श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 491–500
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 491–500
पृष्ठ 491
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
चलती और गोपियोंसे कहने लगती - ' मित्रो! मैं श्रीकृष्ण हूँ । तुमलोग मेरी यह मनोहर चाल देखो ' ॥१९ ॥ कोई गोपी श्रीकृष्ण बनकर कहती - ' अरे व्रजवासियो! तुम आँधी - पानीसे मत
डरो । मैंने उससे बचनेका उपाय निकाल लिया है । ' ऐसा कहकर गोवर्धन- धारणका अनुकरण करती हुई वह अपनी ओढ़नी उठाकर ऊपर तान लेती ॥२० ॥ परीक्षित्! एक गोपी बनी
कालिय नाग, तो दूसरी श्रीकृष्ण बनकर उसके सिरपर पैर रखकर चढ़ी चढ़ी बोलने लगी रेदुष्ट साँप! तू यहाँसे चला जा । मैं दुष्टोंका दमन करनेके लिये ही उत्पन्न हुआ हूँ' ॥२१ ॥
इतनेमें ही एक गोपी बोली- ' अरे ग्वालो! देखो, वनमें बड़ी भयंकर आग लगी है । तुमलोग जल्दी - से -जल्दी अपनी आँखें मूँद लो, मैं अनायास ही तुमलोगोंकी रक्षा कर लूँगा ' ॥२२ ॥
एक गोपी यशोदा बनी और दूसरी बनी श्रीकृष्ण । यशोदाने फूलोंकी मालासे श्रीकृष्णको ऊखलमें बाँध दिया । अब वह श्रीकृष्ण बनी हुई सुन्दरी गोपी हाथोंसे मुँह ढँककर भयकी नकल करने लगी ॥२३ ॥
तत्रैकोवाच हेगोपा दावाग्निं पश्यतोल्बणम् ।
चक्षूंष्याश्वपिदध्वं वो विधास्ये क्षेममंजसा ॥ २२
बद्धान्यया स्रजा काचित्तन्वी तत्र उलूखले ।
भीता सुदृक् पिधायास्यं भेजे भीतिविडम्बनम् ॥२३
एवं कृष्णं पृच्छमाना वृन्दावनलतास्तरून् ।
व्यचक्षत वनोद्देशे पदानि परमात्मनः ॥२४
पदानि व्यक्तमेतानि नन्दसूनोर्महात्मनः ।
लक्ष्यन्ते हि ध्वजाम्भोजवज्रांकुशयवादिभिः ॥ २५
तैस्तैः पदैस्तत्पदवीमन्विच्छन्त्योऽग्रतोऽबलाः ।
वध्वाः पदैः सुपृक्तानि विलोक्यार्ताः समब्रुवन् ॥२६
कस्याः पदानि चैतानि याताया नन्दसूनुना ।
अंसन्यस्तप्रकोष्ठायाः करेणोः करिणा यथा ॥२७
अनयाऽऽराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः ।
यन्नो विहाय गोविन्दः प्रीतो यामनयद् रहः ॥२८
धन्या अहो अमी आल्यो गोविन्दाङ्घ्रयब्जरेणवः ।
यान् ब्रह्मेशो रमा देवी दधुर्मूर्म्यघनुत्तये ॥२९
पृष्ठ 492
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तस्या अमूनि नः क्षोभं कुर्वन्त्युच्चैः पदानि यत् ।
यैकापहृत्य गोपीनां रहो भुङ्क्तेऽच्युताधरम् ॥३०
परीक्षित्! इस प्रकार लीला करते- करते गोपियाँ वृन्दावनके वृक्ष और लता आदिसे फिर भी श्रीकृष्णका पता पूछने लगीं । इसी समय उन्होंने एक स्थानपर भगवान्के चरणचिह्न देखे ॥२४ ॥ वे आपसमें कहने लगीं— ' अवश्य ही ये चरणचिह्न उदारशिरोमणि नन्दनन्दन
श्यामसुन्दरके हैं; क्योंकि इनमें ध्वजा, कमल, वज्र, अंकुश और जौ आदिके चिह्न स्पष्ट ही दीख रहे हैं' ॥२५ ॥ उन चरणचिह्नोंके द्वारा व्रजवल्लभ भगवान्को ढूँढ़ती हुई गोपियाँ आगे
बढ़ीं, तब उन्हें श्रीकृष्णके साथ किसी व्रजयुवतीके भी चरणचिह्न दीख पड़े । उन्हें देखकर वे व्याकुल हो गयीं । और आपसमें कहने लगीं- ॥ २६ ॥ 'जैसे हथिनी अपने प्रियतम
गजराजके साथ गयी हो, वैसे ही नन्दनन्दन श्यामसुन्दरके साथ उनके कंधेपर हाथ रखकर चलनेवाली किस बड़भागिनीके ये चरणचिह्न हैं? ॥ २७ ॥ अवश्य ही सर्वशक्तिमान् भगवान्
श्रीकृष्णकी यह ‘ आराधिका' होगी । इसीलिये इसपर प्रसन्न होकर हमारे प्राणप्यारे श्यामसुन्दरने हमें छोड़ दिया है और इसे एकान्तमें ले गये हैं ॥ २८ ॥ प्यारी सखियो! भगवान्
श्रीकृष्ण अपने चरणकमलसे जिस रजका स्पर्श कर देते हैं, वह धन्य हो जाती है, उसके अहोभाग्य हैं! क्योंकि ब्रह्मा, शंकर और लक्ष्मी आदि भी अपने अशुभ नष्ट करनेके लिये उस रजको अपने सिरपर धारण करते हैं ' || २ ९ || ' अरी सखी! चाहे कुछ भी हो — यह जो सखी हमारे सर्वस्व श्रीकृष्णको एकान्तमें ले जाकर अकेले ही उनकी अधर- सुधाका रस पी रही है, इस गोपीके उभरे हुए चरणचिह्न तो हमारे हृदयमें बड़ा ही क्षोभ उत्पन्न कर रहे हैं ' ॥३० ॥
यहाँ उस गोपीके पैर नहीं दिखायी देते । मालूम होता है, यहाँ प्यारे श्यामसुन्दरने देखा होगा कि मेरी प्रेयसीके सुकुमार चरणकमलोंमें घासकी नोक गड़ती होगी; इसलिये उन्होंने उसे अपने कंधेपर चढ़ा लिया होगा ॥ ३१ ॥ सखियो! यहाँ देखो, प्यारे श्रीकृष्णके चरणचिह्न
अधिक गहरे — बालूमें धँसे हुए हैं । इससे सूचित होता है कि यहाँ वे किसी भारी वस्तुको उठाकर चले हैं, उसीके बोझसे उनके पैर जमीनमें धँस गये हैं । हो-न-हो यहाँ उस कामीने अपनी प्रियतमाको अवश्य कंधेपर चढ़ाया होगा ॥ ३२ ॥ देखो- देखो, यहाँ परमप्रेमी
व्रजवल्लभने फूल चुननेके लिये अपनी प्रेयसीको नीचे उतार दिया है और यहाँ परम प्रियतम श्रीकृष्णने अपनी प्रेयसीके लिये फूल चुने हैं । उचक-उचककर फूल तोड़नेके कारण यहाँ उनके पंजे तो धरतीमें गड़े हुए हैं और एड़ीका पता ही नहीं है ॥ ३३ ॥ परम प्रेमी श्रीकृष्णने
कामी पुरुषके समान यहाँ अपनी प्रेयसीके केश सँवारे हैं । देखो, अपने चुने हुए फूलोंको प्रेयसीकी चोटीमें गूँथनेके लिये वे यहाँ अवश्य ही बैठे रहे होंगे || ३४ || परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण आत्माराम हैं । वे अपने -आपमें ही सन्तुष्ट और पूर्ण हैं । जब वे अखण्ड हैं, उनमें दूसरा कोई है ही नहीं, तब उनमें कामकी कल्पना कैसे हो सकती है? फिर भी उन्होंने कामियोंकी दीनता-स्त्रीपरवशता और स्त्रियोंकी कुटिलता दिखलाते हुए वहाँ उस गोपीके साथ एकान्तमें क्रीडा की थी- एक खेल रचा था ॥३५ ॥
न लक्ष्यन्ते पदान्यत्र तस्या नूनं तृणांकुरैः ।
खिद्यत्सुजाताङ्घ्रितलामुन्निन्ये प्रेयसीं प्रियः ॥ ३१
पृष्ठ 493
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
इमान्यधिकमग्नानि पदानि वहतो वधूम् ।
गोप्यः पश्यत कृष्णस्य भाराक्रान्तस्य कामिनः ॥३२
अत्रावरोपिता कान्ता पुष्पहेतोर्महात्मना ।
अत्र प्रसूनावचयः प्रियार्थे प्रेयसा कृतः ।
प्रपदाक्रमणे एते पश्यतासकले पदे ॥३३
केशप्रसाधनं त्वत्र कामिन्याः कामिना कृतम् ।
तानि चूडयता कान्तामुपविष्टमिह ध्रुवम् ॥३४
रेमे तया चात्मरत आत्मारामोऽप्यखण्डितः ।
कामिनां दर्शयन् दैन्यं स्त्रीणां चैव दुरात्मताम् ॥३५
इत्येवं दर्शयन्त्यस्ताश्चेरुर्गोप्यो विचेतसः ।
यां गोपीमनयत् कृष्णो विहायान्याः स्त्रियो वने ॥३६
सा च मेने तदाऽऽत्मानं वरिष्ठं सर्वयोषिताम् ।
हित्वा गोपीः कामयाना मामसौ भजते प्रियः ॥३७
इस प्रकार गोपियाँ मतवाली- सी होकर– अपनी सुधबुध खोकर एक दूसरेको भगवान् श्रीकृष्णके चरणचिह्न दिखलाती हुई वन- वनमें भटक रही थीं । इधर भगवान् श्रीकृष्ण दूसरी गोपियोंको वनमें छोड़कर जिस भाग्यवती गोपीको एकान्तमें ले गये थे, उसने समझा कि ‘ मैं ही समस्त गोपियोंमें श्रेष्ठ हूँ । इसीलिये तो हमारे प्यारे श्रीकृष्ण दूसरी गोपियोंको छोड़कर, जो उन्हें इतना चाहती हैं, केवल मेरा ही मान करते हैं । मुझे ही आदर दे रहे हैं ॥३६-३७ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण ब्रह्मा और शंकरके भी शासक हैं । वह गोपी वनमें जाकर अपने प्रेम और सौभाग्यके मदसे मतवाली हो गयी और उन्हीं श्रीकृष्णसे कहने लगी- ' प्यारे! मुझसे अब तो और नहीं चला जाता । मेरे सुकुमार पाँव थक गये हैं । अब तुम जहाँ चलना चाहो, मुझे अपने कंधेपर चढ़ाकर ले चलो' || ३८ || अपनी प्रियतमाकी यह बात सुनकर श्यामसुन्दरने कहा ——अच्छा प्यारी! तुम अब मेरे कंधेपर चढ़ लो । ' यह सुनकर वह गोपी ज्यों ही उनके कंधेपर चढ़ने चली, त्यों ही श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये और वह सौभाग्यवती गोपी रोने - पछताने लगी ॥३९ ॥ ‘ हा नाथ! हा रमण! हा प्रेष्ठ! हा महाभुज! तुम कहाँ हो! कहाँ हो!! मेरे सखा!
मैं तुम्हारी दीन -हीन दासी हूँ । शीघ्र ही मुझे अपने सान्निध्यका अनुभव कराओ, मुझे दर्शन दो' ॥४० ॥ परीक्षित्! गोपियाँ भगवान्के चरणचिह्नोंके सहारे उनके जानेका मार्ग ढूँढ़ती-ढूँढ़ती वहाँ जा पहुँची । थोड़ी दूरसे ही उन्होंने देखा कि उनकी सखी अपने प्रियतमके
वियोगसे दुःखी होकर अचेत हो गयी है ॥ ४१ ॥ जब उन्होंने उसे जगाया, तब उसने भगवान्
श्रीकृष्णसे उसे जो प्यार और सम्मान प्राप्त हुआ था, वह उनको सुनाया । उसने यह भी कहा
पृष्ठ 494
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कि ' मैंने कुटिलतावश उनका अपमान किया, इसीसे वे अन्तर्धान हो गये । ' उसकी बात सुनकर गोपियोंके आश्चर्यकी सीमा न रही ॥४२ ॥
ततो गत्वा वनोद्देशं दृप्ता केशवमब्रवीत् ।
न पारयेऽहं चलितुं नय मां यत्र ते मनः ॥ ३८
एवमुक्तः प्रियामाह स्कन्ध आरुह्यतामिति ।
ततश्चान्तर्दधे कृष्णः सा वधूरन्वतप्यत ॥३९
हा नाथ रमण प्रेष्ठ क्वासि क्वासि महाभुज ।
दास्यास्ते कृपणाया मे सखे दर्शय सन्निधिम् ॥४०
अन्विच्छन्त्यो भगवतो मार्गं गोप्योऽविदूरतः ।
ददृशुः प्रियविश्लेषमोहितां दुःखितां सखीम् ॥४१
तया कथितमाकर्ण्य मानप्राप्तिं च माधवात् ।
अवमानं च दौरात्म्याद् विस्मयं परमं ययुः ॥४२
ततोऽविशन् वनं चन्द्रज्योत्स्ना यावद् विभाव्यते ।
तयः प्रविष्टमालक्ष्य ततो निववृतुः स्त्रियः ॥४३
तन्मनस्कास्तदालापास्तद्विचेष्टास्तदात्मिकाः ।
तद्गुणानेव गायन्त्यो नात्मागाराणि सस्मरुः ॥४४
इसके बाद वनमें जहाँतक चन्द्रदेवकी चाँदनी छिटक रही थी, वहाँतक वे उन्हें ढूँढ़ती हुई गयीं । परन्तु जब उन्होंने देखा कि आगे घना अन्धकार है - घोर जंगल है- हम ढूँढ़ती जायँगी तो श्रीकृष्ण और भी उसके अंदर घुस जायँगे, तब वे उधरसे लौट आयीं ॥४३ ॥ परीक्षित्!
गोपियोंका मन श्रीकृष्णमय हो गया था । उनकी वाणीसे कृष्णचर्चाके अतिरिक्त और कोई बात नहीं निकलती थी । उनके शरीरसे केवल श्रीकृष्णके लिये और केवल श्रीकृष्णकी चेष्टाएँ हो रही थीं । कहाँतक कहूँ, उनका रोम- रोम, उनकी आत्मा श्रीकृष्णमय हो रही थी । वे केवल उनके गुणों और लीलाओंका ही गान कर रही थीं और उनमें इतनी तन्मय हो रही थीं कि उन्हें अपने शरीरकी भी सुध नहीं थी, फिर घरकी याद कौन करता? ॥४४ ॥
पुनः पुलिनमागत्य कालिन्द्याः कृष्णभावनाः ।
समवेता जगुः कृष्णं तदागमनकांक्षिताः ॥४५
गोपियोंका रोम - रोम इस बातकी प्रतीक्षा और आकांक्षा कर रहा था कि जल्दी - से - जल्दी श्रीकृष्ण आयें। श्रीकृष्णकी ही भावनामें डूबी हुई गोपियाँ यमुनाजीके पावन पुलिनपर-
पृष्ठ 495
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
रमणरेतीमें लौट आयीं और एक साथ मिलकर श्रीकृष्णके गुणोंका गान करने लगीं ॥ ४५ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे रासक्रीडायां कृष्णान्वेषणं नाम त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
पृष्ठ 496
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अथैकत्रिंशोऽध्यायः गोपिकागीत गोप्य ऊचुः जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः
श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि ।
दयित दृश्यतां दिक्षु तावका- स्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते ॥१
शरदुदाशये साधुजातसत् सरसिजोदरश्रीमुषा दृशा । सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका वरद निघ्नतो नेह किं वधः ॥२ विषजलाप्ययाद् व्यालराक्षसाद्
वर्षमारुताद् वैद्युतानलात् ।
वृषमयात्मजाद् विश्वतोभया- दृषभ ते वयं रक्षिता मुहुः ॥ ३
न खलु गोपिकानन्दनो भवा- नखिलदेहिनामन्तरात्मदृक् । विखनसार्थितो विश्वगुप्तये सख उदेयिवान् सात्वतां कुले ॥४ गोपियाँ विरहावेशमें गाने लगीं - ' प्यारे! तुम्हारे जन्मके कारण वैकुण्ठ आदि लोकोंसे भी व्रजकी महिमा बढ़ गयी है । तभी तो सौन्दर्य और मृदुलताकी देवी लक्ष्मीजी अपना निवासस्थान वैकुण्ठ छोड़कर यहाँ नित्य निरन्तर निवास करने लगी हैं, इसकी सेवा करने लगी हैं । परन्तु प्रियतम! देखो तुम्हारी गोपियाँ जिन्होंने तुम्हारे चरणोंमें ही अपने प्राण समर्पित कर रखे हैं, वन- वनमें भटककर तुम्हें ढूँढ़ रही हैं ॥१ ॥ हमारे प्रेमपूर्ण हृदयके
स्वामी! हम तुम्हारी बिना मोलकी दासी हैं । तुम शरत्कालीन जलाशयमें सुन्दर- से - सुन्दर सरसिजकी कर्णिकाके सौन्दर्यको चुरानेवाले नेत्रोंसे हमें घायल कर चुके हो । हमारे मनोरथ पूर्ण करनेवाले प्राणेश्वर! क्या नेत्रोंसे मारना वध नहीं है? अस्त्रोंसे हत्या करना ही वध है? ॥२॥ पुरुषशिरोमणे! यमुनाजीके विषैले जलसे होनेवाली मृत्यु, अजगरके रूपमें
खानेवाले अघासुर, इन्द्रकी वर्षा, आँधी, बिजली, दावानल, वृषभासुर और व्योमासुर आदिसे एवं भिन्न -भिन्न अवसरोंपर सब प्रकारके भयोंसे तुमने बार- बार हमलोगोंकी रक्षा की है ॥३ ॥
पृष्ठ 497
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तुम केवल यशोदानन्दन ही नहीं हो; समस्त शरीरधारियोंके हृदयमें रहनेवाले उनके साक्षी हो, अन्तर्यामी हो । सखे! ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे विश्वकी रक्षा करनेके लिये तुम यदुवंशमें अवतीर्ण हुए हो ॥४ ॥
विरचिताभयं वृष्णिधुर्य ते चरणमीयुषां संसृतेर्भयात् । करसरोरुहं कान्त कामदं शिरसि धेहि नः श्रीकरग्रहम् ॥५ व्रजजनार्तिहन् वीर योषितां निजजनस्मयध्वंसनस्मित । भज सखे भवत्किंकरीः स्म नो जलरुहाननं चारु दर्शय ॥६ प्रणतदेहिनां पापकर्शनं तृणचरानुगं श्रीनिकेतनम् । फणिफणार्पितं ते पदाम्बुजं कृणु कुचेषु नः कृन्धि हृच्छयम् ॥७ मधुरया गिरा वल्गुवाक्यया
बुधमनोज्ञया पुष्करेक्षण ।
विधिकरीरिमा वीर मुह्यती- रधरसीधुनाऽऽप्याययस्व नः ॥८
अपने प्रेमियोंकी अभिलाषा पूर्ण करनेवालोंमें अग्रगण्य यदुवंशशिरोमणे! जो लोग जन्म- मृत्युरूप संसारके चक्करसे डरकर तुम्हारे चरणोंकी शरण ग्रहण करते हैं, उन्हें तुम्हारे करकमल अपनी छत्र-छायामें लेकर अभय कर देते हैं । हमारे प्रियतम! सबकी लालसा-अभिलाषाओंको पूर्ण करनेवाला वही करकमल, जिससे तुमने लक्ष्मीजीका हाथ पकड़ा है, हमारे सिरपर रख दो ॥ ५ ॥
व्रजवासियोंके दुःख दूर करनेवाले वीरशिरोमणि श्यामसुन्दर! तुम्हारी मन्द- मन्द मुसकानकी एक उज्ज्वल रेखा ही तुम्हारे प्रेमीजनोंके सारे मान- मदको चूर-चूर कर देनेके लिये पर्याप्त है । हमारे प्यारे सखा! हमसे रूठो मत, प्रेम करो । हम तो तुम्हारी दासी हैं, तुम्हारे चरणोंपर निछावर हैं । हम अबलाओंको अपना वह परम सुन्दर साँवला- साँवला मुखकमल दिखलाओ ॥६ ॥
तुम्हारे चरणकमल शरणागत प्राणियोंके सारे पापोंको नष्ट कर देते हैं । वे समस्त सौन्दर्य, माधुर्यकी खान हैं और स्वयं लक्ष्मीजी उनकी सेवा करती रहती हैं । तुम उन्हीं चरणोंसे हमारे
पृष्ठ 498
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बछड़ोंके पीछे - पीछे चलते हो और हमारे लिये उन्हें साँपके फणोंतकपर रखनेमें भी तुमने संकोच नहीं किया । हमारा हृदय तुम्हारी विरहव्यथाकी आगसे जल रहा है तुम्हारी मिलनकी आकांक्षा हमें सता रही है । तुम अपने वे ही चरण हमारे वक्षःस्थलपर रखकर हमारे हृदयकी ज्वालाको शान्त कर दो ॥७ ॥
कमलनयन! तुम्हारी वाणी कितनी मधुर है! उसका एक- एक पद, एक- एक शब्द, एक-एक अक्षर मधुरातिमधुर है । बड़े -बड़े विद्वान् उसमें रम जाते हैं । उसपर अपना सर्वस्व निछावर कर देते हैं । तुम्हारी उसी वाणीका रसास्वादन करके तुम्हारी आज्ञाकारिणी दासी गोपियाँ मोहित हो रही हैं । दानवीर! अब तुम अपना दिव्य अमृतसे भी मधुर अधर- रस पिलाकर हमें जीवन - दान दो, छका दो ॥८ ॥ प्रभो! तुम्हारी लीलाकथा भी अमृतस्वरूप है ।
विरहसे सताये हुए लोगोंके लिये तो वह जीवन सर्वस्व ही है । बड़े - बड़े ज्ञानी महात्माओं-भक्त कवियोंने उसका गान किया है, वह सारे पाप ताप तो मिटाती ही है, साथ ही श्रवणमात्रसे परम मंगल- परम कल्याणका दान भी करती है । वह परम सुन्दर, परम मधुर और बहुत विस्तृत भी है । जो तुम्हारी उस लीला- कथाका गान करते हैं, वास्तवमें भूलोकमें वे ही सबसे बड़े दाता हैं ॥९ ॥ प्यारे! एक दिन वह था, जब तुम्हारी प्रेमभरी हँसी और चितवन
तथा तुम्हारी तरह - तरहकी क्रीडाओंका ध्यान करके हम आनन्दमें मग्न हो जाया करती थीं । उनका ध्यान भी परम मंगलदायक है, उसके बाद तुम मिले । तुमने एकान्तमें हृदयस्पर्शी ठिठोलियाँ कीं, प्रेमकी बातें कहीं । हमारे कपटी मित्र! अब वे सब बातें याद आकर हमारे मनको क्षुब्ध किये देती हैं ॥१० ॥
तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम् । श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः ॥९ प्रहसितं प्रिय प्रेमवीक्षणं विहरणं च तेते ध्यानमङ्गलम् । रहसि संविदो या हृदिस्पृशः कुहक नो मनः क्षोभयन्ति हि ॥१० चलसि। यद् व्रजाच्चारयन् पशून् नलिनसुन्दरं नाथ ते पदम् । शिलतृणांकुरैः सीदतीति नः कलिलतां मनः कान्त गच्छति ॥११ दिनपरिक्षये नीलकुन्तलै- र्वनरुहाननं बिभ्रदावृतम् ।
पृष्ठ 499
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
घनरजस्वलं दर्शयन् मुहु- नसि नः स्मरं वीर यच्छसि ॥१२ प्रणतकामदं पद्मजार्चितं धरणिमण्डनं ध्येयमापदि । चरणपंकजं शन्तमं च ते रमण नः स्तनेष्वर्पयाधिहन् ॥१३ हमारे प्यारे स्वामी! तुम्हारे चरण कमलसे भी सुकोमल और सुन्दर हैं । जब तुम गौओंको चरानेके लिये व्रजसे निकलते हो तब यह सोचकर कि तुम्हारे वे युगल चरण कंकड़, तिनके और कुश- काँटे गड़ जानेसे कष्ट पाते होंगे, हमारा मन बेचैन हो जाता है । हमें बड़ा दुःख होता है ॥ ११ ॥ दिन ढलनेपर जब तुम वनसे घर लौटते हो, तो हम देखती हैं कि तुम्हारे
मुखकमलपर नीली- नीली अलकें लटक रही हैं और गौओंके खुरसे उड़- उड़कर घनी धूल पड़ी हुई है । हमारे वीर प्रियतम! तुम अपना वह सौन्दर्य हमें दिखा -दिखाकर हमारे हृदयमें मिलनकी आकांक्षा– प्रेम उत्पन्न करते हो ॥१२ ॥ प्रियतम! एकमात्र तुम्हीं हमारे सारे
दुःखोंको मिटानेवाले हो । तुम्हारे चरणकमल शरणागत भक्तोंकी समस्त अभिलाषाओंको पूर्ण करनेवाले हैं । स्वयं लक्ष्मीजी उनकी सेवा करती हैं और पृथ्वीके तो वे भूषण ही हैं । आपत्तिके समय एकमात्र उन्हींका चिन्तन करना उचित है, जिससे सारी आपत्तियाँ कट जाती हैं । कुंजविहारी! तुम अपने वे परम कल्याणस्वरूप चरणकमल हमारे वक्षःस्थलपर रखकर हृदयकी व्यथा शान्त कर दो ॥ १३ ॥ वीरशिरोमणे! तुम्हारा अधरामृत मिलनके सुखको—
आकांक्षाको बढ़ानेवाला है । वह विरहजन्य समस्त शोक- सन्तापको नष्ट कर देता है । यह गानेवाली बाँसुरी भलीभाँति उसे चूमती रहती है । जिन्होंने एक बार उसे पी लिया, उन लोगोंको फिर दूसरों और दूसरोंकी आसक्तियोंका स्मरण भी नहीं होता । हमारे वीर! अपना वही अधरामृत हमें वितरण करो, पिलाओ || १४ || प्यारे! दिनके समय जब तुम वनमें विहार करनेके लिये चले जाते हो, तब तुम्हें देखे बिना हमारे लिये एक- एक क्षण युगके समान हो जाता है और जब तुम सन्ध्याके समय लौटते हो तथा घुँघराली अलकोंसे युक्त तुम्हारा परम सुन्दर मुखारविन्द हम देखती हैं, उस समय पलकोंका गिरना हमारे लिये भार हो जाता है और ऐसा जान पड़ता है कि इन नेत्रोंकी पलकोंको बनानेवाला विधाता मूर्ख है ॥१५ ॥ प्यारे
श्यामसुन्दर! हम अपने पति-पुत्र, भाई- बन्धु और कुल परिवारका त्यागकर, उनकी इच्छा और आज्ञाओंका उल्लंघन करके तुम्हारे पास आयी हैं । हम तुम्हारी एक- एक चाल जानती हैं, संकेत समझती हैं और तुम्हारे मधुर गानकी गति समझकर, उसीसे मोहित होकर यहाँ आयी हैं। कपटी! इस प्रकार रात्रिके समय आयी हुई युवतियोंको तुम्हारे सिवा और कौन छोड़ सकता है ॥१६ ॥ प्यारे! एकान्तमें तुम मिलनकी आकांक्षा, प्रेम- भावको जगानेवाली बातें
करते थे । ठिठोली करके हमें छेड़ते थे । तुम प्रेमभरी चितवनसे हमारी ओर देखकर मुसकरा देते थे और हम देखती थीं तुम्हारा वह विशाल वक्षःस्थल, जिसपर लक्ष्मीजी नित्य- निरन्तर निवास करती हैं । तबसे अबतक निरन्तर हमारी लालसा बढ़ती ही जा रही है और हमारा मन
पृष्ठ 500
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अधिकाधिक मुग्ध होता जा रहा है ॥१७ ॥ प्यारे! तुम्हारी यह अभिव्यक्ति व्रज- वनवासियोंके
सम्पूर्ण दुःख- तापको नष्ट करनेवाली और विश्वका पूर्ण मंगल करनेके लिये है । हमारा हृदय तुम्हारे प्रति लालसासे भर रहा है । कुछ थोड़ी - सी ऐसी ओषधि दो, जो तुम्हारे निजजनोंके हृदयरोगको सर्वथा निर्मूल कर दे ॥१८ ॥
सुरतवर्धनं शोकनाशनं स्वरितवेणुना सुष्ठु चुम्बितम् । इतररागविस्मारणं नृणां वितर वीर नस्तेऽधरामृतम् ॥१४ अटति यद् भवानह्नि काननं त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम् । कुटिलकुन्तलं श्रीमुखं च ते जड उदीक्षतां पक्ष्मकृद् दृशाम् ॥१५ पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवा- नतिविलङ्घ्य तेऽन्त्यच्युतागताः । गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः कितव योषितः कस्त्यजेन्निशि ॥१६ रहसि संविदं हृच्छयोदयं प्रहसिताननं प्रेमवीक्षणम् । बृहदुरः श्रियो वीक्ष्य धाम ते मुहुरतिस्पृहा मुह्यते मनः ॥१७ व्रजवनौकसां व्यक्तिरङ्ग ते वृजिनहन्त्र्यलं विश्वमङ्गलम् । त्यज मनाक् च नस्त्वत्स्पृहात्मनां स्वजनहृद्रुजां यन्निषूदनम् ॥१८ यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु । तेनाटवीमटसि तद् व्यथते न किंस्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः ॥ १ ९ तुम्हारे चरण कमलसे भी सुकुमार हैं । उन्हें हम अपने कठोर स्तनोंपर भी डरते - डरते बहुत धीरेसे रखती हैं कि कहीं उन्हें चोट न लग जाय । उन्हीं चरणोंसे तुम रात्रिके समय घोर