श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 911–920

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 911–920

पृष्ठ 911

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पश्यन्तोऽपि न पश्यन्ति पश्यन्तं परमेश्वरम् ॥४४

शब्दब्रह्मणि दुष्पारे चरन्त उरुविस्तरे ।

मन्त्रलिङ्गैर्व्यवच्छिन्नं भजन्तो न विदुः परम् ॥४५

यदा यमनुगृह्णाति भगवानात्मभावितः ।

स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम् ॥४६

तस्मात्कर्मसु बर्हिष्मन्नज्ञानादर्थकाशिषु ।

मार्थदृष्टिं कृथाः श्रोत्रस्पर्शिष्वस्पृष्टवस्तुषु ॥४७

स्वं लोकं न विदुस्ते वै यत्र देवो जनार्दनः ।

आहुर्धूम्रधियो वेदं सकर्मकमतद्विदः ॥४८

आस्तीर्य दर्भैः प्रागग्रैः कार्त्स्न्येन क्षितिमण्डलम् ।

स्तब्धो बृहद्वधान्मानी कर्म नावैषि यत्परम् ।

तत्कर्म हरितोषं यत्सा विद्या तन्मतिर्यया ॥४९

हाय! स्वभावतः प्राप्त होनेवाले इन क्षुधा पिपासादि विघ्नोंसे सदा घिरा हुआ जीव-समुदाय श्रीहरिके कथामृत - सिन्धुसे प्रेम नहीं करता ॥४१ ॥ साक्षात् प्रजापतियोंके पति

ब्रह्माजी, भगवान् शंकर, स्वायम्भुव मनु, दक्षादि प्रजापतिगण, सनकादि नैष्ठिक ब्रह्मचारी, मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ और मैं - ये जितने ब्रह्मवादी मुनिगण हैं, समस्त वाङ्मयके अधिपति होनेपर भी तप, उपासना और समाधिके द्वारा ढूँढ़-ढूँढ़कर हार गये, फिर भी उस सर्वसाक्षी परमेश्वरको आजतक न देख सके ॥४२-४४ ॥ वेद भी अत्यन्त विस्तृत हैं, उसका पार पाना हँसी - खेल नहीं है । अनेकों महानुभाव उसकी आलोचना करके मन्त्रोंमें बताये हुए वज्र - हस्तत्वादि गुणोंसे युक्त इन्द्रादि देवताओंके रूपमें, भिन्न - भिन्न कर्मोंके द्वारा, यद्यपि उस परमात्माका ही यजन करते हैं तथापि उसके स्वरूपको वे भी नहीं जानते ॥४५ ॥ हृदयमें बार - बार चिन्तन किये जानेपर भगवान् जिस समय जिस

जीवपर कृपा करते हैं, उसी समय वह लौकिक व्यवहार एवं वैदिक कर्म - मार्गकी बद्धमूल आस्थासे छुट्टी पा जाता है ॥४६ ॥

बर्हिष्मन्! तुम इन कर्मोंमें परमार्थबुद्धि मत करो । ये सुननेमें ही प्रिय जान पड़ते हैं, परमार्थका तो स्पर्श भी नहीं करते । ये जो परमार्थवत् दीख पड़ते हैं, इसमें केवल अज्ञान ही कारण है ॥४७ ॥ जो मलिनमति कर्मवादी लोग वेदको कर्मपरक बताते हैं, वे वास्तवमें

उसका मर्म नहीं जानते । इसका कारण यही है कि वे अपने स्वरूपभूत लोक ( आत्मतत्त्व ) -को नहीं जानते, जहाँ साक्षात् श्रीजनार्दन भगवान् विराजमान हैं ॥४८ ॥ पूर्वकी ओर

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अग्रभागवाले कुशाओंसे सम्पूर्ण भूमण्डलको आच्छादित करके अनेकों पशुओंका वध करनेसे तुम बड़े कर्माभिमानी और उद्धत हो गये हो; किन्तु वास्तवमें तुम्हें कर्म या उपासना – किसीके भी रहस्यका पता नहीं है । वास्तवमें कर्म तो वही है, जिससे श्रीहरिको प्रसन्न किया जा सके और विद्या भी वही है, जिससे भगवान्‌में चित्त लगे ॥ ४ ९ ॥

हरिर्देहभृतामात्मा स्वयं प्रकृतिरीश्वरः ।

तत्पादमूलं शरणं यतः क्षेमो नृणामिह ॥५०

स वै प्रियतमश्चात्मा यतो न भयमण्वपि ।

इति वेद स वै विद्वान् यो विद्वान् स गुरुर्हरिः ॥ ५१

नारद उवाच

प्रश्न एवं हि संछिन्नो भवतः पुरुषर्षभ ।

अत्र मे वदतो गुह्यं निशामय सुनिश्चितम् ॥५२

क्षुद्रंचरं सुमनसां शरणे मिथित्वा रक्तं षडङ्घ्रिगणसामसु लुब्धकर्णम् । अग्रे वृकासुतृपोऽविगणय्य यान्तं पृष्ठे मृगं मृगय लुब्धकबाणभिन्नम् ॥५३ [ अस्यार्थः ] सुमनःसधर्मणां स्त्रीणां शरण आश्रमे पुष्पमधुगन्धवत्क्षुद्रतमं काम्यकर्मविपाकजं कामसुखलवं जैह्ह्व्यौपस्थ्यादि विचिन्वन्तं मिथुनीभूय तदभिनिवेशितमनसं षडङ्घ्रिगण - सामगीतवदतिमनोहरवनितादिजनालापेष्वतितरा - मतिप्रलोभितकर्णमग्रे वृकयूथवदात्मन आयुर्हरतोऽहोरात्रान्तान् काललव - विशेषानविगणय्य गृहेषु विहरन्तं पृष्ठत एव परोक्षमनुप्रवृत्तो लुब्धकः कृतान्तोऽन्तः शरेण यमिह पराविध्यति तमिममात्मानमहो राजन् भिन्न- हृदयं द्रष्टुमर्हसीति ॥५४ ॥

श्रीहरि सम्पूर्ण देहधारियोंके आत्मा, नियामक और स्वतन्त्र कारण हैं; अतः उनके चरणतल ही मनुष्योंके एकमात्र आश्रय हैं और उन्हींसे संसारमें सबका कल्याण हो सकता है ॥५० ॥ ‘ जिससे किसीको अणुमात्र भी भय नहीं होता, वही उसका प्रियतम आत्मा है '

ऐसा जो पुरुष जानता है, वही ज्ञानी है और जो ज्ञानी है, वही गुरु एवं साक्षात् श्रीहरि है ॥५१ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं — पुरुषश्रेष्ठ! यहाँतक जो कुछ कहा गया है, उससे तुम्हारे प्रश्नका उत्तर हो गया । अब मैं एक भलीभाँति निश्चित किया हुआ गुप्त साधन बताता हूँ, ध्यान देकर सुनो ॥५२ ॥ ' पुष्पवाटिकामें अपनी हरिनीके साथ विहार करता हुआ एक हरिन मस्त घूम

पृष्ठ 913

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रहा है, वह दूब आदि छोटे - छोटे अंकुरोंको चर रहा है । उसके कान भौंरोंके मधुर गुंजारमें लग रहे हैं । उसके सामने ही दूसरे जीवोंको मारकर अपना पेट पालनेवाले भेड़िये ताक लगाये खड़े हैं और पीछेसे शिकारी व्याधने बींधनेके लिये उसपर बाण छोड़ दिया है । परन्तु हरिन इतना बेसुध है कि उसे इसका कुछ भी पता नहीं है । ' एक बार इस हरिनकी दशापर विचार करो ॥५३ ॥

राजन्! इस रूपकका आशय सुनो । यह मृतप्राय हरिन तुम्हीं हो, तुम अपनी दशापर विचार करो । पुष्पोंकी तरह ये स्त्रियाँ केवल देखनेमें सुन्दर हैं, इन स्त्रियोंके रहनेका घर ही पुष्पवाटिका है । इसमें रहकर तुम पुष्पोंके मधु और गन्धके समान क्षुद्र सकाम कर्मोंके फलरूप, जीभ और जननेन्द्रियको प्रिय लगनेवाले भोजन तथा स्त्रीसंग आदि तुच्छ भोगोंको ढूँढ़ रहे हो । स्त्रियोंसे घिरे रहते हो और अपने मनको तुमने उन्हींमें फँसा रखा है । स्त्री - पुत्रोंका मधुर भाषण ही भौंरोंका मधुर गुंजार है, तुम्हारे कान उसीमें अत्यन्त आसक्त हो रहे हैं । सामने ही भेड़ियोंके झुंडके समान कालके अंश दिन और रात तुम्हारी आयुको हर रहे हैं, परन्तु तुम उनकी कुछ भी परवा न कर गृहस्थीके सुखोंमें मस्त हो रहे हो । तुम्हारे पीछे गुप - चुप लगा हुआ शिकारी काल अपने छिपे हुए बाणसे तुम्हारे हृदयको दूरसे ही बींध डालना चाहता ॥५४ ॥

स त्वं विचक्ष्य मृगचेष्टितमात्मनोऽन्त-श्चित्तं नियच्छ हृदि कर्णधुनीं च चित्ते । जह्यंगनाश्रममसत्तमयूथगाथं प्रीणीहि हंसशरणं विरम क्रमेण ॥५५ राजोवाच

श्रुतमन्वीक्षितं ब्रह्मन् भगवान् यदभाषत ।

नैतज्जानन्त्युपाध्यायाः किं न ब्रूयुर्विदुर्यदि ॥५६

संशयोऽत्र तु मे विप्र संछिन्नस्तत्कृतो महान् ।

ऋषयोऽपि हि मुह्यन्ति यत्र नेन्द्रियवृत्तयः ॥ ५७

कर्माण्यारभते येन पुमानिह विहाय तम् ।

अमुत्रान्येन देहेन जुष्टानि स यदश्नुते ॥५८

इति वेदविदां वादः श्रूयते तत्र तत्र ह ।

कर्म यत्क्रियते प्रोक्तं परोक्षं न प्रकाशते ॥५९

नारद उवाच

पृष्ठ 914

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येनैवारभते कर्म तेनैवामुत्र तत्पुमान् ।

भुङ्क्ते ह्यव्यवधानेन लिंगेन मनसा स्वयम् ॥ ६०

शयानमिममुत्सृज्य श्वसन्तं पुरुषो यथा ।

कर्मात्मन्याहितं भुङ्क्ते तादृशेनेतरेण वा ॥६१

इस प्रकार अपनेको मृगकी - सी स्थितिमें देखकर तुम अपने चित्तको हृदयके भीतर निरुद्ध करो और नदीकी भाँति प्रवाहित होनेवाली श्रवणेन्द्रियकी बाह्य वृत्तिको चित्तमें स्थापित करो ( अन्तर्मुखी करो ) । जहाँ कामी पुरुषोंकी चर्चा होती रहती है, उस गृहस्थाश्रमको छोड़कर परमहंसोंके आश्रय श्रीहरिको प्रसन्न करो और क्रमशः सभी विषयोंसे विरत हो जाओ ॥५५ ॥

राजा प्राचीनबर्हिने कहा- भगवन्! आपने कृपा करके मुझे जो उपदेश दिया, उसे मैंने सुना और उसपर विशेषरूपसे विचार भी किया । मुझे कर्मका उपदेश देनेवाले इन आचार्योंको निश्चय ही इसका ज्ञान नहीं है; यदि ये इस विषयको जानते तो मुझे इसका उपदेश क्यों न करते ॥५६ ॥ विप्रवर! मेरे उपाध्यायोंने आत्मतत्त्वके विषयमें मेरे हृदयमें जो महान् संशय

खड़ा कर दिया था, उसे आपने पूरी तरहसे काट दिया । इस विषय में इन्द्रियोंकी गति न होनेके कारण मन्त्रद्रष्टा ऋषियोंको भी मोह हो जाता है ॥ ५७ ॥ वेदवादियोंका कथन जगह - जगह

सुना जाता है कि ' पुरुष इस लोकमें जिसके द्वारा कर्म करता है, उस स्थूलशरीरको यहीं छोड़कर परलोकमें कर्मोंसे ही बने हुए दूसरी देहसे उनका फल भोगता है । किन्तु यह बात कैसे हो सकती है? ' ( क्योंकि उन कर्मोंका कर्ता स्थूलशरीर तो यहीं नष्ट हो जाता है । ) इसके सिवा जो - जो कर्म यहाँ किये जाते हैं, वे तो दूसरे ही क्षणमें अदृश्य हो जाते हैं; वे परलोकमें फल देनेके लिये किस प्रकार पुनः प्रकट हो सकते हैं? ॥५८-५९ ॥ श्रीनारदजीने कहा - राजन्! ( स्थूल शरीर तो लिंगशरीरके अधीन है, अतः कर्मोंका उत्तरदायित्व उसीपर है ) जिस मनः प्रधान लिंगशरीरकी सहायता से मनुष्य कर्म करता है, वह तो मरनेके बाद भी उसके साथ रहता ही है; अतः वह परलोकमें अपरोक्षरूपसे स्वयं उसीके द्वारा उनका फल भोगता है ॥ ६० ॥

स्वप्नावस्थामें मनुष्य इस जीवित शरीरका अभिमान तो छोड़ देता है, किन्तु इसीके समान अथवा इससे भिन्न प्रकारके पशु - पक्षी आदि शरीरसे वह मनमें संस्काररूपसे स्थित कर्मोंका फल भोगता रहता है ॥६१ ॥

ममैते मनसा यद्यदसावहमिति ब्रुवन् ।

गृह्णीयात्तत्पुमान् राद्धं कर्म येन पुनर्भवः ॥ ६२

यथानुमीयते चित्तमुभयैरिन्द्रियेहितैः ।

एवं प्राग्देहजं कर्म लक्ष्यते चित्तवृत्तिभिः ॥६३

पृष्ठ 915

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नानुभूतं क्व चानेन देहेनादृष्टमश्रुतम् ।

कदाचिदुपलभ्येत यद्रूपं यादृगात्मनि ॥ ६४

तेनास्य तादृशं राजँल्लिंगिनो देहसम्भवम् ।

श्रद्धत्स्वाननुभूतोऽर्थो न मनः स्प्रष्टुमर्हति ॥६५

मन एव मनुष्यस्य पूर्वरूपाणि शंसति ।

भविष्यतश्च भद्रं ते तथैव न भविष्यतः ॥६६

अदृष्टमश्रुतं चात्र क्वचिन्मनसि दृश्यते ।

यथा तथानुमन्तव्यं देशकालक्रियाश्रयम् ' ॥६७

सर्वे क्रमानुरोधेन मनसीन्द्रियगोचराः ।

आयान्ति वर्गशोर यान्ति सर्वे समनसो जनाः ॥६८

इस मनके द्वारा जीव जिन स्त्री- पुत्रादिको ' ये मेरे हैं ' और देहादिको ' यह मैं हूँ ' ऐसा कहकर मानता है, उनके किये हुए पाप - पुण्यादिरूप कर्मोंको भी यह अपने ऊपर ले लेता है और उनके कारण इसे व्यर्थ ही फिर जन्म लेना पड़ता है ॥ ६२ ॥ जिस प्रकार ज्ञानेन्द्रिय और

कर्मेन्द्रिय दोनोंकी चेष्टाओंसे उनके प्रेरक चित्तका अनुमान किया जाता है, उसी प्रकार चित्तकी भिन्न - भिन्न प्रकारकी वृत्तियोंसे पूर्वजन्मके कर्मोंका भी अनुमान होता है ( अतः कर्म अदृष्टरूपसे फल देनेके लिये कालान्तरमें मौजूद रहते हैं ) ॥ ६३ ॥ कभी - कभी देखा जाता है

कि जिस वस्तुका इस शरीरसे कभी अनुभव नहीं किया - जिसे न कभी देखा, न सुना ही-उसका स्वप्नमें, वह जैसी होती है, वैसा ही अनुभव हो जाता है ॥ ६४ ॥ राजन्! तुम निश्चय

मानो कि लिंगदेहके अभिमानी जीवको उसका अनुभव पूर्वजन्ममें हो चुका है; क्योंकि जो वस्तु पहले अनुभव की हुई नहीं होती, उसकी मनमें वासना भी नहीं हो सकती ॥६५ ॥

— राजन्! तुम्हारा कल्याण हो । मन ही मनुष्यके पूर्वरूपोंको तथा भावी शरीरादिको भी बता देता है और जिनका भावी जन्म होनेवाला नहीं होता, उन तत्त्व - वेत्ताओंकी विदेहमुक्तिका पता भी उनके मनसे ही लग जाता है ॥ ६६ ॥ कभी - कभी स्वप्नमें देश, काल

अथवा क्रियासम्बन्धी ऐसी बातें भी देखी जाती हैं, जो पहले कभी देखी या सुनी नहीं गयीं ( जैसे पर्वतकी चोटीपर समुद्र, दिनमें तारे अथवा अपना सिर कटा दिखायी देना, इत्यादि ) । इनके दीखनेमें निद्रादोषको ही कारण मानना चाहिये ॥ ६७ ॥ मनके सामने इन्द्रियोंसे अनुभव

होनेयोग्य पदार्थ ही भोगरूपमें बार - बार आते हैं और भोग समाप्त होनेपर चले जाते हैं; ऐसा कोई पदार्थ नहीं आता, जिसका इन्द्रियोंसे अनुभव ही न हो सके । इसका कारण यही है कि सब जीव मनसहित हैं ॥६८ ॥

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सत्त्वैकनिष्ठे मनसि भगवत्पार्श्ववर्तिनि ।

तमश्चन्द्रमसीवेदमुपरज्यावभासते ॥ ६ ९

नाहं ममेति भावोऽयं पुरुषे व्यवधीयते ।

यावद् बुद्धिमनोऽक्षार्थगुणव्यूहो ह्यनादिमान् ॥ ७०

सुप्तिमूर्च्छापतापेषु प्राणायनविघाततः ।

नेहतेऽहमिति ज्ञानं मृत्युप्रज्वारयोरपि ॥७१

गर्भे बाल्येऽप्यपौष्कल्यादेकादशविधं तदा २ ।

लिंगं न दृश्यते यूनः कुह्वां चन्द्रमसो यथा ॥७२

अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते ।

ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा ॥७३

एवं पंचविधं लिंगं त्रिवृत् षोडशविस्तृतम् ।

एष चेतनया युक्तो जीव इत्यभिधीयते ॥७४

अनेन पुरुषो देहानुपादत्तेः विमुंचति ।

हर्षं शोकं भयं दुःखं सुखं चानेन विन्दति ॥७५

साधारणतया तो सब पदार्थोंका क्रमशः ही भान होता है; किन्तु यदि किसी समय भगवच्चिन्तनमें लगा हुआ मन विशुद्ध सत्त्वमें स्थित हो जाय, तो उसमें भगवान्का संसर्ग होनेसे एक साथ समस्त विश्वका भी भान हो सकता है - जैसे राहु दृष्टिका विषय न होनेपर भी प्रकाशात्मक चन्द्रमाके संसर्गसे दीखने लगता है ॥६९ ॥ राजन्! जबतक गुणोंका

परिणाम एवं बुद्धि, मन, इन्द्रिय और शब्दादि विषयोंका संघात यह अनादि लिंगदेह बना हुआ है, तबतक जीवके अंदर स्थूलदेहके प्रति ' मैं मेरा ' इस भावका अभाव नहीं हो सकता ॥७० ॥ सुषुप्ति, मूर्च्छा, अत्यन्त दुःख तथा मृत्यु और तीव्र ज्वरादिके समय भी

इन्द्रियोंकी व्याकुलताके कारण ' मैं ' और ' मेरेपन ' की स्पष्ट प्रतीति नहीं होती; किन्तु उस समय भी उनका अभिमान तो बना ही रहता है ॥७१ ॥ जिस प्रकार अमावास्याकी रात्रिमें

चन्द्रमा रहते हुए भी दिखायी नहीं देता, उसी प्रकार युवावस्थामें स्पष्ट प्रतीत होनेवाला यह एकादश इन्द्रियविशिष्ट लिंगशरीर गर्भावस्था और बाल्यकालमें रहते हुए भी इन्द्रियोंका पूर्ण विकास न होनेके कारण प्रतीत नहीं होता ॥७२ ॥ जिस प्रकार स्वप्नमें किसी वस्तुका

अस्तित्व न होनेपर भी जागे बिना स्वप्नजनित अनर्थकी निवृत्ति नहीं होती – उसी प्रकार सांसारिक वस्तुएँ यद्यपि असत् हैं, तो भी अविद्यावश जीव उनका चिन्तन करता रहता है;

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इसलिये उसका जन्म - मरणरूप संसारसे छुटकारा नहीं हो पाता ॥७३ ॥

इस प्रकार पंचतन्मात्राओंसे बना हुआ तथा सोलह तत्त्वोंके रूपमें विकसित यह त्रिगुणमय संघात ही लिंगशरीर है । यही चेतनाशक्तिसे युक्त होकर जीव कहा जाता है ॥७४ ॥

इसीके द्वारा पुरुष भिन्न - भिन्न देहोंको ग्रहण करता और त्यागता है तथा इसीसे उसे हर्ष, शोक, भय, दुःख और सुख आदिका अनुभव होता है ॥७५ ॥

यथा तृणजलूकेयं नापयात्यपयाति च ।

न त्यजेन्म्रियमाणोऽपि प्राग्देहाभिमतिं जनः ॥७६

यावदन्यं न विन्देत व्यवधानेन कर्मणाम् ।

मन एव मनुष्येन्द्र भूतानां भवभावनम् ॥७७

यदाक्षैश्चरितान् ध्यायन् कर्माण्याचिनुतेऽसकृत् ।

सति कर्मण्यविद्यायां बन्धः कर्मण्यनात्मनः ॥७८

अतस्तदपवादार्थं भज सर्वात्मना हरिम् ।

पश्यंस्तदात्मकं विश्वं स्थित्युत्पत्त्यप्यया यतः ॥७९

मैत्रेय उवाच

भागवतमुख्यो भगवान्नारदो हंसयोर्गतिम् ।

प्रदर्श्य ह्यमुमामन्त्र्य े सिद्धलोकं ततोऽगमत् ॥८०

प्राचीनबर्ही राजर्षिः प्रजासर्गाभिरक्षणे ।

आदिश्य पुत्रानगमत्तपसे कपिलाश्रमम् ॥ ८१

तत्रैकाग्रमना वीरो गोविन्दचरणाम्बुजम् ।

विमुक्तसंगोऽनुभजन् भक्त्या तत्साम्यतामगात् ॥८२

एतदध्यात्मपारोक्ष्यं गीतं देवर्षिणानघ ।

यः श्रावयेद्यः शृणुयात्स लिंगेन विमुच्यते ॥८३

एतन्मुकुन्दयशसा भुवनं पुनानं देवर्षिवर्यमुखनिःसृतमात्मशौचम् । यः कीर्त्यमानमधिगच्छति पारमेष्ठ्यं

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नास्मिन् भवे भ्रमति मुक्तसमस्तबन्धः ॥८४ जिस प्रकार जोंक, जबतक दूसरे तृणको नहीं पकड़ लेती, तबतक पहलेको नहीं छोड़ती — उसी प्रकार जीव मरणकाल उपस्थित होनेपर भी जबतक देहारम्भक कर्मोंकी समाप्ति होनेपर दूसरा शरीर प्राप्त नहीं कर लेता, तबतक पहले शरीरके अभिमानको नहीं छोड़ता । राजन्! यह मनः प्रधान लिंगशरीर ही जीवके जन्मादिका कारण है ॥७६-७७ ॥ जीव जब इन्द्रियजनित भोगोंका चिन्तन करते हुए बार - बार उन्हींके लिये कर्म करता है, तब उन कर्मोंके होते रहनेसे अविद्यावश वह देहादिके कर्मोंमें बँध जाता है ॥७८ ॥ अतएव

उस कर्मबन्धनसे छुटकारा पानेके लिये सम्पूर्ण विश्वको भगवद्रूप देखते हुए सब प्रकार श्रीहरिका भजन करो । उन्हींसे इस विश्वकी उत्पत्ति और स्थिति होती है तथा उन्हींमें लय होता है ॥७९ ॥

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुरजी! भक्तश्रेष्ठ श्रीनारदजीने राजा प्राचीनबर्हिको जीव और ईश्वरके स्वरूपका दिग्दर्शन कराया । फिर वे उनसे विदा लेकर सिद्धलोकको चले गये || ८० || तब राजर्षि प्राचीनबर्हि भी प्रजापालनका भार अपने पुत्रोंको सौंपकर तपस्या करनेके लिये कपिलाश्रमको चले गये ॥ ८१ ॥ वहाँ उन वीरवरने समस्त विषयोंकी आसक्ति छोड़ एकाग्र

मनसे भक्तिपूर्वक श्रीहरिके चरणकमलोंका चिन्तन करते हुए सारूप्यपद प्राप्त किया ॥८२ ॥

निष्पाप विदुरजी! देवर्षि नारदके परोक्षरूपसे कहे हुए इस आत्मज्ञानको जो पुरुष सुनेगा या सुनायेगा, वह शीघ्र ही लिंगदेहके बन्धनसे छूट जायगा ॥ ८३ ॥ देवर्षि नारदके

मुखसे निकला हुआ यह आत्मज्ञान भगवान् मुकुन्दके यशसे सम्बद्ध होनेके कारण त्रिलोकीको पवित्र करनेवाला, अन्तःकरणका शोधक तथा परमात्मपदको प्रकाशित करनेवाला है । जो पुरुष इसकी कथा सुनेगा, वह समस्त बन्धनोंसे मुक्त हो जायगा और फिर उसे इस संसार - चक्रमें नहीं भटकना पड़ेगा ॥ ८४ ॥

अध्यात्मपारोक्ष्यमिदं मयाधिगतमद्भुतम् ।

एवं स्त्रियाऽऽश्रमः पुंसश्छिन्नोऽमुत्र च संशयः ॥८५

विदुरजी! गृहस्थाश्रमी पुरंजनके रूपकसे परोक्षरूपमें कहा हुआ यह अद्भुत आत्मज्ञान मैंने गुरुजीकी कृपासे प्राप्त किया था । इसका तात्पर्य समझ लेनेसे बुद्धियुक्त जीवका देहाभिमान निवृत्त हो जाता है तथा उसका ' परलोकमें जीव किस प्रकार कर्मोंका फल भोगता है ' यह संशय भी मिट जाता है ॥ ८५ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे विदुरमैत्रेयसंवादे प्राचीनबर्हिर्नारदसंवादो * नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥२९ ॥

१. प्रा ० पा ० – मिहोदिते । २. प्रा ० पा०- । ० - विचक्षे १. प्रा ० पा ० — च यथा समभिजायते । २. प्रा ० पा ० — ल्लोकान् प्राप्नोति । ३. प्रा ० पा०—

पृष्ठ 919

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कर्तृगुणं । १. प्रा ० पा ० – रात्रादीन्कालविशेषान्विगणय्य । २. प्रा ० पा०— १. प्रा ० पा ० — बलाश्रयम् । २. प्रा ० पा ० - बहुशो । -पृष्ठतः परोक्षमनु । १. प्रा ० पा ० – वेह उप ० । २. प्रा ० पा ० – तथा । ३. प्रा ० पा०— -देहमुपादत्ते । १. प्रा ० पा ० — तदपबाधार्थं । २. प्रा ० पा ० — नृपमा ० । * प्रा ० पा ० — नारदप्राचीन बर्हिःसंवादेऽध्यात्मपारोक्षं नाम ।

पृष्ठ 920

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अथ त्रिंशोऽध्यायः प्रचेताओंको श्रीविष्णुभगवान्का वरदान विदुर उवाच

ये त्वयाभिहिता ब्रह्मन् सुताः प्राचीनबर्हिषः ।

ते रुद्रगीतेन हरिं सिद्धिमापुः प्रतोष्य काम् ॥१

किं बार्हस्पत्येह परत्र वाथ कैवल्यनाथप्रियपार्श्ववर्तिनः । आसाद्य देवं गिरिशं यदृच्छया प्रापुः परं नूनमथ प्रचेतसः ॥२ मैत्रेय उवाच

प्रचेतसोऽन्तरुदधौ पितुरादेशकारिणः ।

जपयज्ञेन तपसा पुरंजनमतोषयन् ॥ ३

दशवर्षसहस्रान्ते पुरुषस्तु सनातनः ।

तेषामाविरभूत्कृच्छ्रं शान्तेन शमयन् रुचा ॥४

सुपर्णस्कन्धमारूढो मेरुशृंगमिवाम्बुदः ।

पीतवासा मणिग्रीवः कुर्वन् वितिमिरा दिशः ॥ ५

विदुरजीने पूछा- ब्रह्मन्! आपने राजा प्राचीनबर्हिके जिन पुत्रोंका वर्णन किया था, उन्होंने रुद्रगीतके द्वारा श्रीहरिकी स्तुति करके क्या सिद्धि प्राप्त की? ॥१ ॥ बार्हस्पत्य!

मोक्षाधिपति श्रीनारायणके अत्यन्त प्रिय भगवान् शंकरका अकस्मात् सान्निध्य प्राप्त करके प्रचेताओंने मुक्ति तो प्राप्त की ही होगी; इससे पहले इस लोकमें अथवा परलोकमें भी उन्होंने क्या पाया — वह बतलानेकी कृपा करें ॥२ ॥

श्रीमैत्रेयजीने कहा – विदुरजी! पिताके आज्ञाकारी प्रचेताओंने समुद्रके अंदर खड़े रहकर रुद्रगीतके जपरूपी यज्ञ और तपस्याके द्वारा समस्त शरीरोंके उत्पादक भगवान् श्रीहरिको प्रसन्न कर लिया ॥ ३ ॥ तपस्या करते - करते दस हजार वर्ष बीत जानेपर पुराणपुरुष

श्रीनारायण अपनी मनोहर कान्तिद्वारा उनके तपस्याजनित क्लेशको शान्त करते हुए सौम्य विग्रहसे उनके सामने प्रकट हुए ॥४ ॥ गरुड़जीके कंधेपर बैठे हुए श्रीभगवान् ऐसे जान पड़ते