श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 881–890

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 881–890

पृष्ठ 881

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महिषी यद्यदीहेत तत्तदेवान्ववर्तत ॥५६

क्वचित्पिबन्त्यां पिबति मदिरां मदविह्वलः ।

अश्नन्त्यां क्वचिदश्नाति जक्षत्यां सह जक्षति ॥५७

क्वचिद्गायति गायन्त्यां रुदत्यां रुदति क्वचित् ।

क्वचिद्धसन्त्यां हसति जल्पन्त्यामनु जल्पति ॥५८

क्वचिद्धावति धावन्त्यां तिष्ठन्त्यामनु तिष्ठति ।

अनु शेते शयानायामन्वास्ते क्वचिदासतीम् ॥५९

क्वचिच्छृणोति शृण्वन्त्यां पश्यन्त्यामनु पश्यति ।

क्वचिज्जिघ्रति जिघ्रन्त्यां स्पृशन्त्यां स्पृशति क्वचित् ॥६०

क्वचिच्च शोचतीं जायामनुशोचति दीनवत् ।

अनु हृष्यति हृष्यन्त्यां मुदितामनु मोदते ॥ ६१

विप्रलब्धो महिष्यैवं सर्वप्रकृतिवंचितः ।

नेच्छन्ननुकरोत्यज्ञः क्लैब्यात्क्रीडामृगो यथा ॥ ६२

इस नगरके निवासियोंमें निर्वाक् और पेशस्कृत् – ये दो नागरिक अन्धे थे । राजा पुरंजन आँखवाले नागरिकोंका अधिपति होनेपर भी इन्हींकी सहायतासे जहाँ - तहाँ जाता और सब प्रकारके कार्य करता था ॥५४ ॥

जब कभी अपने प्रधान सेवक विषूचीनके साथ अन्तःपुरमें जाता, तब उसे स्त्री और पुत्रोंके कारण होनेवाले मोह, प्रसन्नता एवं हर्ष आदि विकारोंका अनुभव होता ॥ ५५ ॥ उसका

चित्त तरह - तरहके कर्मोंमें फँसा हुआ था और काम - परवश होनेके कारण वह मूढ़ रमणीके द्वारा ठगा गया था । उसकी रानी जो - जो काम करती थी, वही वह भी करने लगता था ॥५६ ॥ वह जब मद्यपान करती, तब वह भी मदिरा पीता और मदसे उन्मत्त हो जाता था;

जब वह भोजन करती, तब आप भी भोजन करने लगता और जब कुछ चबाती, तब आप भी वही वस्तु चबाने लगता था ॥ ५७ ॥ इसी प्रकार कभी उसके गानेपर गाने लगता, रोनेपर

रोने लगता, हँसनेपर हँसने लगता और बोलनेपर बोलने लगता ॥ ५८ ॥ वह दौड़ती तो आप

भी दौड़ने लगता, खड़ी होती तो आप भी खड़ा हो जाता, सोती तो आप भी उसीके साथ सो जाता और बैठती तो आप भी बैठ जाता ॥ ५ ९ ॥ कभी वह सुनने लगती तो आप भी सुनने लगता, देखती तो देखने लगता, सूँघती तो सूँघने लगता और किसी चीजको छूती तो आप भी छूने लगता ॥६० ॥ कभी उसकी प्रिया शोकाकुल होती तो आप भी अत्यन्त दीनके समान

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पृष्ठ 882

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व्याकुल हो जाता; जब वह प्रसन्न होती, आप भी प्रसन्न हो जाता और उसके आनन्दित होनेपर आप भी आनन्दित हो जाता ॥ ६१ ॥ ( इस प्रकार ) राजा पुरंजन अपनी सुन्दरी रानीके

द्वारा ठगा गया । सारा प्रकृतिवर्ग — परिकर ही उसको धोखा देने लगा । वह मूर्ख विवश होकर इच्छा न होनेपर भी खेलके लिये घरपर पाले हुए बंदरके समान अनुकरण करता रहता ॥६२ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे पुरंजनोपाख्याने पञ्चविंशोऽध्यायः ॥२५ ॥

१. प्रा ० पा ० — द्वरैिः । -१. प्रा ० पा०- – एते ते पुरोगा ये । २. प्रा ० पा ० - एताश्च । ३. प्रा ० पा ० – श्रीर्भवान्य ० । ४. प्रा ० पा ० — वा उमापतिं । ५. प्रा ० पा ० – ते मानुगृहाण । ६. प्रा ० पा ० — सुनास ० । ७. प्रा ० पा ० - संकुलम् । १. प्रा ० पा०- - क्षेमं । - पतिं । ३. प्रा ० पा ० —– स्वयम् ॥ २. प्रा ० पा०— ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 883

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अथ षड्विंशोऽध्यायः राजा पुरंजनका शिकार खेलने वनमें जाना और रानीका कुपित होना नारद उवाच

स एकदा महेष्वासो रथं पञ्चाश्वमाशुगम् ।

द्वीषं द्विचक्रमेकाक्षं त्रिवेणुं पञ्चबन्धुरम् ॥१

एकरश्म्येकदमनमेकनीडं द्विकूबरम् ।

पञ्चप्रहरणं सप्तवरूथं पञ्चविक्रमम् ॥२

हैमोपस्करमारुह्य स्वर्णवर्माक्षयेषुधिः ।

एकादशचमूनाथः पञ्चप्रस्थमगाद्वनम् ॥३

चचार मृगयां तत्र दृप्त आत्तेषुकार्मुकः ।

विहाय जायामतदर्हां मृगव्यसनलालसः ॥४

आसुरीं वृत्तिमाश्रित्य घोरात्मा निरनुग्रहः ।

न्यहनन्निशितैर्बाणैर्वनेषु वनगोचरान् ॥५

तीर्थेषु प्रतिदृष्टेषु राजा मेध्यान् पशून् वने ।

यावदर्थमलं लुब्धो हन्यादिति नियम्यते ॥६

य एवं कर्म नियतं विद्वान् कुर्वीत मानवः ।

कर्मणा तेन राजेन्द्र ज्ञानेन न स लिप्यते ॥७

अन्यथा कर्म कुर्वाणो मानारूढो निबध्यते ।

गुणप्रवाहपतितो नष्टप्रज्ञो व्रजत्यधः ॥८

तत्र निर्भिन्नगात्राणां चित्रवाजैः शिलीमुखैः ।

विप्लवोऽभूद्दुःखितानां दुःसहः करुणात्मनाम् ॥९

श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! एक दिन राजा पुरंजन अपना विशाल धनुष, सोनेका कवच और अक्षय तरकस धारणकर अपने ग्यारहवें सेनापतिके साथ पाँच घोड़ोंके शीघ्रगामी ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 884

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रथमें बैठकर पंचप्रस्थ नामके वनमें गया । उस रथमें दो ईषादण्ड ( बंब ), दो पहिये, एक धुरी, तीन ध्वजदण्ड, पाँच डोरियाँ, एक लगाम, एक सारथि, एक बैठक स्थान, दो जुए, पाँच आयुध और सात आवरण थे । वह पाँच प्रकारकी चालोंसे चलता था तथा उसका साज - बाज सब सुनहरा था ॥१-३ ॥ यद्यपि राजाके लिये अपनी प्रियाको क्षणभर भी छोड़ना कठिन था, किन्तु उस दिन उसे शिकारका ऐसा शौक लगा कि उसकी भी परवा न कर वह बड़े गर्वसे धनुष - बाण चढ़ाकर आखेट करने लगा ॥४ ॥ इस समय आसुरीवृत्ति बढ़ जानेसे उसका चित्त

बड़ा कठोर और दयाशून्य हो गया था, इससे उसने अपने तीखे बाणोंसे बहुत - से निर्दोष जंगली जानवरोंका वध कर डाला || ५ || जिसकी मांसमें अत्यन्त आसक्ति हो, वह राजा केवल शास्त्रप्रदर्शित कर्मोंके लिये वनमें जाकर आवश्यकतानुसार अनिषिद्ध पशुओंका वध करे; व्यर्थ पशुहिंसा न करे । शास्त्र इस प्रकार उच्छृंखल प्रवृत्तिको नियन्त्रित करता है ॥६ ॥

राजन्! जो विद्वान् इस प्रकार शास्त्रनियत कर्मोंका आचरण करता है, वह उस कर्मानुष्ठानसे प्राप्त हुए ज्ञानके कारणभूत कर्मोंसे लिप्त नहीं होता ॥७ ॥ नहीं तो, मनमाना कर्म करनेसे

मनुष्य अभिमानके वशीभूत होकर कर्मोंमें बँध जाता है तथा गुण - प्रवाहरूप संसारचक्रमें पड़कर विवेक - बुद्धिके नष्ट हो जानेसे अधम योनियोंमें जन्म लेता है ॥८ ॥

पुरंजनके तरह - तरहके पंखोंवाले बाणोंसे छिन्न - भिन्न होकर अनेकों जीव बड़े कष्टके साथ प्राण त्यागने लगे । उसका वह निर्दयतापूर्ण जीव - संहार देखकर सभी दयालु पुरुष बहुत दुःखी हुए । वे इसे सह नहीं सके ॥९ ॥

शशान् वराहान् महिषान् गवयान् रुरुशल्यकान् ।

मेध्यानन्यांश्च विविधान् विनिघ्नन् श्रममध्यगात् ॥१०

ततः क्षुत्तृट्परिश्रान्तो निवृत्तो गृहमेयिवान् ।

कृतस्नानोचिताहारः संविवेश गतक्लमः ॥११

आत्मानमर्हयांचक्रे धूपालेपस्रगादिभिः ।

साध्वलङ्कृतसर्वांगो महिष्यामादधे मनः ॥ १२

तृप्तो हृष्टः सुदृप्तश्च कन्दर्पाकृष्टमानसः ।

न व्यचष्ट वरारोहां गृहिणीं गृहमेधिनीम् ॥१३

अन्तःपुरस्त्रियोऽपृच्छद्विमना इव वेदिषत् ।

अपि वः कुशलं रामाः सेश्वरीणां यथा पुरा ॥१४

न तथैतर्हि रोचन्ते गृहेषु गृहसम्पदः । यदि न स्याद् गृहे माता पत्नी वा पतिदेवता । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 885

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व्यंगे रथ इव प्राज्ञः को नामासीत दीनवत् ॥ १५

क्व वर्तते सा ललना मज्जन्तं व्यसनार्णवे ।

या मामुद्धरते प्रज्ञां दीपयन्ती पदे पदे ॥१६

रामा ऊचुः

नरनाथ न जानीमस्त्वत्प्रिया यद्वयवस्यति ।

भूतले निरवस्तारे शयानां पश्य शत्रुहन् ॥१७

नारद उवाच

पुरंजनः स्वमहिषीं निरीक्ष्यावधुतां भुवि ।

तत्संगोन्मथितज्ञानो वैक्लव्यं परमं ययौ ॥१८

सान्त्वयन् श्लक्ष्णया वाचा हृदयेन विदूयता ।

प्रेयस्याः स्नेहसंरम्भलिंगमात्मनि नाभ्यगात् ॥१९

इस प्रकार वहाँ खरगोश, सूअर, भैंसे, नीलगाय, कृष्णमृग, साही तथा और भी बहुत - से मेध्य पशुओंका वध करते - करते राजा पुरंजन बहुत थक गया ॥१० ॥ तब वह भूख - प्याससे

अत्यन्त शिथिल हो वनसे लौटकर राजमहलमें आया । वहाँ उसने यथायोग्य रीतिसे स्नान और भोजनसे निवृत्त हो, कुछ विश्राम करके थकान दूर की ॥११ ॥ फिर गन्ध, चन्दन और माला

आदिसे सुसज्जित हो सब अंगोंमें सुन्दर - सुन्दर आभूषण पहने । तब उसे अपनी प्रियाकी याद आयी ॥१२ ॥ वह भोजनादिसे तृप्त, हृदयमें आनन्दित, मदसे उन्मत्त और कामसे व्यथित

होकर अपनी सुन्दरी भार्याको ढूँढने लगा; किन्तु उसे वह कहीं भी दिखायी न दी ॥१३ ॥

प्राचीनबर्हि! तब उसने चित्तमें कुछ उदास होकर अन्तःपुरकी स्त्रियोंसे पूछा, ‘ सुन्दरियो! अपनी स्वामिनीके सहित तुम सब पहलेकी ही तरह कुशलसे हो न? || १४ || क्या कारण है आज इस घरकी सम्पत्ति पहले जैसी सुहावनी नहीं जान पड़ती? घरमें माता अथवा पतिपरायणा भार्या न हो, तो वह घर बिना पहियेके रथके समान हो जाता है; फिर उसमें कौन बुद्धिमान् दीन पुरुषोंके समान रहना पसंद करेगा ॥ १५ ॥ अत: बताओ, वह सुन्दरी कहाँ है,

जो दुःख- समुद्रमें डूबनेपर मेरी विवेक - बुद्धिको पद - पदपर जाग्रत् करके मुझे उस संकटसे उबार लेती है? ' ॥१६ ॥

स्त्रियोंने कहा — नरनाथ! मालूम नहीं आज आपकी प्रियाने क्या ठानी है । शत्रुदमन! देखिये, वे बिना बिछौनेके पृथ्वीपर ही पड़ी हुई हैं ॥१७ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! उस स्त्रीके संगसे राजा पुरंजनका विवेक नष्ट हो चुका ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 886

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था; इसलिये अपनी रानीको पृथ्वीपर अस्त - व्यस्त अवस्थामें पड़ी देखकर वह अत्यन्त व्याकुल हो गया ॥ १८ ॥ उसने दुःखित हृदयसे उसे मधुर वचनोंद्वारा बहुत कुछ समझाया,

किन्तु उसे अपनी प्रेयसीके अंदर अपने प्रति प्रणय- कोपका कोई चिह्न नहीं दिखायी दिया ॥१९ ॥

अनुनिन्येऽथ शनकैर्वीरोऽनुनयकोविदः ।

पस्पर्श पादयुगलमाह चोत्संगलालिताम् ॥ २०

पुरंजन उवाच

नूनं त्वकृतपुण्यास्ते भृत्या येष्वीश्वराः शुभे ।

कृतागस्स्वात्मसात्कृत्वा शिक्षादण्डं न युंजते ॥२१

परमोऽनुग्रहो दण्डो भृत्येषु प्रभुणार्पितः ।

बालो न वेद तत्तन्वि बन्धुकृत्यममर्षणः ॥२२

सा त्वं मुखं सुदति सुभ्रुवनुरागभार-व्रीडाविलम्बविलसद्ध सितावलोकम् । नीलालकालिभिरुपस्कृतमुन्नसं नः स्वानां प्रदर्शय मनस्विनि वल्गुवाक्यम् ॥२३ तस्मिन्दधे दममहं तव वीरपत्नि

योऽन्यत्र भूसुरकुलात्कृतकिल्बिषस्तम् ।

पश्ये न वीतभयमुन्मुदितं त्रिलोक्या-मन्यत्र वै मुररिपोरितरत्र दासात् ॥२४

वक्त्रं न ते वितिलकं मलिनं विहर्षं संरम्भभीममविमृष्टमपेतरागम् । पश्ये स्तनावपि शुचोपहतौ सुजातौ बिम्बाधरं विगतकुङ्कुमपङ्करागम् ॥२५ तन्मे प्रसीद सुहृदः कृतकिल्बिषस्य

स्वैरं गतस्य मृगयां व्यसनातुरस्य ।

का देवरं वशगतं कुसुमास्त्रवेग-विस्रस्त पौंस्नमुशती न भजेत कृत्ये ॥२६

वह मनानेमें भी बहुत कुशल था, इसलिये अब पुरंजनने उसे धीरे - धीरे मनाना आरम्भ किया । उसने पहले उसके चरण छूए और फिर गोदमें बिठाकर बड़े प्यारसे कहने लगा ॥२० ॥

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पृष्ठ 887

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पुरंजन बोला – सुन्दरि! वे सेवक तो निश्चय ही बड़े अभागे हैं, जिनके अपराध करनेपर स्वामी उन्हें अपना समझकर शिक्षाके लिये उचित दण्ड नहीं देते ॥ २१ ॥ सेवकको दिया हुआ

स्वामीका दण्ड तो उसपर बड़ा अनुग्रह ही होता है । जो मूर्ख हैं, उन्हींको क्रोधके कारण अपने हितकारी स्वामीके किये हुए उस उपकारका पता नहीं चलता ॥ २२ ॥ सुन्दर दन्तावली और

मनोहर भौंहोंसे शोभा पानेवाली मनस्विनि! अब यह क्रोध दूर करो और एक बार मुझे अपना समझकर प्रणय - भार तथा लज्जासे झुका हुआ एवं मधुर मुसकानमयी चितवनसे सुशोभित अपना मनोहर मुखड़ा दिखाओ । अहो! भ्रमरपंक्तिके समान नीली अलकावली, उन्नत नासिका और सुमधुर वाणीके कारण तुम्हारा वह मुखारविन्द कैसा मनोमोहक जान पड़ता है ॥२३ ॥ वीरपत्नि! यदि किसी दूसरेने तुम्हारा कोई अपराध किया हो तो उसे बताओ; यदि

वह अपराधी ब्राह्मणकुलका नहीं है, तो मैं उसे अभी दण्ड देता हूँ । मुझे तो भगवान्के भक्तोंको छोड़कर त्रिलोकीमें अथवा उससे बाहर ऐसा कोई नहीं दिखायी देता जो तुम्हारा अपराध करके निर्भय और आनन्दपूर्वक रह सके || २४ || प्रिये! मैंने आजतक तुम्हारा मुख कभी तिलकहीन, उदास, मुरझाया हुआ, क्रोधके कारण डरावना, कान्तिहीन और स्नेहशून्य नहीं देखा; और न कभी तुम्हारे सुन्दर स्तनोंको ही शोकाश्रुओंसे भीगा तथा बिम्बाफलसदृश अधरोंको स्निग्ध केसरकी लालीसे रहित देखा है ॥ २५ ॥ मैं व्यसनवश तुमसे बिना पूछे

शिकार खेलने चला गया, इसलिये अवश्य अपराधी हूँ । फिर भी अपना समझकर तुम मुझपर प्रसन्न हो जाओ; कामदेवके विषम बाणोंसे अधीर होकर जो सर्वदा अपने अधीन रहता है, उस अपने प्रिय पतिको उचित कार्यके लिये भला कौन कामिनी स्वीकार नहीं करती ॥२६ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे पुरंजनोपाख्याने षड्विंशोऽध्यायः ॥२६ ॥

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पृष्ठ 888

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अथ सप्तविंशोऽध्यायः पुरंजनपुरीपर चण्डवेगकी चढ़ाई तथा कालकन्याका चरित्र नारद उवाच

इत्थं पुरंजनं सम्यग्वशमानीय विभ्रमैः ।

पुरंजनी महाराज रेमे रमयती पतिम् ॥१

स राजा महिषीं राजन् सुस्नातां रुचिराननाम् ।

कृतस्वस्त्ययनां तृप्तामभ्यनन्ददुपागताम् ॥२

तयोपगूढः परिरब्धकन्धरो रहोऽनुमन्त्रैरपकृष्टचेतनः । न कालरंहो बुबुधे दुरत्ययं दिवा निशेति प्रमदापरिग्रहः ॥३ शयान उन्नद्धमदो महामना

महार्हतल्पे महिषीभुजोपधिः ।

तामेव वीरो मनुते परं यत-स्तमोऽभिभूतो न निजं परं च यत् ॥४

तयैवं रममाणस्य कामकश्मलचेतसः ।

क्षणार्धमिव राजेन्द्र व्यतिक्रान्तं नवं वयः ॥५

तस्यामजनयत्पुत्रान् पुरंजन्यां पुरंजनः ।

शतान्येकादश विराडायुषोऽर्धमथात्यगात् ॥ ६

दुहितृर्दशोत्तरशतं पितृमातृयशस्करीः ।

शीलौदार्यगुणोपेताः पौरंजन्यः प्रजापते ॥ ७

स पंचालपतिः पुत्रान् पितृवंशविवर्धनान् ।

दारैः संयोजयामास दुहितृः सदृशैर्वरैः ॥८

पुत्राणां चाभवन् पुत्रा एकैकस्य शतं शतम् ।

यैर्वै पौरंजनो वंशः पंचालेषु समेधितः ॥९

तेषु तद्रिक्थहारेषु गृहको शानुजीविषु ।

निरूढेन ममत्वेन विषयेष्वन्वबध्यत ॥ १०

श्रीनारदजी कहते हैं—- महाराज! इस प्रकार वह सुन्दरी अनेकों नखरोंसे पुरंजनको पूरी ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 889

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तरह अपने वशमें कर उसे आनन्दित करती हुई विहार करने लगी ॥१ ॥ उसने अच्छी तरह

स्नान कर अनेक प्रकारके मांगलिक शृंगार किये तथा भोजनादिसे तृप्त होकर वह राजाके पास आयी । राजाने उस मनोहर मुखवाली राजमहिषीका सादर अभिनन्दन किया ॥ २ ॥

पुरंजनीने राजाका आलिंगन किया और राजाने उसे गले लगाया । फिर एकान्तमें मनके अनुकूल रहस्यकी बातें करते हुए वह ऐसा मोहित हो गया कि उस कामिनीमें ही चित्त लगा रहनेके कारण उसे दिन - रातके भेदसे निरन्तर बीतते हुए कालकी दुस्तर गतिका भी कुछ पता न चला ॥३ ॥ मदसे छका हुआ मनस्वी पुरंजन अपनी प्रियाकी भुजापर सिर रखे महामूल्य

शय्यापर पड़ा रहता । उसे तो वह रमणी ही जीवनका परम फल जान पड़ती थी । अज्ञानसे आवृत्त हो जानेके कारण उसे आत्मा अथवा परमात्माका कोई ज्ञान न रहा ॥४ ॥

राजन्! इस प्रकार कामातुर चित्तसे उसके साथ विहार करते - करते राजा पुरंजनकी जवानी आधे क्षणके समान बीत गयी || ५ || प्रजापते! उस पुरंजनीसे राजा पुरंजनके ग्यारह - पिताका सुयश बढ़ानेवाली और सौ पुत्र और एक सौ दस कन्याएँ हुईं, जो सभी माता-सुशीलता, उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न थीं । ये पौरंजनी नामसे विख्यात हुईं । इतनेमें ही उस सम्राट्की लंबी आयुका आधा भाग निकल गया ॥ ६-७ ॥ फिर पांचालराज पुरंजनने पितृवंशकी वृद्धि करनेवाले पुत्रोंका वधुओंके साथ और कन्याओंका उनके योग्य वरोंके साथ विवाह कर दिया ॥८ ॥ पुत्रोंमेंसे प्रत्येकके सौ - सौ पुत्र हुए । उनसे वृद्धिको प्राप्त होकर

पुरंजनका वंश सारे पांचाल देशमें फैल गया ॥९ ॥ इन पुत्र, पौत्र, गृह, कोश, सेवक और

मन्त्री आदिमें दृढ़ ममता हो जानेसे वह इन विषयोंमें ही बँध गया ॥१० ॥

ईजे च क्रतुभिर्घोरैर्दीक्षितः पशुमारकैः ।

देवान् पितॄन् भूतपतीन्नानाकामो यथा भवान् ॥११

युक्तेष्वेवं प्रमत्तस्य कुटुम्बासक्तचेतसः ।

आससाद ' स वै कालो योऽप्रियः प्रिययोषिताम् ॥१२

चण्डवेग इति ख्यातो गन्धर्वाधिपतिर्नृप ।

गन्धर्वास्तस्य बलिनः षष्ट्युत्तरशतत्रयम् ॥१३

गन्धर्व्यस्तादृशीरस्य मैथुन्यश्च सितासिताः ।

परिवृत्त्या विलुम्पन्ति सर्वकामविनिर्मिताम् ॥१४

ते चण्डवेगानुचराः पुरंजनपुरं यदा ।

हर्तुमारेभिरे तत्र प्रत्यषेधत्प्रजागरः ॥१५

स सप्तभिः शतैरेको विंशत्या च शतं समाः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 890

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पुरंजनपुराध्यक्षो गन्धर्वैर्युयुधे बली ॥१६

क्षीयमाणे स्वसम्बन्धे एकस्मिन् बहुभिर्युधा ।

चिन्तां परां जगामार्तः सराष्ट्रपुरबान्धवः ॥१७

स एव पुर्यां मधुभुक् पंचालेषु स्वपार्षदैः ।

उपनीतं ३ बलिं गृह्णन् स्त्रीजितो नाविदद्भयम् ॥१८

कालस्य दुहिता काचित्त्रिलोकीं वरमिच्छती ।

पर्यटन्ती न बर्हिष्मन् प्रत्यनन्दत कश्चन ॥ १ ९

दौर्भाग्येनात्मनो ४ लोके विश्रुता दुर्भगेति सा ।

या तुष्टा राजर्षये तु वृतादात्पूरवे वरम् ॥२०

फिर तुम्हारी तरह उसने भी अनेक प्रकारके भोगोंकी कामनासे यज्ञकी दीक्षा ले तरह-तरहके पशुहिंसामय घोर यज्ञोंसे देवता, पितर और भूतपतियोंकी आराधना की ॥११ ॥ इस

प्रकार वह जीवनभर आत्माका कल्याण करनेवाले कर्मोंकी ओरसे असावधान और कुटुम्बपालनमें व्यस्त रहा । अन्तमें वृद्धावस्थाका वह समय आ पहुँचा, जो स्त्रीलंपट पुरुषोंको बड़ा अप्रिय होता है ॥१२ ॥

राजन्! चण्डवेग नामका एक गन्धर्वराज है । उसके अधीन तीन सौ साठ महाबलवान् गन्धर्व रहते हैं ॥१३ ॥ इनके साथ मिथुनभावसे स्थित कृष्ण और शुक्ल वर्णकी उतनी ही

गन्धर्वियाँ भी हैं । ये बारी - बारीसे चक्कर लगाकर भोग - विलासकी सामग्रियोंसे भरी - पूरी नगरीको लूटती रहती हैं ॥१४ ॥ गन्धर्वराज चण्डवेगके उन अनुचरोंने जब राजा पुरंजनका

नगर लूटना आरम्भ किया, तब उन्हें पाँच फनके सर्प प्रजागरने रोका ॥ १५ ॥ यह

पुरंजनपुरीकी चौकसी करनेवाला महाबलवान् सर्प सौ वर्षतक अकेला ही उन सात सौ बीस गन्धर्वगन्धर्वियोंसे युद्ध करता रहा ॥ १६ ॥ बहुत - से वीरोंके साथ अकेले ही युद्ध करनेके

कारण अपने एकमात्र सम्बन्धी प्रजागरको बलहीन हुआ देख राजा पुरंजनको अपने राष्ट्र और नगरमें रहनेवाले अन्य बान्धवोंके सहित बड़ी चिन्ता हुई ॥ १७ ॥ वह इतने दिनोंतक

पांचाल देशके उस नगरमें अपने दूतोंद्वारा लाये हुए करको लेकर विषय - भोगोंमें मस्त रहता था । स्त्रीके वशीभूत रहनेके कारण इस अवश्यम्भावी भयका उसे पता ही न चला ॥१८ ॥

बर्हिष्मन्! इन्हीं दिनों कालकी एक कन्या वरकी खोजमें त्रिलोकीमें भटकती रही, फिर भी उसे किसीने स्वीकार नहीं किया || १ ९ || वह कालकन्या ( जरा ) बड़ी भाग्यहीना थी, इसलिये लोग उसे ‘ दुर्भगा ' कहते थे । एक बार राजर्षि पूरुने पिताको अपना यौवन देनेके लिये अपनी ही इच्छासे उसे वर लिया था, इससे प्रसन्न होकर उसने उन्हें राज्यप्राप्तिका वर दिया था ॥२० ॥

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