श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 321–330
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 321–330
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धरके वहाँ आया था । उसकी चोंच बड़ी तीखी थी और वह स्वयं बड़ा बलवान् था । उसने झपटकर श्रीकृष्णको निगल लिया ॥ ४८ ॥ जब बलराम आदि बालकोंने देखा कि
वह बड़ा भारी बगुला श्रीकृष्णको निगल गया, तब उनकी वही गति हुई जो प्राण निकल जानेपर इन्द्रियोंकी होती है । वे अचेत हो गये ॥४९ ॥ परीक्षित्! श्रीकृष्ण लोकपितामह
ब्रह्माके भी पिता हैं । वे लीलासे ही गोपाल- बालक बने हुए हैं । जब वे बगुलेके तालुके नीचे पहुँचे, तब वे आगके समान उसका तालु जलाने लगे । अतः उस दैत्यने श्रीकृष्णके शरीरपर बिना किसी प्रकारका घाव किये ही झटपट उन्हें उगल दिया और फिर बड़े क्रोधसे अपनी कठोर चोंचसे उनपर चोट करनेके लिये टूट पड़ा ॥ ५० ॥ कंसका सखा
बकासुर अभी भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्णपर झपट ही रहा था कि उन्होंने अपने दोनों हाथोंसे उसके दोनों ठोर पकड़ लिये और ग्वालबालोंके देखते -देखते खेल- ही - खेलमें उसे वैसे ही चीर डाला, जैसे कोई वीरण ( गाँड़र, जिसकी जड़का खस होता है ) को चीर डाले । इससे देवताओंको बड़ा आनन्द हुआ ॥ ५१ ॥ सभी देवता भगवान् श्रीकृष्णपर
नन्दनवनके बेला, चमेली आदिके फूल बरसाने लगे तथा नगारे, शंख आदि बजाकर एवं स्तोत्रोंके द्वारा उनको प्रसन्न करने लगे । यह सब देखकर सब- के - सब ग्वालबाल आश्चर्यचकित हो गये ॥ ५२ ॥ जब बलराम आदि बालकोंने देखा कि श्रीकृष्ण बगुलेके
मुँहसे निकलकर हमारे पास आ गये हैं, तब उन्हें ऐसा आनन्द हुआ, मानो प्राणोंके संचारसे इन्द्रियाँ सचेत और आनन्दित हो गयी हों । सबने भगवान्को अलग- अलग गले लगाया । इसके बाद अपने - अपने बछड़े हाँककर सब व्रजमें आये और वहाँ उन्होंने घरके लोगोंसे सारी घटना कह सुनायी ॥ ५३ ॥
तमापतन्तं स निगृह्य तुण्डयो- र्दोर्भ्यां बकं कंससखं सतां पतिः । पश्यत्सु बालेषु ददार लीलया मुदावहो वीरणवद् दिवौकसाम् ॥५१ तदा बकारि सुरलोकवासिनः
समाकिरन् नन्दनमल्लिकादिभिः ।
समीडिरे चानकशंखसंस्तवै- स्तद् वीक्ष्य गोपालसुता विसिस्मिरे ॥५२
मुक्तं बकास्यादुपलभ्य बालका रामादयः प्राणमिवैन्द्रियो गणः । स्थानागतं तं परिरभ्य निर्वृताः प्रणीय वत्सान् व्रजमेत्य तज्जगुः ॥५३ श्रुत्वा तद् विस्मिता गोपा गोप्यश्चातिप्रियादृताः ।
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प्रेत्यागतमिवौत्सुक्यादैक्षन्त तृषितेक्षणाः ॥ ५४
अहो बतास्य बालस्य बहवो मृत्यवोऽभवन् ।
अप्यासीद् विप्रियं तेषां कृतं पूर्वं यतो भयम् ॥५५
अथाप्यभिभवन्त्येनं नैव ते घोरदर्शनाः ।
जिघांसयैनमासाद्य नश्यन्त्यग्नौ पतंगवत् ॥५६
परीक्षित्! बकासुरके वधकी घटना सुनकर सब- के - सब गोपी- गोप आश्चर्यचकित हो गये । उन्हें ऐसा जान पड़ा, जैसे कन्हैया साक्षात् मृत्युके मुखसे ही लौटे हों । वे बड़ी उत्सुकता, प्रेम और आदरसे श्रीकृष्णको निहारने लगे । उनके नेत्रोंकी प्यास बढ़ती ही जाती थी, किसी प्रकार उन्हें तृप्ति न होती थी ॥ ५४ ॥ वे आपसमें कहने लगे — ‘ हाय!
हाय!! यह कितने आश्चर्यकी बात है । इस बालकको कई बार मृत्युके मुँहमें जाना पड़ा । परन्तु जिन्होंने इसका अनिष्ट करना चाहा, उन्हींका अनिष्ट हुआ । क्योंकि उन्होंने पहलेसे दूसरोंका अनिष्ट किया था ॥ ५५ ॥ यह सब होनेपर भी वे भयंकर असुर इसका
कुछ भी नहीं बिगाड़ पाते । आते हैं इसे मार डालनेकी नीयतसे, किन्तु आगपर गिरकर पतिंगोंकी तरह उलटे स्वयं स्वाहा हो जाते हैं ॥ ५६ ॥
अहो ब्रह्मविदां वाचो नासत्याः सन्ति कर्हिचित् ।
गर्गो यदाह भगवानन्वभावि तथैव तत् ॥५७
इति नन्दादयो गोपाः कृष्णरामकथां मुदा ।
कुर्वन्तो रममाणाश्च नाविन्दन् भववेदनाम् ॥५८
एवं विहारैः कौमारैः कौमारं जहतुर्व्रजे ।
निलायनैः सेतुबन्धैर्मर्कटोत्प्लवनादिभिः ॥५९
सच है, ब्रह्मवेत्ता महात्माओंके वचन कभी झूठे नहीं होते । देखो न, महात्मा गर्गाचार्यने जितनी बातें कही थीं, सब की - सब सोलहों आने ठीक उतर रही हैं ' ॥ ५७ ॥
नन्दबाबा आदि गोपगण इसी प्रकार बड़े आनन्दसे अपने श्याम और रामकी बातें किया करते । वे उनमें इतने तन्मय रहते कि उन्हें संसारके दुःख- संकटोंका कुछ पता ही न चलता ॥ ५८ ॥ इसी प्रकार श्याम और बलराम ग्वालबालोंके साथ कभी आँखमिचौनी
खेलते, तो कभी पुल बाँधते । कभी बंदरोंकी भाँति उछलते -कूदते, तो कभी और कोई विचित्र खेल करते । इस प्रकारके बालोचित खेलोंसे उन दोनोंने व्रजमें अपनी बाल्यावस्था व्यतीत की ॥५९ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे वत्सबकवधो नामैकादशोऽध्यायः ॥११ ॥
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* नन्दबाबा इसलिये हँसे कि कन्हैया कहीं यह सोचकर डर न जाय कि जब माने बाँध दिया, तब पिता कहीं आकर पीटने न लगें । माताने बाँधा और पिताने छोड़ा । भगवान् श्रीकृष्णकी लीलासे यह बात सिद्ध हुई कि उनके स्वरूपमें बन्धन और मुक्तकी कल्पना करनेवाले दूसरे ही हैं । वे स्वयं न बद्ध हैं, न मुक्त हैं ।
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अथ द्वादशोऽध्यायः अघासुरका उद्धार श्रीशुक उवाच क्वचिद् वनाशाय मनो दधद् व्रजात् प्रातः समुत्थाय वयस्यवत्सपान् । प्रबोधयञ्छृंगरवेण चारुणा विनिर्गतो वत्सपुरःसरो हरिः ॥१ तेनैव साकं पृथुकाः सहस्रशः स्निग्धाः सुशिग्वेत्रविषाणवेणवः । स्वान् स्वान् सहस्रोपरिसंख्ययान्वितान् वत्सान् पुरस्कृत्य विनिर्ययुर्मुदा ॥ २
कृष्णवत्सैरसंख्यातैर्यूथीकृत्य स्ववत्सकान् ।
चारयन्तोऽर्भलीलाभिर्विजहुस्तत्र तत्र ह ॥३
फलप्रवालस्तबकसुमनःपिच्छधातुभिः ।
काचगुंजामणिस्वर्णभूषिता अप्यभूषयन् ॥४
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! एक दिन नन्दनन्दन श्यामसुन्दर वनमें ही कलेवा करनेके विचारसे बड़े तड़के उठ गये और सिंगी बाजेकी मधुर मनोहर ध्वनिसे अपने साथी ग्वालबालोंको मनकी बात जनाते हुए उन्हें जगाया और बछड़ोंको आगे करके वे व्रज-मण्डलसे निकल पड़े ॥१ || श्रीकृष्णके साथ ही उनके प्रेमी सहस्रों ग्वालबाल सुन्दर छीके, बेंत, सिंगी और बाँसुरी लेकर तथा अपने सहस्रों बछड़ोंको आगे करके बड़ी प्रसन्नतासे अपने - अपने घरोंसे चल पड़े || २ || उन्होंने श्रीकृष्णके अगणित बछड़ोंमें अपने - अपने बछड़े मिला दिये और स्थान- स्थानपर बालोचित खेल खेलते हुए विचरने लगे ॥३ ॥ यद्यपि सब- के-सब ग्वालबाल काँच, घुँघची, मणि और सुवर्णके गहने पहने हुए थे, फिर भी उन्होंने
वृन्दावनके लाल-पीले - हरे फलोंसे, नयी- नयी कोंपलोंसे, गुच्छोंसे, रंग - बिरंगे फूलों और मोरपंखोंसे तथा गेरू आदि रंगीन धातुओंसे अपनेको सजा लिया ॥४ ॥ कोई किसीका छीका
चुरा लेता, तो कोई किसीकी बेंत या बाँसुरी । जब उन वस्तुओंके स्वामीको पता चलता, तब उन्हें लेनेवाला किसी दूसरेके पास दूर फेंक देता, दूसरा तीसरेके और तीसरा और भी दूर चौथेके पास । फिर वे हँसते हुए उन्हें लौटा देते || ५ || यदि श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण वनकी शोभा देखनेके लिये कुछ आगे बढ़ जाते, तो ' पहले मैं छुऊँगा, पहले मैं छुऊँगा' – इस प्रकार आपसमें होड़ लगाकर सब- के - सब उनकी ओर दौड़ पड़ते और उन्हें छू- छूकर आनन्दमग्न हो
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जाते ॥६ ॥ कोई बाँसुरी बजा रहा है, तो कोई सिंगी ही फूँक रहा है । कोई- कोई भौंरोंके साथ
गुनगुना रहे हैं, तो बहुत - से कोयलोंके स्वरमें स्वर मिलाकर ' कुहू कुहू ' कर रहे हैं ॥७ ॥ एक
ओर कुछ ग्वालबाल आकाशमें उड़ते हुए पक्षियोंकी छायाके साथ दौड़ लगा रहे हैं, तो दूसरी ओर कुछ हंसोंकी चालकी नकल करते हुए उनके साथ सुन्दर गति से चल रहे हैं । कोई बगुलेके पास उसीके समान आँखें मूँदकर बैठ रहे हैं, तो कोई मोरोंको नाचते देख उन्हींकी तरह नाच रहे हैं ॥८ ॥ कोई- कोई बंदरोंकी पूँछ पकड़कर खींच रहे हैं, तो दूसरे उनके साथ
इस पेड़से उस पेड़पर चढ़ रहे हैं । कोई- कोई उनके साथ मुँह बना रहे हैं, तो दूसरे उनके साथ एक डालसे दूसरी डालपर छलाँग मार रहे हैं || ९ || बहुत से ग्वालबाल तो नदीके कछारमें छपका खेल रहे हैं और उसमें फुदकते हुए मेढकोंके साथ स्वयं भी फुदक रहे हैं । कोई पानीमें अपनी परछाईं देखकर उसकी हँसी कर रहे हैं, तो दूसरे अपने शब्दकी प्रतिध्वनिको ही बुरा-भला कह रहे हैं ॥१० ॥ भगवान् श्रीकृष्ण ज्ञानी संतोंके लिये स्वयं ब्रह्मानन्दके मूर्तिमान्
अनुभव हैं । दास्यभावसे युक्त भक्तोंके लिये वे उनके आराध्यदेव, परम ऐश्वर्यशाली परमेश्वर हैं । और माया- मोहित विषयान्धोंके लिये वे केवल एक मनुष्य-बालक हैं । उन्हीं भगवान्के साथ वे महान् पुण्यात्मा ग्वालबाल तरह- तरहके खेल खेल रहे हैं ॥ ११ ॥ बहुत जन्मोंतक
श्रम और कष्ट उठाकर जिन्होंने अपनी इन्द्रियों और अन्तःकरणको वशमें कर लिया है, उन योगियोंके लिये भी भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी रज अप्राप्य है । वही भगवान् स्वयं जिन व्रजवासी ग्वालबालोंकी आँखोंके सामने रहकर सदा खेल खेलते हैं, उनके सौभाग्यकी महिमा इससे अधिक क्या कही जाय ॥१२ ॥
मुष्णन्तोऽन्योन्यशिक्यादीन् ज्ञातानाराच्च चिक्षिपुः ।
तत्रत्याश्च पुनर्दूराद्धसन्तश्च पुनर्ददुः ॥५
यदि दूरं गतः कृष्णो वनशोभेक्षणाय तम् ।
अहं पूर्वमहं पूर्वमिति संस्पृश्य रेमिरे ॥६
केचिद् वेणून् वादयन्तो ध्मान्तः शृंगाणि केचन ।
केचिद् भृङ्गैः प्रगायन्तः कूजन्तः कोकिलैः परे ॥७
विच्छायाभिः प्रधावन्तो गच्छन्तः साधुहंसकैः ।
बकैरुपविशन्तश्च नृत्यन्तश्च कलापिभिः ॥८
विकर्षन्तः कीशबालानारोहन्तश्च तैर्द्रुमान् ।
विकुर्वन्तश्च तैः साकं प्लवन्तश्च पलाशिषु ॥ ९
साकं भेकैर्विलंघन्तः सरित्प्रस्रवसम्प्लुताः ।
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विहसन्तः प्रतिच्छायाः शपन्तश्च प्रतिस्वनान् ॥१० इत्थं सतां ब्रह्मसुखानुभूत्या दास्यं गतानां परदैवतेन । मायाश्रितानां नरदारकेण साकं विजहुः कृतपुण्यपुंजाः ॥११ यत्पादपांसुर्बहुजन्मकृच्छ्रतो धृतात्मभिर्योगिभिरप्यलभ्यः । स एव यद्दृग्विषयः स्वयं स्थितः किं वर्ण्यते दिष्टमतो व्रजौकसाम् ॥१२ अथाघनामाभ्यपतन्महासुर- तेषां सुखक्रीडनवीक्षणाक्षमः । नित्यं यदन्तर्निजजीवितेप्सुभिः पीतामृतैरप्यमरैः प्रतीक्ष्यते ॥ १३ दृष्ट्वार्थकान् कृष्णमुखानघासुरः
कंसानुशिष्टः स बकीबकानुजः ।
अयं तु मे सोदरनाशकृत्तयो- र्द्वयोर्ममैनं सबलं हनिष्ये ॥१४
एते यदा मत्सुहृदोस्तिलापः कृतास्तदा नष्टसमा व्रजौकसः । प्राणे गते वर्ष्मसु का नु चिन्ता प्रजासवः प्राणभृतो हि ये ते ॥१५ इति व्यवस्याजगरं बृहद् वपुः स योजनायाममहाद्रिपीवरम् । धृत्वाद्भुतं व्यात्तगुहाननं तदा पथि व्यशेत ग्रसनाशया खलः ॥१६ धराधरोष्ठो जलदोत्तरोष्ठो दर्याननान्तो गिरिशृंगदंष्ट्रः । ध्वान्तान्तरास्यो वितताध्वजिह्वः
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परुषानिलश्वासदवेक्षणोष्णः ॥१७ परीक्षित्! इसी समय अघासुर नामका महान् दैत्य आ धमका । उससे श्रीकृष्ण और ग्वालबालोंकी सुखमयी क्रीडा देखी न गयी । उसके हृदयमें जलन होने लगी । वह इतना भयंकर था कि अमृतपान करके अमर हुए देवता भी उससे अपने जीवनकी रक्षा करनेके लिये चिन्तित रहा करते थे और इस बातकी बाट देखते रहते थे कि किसी प्रकारसे इसकी मृत्युका अवसर आ जाय ॥१३ ॥ अघासुर पूतना और बकासुरका छोटा भाई तथा कंसका
भेजा हुआ था । वह श्रीकृष्ण, श्रीदामा आदि ग्वालबालोंको देखकर मन -ही- मन सोचने लगा कि ' यही मेरे सगे भाई और बहिनको मारनेवाला है । इसलिये आज मैं इन ग्वालबालाकें साथ इसे मार डालूँगा ॥१४ ॥ जब ये सब मरकर मेरे उन दोनों भाई-बहिनोंके मृततर्पणकी
तिलांजलि बन जायँगे, तब व्रजवासी अपने - आप मरे- जैसे हो जायँगे । सन्तान ही प्राणियोंके प्राण हैं । जब प्राण ही न रहेंगे, तब शरीर कैसे रहेगा? इसकी मृत्युसे व्रजवासी अपने - आप मर जायँगे ' ॥१५ ॥ ऐसा निश्चय करके वह दुष्ट दैत्य अजगरका रूप धारण कर मार्गमें लेट गया ।
उसका वह अजगर- शरीर एक योजन लंबे बड़े पर्वतके समान विशाल एवं मोटा था । वह बहुत ही अद्भुत था । उसकी नीयत सब बालकोंको निगल जानेकी थी, इसलिये उसने गुफाके समान अपना बहुत बड़ा मुँह फाड़ रखा था ॥ १६ ॥ उसका नीचेका होठ पृथ्वीसे और
ऊपरका होठ बादलोंसे लग रहा था । उसके जबड़े कन्दराओंके समान थे और दाढ़ें पर्वतके शिखर- सी जान पड़ती थीं । मुँहके भीतर घोर अन्धकार था । जीभ एक चौड़ी लाल सड़क- सी दीखती थी । साँस आँधीके समान थी और आँखें दावानलके समान दहक रही थीं ॥१७ ॥
दृष्ट्वा तं तादृशं सर्वे मत्वा वृन्दावनश्रियम् ।
व्यात्ताजगरतुण्डेन ह्युत्प्रेक्षन्ते स्म लीलया ॥१८
अहो मित्राणि गदत सत्त्वकूटं पुरः स्थितम् ।
अस्मत्संग्रसनव्यात्तव्यालतुण्डायते न वा ॥१९
सत्यमर्ककरारक्तमुत्तराहनुवद् घनम् ।
अधराहनुवद् रोधस्तत्प्रतिच्छाययारुणम् ॥२०
प्रतिस्पर्धेते सृक्किभ्यां सव्यासव्ये नगोदरे ।
तुंगशृंगालयोऽप्येतास्तद्दंष्ट्राभिश्च पश्यत ॥२१
आस्तृतायाममार्गोऽयं रसनां प्रतिगर्जति ।
एषामन्तर्गतं ध्वान्तमेतदप्यन्तराननम् ॥२२
दावोष्णखरवातोऽयं श्वासवद् भाति पश्यत ।
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तद्दग्धसत्त्वदुर्गन्धोऽप्यन्तरामिषगन्धवत् ॥ २३ अस्मान् किमत्र ग्रसिता निविष्टा- नयं तथा चेद् बकवद् विनङ्क्ष्यति । क्षणादनेनेति बकार्युशन्मुखं वीक्ष्योद्धसन्तः करताडनैर्ययुः ॥२४ अघासुरका ऐसा रूप देखकर बालकोंने समझा कि यह भी वृन्दावनकी कोई शोभा है । वे कौतुकवश खेल- ही -खेलमें उत्प्रेक्षा करने लगे कि यह मानो अजगरका खुला हुआ मुँह है ॥१८ ॥ कोई कहता- ' मित्रो! भला बतलाओ तो, यह जो हमारे सामने कोई जीव - सा बैठा
है, यह हमें निगलनेके लिये खुले हुए किसी अजगरके मुँह- जैसा नहीं है? ' ॥१९ ॥ दूसरेने
कहा —‘ सचमुच सूर्यकी किरणें पड़नेसे ये जो बादल लाल- लाल हो गये हैं, वे ऐसे मालूम होते हैं मानो ठीक-ठीक इसका ऊपरी होठ ही हो । और उन्हीं बादलोंकी परछाईंसे यह जो नीचेकी भूमि कुछ लाल- लाल दीख रही है, वही इसका नीचेका होठ जान पड़ता है ' ॥२० ॥ तीसरे
ग्वालबालने कहा — ‘ हाँ, सच तो है । देखो तो सही, क्या ये दायीं और बायीं ओरकी गिरि-कन्दराएँ अजगरके जबड़ोंकी होड़ नहीं करतीं? और ये ऊँची- ऊँची शिखर- पंक्तियाँ तो साफ-साफ इसकी दाढ़ें मालूम पड़ती हैं ' || २१ || चौथेने कहा — ' अरे भाई! यह लम्बी - चौड़ी सड़क तो ठीक अजगरकी जीभ सरीखी मालूम पड़ती है और इन गिरिशृंगोंके बीचका अन्धकार तो उसके मुँहके भीतरी भागको भी मात करता है' || २२ || किसी दूसरे ग्वालबालने कहा - ' देखो, देखो! ऐसा जान पड़ता है कि कहीं इधर जंगलमें आग लगी है । इसीसे यह गरम और तीखी हवा आ रही है । परन्तु अजगरकी साँसके साथ इसका क्या ही मेल बैठ गया है । और उसी आगसे जले हुए प्राणियोंकी दुर्गन्ध ऐसी जान पड़ती है, मानो अजगरके पेटमें मरे हुए जीवोंके मांसकी ही दुर्गन्ध हो ' || २३ || तब उन्हींमेंसे एकने कहा — ' यदि हमलोग इसके मुँहमें घुस जायँ, तो क्या यह हमें निगल जायगा? अजी! यह क्या निगलेगा । कहीं ऐसा करनेकी ढिठाई की तो एक क्षणमें यह भी बकासुरके समान नष्ट हो जायगा । हमारा यह कन्हैया इसको छोड़ेगा थोड़े ही । ' इस प्रकार कहते हुए वे ग्वालबाल बकासुरको मारनेवाले श्रीकृष्णका सुन्दर मुख देखते और ताली पीट- पीटकर हँसते हुए अघासुरके मुँहमें घुस गये ॥२४ ॥ उन अनजान बच्चोंकी आपसमें की हुई भ्रमपूर्ण बातें सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने
सोचा कि ‘ अरे, इन्हें तो सच्चा सर्प भी झूठा प्रतीत होता है! ' परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण जान गये कि यह राक्षस है । भला, उनसे क्या छिपा रहता? वे तो समस्त प्राणियोंके हृदयमें ही निवास करते हैं । अब उन्होंने यह निश्चय किया कि अपने सखा ग्वालबालोंको उसके मुँहमें जानेसे बचा लें || २५ || भगवान् इस प्रकार सोच ही रहे थे कि सब-ब-के - सब ग्वालबाल बछड़ोंके साथ उस असुरके पेटमें चले गये । परन्तु अघासुरने अभी उन्हें निगला नहीं, इसका कारण यह था कि अघासुर अपने भाई बकासुर और बहिन पूतनाके वधकी याद करके इस बातकी बाट देख रहा था कि उनको मारनेवाले श्रीकृष्ण मुँहमें आ जायँ, तब सबको एक साथ ही निगल जाऊँ ॥२६ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण सबको अभय देनेवाले हैं । जब उन्होंने देखा कि ये
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बेचारे ग्वालबाल — जिनका एकमात्र रक्षक मैं ही हूँ— मेरे हाथसे निकल गये और जैसे कोई तिनका उड़कर आगमें गिर पड़े, वैसे ही अपने - आप मृत्युरूप अघासुरकी जठराग्निके ग्रास बन गये, तब दैवकी इस विचित्र लीलापर भगवान्को बड़ा विस्मय हुआ और उनका हृदय दयासे द्रवित हो गया ॥२७ || वे सोचने लगे कि ' अब मुझे क्या करना चाहिये? ऐसा कौन - सा उपाय है, जिससे इस दुष्टकी मृत्यु भी हो जाय और इन संत- स्वभाव भोले - भाले बालकोंकी हत्या भी न हो? ये दोनों काम कैसे हो सकते हैं? ' परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण भूत, भविष्य, वर्तमान — सबको प्रत्यक्ष देखते रहते हैं । उनके लिये यह उपाय जानना कोई कठिन न था । वे अपना कर्तव्य निश्चय करके स्वयं उसके मुँहमें घुस गये ॥ २८ ॥ उस समय बादलोंमें छिपे हुए
देवता भयवश ‘ हाय - हाय ' पुकार उठे और अघासुरके हितैषी कंस आदि राक्षस हर्ष प्रकट करने लगे ॥२९ ॥
इत्थं मिथोऽतथ्यमतज्ज्ञभाषितं श्रुत्वा विचिन्त्येत्यमृषा मृषायते । रक्षो विदित्वाखिलभूतहृत्स्थितः स्वानां निरोद्धुं भगवान् मनो दधे ॥२५ तावत् प्रविष्टास्त्वसुरोदरान्तरं परं न गीर्णाः शिशवः सवत्साः । प्रतीक्षमाणेन बकारिवेशनं हतस्वकान्तस्मरणेन रक्षसा ॥२६ तान् वीक्ष्य कृष्णः सकलाभयप्रदो ह्यनन्यनाथान् स्वकरादवच्युतान् । दीनांश्च मृत्योर्जठराग्निघासान् घृणार्दितो दिष्टकृतेन विस्मितः ॥ २७ कृत्यं किमत्रास्य खलस्य जीवनं
न वा अमीषां च सतां विहिंसनम् ।
द्वयं कथं स्यादिति संविचिन्त्य त- ज्ज्ञात्वाविशत्तुण्डमशेषदृग्घरिः ॥२८
तदा घनच्छदा देवा भयाद्धाहेति चुक्रुशुः ।
जहृषुर्ये च कंसाद्याः कौणपास्त्वघबान्धवाः ॥२९
तच्छ्रुत्वा भगवान् कृष्णस्त्वव्ययः सार्भवत्सकम् ।
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चूर्णीचिकीर्षोरात्मानं तरसा ववृधे गले ॥३० अघासुर बछड़ों और ग्वालबालोंके सहित भगवान् श्रीकृष्णको अपनी डाढ़ोंसे चबाकर चूर- चूर कर डालना चाहता था । परन्तु उसी समय अविनाशी श्रीकृष्णने देवताओंकी ' हाय-हाय' सुनकर उसके गलेमें अपने शरीरको बड़ी फुर्तीसे बढ़ा लिया || ३० || इसके बाद भगवान्ने अपने शरीरको इतना बड़ा कर लिया कि उसका गला ही रुँध गया । आँखें उलट गयीं । वह व्याकुल होकर बहुत ही छटपटाने लगा । साँस रुककर सारे शरीरमें भर गयी और अन्तमें उसके प्राण ब्रह्मरन्ध्र फोड़कर निकल गये || ३१ || उसी मार्गसे प्राणोंके साथ उसकी सारी इन्द्रियाँ भी शरीरसे बाहर हो गयीं । उसी समय भगवान् मुकुन्दने अपनी अमृतमयी दृष्टिसे मरे हुए बछड़ों और ग्वालबालोंको जिला दिया और उन सबको साथ लेकर वे अघासुरके मुँहसे बाहर निकल आये || ३२ || उस अजगरके स्थूल शरीरसे एक अत्यन्त अद्भुत और महान् ज्योति निकली, उस समय उस ज्योतिके प्रकाशसे दसों दिशाएँ प्रज्वलित हो उठीं । वह थोड़ी देरतक तो आकाशमें स्थित होकर भगवान्के निकलनेकी प्रतीक्षा करती रही । जब वे बाहर निकल आये, तब वह सब देवताओंके देखते -देखते उन्हींमें समा गयी ॥३३ ॥ उस समय देवताओंने फूल बरसाकर, अप्सराओंने नाचकर, गन्धर्वोंने गाकर,
विद्याधरोंने बाजे बजाकर, ब्राह्मणोंने स्तुति- पाठकर और पार्षदोंने जय- जय- कारके नारे लगाकर बड़े आनन्दसे भगवान् श्रीकृष्णका अभिनन्दन किया । क्योंकि भगवान् श्रीकृष्णने अघासुरको मारकर उन सबका बहुत बड़ा काम किया था || ३४ || उन अद्भुत स्तुतियों, सुन्दर बाजों, मंगलमय गीतों, जय जयकार और आनन्दोत्सवोंकी मंगलध्वनि ब्रह्म-लोकके पास पहुँच गयी । जब ब्रह्माजीने वह ध्वनि सुनी, तब वे बहुत ही शीघ्र अपने वाहनपर चढ़कर वहाँ आये और भगवान् श्रीकृष्णकी यह महिमा देखकर आश्चर्य चकित हो गये ॥३५ ॥
परीक्षित्! जब वृन्दावनमें अजगरका वह चाम सूख गया, तब वह व्रजवासियोंके लिये बहुत दिनोंतक खेलनेकी एक अद्भुत गुफा-सी बना रहा ॥ ३६ ॥ यह जो भगवान्ने अपने
ग्वालबालोंको मृत्युके मुखसे बचाया था और अघासुरको मोक्ष- दान किया था, वह लीला भगवान्ने अपनी कुमार अवस्थामें अर्थात् पाँचवें वर्षमें ही की थी । ग्वालबालोंने उसे उसी समय देखा भी था, परन्तु पौगण्ड अवस्था अर्थात् छठे वर्षमें अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर व्रजमें उसका वर्णन किया ॥ ३७ ॥
ततोऽतिकायस्य निरुद्धमार्गिणो ह्युद्गीर्णदृष्टेर्भ्रमतस्त्वितस्ततः । पूर्णोऽन्तरंगे पवनो निरुद्धो मूर्धन् विनिष्पाट्य विनिर्गतो बहिः ॥३१ तेनैव सर्वेषु बहिर्गतेषु प्राणेषु वत्सान् सुहृदः परेतान् । दृष्ट्या स्वयोत्थाप्य तदन्वितः पुन-