श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 451–460

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 451–460

पृष्ठ 451

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चूर- चूर कर दें । नन्दबाबा आदि गोपोंने उनकी बात सुनकर बड़ी प्रसन्नतासे स्वीकार कर ली ॥३१ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने जिस प्रकारका यज्ञ करनेको कहा था, वैसा ही यज्ञ उन्होंने

प्रारम्भ किया । पहले ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर उसी सामग्रीसे गिरिराज और ब्राह्मणोंको सादर भेंटें दीं तथा गौओंको हरी - हरी घास खिलायीं । इसके बाद नन्दबाबा आदि गोपोंने गौओंको आगे करके गिरिराजकी प्रदक्षिणा की ॥ ३२-३३ ॥ ब्राह्मणोंका आशीर्वाद प्राप्त करके वे और गोपियाँ भलीभाँति शृंगार करके और बैलोंसे जुती गाड़ियोंपर सवार होकर भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाओंका गान करती हुई गिरिराजकी परिक्रमा करने लगीं ॥३४ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण गोपोंको विश्वास दिलानेके लिये गिरिराजके ऊपर एक दूसरा

विशाल शरीर धारण करके प्रकट हो गये, तथा ' मैं गिरिराज हूँ' इस प्रकार कहते हुए सारी सामग्री आरोगने लगे ॥३५ ॥

अनांस्यनडुद्युक्तानि ते चारुह्य स्वलंकृताः ।

गोप्यश्च कृष्णवीर्याणि गायन्त्यः सद्विजाशिषः ॥३४

कृष्णस्त्वन्यतमं रूपं गोपविश्रम्भणं गतः ।

शैलोऽस्मीति ब्रुवन् भूरि बलिमादद् बृहद्वपुः ॥३५

तस्मै नमो व्रजजनैः सह चक्रेऽऽत्मनाऽऽत्मने ।

अहो पश्यत शैलोऽसौ रूपी नोऽनुग्रहंव्यधात् ॥३६

एषोऽवजानतो मर्त्यान् कामरूपी वनौकसः ।

हन्ति ह्यस्मै नमस्यामः शर्मणे आत्मनो गवाम् ॥३७

इत्यद्रिगोद्विजमखं वासुदेवप्रणोदिताः१ ।

यथा विधाय ते गोपाः सहकृष्णा व्रजं ययुः ॥३८

भगवान् श्रीकृष्णने अपने उस स्वरूपको दूसरे व्रजवासियोंके साथ स्वयं भी प्रणाम किया और कहने लगे — ' देखो, कैसा आश्चर्य है! गिरिराजने साक्षात् प्रकट होकर हमपर कृपा की है ॥३६॥ | ये चाहे जैसा रूप धारण कर सकते हैं । जो वनवासी जीव इनका निरादर करते हैं,

उन्हें ये नष्ट कर डालते हैं । आओ, अपना और गौओंका कल्याण करनेके लिये इन गिरिराजको हम नमस्कार करें' ॥ ३७ ॥ इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णकी प्रेरणासे नन्दबाबा

आदि बड़े- बूढ़े गोपोंने गिरिराज, गौ और ब्राह्मणोंका विधिपूर्वक पूजन किया तथा फिर श्रीकृष्णके साथ सब व्रजमें लौट आये ॥ ३८ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे’ चतुर्विंशोऽध्यायः ॥२४ ॥

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पृष्ठ 452

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१. बादरायणिरुवाच । १. नन्दगोप उवाच । २. बादरायणिरुवाच । १. रक्ष्यं । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 453

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अथ पञ्चविंशोऽध्यायः गोवर्धनधारण श्रीशुक उवाच

इन्द्रस्तदाऽऽत्मनः पूजां विज्ञाय विहतां नृप ।

गोपेभ्यः कृष्णनाथेभ्यो नन्दादिभ्यश्चकोप सः ॥ १

गणं सांवर्तकं नाम मेघानां चान्तकारिणाम् ।

इन्द्रः प्राचोदयत् क्रुद्धो वाक्यं चाहे मान्युत ॥ २

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! जब इन्द्रको पता लगा कि मेरी पूजा बंद कर दी गयी है, तब वे नन्दबाबा आदि गोपोंपर बहुत ही क्रोधित हुए । परन्तु उनके क्रोध करनेसे होता क्या, उन गोपोंके रक्षक तो स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण थे ॥१ ॥ इन्द्रको अपने

पदका बड़ा घमण्ड था, वे समझते थे कि मैं ही त्रिलोकीका ईश्वर हूँ । उन्होंने क्रोधसे तिलमिलाकर प्रलय करनेवाले मेघोंके सांवर्तक नामक गणको व्रजपर चढ़ाई करनेकी आज्ञा दी और कहा— || २ || ' ओह, इन जंगली ग्वालोंको इतना घमण्ड! सचमुच यह धनका ही नशा है । भला देखो तो सही, एक साधारण मनुष्य कृष्णके बलपर उन्होंने मुझ देवराजका अपमान कर डाला || ३ || जैसे पृथ्वीपर बहुत से मन्दबुद्धि पुरुष भवसागरसे पार जानेके सच्चे साधन ब्रह्मविद्याको तो छोड़ देते हैं और नाममात्रकी टूटी हुई नावसे - कर्ममय यज्ञोंसे इस घोर संसार- सागरको पार करना चाहते हैं || ४ || कृष्ण बकवादी, नादान, अभिमानी और मूर्ख होनेपर भी अपनेको बहुत बड़ा ज्ञानी समझता है । वह स्वयं मृत्युका ग्रास है । फिर भी उसीका सहारा लेकर इन अहीरोंने मेरी अवहेलना की है ॥५ ॥ एक तो ये यों ही धनके नशेमें चूर हो रहे थे; दूसरे कृष्णने इनको

और बढ़ावा दे दिया है । अब तुमलोग जाकर इनके इस धनके घमण्ड और हेकड़ीको धूलमें मिला दो तथा उनके पशुओंका संहार कर डालो ॥ ६ ॥ मैं भी तुम्हारे पीछे - पीछे

ऐरावत हाथीपर चढ़कर नन्दके व्रजका नाश करनेके लिये महापराक्रमी मरुद्गणोंके साथ आता हूँ' ॥७ ॥

अहो श्रीमदमाहात्म्यं गोपानां काननौकसाम् ।

कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य ये ' चक्रुर्देवहेलनम् ॥३

यथादृढैः कर्ममयैः क्रतुभिर्नामनौनिभैः ।

विद्यामान्वीक्षिकीं हित्वा तितीर्षन्ति भवार्णवम् ॥४

वाचालं बालिशं स्तब्धमज्ञं पण्डितमानिनम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 454

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कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य गोपा मे चक्रुरप्रियम् ॥५

एषां श्रियावलिप्तानां कृष्णेनाध्मायितात्मनाम् ।

धुनुत श्रीमदस्तम्भं पशून् नयत संक्षयम् ॥६

अहं चैरावतं नागमारुह्यानुव्रजे व्रजम् ।

मरुद्गणैर्महावीर्यैर्नन्दगोष्ठजिघांसयार ॥७

श्रीशुक उवाच

इत्थं मघवताऽऽज्ञप्ता मेघा निर्मुक्तबन्धनाः ।

नन्दगोकुलमासारैः पीडयामासुरोजसा ॥८

विद्योतमाना विद्युद्भिः स्तनन्तः स्तनयित्नुभिः ।

तीव्रैर्मरुद्गणैर्नुन्ना ववृषुर्जलशर्कराः ॥९

स्थूणास्थूला वर्षधारा मुञ्चत्स्वभ्रेष्वभीक्ष्णशः ।

जलौघैः प्लाव्यमाना भूर्नादृश्यत नतोन्नतम् ॥ १०

अत्यासारातिवातेन पशवो जातवेपनाः ।

गोपा गोप्यश्च शीतार्ता गोविन्दं शरणं ययुः ॥११

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! इन्द्रने इस प्रकार प्रलयके मेघोंको आज्ञा दी और उनके बन्धन खोल दिये । अब वे बड़े वेगसे नन्दबाबाके व्रजपर चढ़ आये और मूसलधार पानी बरसाकर सारे व्रजको पीड़ित करने लगे || ८ || चारों ओर बिजलियाँ चमकने लगीं, बादल आपसमें टकराकर कड़कने लगे और प्रचण्ड आँधीकी प्रेरणासे वे बड़े - बड़े ओले बरसाने लगे || ९ || इस प्रकार जब दल-के -दल बादल बार- बार आ- आकर खंभेके समान मोटी- मोटी धाराएँ गिराने लगे, तब व्रजभूमिका कोना- कोना पानीसे भर गया और कहाँ नीचा है, कहाँ ऊँचा- इसका पता चलना कठिन हो गया ॥१० ॥ इस प्रकार मूसलधार वर्षा तथा झंझावातके झपाटेसे जब एक- एक पशु

ठिठुरने और काँपने लगा, ग्वाल और ग्वालिनें भी ठंडके मारे अत्यन्त व्याकुल हो गयीं, तब वे सब - के - सब भगवान् श्रीकृष्णकी शरणमें आये ॥११ ॥ मूसलधार वर्षासे सताये

जानेके कारण सबने अपने- अपने सिर और बच्चोंको निहुककर अपने शरीरके नीचे छिपा लिया था और वे काँपते- काँपते भगवान्की चरणशरणमें पहुँचे ॥१२ ॥ और बोले

- ' प्यारे श्रीकृष्ण! तुम बड़े भाग्यवान् हो । अब तो कृष्ण! केवल तुम्हारे ही भाग्यसे हमारी रक्षा होगी । प्रभो! इस सारे गोकुलके एकमात्र स्वामी, एकमात्र रक्षक तुम्हीं हो । भक्तवत्सल! इन्द्रके क्रोधसे अब तुम्हीं हमारी रक्षा कर सकते हो ' ॥१३ ॥ भगवान्ने

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पृष्ठ 455

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देखा कि वर्षा और ओलोंकी मारसे पीड़ित होकर सब बेहोश हो रहे हैं । वे समझ गये कि यह सारी करतूत इन्द्रकी है । उन्होंने ही क्रोधवश ऐसा किया है ॥१४ ॥ वे मन- ही- मन कहने लगे — ‘ हमने इन्द्रका यज्ञ भंग कर दिया है, इसीसे वे व्रजका नाश करनेके

लिये बिना ऋतुके ही यह प्रचण्ड वायु और ओलोंके साथ घनघोर वर्षा कर रहे हैं ॥१५ ॥ अच्छा, मैं अपनी योगमायासे इसका भलीभाँति जवाब दूँगा । ये मूर्खतावश

अपनेको लोकपाल मानते हैं, इनके ऐश्वर्य और धनका घमण्ड तथा अज्ञान मैं चूर-चूर कर दूँगा ॥१६ ॥ देवतालोग तो सत्त्वप्रधान होते हैं । इनमें अपने ऐश्वर्य और पदका

अभिमान न होना चाहिये । अतः यह उचित ही है कि इन सत्त्वगुणसे च्युत दुष्ट देवताओंका मैं मान भंग कर दूँ। इससे अन्तमें उन्हें शान्ति ही मिलेगी ॥ १७ ॥ यह सारा

व्रज मेरे आश्रित है, मेरे द्वारा स्वीकृत है और एकमात्र मैं ही इसका रक्षक हूँ । अतः मैं अपनी योगमायासे इसकी रक्षा करूँगा । संतोंकी रक्षा करना तो मेरा व्रत ही है । अब उसके पालनका अवसर आ पहुँचा है * ॥१८ ॥

शिरः सुतांश्च कायेन प्रच्छाद्यासारपीडिताः ।

वेपमाना भगवतः पादमूलमुपाययुः ॥१२

कृष्ण कृष्ण महाभाग त्वन्नाथं गोकुलं प्रभो ।

त्रातुमर्हसि देवान्नः कुपिताद् भक्तवत्सल ॥१३

शिलावर्षनिपातेन हन्यमानमचेतनम् ।

निरीक्ष्य भगवान् मेने कुपितेन्द्रकृतं हरिः ॥१४

अपत्र्त्वत्युल्बणं वर्षमतिवातं शिलामयम् ।

स्वयागे विहतेऽस्माभिरिन्द्रो नाशाय वर्षति ॥१५

तत्र प्रतिविधिं सम्यगात्मयोगेन साधये ।

लोकेशमानिनां मौढ्याद्धरिष्ये श्रीमदं तमः ॥ १६

न हि सद्भावयुक्तानां सुराणामीशविस्मयः ।

मत्तोऽसतां मानभंगः प्रशमायोपकल्पते ॥१७

तस्मान्मच्छरणं गोष्ठं मन्नाथं मत्परिग्रहम् ।

गोपाये स्वात्मयोगेन सोऽयं मे व्रत आहितः ॥१८

इत्युक्त्वैकेन हस्तेन कृत्वा गोवर्धनाचलम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 456

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दधार लीलया कृष्णश्छत्राकमिव बालकः ॥१९ इस प्रकार कहकर भगवान् श्रीकृष्णने खेल- खेलमें एक ही हाथसे गिरिराज गोवर्द्धनको उखाड़ लिया और जैसे छोटे - छोटे बालक बरसाती छत्तेके पुष्पको उखाड़कर हाथमें रख लेते हैं, वैसे ही उन्होंने उस पर्वतको धारण कर लिया ॥१९ ॥

अथाह भगवान् गोपान् हेऽम्ब तात व्रजौकसः ।

यथोपजोषं विशत गिरिगर्तं सगोधनाः ॥२०

न त्रास इह वः कार्यो मद्धस्ताद्रिनिपातने ।

वातवर्षभयेनालं तत्त्राणं विहितं हि वः ॥ २१

तथा निर्विविशुर्गर्तं कृष्णाश्वासितमानसाः ।

यथावकाशं सधनाः सव्रजाः सोपजीविनः ॥२२

क्षुत्तृड्व्यथां सुखापेक्षां हित्वा तैर्व्रजवासिभिः ।

वीक्ष्यमाणो दधावद्रिं सप्ताहं नाचलत् पदात् ॥२३

कृष्णयोगानुभावं तं निशाम्येन्द्रोऽतिविस्मितः ।

निःस्तम्भो भ्रष्टसंकल्पः स्वान् मेघान् संन्यवारयत् ॥२४

खं व्यभ्रमुदितादित्यं वातवर्षं च दारुणम् ।

निशाम्योपरतं गोपान् गोवर्धनधरोऽब्रवीत् ॥२५

निर्यात त्यजत त्रासं गोपाः सस्त्रीधनार्भकाः ।

उपारतं वातवर्षं व्युदप्रायाश्च निम्नगाः ॥२६

ततस्ते निर्ययुर्गोपाः स्वं स्वमादाय गोधनम् ।

शकटोढोपकरणं स्त्रीबालस्थविराः शनैः ॥२७

भगवानपि तं शैलं स्वस्थाने पूर्ववत् प्रभुः ।

पश्यतां सर्वभूतानां स्थापयामास लीलया ॥२८

इसके बाद भगवान्ने गोपोंसे कहा- ' माताजी, पिताजी और व्रजवासियो! तुमलोग अपनी गौओं और सब सामग्रियोंके साथ इस पर्वतके गड्ढेमें आकर आरामसे बैठ जाओ ॥२० ॥ देखो, तुमलोग ऐसी शंका न करना कि मेरे हाथसे यह पर्वत गिर पड़ेगा ।

तुमलोग तनिक भी मत डरो । इस आँधी - पानीके डरसे तुम्हें बचानेके लिये ही मैंने यह ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 457

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युक्ति रची है ' ॥२१ ॥ जब भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार सबको आश्वासन दिया—

ढाढ़सबँधाया, तब सब - के --ससब ग्वाल अपने - अपने गोधन, छकड़ों, आश्रितों, पुरोहितों और भृत्योंको अपने - अपने साथ लेकर सुभीतेके अनुसार गोवर्द्धनके गड्ढेमें आ घुसे ॥२२ ॥

भगवान् श्रीकृष्णने सब व्रजवासियोंके देखते -देखते भूख- प्यासकी पीड़ा, आराम- विश्रामकी आवश्यकता आदि सब कुछ भुलाकर सात दिनतक लगातार उस पर्वतको उठाये रखा। वे एक डग भी वहाँसे इधर- उधर नहीं हुए ॥ २३ ॥ श्रीकृष्णकी

योगमायाका यह प्रभाव देखकर इन्द्रके आश्चर्यका ठिकाना न रहा । अपना संकल्प पूरा न होनेके कारण उनकी सारी हेकड़ी बंद हो गयी, वे भौंचक्के से रह गये । इसके बाद उन्होंने मेघोंको अपने - आप वर्षा करनेसे रोक दिया ॥ २४ ॥ जब गोवर्द्धनधारी भगवान्

श्रीकृष्णने देखा कि वह भयंकर आँधी और घनघोर वर्षा बंद हो गयी, आकाशसे बादल छँट गये और सूर्य दीखने लगे, तब उन्होंने गोपोंसे कहा— ॥२५ ॥ ‘ मेरे प्यारे गोपो!

अब तुमलोग निडर हो जाओ और अपनी स्त्रियों, गोधन तथा बच्चोंके साथ बाहर निकल आओ । देखो, अब आँधी- पानी बंद हो गया तथा नदियोंका पानी भी उतर गया' ॥२६ ॥ भगवान्की ऐसी आज्ञा पाकर अपने - अपने गोधन, स्त्रियों, बच्चों और

बूढ़ोंको साथ ले तथा अपनी सामग्री छकड़ोंपर लादकर धीरे- धीरे सब लोग बाहर निकल आये ॥२७ ॥

सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्णने भी सब प्राणियोंके देखते -देखते खेल- खेलमें ही गिरिराजको पूर्ववत् उसके स्थानपर रख दिया ॥२८ ॥

तं प्रेमवेगान्निभृता व्रजौकसो यथा समीयुः परिरम्भणादिभिः । गोप्यश्च सस्नेहमपूजयन् मुदा दध्यक्षताद्भिर्युयुजुः सदाशिषः ॥२९

यशोदा रोहिणी नन्दो रामश्च बलिनां वरः ।

कृष्णमालिङ्ग्य युयुजुराशिषः स्नेहकातराः ॥ ३०

दिवि देवगणाः साध्याः सिद्धगन्धर्वचारणाः ।

तुष्टुवुर्मुमुचुस्तुष्टाः पुष्पवर्षाणि पार्थिव ॥३१

शंखदुन्दुभयो नेदुर्दिवि देवप्रणोदिताः ।

जगुर्गन्धर्वपतयस्तुम्बुरुप्रमुखा नृप ॥३२

ततोऽनुरक्तैः पशुपैः परिश्रितो ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 458

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राजन् स गोष्ठं सबलोऽव्रजद्धरिः । तथाविधान्यस्य कृतानि गोपिका गायन्त्य ईयुर्मुदिता हृदिस्पृशः ॥३३ व्रजवासियोंका हृदय प्रेमके आवेगसे भर रहा था । पर्वतको रखते ही वे भगवान् श्रीकृष्णके पास दौड़ आये । कोई उन्हें हृदयसे लगाने और कोई चूमने लगा । सबने उनका सत्कार किया । बड़ी- बूढ़ी गोपियोंने बड़े आनन्द और स्नेहसे दही, चावल, जल आदिसे उनका मंगल- तिलक किया और उन्मुक्त हृदयसे शुभ आशीर्वाद दिये ॥२९ ॥

यशोदारानी, रोहिणीजी, नन्दबाबा और बलवानोंमें श्रेष्ठ बलरामजीने स्नेहातुर होकर श्रीकृष्णको हृदयसे लगा लिया तथा आशीर्वाद दिये || ३० || परीक्षित्! उस समय आकाशमें स्थित देवता, साध्य, सिद्ध, गन्धर्व और चारण आदि प्रसन्न होकर भगवान्‌की स्तुति करते हुए उनपर फूलोंकी वर्षा करने लगे ॥३१ ॥ राजन्! स्वर्गमें देवतालोग शंख

और नौबत बजाने लगे । तुम्बुरु आदि गन्धर्वराज भगवान्‌की मधुर लीलाका गान करने लगे ॥३२ ॥ इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने व्रजकी यात्रा की । उनके बगलमें बलरामजी

चल रहे थे और उनके प्रेमी ग्वालबाल उनकी सेवा कर रहे थे । उनके साथ ही प्रेममयी गोपियाँ भी अपने हृदयको आकर्षित करनेवाले, उसमें प्रेम जगानेवाले भगवान्की गोवर्द्धन- धारण आदि लीलाओंका गान करती हुई बड़े आनन्दसे व्रजमें लौट आयीं ॥३३ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे पञ्चविंशोऽध्यायः ॥२५ ॥

१. प्रचो० । २. इन्द्रमखभंगश्चतु ० । ३. बादरायणिरुवाच । १. मखभंगमचीकरन् । २. हावेगैर्न० । * भगवान् कहते हैं— सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति चयाचते । अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतं मम ॥ ' जो केवल एक बार मेरी शरणमें आ जाता है और ' मैं तुम्हारा हूँ' इस प्रकार याचना करता है, उसे मैं सम्पूर्ण प्राणियोंसे अभय कर देता हूँ- यह मेरा व्रत है । ' १. धाराद्रिं । ******ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 459

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पृष्ठ 460

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अथ षड्विंशोऽध्यायः नन्दबाबासे गोपोंकी श्रीकृष्णके प्रभावके विषयमें बातचीत श्रीशुक उवाच

एवंविधानि कर्माणि गोपाः कृष्णस्य वीक्ष्य ते ।

अतद्वीर्यविदः प्रोचुः समभ्येत्य सुविस्मिताः ॥ १

बालकस्य यदेतानि कर्माण्यत्यद्भुतानि वै ।

कथमर्हत्यसौ जन्म ग्राम्येष्वात्मजुगुप्सितम् ॥२

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! व्रजके गोप भगवान् श्रीकृष्णके ऐसे अलौकिक कर्म देखकर बड़े आश्चर्यमें पड़ गये । उन्हें भगवान्‌की अनन्त शक्तिका तो पता था नहीं, वे इकट्ठे होकर आपसमें इस प्रकार कहने लगे- ॥ १ ॥ ' इस बालकके ये कर्म बड़े अलौकिक हैं ।

इसका हमारे - जैसे गँवार ग्रामीणोंमें जन्म लेना तो इसके लिये बड़ी निन्दाकी बात है । यह भला, कैसे उचित हो सकता है ॥२ ॥ जैसे गजराज कोई कमल उखाड़कर उसे ऊपर उठा ले

और धारण करे, वैसे ही इस नन्हें - से सात वर्षके बालकने एक ही हाथसे गिरिराज गोवर्द्धनको उखाड़ लिया और खेल- खेलमें सात दिनोंतक उठाये रखा ॥३ ॥ यह साधारण मनुष्यके लिये

भला कैसे सम्भव है? जब यह नन्हा सा बच्चा था, उस समय बड़ी भयंकर राक्षसी पूतना आयी और इसने आँख बंद किये - किये ही उसका स्तन तो पिया ही, प्राण भी पी डाले —ठीक वैसे ही, जैसे काल शरीरकी आयुको निगल जाता है || ४ || जिस समय यह केवल तीन महीनेका था और छकड़ेके नीचे सोकर रो रहा था, उस समय रोते - रोते इसने ऐसा पाँव उछाला कि उसकी ठोकरसे वह बड़ा भारी छकड़ा उलटकर गिर ही पड़ा ॥५ ॥ उस समय तो

यह एक ही वर्षका था, जब दैत्य बवंडरके रूपमें इसे बैठे - बैठे आकाशमें उड़ा ले गया था । तुम सब जानते ही हो कि इसने उस तृणावर्त दैत्यको गला घोंटकर मार डाला ॥६ ॥ उस

दिनकी बात तो सभी जानते हैं कि माखनचोरी करनेपर यशोदारानीने इसे ऊखलसे बाँध दिया था । यह घुटनोंके बल बकैयाँ खींचते - खींचते उन दोनों विशाल अर्जुन वृक्षोंके बीचमेंसे निकल गया और उन्हें उखाड़ ही डाला || ७ || जब यह ग्वालबाल और बलरामजीके साथ बछड़ोंको चरानेके लिये वनमें गया हुआ था उस समय इसको मार डालनेके लिये एक दैत्य बगुलेके रूपमें आया और इसने दोनों हाथोंसे उसके दोनों ठोर पकड़कर उसे तिनकेकी तरह चीर डाला ॥८ ॥ जिस समय इसको मार डालनेकी इच्छासे एक दैत्य बछड़ेके रूपमें

बछड़ोंके झुंडमें घुस गया था उस समय इसने उस दैत्यको खेल- ही खेलमें मार डाला और उसे कैथके पेड़ोंपर पटककर उन पेड़ोंको भी गिरा दिया || ९ || इसने बलरामजीके साथ मिलकर गधेके रूपमें रहनेवाले धेनुकासुर तथा उसके भाई- बन्धुओंको मार डाला और पके हुए फलोंसे पूर्ण तालवनको सबके लिये उपयोगी और मंगलमय बना दिया ॥१० ॥ इसीने

बलशाली बलरामजीके द्वारा क्रूर प्रलम्बासुरको मरवा डाला तथा दावानलसे गौओं और ****** ebook converter DEMO Watermarks *******