श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 901–910
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 901–910
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गयी और रो - रोकर आँसू बहाने लगी ॥ ४ ९ ॥ लकड़ियोंकी चिता बनाकर उसने उसपर पतिका शव रखा और अग्नि लगाकर विलाप करते - करते स्वयं सती होनेका निश्चय किया ॥५० ॥ राजन्! इसी समय उसका कोई पुराना मित्र एक आत्मज्ञानी ब्राह्मन वहाँ
आया । उसने उस रोती हुई अबलाको मधुर वाणी से समझाते हुए कहा ॥ ५१ ॥
ब्राह्मणने कहा — तू कौन है? किसकी पुत्री है? और जिसके लिये तू शोक कर रही है, वह यह सोया हुआ पुरुष कौन है? क्या तुम मुझे नहीं जानती? मैं वही तेरा मित्र हूँ, जिसके साथ तू पहले विचरा करती थी ॥ ५२ ॥ सखे! क्या तुम्हें अपनी याद आती है, किसी समय मैं
तुम्हारा अविज्ञात नामका सखा था? तुम पृथ्वीके भोग भोगनेके लिये निवास - स्थानकी खोजमें मुझे छोड़कर चले गये थे ॥ ५३ ॥ आर्य! पहले मैं और तुम एक - दूसरेके मित्र एवं
मानसनिवासी हंस थे । हम दोनों सहस्रों वर्षोंतक बिना किसी निवास - स्थानके ही रहे थे ॥५४ ॥ किन्तु मित्र! तुम विषयभोगोंकी इच्छासे मुझे छोड़कर यहाँ पृथ्वीपर चले आये!
यहाँ घूमते - घूमते तुमने एक स्त्रीका रचा हुआ स्थान देखा ॥ ५५ ॥ उसमें पाँच बगीचे, नौ
दरवाजे, एक द्वारपाल, तीन परकोटे, छः वैश्यकुल और पाँच बाजार थे । वह पाँच उपादान-कारणोंसे बना हुआ था और उसकी स्वामिनी एक स्त्री थी ॥ ५६ ॥ महाराज! इन्द्रियोंके पाँच
विषय उसके बगीचे थे, नौ इन्द्रिय - छिद्र द्वार थे; तेज, जल और अन्न- तीन परकोटे थे; मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ — छः वैश्यकुल थे; क्रियाशक्तिरूप कर्मेन्द्रियाँ ही बाजार थीं; पाँच भूत ही उसके कभी क्षीण न होनेवाले उपादान कारण थे और बुद्धिशक्ति ही उसकी स्वामिनी थी । यह ऐसा नगर था, जिसमें प्रवेश करनेपर पुरुष ज्ञानशून्य हो जाता है — अपने स्वरूपको भूल जाता है ॥५७-५८ ॥
तस्मिंस्त्वं रामया स्पृष्टो रममाणोऽश्रुतस्मृतिः ।
तत्संगादीदृशीं प्राप्तो दशां पापीयसीं प्रभो ॥५९
न त्वं विदर्भदुहिता नायं वीरः सुहृत्तव ।
न पतिस्त्वं पुरंजन्या रुद्धो नवमुखे यया ॥ ६०
माया ह्येषा मया सृष्टा यत्पुमांसं स्त्रियं सतीम् ' ।
मन्यसे नोभयं यद्वै हंसौ पश्यावयोर्गतिम् ॥६१
अहं भवान्न चान्यस्त्वं त्वमेवाहं विचक्ष्व भोः ।
न नौ पश्यन्ति कवयश्छिद्रं जातु मनागपि ॥ ६२
यथा पुरुष आत्मानमेकमादर्शचक्षुषोः ।
द्विधाभूतमवेक्षेत तथैवान्तरमावयोः ॥६३
एवं स मानसो हंसो हंसेन प्रतिबोधितः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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स्वस्थस्तद्व्यभिचारेण नष्टामाप पुनः स्मृतिम् ॥६४
बर्हिष्मन्नेतदध्यात्मं पारोक्ष्येण प्रदर्शितम् ।
यत्परोक्षप्रियो देवो भगवान् विश्वभावनः ॥६५
भाई! उस नगरमें उसकी स्वामिनीके फंदे में पड़कर उसके साथ विहार करते - करते तुम भी अपने स्वरूपको भूल गये और उसीके संगसे तुम्हारी यह दुर्दशा हुई है ॥ ५ ९ ॥ देखो, तुम न तो विदर्भराजकी पुत्री ही हो और न यह वीर मलयध्वज तुम्हारा पति ही । जिसने तुम्हें नौ द्वारोंके नगरमें बंद किया था, उस पुरंजनीके पति भी तुम नहीं हो ॥ ६० ॥
तुम पहले जन्ममें अपनेको पुरुष समझते थे और अब सती स्त्री मानते हो — यह सब मेरी ही फैलायी हुई माया है । वास्तवमें तुम न पुरुष हो न स्त्री । हम दोनों तो हंस हैं; हमारा जो वास्तविक स्वरूप है, उसका अनुभव करो ॥६१ ॥
मित्र! जो मैं ( ईश्वर ) हूँ, वही तुम ( जीव ) हो । तुम मुझसे भिन्न नहीं हो और तुम विचारपूर्वक देखो, मैं भी वही हूँ जो तुम हो । ज्ञानी पुरुष हम दोनोंमें कभी थोड़ा - सा भी अन्तर नहीं देखते ॥६२ ॥
जैसे एक पुरुष अपने शरीरकी परछाईंको शीशेमें और किसी व्यक्तिके नेत्रमें भिन्न - भिन्न रूपसे देखता है वैसे ही - एक ही आत्मा विद्या और अविद्याकी उपाधिके भेदसे अपनेको ईश्वर और जीवके रूपमें दो प्रकारसे देख रहा है ॥६३ ॥
इस प्रकार जब हंस ( ईश्वर ) - ने उसे सावधान किया, तब वह मानसरोवरका हंस ( जीव ) अपने स्वरूपमें स्थित हो गया और उसे अपने मित्रके विछोहसे भूला हुआ आत्मज्ञान फिर प्राप्त हो गया ॥ ६४ ॥
प्राचीनबर्हि! मैंने तुम्हें परोक्षरूपसे यह आत्मज्ञानका दिग्दर्शन कराया है; क्योंकि जगत्कर्ता जगदीश्वरको परोक्ष वर्णन ही अधिक प्रिय है ॥ ६५ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे पुरंजनोपाख्यानेऽष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
१. प्रा ० पा ० — आवापो ० । १. प्रा ० पा ० — राजन् तां पुरीमभिनिकामतः । २. प्रा ० पा ० - जामातृमित्रपार्षदान् । ३. प्रा ० पा०— त्वेका । १. प्रा ० पा ० — तु संत्र ० । २. प्रा ० पा०-२ ० - मृते । —रभिनेष्यति । ३. प्रा ० पा १. प्रा ० पा ० — चिता । २. प्रा ० पा ० – किं जानासि । ३. प्रा ० पा ० – विचरेम हि । १. प्रा ० पा ० — ततः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः पुरंजनोपाख्यानका तात्पर्य प्राचीनबर्हिरुवाच
भगवंस्ते वचोऽस्माभिर्न सम्यगवगम्यते ।
कवयस्तद्विजानन्ति न वयं कर्ममोहिताः ॥१
नारद उवाच
पुरुषं पुरंजनं विद्याद्यद् व्यनक्त्यात्मनः पुरम् ।
एकद्वित्रिचतुष्पादं बहुपादमपादकम् ॥२
योऽविज्ञाताहृतस्तस्य पुरुषस्य सखेश्वरः ।
यन्न विज्ञायते पुम्भिर्नामभिर्वा क्रियागुणैः ॥ ३
यदा जिघृक्षन् पुरुषः कार्त्स्न्येन प्रकृतेर्गुणान् ।
नवद्वारं द्विहस्ताङ्घ्रि तत्रामनुत साध्विति ॥४
बुद्धिं तु प्रमदां विद्यान्ममाहमिति यत्कृतम् ।
यामधिष्ठाय देहेऽस्मिन् पुमान् भुङ्क्तेऽक्षभिर्गुणान् ॥५
सखाय इन्द्रियगणा ज्ञानं कर्म च यत्कृतम् ।
सख्यस्तद्वृत्तयः प्राणः पंचवृत्तिर्यथोरगः ॥६
बृहद्बलं मनो विद्यादुभयेन्द्रियनायकम् ।
पंचालाः पंच विषया यन्मध्ये नवखं पुरम् ॥७
अक्षिणी नासिके कर्णौ मुखं शिश्नगुदाविति ।
द्वे द्वे द्वारा बहिर्याति यस्तदिन्द्रियसंयुतः ॥ ८
राजा प्राचीनबर्हिने कहा - भगवन्! मेरी समझमें आपके वचनोंका अभिप्राय पूरा - पूरा नहीं आ रहा है । विवेकी पुरुष ही इनका तात्पर्य समझ सकते हैं, हम कर्ममोहित जीव नहीं ॥१ ॥
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श्रीनारदजीने कहा— राजन्! पुरंजन ( नगरका निर्माता ) जीव है - जो अपने लिये एक, दो, तीन, चार अथवा बहुत पैरोंवाला या बिना पैरोंका शरीररूप पुर तैयार कर लेता है || २ || उस जीवका सखा जो अविज्ञात नामसे कहा गया है, वह ईश्वर है; क्योंकि किसी भी प्रकारके नाम, गुण अथवा कर्मोंसे जीवोंको उसका पता नहीं चलता ॥३ ॥ जीवने जब सुख - दुःखरूप
सभी प्राकृत विषयोंको भोगनेकी इच्छा की तब उसने दूसरे शरीरोंकी अपेक्षा नौ द्वार, दो हाथ और दो पैरोंवाला मानव - देह ही पसंद किया || ४ || बुद्धि अथवा अविद्याको ही तुम पुरंजनी नामकी स्त्री जानो; इसीके कारण देह और इन्द्रिय आदिमें मैं - मेरेपनका भाव उत्पन्न होता है और पुरुष इसीका आश्रय लेकर शरीरमें इन्द्रियोंद्वारा विषयोंको भोगता है ॥५ ॥ दस इन्द्रियाँ
ही उसके मित्र हैं, जिनसे कि सब प्रकारके ज्ञान और कर्म होते हैं । इन्द्रियोंकी वृत्तियाँ ही उसकी सखियाँ और प्राण - अपान - व्यान - उदान- समानरूप पाँच वृत्तियोंवाला प्राणवायु ही नगरकी रक्षा करनेवाला पाँच फनका सर्प है ॥६ ॥ दोनों प्रकारकी इन्द्रियोंके नायक मनको
ही ग्यारहवाँ महाबली योद्धा जानना चाहिये । शब्दादि पाँच विषय ही पांचालदेश हैं, जिसके बीचमें वह नौ द्वारोंवाला नगर बसा हुआ है ॥७ ॥
उस नगरमें जो एक - एक स्थानपर दो - दो द्वार बताये गये थे- वे दो नेत्रगोलक, दो नासाछिद्र और दो कर्णछिद्र हैं । इनके साथ मुख, लिंग और गुदा – ये तीन और मिलाकर कुल नौ द्वार हैं; इन्हींमें होकर वह जीव इन्द्रियोंके साथ बाह्य विषयोंमें जाता है || ८ ||
अक्षिणी नासिके आस्यमिति पंच पुरः कृताः ।
दक्षिणा दक्षिणः कर्ण उत्तरा चोत्तरः स्मृतः ॥९
पश्चिमे इत्यधोद्वारौ गुदं शिश्नमिहोच्यते ' ।
खद्योताऽऽविर्मुखी चात्र नेत्रे एकत्र निर्मिते ।
रूपं विभ्राजितं ताभ्यां विचष्टे चक्षुषेश्वरः ॥ १०
नलिनी नालिनी नासे गन्धः सौरभ उच्यते ।
घ्राणोऽवधूतो मुख्यास्यं विपणो वाग्रसविद्रसः ॥११
आपणो व्यवहारोऽत्र चित्रमन्धो बहूदनम् ।
पितृहूर्दक्षिणः कर्ण उत्तरो देवहूः स्मृतः ॥१२
प्रवृत्तं च निवृत्तं च शास्त्रं पंचालसंज्ञितम् ।
पितृयानं देवयानं श्रोत्राच्छ्रुतधराद्व्रजेत् ॥ १३
आसुरी मेढ्रमर्वाग्द्वार्व्यवायो ग्रामिणां रतिः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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उपस्थो दुर्मदः प्रोक्तो निरृतिर्गुद उच्यते ॥१४
वैशसं नरकं पायुर्लुब्धकोऽन्धौ तु मे शृणु ।
हस्तपादौ पुमांस्ताभ्यां युक्तो याति करोति च ॥१५
अन्तःपुरं च हृदयं विषूचिर्मन उच्यते ।
तत्र मोहं प्रसादं वा हर्षं प्राप्नोति तद्गुणैः ॥१६
इसमें दो नेत्रगोलक, दो नासाछिद्र और एक मुख – ये पाँच पूर्वके द्वार हैं; दाहिने कानको दक्षिणका और बायें कानको उत्तरका द्वार समझना चाहिये ॥९ ॥ गुदा और लिंग–
ये नीचेके दो छिद्र पश्चिमके द्वार हैं । खद्योता और आविर्मुखी नामके जो दो द्वार एक स्थानपर बतलाये थे, वे नेत्रगोलक हैं तथा रूप विभ्राजित नामका देश है, जिसका इन द्वारोंसे जीव चक्षु - इन्द्रियकी सहायतासे अनुभव करता है । ( चक्षु - इन्द्रियोंको ही पहले द्युमान् नामका सखा कहा गया है ) ॥१० ॥ दोनों नासाछिद्र ही नलिनी और नालिनी नामके द्वार हैं और नासिकाका
विषय गन्ध ही सौरभ देश है तथा घ्राणेन्द्रिय अवधूत नामका मित्र है । मुख मुख्य नामका द्वार है । उसमें रहनेवाला वागिन्द्रिय विपण है और रसनेन्द्रिय रसविद् ( रसज्ञ ) नामका मित्र है ॥११ ॥ वाणीका व्यापार आपण है और तरह- तरहका अन्न बहूदन है तथा दाहिना कान
पितृहू और बायाँ कान देवहू कहा गया है || १२ || कर्मकाण्डरूप प्रवृत्तिमार्गका शास्त्र और उपासनाकाण्डरूप निवृत्तिमार्गका शास्त्र ही क्रमशः दक्षिण और उत्तर पांचाल देश हैं । इन्हें श्रवणेन्द्रियरूप श्रुतधरकी सहायतासे सुनकर जीव क्रमशः पितृयान और देवयान मार्गोंमें जाता है ॥१३ ॥ लिंग ही आसुरी नामका पश्चिमी द्वार है, स्त्रीप्रसंग ग्रामक नामका देश है और
लिंगमें रहनेवाला उपस्थेन्द्रिय दुर्मद नामका मित्र है । गुदा निर्ऋति नामका पश्चिमी द्वार है ॥१४ ॥ नरक वैशस नामका देश है और गुदामें स्थित पायु - इन्द्रिय लुब्धक नामका मित्र है ।
इनके सिवा दो पुरुष अंधे बताये गये थे, उनका रहस्य भी सुनो । वे हाथ और पाँव हैं; इन्हींकी सहायतासे जीव क्रमशः सब काम करता और जहाँ - तहाँ जाता है ॥१५ ॥ हृदय अन्तःपुर है,
उसमें रहनेवाला मन ही विषूचि ( विषूचीन ) नामका प्रधान सेवक है । जीव उस मनके सत्त्वादि गुणोंके कारण ही प्रसन्नता, हर्षरूप विकार अथवा मोहको प्राप्त होता है ॥१६ ॥
यथा यथा विक्रियते गुणाक्तो विकरोति वा ।
तथा तथोपद्रष्टाऽऽत्मा तद्वृत्तीरनुकार्यते ॥१७
देहो रथस्त्विन्द्रियाश्वः संवत्सररयोऽगतिः ।
द्विकर्मचक्रस्त्रिगुणध्वजः पंचासुबन्धुरः ॥ १८
मनोरश्मिर्बुद्धिसूतो हृन्नीडो द्वन्द्वकूबरः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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पंचेन्द्रियार्थप्रक्षेपः सप्तधातुवरूथकः ॥१९
आकूतिर्विक्रमो बाह्यो मृगतृष्णां प्रधावति ।
एकादशेन्द्रियचमूः पंचसूनाविनोदकृत् ॥२०
संवत्सरश्चण्डवेगः कालो येनोपलक्षितः ।
तस्याहानीह गन्धर्वा गन्धर्व्यो रात्रयः स्मृताः ।
हरन्त्यायुः परिक्रान्त्या षष्ट्युत्तरशतत्रयम् ॥२१
कालकन्या जरा साक्षाल्लोकस्तां नाभिनन्दति ।
स्वसारं जगृहे मृत्युः क्षयाय यवनेश्वरः ॥२२
आधयो व्याधयस्तस्य सैनिका यवनाश्चराः ।
भूतोपसर्गाशुरयः प्रज्वारो द्विविधो ज्वरः ॥२३
बुद्धि ( राजमहिषी पुरंजनी ) जिस - जिस प्रकार स्वप्नावस्थामें विकारको प्राप्त होती है और जाग्रत् - अवस्थामें इन्द्रियादिको विकृत करती है, उसके गुणोंसे लिप्त होकर आत्मा ( जीव ) भी उसी उसी रूपमें उसकी वृत्तियोंका अनुकरण करनेको बाध्य होता है – यद्यपि वस्तुतः वह उनका निर्विकार साक्षीमात्र ही है ॥१७ ॥ शरीर ही रथ है । उसमें ज्ञानेन्द्रियरूप
पाँच घोड़े जुते हुए हैं । देखनेमें संवत्सररूप कालके समान ही उसका अप्रतिहत वेग है, वास्तवमें वह गतिहीन है । पुण्य और पाप – ये दो प्रकारके कर्म ही उसके पहिये हैं, तीन गुण ध्वजा हैं, पाँच प्राण डोरियाँ हैं ॥१८ ॥ मन बागडोर है, बुद्धि सारथि है, हृदय बैठनेका स्थान
है, सुख - दुःखादि द्वन्द्व जुए हैं, इन्द्रियोंके पाँच विषय उसमें रखे हुए आयुध हैं और त्वचा आदि सात धातुएँ उसके आवरण हैं ॥१९ ॥ पाँच कर्मेन्द्रियाँ उसकी पाँच प्रकारकी गति हैं । इस
रथपर चढ़कर रथीरूप यह जीव मृगतृष्णाके समान मिथ्या विषयोंकी ओर दौड़ता है । ग्यारह इन्द्रियाँ उसकी सेना हैं तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारा उन - उन इन्द्रियोंके विषयोंको अन्यायपूर्वक ग्रहण करना ही उसका शिकार खेलना है ॥२० ॥
जिसके द्वारा कालका ज्ञान होता है, वह संवत्सर ही चण्डवेग नामक गन्धर्वराज है । उसके अधीन जो तीन सौ साठ गन्धर्व बताये गये थे, वे दिन हैं और तीन सौ साठ गन्धर्वियाँ रात्रि हैं । ये बारी - बारीसे चक्कर लगाते हुए मनुष्यकी आयुको हरते रहते हैं ॥२१ ॥ वृद्धावस्था
ही साक्षात् कालकन्या है, उसे कोई भी पुरुष पसंद नहीं करता । तब मृत्युरूप यवनराजने लोकका संहार करनेके लिये उसे बहिन मानकर स्वीकार कर लिया ॥२२ ॥ आधि ( मानसिक
क्लेश ) और व्याधि ( रोगादि शारीरिक कष्ट ) ही उस यवनराजके पैदल चलनेवाले सैनिक हैं तथा प्राणियोंको पीड़ा पहुँचाकर शीघ्र ही मृत्युके मुखमें ले जानेवाला शीत और उष्ण दो प्रकारका ज्वर ही प्रज्वार नामका उसका भाई है ॥२३ ॥
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एवं बहुविधैर्दुःखैर्देवभूतात्मसम्भवैः ।
क्लिश्यमानः शतं वर्षं देहे देही तमोवृतः ॥२४
प्राणेन्द्रियमनोधर्मानात्मन्यध्यस्य निर्गुणः ।
शेते कामलवान्ध्यायन्ममाहमिति कर्मकृत् ॥२५
यदाऽऽत्मानमविज्ञाय भगवन्तं परं गुरुम् ।
पुरुषस्तु विषज्जेत गुणेषु प्रकृतेः स्वदृक् ॥२६
गुणाभिमानी स तदा कर्माणि कुरुतेऽवशः ।
शुक्लं कृष्णं लोहितं वा यथाकर्माभिजायते ॥२७
शुक्लात्प्रकाशभूयिष्ठाँल्लोकानाप्नोति कर्हिचित् ।
दुःखोदर्कान् क्रियायासांस्तमः शोकोत्कटान् क्वचित् ॥२८
क्वचित्पुमान् क्वचिच्च स्त्री क्वचिन्नोभयमन्धधीः ।
देवो मनुष्यस्तिर्यग्वा यथाकर्मगुणं ३ भवः ॥२९
क्षुत्परीतो यथा दीनः सारमेयो गृहं गृहम् ।
चरन् विन्दति यद्दिष्टं दण्डमोदनमेव वा ॥३०
तथा कामाशयो जीव उच्चावचपथा भ्रमन् ।
उपर्यधो वा मध्ये वा याति दिष्टं प्रियाप्रियम् ॥३१
दुःखेष्वेकतरेणापि दैवभूतात्महेतुषु ।
जीवस्य न व्यवच्छेदः स्याच्चेत्तत्तत्प्रतिक्रिया ॥ ३२
इस प्रकार यह देहाभिमानी जीव अज्ञानसे आच्छादित होकर अनेक प्रकारके आधिभौतिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक कष्ट भोगता हुआ सौ वर्षतक मनुष्यशरीरमें पड़ा रहता है ॥२४ ॥ वस्तुतः तो वह निर्गुण है, किन्तु प्राण, इन्द्रिय और मनके धर्मोंको
अपनेमें आरोपित कर मैं - मेरेपनके अभिमानसे बँधकर क्षुद्र विषयोंका चिन्तन करता हुआ तरह - तरहके कर्म करता रहता है ॥२५ ॥ यह यद्यपि स्वयंप्रकाश है, तथापि जबतक सबके
परमगुरु आत्मस्वरूप श्रीभगवान्के स्वरूपको नहीं जानता, तबतक प्रकृतिके गुणोंमें ही बँधा रहता है ॥२६ ॥ उन गुणोंका अभिमानी होनेसे वह विवश होकर सात्त्विक, राजस और
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तामस कर्म करता है तथा उन कर्मोंके अनुसार भिन्न - भिन्न योनियोंमें जन्म लेता है ॥२७ ॥
वह कभी तो सात्त्विक कर्मोंके द्वारा प्रकाशबहुल स्वर्गादि लोक प्राप्त करता है, कभी राजसी कर्मोंके द्वारा दुःखमय रजोगुणी लोकोंमें जाता है - जहाँ उसे तरह- तरहके कर्मोंका क्लेश उठाना पड़ता है — और कभी तमोगुणी कर्मोंके द्वारा शोकबहुल तमोमयी योनियोंमें जन्म लेता है ॥२८ ॥ इस प्रकार अपने कर्म और गुणोंके अनुसार देवयोनि, मनुष्ययोनि अथवा
पशु - पक्षीयोनिमें जन्म लेकर वह अज्ञानान्ध जीव कभी पुरुष, कभी स्त्री और कभी नपुंसक होता है ॥२९ ॥ जिस प्रकार बेचारा भूख से व्याकुल कुत्ता दर - दर भटकता हुआ अपने
प्रारब्धानुसार कहीं डंडा खाता है और कहीं भात खाता है, उसी प्रकार यह जीव चित्तमें नाना प्रकारकी वासनाओंको लेकर ऊँचे - नीचे मार्गसे ऊपर, नीचे अथवा मध्यके लोकोंमें भटकता हुआ अपने कर्मानुसार सुख - दुःख भोगता रहता है ॥३०-३१ ॥ आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक – इन तीन प्रकारके दुःखोंमेंसे किसी भी एकसे जीवका सर्वथा छुटकारा नहीं हो सकता । यदि कभी वैसा जान पड़ता है तो वह केवल तात्कालिक निवृत्ति ही है ॥३२ ॥
यथा हि पुरुषो भारं शिरसा गुरुमुद्वहन् ।
तं स्कन्धेन स आधत्ते तथा सर्वाः प्रतिक्रियाः ॥३३
नैकान्ततः प्रतीकारः कर्मणां कर्म केवलम् ।
द्वयं ह्यविद्योपसृतं स्वप्ने स्वप्न इवानघ ॥३४
अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते ।
मनसा लिंगरूपेण स्वप्ने विचरतो यथा ॥३५
अथात्मनोऽर्थभूतस्य यतोऽनर्थपरम्परा ।
संसृतिस्तद्व्यवच्छेदो भक्त्या परमया गुरौ ॥३६
वासुदेवे भगवति भक्तियोगः समाहितः ।
सध्रीचीनेन वैराग्यं ज्ञानं च जनयिष्यति ॥३७
सोऽचिरादेव राजर्षे स्यादच्युतकथाश्रयः ।
शृण्वतः श्रद्दधानस्य नित्यदा स्यादधीयतः ॥३८
यत्र भगवता राजन् साधवो विशदाशयाः ।
भगवद्गुणानुकथनश्रवणव्यग्रचेतसः ॥३९
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तस्मिन्महन्मुखरिता मधुभिच्चरित्र-पीयूषशेषसरितः परितः स्रवन्ति ।
ता ये पिबन्त्यवितृषो नृप गाढकर्णै-स्तान्न स्पृशन्त्यशनतृड्भयशोकमोहाः ॥ ४०
वह ऐसी ही है जैसे कोई सिरपर भारी बोझा ढोकर ले जानेवाला पुरुष उसे कंधेपर रख ले । इसी तरह सभी प्रतिक्रिया ( दुःखनिवृत्ति ) जाननी चाहिये - यदि किसी उपायसे मनुष्य एक प्रकारके दुःखसे छुट्टी पाता है, तो दूसरा दुःख आकर उसके सिरपर सवार हो जाता है ॥३३ ॥ शुद्धहृदय नरेन्द्र! जिस प्रकार स्वप्न में होनेवाला स्वप्नान्तर उस स्वप्नसे सर्वथा
छूटनेका उपाय नहीं है, उसी प्रकार कर्मफल- भोगसे सर्वथा छूटनेका उपाय केवल कर्म नहीं हो सकता; क्योंकि कर्म और कर्मफलभोग दोनों ही अविद्यायुक्त होते हैं ॥३४ ॥ जिस प्रकार
स्वप्नावस्थामें अपने मनोमय लिंगशरीरसे विचरनेवाले प्राणीको स्वप्नके पदार्थ न होनेपर भी भासते हैं, उसी प्रकार ये दृश्यपदार्थ वस्तुतः न होनेपर भी, जबतक अज्ञान - निद्रा नहीं टूटती, बने ही रहते हैं और जीवको जन्म - मरणरूप संसारसे मुक्ति नहीं मिलती । ( अतः इनकी आत्यन्तिक निवृत्तिका उपाय एकमात्र आत्मज्ञान ही है ) ॥३५ ॥
राजन्! जिस अविद्याके कारण परमार्थस्वरूप आत्माको यह जन्म - मरणरूप अनर्थपरम्परा प्राप्त हुई है, उसकी निवृत्ति गुरुस्वरूप श्रीहरिमें सुदृढ़ भक्ति होनेपर हो सकती है ॥३६ ॥ भगवान् वासुदेवमें एकाग्रतापूर्वक सम्यक् प्रकारसे किया हुआ भक्तिभाव ज्ञान
और वैराग्यका आविर्भाव कर देता है ॥ ३७ ॥ राजर्षे! यह भक्तिभाव भगवान्की कथाओंके
आश्रित रहता है । इसलिये जो श्रद्धापूर्वक उन्हें प्रतिदिन सुनता या पढ़ता है, उसे बहुत शीघ्र इसकी प्राप्ति हो जाती है ॥ ३८ ॥ राजन्! जहाँ भगवद्गुणोंको कहने और सुननेमें तत्पर
विशुद्धचित्त भक्तजन रहते हैं, उस साधु - समाजमें सब ओर महापुरुषोंके मुखसे निकले हुए श्रीमधुसूदनभगवान्के चरित्ररूप शुद्ध अमृतकी अनेकों नदियाँ बहती रहती हैं । जो लोग अतृप्त - चित्तसे श्रवणमें तत्पर अपने कर्णकुहरोंद्वारा उस अमृतका छककर पान करते हैं, उन्हें भूख - प्यास, भय, शोक और मोह आदि कुछ भी बाधा नहीं पहुँचा सकते ॥३९ -४० ॥
एतैरुपद्रुतो नित्यं जीवलोकः स्वभावजैः ।
न करोति हरेर्नूनं कथामृतनिधौ रतिम् ॥ ४१
प्रजापतिपतिः साक्षाद्भगवान् गिरिशोमनुः दक्षादयः प्रजाध्यक्षा नैष्ठिकाः सनकादयः ॥४२
मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
भृगुर्वसिष्ठ इत्येते मदन्ता ब्रह्मवादिनः ॥ ४३
अद्यापि वाचस्पतयस्तपोविद्यासमाधिभिः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******