श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 891–900
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 891–900
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कदाचिदटमाना सा ब्रह्मलोकान्महीं गतम् ।
वव्रे बृहद्व्रतं मां तु जानती काममोहिता ॥२१
मयि संरभ्य विपुलमदाच्छापं सुदुःसहम् ।
स्थातुमर्हसि नैकत्र मद्याच्ञाविमुखो मुने ॥ २२
ततो विहतसङ्कल्पा कन्यका यवनेश्वरम् ।
मयोपदिष्टमासाद्य वव्रे नाम्ना भयं पतिम् ॥२३
ऋषभं यवनानां त्वां वृणे वीरेप्सितं पतिम् ।
सङ्कल्पस्त्वयि भूतानां कृतः किल न रिष्यति ॥२४
द्वाविमावनुशोचन्ति बालावसदवग्रहौ ।
यल्लोकशास्त्रोपनतं न राति न तदिच्छति ॥२५
अथो भजस्व मां भद्र भजन्तीं मे दयां कुरु ।
एतावान् पौरुषो धर्मो यदार्ताननुकम्पते ॥२६
कालकन्योदितवचो निशम्य यवनेश्वरः ।
चिकीर्षुर्देवगुह्यं स सस्मितं तामभाषत ॥२७
मया निरूपितस्तुभ्यं पतिरात्मसमाधिना ।
नाभिनन्दति लोकोऽयं त्वामभद्रामसम्मताम् ॥२८
त्वमव्यक्तगतिर्भुङ्क्ष्व लोकं कर्मविनिर्मितम् ।
याहि मे पृतनायुक्ता प्रजानाशं प्रणेष्यसि ॥२९
प्रज्वारोऽयं मम भ्राता त्वं च मे भगिनी भव ।
चराम्युभाभ्यां लोकेऽस्मिन्नव्यक्तो भीमसैनिकः ॥३०
एक दिन मैं ब्रह्मलोकसे पृथ्वीपर आया, तो वह घूमती - घूमती मुझे भी मिल गयी । तब मुझे नैष्ठिक ब्रह्मचारी जानकर भी कामातुरा होनेके कारण उसने वरना चाहा ॥२१ ॥ मैंने
उसकी प्रार्थना स्वीकार नहीं की । इसपर उसने अत्यन्त कुपित होकर मुझे यह दुःसह शाप दिया कि ‘ तुमने मेरी प्रार्थना स्वीकार नहीं की, अतः तुम एक स्थानपर अधिक देर न ठहर सकोगे ' ॥२२ ॥
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तब मेरी ओरसे निराश होकर उस कन्याने मेरी सम्मति से यवनराज भयके पास जाकर उसका पतिरूपसे वरण किया ॥२३ ॥ और कहा, ' वीरवर! आप यवनोंमें श्रेष्ठ हैं, मैं आपसे
प्रेम करती हूँ और पति बनाना चाहती हूँ । आपके प्रति किया हुआ जीवोंका संकल्प कभी विफल नहीं होता ॥२४ ॥ जो मनुष्य लोक अथवा शास्त्रकी दृष्टिसे देनेयोग्य वस्तुका दान नहीं
करता और जो शास्त्रदृष्टिसे अधिकारी होकर भी ऐसा दान नहीं लेता, वे दोनों ही दुराग्रही और मूढ़ हैं, अतएव शोचनीय हैं ॥ २५ ॥ भद्र! इस समय मैं आपकी सेवामें उपस्थित हुई हूँ,
आप मुझे स्वीकार करके अनुगृहीत कीजिये । पुरुषका सबसे बड़ा धर्म दीनोंपर दया करना ही है ' ॥२६ ॥
कालकन्याकी बात सुनकर यवनराजने विधाताका एक गुप्त कार्य करानेकी इच्छासे मुसकराते हुए उससे कहा || २७ || ' मैंने योगदृष्टिसे देखकर तेरे लिये एक पति निश्चय किया है । तू सबका अनिष्ट करनेवाली है, इसलिये किसीको भी अच्छी नहीं लगती और इसीसे लोग तुझे स्वीकार नहीं करते । अतः इस कर्मजनित लोकको तू अलक्षित होकर बलात् भोग । तू मेरी सेना लेकर जा; इसकी सहायतासे तू सारी प्रजाका नाश करनेमें समर्थ होगी, कोई भी तेरा सामना न कर सकेगा ॥ २८-२९ ॥ यह प्रज्वार नामका मेरा भाई है और तू मेरी बहिन बन जा । तुम दोनोंके साथ मैं अव्यक्त गतिसे भयंकर सेना लेकर सारे लोकोंमें विचरूँगा ' ॥३० ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे पुरंजनोपाख्याने सप्तविंशोऽध्यायः ॥२७ ॥
-१. प्रा ० पा ० — आससादाथ वै । २. प्रा ० पा ० – पुरीं । ३. प्रा ० पा ० – उपानीतं । ४. प्रा ० पा ० — दौर्भगेन । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथाष्टाविंशोऽध्यायः पुरंजनको स्त्रीयोनिकी प्राप्ति और अविज्ञातके उपदेशसे उसका मुक्त होना नारद उवाच
सैनिका भयनाम्नो ये बर्हिष्मन् दिष्टकारिणः ।
प्रज्वारकालकन्याभ्यां विचेरुरवनीमिमाम् ॥१
त एकदा तु रभसा पुरंजनपुरीं नृप ।
रुरुधुर्भीमभोगाढ्यां जरत्पन्नगपालिताम् ॥२
कालकन्यापि बुभुजे पुरंजनपुरं बलात् ।
ययाभिभूतः पुरुषः सद्यो निःसारतामियात् ॥३
तयोपभुज्यमानां वै यवनाः सर्वतोदिशम् ।
द्वार्भिः प्रविश्य सुभृशं प्रार्दयन् सकलां पुरीम् ॥४
तस्यां प्रपीड्यमानायामभिमानी पुरंजनः ।
अवापोरुविधांस्तापान् ” कुटुम्बी ममताकुलः ॥५
कन्योपगुढो नष्टश्रीः कृपणो विषयात्मकः ।
नष्टप्रज्ञो हृतैश्वर्यो गन्धर्वयवनैर्बलात् ॥६
विशीर्णां स्वपुरीं वीक्ष्य प्रतिकूलाननादृतान् ।
पुत्रान् पौत्रानुगामात्याञ्जायां च गतसौहृदाम् ॥७
आत्मानं कन्यया ग्रस्तं पंचालानरिदूषितान् ।
दुरन्तचिन्तामापन्नो न लेभे तत्प्रतिक्रियाम् ॥८
कामानभिलषन्दीनो यातयामांश्च कन्यया ।
विगतात्मगतिस्नेहः पुत्रदारांश्च लालयन् ॥९
श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! फिर भय नामक यवनराजके आज्ञाकारी सैनिक प्रज्वार ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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और कालकन्याके साथ इस पृथ्वीतलपर सर्वत्र विचरने लगे || १ || एक बार उन्होंने बड़े वेगसे बूढ़े साँपसे सुरक्षित और संसारकी सब प्रकारकी सुख - सामग्रीसे सम्पन्न पुरंजनपुरीको घेर लिया ॥२ ॥ तब, जिसके चंगुलमें फँसकर पुरुष शीघ्र ही निःसार हो जाता है, वह कालकन्या
बलात् उस पुरीकी प्रजाको भोगने लगी || ३ || उस समय वे यवन भी कालकन्याके द्वारा भोगी जाती हुई उस पुरीमें चारों ओरसे भिन्न - भिन्न द्वारोंसे घुसकर उसका विध्वंस करने लगे ॥४ ॥ पुरीके इस प्रकार पीड़ित किये जानेपर उसके स्वामित्वका अभिमान रखनेवाले
तथा ममताग्रस्त, बहुकुटुम्बी राजा पुरंजनको भी नाना प्रकारके क्लेश सताने लगे ॥५ ॥
कालकन्याके आलिंगन करनेसे उसकी सारी श्री नष्ट हो गयी तथा अत्यन्त विषयासक्त होनेके कारण वह बहुत दीन हो गया, उसकी विवेकशक्ति नष्ट हो गयी । गन्धर्व और यवनोंने बलात् उसका सारा ऐश्वर्य लूट लिया ॥ ६ ॥ उसने देखा कि सारा नगर नष्ट - भ्रष्ट हो गया है;
पुत्र, पौत्र, भृत्य और अमात्यवर्ग प्रतिकूल होकर अनादर करने लगे हैं; स्त्री स्नेहशून्य हो गयी है, मेरी देहको कालकन्याने वशमें कर रखा है और पांचालदेश शत्रुओंके हाथमें पड़कर भ्रष्ट हो गया है । यह सब देखकर राजा पुरंजन अपार चिन्तामें डूब गया और उसे उस विपत्तिसे छुटकारा ' पानेका कोई उपाय न दिखायी दिया ॥ ७-८ ॥ कालकन्याने जिन्हें निःसार कर दिया था, उन्हीं भोगोंकी लालसासे वह दीन था । अपनी पारलौकिकी गति और बन्धुजनोंके स्नेहसे वंचित रहकर उसका चित्त केवल स्त्री और पुत्रके लालन - पालनमें ही लगा हुआ था ॥९ ॥
गन्धर्वयवनाक्रान्तां कालकन्योपमर्दिताम् ।
हातुं प्रचक्रमे राजा तां पुरीमनिकामतः ॥ १०
भयनाम्नोऽग्रजो भ्राता प्रज्वारः प्रत्युपस्थितः ।
ददाह तां पुरीं कृत्स्नां भ्रातुः प्रियचिकीर्षया ॥११
तस्यां सन्दह्यमानायां सपौरः सपरिच्छदः ।
कौटुम्बिकः कुटुम्बिन्या उपातप्यत सान्वयः ॥१२
यवनोपरुद्धायतनो ग्रस्तायां कालकन्यया ।
पुर्यां प्रज्वारसंसृष्टः पुरपालोऽन्वतप्यत ॥१३
न शेके सोऽवितुं तत्र पुरुकृच्छ्रोरुवेपथुः ।
गन्तुमैच्छत्ततो वृक्षकोटरादिव सानलात् ॥१४
शिथिलावयवो यहि गन्धर्वैर्हृतपौरुषः ।
यवनैररिभी राजन्नुपरुद्धो रुरोद ह ॥१५
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दुहितृः पुत्रपौत्रांश्च जामिजामातृपार्षदान् ।
स्वत्वावशिष्टं यत्किञ्चिद् गृहकोशपरिच्छदम् ॥१६
अहं ममेति स्वीकृत्य गृहेषु कुमतिर्गृही ।
दध्यौ प्रमदया दीनो विप्रयोग उपस्थिते ॥१७
लोकान्तरं गतवति मय्यनाथा कुटुम्बिनी ।
वर्तिष्यते कथं त्वेषा ' बालकाननुशोचती ॥१८
ऐसी अवस्थामें उनसे बिछुड़नेकी इच्छा न होनेपर भी उसे उस पुरीको छोड़नेके लिये बाध्य होना पड़ा; क्योंकि उसे गन्धर्व और यवनोंने घेर रखा था तथा कालकन्याने कुचल दिया था ॥१० ॥ इतनेमें ही यवनराज भयके बड़े भाई प्रज्वारने अपने भाईका प्रिय करनेके लिये
उस सारी पुरीमें आग लगा दी ॥ ११ ॥ जब वह नगरी जलने लगी, तब पुरवासी, सेवकवृन्द,
सन्तानवर्ग और कुटुम्बकी स्वामिनीके सहित कुटुम्बवत्सल पुरंजनको बड़ा दुःख हुआ ॥१२ ॥ नगरको कालकन्याके हाथमें पड़ा देख उसकी रक्षा करनेवाले सर्पको भी बड़ी
पीड़ा हुई, क्योंकि उसके निवासस्थानपर भी यवनोंने अधिकार कर लिया था और प्रज्वार उसपर भी आक्रमण कर रहा था ॥१३ ॥ जब उस नगरकी रक्षा करनेमें वह सर्वथा असमर्थ
हो गया, तब जिस प्रकार जलते हुए वृक्षके कोटरमें रहनेवाला सर्प उससे निकल जाना चाहता है, उसी प्रकार उसने भी महान् कष्टसे काँपते हुए वहाँसे भागनेकी इच्छा की ॥१४ ॥
उसके अंग - प्रत्यंग ढीले पड़ गये थे तथा गन्धर्वोंने उसकी सारी शक्ति नष्ट कर दी थी; अतः जब यवन शत्रुओंने उसे जाते देखकर रोक दिया, तब वह दुःखी होकर रोने लगा ॥१५ ॥
गृहासक्त पुरंजन देह - गेहादिमें मैं मेरेपनका भाव रखनेसे अत्यन्त बुद्धिहीन हो गया था । स्त्रीके प्रेमपाशमें फँसकर वह बहुत दीन हो गया था । अब जब इनसे बिछुड़नेका समय उपस्थित हुआ, तब वह अपने पुत्री, पुत्र, पौत्र, पुत्रवधू, दामाद, नौकर और घर, खजाना तथा अन्यान्य जिन पदार्थोंमें उसकी ममताभर शेष थी ( उनका भोग तो कभीका छूट गया था ), उन सबके लिये इस प्रकार चिन्ता करने लगा ॥१६ - १७ ॥ ' हाय! मेरी भार्या तो बहुत घर-गृहस्थीवाली है; जब मैं परलोकको चला जाऊँगा, तब यह असहाय होकर किस प्रकार अपना निर्वाह करेगी? इसे इन बाल - बच्चोंकी चिन्ता ही खा जायगी ॥१८ ॥
न मय्यनाशिते भुङ्क्ते नास्नाते स्नाति मत्परा ।
मयि रुष्टे सुसंत्रस्ता ' भर्त्सिते यतवाग्भयात् ॥१९
प्रबोधयति माविज्ञं व्युषिते शोककर्शिता ।
वर्त्येतद् गृहमेधीयं वीरसूरपि ेनेष्यति ॥२०
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कथं नु दारका दीना दारकीर्वापरायणाः ।
वर्तिष्यन्ते मयि गते ३ भिन्ननाव इवोदधौ ॥ २१
एवं कृपणया बुद्ध्या शोचन्तमतदर्हणम् ।
ग्रहीतुं कृतधीरेनं भयनामाभ्यपद्यत ॥२२
पशुवद्यवनैरेष नीयमानः स्वकं क्षयम् ।
अन्वद्रवन्ननुपथाः शोचन्तो भृशमातुराः ॥२३
पुरीं विहायोपगत उपरुद्धो भुजंगमः ।
यदा तमेवानु पुरी विशीर्णा प्रकृतिं गता ॥२४
विकृष्यमाणः प्रसभं यवनेन बलीयसा ।
नाविन्दत्तमसाऽऽविष्टः सखायं सुहृदं पुरः ॥२५
तं यज्ञपशवोऽनेन संज्ञप्ता येऽदयालुना ।
कुठारैश्चिच्छिदुः क्रुद्धाः स्मरन्तोऽमीवमस्य तत् ॥२६
अनन्तपारे तमसि मग्नो नष्टस्मृतिः समाः ।
शाश्वतीरनुभूयार्तिं प्रमदासंगदूषितः ॥२७
यह मेरे भोजन किये बिना भोजन नहीं करती थी और स्नान किये बिना स्नान नहीं करती थी, सदा मेरी ही सेवामें तत्पर रहती थी । मैं कभी रूठ जाता था तो यह बड़ी भयभीत हो जाती थी और झिड़कने लगता तो डरके मारे चुप रह जाती थी ॥ १ ९ ॥ मुझसे कोई भूल हो जाती तो यह मुझे सचेत कर देती थी । मुझमें इसका इतना अधिक स्नेह है कि यदि मैं कभी परदेश चला जाता था तो यह विरहव्यथासे सूखकर काँटा हो जाती थी । यों तो यह वीरमाता है, तो भी मेरे पीछे क्या यह गृहस्थाश्रमका व्यवहार चला सकेगी? ॥२० ॥ मेरे चले
जानेपर एकमात्र मेरे ही सहारे रहनेवाले ये पुत्र और पुत्री भी कैसे जीवन धारण करेंगे? ये तो बीच समुद्रमें नाव टूट जानेसे व्याकुल हुए यात्रियोंके समान बिलबिलाने लगेंगे ' ॥२१ ॥
यद्यपि ज्ञानदृष्टिसे उसे शोक करना उचित न था, फिर भी अज्ञानवश राजा पुरंजन इस प्रकार दीनबुद्धिसे अपने स्त्री- पुत्रादिके लिये शोकाकुल हो रहा था । इसी समय उसे पकड़नेके लिये वहाँ भय नामक यवनराज आ धमका ॥ २२ ॥ जब यवनलोग उसे पशुके समान बाँधकर
अपने स्थानको ले चले, तब उसके अनुचरगण अत्यन्त आतुर और शोकाकुल होकर उसके साथ हो लिये ॥२३ ॥ यवनोंद्वारा रोका हुआ सर्प भी उस पुरीको छोड़कर इन सबके साथ ही
चल दिया । उसके जाते ही सारा नगर छिन्न - भिन्न होकर अपने कारणमें लीन हो गया ॥२४ ॥
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इस प्रकार महाबली यवनराजके बलपूर्वक खींचनेपर भी राजा पुरंजनने अज्ञानवश अपने हितैषी एवं पुराने मित्र अविज्ञातका स्मरण नहीं किया ॥२५ ॥
उस निर्दय राजाने जिन यज्ञपशुओंकी बलि दी थी, वे उसकी दी हुई पीड़ाको याद करके उसे क्रोधपूर्वक कुठारोंसे काटने लगे || २६ || वह वर्षोंतक विवेकहीन अवस्थामें अपार अन्धकारमें पड़ा निरन्तर कष्ट भोगता रहा । स्त्रीकी आसक्तिसे उसकी यह दुर्गति हुई थी ॥२७ ॥
तामेव मनसा गृह्णन् बभूव प्रमदोत्तमा ।
अनन्तरं विदर्भस्य राजसिंहस्य वेश्मनि ॥२८
उपयेमे वीर्यपणां वैदर्भी मलयध्वजः ।
युधि निर्जित्य राजन्यान् पाण्ड्यः परपुरंजयः ॥२९
तस्यां स जनयांचक्र आत्मजामसितेक्षणाम् ।
यवीयसः सप्त सुतान् सप्त द्रविडभूभृतः ॥ ३०
एकैकस्याभवत्तेषां राजन्नर्बुदमर्बुदम् ।
भोक्ष्यते यद्वंशधरैर्मही मन्वन्तरं परम् ॥३१
अगस्त्यः प्राग्दुहितरमुपयेमे धृतव्रताम् ।
यस्यां दृढच्युतो जात इध्मवाहात्मजो मुनिः ॥ ३२
विभज्य तनयेभ्यः क्ष्मां राजर्षिर्मलयध्वजः ।
आरिराधयिषुः कृष्णं स जगाम कुलाचलम् ॥३३
हित्वा गृहान् सुतान् भोगान् वैदर्भी मदिरेक्षणा ।
अन्वधावत पाण्ड्येशं ज्योत्स्नेव रजनीकरम् ॥३४
तत्र चन्द्रवसा नाम ताम्रपर्णी वटोदका ।
तत्पुण्यसलिलैर्नित्यमुभयत्रात्मनो मृजन् ॥३५
कन्दाष्टिभिर्मूलफलैः पुष्पपर्णैस्तृणोदकैः ।
वर्तमानः शनैर्गात्रकर्शनं तप आस्थितः ॥३६
शीतोष्णवातवर्षाणि क्षुत्पिपासे प्रियाप्रिये । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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सुखदुःखे इति द्वन्द्वान्यजयत्समदर्शनः ॥३७
तपसा विद्यया पक्वकषायो नियमैर्यमैः ।
युयुजे ब्रह्मण्यात्मानं विजिताक्षानिलाशयः ॥ ३८
अन्त समयमें भी पुरंजनको उसीका चिन्तन बना हुआ था । इसलिये दूसरे जन्ममें वह नृपश्रेष्ठ विदर्भराजके यहाँ सुन्दरी कन्या होकर उत्पन्न हुआ || २८ || जब यह विदर्भनन्दिनी विवाहयोग्य हुई, तब विदर्भराजने घोषित कर दिया कि इसे सर्वश्रेष्ठ पराक्रमी वीर ही ब्याह सकेगा । तब शत्रुओंके नगरोंको जीतनेवाले पाण्ड्यनरेश महाराज मलयध्वजने समरभूमिमें समस्त राजाओंको जीतकर उसके साथ विवाह किया ॥ २ ९ ॥ उससे महाराज मलयध्वजने एक श्यामलोचना कन्या और उससे छोटे सात पुत्र उत्पन्न किये, जो आगे चलकर द्रविडदेशके सात राजा हुए ॥३० ॥ राजन्! फिर उनमेंसे प्रत्येक पुत्रके बहुत - बहुत पुत्र उत्पन्न हुए, जिनके
वंशधर इस पृथ्वीको मन्वन्तरके अन्ततक तथा उसके बाद भी भोगेंगे || ३१ || राजा
मलयध्वजकी पहली पुत्री बड़ी व्रतशीला थी । उसके साथ अगस्त्य ऋषिका विवाह हुआ ।
उससे उनके दृढ़च्युत नामका पुत्र हुआ और दृढ़च्युतके इध्मवाह हुआ ॥ ३२ ॥
अन्तमें राजर्षि मलयध्वज पृथ्वीको पुत्रोंमें बाँटकर भगवान् श्रीकृष्णकी आराधना करनेकी इच्छासे मलय पर्वतपर चले गये ॥३३ ॥ उस समय - चन्द्रिका जिस प्रकार
चन्द्रदेवका अनुसरण करती है— उसी प्रकार मत्तलोचना वैदर्भीने अपने घर, पुत्र और समस्त भोगोंको तिलांजलि दे पाण्ड्यनरेशका अनुगमन किया || ३४ || वहाँ चन्द्रवसा, ताम्रपर्णी और वेटोदका नामकी तीन नदियाँ थीं । उनके पवित्र जलमें स्नान करके वे प्रतिदिन अपने शरीर और अन्तःकरणको निर्मल करते थे ॥३५ ॥ वहाँ रहकर उन्होंने कन्द, बीज, मूल, फल, पुष्प,
पत्ते, तृण और जलसे ही निर्वाह करते हुए बड़ा कठोर तप किया । इससे धीरे - धीरे उनका शरीर बहुत सूख गया ॥ ३६ ॥ महाराज मलयध्वजने सर्वत्र समदृष्टि रखकर शीत - उष्ण, वर्षा-वायु, भूख - प्यास, प्रिय - अप्रिय और सुख - दुःखादि सभी द्वन्द्वोंको जीत लिया || ३७ ॥ तप और
उपासनासे वासनाओंको निर्मूल कर तथा यम - नियमादिके द्वारा इन्द्रिय, प्राण और मनको वशमें करके वे आत्मामें ब्रह्मभावना करने लगे ॥ ३८ ॥
आस्ते स्थाणुरिवैकत्र दिव्यं वर्षशतं स्थिरः ।
वासुदेवे भगवति नान्यद्वेदोद्वहन् रतिम् ॥३९
स व्यापकतयाऽऽत्मानं व्यतिरिक्ततयाऽऽत्मनि ।
विद्वान् स्वप्न इवामर्शसाक्षिणं विरराम ह ॥४०
साक्षाद्भगवतोक्तेन गुरुणा हरिणा नृप ।
विशुद्धज्ञानदीपेन स्फुरता विश्वतोमुखम् ॥४१
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परे ब्रह्मणि चात्मानं परं ब्रह्म तथाऽऽत्मनि ।
वीक्षमाणो विहायेक्षामस्मादुपरराम हा ॥४२
पतिं परमधर्मज्ञं वैदर्भी मलयध्वजम् ।
प्रेम्णा पर्यचरद्धित्वा भोगान् सा पतिदेवता ॥४३
चीरवासा व्रतक्षामा वेणीभूतशिरोरुहा ।
बभावुप पतिं शान्ता शिखा शान्तमिवानलम् ॥४४
अजानती प्रियतमं यदोपरतमंगना ।
सुस्थिरासनमासाद्य यथापूर्वमुपाचरत् ॥४५
यदा नोपलभेताङ्ग्रावूष्माणं पत्युरर्चती ।
आसीत्संविग्नहृदया यूथभ्रष्टा मृगी यथा ॥४६
आत्मानं शोचती दीनबन्धुं विक्लवाश्रुभिः ।
स्तनावासिच्य विपिने सुस्वरं प्ररुरोद सा ॥४७
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ राजर्षे इमामुदधिमेखलाम् ।
दस्युभ्यः क्षत्रबन्धुभ्यो बिभ्यतीं पातुमर्हसि ॥४८
इस प्रकार सौ दिव्य वर्षोंतक स्थाणुके समान निश्चलभावसे एक ही स्थानपर बैठे रहे । भगवान् वासुदेवमें सुदृढ़ प्रेम हो जानेके कारण इतने समयतक उन्हें शरीरादिका भी भान न हुआ ॥३९ ॥ राजन्! गुरुस्वरूप साक्षात् श्रीहरिके उपदेश किये हुए तथा अपने अन्तःकरणमें
सब ओर स्फुरित होनेवाले विशुद्ध विज्ञानदीपकसे उन्होंने देखा कि अन्तःकरणकी वृत्तिका प्रकाशक आत्मा स्वप्नावस्थाकी भाँति देहादि समस्त उपाधियोंमें व्याप्त तथा उनसे पृथक् भी है । ऐसा अनुभव करके वे सब ओरसे उदासीन हो गये ॥४०-४१ ॥ फिर अपनी आत्माको परब्रह्ममें और परब्रह्मको आत्मामें अभिन्नरूपसे देखा और अन्तमें इस अभेद चिन्तनको भी त्यागकर सर्वथा शान्त हो गये ॥४२ ॥
राजन्! इस समय पतिपरायणा वैदर्भी सब प्रकारके भोगोंको त्यागकर अपने परमधर्मज्ञ पति मलयध्वजकी सेवा बड़े प्रेमसे करती थी || ४३ || वह चीर - वस्त्र धारण किये रहती, व्रत उपवासादिके कारण उसका शरीर अत्यन्त कृश हो गया था और सिरके बाल आपसमें उलझ जानेके कारण उनमें लटें पड़ गयी थीं । उस समय अपने पतिदेवके पास वह अंगारभावको प्राप्त धूमरहित अग्निके समीप अग्निकी शान्त शिखाके समान सुशोभित हो रही थी ॥४४ ॥
उसके पति परलोकवासी हो चुके थे, परन्तु पूर्ववत् स्थिर आसनसे विराजमान थे । इस ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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रहस्यको न जाननेके कारण वह उनके पास जाकर उनकी पूर्ववत् सेवा करने लगी ॥४५ ॥
चरणसेवा करते समय जब उसे अपने पतिके चरणों में गरमी बिलकुल नहीं मालूम हुई, तब तो वह झुंडसे बिछुड़ी हुई मृगीके समान चित्तमें अत्यन्त व्याकुल हो गयी ॥ ४६ ॥ उस बीहड़
वनमें अपनेको अकेली और दीन अवस्थामें देखकर वह बड़ी शोकाकुल हुई और आँसुओंकी धारासे स्तनोंको भिगोती हुई बड़े जोर - जोर से रोने लगी ॥४७ ॥ वह बोली, ‘ राजर्षे! उठिये,
उठिये; समुद्रसे घिरी हुई यह वसुन्धरा लुटेरों और अधार्मिक राजाओंसे भयभीत हो रही है, आप इसकी रक्षा कीजिये ' ॥४८ ॥
एवं विलपती बाला विपिनेऽनुगता पतिम् ।
पतिता पादयोर्भर्तु रुदत्यश्रूण्यवर्तयत् ॥४९
चितिं ” दारुमयीं चित्वा तस्यां पत्युः कलेवरम् ।
आदीप्य चानुमरणे विलपन्ती मनो दधे ॥ ५०
तत्र पूर्वतरः कश्चित्सखा ब्राह्मण आत्मवान् ।
सान्त्वयन् वल्गुना साम्ना तामाह रुदतीं प्रभो ॥५१
ब्राह्मण उवाच
का त्वं कस्यासि को वायं शयानो यस्य शोचसि ।
जानासि किं सखायं मां येनाग्रे विचचर्थ ३ ह ॥५२
अपि स्मरसि चात्मानमविज्ञातसखं सखे ।
हित्वा मां पदमन्विच्छन् भौमभोगरतो गतः ॥५३
हंसावहं च त्वं चार्य सखायौ मानसायनौ ।
अभूतामन्तरा वौकः सहस्रपरिवत्सरान् ॥५४
स त्वं विहाय मां बन्धो गतो ग्राम्यमतिर्महीम् ।
विचरन् पदमद्राक्षीः कयाचिन्निर्मितं स्त्रिया ॥५५
पंचारामं नवद्वारमेकपालं त्रिकोष्ठकम् ।
षट्कुलं पंचविपणं पंचप्रकृति स्त्रीधवम् ॥५६
पंचेन्द्रियार्था आरामा द्वारः प्राणा नव प्रभो ।
तेजोऽबन्नानि कोष्ठानि कुलमिन्द्रियसंग्रहः ॥५७
विपणस्तु क्रियाशक्तिर्भूतप्रकृतिरव्यया ।
शक्त्यधीशः पुमांस्त्वत्र प्रविष्टो नावबुध्यते ॥५८
पतिके साथ वनमें गयी हुई वह अबला इस प्रकार विलाप करती पतिके चरणोंमें गिर ****** ebook converter DEMO Watermarks *******