श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 461–470
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 461–470
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ग्वालबालोंको उबार लिया ॥ ११ ॥ यमुनाजलमें रहनेवाला कालियनाग कितना विषैला था?
परन्तु इसने उसका भी मान मर्दन कर उसे बलपूर्वक दहसे निकाल दिया और यमुनाजीका जल सदाके लिये विषरहित - अमृतमय बना दिया ॥ १२ ॥ नन्दजी! हम यह भी देखते हैं कि
तुम्हारे इस साँवले बालकपर हम सभी व्रजवासियोंका अनन्त प्रेम है और इसका भी हमपर स्वाभाविक ही स्नेह है । क्या आप बतला सकते हैं कि इसका क्या कारण है ॥ १३ ॥ भला,
कहाँ तो यह सात वर्षका नन्हा-सा बालक और कहाँ इतने बड़े गिरिराजको सात दिनोंतक उठाये रखना! व्रजराज! इसीसे तो तुम्हारे पुत्रके सम्बन्धमें हमें बड़ी शंका हो रही है ॥१४ ॥
यः सप्तहायनो बालः करेणैकेन लीलया ।
कथं बिभ्रद् गिरिवरं पुष्करं गजराडिव ॥३
तोकेनामीलिताक्षेण पूतनाया महौजसः ।
पीतः स्तनः सह प्राणैः कालेनेव वयस्तनोः ॥४
हिन्वतोऽधः शयानस्य मास्यस्य चरणावुदक् ।
अनोऽपतद् विपर्यस्तं रुदतः प्रपदाहतम् ॥५
एकहायन आसीनो ह्रियमाणो विहायसा ।
दैत्येन यस्तृणावर्तमहन् कण्ठग्रहातुरम् ॥६
क्वचिद्धैयंगवस्तैन्ये मात्रा बद्ध उलूखले ।
गच्छन्नर्जुनयोर्मध्ये बाहुभ्यां तावपातयत् ॥७
वने संचारयन् वत्सान् सरामो बालकैर्वृतः ।
हन्तुकामं बकं दोर्भ्यां मुखतोऽरिमपाटयत् ॥८
वत्सेषु वत्सरूपेण प्रविशन्तं जिघांसया ।
हत्वा न्यपातयत्तेन कपित्थानि च लीलया ॥९
हत्वा रासभदैतेयं तद्बन्धूंश्च बलान्वितः ।
चक्रे तालवनं क्षेमं परिपक्वफलान्वितम् ॥१०
प्रलम्बं घातयित्वोग्रं बलेन बलशालिना ।
अमोचयद् व्रजपशून् गोपांश्चारण्यवह्नितः ॥ ११
आशीविषतमाहीन्द्रं दमित्वा विमदं ह्रदात् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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प्रसह्योद्वास्य यमुनां चक्रेऽसौ निर्विषोदकाम् ॥ १२
दुस्त्यजश्चानुरागोऽस्मिन् सर्वेषां नो व्रजौकसाम् ।
नन्द ते तनयेऽस्मासु तस्याप्यौत्पत्तिकः कथम् ॥१३
क्व सप्तहायनो बालः क्व महाद्रिविधारणम् ।
ततो नो जायते शंका व्रजनाथ तवात्मजे ॥१४
नन्द उवाच
श्रूयतां मे वचो गोपा व्येतु शंका च वोऽर्भके ।
एनं कुमारमुद्दिश्य गर्गो मे यदुवाच ह ॥१५
वर्णास्त्रयः किलास्यासन् गृह्णतोऽनुयुगं तनूः ।
शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गतः ॥ १६
प्रागयं वसुदेवस्य क्वचिज्जातस्तवात्मजः ।
वासुदेव इति श्रीमानभिज्ञाः सम्प्रचक्षते ॥१७
बहूनि सन्ति नामानि रूपाणि च सुतस्य ते ।
गुणकर्मानुरूपाणि तान्यहं वेद नो जनाः ॥१८
एष वः श्रेय आधास्यद् गोपगोकुलनन्दनः ।
अनेन सर्वदुर्गाणि यूयमञ्जस्तरिष्यथ ॥१९
पुरानेन व्रजपते साधवो दस्युपीडिताः ।
अराजके रक्ष्यमाणा जिग्युर्दस्यून् समेधिताः ॥ २०
नन्दबाबाने कहा — गोपो! तुमलोग सावधान होकर मेरी बात सुनो । मेरे बालकके विषयमें तुम्हारी शंका दूर हो जाय । क्योंकि महर्षि गर्गने इस बालकको देखकर इसके विषयमें ऐसा ही कहा था ॥१५ ॥ ' तुम्हारा यह बालक प्रत्येक युगमें शरीर ग्रहण करता है । विभिन्न
युगोंमें इसने श्वेत, रक्त और पीत - ये भिन्न- भिन्न रंग स्वीकार किये थे । इस बार यह कृष्णवर्ण हुआ है ॥१६ ॥ नन्दजी! यह तुम्हारा पुत्र पहले कहीं वसुदेवके घर भी पैदा हुआ था, इसलिये
इस रहस्यको जाननेवाले लोग 'इसका नाम श्रीमान् वासुदेव है' - ऐसा कहते हैं ॥१७ ॥
तुम्हारे पुत्रके गुण और कर्मोंके अनुरूप और भी बहुत -से नाम हैं तथा बहुत - से रूप । मैं तो उन नामोंको जानता हूँ, परन्तु संसारके साधारण लोग नहीं जानते ॥ १८ ॥ यह तुमलोगोंका
परम कल्याण करेगा, समस्त गोप और गौओंको यह बहुत ही आनन्दित करेगा । इसकी ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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सहायतासे तुमलोग बड़ी - बड़ी विपत्तियोंको बड़ी सुगमतासे पार कर लोगे ॥१९ ॥
‘ व्रजराज! पूर्वकालमें एक बार पृथ्वीमें कोई राजा नहीं रह गया था । डाकुओंने चारों ओर लूट- खसोट मचा रखी थी । तब तुम्हारे इसी पुत्रने सज्जन पुरुषोंकी रक्षा की और इससे बल पाकर उन लोगोंने लुटेरोंपर विजय प्राप्त की ॥ २० ॥
य एतस्मिन् महाभागाः प्रीतिं कुर्वन्ति मानवाः ।
नारयोऽभिभवन्त्येतान् विष्णुपक्षानिवासुराः ॥२१
तस्मान्नन्द कुमारोऽयं नारायणसमो गुणैः ।
श्रिया कीर्त्यानुभावेन तत्कर्मसु न विस्मयः ॥२२
इत्यद्धा मां समादिश्य गर्गे च स्वगृहं गते ।
मन्ये नारायणस्यांशं कृष्णमक्लिष्टकारिणम् ॥२३
इति नन्दवचः श्रुत्वा गर्गगीतं व्रजौकसः ।
दृष्टश्रुतानुभावास्ते कृष्णस्यामिततेजसः ।
मुदिता नन्दमानर्चुः कृष्णं च गतविस्मयाः ॥२४
देवे वर्षति यज्ञविप्लवरुषा वज्राश्मपर्षानिलैः सीदत्पालपशुस्त्रि आत्मशरणं दृष्ट्वानुकम्प्युत्स्मयन् । उत्पाट्यैककरेण शैलमबलो लीलोच्छिलीन्ध्रं यथा बिभ्रद् गोष्ठमपान्महेन्द्रमदभित् प्रीयान्न इन्द्रो गवाम् ॥२५ नन्दबाबा! जो तुम्हारे इस साँवले शिशुसे प्रेम करते हैं, वे बड़े भाग्यवान् हैं । जैसे विष्णुभगवान्के करकमलोंकी छत्रछायामें रहनेवाले देवताओंको असुर नहीं जीत सकते, वैसे ही इससे प्रेम करनेवालोंको भीतरी या बाहरी - किसी भी प्रकारके शत्रु नहीं जीत सकते ॥२१ ॥ नन्दजी! चाहे जिस दृष्टि से देखें – गुणसे, ऐश्वर्य और सौन्दर्यसे, कीर्ति और
प्रभावसे तुम्हारा बालक स्वयं भगवान् नारायणके ही समान है, अतः इस बालकके अलौकिक कार्योंको देखकर आश्चर्य न करना चाहिये ' || २२ || गोपो! मुझे स्वयं गर्गाचार्यजी यह आदेश देकर अपने घर चले गये । तबसे मैं अलौकिक और परम सुखद कर्म करनेवाले इस बालकको भगवान् नारायणका ही अंश मानता हूँ || २३ || जब व्रजवासियोंने नन्दबाबाके मुखसे गर्गजीकी यह बात सुनी, तब उनका विस्मय जाता रहा । क्योंकि अब वे अमिततेजस्वी ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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श्रीकृष्णके प्रभावको पूर्णरूपसे देख और सुन चुके थे । आनन्दमें भरकर उन्होंने नन्दबाबा और श्रीकृष्णकी भूरि- भूरि प्रशंसा की ॥२४ ॥
जिस समय अपना यज्ञ भंग हो जानेके कारण इन्द्र क्रोधके मारे आग - बबूला हो गये थे और मूसलधार वर्षा करने लगे थे, उस समय वज्रपात, ओलोंकी बौछार और प्रचण्ड आँधीसे स्त्री, पशु तथा ग्वाले अत्यन्त पीड़ित हो गये थे । अपनी शरणमें रहनेवाले व्रजवासियोंकी यह दशा देखकर भगवान्का हृदय करुणासे भर आया । परन्तु फिर एक नयी लीला करनेके विचारसे वे तुरंत ही मुसकराने लगे । जैसे कोई नन्हा- सा निर्बल बालक खेल- खेलमें ही बरसाती छत्तेका पुष्प उखाड़ ले, वैसे ही उन्होंने एक हाथसे ही गिरिराज गोवर्द्धनको उखाड़कर धारण कर लिया और सारे व्रजकी रक्षा की । इन्द्रका मद चूर करनेवाले वे ही भगवान् गोविन्द हमपर प्रसन्न हों ॥२५ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे षड्विंशोऽध्यायः ॥२६ ॥
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अथ सप्तविंशोऽध्यायः श्रीकृष्णका अभिषेक श्रीशुक उवाच
गोवर्धने धृते शैल आसाराद् रक्षिते व्रजे ।
गोलोकादाव्रजत् कृष्णं सुरभिः शक्र एव च ॥१
विविक्त उपसङ्गम्य व्रीडितः कृतहेलनः ।
पस्पर्श पादयोरेनं किरीटेनार्कवर्चसा ॥२
दृष्टश्रुतानुभावोऽस्य कृष्णस्यामिततेजसः ।
नष्टत्रिलोकेशमद इन्द्र आह कृतांजलिः ॥३
इन्द्र उवाच विशुद्धसत्त्वं तव धाम शान्तं तपोमयं ध्वस्तरजस्तमस्कम् । मायामयोऽयं गुणसम्प्रवाहो न विद्यते तेऽग्रहणानुबन्धः ॥४ कुतो नु तद्धेतव ईश तत्कृता लोभादयो येऽबुधलिङ्गभावाः । तथापि दण्डं भगवान् बिभर्ति धर्मस्य गुप्त्यै खलनिग्रहाय ॥५ पिता गुरुस्त्वं जगतामधीशो दुरत्ययः काल उपात्तदण्डः । हिताय स्वेच्छातनुभिः समीहसे मानं विधुन्वञ्जगदीशमानिनाम् ॥ ६ श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! जब भगवान् श्रीकृष्णने गिरिराज गोवर्द्धनको धारण करके मूसलधार वर्षासे व्रजको बचा लिया, तब उनके पास गोलोकसे कामधेनु ( बधाई देनेके लिये ) और स्वर्गसे देवराज इन्द्र (अपने अपराधको क्षमा करानेके लिये) आये ॥ १ ॥
भगवान्का तिरस्कार करनेके कारण इन्द्र बहुत ही लज्जित थे । इसलिये उन्होंने एकान्त-स्थानमें भगवान्के पास जाकर अपने सूर्यके समान तेजस्वी मुकुटसे उनके चरणोंका स्पर्श किया ॥२ ॥ परम तेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णका प्रभाव देख- सुनकर इन्द्रका यह घमंड जाता
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रहा कि मैं ही तीनों लोकोंका स्वामी हूँ । अब उन्होंने हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की ॥३ ॥
इन्द्रने कहा— भगवन्! आपका स्वरूप परम शान्त, ज्ञानमय, रजोगुण तथा तमोगुणसे रहित एवं विशुद्ध अप्राकृत सत्त्वमय है । यह गुणोंके प्रवाहरूपसे प्रतीत होनेवाला प्रपंच केवल मायामय है; क्योंकि आपका स्वरूप न जाननेके कारण ही आपमें इसकी प्रतीति होती है ॥४ ॥ जब आपका सम्बन्ध अज्ञान और उसके कारण प्रतीत होनेवाले देहादिसे है ही नहीं,
फिर उन देह आदिकी प्राप्तिके कारण तथा उन्हींसे होनेवाले लोभ- क्रोध आदि दोष तो आपमें हो ही कैसे सकते हैं? प्रभो! इन दोषोंका होना तो अज्ञानका लक्षण है । इस प्रकार यद्यपि अज्ञान और उससे होनेवाले जगत्से आपका कोई सम्बन्ध नहीं है, फिर भी धर्मकी रक्षा और दुष्टोंका दमन करनेके लिये आप अवतार ग्रहण करते हैं और निग्रह- अनुग्रह भी करते ॥५ ॥ आप जगत्के पिता, गुरु और स्वामी हैं। आप जगत्का नियन्त्रण करनेके लिये दण्ड
धारण किये हुए दुस्तर काल हैं । आप अपने भक्तोंकी लालसा पूर्ण करनेके लिये स्वच्छन्दतासे लीला- शरीर प्रकट करते हैं और जो लोग हमारी तरह अपनेको ईश्वर मान बैठते हैं, उनका मान मर्दन करते हुए अनेकों प्रकारकी लीलाएँ करते हैं ॥ ६ ॥ प्रभो! जो मेरे - जैसे अज्ञानी
और अपनेको जगत्का ईश्वर माननेवाले हैं, वे जब देखते हैं कि बड़े -बड़े भयके अवसरोंपर भी आप निर्भय रहते हैं, तब वे अपना घमंड छोड़ देते हैं और गर्वरहित होकर संतपुरुषोंके द्वारा सेवित भक्तिमार्गका आश्रय लेकर आपका भजन करते हैं । प्रभो! आपकी एक-एक चेष्टा दुष्टोंके लिये दण्डविधान है || ७ || प्रभो! मैंने ऐश्वर्यके मदसे चूर होकर आपका अपराध किया है; क्योंकि मैं आपकी शक्ति और प्रभावके सम्बन्धमें बिलकुल अनजान था । परमेश्वर! आप कृपा करके मुझ मूर्ख अपराधीका यह अपराध क्षमा करें और ऐसी कृपा करें कि मुझे फिर कभी ऐसे दुष्ट अज्ञानका शिकार न होना पड़े ॥८ ॥ स्वयंप्रकाश, इन्द्रियातीत परमात्मन्!
आपका यह अवतार इसलिये हुआ है कि जो असुर- सेनापति केवल अपना पेट पालनेमें ही लग रहे हैं और पृथ्वीके लिये बड़े भारी भारके कारण बन रहे हैं, उनका वध करके उन्हें मोक्ष दिया जाय और जो आपके चरणोंके सेवक हैं — आज्ञाकारी भक्तजन हैं, उनका अभ्युदय हो —उनकी रक्षा हो ॥ ९ ॥ भगवन्! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आप सर्वान्तर्यामी
पुरुषोत्तम तथा सर्वात्मा वासुदेव हैं । आप यदुवंशियोंके एकमात्र स्वामी, भक्तवत्सल एवं
सबके चित्तको आकर्षित करनेवाले हैं । मैं आपको बार- बार नमस्कार करता हूँ ॥१० ॥
आपने जीवोंके समान कर्मवश होकर नहीं, स्वतन्त्रतासे अपने भक्तोंकी तथा अपनी इच्छाके अनुसार शरीर स्वीकार किया है। आपका यह शरीर भी विशुद्ध- ज्ञानस्वरूप है । आप सब कुछ हैं, सबके कारण हैं और सबके आत्मा हैं । मैं आपको बार- बार नमस्कार करता ॥११ ॥ भगवन्! मेरे अभिमानका अन्त नहीं है और मेरा क्रोध भी बहुत ही तीव्र, मेरे वशके
बाहर है । जब मैंने देखा कि मेरा यज्ञ तो नष्ट कर दिया गया, तब मैंने मूसलधार वर्षा और आँधीके द्वारा सारे व्रजमण्डलको नष्ट कर देना चाहा || १२ || परन्तु प्रभो! आपने मुझपर बहुत ही अनुग्रह किया । मेरी चेष्टा व्यर्थ होनेसे मेरे घमंडकी जड़ उखड़ गयी । आप मेरे स्वामी
हैं, गुरु हैं और मेरे आत्मा हैं । मैं आपकी शरणमें हूँ ॥१३ ॥
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ये मद्विधाज्ञा जगदीशमानिन- स्त्वां वीक्ष्य कालेऽभयमाशु तन्मदम् । हित्वाऽऽर्यमार्गं प्रभजन्त्यपस्मया ईहा खलानामपि तेऽनुशासनम् ॥७ स त्वं ममैश्वर्यमदप्लुतस्य कृतागसस्तेऽविदुषः प्रभावम् । क्षन्तुं प्रभोऽथार्हसि मूढचेतसो मैवं पुनर्भून्मतिरीश मेऽसती ॥८ तवावतारोऽयमधोक्षजेह स्वयम्भराणामुरुभारजन्मनाम् । चमूपतीनामभवाय देव भवाय युष्मच्चरणानुवर्तिनाम् ॥ ९
नमस्तुभ्यं भगवते पुरुषाय महात्मने ।
वासुदेवाय कृष्णाय सात्वतां पतये नमः ॥१०
स्वच्छन्दोपात्तदेहाय विशुद्धज्ञानमूर्तये ।
सर्वस्मै सर्वबीजाय सर्वभूतात्मने नमः ॥११
मयेदं भगवन् गोष्ठनाशायासारवायुभिः ।
चेष्टितं विहते यज्ञे मानिना तीव्रमन्युना ॥१२
त्वयेशानुगृहीतोऽस्मि ध्वस्तस्तम्भो वृथोद्यमः ।
ईश्वरं गुरुमात्मानं त्वामहं शरणं गतः ॥ १३
श्रीशुक उवाच एवं संकीर्तितः कृष्णो मघोना भगवानमुम् मेघगम्भीरया वाचा प्रहसन्निदमब्रवीत् ॥१४ श्रीभगवानुवाच
मया तेऽकारि मघवन् मखभङ्गोऽनुगृह्णता ।
मदनुस्मृतये नित्यं मत्तस्येन्द्रश्रिया भृशम् ॥१५
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मामैश्वर्यश्रीमदान्धो दण्डपाणिं न पश्यति ।
तं भ्रंशयामि सम्पद्भ्यो यस्य चेच्छाम्यनुग्रहम् ॥१६
गम्यतां शक्र भद्रं वः क्रियतां मेऽनुशासनम् ।
स्थीयतां स्वाधिकारेषु युक्तैर्वः स्तम्भवर्जितैः ॥१७
अथाह सुरभिः कृष्णमभिवन्द्य मनस्विनी ।
स्वसन्तानैरुपामन्त्र्य गोपरूपिणमीश्वरम् ॥१८
सुरभिरुवाच
कृष्ण कृष्ण महायोगिन् विश्वात्मन् विश्वसम्भव ।
भवता लोकनाथेन सनाथा वयमच्युत ॥१९
त्वं नः परमकं दैवं त्वं न इन्द्रो जगत्पते ।
भवाय भव गोविप्रदेवानां ये च साधवः ॥२०
इन्द्रं नस्त्वाभिषेक्ष्यामो ब्रह्मणा नोदिता वयम् ।
अवतीर्णोऽसि विश्वात्मन् भूमेर्भारापनुत्तये ॥२१
श्रीशुक उवाच
एवं कृष्णमुपामन्त्र्य सुरभिः पयसाऽऽत्मनः ।
जलैराकाशगङ्गाया ऐरावतकरोद्धृतैः ॥ २२
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! जब देवराज इन्द्रने भगवान् श्रीकृष्णकी इस प्रकार स्तुति की, तब उन्होंने हँसते हुए मेघके समान गम्भीर वाणीसे इन्द्रको सम्बोधन करके कहा ॥१४ ॥
श्रीभगवान्ने कहा – इन्द्र! तुम ऐश्वर्य और धन - सम्पत्तिके मदसे पूरे - पूरे मतवाले हो रहे थे । इसलिये तुमपर अनुग्रह करके ही मैंने तुम्हारा यज्ञ भंग किया है । यह इसलिये कि अब तुम मुझे नित्य- निरन्तर स्मरण रख सको ॥ १५ ॥ जो ऐश्वर्य और धन- सम्पत्तिके मदसे अंधा हो
जाता है, वह यह नहीं देखता कि मैं कालरूप परमेश्वर हाथमें दण्ड लेकर उसके सिरपर सवार हूँ । मैं जिसपर अनुग्रह करना चाहता हूँ, उसे ऐश्वर्यभ्रष्ट कर देता हूँ ॥१६ ॥ इन्द्र!
तुम्हारा मंगल हो । अब तुम अपनी राजधानी अमरावतीमें जाओ और मेरी आज्ञाका पालन करो । अब कभी घमंड न करना । नित्य- निरन्तर मेरी सन्निधिका, मेरे संयोगका अनुभव करते रहना और अपने अधिकारके अनुसार उचित रीतिसे मर्यादाका पालन करना ॥१७ ॥
परीक्षित्! भगवान् इस प्रकार आज्ञा दे ही रहे थे कि मनस्विनी कामधेनुने अपनी सन्तानोंके साथ गोपवेषधारी परमेश्वर श्रीकृष्णकी वन्दना की और उनको सम्बोधित करके ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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कहा— ॥१८ ॥
कामधेनुने कहा —सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण! आप महायोगी– योगेश्वर हैं । आप स्वयं विश्व हैं, विश्वके परमकारण हैं, अच्युत हैं । सम्पूर्ण विश्वके स्वामी आपको अपने रक्षकके रूपमें प्राप्तकर हम सनाथ हो गयी ॥१९ ॥ आप जगत्के स्वामी हैं, परन्तु हमारे तो परम
पूजनीय आराध्यदेव ही हैं । प्रभो! इन्द्र त्रिलोकीके इन्द्र हुआ करें, परन्तु हमारे इन्द्र तो आप ही अतः आप ही गौ, ब्राह्मण, देवता और साधुजनोंकी रक्षाके लिये हमारे इन्द्र बन
जाइये ॥२० ॥ हम गौएँ ब्रह्माजीकी प्रेरणासे आपको अपना इन्द्र मानकर अभिषेक करेंगी ।
विश्वात्मन्! आपने पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ही अवतार धारण किया है ॥२१ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णसे ऐसा कहकर कामधेनुने अपने दूधसे और देवमाताओंकी प्रेरणासे देवराज इन्द्रने ऐरावतकी सूँडके द्वारा लाये हुए आकाशगंगाके जलसे देवर्षियोंके साथ यदुनाथ श्रीकृष्णका अभिषेक किया और उन्हें ‘ गोविन्द ' नामसे सम्बोधित किया ॥२२-२३ ॥ उस समय वहाँ नारद, तुम्बुरु आदि गन्धर्व, विद्याधर, सिद्ध और चारण पहलेसे ही आ गये थे । वे समस्त संसारके पाप- तापको मिटा देनेवाले भगवान्के लोकमलापह यशका गान करने लगे और अप्सराएँ आनन्दसे भरकर नृत्य करने लगीं ॥२४ ॥
इन्द्रः सुरर्षिभिः साकं नोदितो देवमातृभिः ।
अभ्यषिञ्चत दाशार्हं गोविन्द इति चाभ्यधात् ॥२३
तत्रागतास्तुम्बुरुनारदादयो गन्धर्वविद्याधरसिद्धचारणाः । गर्यो लोकमलापहं हरेः सुराङ्गनाः संननृतुर्मुदान्विताः ॥ २४ तं तुष्टुवुर्देवनिकायकेतवो व्यवाकिरंश्चाद्भुतपुष्पवृष्टिभिः । लोकाः परां निर्वृतिमाप्नुवंस्त्रयो गावस्तदा गामनयन् पयोद्रुताम् ॥२५
नानारसौघाः सरितो वृक्षा आसन् मधुस्रवाः ।
अकृष्टपच्यौषधयो गिरयोऽबिभ्रदुन्मणीन् ॥२६
कृष्णेऽभिषिक्त एतानि सत्त्वानि कुरुनन्दन ।
निर्वैराण्यभवंस्तात क्रूराण्यपि निसर्गतः ॥२७
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इति गोगोकुलपतिं गोविन्दमभिषिच्य सः ।
अनुज्ञातो ययौ शक्रो वृतो देवादिभिर्दिवम् ॥२८
मुख्य- मुख्य देवता भगवान्की स्तुति करके उनपर नन्दनवनके दिव्य पुष्पोंकी वर्षा करने लगे । तीनों लोकोंमें परमानन्दकी बाढ़ आ गयी और गौओंके स्तनोंसे आप ही आप इतना दूध गिरा कि पृथ्वी गीली हो गयी ॥ २५ ॥ नदियोंमें विविध रसोंकी बाढ़ आ गयी । वृक्षोंसे मधुधारा
बहने लगी । बिना जोते- बोये पृथ्वीमें अनेकों प्रकारकी ओषधियाँ, अन्न पैदा हो गये । पर्वतोंमें छिपेहुए मणि- माणिक्य स्वयं ही बाहर निकल आये || २६ || परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णका अभिषेक होनेपर जो जीव स्वभावसे ही क्रूर हैं, वे भी वैरहीन हो गये, उनमें भी परस्पर मित्रता हो गयी ॥२७ ॥ इन्द्रने इस प्रकार गौ और गोकुलके स्वामी श्रीगोविन्दका अभिषेक
किया और उनसे अनुमति प्राप्त होनेपर देवता, गन्धर्व आदिके साथ स्वर्गकी यात्रा की ॥२८ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे इन्द्रस्तुतिर्नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥२७ ॥
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