श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 341–350
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 341–350
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गायोंपर बड़ा क्रोध आया । जब वे बहुत कष्ट उठाकर उस कठिन मार्गसे उस स्थानपर पहुँचे, तब उन्होंने बछड़ोंके साथ अपने बालकोंको भी देखा ॥३२ ॥ अपने बच्चोंको देखते ही
उनका हृदय प्रेमरससे सराबोर हो गया । बालकोंके प्रति अनुरागकी बाढ़ आ गयी, उनका क्रोध न जाने कहाँ हवा हो गया । उन्होंने अपने - अपने बालकोंको गोदमें उठाकर हृदयसे लगा लिया और उनका मस्तक सूँघकर अत्यन्त आनन्दित हुए || ३३ || बूढ़े गोपोंको अपने बालकोंके आलिंगनसे परम आनन्द प्राप्त हुआ । वे निहाल हो गये । फिर बड़े कष्टसे उन्हें छोड़कर धीरे - धीरे वहाँसे गये । जानेके बाद भी बालकोंके और उनके आलिंगनके स्मरणसे उनके नेत्रोंसे प्रेमके आँसू बहते रहे ॥३४ ॥
बलरामजीने देखा कि व्रजवासी गोप, गौएँ और ग्वालिनोंकी उन सन्तानोंपर भी, जिन्होंने अपनी माका दूध पीना छोड़ दिया है, क्षण-प्रतिक्षण प्रेम-सम्पत्ति और उसके अनुरूप उत्कण्ठा बढ़ती ही जा रही है, तब वे विचारमें पड़ गये, क्योंकि उन्हें इसका कारण मालूम न था ॥३५ ॥
किमेतदद्भुतमिव वासुदेवेऽखिलात्मनि ।
व्रजस्य सात्मनस्तोकेष्वपूर्वं प्रेम वर्धते ॥३६
केयं वा कुत आयाता दैवी वा नार्युतासुरी ।
प्रायो मायास्तु मे भर्तुर्नान्या मे s पि विमोहिनी ॥३७
इति संचिन्त्य दाशार्हो वत्सान् सवयसानपि ।
सर्वानाचष्ट वैकुण्ठं चक्षुषा वयुनेन सः ॥३८
नैते सुरेशा ऋषयो न चैते
त्वमेव भासीश भिदाश्रयेऽपि ।
सर्वं पृथक्त्वं निगमात् कथं वदे- त्युक्तेन वृत्तं प्रभुणा बलोऽवैत् ॥ ३ ९
तावदेत्यात्मभूरात्ममानेन त्रुट्यनेहसा ।
पुरोवदब्दं क्रीडन्तं ददृशे सकलं हरिम् ॥४०
यावन्तो गोकुले बालाः सवत्साः सर्व एव हि ।
मायाशये शयाना मे नाद्यापि पुनरुत्थिताः ॥४१
इत एतेऽत्र कुत्रत्या मन्मायामोहितेतरे ।
तावन्त एव तत्राब्दं क्रीडन्तो विष्णुना समम् ॥४२
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एवमेतेषु भेदेषु चिरं ध्यात्वा स आत्मभूः ।
सत्याः के कतरे नेति ज्ञातुं नेष्टे कथंचन ॥४३
‘ यह कैसी विचित्र बात है! सर्वात्मा श्रीकृष्णमें व्रजवासियोंका और मेरा जैसा अपूर्व स्नेह है, वैसा ही इन बालकों और बछड़ोंपर भी बढ़ता जा रहा है || ३६ || यह कौन - सी माया है? कहाँसे आयी है? यह किसी देवताकी है, मनुष्यकी है अथवा असुरोंकी? परन्तु क्या ऐसा भी सम्भव है? नहीं- नहीं, यह तो मेरे प्रभुकी ही माया है । और किसीकी मायामें ऐसी सामर्थ्य नहीं, जो मुझे भी मोहित कर ले ' ॥ ३७ ॥ बलरामजीने ऐसा विचार करके ज्ञानदृष्टिसे देखा,
तो उन्हें ऐसा मालूम हुआ कि इन सब बछड़ों और ग्वालबालोंके रूपमें केवल श्रीकृष्ण- ही- श्रीकृष्ण हैं ॥ ३८ ॥ तब उन्होंने श्रीकृष्णसे कहा- ' भगवन्! ये ग्वालबाल और बछड़े न देवता
हैं और न तो कोई ऋषि ही । इन भिन्न-भिन्न रूपोंका आश्रय लेनेपर भी आप अकेले ही इन रूपोंमें प्रकाशित हो रहे हैं । कृपया स्पष्ट करके थोड़ेमें ही यह बतला दीजिये कि आप इस प्रकार बछड़े, बालक, सिंगी, रस्सी आदिके रूपमें अलग- अलग क्यों प्रकाशित हो रहे हैं? ' तब भगवान्ने ब्रह्माकी सारी करतूत सुनायी और बलरामजीने सब बातें जान लीं ॥३९ ॥
परीक्षित्! तबतक ब्रह्माजी ब्रह्मलोकसे व्रजमें लौट आये । उनके कालमानसे अबतक केवल एक त्रुटि ( जितनी देर में तीखी सूईसे कमलकी पँखुड़ी छिदे ) समय व्यतीत हुआ था । उन्होंने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण ग्वालबाल और बछड़ोंके साथ एक सालसे पहलेकी भाँति ही क्रीडा कर रहे हैं || ४० || वे सोचने लगे – ' गोकुलमें जितने भी ग्वालबाल और बछड़े थे, वे तो मेरी मायामयी शय्यापर सो रहे हैं— उनको तो मैंने अपनी मायासे अचेत कर दिया था; वे तबसे अबतक सचेत नहीं हुए ॥४१ ॥ तब मेरी मायासे मोहित ग्वालबाल और बछड़ोंके
अतिरिक्त ये उतने ही दूसरे बालक तथा बछड़े कहाँसे आ गये, जो एक सालसे भगवान्के साथ खेल रहे हैं? ॥४२ ॥ ब्रह्माजीने दोनों स्थानोंपर दोनोंको देखा और बहुत देरतक ध्यान
करके अपनी ज्ञानदृष्टिसे उनका रहस्य खोलना चाहा; परन्तु इन दोनोंमें कौन- से पहलेके ग्वालबाल हैं और कौन- से पीछे बना लिये गये हैं, इनमेंसे कौन सच्चे हैं और कौन बनावटी -' यह बात वे किसी प्रकार न समझ सके ॥४३ ॥
एवं सम्मोहयन् विष्णुं विमोहं विश्वमोहनम् ।
स्वयैव माययाजोऽपि स्वयमेव विमोहितः ॥४४
तम्यां तमोवन्नैहारं खद्योतार्चिरिवाहनि ।
महतीतरमायैश्यं निहन्त्यात्मनि युंजतः ॥४५
तावत् सर्वे वत्सपालाः पश्यतोऽजस्य तत्क्षणात् ।
व्यदृश्यन्त घनश्यामाः पीतकौशेयवाससः ॥४६
चतुर्भुजाः शंखचक्रगदाराजीवपाणयः ।
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किरीटिनः कुण्डलिनो हारिणो वनमालिनः ॥४७
श्रीवत्सांगददोरत्नकम्बुकंकणपाणयः ।
नूपुरैः कटकैर्भाताः कटिसूत्रांगुलीयकैः ॥४८
आङ्घ्रिमस्तकमापूर्णास्तुलसीनवदामभिः ।
कोमलैः सर्वगात्रेषु भूरिपुण्यवदर्पितैः ॥४९
चन्द्रिकाविशदस्मेरैः सारुणापांगवीक्षितैः ।
स्वकार्थानामिव रजःसत्त्वाभ्यां स्रष्टृपालकाः ॥५०
आत्मादिस्तम्बपर्यन्तैर्मूर्तिमद्भिश्चराचरैः ।
नृत्यगीताद्यनेकाः पृथक् पृथगुपासिताः ॥ ५१
भगवान् श्रीकृष्णकी मायामें तो सभी मुग्ध हो रहे हैं, परन्तु कोई भी माया- मोह भगवान्का स्पर्श नहीं कर सकता । ब्रह्माजी उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णको अपनी मायासे मोहित करने चले थे । किन्तु उनको मोहित करना तो दूर रहा, वे अजन्मा होनेपर भी अपनी ही मायासे अपने - आप मोहित हो गये || ४४ || जिस प्रकार रातके घोर अन्धकारमें कुहरेके अन्धकारका और दिनके प्रकाशमें जुगनूके प्रकाशका पता नहीं चलता, वैसे ही जब क्षुद्र पुरुष महापुरुषोंपर अपनी मायाका प्रयोग करते हैं, तब वह उनका तो कुछ बिगाड़ नहीं सकती, अपना ही प्रभाव खो बैठती है ॥ ४५ ॥
ब्रह्माजी विचार कर ही रहे थे कि उनके देखते - देखते उसी क्षण सभी ग्वालबाल और बछड़े श्रीकृष्णके रूपमें दिखायी पड़ने लगे । सब- के - सब सजल जलधरके समान श्यामवर्ण, पीताम्बरधारी, शंख, चक्र, गदा और पद्मसे युक्त— चतुर्भुज । सबके सिरपर मुकुट, कानोंमें कुण्डल और कण्ठोंमें मनोहर हार तथा वनमालाएँ शोभायमान हो रही थीं ॥४६-४७ ॥ उनके वक्षःस्थलपर सुवर्णकी सुनहली रेखा- श्रीवत्स, बाहुओंमें बाजूबंद, कलाइयोंमें शंखाकार रत्नोंसे जड़े कंगन, चरणोंमें नूपुर और कड़े, कमरमें करधनी तथा अँगुलियोंमें अँगूठियाँ जगमगा रही थीं ॥४८ ॥ वे नखसे शिखतक समस्त अंगोंमें कोमल और नूतन तुलसीकी
मालाएँ, जो उन्हें बड़े भाग्यशाली भक्तोंने पहनायी थीं, धारण किये हुए थे ॥४९ ॥ उनकी
मुसकान चाँदनीके समान उज्ज्वल थी और रतनारे नेत्रोंकी कटाक्षपूर्ण चितवन बड़ी ही मधुर थी । ऐसा जान पड़ता था मानो वे इन दोनोंके द्वारा सत्त्वगुण और रजोगुणको स्वीकार करके भक्त- जनोंके हृदयमें शुद्ध लालसाएँ जगाकर उनको पूर्ण कर रहे हैं ॥ ५० ॥ ब्रह्माजीने यह भी
देखा कि उन्हींके - जैसे दूसरे ब्रह्मासे लेकर तृणतक सभी चराचर जीव मूर्तिमान् होकर नाचते-गाते अनेक प्रकारकी पूजा सामग्रीसे अलग- अलग भगवान्के उन सब रूपोंकी उपासना कर रहे हैं ॥५१ ॥
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अणिमाद्यैर्महिमभिरजाद्याभिर्विभूतिभिः ।
चतुर्विंशतिभिस्तत्त्वैः परीता महदादिभिः ॥ ५२
कालस्वभावसंस्कारकामकर्मगुणादिभिः ।
स्वमहिध्वस्तमहिभिर्मूर्तिमद्भिरुपासिताः ॥५३
सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तयः ।
अस्पृष्टभूरिमाहात्म्या अपि ह्युपनिषदृशाम् ॥ ५४
एवं सकृद् ददर्शाजः परब्रह्मात्मनोऽखिलान् ।
यस्य भासा सर्वमिदं विभाति सचराचरम् ॥५५
ततोऽतिकुतुकोद्वृत्तस्तिमितैकादशेन्द्रियः ।
तद्धाम्नाभूदजस्तूष्णीं पूर्देव्यन्तीव पुत्रिका ॥ ५६
इतीरेशेऽतर्क्य निजमहिमनि स्वप्रमितिके परत्राजातोऽतन्निरसनमुखब्रह्मकमितौ । अनीशेऽपि द्रष्टुं किमिदमिति वा मुह्यति सति चछादाजो ज्ञात्वा सपदि परमोऽजाजवनिकाम् ॥५७ उन्हें अलग - अलग अणिमा- महिमा आदि सिद्धियाँ, माया- विद्या आदि विभूतियाँ और महत्तत्त्व आदि चौबीसों तत्त्व चारों ओरसे घेरे हुए हैं ॥ ५२ ॥ प्रकृतिमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाला
काल, उसके परिणामका कारण स्वभाव, वासनाओंको जगानेवाला संस्कार, कामनाएँ, कर्म, विषय और फल — सभी मूर्तिमान् होकर भगवानके प्रत्येक रूपकी उपासना कर रहे हैं । भगवान्की सत्ता और महत्ताके सामने उन सभीकी सत्ता और महत्ता अपना अस्तित्व खो बैठी थी ॥५३ ॥ ब्रह्माजीने यह भी देखा कि वे सभी भूत, भविष्यत् और वर्तमान कालके
द्वारा सीमित नहीं हैं, त्रिकालाबाधित सत्य हैं । वे सब - के --सबस स्वयंप्रकाश और केवल अनन्त आनन्दस्वरूप हैं । उनमें जड़ता अथवा चेतनताका भेदभाव नहीं है । वे सब- के - सब एक- रस हैं । यहाँतक कि उपनिषद्दर्शी तत्त्वज्ञानियोंकी दृष्टि भी उनकी अनन्त महिमाका स्पर्श नहीं कर सकती ॥५४ ॥ इस प्रकार ब्रह्माजीने एक साथ ही देखा कि वे सब - के - सब उन परब्रह्म
परमात्मा श्रीकृष्णके ही स्वरूप हैं, जिनके प्रकाशसे यह सारा चराचर जगत् प्रकाशित हो रहा है ॥५५ ॥
यह अत्यन्त आश्चर्यमय दृश्य देखकर ब्रह्माजी तो चकित रह गये । उनकी ग्यारहों इन्द्रियाँ ( पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय और एक मन) क्षुब्ध एवं स्तब्ध रह गयीं । वे भगवान्के तेजसे निस्तेज होकर मौन हो गये । उस समय वे ऐसे स्तब्ध होकर खड़े रह गये, मानो व्रजके अधिष्ठातृ- देवताके पास एक पुतली खड़ी हो || ५६ ॥ परीक्षित्! भगवान्का स्वरूप तर्कसे परे
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है । उसकी महिमा असाधारण है । वह स्वयंप्रकाश, आनन्दस्वरूप और मायासे अतीत है । वेदान्त भी साक्षात्रूपसे उसका वर्णन करनेमें असमर्थ है, इसलिये उससे भिन्नका निषेध करके आनन्द - स्वरूप ब्रह्मका किसी प्रकार कुछ संकेत करता है । यद्यपि ब्रह्माजी समस्त विद्याओंके अधिपति हैं, तथापि भगवान्के दिव्यस्वरूपको वे तनिक भी न समझ सके कि यह क्या है । यहाँतक कि वे भगवान्के उन महिमामय रूपोंको देखनेमें भी असमर्थ हो गये । उनकी आँखें मुँद गयीं । भगवान् श्रीकृष्णने ब्रह्माके इस मोह और असमर्थताको जानकर बिना किसी प्रयासके तुरंत अपनी मायाका परदा हटा दिया ॥ ५७ ॥ इससे ब्रह्माजीको बाह्यज्ञान
हुआ । वे मानो मरकर फिर जी उठे । सचेत होकर उन्होंने ज्यों- त्यों करके बड़े कष्टसे अपने नेत्र खोले । तब कहीं उन्हें अपना शरीर और यह जगत् दिखायी पड़ा ॥ ५८ ॥ फिर ब्रह्माजी जब
चारों ओर देखने लगे, तब पहले दिशाएँ और उसके बाद तुरंत ही उनके सामने वृन्दावन दिखायी पड़ा । वृन्दावन सबके लिये एक- सा प्यारा है । जिधर देखिये, उधर ही जीवोंको जीवन देनेवाले फल और फूलोंसे लदे हुए, हरे- हरे पत्तोंसे लहलहाते हुए वृक्षोंकी पाँतें शोभा पा रही हैं ॥५९ ॥ भगवान् श्रीकृष्णकी लीला भूमि होनेके कारण वृन्दावनधाममें क्रोध, तृष्णा
आदि दोष प्रवेश नहीं कर सकते और वहाँ स्वभावसे ही परस्पर दुस्त्यज वैर रखनेवाले मनुष्य और पशु-पक्षी भी प्रेमी मित्रोंके समान हिल-मिलकर एक साथ रहते हैं ॥६० ॥ ब्रह्माजीने
वृन्दावनका दर्शन करनेके बाद देखा कि अद्वितीय परब्रह्म गोपवंशके बालकका- सा नाट्य कर रहा है । एक होनेपर भी उसके सखा हैं, अनन्त होनेपर भी वह इधर- उधर घूम रहा है और उसका ज्ञान अगाध होनेपर भी वह अपने ग्वालबाल और बछड़ोंको ढूँढ़ रहा है। ब्रह्माजीने देखा कि जैसे भगवान् श्रीकृष्ण पहले अपने हाथमें दही - भातका कौर लिये उन्हें ढूँढ़ रहे थे, वैसे ही अब भी अकेले ही उनकी खोजमें लगे हैं ॥ ६१ ॥ भगवान्को देखते ही ब्रह्माजी अपने
वाहन हंसपरसे कूद पड़े और सोनेके समान चमकते हुए अपने शरीरसे पृथ्वीपर दण्डकी भाँति गिर पड़े । उन्होंने अपने चारों मुकुटोंके अग्रभागसे भगवान्के चरण- कमलोंका स्पर्श करके नमस्कार किया और आनन्दके आँसुओंकी धारासे उन्हें नहला दिया ॥६२ ॥ वे
भगवान् श्रीकृष्णकी पहले देखी हुई महिमाका बार- बार स्मरण करते, उनके चरणोंपर गिरते और उठ - उठकर फिर-फिर गिर पड़ते । इसी प्रकार बहुत देरतक वे भगवान्के चरणोंमें ही पड़े रहे ॥६३ ॥
ततोऽर्वाक् प्रतिलब्धाक्षः कः परेतवदुत्थितः ।
कृच्छ्रादुन्मील्य वै दृष्टीराचष्टेदं सहात्मना ॥५८
सपद्येवाभितः पश्यन् दिशोऽपश्यत् पुरः स्थितम् ।
वृन्दावनं जनाजीव्यद्रुमाकीर्णं समाप्रियम् ॥५९
यत्र नैसर्गदुर्वैराः सहासन् नृमृगादयः ।
मित्राणीवाजितावासद्रुतरुट्तर्षकादिकम् ॥६०
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तत्रोद्वहत् पशुपवंशशिशुत्वनाट्यं
ब्रह्माद्वयं परमनन्तमगाधबोधम् ।
वत्सान् सखीनिव पुरा परितो विचिन्व- देकं सपाणिकवलं परमेष्ठ्यचष्ट ॥६१
दृष्ट्वा त्वरेण निजधोरणतोऽवतीर्य पृथ्व्यां वपुः कनकदण्डमिवाभिपात्य । स्पृष्ट्वा चतुर्मुकुटकोटिभिरङ्घ्रियुग्मं नत्वा मुदश्रुसुजलैरकृताभिषेकम् ॥६२
उत्थायोत्थाय कृष्णस्य चिरस्य पादयोः पतन् ।
आस्ते महित्वं प्राग्दृष्टं स्मृत्वा स्मृत्वा पुनः पुनः ॥६३
शनैरथोत्थाय विमृज्य लोचने मुकुन्दमुद्वीक्ष्य विनम्रकन्धरः । कृतांजलिः प्रश्रयवान् समाहितः सवेपथुर्गद्गदयैलतेलया ॥६४ फिर धीरे - धीरे उठे और अपने नेत्रोंके आँसू पोंछे । प्रेम और मुक्तिके एकमात्र उद्गम भगवान्को देखकर उनका सिर झुक गया । वे काँपने लगे । अंजलि बाँधकर बड़ी नम्रता और एकाग्रताके साथ गद्गद वाणीसे वे भगवान्की स्तुति करने लगे ॥६४ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे त्रयोदशोऽध्यायः ॥१३ ॥
* भगवान् सर्वसमर्थ हैं । वे ब्रह्माजीके चुराये हुए ग्वालबाल और बछड़ोंको ला सकते थे । किन्तु इससे ब्रह्माजीका मोह दूर न होता और वे भगवान्की उस दिव्य मायाका ऐश्वर्य न देख सकते, जिसने उनके विश्वकर्ता होनेके अभिमानको नष्ट किया । इसीलिये भगवान् उन्हीं ग्वालबाल और बछड़ोंको न लाकर स्वयं ही वैसे ही एवं उतने ही ग्वालबाल और बछड़े बन गये ।
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अथ चतुर्दशोऽध्यायः ब्रह्माजीके द्वारा भगवान्की स्तुति ब्रह्मोवाच नौमीड्य तेऽभ्रवपुषे तडिदम्बराय
गुंजावतंसपरिपिच्छलसन्मुखाय ।
वन्यस्रजे कवलवेत्रविषाणवेणु- लक्ष्मश्रिये मृदुपदे पशुपाङ्गजाय ॥१
अस्यापि देव वपुषो मदनुग्रहस्य स्वेच्छामयस्य न तु भूतमयस्य कोऽपि । नेशे महि त्ववसितुं मनसाऽऽन्तरेण साक्षात्तवैव किमुतात्मसुखानुभूतेः ॥ २ ब्रह्माजीने स्तुति की — प्रभो! एकमात्र आप ही स्तुति करनेयोग्य हैं । मैं आपके चरणोंमें नमस्कार करता हूँ । आपका यह शरीर वर्षाकालीन मेघके समान श्यामल है, इसपर स्थिर बिजलीके समान झिलमिल झिलमिल करता हुआ पीताम्बर शोभा पाता है, आपके गलेमें घुँघचीकी माला, कानोंमें मकराकृति कुण्डल तथा सिरपर मोरपंखोंका मुकुट है, इन सबकी कान्तिसे आपके मुखपर अनोखी छटा छिटक रही है । वक्षःस्थलपर लटकती हुई वनमाला और नन्ही- सी हथेलीपर दही- भातका कौर। बगलमें बेंत और सिंगी तथा कमरकी फेंटमें आपकी पहचान बतानेवाली बाँसुरी शोभा पा रही है । आपके कमल- से सुकोमल परम सुकुमार चरण और यह गोपाल- बालकका सुमधुर वेष । ( मैं और कुछ नहीं जानता; बस, मैं तो इन्हीं चरणोंपर निछावर हूँ) ॥१॥ स्वयं-प्रकाश परमात्मन्! आपका यह श्रीविग्रह
भक्तजनोंकी लालसा- अभिलाषा पूर्ण करनेवाला है । यह आपकी चिन्मयी इच्छाका मूर्तिमान् स्वरूप मुझपर आपका साक्षात् कृपा- प्रसाद है । मुझे अनुगृहीत करनेके लिये ही आपने इसे प्रकट किया है । कौन कहता है कि यह पंचभूतोंकी रचना है? प्रभो! यह तो अप्राकृत शुद्ध सत्त्वमय है । मैं या और कोई समाधि लगाकर भी आपके इस सच्चिदानन्द - विग्रहकी महिमा नहीं जान सकता । फिर आत्मा- नन्दानुभवस्वरूप साक्षात् आपकी ही महिमाको तो कोई एकाग्रमनसे भी कैसे जान सकता है ॥२ ॥ प्रभो! जो लोग ज्ञानके लिये प्रयत्न न करके
अपने स्थानमें ही स्थित रहकर केवल सत्संग करते हैं और आपके प्रेमी संत पुरुषोंके द्वारा गायी हुई आपकी लीला -कथाका, जो उन लोगोंके पास रहने से अपने - आप सुननेको मिलती है, शरीर, वाणी और मनसे विनयावनत होकर सेवन करते हैं - यहाँतक कि उसे ही अपना जीवन बना लेते हैं, उसके बिना जी ही नहीं सकते - प्रभो! यद्यपि आपपर त्रिलोकीमें कोई कभी विजय नहीं प्राप्त कर सकता, फिर भी वे आपपर विजय प्राप्त कर लेते हैं, आप उनके प्रेमके अधीन हो जाते हैं ॥३ ॥ भगवन्! आपकी भक्ति सब प्रकारके कल्याणका मूलस्रोत–
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उद्गम है । जो लोग उसे छोड़कर केवल ज्ञानकी प्राप्तिके लिये श्रम उठाते और दुःख भोगते -हैं, उनको बस, क्लेश-ही क्लेश हाथ लगता है, और कुछ नहीं – जैसे थोथी भूसी कूटनेवालेको केवल श्रम ही मिलता है, चावल नहीं ॥४ ॥
ज्ञाने प्रयासमुदपास्य नमन्त एव जीवन्ति सन्मुखरितां भवदीयवार्ताम् । स्थाने स्थिताः श्रुतिगतां तनुवाङ्मनोभि- र्ये प्रायशोऽजित जितोऽप्यसि तैस्त्रिलोक्याम् ॥३ श्रेयःस्रुतिं भक्तिमुदस्य ते विभो क्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये । तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते नान्यद्यथा स्थूलतुषावघातिनाम् ॥ ४ पुरेह भूमन् बहवोऽपि योगिन- स्त्वदर्पितेहा निजकर्मलब्धया । विबुध्य भक्त्यैव कथोपनीतया प्रपेदिरेऽञ्जोऽच्त ते गतिं पराम् ॥५ तथापि भूमन् महिमागुणस्य ते विबोद्धुमर्हत्यमलान्तरात्मभिः । अविक्रियात् स्वानुभवादरूपतो ह्यनन्यबोध्यात्मतया न चान्यथा ॥६ गुणात्मनस्तेऽपि गुणान् विमातुं हितावतीर्णस्य क ईशिरेऽस्य । हे अच्युत! हे अनन्त! इस लोकमें पहले भी बहुत - से योगी हो गये हैं । जब उन्हें योगादिके द्वारा आपकी प्राप्ति न हुई, तब उन्होंने अपने लौकिक और वैदिक समस्त कर्म आपके चरणोंमें समर्पित कर दिये । उन समर्पित कर्मोंसे तथा आपकी लीला - कथासे उन्हें आपकी भक्ति प्राप्त हुई । उस भक्तिसे ही आपके स्वरूपका ज्ञान प्राप्त करके उन्होंने बड़ी सुगमतासे आपके परमपदकी प्राप्ति कर ली || ५ || हे अनन्त! आपके सगुण- निर्गुण दोनों स्वरूपोंका ज्ञान कठिन होनेपर भी निर्गुण स्वरूपकी महिमा इन्द्रियोंका प्रत्याहार करके शुद्धान्तःकरणसे जानी जा सकती है । (जाननेकी प्रक्रिया यह है कि) विशेष आकारके परित्यागपूर्वक आत्माकार अन्तःकरणका साक्षात्कार किया जाय। यह आत्माकारता घटपटादि रूपके समान ज्ञेय नहीं है, प्रत्युत आवरणका भंगमात्र है । यह साक्षात्कार ' यह ब्रह्म है, ‘ मैं ब्रह्मको
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जानता हूँ ' इस प्रकार नहीं, किन्तु स्वयंप्रकाश रूपसे ही होता है || ६ || परन्तु भगवन्! जिन समर्थ पुरुषोंने अनेक जन्मोंतक परिश्रम करके पृथ्वीका एक-एक परमाणु, आकाशके हिमकण ( ओसकी बूँदें ) तथा उसमें चमकनेवाले नक्षत्र एवं तारोंतकको गिन डाला है— उनमें भी भला, ऐसा कौन हो सकता है जो आपके सगुण स्वरूपके अनन्त गुणोंको गिन सके? प्रभो! आप केवल संसारके कल्याणके लिये ही अवतीर्ण हुए हैं । सो भगवन्! आपकी महिमाका ज्ञान तो बड़ा ही कठिन है ॥७ ॥ इसलिये जो पुरुष क्षण- क्षणपर बड़ी उत्सुकतासे
आपकी कृपाका ही भलीभाँति अनुभव करता रहता है और प्रारब्धके अनुसार जो कुछ सुख या दुःख प्राप्त होता है उसे निर्विकार मनसे भोग लेता है, एवं जो प्रेमपूर्ण हृदय, गद्गद वाणी और पुलकित शरीरसे अपनेको आपके चरणोंमें समर्पित करता रहता है - इस प्रकार जीवन व्यतीत करनेवाला पुरुष ठीक वैसे ही आपके परम पदका अधिकारी हो जाता है, जैसे अपने पिताकी सम्पत्तिका पुत्र! ॥८ ॥
कालेन यैर्वा विमिताः सुकल्पै- भूपांसवः खे मिहिका द्युभासः ॥७ तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो भुंजान एवात्मकृतं विपाकम् । हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक् ॥८ पश्येश मेऽनार्यमनन्त आद्ये परात्मनि त्वय्यपि मायिमायिनि । मायां वितत्येक्षितुमात्मवैभवं ह्यहं कियानैच्छमिवार्चिरग्नौ ॥९ अतः क्षमस्वाच्युत मे रजोभुवो ह्यजानतस्त्वत्पृथगीशमानिनः । अजावलेपान्धतमोऽन्धचक्षुष एषोऽनुकम्प्यो मयि नाथवानिति ॥१०
क्वाहं तमोमहदहंखचराग्निवार्भू- संवेष्टिताण्डघटसप्तवितस्तिकायः ।
क्वेदृग्विधाविगणिताण्डपराणुचर्या- वाताध्वरोमविवरस्य च ते महित्वम् ॥११
प्रभो! मेरी कुटिलता तो देखिये । आप अनन्त आदिपुरुष परमात्मा हैं और मेरे - जैसे बड़े-