श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 1401–1410

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1401–1410

पृष्ठ 1401

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श्रीकृष्ण कृष्णसख वृष्ण्यृषभावनिधु- ग्राजन्यवंशदहनानपवर्गवीर्य ।

गोविन्द गोपवनिताव्रजभृत्यगीत- तीर्थश्रवः श्रवणमंगल पाहि भृत्यान् ॥२५

य इदं कल्य उत्थाय महापुरुषलक्षणम् ।

तच्चित्तः प्रयतो जप्त्वा ब्रह्म वेद गुहाशयम् ॥२६

शौनक उवाच

शुको यदाह भगवान् विष्णुराताय शृण्वते ।

सौरो गणो मासि मासि नाना वसति सप्तकः ॥२७

तेषां नामानि कर्माणि संयुक्तानामधीश्वरैः ।

ब्रूहि नः श्रद्दधानानां व्यूहं सूर्यात्मनो हरेः ॥ २८

सूत उवाच

अनाद्यविद्यया विष्णोरात्मनः सर्वदेहिनाम् ।

निर्मितो लोकतन्त्रोऽयं लोकेषु परिवर्तते ॥२९

शौनकजी! वही सर्वस्वरूप भगवान् वेदोंके मूल कारण हैं, वे स्वयंप्रकाश एवं अपनी महिमासे परिपूर्ण हैं । वे अपनी मायासे ब्रह्मा आदि रूपों एवं नामोंसे इस विश्वकी सृष्टि, स्थिति और संहार सम्पन्न करते हैं । इन सब कर्मों और नामोंसे उनका ज्ञान कभी आवृत नहीं होता । यद्यपि शास्त्रोंमें भिन्नके समान उनका वर्णन हुआ है अवश्य, परन्तु वे अपने भक्तोंको आत्मस्वरूपसे ही प्राप्त होते हैं ॥२४ ॥ सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण! आप अर्जुनके सखा

हैं । आपने यदुवंशशिरोमणिके रूपमें अवतार ग्रहण करके पृथ्वीके द्रोही भूपालोंको भस्म कर दिया है । आपका पराक्रम सदा एकरस रहता है । व्रजकी गोपबालाएँ और आपके नारदादि प्रेमी निरन्तर आपके पवित्र यशका गान करते रहते हैं । गोविन्द! आपके नाम, गुण और लीलादिका श्रवण करनेसे ही जीवका मंगल हो जाता है । हम सब आपके सेवक हैं । आप कृपा करके हमारी रक्षा कीजिये ॥२५ ॥

पुरुषोत्तमभगवान्के चिह्नभूत अंग, उपांग और आयुध आदिके इस वर्णनका जो मनुष्य भगवान्में ही चित्त लगाकर पवित्र होकर प्रातःकाल पाठ करेगा, उसे सबके हृदयमें रहनेवाले ब्रह्मस्वरूप परमात्माका ज्ञान हो जायगा ॥२६ ॥

शौनकजीने कहा— सूतजी! भगवान् श्रीशुकदेवजीने श्रीमद्भागवत कथा सुनाते समय राजर्षि परीक्षित्से ( पंचम स्कन्धमें) कहा था कि ऋषि, गन्धर्व, नाग, अप्सरा, यक्ष, राक्षस और देवताओंका एक सौरगण होता है और ये सातों प्रत्येक महीनेमें बदलते रहते हैं । ये बारह गण अपने स्वामी द्वादश आदित्योंके साथ रहकर क्या काम करते हैं और उनके अन्तर्गत

पृष्ठ 1402

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व्यक्तियोंके नाम क्या हैं? सूर्यके रूपमें भी स्वयं भगवान् ही हैं; इसलिये उनके विभागको हम बड़ी श्रद्धाके साथ सुनना चाहते हैं, आप कृपा करके कहिये ॥२७-२८ ॥ सूतजीने कहा — समस्त प्राणियोंके आत्मा भगवान् विष्णु ही हैं । अनादि अविद्यासे अर्थात् उनके वास्तविक स्वरूपके अज्ञानसे ही समस्त लोकोंके व्यवहार- प्रवर्तक प्राकृत

सूर्यमण्डलका निर्माण हुआ है । वही लोकोंमें भ्रमण किया करता है ॥ २ ९ ॥

एक एव हि लोकानां सूर्य आत्माऽऽदिकृद्धरिः ।

सर्ववेदक्रियामूलमृषिभिर्बहुधोदितः ॥३०

कालो देशः क्रिया कर्ता करणं कार्यमागमः ।

द्रव्यं फलमिति ब्रह्मन् नवधोक्तोऽजया हरिः ॥३१

मध्वादिषु द्वादशसु भगवान् कालरूपधृक् ।

लोकतन्त्राय चरति पृथग्द्वादशभिर्गणैः ॥३२

धाता कृतस्थली हेतिर्वासुकी रथकृन्मुने ।

पुलस्त्यस्तुम्बुरुरिति मधुमासं नयन्त्यमी ॥ ३३

अर्यमा पुलहोऽथौजाः प्रहेतिः पुंजिकस्थली ।

नारदः कच्छनीरश्च नयन्त्येते स्म माधवम् ॥३४

मित्रोऽत्रिः पौरुषेयोऽथ तक्षको मेनका हहाः ।

रथस्वन इति ह्येते शुक्रमासं नयन्त्यमी ॥३५

वसिष्ठो वरुणो रम्भा सहजन्यस्तथा हुहूः ।

शुक्रश्चित्रस्वनश्चैव शुचिमासं नयन्त्यमी ॥ ३६

इन्द्रो विश्वावसुः श्रोता एलापत्रस्तथांगिराः ।

प्रम्लोचा राक्षसो वर्यो नभोमासं नयन्त्यमी ॥३७

विवस्वानुग्रसेनश्च व्याघ्र आसारणो भृगुः ।

अनुम्लोचा शंखपालो नभस्याख्यं नयन्त्यमी ॥३८

पूषा धनंजयो वातः सुषेणः सुरुचिस्तथा ।

घृताची गौतमश्चेति तपोमासं नयन्त्यमी ॥३९

पृष्ठ 1403

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असलमें समस्त लोकोंके आत्मा एवं आदिकर्ता एकमात्र श्रीहरि ही अन्तर्यामीरूपसे सूर्य बने हुए हैं । वे यद्यपि एक ही हैं, तथापि ऋषियोंने उनका बहुत रूपोंमें वर्णन किया है, वे ही समस्त वैदिक क्रियाओंके मूल हैं ॥ ३० ॥ शौनकजी! एक भगवान् ही मायाके द्वारा काल,

देश, यज्ञादि क्रिया, कर्ता, सुवा आदि करण, यागादि कर्म, वेदमन्त्र, शाकल्य आदि द्रव्य और फलरूपसे नौ प्रकारके कहे जाते हैं || ३१ || कालरूपधारी भगवान् सूर्य लोगोंका व्यवहार ठीक - ठीक चलानेके लिये चैत्रादि बारह महीनोंमें अपने भिन्न- भिन्न बारह गणोंके साथ चक्कर लगाया करते हैं ॥३२ ॥

शौनकजी! धाता नामक सूर्य, कृतस्थली अप्सरा, हेति राक्षस, वासुकि सर्प, रथकृत् यक्ष, पुलस्त्य ऋषि और तुम्बुरु गन्धर्व – ये चैत्र मासमें अपना- अपना कार्य सम्पन्न करते हैं ॥३३ ॥

अर्यमा सूर्य, पुलह ऋषि, अथौजा यक्ष, प्रहेति राक्षस, पुंजिकस्थली अप्सरा, नारद गन्धर्व और कच्छनीर सर्प — ये वैशाख मासके कार्य- निर्वाहक हैं ॥ ३४ ॥ मित्र सूर्य, अत्रि ऋषि, पौरुषेय

राक्षस, तक्षक सर्प, मेनका अप्सरा, हाहा गन्धर्व और रथस्वन यक्ष -ये ज्येष्ठ मासके कार्यनिर्वाहक हैं ॥३५ ॥ आषाढ़में वरुण नामक सूर्यके साथ वसिष्ठ ऋषि, रम्भा अप्सरा,

सहजन्य यक्ष, हूहू गन्धर्व, शुक्र नाग और चित्रस्वन राक्षस अपने- अपने कार्यका निर्वाह करते हैं ॥३६ ॥ श्रावण मास इन्द्र नामक सूर्यका कार्यकाल है । उनके साथ विश्वावसु गन्धर्व, श्रोता

यक्ष, एलापत्र नाग, अंगिरा ऋषि, प्रम्लोचा अप्सरा एवं वर्य नामक राक्षस अपने कार्यका सम्पादन करते हैं ॥३७ ॥ भाद्रपदके सूर्यका नाम है विवस्वान् । उनके साथ उग्रसेन गन्धर्व,

व्याघ्र राक्षस, आसारण यक्ष, भृगु ऋषि, अनुम्लोचा अप्सरा और शंखपाल नाग रहते हैं ॥ ३८ ॥ शौनकजी! माघ मासमें पूषा नामके सूर्य रहते हैं । उनके साथ धनंजय नाग, वात

राक्षस, सुषेण गन्धर्व, सुरुचि यक्ष, घृताची अप्सरा और गौतम ऋषि रहते हैं ॥ ३ ९ ॥ फाल्गुन मासका कार्यकाल पर्जन्य नामक सूर्यका है । उनके साथ क्रतु यक्ष, वर्चा राक्षस, भरद्वाज ऋषि, सेनजित् अप्सरा, विश्व गन्धर्व और ऐरावत सर्प रहते हैं ॥ ४० ॥ मार्गशीर्ष मासमें

सूर्यका नाम होता है अंशु। उनके साथ कश्यप ऋषि, तार्क्ष्य यक्ष, ऋतसेन गन्धर्व, उर्वशी अप्सरा, विद्युच्छत्रु राक्षस और महाशंख नाग रहते हैं ॥४१ ॥ पौष मासमें भग नामक सूर्यके

साथ स्फूर्ज राक्षस, अरिष्टनेमि गन्धर्व, ऊर्ण यक्ष, आयु ऋषि, पूर्वचित्ति अप्सरा और कर्कोटक नाग रहते हैं ॥४२ ॥ आश्विन मासमें त्वष्टा सूर्य, जमदग्नि ऋषि, कम्बल नाग, तिलोत्तमा

अप्सरा, ब्रह्मापेत राक्षस, शतजित् यक्ष और धृतराष्ट्र गन्धर्वका कार्यकाल है ॥४३ ॥ तथा

कार्तिकमें विष्णु नामक सूर्यके साथ अश्वतर नाग, रम्भा अप्सरा, सूर्यवर्चा गन्धर्व, सत्यजित् यक्ष, विश्वामित्र ऋषि और मखापेत राक्षस अपना - अपना कार्य सम्पन्न करते हैं ॥४४ ॥

क्रतुर्वर्चा भरद्वाजः पर्जन्यः सेनजित्तथा ।

विश्व ऐरावतश्चैव तपस्याख्यं नयन्त्यमी ॥४०

अथांशुः कश्यपस्तार्क्ष्य ऋतसेनस्तथोर्वशी ।

विद्युच्छत्रुर्महाशंखः सहोमासं नयन्त्यमी ॥४१

पृष्ठ 1404

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भगः स्फूर्जोऽरिष्टनेमिरूर्ण आयुश्च पंचमः ।

कर्कोटकः पूर्वचित्तिः पुष्यमासं नयन्त्यमी ॥४२

त्वष्टा ऋचीकतनयः कम्बलश्च तिलोत्तमा ।

ब्रह्मापेतोऽथ शतजिद् धृतराष्ट्र इषम्भराः ॥४३

विष्णुरश्वतरो रम्भा सूर्यवर्चाश्च सत्यजित् ।

विश्वामित्रो मखापेत ऊर्जमासं नयन्त्यमी ॥ ४४

एता भगवतो विष्णोरादित्यस्य विभूतयः ।

स्मरतां सन्ध्ययोर्नृणां हरन्त्यंहो दिने दिने ॥४५

द्वादशस्वपि मासेषु देवोऽसौ षड्भिरस्य वै ।

चरन् समन्तात्तनुते परत्रेह च सन्मतिम् ॥४६

सामर्ग्यजुर्भिस्तल्लिङ्गैर्ऋषयः संस्तुवन्त्यमुम् ।

गन्धर्वास्तं प्रगायन्ति नृत्यन्त्यप्सरसोऽग्रतः ॥४७

उन्नह्यन्ति रथं नागा ग्रामण्यो रथयोजकाः ।

चोदयन्ति रथं पृष्ठे नैर्ऋता बलशालिनः ॥४८

वालखिल्याः सहस्राणि षष्टिर्ब्रह्मर्षयोऽमलाः ।

पुरतोऽभिमुखं यान्ति स्तुवन्ति स्तुतिभिर्विभुम् ॥४९

एवं ह्यनादिनिधनो भगवान् हरिरीश्वरः ।

कल्पे कल्पे स्वमात्मानं व्यूह्य लोकानवत्यजः ॥ ५०

शौनकजी! ये सब सूर्यरूप भगवान्‌की विभूतियाँ हैं । जो लोग इनका प्रतिदिन प्रातःकाल और सायंकाल स्मरण करते हैं, उनके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ ४५ ॥ ये सूर्यदेव अपने छः

गणोंके साथ बारहों महीने सर्वत्र विचरते रहते हैं और इस लोक तथा परलोकमें विवेक-बुद्धिका विस्तार करते हैं ॥ ४६ ॥ सूर्यभगवान्के गणोंमें ऋषिलोग तो सूर्यसम्बन्धी ऋग्वेद,

यजुर्वेद और सामवेदके मन्त्रोंद्वारा उनकी स्तुति करते हैं और गंधर्व उनके सुयशका गान करते रहते हैं। अप्सराएँ आगे - आगे नृत्य करती चलती हैं ॥४७ ॥

नागगण रस्सीकी तरह उनके रथको कसे रहते हैं । यक्षगण रथका साज सजाते हैं और बलवान् राक्षस उसे पीछेसे ढकेलते हैं ॥४८ ॥ इनके सिवा वालखिल्य नामके साठ हजार

निर्मलस्वभाव ब्रह्मर्षि सूर्यकी ओर मुँह करके उनके आगे-आगे स्तुतिपाठ करते चलते

पृष्ठ 1405

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हैं ॥४९ ॥ इस प्रकार अनादि, अनन्त, अजन्मा भगवान् श्रीहरि ही कल्प- कल्पमें अपने

स्वरूपका विभाग करके लोकोंका पालन - पोषण करते - रहते हैं ॥५० ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे आदित्यव्यूहविवरणं नामैकादशोऽध्यायः ॥११ ॥

पृष्ठ 1406

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अथ द्वादशोऽध्यायः श्रीमद्भागवतकी संक्षिप्त विषय - सूची सूत उवाच

नमो धर्माय महते नमः कृष्णाय वेधसे ।

ब्राह्मणेभ्यो नमस्कृत्य धर्मान् वक्ष्ये सनातनान् ॥१

एतद् वः कथितं विप्रा विष्णोश्चरितमद्भुतम् ।

भवद्भिर्यदहं पृष्टो नराणां पुरुषोचितम् ॥२

अत्र संकीर्तितः साक्षात् सर्वपापहरो हरिः ।

नारायणो हृषीकेशो भगवान् सात्वतां पतिः ॥३

अत्र ब्रह्म परं गुह्यं जगतः प्रभवाप्ययम् ।

ज्ञानं च तदुपाख्यानं प्रोक्तं विज्ञानसंयुतम् ॥४

भक्तियोगः समाख्यातो वैराग्यं च तदाश्रयम् ।

पारीक्षितमुपाख्यानं नारदाख्यानमेव च ॥ ५

प्रायोपवेशो राजर्षेर्विप्रशापात् परीक्षितः ।

शुकस्य ब्रह्मर्षभस्य संवादश्च परीक्षितः ॥६

योगधारणयोत्क्रान्तिः संवादो नारदाजयोः ।

अवतारानुगीतं च सर्गः प्राधानिकोऽग्रतः ॥७

सूतजी कहते हैं — भगवद्भक्तिरूप महान् धर्मको नमस्कार है । विश्वविधाता भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है । अब मैं ब्राह्मणोंको नमस्कार करके श्रीमद्भागवतोक्त सनातन धर्मोंका संक्षिप्त विवरण सुनाता हूँ ॥१ ॥

शौनकादि ऋषियो! आपलोगोंने मुझसे जो प्रश्न किया था, उसके अनुसार मैंने भगवान्

विष्णुका यह अद्भुत चरित्र सुनाया । यह सभी मनुष्योंके श्रवण करनेयोग्य है ॥२ ॥

इस श्रीमद्भागवतपुराणमें सर्वपापापहारी स्वयं भगवान् श्रीहरिका ही संकीर्तन हुआ है । वे ही सबके हृदयमें विराजमान, सबकी इन्द्रियोंके स्वामी और प्रेमी भक्तोंके जीवनधन हैं ॥३ ॥

इस श्रीमद्भागवतपुराणमें परम रहस्यमय – अत्यन्त गोपनीय ब्रह्मतत्त्वका वर्णन हुआ है । उस ब्रह्ममें ही इस जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयकी प्रतीति होती है । इस पुराणमें उसी

पृष्ठ 1407

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परमतत्त्वका अनुभवात्मक ज्ञान और उसकी प्राप्तिके साधनोंका स्पष्ट निर्देश है ॥४ ॥

शौनकजी! इस महापुराणके प्रथम स्कन्धमें भक्तियोगका भलीभाँति निरूपण हुआ है और साथ ही भक्तियोगसे उत्पन्न एवं उसको स्थिर रखनेवाले वैराग्यका भी वर्णन किया गया है । परीक्षित्की कथा और व्यास- नारद - संवादके प्रसंगसे नारदचरित्र भी कहा गया है || ५ || राजर्षि परीक्षित् ब्राह्मणका शाप हो जानेपर किस प्रकार गंगातटपर अनशन- व्रत लेकर बैठ गये और ऋषिप्रवर श्रीशुकदेवजीके साथ किस प्रकार उनका संवाद प्रारम्भ हुआ, यह कथा भी प्रथम स्कन्धमें ही है ॥६ ॥

योगधारणाके द्वारा शरीरत्यागकी विधि, ब्रह्मा और नारदका संवाद, अवतारोंकी संक्षिप्त चर्चा तथा महत्तत्त्व आदिके क्रमसे प्राकृतिक सृष्टिकी उत्पत्ति आदि विषयोंका वर्णन द्वितीय स्कन्धमें हुआ है ॥७ ॥

विदुरोद्धवसंवादः क्षत्तृमैत्रेययोस्ततः ।

पुराणसंहिताप्रश्नी महापुरुषसंस्थितिः ॥८

ततः प्राकृतिकः सर्गः सप्त वैकृतिकाश्च ये ।

ततो ब्रह्माण्डसम्भूतिर्वैराजः पुरुषो यतः ॥९

कालस्य स्थूलसूक्ष्मस्य गतिः पद्मसमुद्भवः ।

भुव उद्धरणेऽम्भोधेर्हिरण्याक्षवधो यथा ॥१०

ऊर्ध्वतिर्यगवाक्सर्गो रुद्रसर्गस्तथैव च ।

अर्धनारीनरस्याथ यतः स्वायम्भुवो मनुः ॥११

शतरूपा च या स्त्रीणामाद्या प्रकृतिरुत्तमा ।

सन्तानो धर्मपत्नीनां कर्दमस्य प्रजापतेः ॥१२

अवतारो भगवतः कपिलस्य महात्मनः ।

देवहूत्याश्च संवादः कपिलेन च धीमता ॥१३

नवब्रह्मसमुत्पत्तिर्दक्षयज्ञविनाशनम् ।

ध्रुवस्य चरितं पश्चात्पृथोः प्राचीनबर्हिषः ॥१४

नारदस्य च संवादस्ततः प्रैयव्रतं द्विजाः ।

नाभेस्ततोऽनुचरितमृषभस्य भरतस्य च ॥१५

पृष्ठ 1408

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द्वीपवर्षसमुद्राणां गिरिनद्युपवर्णनम् ।

ज्योतिश्चक्रस्य संस्थानं पातालनरकस्थितिः ॥१६

दक्षजन्म प्रचेतोभ्यस्तत्पुत्रीणां च सन्ततिः ।

यतो देवासुरनरास्तिर्यङ्नगखगादयः ॥१७

त्वाष्ट्रस्य जन्म निधनं पुत्रयोश्च दितेर्द्विजाः ।

दैत्येश्वरस्य चरितं प्रह्रादस्य महात्मनः ॥१८

तीसरे स्कन्धमें पहले - पहल विदुरजी और उद्धवजीके, तदनन्तर विदुर तथा मैत्रेयजीके समागम और संवादका प्रसंग है । इसके पश्चात् पुराणसंहिताके विषयमें प्रश्न है और फिर प्रलयकालमें परमात्मा किस प्रकार स्थित रहते हैं, इसका निरूपण है ॥ ८ ॥

गुणोंके क्षोभसे प्राकृतिक सृष्टि और महत्तत्त्व आदि सात प्रकृति- विकृतियोंके द्वारा कार्य- सृष्टिका वर्णन है । इसके बाद ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति और उसमें विराट् पुरुषकी स्थितिका स्वरूप समझाया गया है ॥९ ॥

तदनन्तर स्थूल और सूक्ष्म कालका स्वरूप, लोक- पद्मकी उत्पत्ति, प्रलय-समुद्रसे पृथ्वीका उद्धार करते समय वराहभगवान्‌के द्वारा हिरण्याक्षका वध, देवता, पशु, पक्षी और मनुष्योंकी सृष्टि एवं रुद्रोंकी उत्पत्तिका प्रसंग है । इसके पश्चात् उस अर्द्धनारी- नरके स्वरूपका विवेचन है, जिससे स्वायम्भुव मनु और स्त्रियोंकी अत्यन्त उत्तम आद्या प्रकृति शतरूपाका जन्म हुआ था । कर्दम प्रजापतिका चरित्र, उनसे मुनिपत्नियोंका जन्म, महात्मा भगवान् कपिलका अवतार और फिर कपिलदेव तथा उनकी माता देवहूतिके संवादका प्रसंग आता है ॥१०-१३ ॥ चौथे स्कन्धमें मरीचि आदि नौ प्रजापतियोंकी उत्पत्ति, दक्षयज्ञका विध्वंस, राजर्षि ध्रुव एवं पृथुका चरित्र तथा प्राचीनबर्हि और नारदजीके संवादका वर्णन है । पाँचवें स्कन्धमें प्रियव्रतका उपाख्यान; नाभि, ऋषभ और भरतके चरित्र, द्वीप, वर्ष, समुद्र, पर्वत और नदियोंका वर्णन; ज्योतिश्चक्रके विस्तार एवं पाताल तथा नरकोंकी स्थितिका निरूपण हुआ है ॥१४-१६ ॥ शौनकादि ऋषियो! छठे स्कन्धमें ये विषय आये हैं- प्रचेताओंसे दक्षकी उत्पत्ति; दक्ष-पुत्रियोंकी सन्तान देवता, असुर, मनुष्य, पशु, पर्वत और पक्षियोंका जन्म - कर्म; वृत्रासुरकी उत्पत्ति और उसकी परम गति । ( अब सातवें स्कन्धके विषय बतलाये जाते हैं— ) इस स्कन्धमें मुख्यतः दैत्यराज हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्षके जन्म- कर्म एवं दैत्यशिरोमणि महात्मा प्रह्लादके उत्कृष्ट चरित्रका निरूपण है ॥१७-१८ ॥

मन्वन्तरानुकथनं गजेन्द्रस्य विमोक्षणम् ।

मन्वन्तरावताराश्च विष्णोर्हयशिरादयः ॥१९

कौर्मं धान्वन्तरं मात्स्यं वामनं च जगत्पतेः ।

पृष्ठ 1409

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क्षीरोदमथनं तद्वदमृतार्थे दिवौकसाम् ॥ २०

देवासुरमहायुद्धं राजवंशानुकीर्तनम् ।

इक्ष्वाकुजन्म तद्वंशः सुद्युम्नस्य महात्मनः ॥२१

इलोपाख्यानमत्रोक्तं तारोपाख्यानमेव च ।

सूर्यवंशानुकथनं शशादाद्या नृगादयः ॥२२

सौकन्यं चाथ शर्यातेः ककुत्स्थस्य च धीमतः ।

खट्वांगस्य च मान्धातुः सौभरेः सगरस्य च ॥२३

रामस्य कोसलेन्द्रस्य चरितं किल्बिषापहम् ।

निमेरंगपरित्यागो जनकानां च सम्भवः ॥२४

रामस्य भार्गवेन्द्रस्य निःक्षत्रकरणं भुवः ।

ऐलस्य सोमवंशस्य ययातेर्नहुषस्य च ॥ २५

दौष्यन्तेर्भरतस्यापि शन्तनोस्तत्सुतस्य च ।

ययातेर्ज्येष्ठपुत्रस्य यदोर्वंशोऽनुकीर्तितः ॥२६

यत्रावतीर्णो भगवान्कृष्णाख्यो जगदीश्वरः ।

वसुदेवगृहे जन्म ततो वृद्धिश्च गोकुले ॥२७

तस्य कर्माण्यपाराणि कीर्तितान्यसुरद्विषः ।

पूतनासुपयःपानं शकटोच्चाटनं शिशोः ॥ २८

तृणावर्तस्य निष्पेषस्तथैव बकवत्सयोः ।

धेनुकस्य सहभ्रातुः प्रलम्बस्य च संक्षयः ॥२९

आठवें स्कन्धमें मन्वन्तरोंकी कथा, गजेन्द्रमोक्ष, विभिन्न मन्वन्तरोंमें होनेवाले जगदीश्वर -भगवान् विष्णुके अवतार– कूर्म, मत्स्य, वामन, धन्वन्तरि, हयग्रीव आदि; अमृत- प्राप्तिके लिये देवताओं और दैत्योंका समुद्र मन्थन और देवासुर संग्राम आदि विषयोंका वर्णन है । नवें स्कन्धमें मुख्यतः राजवंशोंका वर्णन है । इक्ष्वाकुके जन्म- कर्म, वंशविस्तार, महात्मा सुद्युम्न, इला एवं ताराके उपाख्यान - इन सबका वर्णन किया गया है । सूर्यवंशका वृत्तान्त, शशाद और नृग आदि राजाओंका वर्णन, सुकन्याका चरित्र, शर्याति, खट्वांग, मान्धाता, सौभरि, सगर, बुद्धिमान् ककुत्स्थ और कोसलेन्द्र भगवान् रामके सर्वपापहारी चरित्रका वर्णन भी इसी स्कन्धमें है । तदनन्तर निमिका देह त्याग और जनकोंकी उत्पत्तिका वर्णन है ॥१९ -२४ ॥ भृगुवंशशिरोमणि परशुरामजीका क्षत्रियसंहार, चन्द्रवंशी नरपति पुरूरवा, ययाति, नहुष, दुष्यन्त- नन्दन भरत, शन्तनु और उनके पुत्र भीष्म आदिकी संक्षिप्त कथाएँ भी नवम स्कन्धमें ही हैं । सबके अन्तमें ययातिके बड़े लड़के यदुका वंशविस्तार कहा गया है ॥२५-२६ ॥ शौनकादि ऋषियो! इसी यदुवंशमें जगत्पति भगवान् श्रीकृष्णने अवतार ग्रहण किया था । उन्होंने अनेक असुरोंका संहार किया । उनकी लीलाएँ इतनी हैं कि कोई पार नहीं पा सकता ।

पृष्ठ 1410

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फिर भी दशम स्कन्धमें उनका कुछ कीर्तन किया गया है । वसुदेवकी पत्नी देवकीके गर्भसे उनका जन्म हुआ । गोकुलमें नन्दबाबाके घर जाकर बढ़े । पूतनाके प्राणोंको दूधके साथ पी लिया । बचपनमें ही छकड़ेको उलट दिया ॥ २७-२८ ॥ तृणावर्त, बकासुर एवं वत्सासुरको पीस डाला। सपरिवार धेनुकासुर और प्रलम्बासुरको मार डाला ॥२९ ॥

गोपानां च परित्राणं दावाग्ने परिसर्पतः ।

दमनं कालियस्याहेर्महाहेर्नन्दमोक्षणम् ॥ ३०

व्रतचर्या तु कन्यानां यत्र तुष्टोऽच्युतो व्रतैः ।

प्रसादो यज्ञपत्नीभ्यो विप्राणां चानुतापनम् ॥३१

गोवर्धनोद्धारणं च शक्रस्य सुरभेरथ ।

यज्ञाभिषेकं कृष्णस्य स्त्रीभिः क्रीडा च रात्रिषु ॥३२

शंखचूडस्य दुर्बुद्धेर्वधोऽरिष्टस्य केशिनः ।

अक्रूरागमनं पश्चात् प्रस्थानं रामकृष्णयोः ॥ ३३

व्रजस्त्रीणां विलापश्च मथुरालोकनं ततः ।

गजमुष्टिकचाणूरकंसादीनां च यो वधः ॥ ३४

मृतस्यानयनं सूनोः पुनः सान्दीपनेर्गुरोः ।

मथुरायां निवसता यदुचक्रस्य यत्प्रियम् ।

कृतमुद्धवरामाभ्यां युतेन हरिणा द्विजाः ॥ ३५

जरासन्धसमानीतसैन्यस्य बहुशो वधः ।

घातनं यवनेन्द्रस्य कुशस्थल्या निवेशनम् ॥३६

आदानं पारिजातस्य सुधर्मायाः सुरालयात् ।

रुक्मिण्या हरणं युद्धे प्रमथ्य द्विषतो हरेः ॥ ३७

दावानलसे घिरे गोपोंकी रक्षा की । कालिय नागका दमन किया । अजगरसे नन्दबाबाको छुड़ाया ॥३० ॥

इसके बाद गोपियोंने भगवानको पतिरूपसे प्राप्त करनेके लिये व्रत किया और भगवान् श्रीकृष्णने प्रसन्न होकर उन्हें अभिमत वर दिया । भगवान्ने यज्ञपत्नियोंपर कृपा की । उनके पतियों— ब्राह्मणोंको बड़ा पश्चत्ताप हुआ ॥३१ ॥