श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 311–320
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 311–320
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पृथ्वीके एकच्छत्र सम्राट् परीक्षित् जब इस प्रकार आमरण अनशनका निश्चय करके बैठ गये, तब आकाशमें स्थित देवतालोग बड़े आनन्दसे उनकी प्रशंसा करते हुए वहाँ पृथ्वीपर पुष्पोंकी वर्षा करने लगे तथा उनके नगारे बार - बार बजने लगे ॥१८ ॥
सभी उपस्थित महर्षियोंने परीक्षित्के निश्चयकी प्रशंसा की और ' साधु - साधु ' कहकर उनका अनुमोदन किया । ऋषिलोग तो स्वभावसे ही लोगोंपर अनुग्रहकी वर्षा करते रहते हैं; यही नहीं, उनकी सारी शक्ति लोकपर कृपा करनेके लिये ही होती है । उन लोगोंने भगवान् श्रीकृष्णके गुणोंसे प्रभावित परीक्षित्के प्रति उनके अनुरूप वचन कहे ॥१९ ॥
‘ राजर्षिशिरोमणे! भगवान् श्रीकृष्णके सेवक और अनुयायी आप पाण्डुवंशियोंके लिये यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि आपलोगोंने भगवान्की सन्निधि प्राप्त करनेकी आकांक्षासे उस राजसिंहासनका एक क्षणमें ही परित्याग कर दिया, जिसकी सेवा बड़े - बड़े राजा अपने मुकुटोंसे करते थे ॥२० ॥
हम सब तबतक यहीं रहेंगे, जबतक ये भगवान्के परम भक्त परीक्षित् अपने नश्वर शरीरको छोड़कर मायादोष एवं शोकसे रहित भगवद्धाममें नहीं चले जाते ' ॥२१ ॥
ऋषियोंके ये वचन बड़े ही मधुर, गम्भीर, सत्य और समतासे युक्त थे । उन्हें सुनकर राजा परीक्षित्ने उन योगयुक्त मुनियोंका अभिनन्दन किया और भगवान्के मनोहर चरित्र सुननेकी इच्छासे ऋषियोंसे प्रार्थना की ॥२२ ॥
‘ महात्माओ! आप सभी सब ओरसे यहाँ पधारे हैं । आप सत्यलोकमें रहनेवाले मूर्तिमान् वेदोंके समान हैं । आपलोगोंका दूसरोंपर अनुग्रह करनेके अतिरिक्त, जो आपका सहज स्वभाव ही है, इस लोक या परलोकमें और कोई स्वार्थ नहीं है ॥२३ ॥
विप्रवरो! आपलोगोंपर पूर्ण विश्वास करके मैं अपने कर्तव्यके सम्बन्धमें यह पूछने योग्य प्रश्न करता हूँ । आप सभी विद्वान् परस्पर विचार करके बतलाइये कि सबके लिये सब अवस्थाओंमें और विशेष करके थोड़े ही समयमें मरनेवाले पुरुषोंके लिये अन्तःकरण और शरीरसे करनेयोग्य विशुद्ध कर्म कौन - सा है * ॥ २४ ॥
तत्राभवद्भगवान् व्यासपुत्रो यदृच्छया गामटमानोऽनपेक्षः । अलक्ष्यलिङ्गो निजलाभतुष्टो वृतश्च बालैरवधूतवेषः ॥२५ तं द्वयष्टवर्षं सुकुमारपाद-करोरुबाहंसकपोलगात्रम् । चार्वायताक्षोन्नसतुल्यकर्ण सुभ्रुवाननं कम्बुसुजातकण्ठम् ॥२६ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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निगूढजत्रं पृथुतुङ्गवक्षस-मावर्तनाभिं वलिवल्गूदरं च । दिगम्बरं वक्त्रविकीर्णकेशं प्रलम्बबाहुं स्वमरोत्तमाभम् ॥२७ श्यामं सदापीच्यवयोऽङ्गलक्ष्म्या
स्त्रीणां मनोज्ञं रुचिरस्मितेन ।
प्रत्युत्थितास्ते मुनयः स्वासनेभ्य-स्तल्लक्षणज्ञा अपि गूढवर्चसम् ॥२८
स विष्णुरातोऽतिथय आगताय तस्मै सपर्यां शिरसाऽऽजहार । ततो निवृत्ता ह्यबुधाः स्त्रियोऽर्भका महासने सोपविवेश पूजितः ॥२९ उसी समय पृथ्वीपर स्वेच्छासे विचरण करते हुए, किसीकी कोई अपेक्षा न रखनेवाले व्यासनन्दन भगवान् श्रीशुकदेवजी महाराज वहाँ प्रकट हो गये । वे वर्ण अथवा आश्रमके बाह्य चिह्नोंसे रहित एवं आत्मानुभूतिमें सन्तुष्ट थे । बच्चों और स्त्रियोंने उन्हें घेर रखा था । उनका वेष अवधूतका था ॥२५ ॥
सोलह वर्षकी अवस्था थी । चरण, हाथ, जंघा, भुजाएँ, कंधे, कपोल और अन्य सब अंग अत्यन्त सुकुमार थे । नेत्र बड़े - बड़े और मनोहर थे । नासिका कुछ ऊँची थी । कान बराबर थे । सुन्दर भौंहें थीं, इनसे मुख बड़ा ही शोभायमान हो रहा था । गला तो मानो सुन्दर शंख ही था ॥२६ ॥
हँसली ढकी हुई, छाती चौड़ी और उभरी हुई, नाभि भँवरके समान गहरी तथा उद्र बड़ा ही सुन्दर, त्रिवलीसे युक्त था । लंबी - लंबी भुजाएँ थीं, मुखपर घुँघराले बाल बिखरे हुए थे । इस दिगम्बर वेषमें वे श्रेष्ठ देवताके समान तेजस्वी जान पड़ते थे ॥ २७ ॥
श्याम रंग था । चित्तको चुरानेवाली भरी जवानी थी । वे शरीरकी छटा और मधुर मुसकानसे स्त्रियोंको सदा ही मनोहर जान पड़ते थे । यद्यपि उन्होंने अपने तेजको छिपा रखा था, फिर भी उनके लक्षण जाननेवाले मुनियोंने उन्हें पहचान लिया और वे सब - के - सब अपने-अपने आसन छोड़कर उनके सम्मानके लिये उठ खड़े हुए ॥२८ ॥
राजा परीक्षित्ने अतिथिरूपसे पधारे हुए श्रीशुकदेवजीको सिर झुकाकर प्रणाम किया और उनकी पूजा की । उनके स्वरूपको न जाननेवाले बच्चे और स्त्रियाँ उनकी यह महिमा देखकर वहाँसे लौट गये; सबके द्वारा सम्मानित होकर श्रीशुकदेवजी श्रेष्ठ आसनपर विराजमान हुए ॥२९ ॥
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स संवृतस्तत्र महान् महीयसां
ब्रह्मर्षिराजर्षिदेवर्षिसङ्घैः ।
व्यरोचतालं भगवान् यथेन्दु-र्ग्रहर्क्षतारानिकरैः परीतः ॥ ३०
प्रशान्तमासीनमकुण्ठमेधसं
मुनिं नृपो भागवतोऽभ्युपेत्य ।
प्रणम्य मूर्ध्वावहितः कृताञ्जलि-र्नत्वा गिरा सूनृतयान्वपृच्छत् ॥३१
परीक्षिदुवाच
अहो अद्य वयं ब्रह्मन् सत्सेव्याः क्षत्रबन्धवः ।
कृपयातिथिरूपेण भवद्भिस्तीर्थकाः कृताः ॥ ३२
येषां संस्मरणात् पुंसां ' सद्यः शुद्ध्यन्ति वै गृहाः I किं पुनर्दर्शनस्पर्शपादशौचासनादिभिः ॥३३
सांनिध्यात्ते महायोगिन्यातकानि महान्त्यपि ।
सद्यो नश्यन्ति वै पुंसां विष्णोरिव सुरेतराः ॥३४
अपि मे भगवान् प्रीतः कृष्णः पाण्डुसुतप्रियः ।
पैतृष्वसेयप्रीत्यर्थं तद्गोत्रस्यात्तबान्धवः ॥३५
अन्यथा तेऽव्यक्तगतेर्दर्शनं नः कथं नृणाम् ।
नितरां म्रियमाणानां संसिद्धस्य वनीयसः २ ॥३६
अतः पृच्छामि संसिद्धिं योगिनां परमं गुरुम् ।
पुरुषस्येह यत्कार्यं म्रियमाणस्य सर्वथा ॥३७
ग्रह, नक्षत्र और तारोंसे घिरे हुए चन्द्रमाके समान ब्रह्मर्षि, देवर्षि और राजर्षियोंके समूहसे आवृत श्रीशुकदेवजी अत्यन्त शोभायमान हुए । वास्तवमें वे महात्माओंके भी आदरणीय थे || ३० ॥ जब प्रखरबुद्धि श्रीशुकदेवजी शान्तभावसे बैठ गये, तब भगवान्के परम भक्त ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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परीक्षित्ने उनके समीप आकर और चरणोंपर सिर रखकर प्रणाम किया । फिर खड़े होकर
हाथ जोड़कर नमस्कार किया । उसके पश्चात् बड़ी मधुर वाणीसे उनसे यह पूछा ॥३१ ॥
परीक्षित्ने कहा — ब्रह्मस्वरूप भगवन्! आज हम बड़भागी हुए; क्योंकि अपराधी क्षत्रिय होनेपर भी हमें संत - समागमका अधिकारी समझा गया । आज कृपापूर्वक अतिथिरूपसे पधारकर आपने हमें तीर्थके तुल्य पवित्र बना दिया ॥ ३२ ॥
आप - जैसे महात्माओंके स्मरणमात्रसे ही गृहस्थोंके घर तत्काल पवित्र हो जाते हैं; फिर दर्शन, स्पर्श, पादप्रक्षालन और आसन - दानादिका सुअवसर मिलनेपर तो कहना ही क्या है ॥३३ ॥
महायोगिन्! जैसे भगवान् विष्णुके सामने दैत्यलोग नहीं ठहरते, वैसे ही आपकी सन्निधिसे बड़े - बड़े पाप भी तुरंत नष्ट हो जाते हैं ॥३४ ॥
अवश्य ही पाण्डवोंके सुहृद् भगवान् श्रीकृष्ण मुझपर अत्यन्त प्रसन्न हैं; उन्होंने अपने फुफेरे भाइयोंकी प्रसन्नताके लिये उन्हींके कुलमें उत्पन्न हुए मेरे साथ भी अपनेपनका व्यवहार किया है ॥३५ ॥
भगवान् श्रीकृष्णकी कृपा न होती तो आप - सरीखे एकान्त वनवासी अव्यक्तगति परम सिद्ध पुरुष स्वयं पधारकर इस मृत्युके समय हम जैसे प्राकृत मनुष्योंको क्यों दर्शन देते ॥३६ ॥
आप योगियोंके परम गुरु हैं, इसलिये मैं आपसे परम सिद्धिके स्वरूप और साधनके सम्बन्धमें प्रश्न कर रहा हूँ । जो पुरुष सर्वथा मरणासन्न है, उसको क्या करना चाहिये? ॥३७ ॥
यच्छ्रोतव्यमथो जप्यं यत्कर्तव्यं नृभिः प्रभो ।
स्मर्तव्यं भजनीयं वा ब्रूहि यद्वा विपर्ययम् ॥३८
नूनं भगवतो ब्रह्मन् गृहेषु गृहमेधिनाम् ।
न लक्ष्यते ह्यवस्थानमपि गोदोहनं क्वचित् ॥३९
सूत उवाच
एवमाभाषितः पृष्टः स राज्ञा श्लक्ष्णया गिरा ।
प्रत्यभाषत धर्मज्ञो भगवान् बादरायणिः ॥४०
भगवन्! साथ ही यह भी बतलाइये कि मनुष्यमात्रको क्या करना चाहिये । वे किसका श्रवण, किसका जप, किसका स्मरण और किसका भजन करें तथा किसका त्याग करें? ॥३८ ॥ भगवत्स्वरूप मुनिवर! आपका दर्शन अत्यन्त दुर्लभ है; क्योंकि जितनी देर
एक गाय दुही जाती है, गृहस्थोंके घरपर उतनी देर भी तो आप नहीं ठहरते ॥३९ ॥
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सूतजी कहते हैं - जब राजाने बड़ी ही मधुर वाणीमें इस प्रकार सम्भाषण एवं प्रश्न किये, तब समस्त धर्मोंके मर्मज्ञ व्यासनन्दन भगवान् श्रीशुकदेवजी उनका उत्तर देने लगे ॥४० ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयासिक्यामष्टादशसाहस्रयां पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शुकागमनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥१९ ॥
॥ इति प्रथमः स्कन्धः समाप्तः ॥ ॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥ १. प्रा ० पा ० – ह्यघ । २. प्रा ० पा ० - पुनरेव सद्यः । ३. प्रा ० पा ० – बलमूर्ज ० । ४. प्रा ० पा ० - मेऽस्तु । * इस जगह राजाने ब्राह्मणोंसे दो प्रश्न किये हैं; पहला प्रश्न यह है कि जीवको सदा-सर्वदा क्या करना चाहिये और दूसरा यह कि जो थोड़े ही समयमें मरनेवाले हैं, उनका क्या कर्तव्य है? ये ही दो प्रश्न उन्होंने श्रीशुकदेवजीसे भी किये तथा क्रमशः इन्हीं दोनों प्रश्नोंका उत्तर द्वितीय स्कन्धसे लेकर द्वादशपर्यन्त श्रीशुकदेवजीने दिया है । १. प्रा ० पा ० – पुंसः । २. प्रा ० पा ० वरीयसः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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॥ ॐ तत्सत् ॥ ॥ श्रीगणेशायः नमः ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराणम् द्वितीयः स्कन्धः अथ प्रथमोऽध्यायः ध्यान - विधि और भगवान्के विराट्स्वरूपका वर्णन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय श्रीशुक उवाच
वरीयानेष ते प्रश्नः कृतो लोकहितं ' नृप ।
आत्मवित्सम्मतः पुंसां श्रोतव्यादिषु यः परः ॥ १
श्रोतव्यादीनि राजेन्द्र नृणां सन्ति सहस्रशः ।
अपश्यतामात्मतत्त्वं गृहेषु गृहमेधिनाम् ॥२
निद्रया ह्रियते नक्तं व्यवायेन च वा वयः ।
दिवा चार्थेहया राजन् कुटुम्बभरणेन वा ॥३
देहापत्यकलत्रादिष्वात्मसैन्येष्वसत्स्वपि ।
तेषां प्रमत्तो निधनं पश्यन्नपि न पश्यति ॥४
तस्माद्भारत सर्वात्मा भगवानीश्वरो हरिः ।
श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च स्मर्तव्यश्चेच्छताभयम् ॥५
एतावान् सांख्ययोगाभ्यां स्वधर्मपरिनिष्ठया ।
जन्मलाभः परः पुंसामन्ते नारायणस्मृतिः ॥६
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श्रीशुकदेवजीने कहा – परीक्षित्! तुम्हारा लोकहितके लिये किया हुआ यह प्रश्न बहुत ही उत्तम है । मनुष्योंके लिये जितनी भी बातें सुनने, स्मरण करने या कीर्तन करनेकी हैं, उन सबमें यह श्रेष्ठ है । आत्मज्ञानी महापुरुष ऐसे प्रश्नका बड़ा आदर करते हैं ॥१ ॥ राजेन्द्र! जो
गृहस्थ घरके काम - धंधोंमें उलझे हुए हैं, अपने स्वरूपको नहीं जानते, उनके लिये हजारों बातें कहने - सुनने एवं सोचने, करनेकी रहती हैं ॥ २ ॥ उनकी सारी उम्र यों ही बीत जाती है । उनकी
रात नींद या स्त्री - प्रसंगसे कटती है और दिन धनकी हाय - हाय या कुटुम्बियोंके भरण - -पोषणमें प समाप्त हो जाता है ॥३ ॥ संसारमें जिन्हें अपना अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्धी कहा जाता है, वे
शरीर, पुत्र, स्त्री आदि कुछ नहीं हैं, असत् हैं; परन्तु जीव उनके मोहमें ऐसा पागल - सा हो जाता है कि रात - दिन उनको मृत्युका ग्रास होते देखकर भी चेतता नहीं ॥४ ॥ इसलिये
परीक्षित्! जो अभय पदको प्राप्त करना चाहता है, उसे तो सर्वात्मा, सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्णकी ही लीलाओंका श्रवण, कीर्तन और स्मरण करना चाहिये || ५ || मनुष्य जन्मका यही — इतना ही लाभ है कि चाहे जैसे हो - ज्ञानसे, भक्तिसे अथवा अपने धर्मकी निष्ठासे जीवनको ऐसा बना लिया जाय कि मृत्युके समय भगवान्की स्मृति अवश्य बनी रहे ॥६ ॥
प्रायेण मुनयो राजन्निवृत्ता विधिषेधतः ।
नैर्गुण्यस्था रमन्ते स्म गुणानुकथने हरेः ॥ ७
इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।
अधीतवान् द्वापरादी पितुर्द्वैपायनादहम् ॥ ८
परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य उत्तमश्लोकलीलया ।
गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान् ॥९
तदहं तेऽभिधास्यामि महापौरुषिको भवान् ।
यस्य श्रद्दधतामाशु स्यान्मुकुन्दे मतिः सती ॥१०
एतन्निर्विद्यमानानामिच्छतामकुतोभयम् ।
योगिनां नृप ' निर्णीतं हरेर्नामानुकीर्तनम् ॥ ११
किं प्रमत्तस्य बहुभिः परोक्षैर्हायनैरिह ।
वरं मुहूर्तं विदितं घटेत श्रेयसे यतः ॥१२
खट्वाङ्गो नाम राजर्षिर्ज्ञात्वेयत्तामिहायुषः ।
मुहूर्तात्सर्वमुत्सृज्य गतवानभयं हरिम् ॥१३
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तवाप्येतर्हि कौरव्य सप्ताहं जीवितावधिः ।
उपकल्पय तत्सर्वं तावद्यत्साम्परायिकम् ॥१४
अन्तकाले तु पुरुष आगते गतसाध्वसः ।
छिन्द्यादसङ्गशस्त्रेण स्पृहां देहेऽनु ४ ये च तम् ॥१५
परीक्षित्! जो निर्गुण स्वरूपमें स्थित हैं एवं विधि - निषेधकी मर्यादाको लाँघ चुके हैं, वे बड़े - बड़े ऋषि - मुनि भी प्रायः भगवान्के अनन्त कल्याणमय गुणगणोंके वर्णनमें रमे रहते हैं ॥७ ॥ द्वापरके अन्तमें इस भगवद्रूप अथवा वेदतुल्य श्रीमद्भागवत नामके महापुराणका
अपने पिता श्रीकृष्णद्वैपायनसे मैंने अध्ययन किया था || ८ || राजर्षे! मेरी निर्गुणस्वरूप परमात्मामें पूर्ण निष्ठा है । फिर भी भगवान् श्रीकृष्णकी मधुर लीलाओंने बलात् मेरै हृदयको
अपनी ओर आकर्षित कर लिया । यही कारण है कि मैंने इस पुराणका अध्ययन किया ॥९ ॥
तुम भगवान्के परमभक्त हो, इसलिये तुम्हें मैं इसे सुनाऊँगा । जो इसके प्रति श्रद्धा रखते हैं, उनकी शुद्ध चित्तवृत्ति भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें अनन्यप्रेमके साथ बहुत शीघ्र लग जाती है ॥१० ॥ जो लोग लोक या परलोककी किसी भी वस्तुकी इच्छा रखते हैं या इसके विपरीत
संसारमें दुःखका अनुभव करके जो उससे विरक्त हो गये हैं और निर्भय मोक्षपदको प्राप्त करना चाहते हैं, उन साधकोंके लिये तथा योगसम्पन्न सिद्ध ज्ञानियोंके लिये भी समस्त शास्त्रोंका यही निर्णय है कि वे भगवान्के नामोंका प्रेमसे संकीर्तन करें ॥११ ॥ अपने
कल्याण - साधनकी ओरसे असावधान रहनेवाले पुरुषकी वर्षों लम्बी आयु भी अनजानमें ही व्यर्थ बीत जाती है । उससे क्या लाभ! सावधानीसे ज्ञानपूर्वक बितायी हुई घड़ी, दो घड़ी भी श्रेष्ठ है; क्योंकि उसके द्वारा अपने कल्याणकी चेष्टा तो की जा सकती है ॥१२ ॥ राजर्षि
खट्वांग अपनी आयुकी समाप्तिका समय जानकर दो घड़ीमें ही सब कुछ त्यागकर भगवान्के अभयपदको प्राप्त हो गये || १३ || परीक्षित्! अभी तो तुम्हारे जीवनकी अवधि सात दिनकी है । इस बीचमें ही तुम अपने परम कल्याणके लिये जो कुछ करना चाहिये, सब कर लो ॥१४ ॥
मृत्युका समय आनेपर मनुष्य घबराये नहीं । उसे चाहिये कि वह वैराग्यके शस्त्रसे शरीर और उससे सम्बन्ध रखनेवालोंके प्रति ममताको काट डाले ॥१५ ॥ धैर्यके साथ घरसे
निकलकर पवित्र तीर्थके जलमें स्नान करे और पवित्र तथा एकान्त स्थानमें विधिपूर्वक आसन लगाकर बैठ जाय ॥१६ ॥ तत्पश्चात् परम पवित्र ' अ उ म् ' इन तीन मात्राओंसे युक्त प्रणवका
मन - ही - मन जप करे । प्राणवायुको वशमें करके मनका दमन करे और एक क्षणके लिये भी प्रणवको न भूले ॥१७ ॥ बुद्धिकी सहायतासे मनके द्वारा इन्द्रियोंको उनके विषयोंसे हटा ले
और कर्मकी वासनाओंसे चंचल हुए मनको विचारके द्वारा रोककर भगवान्के मंगलमय रूपमें लगाये ॥१८ ॥ स्थिर चित्तसे भगवान्के श्रीविग्रहमेंसे किसी एक अंगका ध्यान करे ।
इस प्रकार एक - एक अंगका ध्यान करते - करते विषय - वासनासे रहित मनको पूर्णरूपसे भगवान्में ऐसा तल्लीन कर दे कि फिर और किसी विषयका चिन्तन ही न हो । वही भगवान् ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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विष्णुका परमपद है, जिसे प्राप्त करके मन भगवत्प्रेमरूप आनन्दसे भर जाता है ॥१९ ॥
यदि भगवान्का ध्यान करते समय मन रजोगुणसे विक्षिप्त या तमोगुणसे मूढ़ हो जाय तो घबराये नहीं । धैर्यके साथ योगधारणाके द्वारा उसे वशमें करना चाहिये; क्योंकि धारणा उक्त दोनों गुणोंके दोषोंको मिटा देती है ॥२० ॥ धारणा स्थिर हो जानेपर ध्यानमें जब योगी अपने
परम मंगलमय आश्रय ( भगवान् ) - को देखता है तब उसे तुरंत ही भक्तियोगकी प्राप्ति हो जाती है ॥२१ ॥
गृहात् प्रव्रजितो धीरः पुण्यतीर्थजलाप्लुतः १ ।
शुचौ विविक्त आसीनो विधिवत्कल्पितासने ॥१६
अभ्यसेन्मनसा शुद्धं त्रिवृद्ब्रह्माक्षरं परम् ।
मनो यच्छेज्जितश्वासो ब्रह्मबीजमविस्मरन् ॥१७
नियच्छेद्विषयेभ्योऽक्षान्मनसा बुद्धिसारथिः ।
मनः कर्मभिराक्षिप्तं शुभार्थे धारयेद्धिया ॥१८
तत्रैकावयवं ध्यायेदव्युच्छिन्नेन चेतसा ।
मनो निर्विषयं युक्त्वा ततः किञ्चन न स्मरेत् ।
पदं तत्परमं विष्णोर्मनो यत्र प्रसीदति ॥१९
रजस्तमोभ्यामाक्षिप्तं विमूढं मन आत्मनः ।
यच्छेद्धारणया धीरो हन्ति या तत्कृतं मलम् ॥२०
यस्यां सन्धार्यमाणायां योगिनो भक्तिलक्षणः ।
आशु सम्पद्यते योग आश्रयं भद्रमीक्षतः ॥२१
राजोवाच
यथा सन्धार्यते ब्रह्मन् धारणा यत्र सम्मता ।
यादृशी वा हरेदाशु पुरुषस्य मनोमलम् ॥२२
श्रीशुक उवाच जितासनो जितश्वासो जितसङ्गो जितेन्द्रियः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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स्थूले भगवतो रूपे मनः सन्धारयेद्धिया ॥२३
विशेषस्तस्य देहोऽयं स्थविष्ठश्च स्थवीयसाम् ।
यत्रेदं दृश्यते विश्वं भूतं भव्यं भवच्च सत् ॥२४
परीक्षित्ने पूछा — ब्रह्मन्! धारणा किस साधनसे किस वस्तुमें किस प्रकार की जाती है और उसका क्या स्वरूप माना गया है, जो शीघ्र ही मनुष्यके मनका मैल मिटा देती है? ॥२२ ॥
श्रीशुकदेवजीने कहा- परीक्षित्! आसन, श्वास, आसक्ति और इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करके फिर बुद्धिके द्वारा मनको भगवान्के स्थूलरूपमें लगाना चाहिये ॥२३ ॥ यह कार्यरूप
सम्पूर्ण विश्व जो कुछ कभी था, है या होगा - सब का सब जिसमें दीख पड़ता है वही भगवान्का स्थूल - से - स्थूल और विराट् शरीर है ॥२४ ॥
आण्डकोशे शरीरेऽस्मिन् सप्तावरणसंयुते ।
वैराजः पुरुषो योऽसौ भगवान् धारणाश्रयः ॥२५
पातालमेतस्य हि पादमूलं पठन्ति पार्ष्णिप्रपदे रसातलम् । महातलं विश्वसृजोऽथ गुल्फौ तलातलं वै पुरुषस्य जङ्घे ॥२६ जानुनी सुतलं विश्वमूर्ते-रूरुद्वयं वितलं चातलं च । महीतलं तज्जघनं महीपते नभस्तलं नाभिसरो गृणन्ति ॥२७ उरःस्थलं ज्योतिरनीकमस्य ग्रीवा महर्वदनं वै जनोऽस्य । तपो रराटीं विदुरादिपुंसः सत्यं तु शीर्षाणि सहस्रशीर्ष्णः ॥२८ तु इन्द्रादयो बाहव आहुरुस्राः कर्णौ दिशः श्रोत्रममुष्य शब्दः । नासत्यदस्रौ परमस्य नासे घ्राणोऽस्य गन्धो मुखमग्निरिद्धः ॥२९ द्यौरक्षिणी चक्षुरभूत्पतङ्गः पक्ष्माणि विष्णोरहनी उभे च । तद्भूविजृम्भः परमेष्ठिधिष्ण्य-****** ebook converter DEMO Watermarks *******