श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 321–330

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 321–330

पृष्ठ 321

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मापोऽस्य तालू रस एव जिह्वा ॥३० छन्दांस्यनन्तस्य शिरो गृणन्ति दंष्ट्रा यमः स्नेहकला द्विजानि । हासो जनोन्मादकरी च माया दुरन्तसर्गो यदपाङ्गमोक्षः ॥ ३१ व्रीडोत्तरोष्ठोऽधर एव लोभो धर्मः स्तनोऽधर्मपथोऽस्य पृष्ठम् । कस्तस्य मेढ्रं वृषणौ च मित्रौ कुक्षिः समुद्रा गिरयो स्थिसङ्घाः ॥३२ नद्योऽस्य नाड्योऽथ तनूरुहाणि महीरुहा विश्वतनोर्नृपेन्द्र अनन्तवीर्यः श्वसितं मातरिश्वा गतिर्वयः कर्म गुणप्रवाहः ॥३३ जल, अग्नि, वायु, आकाश, अहंकार, महत्तत्त्व और प्रकृति- इन सात आवरणोंसे घिरे हुए इस ब्रह्माण्डशरीरमें जो विराट् पुरुष भगवान् हैं, वे ही धारणाके आश्रय हैं, उन्हींकी धारणा की जाती है ॥२५ ॥

तत्त्वज्ञ पुरुष उनका इस प्रकार वर्णन करते हैं - पाताल विराट् पुरुषके तलवे हैं, उनकी एड़ियाँ और पंजे रसातल हैं, दोनों गुल्फ - एड़ीके ऊपरकी गाँठें महातल हैं, उनके पैरके पिंडे तलातल हैं, ॥२६ ॥

विश्व - मूर्तिभगवान्के दोनों घुटने सुतल हैं, जाँघें वितल और अतल हैं, पेड़ू भूतल है और परीक्षित्! उनके नाभिरूप सरोवरको ही आकाश कहते हैं ॥२७ ॥

आदिपुरुष परमात्माकी छातीको स्वर्गलोक, गलेको महर्लोक, मुखको जनलोक और ललाटको तपोलोक कहते हैं । उन सहस्र सिरवाले भगवान्‌का मस्तकसमूह ही सत्यलोक है ॥२८ ॥

इन्द्रादि देवता उनकी भुजाएँ हैं । दिशाएँ कान और शब्द श्रवणेन्द्रिय हैं । दोनों अश्विनीकुमार उनकी नासिकाके छिद्र हैं; गन्ध घ्राणेन्द्रिय है और धधकती हुई आग उनका मुख है || २ ९ || भगवान् विष्णुके नेत्र अन्तरिक्ष हैं, उनमें देखनेकी शक्ति सूर्य है, दोनों पलकें रात और दिन हैं, उनका भ्रूविलास ब्रह्मलोक है । तालु जल है और जिह्वा रस ॥३० ॥ वेदोंको

भगवान्का ब्रह्मरन्ध्र कहते हैं और यमको दाढ़ें । सब प्रकारके स्नेह दाँत हैं और उनकी जगन्मोहिनी मायाको ही उनकी मुसकान कहते हैं । यह अनन्त सृष्टि उसी मायाका कटाक्ष-विक्षेप है ॥३१ ॥

लज्जा ऊपरका होठ और लोभ नीचेका होठ है । धर्म स्तन और अधर्म पीठ है । प्रजापति

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उनके मूत्रेन्द्रिय हैं, मित्रावरुण अण्डकोश हैं, समुद्र कोख है और बड़े - बड़े पर्वत उनकी हड्डियाँ हैं ॥३२ ॥

राजन्! विश्वमूर्ति विराट् पुरुषकी नाड़ियाँ नदियाँ हैं । वृक्ष रोम हैं । परम प्रबल वायु श्वास है । काल उनकी चाल है और गुणोंका चक्कर चलाते रहना ही उनका कर्म है ॥३ ॥

ईशस्य केशान् विदुरम्बुवाहान् वासस्तु सन्ध्यां कुरुवर्य भूम्नः । अव्यक्तमाहुर्हृदयं मनश्च स चन्द्रमाः सर्वविकारकोशः ॥३४ विज्ञानशक्तिं महिमामनन्ति सर्वात्मनोऽन्तःकरणं गिरित्रम् । अश्वाश्वतर्युष्टगजा नखानि सर्वे मृगाः पशवः श्रोणिदेशे ॥३५ वयांसि तद्व्याकरणं विचित्रं मनुर्मनीषा मनुजो निवासः । गन्धर्वविद्याधरचारणाप्सरः स्वरस्मृतीरसुरानीकवीर्यः१॥३६ ब्रह्माननं क्षत्रभुजो महात्मा विडूरुरङ्घ्रिश्रितकृष्णवर्णः । नानाभिधाभीज्यगणोपपन्नो द्रव्यात्मकः कर्म वितानयोगः ॥ ३७ इयानसावीश्वरविग्रहस्य यः सन्निवेशः कथितो मया ते । सन्धार्यतेऽस्मिन् वपुषि स्थविष्ठे मनः स्वबुद्ध्या न यतोऽस्ति किञ्चित् ॥३८ स सर्वधीवृत्त्यनुभूतसर्व आत्मा यथा स्वप्नजनेक्षितैकः । तं सत्यमानन्दनिधिं भजेत नान्यत्र सज्जेद् यत आत्मपातः ॥३९ परीक्षित्! बादलोंको उनके केश मानते हैं । सन्ध्या उन अनन्तका वस्त्र है । महात्माओंने अव्यक्त ( मूलप्रकृति ) -को ही उनका हृदय बतलाया है और सब विकारोंका खजाना उनका मन चन्द्रमा कहा गया है ॥३४ ॥

महत्तत्त्वको सर्वात्मा भगवान्‌का चित्त कहते हैं और रुद्र उनके अहंकार कहे गये हैं ।

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घोड़े, खच्चर, ऊँट और हाथी उनके नख हैं । वनमें रहनेवाले सारे मृग और कटिप्रेदशमें स्थित हैं ॥३५ ॥

पशु उनके तरह - तरहके पक्षी उनके अद्भुत रचना - कौशल हैं । स्वायम्भुव मनु उनकी बुद्धि हैं और मनुकी सन्तान मनुष्य उनके निवासस्थान हैं । गन्धर्व, विद्याधर, चारण और अप्सराएँ उनके

षड्ज आदि स्वरोंकी स्मृति हैं । दैत्य उनके वीर्य हैं ॥ ३६ ॥

ब्राह्मण मुख, क्षत्रिय भुजाएँ, वैश्य जंघाएँ और शूद्र उन विराट् पुरुषके चरण हैं । विविध देवताओंके नामसे जो बड़े - बड़े द्रव्यमय यज्ञ किये जाते हैं, वे उनके कर्म हैं ॥३७ ॥

परीक्षित्! विराट्भगवान्‌ के स्थूलशरीरका यही स्वरूप है, सो मैंने तुम्हें सुना दिया । इसीमें मुमुक्षु पुरुष बुद्धिके द्वारा मनको स्थिर करते हैं; क्योंकि इससे भिन्न और कोई वस्तु नहीं है ॥ ३८ ॥

जैसे स्वप्न देखनेवाला स्वप्नावस्थामें अपने - आपको ही विविध पदार्थोंके रूपमें देखता है, वैसे ही सबकी बुद्धि - वृत्तियोंके द्वारा सब कुछ अनुभव करनेवाला सर्वान्तर्यामी परमात्मा भी एक ही है । उन सत्यस्वरूप आनन्दनिधि भगवान्का ही भजन करना चाहिये, अन्य किसी भी वस्तुमें आसक्ति नहीं करनी चाहिये । क्योंकि यह आसक्ति जीवके अधःपतनका हेतु है ॥३९ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे महापुरुषसंस्थानुवर्णने प्रथमोऽध्यायः ॥१ ॥

विभुः । १. प्रा ० पा ० - लोकहितो । २. प्रा ० पा ० – सौख्येष्व ० । ३. प्रा ० पा ० - व्यः स्वेच्छया -१. प्रा ० पा ० – नृपते गीतं । २. प्रा ० पा ० - यतते । ३. प्रा ० पा ० – पि । ४. प्रा ० पा०— देहानुयायिनीम् । १. प्रा ० पा ० – परिप्लुपः । २.. प्रा ० पा०- - मनुस्म ० । १. प्रा ० पा ० — स्वरः स्मृतिर्वै भासुरानीकवीर्यः ।

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अथ द्वितीयोऽध्यायः भगवान्के स्थूल और सूक्ष्मरूपोंकी धारणा तथा क्रममुक्ति और सद्योमुक्तिका वर्णन श्रीशुक उवाच

एवं पुरा धारणयाऽऽत्मयोनि-र्नष्टां स्मृतिं प्रत्यवरुध्य तुष्टात् ।

तथा ससर्जेदममोघदृष्टि-र्यथाप्ययात् प्राग् व्यवसायबुद्धिः ॥१

शाब्दस्य हि ब्रह्मण एष पन्था यन्नामभिर्ध्यायति धीरपार्थैः । परिभ्रमंस्तत्र न विन्दतेऽर्थान् मायामये वासनया शयानः ॥२ अतः कविर्नामसु यावदर्थः स्यादप्रमत्तो व्यवसायबुद्धिः । सिद्धेऽन्यथार्थे न यतेत तत्र परिश्रमं तत्र समीक्षमाणः ॥ ३ सत्यां क्षितौ किं कशिपोः प्रयासै-र्बाहौ स्वसिद्धे ह्युपबर्हणैः किम् । सत्यञ्जलौ किं पुरुधान्नपात्र्या दिग्वल्कलादौ सति किं दुकूलैः ॥४ चीराणि किं पथि न सन्ति दिशन्ति भिक्षां नैवाङ्घ्रिपाः परभृतः सरितोऽप्यशुष्यन् । रुद्धा गुहाः किमजितोऽवति नोपसन्नान् कस्माद् भजन्ति कवयो धनदुर्मदान्धान् ॥५ श्रीशुकदेवजी कहते हैं - सृष्टिके प्रारम्भमें ब्रह्माजीने इसी धारणाके द्वारा प्रसन्न हुए भगवान्से वह सृष्टिविषयक स्मृति प्राप्त की थी जो पहले प्रलयकालमें विलुप्त हो गयी थी । इससे उनकी दृष्टि अमोघ और बुद्धि निश्चयात्मिका हो गयी तब उन्होंने इस

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जगत्को वैसे ही रचा जैसा कि यह प्रलयके पहले था ॥१ ॥

वेदोंकी वर्णनशैली ही इस प्रकारकी है कि लोगोंकी बुद्धि स्वर्ग आदि निरर्थक नामोंके फेरमें फँस जाती है, जीव वहाँ सुखकी वासनामें स्वप्न - सा देखता हुआ भटकने लगता है; किंतु उन मायामय लोकोंमें कहीं भी उसे सच्चे सुखकी प्राप्ति नहीं होती ॥२ ॥ इसलिये विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह विविध नामवाले पदार्थोंसे उतना

ही व्यवहार करे, जितना प्रयोजनीय हो । अपनी बुद्धिको उनकी निस्सारताके निश्चयसे परिपूर्ण रखे और एक क्षणके लिये भी असावधान न हो । यदि संसारके पदार्थ प्रारब्धवश बिना परिश्रमके यों ही मिल जायँ, तब उनके उपार्जनका परिश्रम व्यर्थ समझकर उनके लिये कोई प्रयत्न न करे ॥३ ॥ जब जमीनपर सोनेसे काम चल सकता

है तब पलँगके लिये प्रयत्न करने से क्या प्रयोजन । जब भुजाएँ अपनेको भगवान्की कृपासे स्वयं ही मिली हुई हैं तब तकियोंकी क्या आवश्यकता । जब अंजलिसे काम चल सकता है तब बहुत - से बर्तन क्यों बटोरें । वृक्षकी छाल पहनकर या वस्त्रहीन रहकर भी यदि जीवन धारण किया जा सकता है तो वस्त्रोंकी क्या आवश्यकता ॥४ ॥ पहननेको

क्या रास्तोंमें चिथड़े नहीं हैं? भूख लगनेपर दूसरोंके लिये ही शरीर धारण करनेवाले वृक्ष क्या फल - फूलकी भिक्षा नहीं देते? जल चाहनेवालोंके लिये नदियाँ क्या बिलकुल सूख गयी हैं? रहनेके लिये क्या पहाड़ोंकी गुफाएँ बंद कर दी गयी हैं? अरे भाई! सब न सही, क्या भगवान् भी अपने शरणगतोंकी रक्षा नहीं करते? ऐसी स्थितिमें बुद्धिमान् लोग भी धनके नशेमें चूर घमंडी धनियोंकी चापलूसी क्यों करते हैं? ॥५ ॥

एवं स्वचित्ते स्वत एव सिद्ध आत्मा प्रियोऽर्थो भगवाननन्तः । तं निर्वृतो नियतार्थो भजेत संसारहेतूपरमश्च यत्र ॥ ६ कस्तां त्वनादृत्य परानुचिन्ता-मृते पशूनसतीं नाम युञ्ज्यात् । पश्यञ्जनं पतितं वैतरण्यां स्वकर्मजान् परितापाञ्जुषाणम् ॥७ केचित् स्वदेहान्तर्हृदयावकाशे

प्रादेशमात्रं पुरुषं वसन्तम् ।

चतुर्भुजं कञ्जरथाङ्गशङ्ख-गदाधरं धारणया स्मरन्ति ॥८

प्रसन्नवक्त्रं नलिनायतेक्षणं कदम्बकिञ्जल्कपिशङ्गवाससम् । लसन्महारत्नहिरण्मयाङ्गदं

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स्फुरन्महारत्नकिरीटकुण्डलम् ॥९ उन्निद्रहृत्पङ्कजकर्णिकालये

योगेश्वरास्थापितपादपल्लवम् ।

श्रीलक्ष्मणं कौस्तुभरत्नकन्धर-मम्लानलक्ष्म्या वनमालयाऽऽचितम् ॥१०

विभूषितं मेखलयाङ्गुलीयकै-र्महाधनैर्नूपुरकङ्कणादिभिः ।

स्निग्धामलाकुञ्चितनीलकुन्तलै-र्विरोचमानाननहासपेशलम् ॥११

अदीनलीलाहसितेक्षणोल्लसद्-भ्रूभङ्गसंसूचितभूर्यनुग्रहम् । ईक्षेत चिन्तामयमेनमीश्वरं यावन्मनो धारणयावतिष्ठते ॥१२ इस प्रकार विरक्त हो जानेपर अपने हृदयमें नित्य विराजमान, स्वतःसिद्ध, आत्मस्वरूप, परम प्रियतम, परम सत्य जो अनन्तभगवान् हैं, बड़े प्रेम और आनन्दसे दृढ़ निश्चय करके उन्हींका भजन करे; क्योंकि उनके भजनसे जन्म - मृत्युके चक्करमें डालनेवाले अज्ञानका नाश हो जाता है || ६ || पशुओंकी बात तो अलग है; परन्तु मनुष्योंमें भला ऐसा कौन है जो लोगोंको इस संसाररूप वैतरणी नदीमें गिरकर अपने कर्मजन्य दुःखोंको भोगते हुए देखकर भी भगवान्का मंगलमय चिन्तन नहीं करेगा, इन असत् विषय - भोगोंमें ही अपने चित्तको भटकने देगा? ॥७ ॥

कोई - कोई साधक अपने शरीरके भीतर हृदया- काशमें विराजमान भगवान्के प्रादेशमात्र स्वरूपकी धारणा करते हैं । वे ऐसा ध्यान करते हैं कि भगवान्‌की चार भुजाओंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म हैं IICII उनके मुखपर प्रसन्नता झलक रही है । कमलके समान विशाल और कोमल नेत्र हैं । कदम्बके पुष्पकी केसरके समान पीला वस्त्र धारण किये हुए हैं । भुजाओंमें श्रेष्ठ रत्नोंसे जड़े हुए सोनेके बाजूबंद शोभायमान हैं । सिरपर बड़ा ही सुन्दर मुकुट और कानोंमें कुण्डल हैं, जिनमें जड़े हुए बहुमूल्य रत्न जगमगा रहे हैं ॥९ ॥ उनके चरणकमल योगेश्वरोंके खिले हुए हृदयकमलकी

कर्णिकापर विराजित हैं । उनके हृदयपर श्रीवत्सका चिह्न - एक सुनहरी रेखा है । गलेमें कौस्तुभमणि लटक रही है । वक्षःस्थल कभी न कुम्हलानेवाली वनमालासे घिरा हुआ है ॥१० ॥ वे कमरमें करधनी, अँगुलियोंमें बहुमूल्य अँगूठी, चरणोंमें नूपुर और हाथोंमें

कंगन आदि आभूषण धारण किये हुए हैं । उनके बालोंकी लटें बहुत चिकनी, निर्मल,

घुँघराली और नीली हैं । उनका मुखकमल मन्द मन्द मुसकानसे खिल रहा है ॥११ ॥

लीलापूर्ण उन्मुक्त हास्य और चितवनसे शोभायमान भौंहोंके द्वारा वे भक्तजनोंपर

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अनन्त अनुग्रहकी वर्षा कर रहे हैं । जबतक मन इस धारणाके द्वारा स्थिर न हो जाय, तबतक बार - बार इन चिन्तनस्वरूप भगवान्‌को देखते रहनेकी चेष्टा करनी चाहिये ॥१२ ॥

एकैकशोऽङ्गानि धियानुभावयेत् ’ पादादि यावद्धसितं गदाभृतः । जितं जितं स्थानमपोह्य धारयेत् परं परं शुद्ध्यतिर धीर्यथा यथा ॥१३ यावन्न जायेत परावरेऽस्मिन् विश्वेश्वरे द्रष्टरि भक्तियोगः । तावत् स्थवीयः पुरुषस्य रूपं क्रियावसाने प्रयतः स्मरेत ॥१४ स्थिरं सुखं चासनमाश्रितो यति-र्यदा जिहासुरिममङ्ग लोकम् । काले च देशे च मनो न सज्जयेत् मन: ३ प्राणान् नियच्छेन्मनसा जितासुः ॥१५ स्वबुद्ध्यामलया नियम्य क्षेत्रज्ञ एतां निनयेत् तमात्मनि । आत्मानमात्मन्यवरुध्य धीरो लब्धोपशान्तिर्विरमेत कृत्यात् ॥१६ न यत्र कालोऽनिमिषां परः प्रभुः कुतो नु देवा जगतां य ईशिरे न यत्र सत्त्वं न रजस्तमश्च न वै विकारो न महान् प्रधानम् ॥१७ परं पदं वैष्णवमामनन्ति तद् यन्नेति नेतीत्यतदुत्सिसृक्षवः । विसृज्य दौरात्म्यमनन्यसौहृदा हृदोपगुह्यार्हपदं पदे पदे ॥ १८ भगवान्के चरण – कमलोंसे लेकर उनके मुसकानयुक्त मुखकमलपर्यन्त समस्त

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अंगोंकी एक - एक करके बुद्धिके द्वारा धारणा करनी चाहिये । जैसे - जैसे बुद्धि शुद्ध होती जायगी, वैसे - वैसे चित्त स्थिर होता जायगा । जब एक अंगका ध्यान ठीक - ठीक होने लगे, तब उसे छोड़कर दूसरे अंगका ध्यान करना चाहिये || १३ || ये विश्वेश्वर भगवान् दृश्य नहीं, द्रष्टा हैं । सगुण, निर्गुण - सब कुछ इन्हींका स्वरूप है । जबतक इनमें अनन्य प्रेममय भक्तियोग न हो जाय तबतक साधकको नित्य नैमित्तिक कर्मोंके बाद एकाग्रतासे भगवान्के उपर्युक्त स्थूलरूपका ही चिन्तन करना चाहिये ॥१४ ॥

परीक्षित्! जब योगी पुरुष इस मनुष्यलोकको छोड़ना चाहे तब देश और कालमें मनको न लगाये । सुखपूर्वक स्थिर आसनसे बैठकर प्राणोंको जीतकर मनसे इन्द्रियोंका संयम करे ॥१५ ॥ तदनन्तर अपनी निर्मल बुद्धिसे मनको नियमित करके मनके साथ

बुद्धिको क्षेत्रज्ञमें और क्षेत्रज्ञको अन्तरात्मामें लीन कर दे । फिर अन्तरात्माको परमात्मामें लीन करके धीर पुरुष उस परम शान्तिमय अवस्थामें स्थित हो जाय । फिर उसके लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता ॥ १६ ॥ इस अवस्थामें सत्त्वगुण भी नहीं है,

फिर रजोगुण और तमोगुणकी तो बात ही क्या है । अहंकार, महत्तत्त्व और प्रकृतिका भी वहाँ अस्तित्व नहीं है । उस स्थितिमें जब देवताओंके नियामक कालकी भी दाल नहीं गलती, तब देवता और उनके अधीन रहनेवाले प्राणी तो रह ही कैसे सकते हैं? ॥१७ ॥

योगीलोग ‘ यह नहीं, यह नहीं ' – इस प्रकार परमात्मासे भिन्न पदार्थोंका त्याग करना चाहते हैं और शरीर तथा उसके सम्बन्धी पदार्थोंमें आत्मबुद्धिका त्याग करके हृदयके द्वारा पद - पदपर भगवान् के जिस परम पूज्य स्वरूपका आलिंगन करते हुए अनन्य प्रेमसे परिपूर्ण रहते हैं, वही भगवान् विष्णुका परम पद है - इस विषयमें समस्त शास्त्रोंकी सम्मति है ॥१८ ॥

इत्थं मुनिस्तूपरमेद् व्यवस्थितो विज्ञानदृग्वीर्यसुरन्धिताशयः । स्वपार्ष्णिनाऽऽपीड्य गुदं ततोऽनिलं स्थानेषु षट्सून्नमयेज्जितक्लमः ॥१९ नाभ्यां स्थितं हृद्यधिरोप्य तस्मा-दुदानगत्योरसि तं नयेन्मुनिः । ततोऽनुसन्धाय धिया मनस्वी स्वतालुमूलं शनकैर्नयेत ॥२० तस्माद् भ्रुवोरन्तरमुन्नयेत

निरुद्धसप्तायतनोऽनपेक्षः ।

स्थित्वा मुहूर्तार्धमकुण्ठदृष्टि-निर्भिद्य मूर्धन् विसृजेत्परं गतः ॥२१

यदि प्रयास्यन् नृप पारमेष्ठ्यं

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वैहायसानामुत यद् विहारम् । अष्टाधिपत्यं गुणसन्निवाये सहैव गच्छेन्मनसेन्द्रियैश्च ॥२२ योगेश्वराणां गतिमाहुरन्त-र्बहिस्त्रिलोक्याः पवनान्तरात्मनाम् । न कर्मभिस्तां गतिमाप्नुवन्ति विद्यातपोयोगसमाधिभाजाम् ॥२३ वैश्वानरं याति विहायसा गतः सुषुम्णया ब्रह्मपथेन शोचिषा । विधूतकल्कोऽथ हरेरुदस्तात् प्रयाति चक्रं नृप शैशुमारम् ॥२४ ज्ञानदृष्टिके बलसे जिसके चित्तकी वासना नष्ट हो गयी है, उस ब्रह्मनिष्ठ योगीको इस प्रकार अपने शरीरका त्याग करना चाहिये । पहले एड़ीसे अपनी गुदाको दबाकर स्थिर हो जाय और तब बिना घबड़ाहटके प्राणवायुको षट्चक्रभेदनकी रीतिसे ऊपर ले जाय ॥१९ ॥ मनस्वी योगीको चाहिये कि नाभिचक्र मणिपूरकमें स्थित वायुको

हृदयचक्र अनाहतमें, वहाँसे उदानवायुके द्वारा वक्षःस्थलके ऊपर विशुद्ध चक्रमें, फिर उस वायुको धीरे - धीरे तालुमूलमें ( विशुद्ध चक्रके अग्रभागमें ) चढ़ा दे ॥२० ॥ तदनन्तर

दो आँख, दो कान, दो नासाछिद्र और मुख - इन सातों छिद्रोंको रोककर उस तालुमूलमें स्थित वायुको भौंहोंके बीच आज्ञाचक्रमें ले जाय । यदि किसी लोकमें जानेकी इच्छा न हो तो आधी घड़ीतक उस वायुको वहीं रोककर स्थिर लक्ष्यके साथ उसे सहस्रारमें ले जाकर परमात्मामें स्थित हो जाय । इसके बाद ब्रह्मरन्ध्रका भेदन करके शरीर-इन्द्रियादिको छोड़ दे ॥२१ ॥

परीक्षित्! यदि योगीकी इच्छा हो कि मैं ब्रह्म - लोकमें जाऊँ, आठों सिद्धियाँ प्राप्त करके आकाशचारी सिद्धोंके साथ विहार करूँ अथवा त्रिगुणमय ब्रह्माण्डके किसी भी प्रदेशमें विचरण करूँ तो उसे मन और इन्द्रियोंको साथ ही लेकर शरीरसे निकलना चाहिये ॥२२ ॥

योगियोंका शरीर वायुकी भाँति सूक्ष्म होता है । उपासना, तपस्या, योग और ज्ञानका सेवन करनेवाले योगियोंको त्रिलोकीके बाहर और भीतर सर्वत्र स्वछन्दरूपसे विचरण करनेका अधिकार होता है । केवल कर्मोंके द्वारा इस प्रकार बेरोक - टोक विचरना नहीं हो सकता ॥२३ ॥

परीक्षित्! योगी ज्योतिर्मय मार्ग सुषुम्णाके द्वारा जब ब्रह्मलोककेलिये प्रस्थान करता है, तब पहले वह आकाशमार्गसे अग्निलोकमें जाता है; वहाँ उसके बचे - खुचे मल भी जल जाते हैं । इसके बाद वह वहाँसे ऊपर भगवान् श्रीहरिके शिशुमार नामक

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ज्योतिर्मय चक्रपर पहुँचता है ॥२४ ॥

तद् विश्वनाभिं त्वतिवर्त्य विष्णो-रणीयसा विरजेनात्मनैकः । नमस्कृतं ब्रह्मविदामुपैति कल्पायुषो यद् विबुधा रमन्ते ॥२५ अथो अनन्तस्य मुखानलेन दन्दह्यमानं स निरीक्ष्य विश्वम् । निर्याति सिद्धेश्वरजुष्टधिष्ण्यं यद् द्वैपरार्ध्यं तदु पारमेष्ठ्यम् ॥२६ न यत्र शोको न जरा न मृत्यु-र्नार्तिर्न चोद्वेग ऋते कुतश्चित् । यच्चित्ततोऽदः कृपयानिदंविदां दुरन्तदुःखप्रभवानुदर्शनात् ॥२७ ततो विशेषं प्रतिपद्य निर्भय-स्तेनात्मनापोऽनलमूर्तिरत्वरन् । ज्योतिर्मयो वायुमुपेत्य काले वाय्वात्मना खं बृहदात्मलिङ्गम् ॥२८ घ्राणेन गन्धं रसनेन वै रसं रूपं तु दृष्ट्या श्वसनं त्वचैव । श्रोत्रेण चोपेत्य नभोगुणत्वं प्राणेन चाकूतिमुपैति योगी ॥२९ भगवान् विष्णुका यह शिशुमार चक्र विश्व - ब्रह्माण्डके भ्रमणका केन्द्र है । उसका अतिक्रमण करके अत्यन्त सूक्ष्म एवं निर्मल शरीरसे वह अकेला ही महर्लोकमें जाता है । वह लोक ब्रह्मवेत्ताओंके द्वारा भी वन्दित है और उसमें कल्पपर्यन्त जीवित रहनेवाले देवता विहार करते रहते हैं ॥२५ ॥

फिर जब प्रलयका समय आता है, तब नीचेके लोकोंको शेषके मुखसे निकली हुई आगके द्वारा भस्म होते देख वह ब्रह्मलोकमें चला जाता है, जिस ब्रह्मलोकमें बड़े - बड़े सिद्धेश्वर विमानोंपर निवास करते हैं । उस ब्रह्मलोककी आयु ब्रह्माकी आयुके समान ही दो परार्द्धकी है ॥२६ ॥

वहाँ न शोक है न दुःख, न बुढ़ापा है न मृत्यु । फिर वहाँ किसी प्रकारका उद्वेग या भय तो हो ही कैसे सकता है । वहाँ यदि दुःख है तो केवल एक बातका । वह यही कि इस परमपदको न जाननेवाले लोगोंके जन्म - मृत्युमय अत्यन्त घोर संकटोंको देखकर