसा आप आशीर्वाद दीजिये ॥१६ ॥
महाराज परीक्षित् परम धीर थे । वे ऐसा दृढ़ निश्चय करके गंगाजीके दक्षिण तटपर पूर्वाग्र कुशोंके आसनपर उत्तरमुख होकर बैठ गये । राज - काजका भार तो उन्होंने पहले ही अपने पुत्र जनमेजयको सौंप दिया था ॥१७ ॥
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एवं च तस्मिन्नरदेवदेवे
प्रायोपविष्टे दिवि देवसङ्घाः ।
प्रशस्य भूमौ व्यकिरन् प्रसूनै-र्मुदा मुहुर्दुन्दुभयश्च नेदुः ॥१८
महर्षयो वै समुपागता ये प्रशस्य साध्वित्यनुमोदमानाः । ऊचुः प्रजानुग्रहशीलसारा यदुत्तमश्लोकगुणाभिरूपम् ॥१९ न वा इदं राजर्षिवर्य चित्रं भवत्सु कृष्णं समनुव्रतेषु । येऽध्यासनं राजकिरीटजुष्टं सद्यो जहुर्भगवत्पार्श्वकामाः ॥ २० सर्वे वयं तावदिहास्महेऽद्य कलेवरं यावदसौ विहाय । लोकं परं विरजस्कं विशोकं यास्यत्ययं भागवतप्रधानः ॥२१ आश्रुत्य तदृषिगणवचः परीक्षित् समं मधुच्युद् गुरु चाव्यलीकम् । आभाषतैनानभिनन्द्य युक्तान् शुश्रूषमाणश्चरितानि विष्णोः ॥ २२ समागताः सर्वत एव सर्वे वेदा यथा मूर्तिधरास्त्रिपृष्ठे । नेहाथवामुत्र च कश्चनार्थ ऋते परानुग्रहमात्मशीलम् ॥२३ ततश्च वः पृच्छ्यमिमं विपृच्छे विश्रभ्य विप्रा इतिकृत्यतायाम् । सर्वात्मना म्रियमाणैश्च कृत्यं शुद्धं च तत्रामृशताभियुक्ताः ॥ २४