श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 441–450
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 441–450
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कोई भी तुम्हारा तिरस्कार नहीं करेंगे। उनकी तो बात ही क्या, सारा संसार तुम्हारा
सम्मान करेगा । इसका कारण है। अब तुम मेरी हो गयी हो, मुझसे युक्त हो गयी हो ।
देखो न, ये देवता मेरी बातका अनुमोदन कर रहे हैं ॥३१ ॥
न प्रीतयेऽनुरागाय ह्यंगसंगो नृणामिह ।
तन्मनो मयि युंजाना अचिरान्मामवाप्स्यथ ॥३२
श्रीशुक उवाच
इत्युक्ता द्विजपत्न्यस्ता यज्ञवाटं पुनर्गताः ।
ते`चानसूयवः स्वाभिः स्त्रीभिः सत्रमपारयन् ॥३३
तत्रैका विधृता भर्त्रा भगवन्तं यथाश्रुतम् ।
हृदोपगुह्य विजहौ देहं कर्मानुबन्धनम् ॥३४
भगवानपि गोविन्दस्तेनैवान्नेन गोपकान् ।
चतुर्विधेनाशयित्वा स्वयं च बुभुजे प्रभुः ॥३५
एवं लीलानरवपुर्नृलोकमनुशीलयन् ।
रेमे गोगोपगोपीनां रमयन् रूपवाक्कृतैः ॥३६
अथानुस्मृत्य विप्रास्ते अन्वतप्यन् कृतागसः ।
यद् विश्वेश्वरयोर्याच्ञामहन्म नृविडम्बयोः ॥ ३७
दृष्ट्वा स्त्रीणां भगवति कृष्णे भक्तिमलौकिकीम् ।
आत्मानं च तया हीनमनुतप्ता व्यगर्हयन् ॥३८
देवियो! इस संसारमें मेरा अंग- संग ही मनुष्योंमें मेरी प्रीति या अनुरागका कारण नहीं है। इसलिये तुम जाओ, अपना मन मुझमें लगा दो । तुम्हें बहुत शीघ्र मेरी प्राप्ति हो जायगी ॥३२ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! जब भगवान्ने इस प्रकार कहा, तब वे ब्राह्मणपत्नियाँ यज्ञशालामें लौट गयीं । उन ब्राह्मणोंने अपनी स्त्रियोंमें तनिक भी
दोषदृष्टि नहीं की । उनके साथ मिलकर अपना यज्ञ पूरा किया ॥३३ ॥
उन स्त्रियोंमेंसे एकको आनेके समय ही उसके पतिने बलपूर्वक रोक लिया था । इसपर उस ब्राह्मणपत्नीने भगवान्के वैसे ही स्वरूपका ध्यान किया, जैसा कि बहुत दिनोंसे सुन रखा था । जब उसका ध्यान जम गया, तब मन- ही- मन भगवान्का आलिंगन करके उसने कर्मके द्वारा बने हुए अपने शरीरको छेड़ दिया— ( शुद्धसत्त्वमय
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दिव्य शरीरसे उसने भगवान्की सन्निधि प्राप्त कर ली ) ॥३४ ॥
इधर भगवान् श्रीकृष्णने ब्राह्मणियोंके लाये हुए उस चार प्रकारके अन्नसे पहले ग्वाल- बालोंको भोजन कराया और फिर उन्होंने स्वयं भी भोजन किया ॥ ३५ ॥
परीक्षित्! इस प्रकार लीलामनुष्य भगवान् श्रीकृष्णने मनुष्यकी-सी लीला की और अपने सौन्दर्य, माधुर्य, वाणी तथा कर्मोंसे गौएँ, ग्वालबाल और गोपियोंको आनन्दित किया और स्वयं भी उनके अलौकिक प्रेमरसका आस्वादन करके आनन्दित हुए ॥३६ ॥
परीक्षित्! इधर जब ब्राह्मणोंको यह मालूम हुआ कि श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान् हैं, तब उन्हें बड़ा पछतावा हुआ । वे सोचने लगे कि जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामकी आज्ञाका उल्लंघन करके हमने बड़ा भारी अपराध किया है । वे तो मनुष्यकी - सी लीला करते हुए भी परमेश्वर ही हैं ॥ ३७ ॥
जब उन्होंने देखा कि हमारी पत्नियोंके हृदयमें तो भगवान्का अलौकिक प्रेम है और हमलोग उससे बिलकुल रीते हैं, तब वे पछता- पछताकर अपनी निन्दा करने लगे || ३८ ||
धिग् जन्म नस्त्रिवृद् विद्यां धिग् व्रतं धिग् बहुज्ञताम् ।
धिक् कुलं धिक् क्रियादाक्ष्यं विमुखा ये त्वधोक्षजे ॥३९
नूनं भगवतो माया योगिनामपि मोहिनी ।
यद् वयं गुरवो नृणां स्वार्थे मुह्यामहे द्विजाः ॥ ४०
अहो पश्यत नारीणामपि कृष्णे जगद्गुरौ ।
दुरन्तभावं योऽविध्यन्मृत्युपाशान् गृहाभिधान् ॥४१
नासां द्विजातिसंस्कारो न निवासो गुरावपि ।
न तपो नात्ममीमांसा न शौचं न क्रियाः शुभाः ॥४२
अथापि ह्युत्तमश्लोके कृष्णे योगेश्वरेश्वरे ।
भक्तिर्दृढा न चास्माकं संस्कारादिमतामपि ॥४३
ननु स्वार्थविमूढानां प्रमत्तानां गृहेहया ।
अहो नः स्मारयामास गोपवाक्यैः सतां गतिः ॥४४
वे कहने लगे – हाय! हम भगवान् श्रीकृष्णसे विमुख हैं । बड़े ऊँचे कुलमें हमारा जन्म हुआ, गायत्री ग्रहण करके हम द्विजाति हुए, वेदाध्ययन करके हमने बड़े - बड़े यज्ञ
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किये; परन्तु वह सब किस कामका? धिक्कार है! धिक्कार है!! हमारी विद्या व्यर्थ गयी, हमारे व्रत बुरे सिद्ध हुए । हमारी इस बहुज्ञताको धिक्कार है! ऊँचे वंशमें जन्म लेना,
कर्मकाण्डमें निपुण होना किसी काम न आया । इन्हें बार-बार धिक्कार है ॥ ३ ९ ॥
निश्चय ही, भगवान्की माया बड़े - बड़े योगियोंको भी मोहित कर लेती है । तभी तो हम कहलाते हैं मनुष्योंके गुरु और ब्राह्मण, परन्तु अपने सच्चे स्वार्थ और परमार्थके विषयमें बिलकुल भूले हुए हैं || ४० || कितने आश्चर्यकी बात है! देखो तो सही —यद्यपि ये स्त्रियाँ हैं, तथापि जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्णमें इनका कितना अगाध प्रेम है, अखण्ड अनुराग है! उसीसे इन्होंने गृहस्थीकी वह बहुत बड़ी फाँसी भी काट डाली, जो मृत्युके साथ भी नहीं कटती ॥४१ ॥ इनके न तो द्विजातिके योग्य यज्ञोपवीत आदि संस्कार हुए
हैं और न तो इन्होंने गुरुकुलमें ही निवास किया है । न इन्होंने तपस्या की है और न तो आत्माके सम्बन्धमें ही कुछ विवेक विचार किया है । उनकी बात तो दूर रही, इनमें न तो पूरी पवित्रता है और न तो शुभकर्म ही ॥४२ ॥ फिर भी समस्त योगेश्वरोंके ईश्वर
पुण्यकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें इनका दृढ़ प्रेम है । और हमने अपने संस्कार किये हैं, गुरुकुलमें निवास किया है, तपस्या की है, आत्मानुसन्धान किया है, पवित्रताका निर्वाह किया है तथा अच्छे - अच्छे कर्म किये हैं; फिर भी भगवान्के चरणोंमें हमारा प्रेम नहीं है ॥४३ ॥ सच्ची बात यह है कि हमलोग गृहस्थीके काम- धंधोंमें
मतवाले हो गये थे, अपनी भलाई और बुराईको बिलकुल भूल गये थे । अहो, भगवान्की कितनी कृपा है! भक्तवत्सल प्रभुने ग्वालबालोंको भेजकर उनके वचनोंसे हमें चेतावनी दी, अपनी याद दिलायी ॥४४ ॥ भगवान् स्वयं पूर्णकाम हैं और कैवल्यमोक्षपर्यन्त
जितनी भी कामनाएँ होती हैं, उनको पूर्ण करनेवाले हैं । यदि हमें सचेत नहीं करना होता तो उनका हम सरीखे क्षुद्र जीवोंसे प्रयोजन ही क्या हो सकता था? अवश्य ही उन्होंने इसी उद्देश्यसे माँगनेका बहाना बनाया । अन्यथा उन्हें माँगनेकी भला क्या आवश्यकता थी? ॥४५ ॥ स्वयं लक्ष्मी अन्य सब देवताओंको छोड़कर और अपनी चंचलता, गर्व
आदि दोषोंका परित्याग कर केवल एक बार उनके चरणकमलोंका स्पर्श पानेके लिये सेवा करती रहती हैं । वे ही प्रभु किसीसे भोजनकी याचना करें, यह लोगोंको मोहित करनेके लिये नहीं तो और क्या है? ॥४६ ॥ देश, काल, पृथक्- पृथक् सामग्रियाँ, उन- उन कर्मोंमें विनियुक्त मन्त्र, अनुष्ठानकी पद्धति, ऋत्विज, अग्नि, देवता, यजमान, यज्ञ
और धर्म– सब भगवान्के ही स्वरूप हैं ॥ ४७ ॥ वे ही योगेश्वरोंके भी ईश्वर भगवान्
विष्णु स्वयं श्रीकृष्णके रूपमें यदुवंशियोंमें अवतीर्ण हुए हैं, यह बात हमने सुन रखी थी; परन्तु हम इतने मूढ हैं कि उन्हें पहचान न सके ॥४८ ॥ यह सब होनेपर भी हम
धन्यातिधन्य हैं, हमारे अहोभाग्य हैं। तभी तो हमें वैसी पत्नियाँ प्राप्त हुई हैं । उनकी भक्तिसे हमारी बुद्धि भी भगवान् श्रीकृष्णके अविचल प्रेमसे युक्त हो गयी है ॥४९ ॥
प्रभो! आप अचिन्त्य और अनन्त ऐश्वर्योंके स्वामी हैं! श्रीकृष्ण! आपका ज्ञान अबाध है । आपकी ही मायासे हमारी बुद्धि मोहित हो रही है और हम कर्मोंके पचड़ेमें भटक रहे हैं । हम आपको नमस्कार करते हैं ॥ ५० ॥ वे आदि पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण
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हमारे इस अपराधको क्षमा करें । क्योंकि हमारी बुद्धि उनकी मायासे मोहित हो रही है और हम उनके प्रभावको न जाननेवाले अज्ञानी हैं ॥ ५१ ॥
अन्यथा पूर्णकामस्य कैवल्याद्याशिषां पतेः ।
ईशितव्यैः किमस्माभिरीशस्यैतद् विडम्बनम् ॥४५
हित्वान्यान् भजते यं श्रीः पादस्पर्शाशया सकृत् ।
आत्मदोषापवर्गेण तद्याच्या जनमोहिनी ॥४६
देशः कालः पृथग्द्रव्यं मन्त्रतन्त्रर्त्विजोऽग्नयः ।
देवता यजमानश्च क्रतुर्धर्मश्च यन्मयः ॥४७
स एष भगवान् साक्षाद् विष्णुर्योगेश्वरेश्वरः ।
तो दुष्वित्यशृण्म ह्यपि मूढा न विद्महे ॥४८
अहो” वयं धन्यतमा येषां नस्तादृशीः स्त्रियः ।
भक्त्या यासां मतिर्जाता अस्माकं निश्चला हरौ ॥४९
नमस्तुभ्यं भगवते कृष्णायाकुण्ठमेधसे ।
यन्मायामोहितधियो भ्रमामः कर्मवर्त्मसु ॥५०
स वै न आद्यः पुरुषः स्वमायामोहितात्मनाम् ।
अविज्ञातानुभावानां क्षन्तुमर्हत्यतिक्रमम् ॥५१
इति स्वाघमनुस्मृत्य कृष्णे ते कृतहेलनाः ।
दिदृक्षवोऽप्यच्युतयोः कंसाद् भीता न चाचलन् ॥५२
परीक्षित्! उन ब्राह्मणोंने श्रीकृष्णका तिरस्कार किया था । अतः उन्हें अपने अपराधकी स्मृतिसे बड़ा पश्चात्ताप हुआ और उनके हृदयमें श्रीकृष्ण- बलरामके दर्शनकी बड़ी इच्छा भी हुई; परन्तु कंसके डरके मारे वे उनका दर्शन करने न जा सके ॥५२ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे यज्ञपत्न्युद्धरणं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥२३ ॥
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१. कृष्णक्रीडायां यमुनागमनं नाम द्वाविंशतितमो । १. प्राचीन प्रतिमें ‘ स्वागतं वो...... ' इत्यादि श्लोकके पहले 'श्रीभगवानुवाच ' इतना अधिक पाठ है । २. याभ्येता । १. निरोद्धुमभिलंघ्य । २. न ह्यभ्य० । १. नूनं । १. प्राचीन प्रतिमें ' अहो वयं ' से लेकर...'निश्चला हरौ ' तकका पाठ नहीं है । २. स्तस्मै ।
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अथ चतुर्विंशोऽध्यायः इन्द्रयज्ञ -निवारण श्रीशुक उवाच
भगवानपि तत्रैव बलदेवेन संयुतः ।
अपश्यन्निवसन् गोपानिन्द्रयागकृतोद्यमान् ॥ १
तदभिज्ञोऽपि भगवान् सर्वात्मा सर्वदर्शनः ।
प्रश्रयावनतोऽपृच्छद् वृद्धान् नन्दपुरोगमान् ॥ २
कथ्यतां मे पितः कोऽयं सम्भ्रमो व उपागतः ।
किं फलं कस्य चोद्देशः केन वा साध्यते मखः ॥३
एतद् ब्रूहि महान् कामो मह्यं शुश्रूषवे पितः ।
न हि गोप्यं हि साधूनां कृत्यं सर्वात्मनामिह ॥४
अस्त्यस्वपरदृष्टीनाममित्रोदास्तविद्विषाम् ।
उदासीनोऽरिवद् वर्ज्य आत्मवत् सुहृदुच्यते ॥५
ज्ञात्वाज्ञात्वा च कर्माणि जनोऽयमनुतिष्ठति ।
विदुषः कर्मसिद्धिः स्यात्तथा नाविदुषो भवेत् ॥६
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजीके साथ वृन्दावनमें रहकर अनेकों प्रकारकी लीलाएँ कर रहे थे । उन्होंने एक दिन देखा कि वहाँके सब गोप इन्द्र-यज्ञ करनेकी तैयारी कर रहे हैं ॥१ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण सबके अन्तर्यामी और सर्वज्ञ हैं । उनसे
कोई बात छिपी नहीं थी, वे सब जानते थे । फिर भी विनयावनत होकर उन्होंने नन्दबाबा आदि बड़े - बूढ़े गोपोंसे पूछा- ॥२ ॥ ' पिताजी! आपलोगोंके सामने यह कौन - सा बड़ा भारी
काम, कौन - सा उत्सव आ पहुँचा है? इसका फल क्या है? किस उद्देश्यसे, कौन लोग, किन साधनोंके द्वारा यह यज्ञ किया करते हैं? पिताजी! आप मुझे यह अवश्य बतलाइये ॥३ ॥
आप मेरे पिता हैं और मैं आपका पुत्र । ये बातें सुननेके लिये मुझे बड़ी उत्कण्ठा भी है । पिताजी! जो संत पुरुष सबको अपनी आत्मा मानते हैं, जिनकी दृष्टिमें अपने और परायेका भेद नहीं है, जिनका न कोई मित्र है, न शत्रु और न उदासीन– उनके पास छिपानेकी तो कोई बात होती ही नहीं । परन्तु यदि ऐसी स्थिति न हो तो रहस्यकी बात शत्रुकी भाँति उदासीनसे भी नहीं कहनी चाहिये । मित्र तो अपने समान ही कहा गया है, इसलिये उससे कोई बात छिपायी नहीं जाती ॥४-५ ॥ यह संसारी मनुष्य समझे- बेसमझे अनेकों प्रकारके कर्मोंका
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अनुष्ठान करता है । उनमेंसे समझ- बूझकर करनेवाले पुरुषोंके कर्म जैसे सफल होते हैं, वैसे बेसमझके नहीं ॥६ ॥ अतः इस समय आपलोग जो क्रियायोग करने जा रहे हैं, वह सुहृदोंके
साथ विचारित — शास्त्रसम्मत है अथवा लौकिक ही है - मैं यह सब जानना चाहता हूँ; आप कृपा करके स्पष्टरूपसे बतलाइये ' ॥७ ॥
तत्र तावत् क्रियायोगो भवतां किं विचारितः ।
अथवा लौकिकस्तन्मे पृच्छतः साधु भण्यताम् ॥।७
नन्द' उवाच
पर्जन्यो भगवानिन्द्रो मेघास्तस्यात्ममूर्तयः ।
तेऽभिवर्षन्ति भूतानां प्रीणनं जीवनं पयः ॥ ८
तं तात वयमन्ये च वार्मुचां पतिमीश्वरम् ।
द्रव्यैस्तद्रेतसा सिद्धैर्यजन्ते क्रतुभिर्नराः ॥९
तच्छेषेणोपजीवन्ति त्रिवर्गफलहेतवे ।
पुंसां पुरुषकाराणां पर्जन्यः फलभावनः ॥१०
य एवं विसृजेद् धर्मं पारम्पर्यागतं नरः ।
कामाल्लोभाद् भयाद् द्वेषात् स वै नाप्नोति शोभनम् ॥११
श्रीशुक उवाच
वचो निशम्य नन्दस्य तथान्येषां व्रजौकसाम् ।
इन्द्राय मन्युं जनयन् पितरं प्राह केशवः ॥ १२
श्रीभगवानुवाच
कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव विलीयते ।
सुखं दुःखं भयं क्षेमं कर्मणैवाभिपद्यते ॥१३
अस्ति चेदीश्वरः कश्चित् फलरूप्यन्यकर्मणाम् ।
कर्तारं भजते सोऽपि न ह्यकर्तुः प्रभुर्हि सः ॥१४
नन्दबाबाने कहा — बेटा! भगवान् इन्द्र वर्षा करनेवाले मेघोंके स्वामी हैं । ये मेघ उन्हींके अपने रूप हैं । वे समस्त प्राणियोंको तृप्त करनेवाला एवं जीवनदान करनेवाला जल बरसाते हैं ॥८ ॥ मेरे प्यारे पुत्र! हम और दूसरे लोग भी उन्हीं मेघपति भगवान् इन्द्रकी यज्ञोंके द्वारा
पूजा किया करते हैं । जिन सामग्रियोंसे यज्ञ होता है, वे भी उनके बरसाये हुए शक्तिशाली जलसे ही उत्पन्न होती हैं || ९ || उनका यज्ञ करनेके बाद जो कुछ बच रहता है, उसी अन्नसे
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हम सब मनुष्य अर्थ, धर्म और कामरूप त्रिवर्गकी सिद्धिके लिये अपना जीवन -निर्वाह करते हैं । मनुष्योंके खेती आदि प्रयत्नोंके फल देनेवाले इन्द्र ही हैं ॥१० ॥ यह धर्म हमारी
कुलपरम्परासे चला आया है। जो मनुष्य काम, लोभ, भय अथवा द्वेषवश ऐसे परम्परागत धर्मको छोड़ देता है, उसका कभी मंगल नहीं होता ॥ ११ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! ब्रह्मा, शंकर आदिके भी शासन करनेवाले केशव भगवान्ने नन्दबाबा और दूसरे व्रजवासियोंकी बात सुनकर इन्द्रको क्रोध दिलानेके लिये अपने पिता नन्दबाबासे कहा ॥१२ ॥
श्रीभगवान्ने कहा — पिताजी! प्राणी अपने कर्मके अनुसार ही पैदा होता और कर्मसे ही मर जाता है । उसे उसके कर्मके अनुसार ही सुख-दुःख, भय और मंगलके निमित्तोंकी प्राप्ति होती है ॥१३ ॥
यदि कर्मोंको ही सब कुछ न मानकर उनसे भिन्न जीवोंके कर्मका फल देनेवाला ईश्वर माना भी जाय तो वह कर्म करनेवालोंको ही उनके कर्मके अनुसार फल दे सकता है । कर्म न करने - वालोंपर उसकी प्रभुता नहीं चल सकती || १४ || जब सभी प्राणी अपने - अपने कर्मोंका ही फल भोग रहे हैं, तब हमें इन्द्रकी क्या आवश्यकता है? पिताजी! जब वे पूर्वसंस्कारके अनुसार प्राप्त होनेवाले मनुष्योंके कर्म-फलको बदल ही नहीं सकते — तब उनसे प्रयोजन? ॥१५ ॥ मनुष्य अपने स्वभाव ( पूर्व- संस्कारों ) के अधीन है । वह उसीका अनुसरण
करता है । यहाँतक कि देवता, असुर, मनुष्य आदिको लिये हुए यह सारा जगत् स्वभावमें ही स्थित है ॥१६ ॥ जीव अपने कर्मोंके अनुसार उत्तम और अधम शरीरोंको ग्रहण करता और
छोड़ता रहता है । अपने कर्मोंके अनुसार ही ' यह शत्रु है, यह मित्र है, यह उदासीन है ' – ऐसा व्यवहार करता है । कहाँतक कहूँ, कर्म ही गुरु है और कर्म ही ईश्वर ॥१७ ॥ इसलिये पिताजी!
मनुष्यको चाहिये कि पूर्व- संस्कारोंके अनुसार अपने वर्ण तथा आश्रमके अनुकूल धर्मोंका पालन करता हुआ कर्मका ही आदर करे । जिसके द्वारा मनुष्यकी जीविका सुगमतासे चलती है, वही उसका इष्टदेव होता है ॥ १८ ॥ जैसे अपने विवाहित पतिको छोड़कर जार पतिका
सेवन करनेवाली व्यभिचारिणी स्त्री कभी शान्तिलाभ नहीं करती, वैसे ही जो मनुष्य अपनी आजीविका चलानेवाले एक देवताको छोड़कर किसी दूसरेकी उपासना करते हैं, उससे उन्हें कभी सुख नहीं मिलता ॥१९ ॥ ब्राह्मण वेदोंके अध्ययन - अध्यापनसे, क्षत्रिय पृथ्वीपालनसे,
वैश्य वार्तावृत्तिसे और शूद्र ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंकी सेवासे अपनी जीविकाका निर्वाह करें ॥२० ॥ वैश्योंकी वार्तावृत्ति चार प्रकारकी है— कृषि, वाणिज्य, गोरक्षा और ब्याज लेना ।
हमलोग उन चारोंमेंसे एक केवल गोपालन ही सदासे करते आये हैं ॥२१ ॥ पिताजी! इस
संसारकी स्थिति, उत्पत्ति और अन्तके कारण क्रमशः सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण हैं । यह विविध प्रकारका सम्पूर्ण जगत् स्त्री- पुरुषके संयोगसे रजोगुणके द्वारा उत्पन्न होता है ॥२२ ॥ उसी रजोगुणकी प्रेरणासे मेघगण सब कहीं जल बरसाते हैं । उसीसे अन्न और
अन्नसे ही सब जीवोंकी जीविका चलती है । इसमें भला इन्द्रका क्या लेना - देना है? वह भला, क्या कर सकता है? ॥२३ ॥
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किमिन्द्रेणेह भूतानां स्वस्वकर्मानुवर्तिनाम् ।
अनीशेनान्यथा कर्तुं स्वभावविहितं नृणाम् ॥१५
स्वभावतन्त्रो हि जनः स्वभावमनुवर्तते ।
स्वभावस्थमिदं सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥१६
देहानुच्चावचाञ्जन्तुः प्राप्योत्सृजति कर्मणा ।
शत्रुर्मित्रमुदासीनः कर्मैव गुरुरीश्वरः ॥१७
तस्मात् सम्पूजयेत् कर्म स्वभावस्थः स्वकर्मकृत् ।
अञ्जसा येन वर्तेत तदेवास्य हि दैवतम् ॥१८
आजीव्यैकतरं भावं यस्त्वन्यमुपजीवति ।
न तस्माद् विन्दते क्षेमं जारं नार्यसती यथा ॥ १ ९
वर्तेत ब्रह्मणा विप्रो राजन्यो रक्षया भुवः ।
वैश्यस्तु वार्तया जीवेच्छूद्रस्तु द्विजसेवया ॥२०
कृषिवाणिज्यगोरक्षा' कुसीदं तुर्यमुच्यते ।
वार्ता चतुर्विधा तत्र वयं गोवृत्तयोऽनिशम् ॥२१
सत्त्वं रजस्तम इति स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः ।
रजसोत्पद्यते विश्वमन्योन्यं विविधं जगत् ॥२२
रजसा चोदिता मेघा वर्षन्त्यम्बूनि सर्वतः ।
प्रजास्तैरेव सिद्धयन्ति महेन्द्रः किं करिष्यति ॥२३
न नः पुरो जनपदा न ग्रामा न गृहा वयम् ।
नित्यं वनौकसस्तात वनशैलनिवासिनः ॥२४
तस्माद् गवां ब्राह्मणानामद्रेश्चारभ्यतां मखः ।
य इन्द्रयागसम्भारास्तैरयं साध्यतां मखः ॥२५
पच्यन्तां विविधाः पाकाः सूपान्ताः पायसादयः ।
संयावापूपशष्कुल्यः सर्वदोहश्च गृह्यताम् ॥२६
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हूयन्तामग्नयः सम्यग् ब्राह्मणैर्ब्रह्मवादिभिः ।
अन्नं बहुविधं तेभ्यो देयं वो धेनुदक्षिणाः ॥ २७
अन्येभ्यश्चाश्वचाण्डालपतितेभ्यो यथार्हतः ।
यवसं च गवां दत्त्वा गिरये दीयतां बलिः ॥२८
स्वलंकृता भुक्तवन्तः स्वनुलिप्ताः सुवाससः ।
प्रदक्षिणं च कुरुत गोविप्रानलपर्वतान् ॥२९
एतन्मम मतं तात क्रियतां यदि रोचते ।
अयं गोब्राह्मणाद्रीणां मह्यं च दयितो मखः ॥ ३०
श्रीशुक उवाच
कालात्मना भगवता शक्रदर्पं जिघांसता ।
प्रोक्तं निशम्य नन्दाद्याः साध्वगृह्णन्त तद्वचः ॥३१
तथा च व्यदधुः सर्वं यथाऽऽह मधुसूदनः ।
वाचयित्वा स्वस्त्ययनं तद् द्रव्येण गिरिद्विजान् ॥३२
उपहृत्य बलीन् सर्वानादृता यवसं गवाम् ।
गोधनानि पुरस्कृत्य गिरिं चक्रुः प्रदक्षिणम् ॥३३
पिताजी! न तो हमारे पास किसी देशका राज्य है और न तो बड़े - बड़े नगर ही हमारे अधीन हैं । हमारे पास गाँव या घर भी नहीं हैं । हम तो सदाके वनवासी हैं, वन और पहाड़ ही हमारे घर हैं ॥२४ ॥ इसलिये हमलोग गौओं, ब्राह्मणों और गिरिराजका यजन करनेकी तैयारी
करें । इन्द्र- यज्ञके लिये जो सामग्रियाँ इकट्ठी की गयी हैं, उन्हींसे इस यज्ञका अनुष्ठान होने दें ॥२५ ॥ अनेकों प्रकारके पकवान - खीर, हलवा, पूआ, पूरी आदिसे लेकर मूँगकी दालतक
बनाये जायँ । व्रजका सारा दूध एकत्र कर लिया जाय || २६|| वेदवादी ब्राह्मणोंके द्वारा भलीभाँति हवन करवाया जाय तथा उन्हें अनेकों प्रकारके अन्न, गौएँ और दक्षिणाएँ दी जायँ ॥२७ ॥ और भी, चाण्डाल, पतित तथा कुत्तोंतकको यथायोग्य वस्तुएँ देकर गायोंको
चारा दिया जाय और फिर गिरिराजको भोग लागाया जाय || २८ || इसके बाद खूब प्रसाद खा - पीकर, सुन्दर- सुन्दर वस्त्र पहनकर गहनोंसे सज- सजा लिया जाय और चन्दन लगाकर गौ, ब्राह्मण, अग्नि तथा गिरिराज गोवर्धनकी प्रदक्षिणा की जाय ॥ २ ९ ॥ पिताजी! मेरी तो ऐसी ही सम्मति है । यदि आप लोगोंको रुचे तो ऐसा ही कीजिये । ऐसा यज्ञ गौ, ब्राह्मण और गिरिराजको तो प्रिय होगा ही; मुझे भी बहुत प्रिय है ॥३० ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! कालात्मा भगवान्की इच्छा थी कि इन्द्रका घमण्ड