श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 331–340
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 331–340
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वक्त्रान्मुकुन्दो भगवान् विनिर्ययौ ॥३२ पीनाहिभोगोत्थितमद्भुतं मह- ज्ज्योतिः स्वधाम्ना ज्वलयद् दिशो दश । प्रतीक्ष्य खेऽवस्थितमीशनिर्गमं विवेश तस्मिन् मिषतां दिवौकसाम् ॥३३ ततोऽतिहृष्टाः स्वकृतोऽकृतार्हणं पुष्पैः सुरा अप्सरसश्च नर्तनैः । गीतैः सुगा वाद्यधराश्च वाद्यकैः स्तवैश्च विप्रा जयनिःस्वनैर्गणाः ॥३४ तदद्भुतस्तोत्रसुवाद्यगीतिका- जयादिनैकोत्सवमंगलस्वनान् । श्रुत्वा स्वधाम्नोऽन्त्यज आगतोऽचिराद् दृष्ट्वा महीशस्य जगाम विस्मयम् ॥३५
राजन्नाजगरं चर्म शुष्कं वृन्दावनेऽद्भुतम् ।
व्रजौकसां बहुतिथं बभूवाक्रीडगह्वरम् ॥३६
एतत् कौमारजं कर्म हरेरात्माहिमोक्षणम् ।
मृत्योः पौगण्डके बाला दृष्ट्वोचुर्विस्मिता व्रजे ॥३७
नैतद् विचित्रं मनुजार्भमायिनः परावराणां परमस्य वेधसः । अघोऽपि यत्स्पर्शनधौतपातकः प्रापात्मसाम्यं त्वसतां सुदुर्लभम् ॥३८ सकृद् यदंगप्रतिमान्तराहिता
मनोमयी भागवतीं ददौ गतिम् ।
स एव नित्यात्मसुखानुभूत्यभि- व्युदस्तमायोऽन्तर्गतो हि किं पुनः ॥३९
सूत उवाच इत्थं द्विजा यादवदेवदत्तः श्रुत्वा स्वरातुश्चरितं विचित्रम् । ******ebook converter DEMO Watermarks *******
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पप्रच्छ भूयोऽपि तदेव पुण्यं वैयासकिं यन्निगृहीतचेताः ॥ ४० राजोवाच
ब्रह्मन् कालान्तरकृतं तत्कालीनं कथं भवेत् ।
यत् कौमारे हरिकृतं जगुः पौगण्डकेऽर्भकाः ॥४१
तद् ब्रूहि मे महायोगिन् परं कौतूहलं गुरो ।
नूनमेतद्धरेरेव माया भवति नान्यथा ॥४२
अघासुर मूर्तिमान् अघ ( पाप ) ही था। भगवान्के स्पर्शमात्रसे उसके सारे पाप धुल गये और उसे उस सारूप्य- मुक्तिकी प्राप्ति हुई, जो पापियोंको कभी मिल नहीं सकती । परन्तु यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है । क्योंकि मनुष्य - बालककी- सी लीला रचनेवाले ये वे ही परमपुरुष परमात्मा हैं, जो व्यक्त - अव्यक्त और कार्य- कारणरूप समस्त जगत्के एकमात्र विधाता हैं ॥३८ ॥ भगवान् श्रीकृष्णके किसी एक अंगकी भावनिर्मित प्रतिमा यदि ध्यानके द्वारा एक
बार भी हृदयमें बैठा ली जाय तो वह सालोक्य, सामीप्य आदि गतिका दान करती है, जो भगवान्के बड़े -बड़े भक्तोंको मिलती है । भगवान् आत्मानन्दके नित्य साक्षात्कारस्वरूप हैं । माया उनके पासतक नहीं फटक पाती । वे ही स्वयं अघासुरके शरीरमें प्रवेश कर गये । क्या अब भी उसकी सद्गतिके विषयमें कोई सन्देह है? ॥३९ ॥
सूतजी कहते हैं - शौनकादि ऋषियो! यदुवंश- शिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णने ही राजा परीक्षित्को जीवन दान दिया था । उन्होंने जब अपने रक्षक एवं जीवनसर्वस्वका यह विचित्र चरित्र सुना, तब उन्होंने फिर श्रीशुकदेवजी महाराजसे उन्हींकी पवित्र लीलाके सम्बन्धमें प्रश्न किया । इसका कारण यह था कि भगवान्की अमृतमयी लीलाने परीक्षित्के चित्तको अपने वशमें कर रखा था ॥४० ॥
राजा परीक्षित्ने पूछा- भगवन्! आपने कहा था कि ग्वालबालोंने भगवान्की की हुई पाँचवें वर्षकी लीला व्रजमें छठे वर्षमें जाकर कही । अब इस विषयमें आप कृपा करके यह बतलाइये कि एक समयकी लीला दूसरे समयमें वर्तमानकालीन कैसे हो सकती है? ॥४१ ॥
महायोगी गुरुदेव! मुझे इस आश्चर्यपूर्ण रहस्यको जाननेके लिये बड़ा कौतूहल हो रहा है । आप कृपा करके बतलाइये । अवश्य ही इसमें भगवान् श्रीकृष्णकी विचित्र घटनाओंको घटित करनेवाली मायाका कुछ-न-कुछ काम होगा। क्योंकि और किसी प्रकार ऐसा नहीं हो सकता ॥४२ ॥ गुरुदेव! यद्यपि क्षत्रियोचित धर्म ब्राह्मणसेवासे विमुख होनेके कारण मैं
अपराधी नाममात्रका क्षत्रिय हूँ, तथापि हमारा अहोभाग्य है कि हम आपके मुखारविन्दसे निरन्तर झरते हुए परम पवित्र मधुमय श्रीकृष्णलीलामृतका बार- बार पान कर रहे हैं ॥४३ ॥
वयं धन्यतमा लोके गुरोऽपि क्षत्रबन्धवः ।
यत् पिबामो मुहुस्त्वत्तः पुण्यं कृष्णकथामृतम् ॥४३
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सूत उवाच इत्थं स्म पृष्टः स तु बादरायणि- स्तत्स्मारितानन्तहृताखिलेन्द्रियः । कृच्छ्रात् पुनर्लब्धबहिर्दृशिः शनैः प्रत्याह तं भागवतोत्तमोत्तम ॥४४ सूतजी कहते हैं - भगवान्के परम प्रेमी भक्तोंमें श्रेष्ठ शौनकजी! जब राजा परीक्षित्ने इस प्रकार प्रश्न किया, तब श्रीशुकदेवजीको भगवान्की वह लीला स्मरण हो आयी और उनकी समस्त इन्द्रियाँ तथा अन्तःकरण विवश होकर भगवान्की नित्यलीलामें खिंच गये । कुछ समयके बाद धीरे- धीरे श्रम और कष्टसे उन्हें बाह्यज्ञान हुआ । तब वे परीक्षित्से भगवान्की लीलाका वर्णन करने लगे ॥४४ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे द्वादशोऽध्यायः ॥१२ ॥
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अथ त्रयोदशोऽध्यायः ब्रह्माजीका मोह और उसका नाश श्रीशुक उवाच
साधु पृष्टं महाभाग त्वया भागवतोत्तम ।
यन्नूतनयसीशस्य शृण्वन्नपि कथां मुहुः ॥ १
सतामयं सारभृतां निसर्गो यदर्थवाणीश्रुतिचेतसामपि । प्रतिक्षणं नव्यवदच्युतस्य यत् स्त्रिया विटानामिव साधुवार्ता ॥२
शृणुष्वावहितो राजन्नपि गुह्यं वदामि ते ।
ब्रूयुः स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवो गुह्यमप्युत ॥३
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! तुम बड़े भाग्यवान् हो । भगवान्के प्रेमी भक्तोंमें तुम्हारा स्थान श्रेष्ठ है। तभी तो तुमने इतना सुन्दर प्रश्न किया है । यों तो तुम्हें बार- बार भगवान्की लीला - कथाएँ सुननेको मिलती हैं, फिर भी तुम उनके सम्बन्धमें प्रश्न करके उन्हें और भी सरस — और भी नूतन बना देते हो || १ || रसिक संतोंकी वाणी, कान और हृदय भगवान्की लीलाके गान, श्रवण और चिन्तनके लिये ही होते हैं— उनका यह स्वभाव ही होता है कि वे क्षण-प्रतिक्षण भगवान्की लीलाओंको अपूर्व रस- मयी और नित्य- नूतन अनुभव करते रहें —ठीक वैसे ही, जैसे लेम्पट पुरुषोंको स्त्रियोंकी चर्चा में नया-नया रस जान पड़ता है ॥२ ॥ परीक्षित्! तुम एकाग्र चित्तसे श्रवण करो । यद्यपि भगवान्की यह लीला अत्यन्त
रहस्यमयी है, फिर भी मैं तुम्हें सुनाता हूँ। क्योंकि दयालु आचार्यगण अपने प्रेमी शिष्यको गुप्त रहस्य भी बतला दिया करते हैं ॥३ ॥
तथाघवदनान्मृत्यो रक्षित्वा वत्सपालकान् ।
सरित्पुलिनमानीय भगवानिदमब्रवीत् ॥४
अहोऽतिरम्यं पुलिनं वयस्याः
स्वकेलिसम्पन्मृदुलाच्छवालुकम् ।
स्फुटत्सरोगन्धहृतालिपत्रिक- ध्वनिप्रतिध्वानलसद्धुमाकुलम् ॥५
अत्र भोक्तव्यमस्माभिर्दिवारूढं क्षुधार्दिताः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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वत्साः समीपेऽपः पीत्वा चरन्तु शनकैस्तृणम् ॥६
तथेति पाययित्वार्भा वत्सानारुध्य शाद्वले ।
मुक्त्वा शिक्यानि बुभुजुः समं भगवता मुदा ॥७
कृष्णस्य विष्वक् पुरुराजिमण्डलै- रभ्याननाः फुल्लदृशो व्रजार्भकाः ।
सहोपविष्टा विपिने विरेजु- श्छदा यथाम्भोरुहकर्णिकायाः ॥८
केचित् पुष्पैर्दलैः केचित् पल्लवैरंकुरैः फलैः ।
शिग्भिस्त्वग्भिर्दृषद्भिश्च बुभुजुः कृतभाजनाः ॥९
सर्वे मिथो दर्शयन्तः स्वस्वभोज्यरुचिं पृथक् ।
हसन्तो हासयन्तश्चाभ्यवजहुः सहेश्वराः ॥ १०
यह तो मैं तुमसे कह ही चुका हूँ कि भगवान् श्रीकृष्णने अपने साथी ग्वालबालोंको मृत्युरूप अघासुरके मुँहसे बचा लिया। इसके बाद वे उन्हें यमुनाके पुलिनपर ले आये और उनसे कहने लगे— ॥४ ॥ ' मेरे प्यारे मित्रो! यमुनाजीका यह पुलिन अत्यन्त रमणीय है । देखो
तो सही, यहाँकी बालू कितनी कोमल और स्वच्छ है । हमलोगोंके लिये खेलनेकी तो यहाँ सभी सामग्री विद्यमान है । देखो, एक ओर रंग- बिरंगे कमल खिले हुए हैं और उनकी सुगन्धसे खिंचकर भौंरे गुंजार कर रहे हैं; तो दूसरी ओर सुन्दर- सुन्दर पक्षी बड़ा ही मधुर कलरव कर रहे हैं, जिसकी प्रतिध्वनिसे सुशोभित वृक्ष इस स्थानकी शोभा बढ़ा रहे हैं || ५ || अब हमलोगोंको यहाँ भोजन कर लेना चाहिये; क्योंकि दिन बहुत चढ़ आया है और हमलोग भूखसे पीड़ित हो रहे हैं । बछड़े पानी पीकर समीप ही धीरे- धीरे हरी - हरी घास चरते रहें' || ६ || ग्वालबालोंने एक स्वरसे कहा- ' ठीक है, ठीक है! ' उन्होंने बछड़ोंको पानी पिलाकर हरी - हरी घासमें छोड़ दिया और अपने- अपने छीके खोल-खोलकर भगवान्के साथ बड़े आनन्दसे भोजन करने लगे || ७ || सबके बीचमें भगवान् श्रीकृष्ण बैठ गये । उनके चारों ओर ग्वालबालोंने बहुत- सी मण्डलाकार पंक्तियाँ बना लीं और एक- से- एक सटकर बैठ गये । सबके मुँह श्रीकृष्णकी ओर थे और सबकी आँखें आनन्दसे खिल रही थीं । वन- भोजनके समय श्रीकृष्णके साथ बैठे हुए ग्वालबाल ऐसे शोभायमान हो रहे थे, मानो कमलकी कर्णिकाके चारों ओर उसकी छोटी -बड़ी पँखुड़ियाँ सुशोभित हो रही हों ॥८ ॥ कोई पुष्प तो
कोई पत्ते और कोई- कोई पल्लव, अंकुर, फल, छीके, छाल एवं पत्थरोंके पात्र बनाकर भोजन करने लगे ॥९ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण और ग्वालबाल सभी परस्पर अपनी- अपनी भिन्न - भिन्न
रुचिका प्रदर्शन करते । कोई किसीको हँसा देता, तो कोई स्वयं ही हँसते - हँसते लोट - पोट हो ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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जाता । इस प्रकार वे सब भोजन करने लगे ॥ १० ॥ ( उस समय श्रीकृष्णकी छटा सबसे
निराली थी । ) उन्होंने मुरलीको तो कमरकी फेंटमें आगेकी ओर खोंस लिया था । सींगी और बेंत बगलमें दबा लिये थे । बायें हाथमें बड़ा ही मधुर घृतमिश्रित दही- भातका ग्रास था और अँगुलियोंमें अदरक, नीबू आदिके अचार-मुरब्बे दबा रखे थे । ग्वालबाल उनको चारों ओरसे घेरकर बैठे हुए थे और वे स्वयं सबके बीचमें बैठकर अपनी विनोदभरी बातोंसे अपने साथी ग्वालबालोंको हँसाते जा रहे थे । जो समस्त यज्ञोंके एकमात्र भोक्ता हैं, वे ही भगवान् ग्वालबालोंके साथ बैठकर इस प्रकार बाल - लीला करते हुए भोजन कर रहे थे और स्वर्गके देवता आश्चर्यचकित होकर यह अद्भुत लीला देख रहे थे ॥११ ॥
बिभ्रद् वेणुं जठरपटयोः शृंगवेत्रे च कक्षे वामे पाणौ मसृणकवलं तत्फलान्यङ्गुलीषु । तिष्ठन् मध्ये स्वपरिसुहृदो हासयन् नर्मभिः स्वैः स्वर्गे लोके मिषति बुभुजे यज्ञभुग् बालकेलिः ॥११
भारतैवं वत्सपेषु भुंजानेष्वच्युतात्मसु ।
वत्सास्त्वन्तर्वने दूरं विविशुस्तृणलोभिताः ॥ १२
तान् दृष्ट्वा भयसंत्रस्तानूचे कृष्णोऽस्य भीभयम् ।
मित्राण्याशान्मा विरमतेहानेष्ये वत्सकानहम् ॥१३
इत्युक्त्वाद्रिदरीकुञ्जगह्वरेष्वात्मवत्सकान् ।
विचिन्वन् भगवान् कृष्णः सपाणिकवलो ययौ ॥१४
अम्भोजन्मजनिस्तदन्तरगतो मायार्भकस्येशितु- र्द्रष्टुं मंजु महित्वमन्यदपि तद्वत्सानितो वत्सपान् नीत्वान्यत्र कुरूद्वहान्तरदधात् खेऽवस्थितो यः पुरा दृष्ट्वाघासुरमोक्षणं प्रभवतः प्राप्तः परं विस्मयम् ॥१५ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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भरतवंशशिरोमणे! इस प्रकार भोजन करते- करते ग्वालबाल भगवान्की इस रसमयी लीलामें तन्मय हो गये । उसी समय उनके बछड़े हरी - हरी घासके लालचसे घोर जंगलमें बड़ी दूर निकल गये ॥१२ ॥ जब ग्वालबालोंका ध्यान उस ओर गया, तब तो वे भयभीत हो गये ।
उस समय अपने भक्तोंके भयको भगा देनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने कहा-' मेरे प्यारे मित्रो! तुमलोग भोजन करना बंद मत करो । मैं अभी बछड़ोंको लिये आता हूँ' ॥१३ ॥ ग्वालबालोंसे
इस प्रकार कहकर भगवान् श्रीकृष्ण हाथमें दही - भातका कौर लिये ही पहाड़ों, गुफाओं, कुंजों एवं अन्यान्य भयंकर स्थानोंमें अपने तथा साथियोंके बछड़ोंको ढूँढने चल दिये ॥१४ ॥
परीक्षित्! ब्रह्माजी पहलेसे ही आकाशमें उपस्थित थे । प्रभुके प्रभावसे अघासुरका मोक्ष देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ । उन्होंने सोचा कि लीलासे मनुष्य- बालक बने हुए भगवान् श्रीकृष्णकी कोई और मनोहर महिमामयी लीला देखनी चाहिये । ऐसा सोचकर उन्होंने पहले तो बछड़ोंको और भगवान् श्रीकृष्णके चले जानेपर ग्वाल-बालोंको भी, अन्यत्र ले जाकर रख
दिया और स्वयं अन्तर्धान हो गये । अन्ततः वे जड़ कमलकी ही तो सन्तान हैं ॥१५ ॥
ततो वत्सानदृष्ट्वैत्य पुलिनेऽपि च वत्सपान् ।
उभावपि वने कृष्णो विचिकाय समन्ततः ॥१६
क्वाप्यदृष्ट्वान्तर्विपिने वत्सान् पालांश्च विश्ववित् ।
सर्वं विधिकृतं कृष्णः सहसावजगाम हा ॥१७
ततः कृष्णो मुदं कर्तुं तन्मातॄणां च कस्य च ।
उभयायितमात्मानं चक्रे विश्वकृदीश्वरः ॥१८
यावद् वत्सपवत्सकाल्पकवपु- र्यावत् कराङ्घ्रयादिकं यावद् यष्टिविषाणवेणुदलशिग् यावद् विभूषाम्बरम् । यावच्छीलगुणाभिधाकृतिवयो यावद् विहारादिकं सर्वं विष्णुमयं गिरोऽङ्गवदजः सर्वस्वरूपो बभौ ॥१९
स्वयमात्माऽऽत्मगोवत्सान् प्रतिवार्यात्मवत्सपैः ।
क्रीडन्नात्मविहारैश्च सर्वात्मा प्राविशद् व्रजम् ॥ २०
तत्तद्वत्सान् पृथङ्नीत्वा तत्तद्गोष्ठे निवेश्य सः । ******ebook converter DEMO Watermarks *******
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तत्तदात्माभवद् राजंस्तत्तत्सद्म प्रविष्टवान् ॥२१ तन्मातरो वेणुरवत्वरोत्थिता उत्थाप्य दोर्भिः परिरभ्य निर्भरम् । भगवान् श्रीकृष्ण बछड़े न मिलनेपर यमुनाजीके पुलिनपर लौट आये, परन्तु यहाँ क्या देखते हैं कि ग्वालबाल भी नहीं हैं । तब उन्होंने वनमें घूम- घूमकर चारों ओर उन्हें ढूँढ़ा ॥१६ ॥
परन्तु जब ग्वालबाल और बछड़े उन्हें कहीं न मिले, तब वे तुरंत जान गये कि यह सब ब्रह्माकी करतूत है । वे तो सारे विश्वके एकमात्र ज्ञाता हैं ॥१७ ॥ अब भगवान् श्रीकृष्णने
बछड़ों और ग्वालबालोंकी माताओंको तथा ब्रह्माजीको भी आनन्दित करनेके लिये अपने-आपको ही बछड़ों और ग्वालबालों– दोनोंके रूपमें बना लिया* । क्योंकि वे ही तो सम्पूर्ण विश्वके कर्ता सर्वशक्तिमान् ईश्वर हैं ॥१८ ॥ परीक्षित्! वे बालक और बछड़े संख्यामें जितने
थे, जितने छोटे -छोटे उनके शरीर थे, उनके हाथ - पैर जैसे - जैसे थे, उनके पास जितनी और जैसी छड़ियाँ, सिंगी, बाँसुरी, पत्ते और छीके थे, जैसे और जितने वस्त्राभूषण थे, उनके शील, वभाव, गुण, नाम, रूप और अवस्थाएँ जैसी थीं, जिस प्रकार वे खाते - पीते और चलते थे, ठीक वैसे ही और उतने ही रूपोंमें सर्वस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण प्रकट हो गये । उस समय ' यह सम्पूर्ण जगत् विष्णुरूप है' - यह वेदवाणी मानो मूर्तिमती होकर प्रकट हो गयी ॥१९ ॥
सर्वात्मा भगवान् स्वयं ही बछड़े बन गये और स्वयं ही ग्वालबाल। अपने आत्मस्वरूप बछड़ोंको अपने आत्मस्वरूप ग्वालबालोंके द्वारा घेरकर अपने ही साथ अनेकों प्रकारके खेल खेलते हुए उन्होंने व्रजमें प्रवेश किया || २० || परीक्षित्! जिस ग्वालबालके जो बछड़े थे, उन्हें उसी ग्वालबालके रूपसे अलग- अलग ले जाकर उसकी बाखलमें घुसा दिया और विभिन्न बालकोंके रूपमें उनके भिन्न - भिन्न घरोंमें चले गये ॥२१ ॥
ग्वालबालोंकी माताएँ बाँसुरीकी तान सुनते ही जल्दीसे दौड़ आयीं । ग्वालबाल बने हुए परब्रह्म श्रीकृष्णको अपने बच्चे समझकर हाथोंसे उठाकर उन्होंने जोरसे हृदयसे लगा लिया । वे अपने स्तनोंसे वात्सल्य-स्नेहकी अधिकताके कारण सुधासे भी मधुर और आसवसे भी मादक चुचुआता हुआ दूध उन्हें पिलाने लगीं ॥ २२ ॥ परीक्षित्! इसी प्रकार प्रतिदिन
सन्ध्यासमय भगवान् श्रीकृष्ण उन ग्वालबालोंके रूपमें वनसे लौट आते और अपनी बालसुलभ लीलाओंसे माताओंको आनन्दित करते । वे माताएँ उन्हें उबटन लगातीं, नहलातीं, चन्दनका लेप करतीं और अच्छे- अच्छे वस्त्रों तथा गहनोंसे सजातीं । दोनों भौंहोंके बीचमें डीठसे बचानेके लिये काजलका डिठौना लगा देतीं तथा भोजन करातीं और तरह - तरहसे बड़े लाड़ - प्यारसे उनका लालन - पालन करतीं ॥ २३ ॥ ग्वालिनोंके समान गौएँ भी जब जंगलोंमेंसे
चरकर जल्दी - जल्दी लौटतीं और उनकी हुंकार सुनकर उनके प्यारे बछड़े दौड़कर उनके पास आ जाते, तब वे बार- बार उन्हें अपनी जीभसे चाटतीं और अपना दूध पिलातीं । अस समय स्नेहकी अधिकताके कारण उनके थनोंसे स्वयं ही दूधकी धारा बहने लगती ॥२४ ॥ इन गायों
और ग्वालिनोंका मातृभाव पहले जैसा ही ऐश्वर्यज्ञानरहित और विशुद्ध था । हाँ, अपने असली पुत्रोंकी अपेक्षा इस समय उनका स्नेह अवश्य अधिक था । इसी प्रकार भगवान् भी उनके ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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पहले पुत्रोंके समान ही पुत्रभाव दिखला रहे थे, परन्तु भगवान्में उन बालकोंके जैसा मोहका भाव नहीं था कि मैं इनका पुत्र हूँ ॥२५ ॥ अपने- अपने बालकोंके प्रति व्रज- वासियोंकी स्नेह-लता दिन- प्रतिदिन एक वर्षतक धीरे- धीरे बढ़ती ही गयी । यहाँतक कि पहले श्रीकृष्णमें
उनका जैसा असीम और अपूर्व प्रेम था, वैसा ही अपने इन बालकोंके प्रति भी हो गया ॥२६ ॥ इस प्रकार सर्वात्मा श्रीकृष्ण बछड़े और ग्वालबालोंके बहाने गोपाल बनकर
अपने बालकरूपसे वत्सरूपका पालन करते हुए एक वर्षतक वन और गोष्ठमें क्रीडा करते रहे ॥२७ ॥
स्नेहस्नुतस्तन्यपयःसुधासवं मत्वा परं ब्रह्म सुतानपाययन् ॥२२ ततो नृपोन्मर्दनमज्जलेपना- लंकाररक्षातिलकाशनादिभिः । संलालितः स्वाचरितैः प्रहर्षयन् सायं गतो यामयमेन माधवः ॥२३ गावस्ततो गोष्ठमुपेत्य सत्वरं हुंकारघोषैः परिहूतसंगतान् । स्वकान् स्वकान् वत्सतरानपाययन् मुहुर्लिहन्त्यः स्रवदौधसं पयः ॥२४
गोगोपीनां मातृतास्मिन् सर्वा स्नेहर्द्धिकां विना ।
पुरोवदास्वपि हरेस्तोकता मायया विना ॥२५
व्रजकसां स्वतोकेषु स्नेहवल्लयाब्दमन्वहम् ।
शनैर्निःसीम ववृधे यथा कृष्णे त्वपूर्ववत् ॥२६
इत्थमात्माऽऽत्मनाऽऽत्मानं वत्सपालमिषेण सः ।
पालयन् वत्सपो वर्षं चिक्रीडे वनगोष्ठयोः ॥२७
एकदा चारयन् वत्सान् सरामो वनमाविशत् ।
पंचषासु त्रियामासु हायनापूरणीष्वजः ॥२८
ततो विदूराच्चरतो गावो वत्सानुपव्रजम् ।
गोवर्धनाद्रिशिरसि चरन्त्यो ददृशुस्तृणम् ॥२९
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जब एक वर्ष पूरा होनेमें पाँच-छः रातें शेष थीं, तब एक दिन भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजीके साथ बछड़ोंको चराते हुए वनमें गये ॥२८ ॥ उस समय गौएँ गोवर्धनकी चोटीपर
घास चर रही थीं । वहाँसे उन्होंने व्रजके पास ही घास चरते हुए बहुत दूर अपने बछड़ोंको देखा ॥२९ ॥
दृष्ट्वाथ तत्स्नेहवशोऽस्मृतात्मा
स गोव्रजोऽत्यात्मपदुर्गमार्गः ।
द्विपात् ककुद्ग्रीव उदास्यपुच्छो- ऽगाधुंकृतैरास्रुपया जवेन ॥ ३०
समेत्य गावोऽधो वत्सान् वत्सवत्योऽप्यपाययन् ।
गिलन्त्य इव चांगानि लिहन्त्यः स्वौधसं पयः ॥३१
गोपास्तद्रोधनायासमौध्यलज्जोरुमन्युना ।
दुर्गाध्वकृच्छ्रतोऽभ्येत्य गोवत्सैर्ददृशुः सुतान् ॥ ३२
तदीक्षणोत्प्रेमरसाप्लुताशया जातानुरागा गतमन्यवोऽर्भकान् । उदुह्य दोर्भिः परिरभ्य मूर्धनि घ्राणैरवापुः परमां मुदं ते ॥३३
ततः प्रवयसो गोपास्तोकाश्लेषसुनिर्वृताः ।
कृच्छ्राच्छनैरपगतास्तदनुस्मृत्युदश्रवः ॥३४
व्रजस्य रामः प्रेमर्धेर्वीक्ष्यौत्कण्ठ्यमनुक्षणम् ।
मुक्तस्तनेष्वपत्येष्वप्यहेतुविदचिन्तयत् ॥३५
बछड़ोंको देखते ही गौओंका वात्सल्य- स्नेह उमड़ आया । वे अपने आपकी सुध- बुध खो बैठीं और ग्वालोंके रोकनेकी कुछ भी परवा न कर जिस मार्गसे वे न जा सकते थे, उस मार्गसे हुंकार करती हुई बड़े वेगसे दौड़ पड़ीं । उस समय उनके थनोंसे दूध बहता जाता था और उनकी गरदनें सिकुड़कर डीलसे मिल गयी थीं। वे पूँछ तथा सिर उठाकर इतने वेगसे दौड़ रही थीं कि मालूम होता था मानो उनके दो ही पैर हैं ॥ ३० ॥ जिन गौओंके और भी बछड़े हो चुके
थे, वे भी गोवर्धनके नीचे अपने पहले बछड़ोंके पास दौड़ आयीं और उन्हें स्नेहवश अपने-आप बहता हुआ दूध पिलाने लगीं । उस समय वे अपने बच्चोंका एक- एक अंग ऐसे चावसे चाट रही थीं, मानो उन्हें अपने पेटमें रख लेंगी || ३१ || गोपोंने उन्हें रोकनेका बहुत कुछ प्रयत्न किया, परन्तु उनका सारा प्रयत्न व्यर्थ रहा । उन्हें अपनी विफलतापर कुछ लज्जा और ****** ebook converter DEMO Watermarks *******