श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 471–480

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 471–480

पृष्ठ 471

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अथाष्टाविंशोऽध्यायः वरुणलोकसे नन्दजीको छुड़ाकर लाना श्रीशुक उवाच

एकादश्यां निराहारः समभ्यर्च्य जनार्दनम् ।

स्नातुं नन्दस्तु कालिन्द्या द्वादश्यां जलमाविशत् ॥१

तं गृहीत्वानयद् भृत्यो वरुणस्यासुरोऽन्तिकम् ।

अविज्ञायासुरीं वेलां प्रविष्टमुदकं निशि ॥ २

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! नन्दबाबाने कार्तिक शुक्ल एकादशीका उपवास किया और भगवान्की पूजा की तथा उसी दिन रातमें द्वादशी लगनेपर स्नान करनेके लिये यमुना- जलमें प्रवेश किया || १ || नन्दबाबाको यह मालूम नहीं था कि यह असुरोंकी वेला है, इसलिये वे रातके समय ही यमुनाजलमें घुस गये । उस समय वरुणके सेवक एक असुरने उन्हें पकड़ लिया और वह अपने स्वामीके पास ले गया || २ || नन्दबाबाके खो जानेसे व्रजके सारे गोप ‘ श्रीकृष्ण! अब तुम्हीं अपने पिताको ला सकते हो; बलराम! अब तुम्हारा ही भरोसा है' – इस प्रकार कहते हुए रोने- पीटने लगे । भगवान् श्रीकृष्ण सर्वशक्तिमान् हैं एवं सदासे ही अपने भक्तोंका भय भगाते आये हैं । जब उन्होंने व्रजवासियोंका रोना पीटना सुना और यह जाना कि पिताजीको वरुणका कोई सेवक ले गया है, तब वे वरुणजीके पास गये || ३ || जब लोकपाल वरुणने देखा कि समस्त जगत्के अन्तरिन्द्रिय और बहिरिन्द्रियोंके प्रवर्तक भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही उनके यहाँ पधारे हैं, तब उन्होंने उनकी बहुत बड़ी पूजा की। भगवान्‌के दर्शनसे उनका रोम- रोम आनन्दसे खिल उठा । इसके बाद उन्होंने भगवान्से निवेदन किया ॥४ ॥

चुक्रुशुस्तमपश्यन्तः कृष्ण रामेति गोपकाः ।

भगवांस्तदुपश्रुत्य पितरं वरुणाहृतम् ।

तदन्तिकं गतो राजन् स्वानामभयदो विभुः ॥ ३

प्राप्तं वीक्ष्य हृषीकेशं लोकपालः सपर्यया ।

महत्या पूजयित्वाऽऽह तद्दर्शनमहोत्सवः ॥४

वरुण उवाच

अद्य मे निभृतो देहोऽद्यैवार्थोऽधिगतः प्रभो ।

त्वत्पादभाजो भगवन्नवापुः पारमध्वनः ॥५

पृष्ठ 472

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नमस्तुभ्यं भगवते ब्रह्मणे परमात्मने ।

न यत्र श्रूयते माया लोकसृष्टिविकल्पना ॥६

अजानता मामकेन मूढेनाकार्यवेदिना ।

आनीतोऽयं तव पिता तद् भवान् क्षन्तुमर्हति ॥७

ममाप्यनुग्रहं कृष्ण कर्तुमर्हस्यशेषदृक् ।

गोविन्द नीयतामेष पिता ते पितृवत्सल ॥८

श्रीशुक उवाच

एवं प्रसादितः कृष्णो भगवानीश्वरेश्वरः ।

आदायागात् स्वपितरं बन्धूनां चावहन् मुदम् ॥९

वरुणजीने कहा — प्रभो! आज मेरा शरीर धारण करना सफल हुआ । आज मुझे सम्पूर्ण पुरुषार्थ प्राप्त हो गया; क्योंकि आज मुझे आपके चरणोंकी सेवाका शुभ अवसर प्राप्त हुआ है । भगवन्! जिन्हें भी आपके चरणकमलोंकी सेवाका सुअवसर मिला, वे भवसागरसे पार हो गये ॥५ ॥ आप भक्तोंके भगवान्, वेदान्तियोंके ब्रह्म और योगियोंके परमात्मा हैं । आपके

स्वरूपमें विभिन्न लोकसृष्टियोंकी कल्पना करनेवाली माया नहीं है - ऐसा श्रुति कहती है । मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ६ ॥ प्रभो! मेरा यह सेवक बड़ा मूढ़ और अनजान है । वह अपने

कर्तव्यको भी नहीं जानता। वही आपके पिताजीको ले आया है, आप कृपा करके उसका अपराध क्षमा कीजिये ॥७॥ गोविन्द! मैं जानता हूँ कि आप अपने पिताके प्रति बड़ा

प्रेमभाव रखते हैं । ये आपके पिता हैं। इन्हें आप ले जाइये । परन्तु भगवन्! आप सबके अन्तर्यामी, सबके साक्षी हैं । इसलिये विश्वविमोहन श्रीकृष्ण! आप मुझ दासपर भी कृपा कीजिये ॥८ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण ब्रह्मा आदि ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं । लोकपाल वरुणने इस प्रकार उनकी स्तुति करके उन्हें प्रसन्न किया । इसके बाद भगवान् अपने पिता नन्दजीको लेकर व्रजमें चले आये और व्रजवासी भाई- बन्धुओंको आनन्दित किया ॥९ ॥ नन्दबाबाने वरुणलोकमें लोक- पालके इन्द्रियातीत ऐश्वर्य और सुख - सम्पत्तिको

देखा तथा यह भी देखा कि वहाँके निवासी उनके पुत्र श्रीकृष्णके चरणोंमें झुक- झुककर प्रणाम कर रहे हैं । उन्हें बड़ा विस्मय हुआ । उन्होंने व्रजमें आकर अपने जाति- भाइयोंको सब बातें कह सुनायीं ॥१० ॥

नन्दस्त्वतीन्द्रियं दृष्ट्वा लोकपालमहोदयम् ।

कृष्णे च सन्नतिं तेषां ज्ञातिभ्यो विस्मितोऽब्रवीत् ॥१०

ते त्वौत्सुक्यधियो राजन् मत्वा गोपास्तमीश्वरम् ।

पृष्ठ 473

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अपि नः स्वगतिं सूक्ष्मामुपाधास्यदधीश्वरः ॥११

इति स्वानां स भगवान् विज्ञायाखिलदृक् स्वयम् ।

संकल्पसिद्धये तेषां कृपयैतदचिन्तयत् ॥ १२

जनो वै लोक एतस्मिन्नविद्याकामकर्मभिः ।

उच्चावचासु गतिषु न वेद स्वां गतिं भ्रमन् ॥ १३

इति संचिन्त्य भगवान् महाकारुणिको हरिः ।

दर्शयामास लोकं स्वं गोपानां तमसः परम् ॥१४

सत्यं ज्ञानमनन्तं यद् ब्रह्म ज्योतिः सनातनम् ।

यद्धि पश्यन्ति मुनयो गुणापाये समाहिताः ॥ १५

ते तु ब्रह्मह्रदं नीता मग्नाः कृष्णेन चोद्धृताः ।

ददृशुर्ब्रह्मणो लोकं यत्राक्रूरोऽध्यगात् पुरा ॥ १६

परीक्षित्! भगवान्के प्रेमी गोप यह सुनकर ऐसा समझने लगे कि अरे, ये तो स्वयं भगवान् हैं । तब उन्होंने मन- ही - मन बड़ी उत्सुकतासे विचार किया कि क्या कभी जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हमलोगोंको भी अपना वह मायातीत स्वधाम, जहाँ केवल इनके प्रेमी - भक्त ही जा सकते हैं, दिखलायेंगे ॥११ ॥

परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं सर्वदर्शी हैं । भला, उनसे यह बात कैसे छिपी रहती? वे अपने आत्मीय गोपोंकी यह अभिलाषा जान गये और उनका संकल्प सिद्ध करनेके लिये कृपासे भरकर इस प्रकार सोचने लगे || १२ || ' इस संसारमें जीव अज्ञानवश शरीरमें आत्मबुद्धि करके भाँति- भाँतिकी कामना और उनकी पूर्तिके लिये नाना प्रकारके कर्म करता है। फिर उनके फलस्वरूप देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि ऊँची - नीची योनियोंमें भटकता फिरता है, अपनी असली गतिको – आत्मस्वरूपको नहीं पहचान पाता ॥१३ ॥

परमदयालु भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार सोचकर उन गोपोंको मायान्धकारसे अतीत अपना परमधाम दिखलाया ॥१४ ॥

भगवान्ने पहले उनको उस ब्रह्मका साक्षात्कार करवाया जिसका स्वरूप सत्य, ज्ञान, अनन्त, सनातन और ज्योतिःस्वरूप है तथा समाधिनिष्ठ गुणातीत पुरुष ही जिसे देख पाते हैं ॥१५ ॥

जिस जलाशयमें अक्रूरको भगवान्ने अपना स्वरूप दिखलाया था, उसी ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मह्रदमें भगवान् उन गोपोंको ले गये । वहाँ उन लोगोंने उसमें डुबकी लगायी । वे ब्रह्मह्रदमें प्रवेश कर गये । तब भगवान्‌ने उसमेंसे उनको निकालकर अपने परमधामका दर्शन कराया ॥१६ ॥

पृष्ठ 474

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नन्दादयस्तु तं दृष्ट्वा परमानन्दनिर्वृताः ।

कृष्णं च तत्रच्छन्दोभिः स्तूयमानं सुविस्मिताः ॥१७

उस दिव्य भगवत्स्वरूप लोकको देखकर नन्द आदि गोप परमानन्दमें मग्न हो गये । वहाँ उन्होंने देखा कि सारे वेद मूर्तिमान् होकर भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति कर रहे हैं । यह देखकर वे सब- के - सब परम विस्मित हो गये ॥१७ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धेऽष्टाविंशोऽध्यायः ॥२८ ॥

पृष्ठ 475

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अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः रासलीलाका आरम्भ श्रीशुक उवाच

भगवानपि ता रात्री: शरदोत्फुल्लमल्लिकाः ।

वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः ॥ १

तदोडुराजः ककुभः करैर्मुखं प्राच्या विलिम्पन्नरुणेन शन्तमैः । स चर्षणीनामुदगाच्छ्चो मृजन् प्रियः प्रियाया इव दीर्घदर्शनः ॥ २ दृष्ट्वा कुमुद्वन्तमखण्डमण्डलं रमाननाभं नवकुंकुमारुणम् । वनं च तत्कोमलगोभिरंजितं जगौ कलं वामदृशां मनोहरम् ॥३ श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! शरद् ऋतु थी। उसके कारण बेला, चमेली आदि सुगन्धित पुष्प खिलकर महँ- महँ महँक रहे थे । भगवान्ने चीरहरणके समय गोपियोंको जिन रात्रियोंका संकेत किया था, वे सब की सब पुंजीभूत होकर एक ही रात्रिके रूपमें उल्लसित हो रही थीं । भगवान्ने उन्हें देखा, देखकर दिव्य बनाया । गोपियाँ तो चाहती ही थीं । अब भगवान्ने भी अपनी अचिन्त्य महाशक्ति योगमायाके सहारे उन्हें निमित्त बनाकर रसमयी रासक्रीडा करनेका संकल्प किया। अमना होनेपर भी उन्होंने अपने प्रेमियोंकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये मन स्वीकार किया || १ || भगवान्के संकल्प करते ही चन्द्रदेवने प्राची दिशाके मुखमण्डलपर अपने शीतल किरणरूपी करकमलोंसे लालिमाकी रोली- केसर मल दी, जैसे बहुत दिनोंके बाद अपनी प्राणप्रिया पत्नीके पास आकर उसके प्रियतम पतिने उसे आनन्दित करनेके लिये ऐसा किया हो! इस प्रकार चन्द्रदेवने उदय होकर न केवल पूर्वदिशाका, प्रत्युत संसारके समस्त चर- अचर प्राणियोंका सन्ताप-जो दिनमें शरत्कालीन प्रखर सूर्य - रश्मियोंके कारण बढ़ गया था— दूर कर दिया ॥ २ ॥

उस दिन चन्द्रदेवका मण्डल अखण्ड था । पूर्णिमाकी रात्रि थी । वे नूतन केशरके समान लाल-लाल हो रहे थे, कुछ संकोचमिश्रित अभिलाषासे युक्त जान पड़ते थे । उनका मुखमण्डल लक्ष्मीजीके समान मालूम हो रहा था । उनकी कोमल किरणोंसे सारा वन अनुरागके रंगमें रँग गया था । वनके कोने - कोनेमें उन्होंने अपनी चाँदनीके द्वारा अमृतका समुद्र उड़ेल दिया था । भगवान् श्रीकृष्णने अपने दिव्य उज्ज्वल रसके उद्दीपनकी पूरी सामग्री उन्हें और उस वनको देखकर अपनी बाँसुरीपर व्रजसुन्दरियोंके मनको हरण करनेवाली

पृष्ठ 476

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कामबीज ' क्लीं ' की अस्पष्ट एवं मधुर तान छेड़ी || ३ || भगवान्का वह वंशीवादन भगवान्के प्रेमको, उनके मिलनकी लालसाको अत्यन्त उकसानेवाला - बढ़ानेवाला था । यों तो श्यामसुन्दरने पहलेसे ही गोपियोंके मनको अपने वशमें कर रखा था । अब तो उनके मनकी सारी वस्तुएँ — भय, संकोच, धैर्य, मर्यादा आदिकी वृत्तियाँ भी- छीन लीं। वंशीध्वनि सुनते ही उनकी विचित्र गति हो गयी । जिन्होंने एक साथ साधना की थी श्रीकृष्णको पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये, वे गोपियाँ भी एक- दूसरेको सूचना न देकर– यहाँतक कि एक- दूसरेसे अपनी चेष्टाको छिपाकर जहाँ वे थे, वहाँके लिये चल पड़ीं। परीक्षित्! वे इतने वेगसे चली थीं कि उनके कानोंके कुण्डल झोंके खा रहे थे ॥ ४ ॥

निशम्य गीतं तदनङ्गवर्धनं व्रजस्त्रियः कृष्णगृहीतमानसाः । आजग्मुरन्योन्यमलक्षितोद्यमाः स यत्र कान्तो जवलोलकुण्डलाः ॥४

दुहन्त्योऽभिययुः काश्चिद् दोहं हित्वा समुत्सुकाः ।

पयोऽधिश्रित्य संयावमनुद्वास्यापरा ययुः ॥५

परिवेषयन्त्यस्तद्धित्वा पाययन्त्यः शिशून् पयः ।

शुश्रूषन्त्यः पतीन् काश्चिदश्नन्त्योऽपास्य भोजनम् ॥ ६

लिम्पन्त्यः प्रमृजन्त्योऽन्या अंजन्त्यः काश्च लोचने ।

व्यत्यस्तवस्त्राभरणाः काश्चित् कृष्णान्तिकं ययुः ॥७

वंशीध्वनि सुनकर जो गोपियाँ दूध दुह रही थीं, वे अत्यन्त उत्सुकतावश दूध दुहना छोड़कर चल पड़ीं । जो चूल्हेपर दूध औंटा रही थीं, वे उफनता हुआ दूध छोड़कर और जो लपसी पका रही थीं वे पकी हुई लपसी बिना उतारे ही ज्यों- की-त्यों छोड़कर चल दीं ॥५ ॥

जो भोजन परस रही थीं वे परसना छोड़कर, जो छोटे -छोटे बच्चोंको दूध पिला रही थीं वे दूध पिलाना छोड़कर, जो पतियोंकी सेवा- शुश्रूषा कर रही थीं वे सेवा- शुश्रूषा छोड़कर और जो स्वयं भोजन कर रही थीं वे भोजन करना छोड़कर अपने कृष्णप्यारेके पास चल पड़ीं ॥६ ॥

कोई- कोई गोपी अपने शरीरमें अंगराग चन्दन और उबटन लगा रही थीं और कुछ आँखोंमें अंजन लगा रही थीं । वे उन्हें छोड़कर तथा उलटे - पलटे वस्त्र धारणकर श्रीकृष्णके पास पहुँचनेके लिये चल पड़ीं ॥७ ॥

ता वार्यमाणाः पतिभिः पितृभिर्भ्रातृबन्धुभिः ।

गोविन्दापहृतात्मानो न न्यवर्तन्त मोहिताः ॥८

पृष्ठ 477

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अन्तर्गृहगताः काश्चिद् गोप्योऽलब्धविनिर्गमाः ।

कृष्णं तद्भावनायुक्ता दध्युर्मीलितलोचनाः ॥९

दुःसहप्रेष्ठविरहतीव्रतापधुताशुभाः ।

ध्यानप्राप्ताच्युताश्लेषनिर्वृत्या क्षीणमङ्गलाः ॥ १०

तमेव परमात्मानं जारबुद्धयापि सङ्गताः ।

जहुर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः ॥११

राजोवाच

कृष्णं विदुः परं कान्तं न तु ब्रह्मतया मुने ।

गुणप्रवाहोपरमस्तासां गुणधियां कथम् ॥१२

पिता और पतियोंने, भाई और जाति- बन्धुओंने उन्हें रोका, उनकी मंगलमयी प्रेमयात्रामें विघ्न डाला । परन्तु वे इतनी मोहित हो गयी थीं कि रोकनेपर भी न रुकीं, न रुक सकीं । रुकतीं कैसे? विश्वविमोहन श्रीकृष्णने उनके प्राण, मन और आत्मा सब कुछका अपहरण जो कर लिया था ॥८ ॥ परीक्षित्! उस समय कुछ गोपियाँ घरोंके भीतर थीं । उन्हें बाहर

निकलनेका मार्ग ही न मिला। तब उन्होंने अपने नेत्र मूँद लिये और बड़ी तन्मयतासे श्रीकृष्णके सौन्दर्य, माधुर्य और लीलाओंका ध्यान करने लगीं ॥ ९ ॥ परीक्षित्! अपने परम

प्रियतम श्रीकृष्णके असह्य विरहकी तीव्र वेदनासे उनके हृदयमें इतनी व्यथा- इतनी जलन हुई कि उनमें जो कुछ अशुभ संस्कारोंका लेशमात्र अवशेष था, वह भस्म हो गया । इसके बाद तुरंत ही ध्यान लग गया । ध्यानमें उनके सामने भगवान् श्रीकृष्ण प्रकट हुए । उन्होंने मन- ही-मन बड़े प्रेमसे, बड़े आवेगसे उनका आलिंगन किया । उस समय उन्हें इतना सुख, इतनी शान्ति मिली कि उनके सब - के - सब पुण्यके संस्कार एक साथ ही क्षीण हो गये ॥ १० ॥

परीक्षित्! यद्यपि उनका उस समय श्रीकृष्णके प्रति जारभाव भी था; तथापि कहीं सत्य वस्तु भी भावकी अपेक्षा रखती है? उन्होंने जिनका आलिंगन किया, चाहे किसी भी भावसे किया हो, वे स्वयं परमात्मा ही तो थे । इसलिये उन्होंने पाप और पुण्यरूप कर्मके परिणामसे बने हुए गुणमय शरीरका परित्याग कर दिया । ( भगवान्‌की लीलामें सम्मिलित होनेके योग्य दिव्य अप्राकृत शरीर प्राप्त कर लिया । ) इस शरीरसे भोगे जानेवाले कर्मबन्धन तो ध्यानके समय ही छिन्न- भिन्न हो चुके थे ॥११ ॥

राजा परीक्षित्ने पूछा- भगवन्! गोपियाँ तो भगवान् श्रीकृष्णको केवल अपना परम प्रियतम ही मानती थीं । उनका उनमें ब्रह्मभाव नहीं था । इस प्रकार उनकी दृष्टि प्राकृत गुणोंमें ही आसक्त दीखती है । ऐसी स्थितिमें उनके लिये गुणोंके प्रवाहरूप इस संसारकी निवृत्ति कैसे सम्भव हुई? ॥१२ ॥

श्रीशुक उवाच

पृष्ठ 478

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उक्तं पुरस्तादेतत्ते चैद्यः सिद्धिं यथा गतः ।

द्विषन्नपि हृषीकेशं किमुताधोक्षजप्रियाः ॥१३

नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप ।

अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥१४

कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च ।

नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते ॥१५

न चैवं विस्मयः कार्यो भवता भगवत्यजे ।

योगेश्वरेश्वरे कृष्णे यत एतद् विमुच्यते ॥१६

ता दृष्ट्वान्तिकमायाता भगवान् व्रजयोषितः अवदद् वदतां श्रेष्ठो वाचः पेशैर्विमोहयन् ॥१७ श्रीभगवानुवाच

स्वागतं वो महाभागाः प्रियं किं करवाणि वः ।

व्रजस्यानामयं कच्चिद् ब्रूतागमनकारणम् ॥१८

श्रीशुकदेवजीने कहा- परीक्षित्! मैं तुमसे पहले ही कह चुका हूँ कि चेदिराज शिशुपाल भगवान्‌के प्रति द्वेषभाव रखनेपर भी अपने प्राकृत शरीरको छोड़कर अप्राकृत शरीरसे उनका पार्षद हो गया। ऐसी स्थितिमें जो समस्त प्रकृति और उसके गुणोंसे अतीत भगवान् श्रीकृष्णकी प्यारी हैं और उनसे अनन्य प्रेम करती हैं, वे गोपियाँ उन्हें प्राप्त हो जायँ – इसमें कौन - सी आश्चर्यकी बात है || १३ || परीक्षित्! वास्तवमें भगवान् प्रकृतिसम्बन्धी वृद्धि-विनाश, प्रमाण -प्रमेय और गुण- गुणीभावसे रहित हैं । वे अचिन्त्य अनन्त अप्राकृत परम कल्याणस्वरूप गुणोंके एकमात्र आश्रय हैं । उन्होंने यह जो अपनेको तथा अपनी लीलाको प्रकट किया है, उसका प्रयोजन केवल इतना ही है कि जीव उसके सहारे अपना परम कल्याण सम्पादन करे ॥१४ ॥ इसलिये भगवान्से केवल सम्बन्ध हो जाना चाहिये । वह

सम्बन्ध चाहे जैसा हो - कामका हो, क्रोधका हो या भयका हो; स्नेह, नातेदारी या सौहार्दका हो । चाहे जिस भावसे भगवान्‌में नित्य निरन्तर अपनी वृत्तियाँ जोड़ दी जायँ, वे भगवान्से ही जुड़ती हैं । इसलिये वृत्तियाँ भगवन्मय हो जाती हैं और उस जीवको भगवान्की ही प्राप्ति होती है ॥१५ ॥ परीक्षित्! तुम्हारे - जैसे परम भागवत भगवान्‌का रहस्य जाननेवाले भक्तको

श्रीकृष्णके सम्बन्धमें ऐसा सन्देह नहीं करना चाहिये । योगेश्वरोंके भी ईश्वर अजन्मा भगवान्के लिये भी यह कोई आश्चर्यकी बात है? अरे! उनके संकल्पमात्रसे - भौंहोंके इशारेसे सारे जगत्का परम कल्याण हो सकता है ॥ १६॥ जब भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि व्रजकी

अनुपम विभूतियाँ गोपियाँ मेरे बिलकुल पास आ गयी हैं, तब उन्होंने अपनी विनोदभरी

पृष्ठ 479

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वाक्चातुरीसे उन्हें मोहित करते हुए कहा- क्यों न हो- भूत, भविष्य और वर्तमानकालके जितने वक्ता हैं, उनमें वे ही तो सर्वश्रेष्ठ हैं ॥१७ ॥

भगवान् श्रीकृष्णने कहा - महाभाग्यवती गोपियो! तुम्हारा स्वागत है । बतलाओ, तुम्हें प्रसन्न करनेके लिये मैं कौन - सा काम करूँ? व्रजमें तो सब कुशल- मंगल है न? कहो, इस समय यहाँ आनेकी क्या आवश्यकता पड़ गयी? ॥ १८ ॥ सुन्दरी गोपियो! रातका समय है,

यह स्वयं ही बड़ा भयावना होता है और इसमें बड़े - बड़े भयावने जीव- जन्तु इधर- उधर घूमते रहते हैं । अतः तुम सब तुरंत व्रजमें लौट जाओ । रातके समय घोर जंगलमें स्त्रियोंको नहीं रुकना चाहिये ॥१९ ॥ तुम्हें न देखकर तुम्हारे माँ-बाप, पति- पुत्र और भाई- बन्धु ढूँढ़ रहे

होंगे । उन्हें भयमें न डालो ॥ २० ॥ तुमलोगोंने रंग-बिरंगे पुष्पोंसे लदे हुए इस वनकी शोभाको

देखा । पूर्ण चन्द्रमाकी कोमल रश्मियोंसे यह रँगा हुआ है, मानो उन्होंने अपने हाथों चित्रकारी की हो; और यमुनाजीके जलका स्पर्श करके बहनेवाले शीतल समीरकी मन्द- मन्द गतिसे हिलते हुए ये वृक्षोंके पत्ते तो इस वनकी शोभाको और भी बढ़ा रहे हैं । परन्तु अब तो तुमलोगोंने यह सब कुछ देख लिया || २१ || अब देर मत करो, शीघ्र से शीघ्र व्रजमें लौट जाओ । तुमलोग कुलीन स्त्री हो और स्वयं भी सती हो; जाओ, अपने पतियोंकी और सतियोंकी सेवा- शुश्रूषा करो । देखो, तुम्हारे घरके नन्हे - नन्हे बच्चे और गौओंके बछड़े रो -रँभा रहे हैं; उन्हें दूध पिलाओ, गौएँ दुहो ॥२२ ॥ अथवा यदि मेरे प्रेमसे परवश होकर तुमलोग यहाँ

आयी हो तो इसमें कोई अनुचित बात नहीं हुई, यह तो तुम्हारे योग्य ही है; क्योंकि जगत्के पशु - पक्षीतक मुझसे प्रेम करते हैं, मुझे देखकर प्रसन्न होते हैं || २३ || कल्याणी गोपियो! स्त्रियोंका परम धर्म यही है कि वे पति और उसके भाई-बन्धुओंकी निष्कपटभावसे सेवा करें और सन्तानका पालन - पोषण करें || २४ || जिन स्त्रियोंको उत्तम लोक प्राप्त करनेकी अभिलाषा हो, वे पातकीको छोड़कर और किसी भी प्रकारके पतिका परित्याग न करें । भले ही वह बुरे स्वभाव- वाला, भाग्यहीन, वृद्ध, मूर्ख, रोगी या निर्धन ही क्यों न हो ॥२५ ॥ कुलीन

स्त्रियोंके लिये जार पुरुषकी सेवा सब तरहसे निन्दनीय ही है । इससे उनका परलोक बिगड़ता है, स्वर्ग नहीं मिलता, इस लोकमें अपयश होता है । यह कुकर्म स्वयं तो अत्यन्त तुच्छ, क्षणिक है ही; इसमें प्रत्यक्ष- वर्तमानमें भी कष्ट ही कष्ट है । मोक्ष आदिकी तो बात ही कौन करे, यह साक्षात् परम भय — नरक आदिका हेतु है ॥ २६ ॥

रजन्येषा घोररूपा घोरसत्त्वनिषेविता ।

प्रतियात व्रजं नेह स्थेयं स्त्रीभिः सुमध्यमाः ॥१९

मातरः पितरः पुत्रा भ्रातरः पतयश्च वः ।

विचिन्वन्ति ह्यपश्यन्तो मा कृढ्वं बन्धुसाध्वसम् ॥२०

दृष्टं वनं कुसुमितं राकेशकररंजितम् ।

यमुनानिललीलैजत्तरुपल्लवशोभितम् ॥२१

पृष्ठ 480

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तद् यात मा चिरं गोष्ठं शुश्रूषध्वं पतीन् सतीः ।

क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्च तान् पाययत दुह्यत ॥२२

अथवा मदभिस्नेहाद् भवत्यो यन्त्रिताशयाः ।

आगता ह्युपपन्नं वः प्रीयन्ते मयि जन्तवः ॥२३

भर्तुः शुश्रूषणं स्त्रीणां परो धर्मो ह्यमायया ।

तद्बन्धूनां च कल्याण्यः प्रजानां चानुपोषणम् ॥ २४

दुःशीलो दुर्भगो वृद्धो जडो रोग्यधनोऽपि वा ।

पतिः स्त्रीभिर्न हातव्यो लोकेप्सुभिरपातकी ॥२५

अस्वर्ग्यमयशस्यं च फल्गु कृच्छ्रं भयावहम् ।

जुगुप्सितं च सर्वत्र औपपत्यं कुलस्त्रियाः ॥ २६

श्रवणाद् दर्शनाद् ध्यानान्मयि भावोऽनुकीर्तनात् ।

न तथा सन्निकर्षेण प्रतियात ततो गृहान् ॥२७

श्रीशुक उवाच

इति विप्रियमाकर्ण्य गोप्यो गोविन्दभाषितम् ।

विषण्णा भग्नसंकल्पाश्चिन्तामापुर्दुरत्ययाम् ॥२८

कृत्वा मुखान्यव शुचः श्वसनेन शुष्यद् बिम्बाधराणि चरणेन भुवं लिखन्त्यः । अत्रैरुपात्तमषिभिः कुचकुंकुमानि तस्थुर्मृजन्त्य उरुदुःखभराः स्म तूष्णीम् ॥२९ प्रेष्ठं प्रियेतरमिव प्रतिभाषमाणं कृष्णं तदर्थविनिवर्तितसर्वकामाः । नेत्रे विमृज्य रुदितोपहते स्म किंचित् संरम्भगद्गदगिरोऽब्रुवतानुरक्ताः ॥३० गोप्य ऊचुः मैवं विभोऽर्हति भवान् गदितुं नृशंसं सन्त्यज्य सर्वविषयांस्तव पादमूलम् । भक्ता भजस्व दुरवग्रह मा त्यजास्मान्