श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 481–490

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 481–490

पृष्ठ 481

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देवो यथाऽऽदिपुरुषो भजते मुमुक्षून् ॥३१ गोपियो! मेरी लीला और गुणोंके श्रवणसे, रूपके दर्शनसे, उन सबके कीर्तन और ध्यानसे मेरे प्रति जैसे अनन्य प्रेमकी प्राप्ति होती है, वैसे प्रेमकी प्राप्ति पास रहनेसे नहीं होती । इसलिये तुमलोग अभी अपने - अपने घर लौट जाओ ॥२७ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णका यह अप्रिय भाषण सुनकर गोपियाँ उदास, खिन्न हो गयीं । उनकी आशा टूट गयी । वे चिन्ताके अथाह एवं अपार समुद्रमें डूबने - उतराने लगीं ॥२८ ॥ उनके बिम्बाफल ( पके हुए कुँदरू) के समान लाल-लाल अधर

शोकके कारण चलनेवाली लम्बी और गरम साँससे सूख गये । उन्होंने अपने मुँह नीचेकी ओर लटका लिये, वे पैरके नखोंसे धरती कुरेदने लगीं । नेत्रोंसे दुःखके आँसू बह- बहकर काजलके साथ वक्षःस्थलपर पहुँचने और वहाँ लगी हुई केशरको धोने लगे । उनका हृदय दुःखसे इतना भर गया कि वे कुछ बोल न सकीं, चुपचाप खड़ी रह गयीं ॥ २ ९ ॥ गोपियोंने अपने प्यारे श्यामसुन्दरके लिये सारी कामनाएँ, सारे भोग छोड़ दिये थे । श्रीकृष्णमें उनका अनन्य अनुराग, परम प्रेम था । जब उन्होंने अपने प्रियतम श्रीकृष्णकी यह निष्ठुरतासे भरी बात सुनी, जो बड़ी ही अप्रिय - सी मालूम हो रही थी, तब उन्हें बड़ा दुःख हुआ। आँखें रोते - रोते लाल हो गयीं, आँसुओंके मारे रुँध गयीं । उन्होंने धीरज धारण करके अपनी आँखोंके आँसू पोंछे और फिर प्रणयकोपके कारण वे गद्गद वाणीसे कहने लगीं ॥ ३० ॥

गोपियोंने कहा- प्यारे श्रीकृष्ण! तुम घट- घट व्यापी हो । हमारे हृदयकी बात जानते हो । तुम्हें इस प्रकार निष्ठुरताभरे वचन नहीं कहने चाहिये । हम सब कुछ छोड़कर केवल तुम्हारे चरणोंमें ही प्रेम करती हैं । इसमें सन्देह नहीं कि तुम स्वतन्त्र और हठीले हो । तुमपर हमारा कोई वश नहीं है । फिर भी तुम अपनी ओरसे, जैसे आदिपुरुष भगवान् नारायण कृपा करके अपने मुमुक्षु भक्तोंसे प्रेम करते हैं, वैसे ही हमें स्वीकार कर लो । हमारा त्याग मत करो ॥३१ ॥ प्यारे श्यामसुन्दर! तुम सब धर्मोंका रहस्य जानते हो । तुम्हारा यह कहना कि

‘ अपने पति, पुत्र और भाई- बन्धुओंकी सेवा करना ही स्त्रियोंका स्वधर्म है ' – अक्षरशः ठीक है। परन्तु इस उपदेशके अनुसार हमें तुम्हारी ही सेवा करनी चाहिये; क्योंकि तुम्हीं सब उपदेशोंके पद ( चरम लक्ष्य) हो; साक्षात् भगवान् हो । तुम्हीं समस्त शरीरधारियोंके सुहृद् हो, आत्मा हो और परम प्रियतम हो ॥ ३२ ॥ आत्मज्ञानमें निपुण महापुरुष तुमसे ही प्रेम करते

हैं; क्योंकि तुम नित्य प्रिय एवं अपने ही आत्मा हो। अनित्य एवं दुःखद पति- पुत्रादिसे क्या प्रयोजन है? परमेश्वर! इसलिये हमपर प्रसन्न होओ । कृपा करो । कमलनयन! चिरकालसे तुम्हारे प्रति पाली- पोसी आशा- अभिलाषाकी लहलहाती लताका छेदन मत करो ॥३३ ॥

मनमोहन! अबतक हमारा चित्त घरके काम- धंधों में लगता था । इसीसे हमारे हाथ भी उनमें रमे हुए थे । परन्तु तुमने हमारे देखते -देखते हमारा वह चित्त लूट लिया । इसमें तुम्हें कोई कठिनाई भी नहीं उठानी पड़ी, तुम तो सुखस्वरूप हो न! परन्तु अब तो हमारी गति- मति निराली ही हो गयी है । हमारे ये पैर तुम्हारे चरणकमलोंको छोड़कर एक पग भी हटनेके लिये तैयार नहीं हैं, नहीं हट रहे हैं । फिर हम व्रजमें कैसे जायँ? और यदि वहाँ जायँ भी तो करें क्या? ॥३४ ॥ प्राणवल्लभ! हमारे प्यारे सखा! तुम्हारी मन्द मन्द मधुर मुसकान, प्रेमभरी

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पृष्ठ 482

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चितवन और मनोहर संगीतने हमारे हृदयमें तुम्हारे प्रेम और मिलनकी आग धधका दी है । उसे तुम अपने अधरोंकी रसधारासे बुझा दो । नहीं तो प्रियतम! हम सच कहती हैं, तुम्हारी विरहव्यथाकी आगसे हम अपने- अपने शरीर जला देंगी और ध्यानके द्वारा तुम्हारे चरणकमलोंको प्राप्त करेंगी ॥ ३५ ॥

यत्पत्यपत्यसुहृदामनुवृत्तिरङ्ग स्त्रीणां स्वधर्म इति धर्मविदा त्वयोक्तम् । अस्त्वेवमेतदुपदेशपदे त्वयीशे प्रेष्ठो भवांस्तनुभृतां किल बन्धुरात्मा ॥३२ कुर्वन्ति हि त्वयि रतिं कुशलाः स्व आत्मन् नित्यप्रिये पतिसुतादिभिरार्तिदैः किम् । तन्नः प्रसीद परमेश्वर मा स्म छिन्द्या आशां भृतां त्वयि चिरादरविन्दनेत्र ॥३३ चित्तं सुखेन भवतापहृतं गृहेषु यन्निर्विशत्युत करावपि गृह्यकृत्ये । पादौ पदं न चलतस्तव पादमूलाद् यामः कथं व्रजमथो करवाम किं वा ॥ ३४ सिञ्चाङ्ग नस्त्वदधरामृतपूरकेण हासावलोककलगीतजहृच्छयाग्निम् । नो चेद् वयं विरहजाग्न्युपयुक्तदेहा ध्यानेन याम पदयोः पदवीं सखे ते ॥ ३५ यर्ह्यम्बुजाक्ष तव पादतलं रमाया दत्तक्षणं क्वचिदरण्यजनप्रियस्य । अस्प्राक्ष्म तत्प्रभृति नान्यसमक्षमङ्ग स्थातुं त्वयाभिरमिता बत पारयामः ॥३६ प्यारे कमलनयन! तुम वनवासियोंके प्यारे हो और वे भी तुमसे बहुत प्रेम करते हैं । इससे प्रायः तुम उन्हींके पास रहते हो । यहाँतक कि तुम्हारे जिन चरणकमलोंकी सेवाका अवसर स्वयं लक्ष्मीजीको कभी- कभी ही मिलता है, उन्हीं चरणोंका स्पर्श हमें प्राप्त हुआ । जिस दिन यह सौभाग्य हमें मिला और तुमने हमें स्वीकार करके आनन्दित किया, उसी दिनसे हम और किसीके सामने एक क्षणके लिये भी ठहरनेमें असमर्थ हो गयी हैं- पति- पुत्रादिकोंकी सेवा तो दूर रही ॥ ३६ ॥ हमारे स्वामी! जिन लक्ष्मीजीका कृपाकटाक्ष प्राप्त करनेके लिये बड़े - बड़े

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पृष्ठ 483

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देवता तपस्या करते रहते वही लक्ष्मीजी तुम्हारे वक्षःस्थलमें बिना किसीकी प्रतिद्वन्द्विताके स्थान प्राप्त कर लेनेपर भी अपनी सौत तुलसीके साथ तुम्हारे चरणोंकी रज पानेकी अभिलाषा किया करती हैं । अबतकके सभी भक्तोंने उस चरणरजका सेवन किया है । उन्हींके समान हम भी तुम्हारी उसी चरणरजकी शरणमें आयी हैं ॥ ३७ ॥ भगवन्! अबतक जिसने

भी तुम्हारे चरणोंकी शरण ली, उसके सारे कष्ट तुमने मिटा दिये। अब तुम हमपर कृपा करो । हमें भी अपने प्रसादका भाजन बनाओ । हम तुम्हारी सेवा करनेकी आशा - अभिलाषासे घर, गाँव, कुटुम्ब — सब कुछ छोड़कर तुम्हारे युगल चरणोंकी शरणमें आयी हैं । प्रियतम! वहाँ तो तुम्हारी आराधनाके लिये अवकाश ही नहीं है । पुरुषभूषण! पुरुषोत्तम! तुम्हारी मधुर मुसकान और चारु चितवनने हमारे हृदयमें प्रेमकी- मिलनकी आकांक्षाकी आग धधका दी है; हमारा रोम - रोम उससे जल रहा है । तुम हमें अपनी दासीके रूपमें स्वीकार कर लो । हमें अपनी सेवाका अवसर दो ॥३८ ॥ प्रियतम्! तुम्हारा सुन्दर मुखकमल, जिसपर घुँघराली अलकें

झलक रही हैं; तुम्हारे ये कमनीय कपोल, जिनपर सुन्दर- सुन्दर कुण्डल अपना अनन्त सौन्दर्य बिखेर रहे हैं; तुम्हारे ये मधुर अधर, जिनकी सुधा सुधाको भी लजानेवाली है; तुम्हारी यह नयनमनोहारी चितवन, जो मन्द मन्द मुसकानसे उल्लसित हो रही है; तुम्हारी ये दोनों भुजाएँ, जो शरणागतोंको अभयदान देनेमें अत्यन्त उदार हैं और तुम्हारा यह वक्षःस्थल, जो लक्ष्मीजीका — सौन्दर्यकी एकमात्र देवीका नित्य क्रीडास्थल है, देखकर हम सब तुम्हारी दासी हो गयी हैं ॥३९ ॥ प्यारे श्यामसुन्दर! तीनों लोकोंमें भी और ऐसी कौन - सी स्त्री है, जो मधुर-मधुर पद और आरोह - अवरोह -क्रमसे विविध प्रकारकी मूर्च्छनाओंसे युक्त तुम्हारी वंशीकी

तान सुनकर तथा इस त्रिलोकसुन्दर मोहिनी मूर्तिको—जो अपने एक बूँद सौन्दर्यसे त्रिलोकीको सौन्दर्यका दान करती है एवं जिसे देखकर गौ, पक्षी, वृक्ष और हरिन भी रोमांचित, पुलकित हो जाते हैं - अपने नेत्रोंसे निहारकर आर्य -मर्यादासे विचलित न हो जाय, कुल- कान और लोकलज्जाको त्यागकर तुममें अनुरक्त न हो जाय || ४० || हमसे यह बात छिपी नहीं है कि जैसे भगवान् नारायण देवताओंकी रक्षा करते हैं, वैसे ही तुम व्रजमण्डलका भय और दुःख मिटानेके लिये ही प्रकट हुए हो! और यह भी स्पष्ट ही है कि दीन -दुखियोंपर तुम्हारा बड़ा प्रेम, बड़ी कृपा है । प्रियतम! हम भी बड़ी दुःखिनी हैं । तुम्हारे मिलनकी आकांक्षाकी आगसे हमारा वक्षःस्थल जल रहा है । तुम अपनी इन दासियोंके वक्षःस्थल और सिरपर अपने कोमल करकमल रखकर इन्हें अपना लो; हमें जीवनदान दो ॥४१ ॥

श्रीर्यत्पदाम्बुजरजश्चकमे तुलस्या

लब्ध्वापि वक्षसि पदं किल भृत्यजुष्टम् ।

यस्याः स्ववीक्षणकृतेऽन्यसुरप्रयास- स्तद्वद् वयं च तव पादरजः प्रपन्नाः ॥३७

तन्नः प्रसीद वृजिनार्दन तेऽङ्घ्रिमूलं प्राप्ता विसृज्य वसतीस्त्वदुपासनाशाः । ******ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 484

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त्वत्सुन्दरस्मितनिरीक्षणतीव्रकाम- तप्तात्मनां पुरुषभूषण देहि दास्यम् ॥३८ वीक्ष्यालकावृतमुखं तव कुण्डलश्री- गण्डस्थलाधरसुधं हसितावलोकम् । दत्ताभयं च भुजदण्डयुगं विलोक्य वक्षः श्रियैकरमणं च भवाम दास्यः ॥ ३ ९ का त्र्यङ्ग ते कलपदायतमूर्च्छितेन सम्मोहिताऽऽर्यचरितान्न चलेत्त्रिलोक्याम् । त्रैलोक्यसौभगमिदं च निरीक्ष्य रूपं यद् गोद्विजद्रुममृगाः पुलकान्यबिभ्रन् ॥ ४० व्यक्तं भवान् व्रजभयार्तिहरोऽभिजातो देवो यथाऽऽदिपुरुषः सुरलोकगोप्ता । तन्नो निधेहि करपंकजमार्तबन्धो तप्तस्तनेषु च शिरस्सु च किंकरीणाम् ॥४१ श्रीशुक उवाच

इति विक्लवितं तासां श्रुत्वा योगेश्वरेश्वरः ।

प्रहस्य सदयं गोपीरात्मारामोऽप्यरीरमत् ॥४२

ताभिः समेताभिरुदारचेष्टितः

प्रियेक्षणोत्फुल्लमुखीभिरच्युतः ।

उदारहासद्विजकुन्ददीधिति- र्व्यरोचतैणांक इवोडुभिर्वृतः ॥ ४३

उपगीयमान उद्गायन् वनिताशतयूथपः ।

मालां बिभ्रद् वैजयन्तीं व्यचरन्मण्डयन् वनम् ॥४४

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण सनकादि योगियों और शिवादि योगेश्वरोंके भी ईश्वर हैं । जब उन्होंने गोपियोंकी व्यथा और व्याकुलतासे भरी वाणी सुनी, तब उनका हृदय दयासे भर गया और यद्यपि वे आत्माराम हैं- अपने - आपमें ही रमण करते रहते हैं, उन्हें अपने अतिरिक्त और किसी भी बाह्य वस्तुकी अपेक्षा नहीं है, फिर भी उन्होंने हँसकर उनके साथ क्रीडा प्रारम्भ की ॥४२ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने अपनी भाव- भंगी और चेष्टाएँ

गोपियोंके अनुकूल कर दीं; फिर भी वे अपने स्वरूपमें ज्यों- के - त्यों एकरस स्थित थे, अच्युत ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 485

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थे । जब वे खुलकर हँसते, तब उनके उज्ज्वल- उज्ज्वल दाँत कुन्दकलीके समान जान पड़ते थे । उनकी प्रेमभरी चितवनसे और उनके दर्शनके आनन्दसे गोपियोंका मुखकमल प्रफुल्लित हो गया । वे उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़ी हो गयीं । उस समय श्रीकृष्णकी ऐसी शोभा हुई, मानो अपनी पत्नी तारिकाओंसे घिरे हुए चन्द्रमा ही हों || ४३ || गोपियोंके शत- शत यूथोंके स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण वैजयन्ती माला पहने वृन्दावनको शोभायमान करते हुए विचरण करने लगे । कभी गोपियाँ अपने प्रियतम श्रीकृष्णके गुण और लीलाओंका गान करतीं, तो कभी श्रीकृष्ण गोपियोंके प्रेम और सौन्दर्यके गीत गाने लगते ॥ ४४ ॥ इसके बाद भगवान्

श्रीकृष्णने गोपियोंके साथ यमुनाजीके पावन पुलिनपर, जो कपूरके समान चमकीली बालूसे जगमगा रहा था, पदार्पण किया । वह यमुनाजीकी तरल तरंगोंके स्पर्शसे शीतल और कुमुदिनीकी सहज सुगन्धसे सुवासित वायुके द्वारा सेवित हो रहा था । उस आनन्दप्रद पुलिनपर भगवान्ने गोपियोंके साथ क्रीडा की ॥ ४५ ॥ हाथ फैलाना, आलिंगन करना,

गोपियोंके हाथ दबाना, उनकी चोटी, जाँघ, नीवी और स्तन आदिका स्पर्श करना, विनोद करना, नखक्षत करना, विनोदपूर्ण चितवनसे देखना और मुसकाना– इन क्रियाओंके द्वारा गोपियोंके दिव्य कामरसको, परमोज्ज्वल प्रेमभावको उत्तेजित करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण उन्हें क्रीडाद्वारा आनन्दित करने लगे ॥ ४६ ॥

नद्याः पुलिनमाविश्य गोपीभिर्हिमवालुकम् ।

रेमेतत्तरलानन्दकुमुदामोदवायुना ॥४५

बाहुप्रसारपरिरम्भकरालकोरु- नीवीस्तनालभननर्मनखाग्रपातैः ।

क्ष्वेल्यावलोकहसितैर्व्रजसुन्दरीणा- मुत्तम्भयन् रतिपतिं रमयाञ्चकार ॥४६

एवं भगवतः कृष्णाल्लब्धमाना महात्मनः ।

आत्मानं मेनिरे स्त्रीणां मानिन्योऽभ्यधिकं भुवि ॥४७

तासां तत् सौभगमदं वीक्ष्य मानं च केशवः ।

प्रशमाय प्रसादाय तत्रैवान्तरधीयत ॥४८

उदारशिरोमणि सर्वव्यापक भगवान् श्रीकृष्णने जब इस प्रकार गोपियोंका सम्मान किया, तब गोपियोंके मनमें ऐसा भाव आया कि संसारकी समस्त स्त्रियोंमें हम ही सर्वश्रेष्ठ हैं, हमारे समान और कोई नहीं है । वे कुछ मानवती हो गयीं ॥ ४७ ॥ जब भगवान्ने देखा कि इन्हें तो

अपने सुहागका कुछ गर्व हो आया है और अब मान भी करने लगी हैं, तब वे उनका गर्व शान्त करनेके लिये तथा उनका मान दूर कर प्रसन्न करनेके लिये वहीं — उनके बीचमें ही अन्तर्धान हो गये ॥४८ ॥

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पृष्ठ 486

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इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे भगवतो रासक्रीडावर्णनं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥

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पृष्ठ 487

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अथ त्रिंशोऽध्यायः श्रीकृष्णके विरहमें गोपियोंकी दशा श्रीशुक उवाच

अन्तर्हिते भगवति सहसैव व्रजाङ्गनाः ।

अतप्यंस्तमचक्षाणाः करिण्य इव यूथपम् ॥१

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! भगवान् सहसा अन्तर्धान हो गये । उन्हें न देखकर व्रजयुवतियोंकी वैसी ही दशा हो गयी, जैसे यूथपति गजराजके बिना हथिनियोंकी होती है । उनका हृदय विरहकी ज्वालासे जलने लगा ॥ १ ॥ भगवान् श्रीकृष्णकी मदोन्मत्त गजराजकी-सी चाल, प्रेमभरी मुसकान, विलासभरी चितवन, मनोरम प्रेमालाप, भिन्न-भिन्न प्रकारकी

लीलाओं तथा शृंगार-रसकी भाव - भंगियोंने उनके चित्तको चुरा लिया था । वे प्रेमकी मतवाली गोपियाँ श्रीकृष्णमय हो गयीं और फिर श्रीकृष्णकी विभिन्न चेष्टाओंका अनुकरण करने लगीं ॥२ ॥ अपने प्रियतम श्रीकृष्णकी चाल- ढाल, हास - विलास और चितवन - बोलन आदिमें

श्रीकृष्णकी प्यारी गोपियाँ उनके समान ही बन गयीं; उनके शरीरमें भी वही गति मति, वही भाव - भंगी उतर आयी । वे अपनेको सर्वथा भूलकर श्रीकृष्ण - स्वरूप हो गयीं और उन्हींके लीला- विलासका अनुकरण करती हुई ' मैं श्रीकृष्ण ही हूँ' - इस प्रकार कहने लगीं ॥३ ॥ वे

सब परस्पर मिलकर ऊँचे स्वरसे उन्हींके गुणोंका गान करने लगीं और मतवाली होकर एक वनसे दूसरे वनमें, एक झाड़ीसे दूसरी झाड़ीमें जा-जाकर श्रीकृष्णको ढूँढने लगीं । परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण कहीं दूर थोड़े ही गये थे । वे तो समस्त जड -चेतन पदार्थोंमें तथा उनके बाहर भी आकाशके समान एकरस स्थित ही हैं । वे वहीं थे, उन्हींमें थे, परन्तु उन्हें न देखकर गोपियाँ वनस्पतियोंसे - पेड़ - पौधोंसे उनका पता पूछने लगीं ॥४ ॥

गत्यानुरागस्मितविभ्रमेक्षितै- र्मनोरमालापविहारविभ्रमैः ।

आक्षिप्तचित्ताः प्रमदा रमापते- स्तास्ता विचेष्टा जगृहुस्तदात्मिकाः ॥२

गतिस्मितप्रेक्षणभाषणादिषु प्रियाः प्रियस्य प्रतिरूढमूर्तयः । असावहं त्वित्यबलास्तदात्मिका न्यवेदिषुः कृष्णविहारविभ्रमाः ॥३ गायन्त्य उच्चैरमुमेव संहता ******ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 488

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विचिक्युरुन्मत्तकवद् वनाद् वनम् ।

पप्रच्छुराकाशवदन्तरं बहि- र्भूतेषु सन्तं पुरुषं वनस्पतीन् ॥४

दृष्टो वः कच्चिदश्वत्थ प्लक्ष न्यग्रोध नो मनः ।

नन्दसूनुर्गतो हृत्वा प्रेमहासावलोकनैः ॥५

कच्चित् कुरबकाशोकनागपुन्नागचम्पकाः ।

रामानुजो मानिनीनामितो दर्पहरस्मितः ॥६

कच्चित्तुलसि कल्याणि गोविन्दचरणप्रिये ।

सह त्वालिकुलैर्बिभ्रद् दृष्टस्तेऽतिप्रियोऽच्युतः ॥७

( गोपियोंने पहले बड़े - बड़े वृक्षोंसे जाकर पूछा ) ' हे पीपल, पाकर और बरगद! नन्दनन्दन श्यामसुन्दर अपनी प्रेमभरी मुसकान और चितवनसे हमारा मन चुराकर चले गये हैं । क्या तुमलोगोंने उन्हें देखा है? ॥५॥ कुरबक, अशोक, नागकेशर, पुन्नाग और चम्पा!

बलरामजीके छोटे भाई, जिनकी मुसकान मात्रसे बड़ी -बड़ी मानिनियोंका मानमर्दन हो जाता है, इधर आये थे क्या? ' || ६|| ( अब उन्होंने स्त्रीजातिके पौधोंसे कहा - ) ' बहिन तुलसी! तुम्हारा हृदय तो बड़ा कोमल है, तुम तो सभी लोगोंका कल्याण चाहती हो । भगवान्‌के चरणोंमें तुम्हारा प्रेम तो है ही, वे भी तुमसे बहुत प्यार करते हैं । तभी तो भौंरोंके मँडराते रहनेपर भी वे तुम्हारी माला नहीं उतारते, सर्वदा पहने रहते हैं । क्या तुमने अपने परम प्रियतम श्यामसुन्दरको देखा है? ॥७॥ प्यारी मालती! मल्लिके! जाती और जूही! तुमलोगोंने

कदाचित् हमारे प्यारे माधवको देखा होगा । क्या वे अपने कोमल करोंसे स्पर्श करके तुम्हें आनन्दित करते हुए इधरसे गये हैं? ' || ८ || ' रसाल, प्रियाल, कटहल, पीतशाल, कचनार, जामुन, आक, बेल, मौलसिरी, आम, कदम्ब और नीम तथा अन्यान्य यमुनाके तटपर विराजमान सुखी तरुवरो! तुम्हारा जन्म - जीवन केवल परोपकारके लिये है । श्रीकृष्णके बिना हमारा जीवन सूना हो रहा है । हम बेहोश हो रही हैं । तुम हमें उन्हें पानेका मार्ग बता दो ’ ॥९ ॥ ‘ भगवान्की प्रेयसी पृथ्वीदेवी! तुमने ऐसी कौन- सी तपस्या की है कि श्रीकृष्णके

चरणकमलोंका स्पर्श प्राप्त करके तुम आनन्दसे भर रही हो और तृण-लता आदिके रूपमें अपना रोमांच प्रकट कर रही हो? तुम्हारा यह उल्लास- विलास श्रीकृष्णके चरणस्पर्शके कारण है अथवा वामनावतारमें विश्वरूप धारण करके उन्होंने तुम्हें जो नापा था, उसके कारण है? कहीं उनसे भी पहले वराह भगवान्के अंग- संगके कारण तो तुम्हारी यह दशा नहीं हो रही है? ' ॥१० ॥ ' अरी सखी! हरिनियो! हमारे श्यामसुन्दरके अंग- संगसे सुषमा-सौन्दर्यकी धारा बहती रहती है, वे कहीं अपनी प्राणप्रियाके साथ तुम्हारे नयनोंको

परमानन्दका दान करते हुए इधरसे ही तो नहीं गये हैं? देखो, देखो; यहाँ कुलपति श्रीकृष्णकी कुन्दकलीकी मालाकी मनोहर गन्ध आ रही है, जो उनकी परम प्रेयसीके अंग - संगसे लगे हुए ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 489

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कुच - कुंकुमसे अनुरंजित रहती है ' ॥११ ॥ ‘ तरुवरो! उनकी मालाकी तुलसीमें ऐसी सुगन्ध है

कि उसकी गन्धके लोभी मतवाले भौंरे प्रत्येक क्षण उसपर मँडराते रहते हैं । उनके एक हाथमें लीलाकमल होगा और दूसरा हाथ अपनी प्रेयसीके कंधेपर रखे होंगे । हमारे प्यारे श्यामसुन्दर इधरसे विचरते हुए अवश्य गये होंगे । जान पड़ता है, तुमलोग उन्हें प्रणाम करनेके लिये ही झुके हो । परन्तु उन्होंने अपनी प्रेमभरी चितवनसे भी तुम्हारी वन्दनाका अभिनन्दन किया है या नहीं? ' ॥१२ ॥ ' अरी सखी! इन लताओंसे पूछो । ये अपने पति वृक्षोंको भुजपाशमें

बाँधकर आलिंगन किये हुए हैं, इससे क्या हुआ? इनके शरीरमें जो पुलक है, रोमांच है, वह

तो भगवान्के नखोंके स्पर्शसे ही है । अहो! इनका कैसा सौभाग्य है? ' ॥१३ ॥

मालत्यदर्शि वः कच्चिन्मल्लिके जाति यूथिके ।

प्रीतिं वो जनयन् यातः करस्पर्शेन माधवः ॥८

चूतप्रियालपनसासनकोविदार- जम्ब्वर्कबिल्वबकुलाम्रकदम्बनीपाः । येऽन्ये परार्थभवका यमुनोपकूलाः शंसन्तु कृष्णपदवीं रहितात्मनां नः ॥ ९ किं ते कृतं क्षिति तपो बत केशवाङ्घ्रि- स्पर्शोत्सवोत्पुलकिताङ्गरुहैर्विभासि । अप्यङ्घ्रिसम्भव उरुक्रमविक्रमाद् वा आहो वराहवपुषः परिरम्भणेन ॥१० अप्येणपत्न्युपगतः प्रिययेह गात्रै- स्तन्वन् दृशां सखि सुनिर्वृतिमच्युतो वः । कान्ताङ्गसङ्गकुचकुंकुमरंजितायाः कुन्दस्रजः कुलपतेरिह वाति गन्धः ॥११ बाहुं प्रियांस उपधाय गृहीतपद्मो रामानुजस्तुलसिकालिकुलैर्मदान्धैः । अन्वीयमान इह वस्तरवः प्रणामं किं वाभिनन्दति चरन् प्रणयावलोकैः ॥१२

पृच्छतेमा लता बाहूनप्याश्लिष्टा वनस्पतेः ।

नूनं तत्करजस्पृष्टा बिभ्रत्युत्पुलकान्यहो ॥१३

इत्युन्मत्तवचो गोप्यः कृष्णान्वेषणकातराः । ******ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 490

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लीला भगवतस्तास्ता ह्यनुचक्रुस्तदात्मिकाः ॥१४

कस्याश्चित् पूतनायन्त्याः कृष्णायन्त्यपिबत् स्तनम् ।

तोकायित्वा रुदत्यन्या पदाहञ्छकटायतीम् ॥१५

दैत्यायित्वा जहारान्यामेका कृष्णार्भभावनाम् ।

रिङ्गयामास काप्यङ्घ्री कर्षन्ती घोषनिःस्वनैः ॥१६

कृष्णरामायिते द्वे तु गोपयन्त्यश्च काश्चन ।

वत्सायतीं हन्ति चान्या तत्रैका तु बकायतीम् ॥१७

आहूय दूरगा यद्वत् कृष्णस्तमनुकुर्वतीम् ।

वेणुं क्वणन्तीं क्रीडन्तीमन्याः शंसन्ति साध्विति ॥१८

कस्यांचित् स्वभुजं न्यस्य चलन्त्याहापरा ननु ।

कृष्णोऽहं पश्यत गतिं ललितामिति तन्मनाः ॥ १ ९

मा भैष्ट वातवर्षाभ्यां तत्त्राणं विहितं मया ।

इत्युक्त्वैकेन हस्तेन यतन्त्युन्निदधेऽम्बरम् ॥२०

आरुह्यैका पदाऽऽक्रम्य शिरस्याहापरां नृप ।

दुष्टा गच्छ जातोऽहं खलानां ननु दण्डधृक् ॥२१

परीक्षित्! इस प्रकार मतवाली गोपियाँ प्रलाप करती हुई भगवान् श्रीकृष्णको ढूँढ़ते - ढूँढ़ते कातर हो रही थीं । अब और भी गाढ़ आवेश हो जानेके कारण वे भगवन्मय होकर भगवान्की विभिन्न लीलाओंका अनुकरण करने लगीं ॥ १४ ॥ एक पूतना बन गयी, तो दूसरी

श्रीकृष्ण बनकर उसका स्तन पीने लगीं । कोई छकड़ा बन गयी, तो किसीने बालकृष्ण बनकर रोते हुए उसे पैरकी ठोकर मारकर उलट दिया ॥ १५ ॥ कोई सखी बालकृष्ण बनकर बैठ गयी

तो कोई तृणावर्त दैत्यका रूप धारण करके उसे हर ले गयी । कोई गोपी पाँव घसीट- घसीटकर घुटनोंके बल बकैयाँ चलने लगी और उस समय उसके पायजेब रुनझुन- रुनझुन बोलने लगे ॥१६ ॥ एक बनी कृष्ण, तो दूसरी बनी बलराम, और बहुत - सी गोपियाँ ग्वालबालोंके

रूपमें हो गयीं । एक गोपी बन गयी वत्सासुर, तो दूसरी बनी बकासुर । तब तो गोपियोंने अलग- अलग श्रीकृष्ण बनकर वत्सासुर और बकासुर बनी हुई गोपियोंको मारनेकी लीला की ॥१७ ॥ जैसे श्रीकृष्ण वनमें करते थे, वैसे ही एक गोपी बाँसुरी बजा - बजाकर दूर गये हुए

पशुओंको बुलानेका खेल खेलने लगी । तब दूसरी गोपियाँ ' वाह - वाह ' करके उसकी प्रशंसा करने लगीं ॥१८ ॥ एक गोपी अपनेको श्रीकृष्ण समझकर दूसरी सखीके गलेमें बाँह डालकर

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