श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 511–520

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 511–520

पृष्ठ 511

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 511 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

यमुनाजलमें गोपियोंने प्रेमभारी चितवनसे भगवान्‌की ओर देख-देखकर तथा हँस - हँसकर उनपर इधर- उधरसे जलकी खूब बौछारें डालीं । जल उलीच उलीचकर उन्हें खूब नहलाया । विमानोंपर चढ़े हुए देवता पुष्पोंकी वर्षा करके उनकी स्तुति करने लगे । इस प्रकार यमुनाजलमें स्वयं आत्माराम भगवान् श्रीकृष्णने गजराजके समान जलविहार किया ॥२४ ॥

इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण व्रजयुवतियों और भौंरोंकी भीड़से घिरे हुए यमुनातटके उपवनमें गये । वह बड़ा ही रमणीय था । उसके चारों ओर जल और स्थलमें बड़ी सुन्दर सुगन्धवाले फूल खिले हुए थे । उनकी सुवास लेकर मन्द मन्द वायु चल रही थी । उसमें भगवान् इस प्रकार विचरण करने लगे, जैसे मदमत्त गजराज हथिनियोंके झुंडके साथ घूम रहा हो ॥२५ ॥

परीक्षित्! शरद्की वह रात्रि जिसके रूपमें अनेक रात्रियाँ पुंजीभूत हो गयी थीं, बहुत ही सुन्दर थी । चारों ओर चन्द्रमाकी बड़ी सुन्दर चाँदनी छिटक रही थी । काव्योंमें शरद् ऋतुकी जिन रस- सामग्रियोंका वर्णन मिलता है, उन सभीसे वह युक्त थी । उसमें भगवान् श्रीकृष्णने अपनी प्रेयसी गोपियोंके साथ यमुनाके पुलिन, यमुनाजी और उनके उपवनमें विहार किया । यह बात स्मरण रखनी चाहिये कि भगवान् सत्यसंकल्प हैं । यह सब उनके चिन्मय संकल्पकी ही चिन्मयी लीला है । और उन्होंने इस लीलामें कामभावको, उसकी चेष्टाओंको तथा उसकी क्रियाको सर्वथा अपने अधीन कर रखा था, उन्हें अपने - आपमें कैद कर रखा था ॥ २६ ॥

ताभिर्युतः श्रममपोहितुमङ्गसङ्ग- घृष्टस्रजः स कुचकुंकुमरंजितायाः । गन्धर्वपालिभिरनुद्रुत आविशद् वाः श्रान्तो गजीभिरिभराडिव भिन्नसेतुः ॥२३ सोऽम्भस्यलं युवतिभिः परिषिच्यमानः प्रेम्णेक्षितः प्रहसतीभिरितस्ततोऽङ्ग । वैमानिकैः कुसुमवर्षिभिरीड्यमानो रेमे स्वयं स्वरतिरत्र गजेन्द्रलीलः ॥२४ ततश्च कृष्णोपवने जलस्थल- प्रसूनगन्धानिलजुष्टदिक्तटे । चचार भृङ्गप्रमदागणावृतो यथा मदच्युद् द्विरदः करेणुभिः ॥ २५ एवं शशांकांशुविराजिता निशाः स सत्यकामोऽनुरता लागणः । सिषेव आत्मन्यवरुद्धसौरतः सर्वाः शरत्काव्यकथारसाश्रयाः ॥२६ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 512

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 512 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

राजोवाच

संस्थापनाय धर्मस्य प्रशमायेतरस्य च ।

अवतीर्णो हि भगवानंशेन जगदीश्वरः ॥२७

स कथं धर्मसेतूनां वक्ता कर्ताभिरक्षिता ।

प्रतीपमाचरद् ब्रह्मन् परदाराभिमर्शनम् ॥२८

आप्तकामो यदुपतिः कृतवान् वै जुगुप्सितम् ।

किमभिप्राय एतं नः संशयं छिन्धि सुव्रत ॥२९

श्रीशुक उवाच

धर्मव्यतिक्रमो दृष्ट ईश्वराणां च साहसम् ।

तेजीयसां न दोषाय वह्नेः सर्वभुजो यथा ॥३०

नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः ।

विनश्यत्याचरन् मौढ्याद्यथारुद्रोऽब्धिजं विषम् ॥३१

ईश्ववराणां वचः सत्यं तथैवाचरितं क्वचित् ।

तेषां यत् स्ववचोयुक्तं बुद्धिमांस्तत् समाचरेत् ॥३२

राजा परीक्षित्ने पूछा — भगवन्! भगवान् श्रीकृष्ण सारे जगत्के एकमात्र स्वामी हैं । उन्होंने अपने अंश श्रीबलरामजीके सहित पूर्णरूपमें अवतार ग्रहण किया था । उनके अवतारका उद्देश्य ही यह था कि धर्मकी स्थापना हो और अधर्मका नाश ॥२७ ॥ ब्रह्मन्! वे

धर्ममर्यादाके बनानेवाले, उपदेश करनेवाले और रक्षक थे । फिर उन्होंने स्वयं धर्मके विपरीत परस्त्रियोंका स्पर्श कैसे किया || २८ || मैं मानता हूँ कि भगवान् श्रीकृष्ण पूर्णकाम थे, उन्हें किसी भी वस्तुकी कामना नहीं थी, फिर भी उन्होंने किस अभिप्रायसे यह निन्दनीय कर्म किया? परम ब्रह्मचारी मुनीश्वर! आप कृपा करके मेरा यह सन्देह मिटाइये ॥२९ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं -सूर्य, अग्नि आदि ईश्वर ( समर्थ) कभी - कभी धर्मका उल्लंघन और साहसका काम करते देखे जाते हैं । परंतु उन कामोंसे उन तेजस्वी पुरुषोंको कोई दोष नहीं होता । देखो, अग्नि सब कुछ खा जाता है, परन्तु उन पदार्थोंके दोषसे लिप्त नहीं होता ॥३० ॥ जिन लोगोंमें ऐसी सामर्थ्य नहीं है, उन्हें मनसे भी वैसी बात कभी नहीं सोचनी

चाहिये, शरीरसे करना तो दूर रहा । यदि मूर्खतावश कोई ऐसा काम कर बैठे, तो उसका नाश हो जाता है । भगवान् शंकरने हलाहल विष पी लिया था, दूसरा कोई पिये तो वह जलकर भस्म हो जायगा || ३१ || इसलिये इस प्रकारके जो शंकर आदि ईश्वर हैं, अपने अधिकारके अनुसार उनके वचनको ही सत्य मानना और उसीके अनुसार आचरण करना चाहिये । उनके आचरणका अनुकरण तो कहीं- कहीं ही किया जाता है । इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 513

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 513 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

कि उनका जो आचरण उनके उपदेशके अनुकूल हो, उसीको जीवनमें उतारे ॥३२ ॥

कुशलाचरितेनैषामिह स्वार्थो न विद्यते ।

विपर्ययेण वानर्थो निरहंकारिणां प्रभो ॥ ३३

किमुताखिलसत्त्वानां तिर्यङ्मर्त्यदिवौकसाम् ।

ईशितुश्चेशितव्यानां कुशलाकुशलान्वयः ॥ ३४

यत्पादपंकजपरागनिषेवतृप्त

योगप्रभावविधुताखिलकर्मबन्धाः ।

स्वैरं चरन्ति मुनयोऽपि न नह्यमाना- स्तस्येच्छयाऽऽत्तवपुषः कुत एव बन्धः ॥३५

गोपीनां तत्पतीनां च सर्वेषामेव देहिनाम् ।

योऽन्तश्चरति सोऽध्यक्षः क्रीडनेनेह देहभाक् ॥३६

अनुग्रहाय भूतानां मानुषं देहमास्थितः ।

भजते तादृशीः क्रीडा याः श्रुत्वा तत्परो भवेत् ॥ ३७

नासूयन् खलु कृष्णाय मोहितास्तस्य मायया ।

मन्यमानाः स्वपार्श्वस्थान् स्वान् स्वान् दारान् व्रजौकसः ॥३८

ब्रह्मरात्र उपावृत्ते वासुदेवानुमोदिताः ।

अनिच्छन्त्यो ययुर्गोप्यः स्वगृहान् भगवत्प्रियाः ॥३९

परीक्षित्! वे सामर्थ्यवान् पुरुष अहंकारहीन होते हैं, शुभकर्म करनेमें उनका कोई सांसारिक स्वार्थ नहीं होता और अशुभ कर्म करनेमें अनर्थ (नुकसान ) नहीं होता । वे स्वार्थ और अनर्थसे ऊपर उठे होते हैं ॥ ३३ ॥ जब उन्हींके सम्बन्धमें ऐसी बात है तब जो पशु,

पक्षी, मनुष्य, देवता आदि समस्त चराचर जीवोंके एकमात्र प्रभु सर्वेश्वर भगवान् हैं, उनके साथ मानवीय शुभ और अशुभका सम्बन्ध कैसे जोड़ा जा सकता है ॥३४ ॥ जिनके

चरणकमलोंके रजका सेवन करके भक्तजन तृप्त हो जाते हैं, जिनके साथ योग प्राप्त करके उसके प्रभावसे योगीजन अपने सारे कर्मबन्धन काट डालते हैं और विचारशील ज्ञानीजन जिनके तत्त्वका विचार करके तत्स्वरूप हो जाते हैं तथा समस्त कर्म - बन्धनोंसे मुक्त होकर स्वच्छन्द विचरते हैं, वे ही भगवान् अपने भक्तोंकी इच्छासे अपना चिन्मय श्रीविग्रह प्रकट करते हैं; तब भला, उनमें कर्मबन्धनकी कल्पना ही कैसे हो सकती है ॥ ३५ ॥ गोपियोंके,

उनके पतियोंके और सम्पूर्ण शरीरधारियोंके अन्तःकरणोंमें जो आत्मारूपसे विराजमान हैं, ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 514

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 514 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

जो सबके साक्षी और परमपति हैं, वही तो अपना दिव्य-चिन्मय श्रीविग्रह प्रकट करके यह लीला कर रहे हैं ॥ ३६ ॥

भगवान् जीवोंपर कृपा करनेके लिये ही अपनेको मनुष्यरूपमें प्रकट करते हैं और ऐसी लीलाएँ करते हैं, जिन्हें सुनकर जीव भगवत्परायण हो जायँ ॥ ३७ ॥ व्रजवासी गोपोंने

भगवान् श्रीकृष्णमें तनिक भी दोषबुद्धि नहीं की । वे उनकी योगमायासे मोहित होकर ऐसा समझ रहे थे कि हमारी पत्नियाँ हमारे पास ही हैं || ३८ || ब्रह्माकी रात्रिके बराबर वह रात्रि बीत गयी । ब्राह्ममुहूर्त आया । यद्यपि गोपियोंकी इच्छा अपने घर लौटनेकी नहीं थी, फिर भी भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे वे अपने - अपने घर चली गयीं । क्योंकि वे अपनी प्रत्येक चेष्टासे, प्रत्येक संकल्पसे केवल भगवान्‌को ही प्रसन्न करना चाहती थीं ॥ ३ ९ ॥ विक्रीडितं व्रजवधूभिरिदं च विष्णोः श्रद्धान्वितोऽनुशृणुयादथ वर्णयेद् यः ॥ भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं हृद्रोगमाश्वपहिनोत्यचिरेण धीरः ॥४० परीक्षित्! जो धीर पुरुष व्रजयुवतियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णके इस चिन्मय रास-विलासका श्रद्धाके साथ बार- बार श्रवण और वर्णन करता है, उसे भगवान्के चरणोंमें परा भक्तिकी प्राप्ति होती है और वह बहुत ही शीघ्र अपने हृदयके रोग-कामविकारसे छुटकारा पा जाता है । उसका कामभाव सर्वदाके लिये नष्ट हो जाता है * ॥ ४० ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे रासक्रीडावर्णनं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥३३ ॥

* श्रीमद्भागवतमें ये रासलीलाके पाँच अध्याय उसके पाँच प्राण माने जाते हैं । भगवान् श्रीकृष्णकी परम अन्तरंगलीला, निजस्वरूपभूता गोपिकाओं और ह्लादिनी शक्ति श्रीराधाजीके साथ होनेवाली भगवान्‌की दिव्यातिदिव्य क्रीडा, इन अध्यायोंमें कही गयी है । ‘ रास ' शब्दका मूल रस है और रस स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण हैं— ' रसो वै सः ’ । जिस दिव्य क्रीडामें एक ही रस अनेक रसोंके रूपमें होकर अनन्त- अनन्त रसका समास्वादन करे; एक रस ही रस- समूहके रूपमें प्रकट होकर स्वयं ही आस्वाद्य - आस्वादक, लीला, धाम और विभिन्न आलम्बन एवं उद्दीपनके रूपमें क्रीडा करे – उसका नाम रास है । भगवान्की यह दिव्य लीला भगवान्के दिव्य धाममें दिव्य रूपसे निरन्तर हुआ करती है । यह भगवान्की विशेष कृपासे प्रेमी साधकोंके हितार्थ कभी -कभी अपने दिव्य धामके साथ ही भूमण्डलपर भी अवतीर्ण हुआ करती है, जिसको देख- सुन एवं गाकर तथा स्मरण- चिन्तन करके ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 515

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 515 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधिकारी पुरुष रसस्वरूप भगवान्‌की इस परम रसमयी लीलाका आनन्द ले सकें और स्वयं भी भगवान्की लीलामें सम्मिलित होकर अपनेको कृतकृत्य कर सकें । इस पंचाध्यायीमें वंशीध्वनि, गोपियोंके अभिसार, श्रीकृष्णके साथ उनकी बातचीत, रमण, श्रीराधाजीके साथ अन्तर्धान, पुनः प्राकट्य, गोपियोंके द्वारा दिये हुए वसनासनपर विराजना, गोपियोंके कूट प्रश्नका उत्तर, रासनृत्य, क्रीडा, जलकेलि और वनविहारका वर्णन है—जो मानवी भाषामें होनेपर भी वस्तुतः परम दिव्य है । समयके साथ ही मानव मस्तिष्क भी पलटता रहता है। कभी अन्तर्दृष्टिकी प्रधानता हो जाती है और कभी बहिर्दृष्टिकी । आजका युग ही ऐसा है, जिसमें भगवान्‌की दिव्य-लीलाओंकी तो बात ही क्या, स्वयं भगवान्‌के अस्तित्वपर ही अविश्वास प्रकट किया जा रहा है । ऐसी स्थितिमें इस दिव्य लीलाका रहस्य न समझकर लोग तरह -तरहकी आशंका प्रकट करें, इसमें आश्चर्यकी कोई बात नहीं है । यह लीला अन्तर्दृष्टिसे और मुख्यतः भगवत्कृपासे ही समझमें आती है । जिन भाग्यवान् और भगवत्कृपाप्राप्त महात्माओंने इसका अनुभव किया है, वे धन्य हैं और उनकी चरण- धूलिके प्रतापसे ही त्रिलोकी धन्य है। उन्हींकी उक्तियोंका आश्रय लेकर यहाँ रासलीलाके सम्बन्धमें यत्किंचित् लिखनेकी धृष्टता की जाती है । यह बात पहले ही समझ लेनी चाहिये कि भगवान्‌का शरीर जीव- शरीरकी भाँति जड नहीं होता । जडकी सत्ता केवल जीवकी दृष्टिमें होती है, भगवान्की दृष्टिमें नहीं । यह देह है और यह देही है, इस प्रकारका भेदभाव केवल प्रकृतिके राज्यमें होता है । अप्राकृत लोकमें— जहाँकी प्रकृति भी चिन्मय है – सब कुछ चिन्मय ही होता है; वहाँ अचित्की प्रतीति तो केवल चिद्विलास अथवा भगवान्की लीलाकी सिद्धिके लिये होती है । इसलिये स्थूलतामें — या यों कहिये कि जडराज्यमें रहनेवाला मस्तिष्क जब भगवान्‌की अप्राकृत लीलाओंके सम्बन्धमें विचार करने लगता है, तब वह अपनी पूर्व वासनाओंके अनुसार जडराज्यकी धारणाओं, कल्पनाओं और क्रियाओंका ही आरोप उस दिव्य राज्यके विषयमें भी करता है, इसलिये दिव्य - लीलाके रहस्यको समझनेमें असमर्थ हो जाता है । यह रास वस्तुतः परम उज्ज्वल रसका एक दिव्य प्रकाश है । जड जगत्की बात तो दूर रही, ज्ञानरूप या विज्ञानरूप जगत्में भी यह प्रकट नहीं होता । अधिक क्या, साक्षात् चिन्मय तत्त्वमें भी इस परम दिव्य उज्ज्वल रसका लेशाभास नहीं देखा जाता। इस परम रसकी स्फूर्ति तो परम भावमयी श्रीकृष्णप्रेमस्वरूपा गोपीजनोंके मधुर हृदयमें ही होती है । इस रासलीलाके यथार्थस्वरूप और परम माधुर्यका आस्वाद उन्हींको मिलता है, दूसरे लोग तो इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते । भगवान्के समान ही गोपियाँ भी परमरसमयी और सच्चिदानन्दमयी ही हैं । साधनाकी दृष्टिसे भी उन्होंने न केवल जड शरीरका ही त्याग कर दिया है, बल्कि सूक्ष्म शरीरसे प्राप्त होनेवाले स्वर्ग, कैवल्यसे अनुभव होनेवाले मोक्ष- और तो क्या, जडताकी दृष्टिका ही त्याग कर दिया है । उनकी दृष्टिमें केवल चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण हैं, उनके हृदयमें श्रीकृष्णको तृप्त करनेवाला प्रेमामृत है । उनकी इस अलौकिक स्थितिमें स्थूलशरीर, उसकी स्मृति और उसके सम्बन्धसे होनेवाले अंग- संगकी कल्पना किसी भी प्रकार नहीं की जा सकती । ऐसी कल्पना ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 516

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 516 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तो केवल देहात्मबुद्धिसे जकड़े हुए जीवोंकी ही होती है । जिन्होंने गोपियोंको पहचाना है, उन्होंने गोपियोंकी चरणधूलिका स्पर्श प्राप्त करके अपनी कृतकृत्यता चाही है । ब्रह्मा, शंकर, उद्धव और अर्जुनने गोपियोंकी उपासना करके भगवान्‌के चरणोंमें वैसे प्रेमका वरदान प्राप्त किया है या प्राप्त करनेकी अभिलाषा की है । उन गोपियोंके दिव्य भावको साधारण स्त्री-पुरुषके भाव - जैसा मानना गोपियोंके प्रति, भगवान्के प्रति और वास्तवमें सत्यके प्रति महान् अन्याय एवं अपराध है । इस अपराधसे बचनेके लिये भगवान्‌की दिव्य लीलाओंपर विचार करते समय उनकी अप्राकृत दिव्यताका स्मरण रखना परमावश्यक है । भगवान्का चिदानन्दघन शरीर दिव्य है । वह अजन्मा और अविनाशी है, हानोपादानरहित है । वह नित्य सनातन शुद्ध भगवत्स्वरूप ही है । इसी प्रकार गोपियाँ दिव्य जगत्की भगवान्की स्वरूपभूता अन्तरंगशक्तियाँ हैं । इन दोनोंका सम्बन्ध भी दिव्य ही है । यह उच्चतम भावराज्यकी लीला स्थूल शरीर और स्थूल मनसे परे है । आवरण- भंगके अनन्तर अर्थात् चीरहरण करके जब भगवान् स्वीकृति देते हैं, तब इसमें प्रवेश होता है । प्राकृत देहका निर्माण होता है स्थूल, सूक्ष्म और कारण-इन तीन देहोंके संयोगसे । जबतक ‘ कारण शरीर' रहता है, तबतक इस प्राकृत देहसे जीवको छुटकारा नहीं मिलता । ‘ कारण शरीर' कहते हैं पूर्वकृत कर्मोंके उन संस्कारोंको, जो देह - निर्माणमें कारण होते हैं । इस ‘ कारण शरीर' के आधारपर जीवको बार- बार जन्म - मृत्युके चक्करमें पड़ना होता है और यह चक्र जीवकी मुक्ति न होनेतक अथवा ' कारण' का सर्वथा अभाव न होनेतक चलता ही रहता है । इसी कर्मबन्धनके कारण पांचभौतिक स्थूलशरीर मिलता है - जो रक्त, मांस, अस्थि आदिसे भरा और चमड़ेसे ढका होता है । प्रकृतिके राज्यमें जितने शरीर होते हैं, सभी वस्तुतः योनि और बिन्दुके संयोगसे ही बनते हैं; फिर चाहे कोई कामजनित निकृष्ट मैथुनसे उत्पन्न हो या ऊर्ध्वरेता महापुरुषके संकल्पसे, बिन्दुके अधोगामी होनेपर कर्तव्यरूप श्रेष्ठ मैथुनसे हो, अथवा बिना ही मैथुनके नाभि, हृदय, कण्ठ, कर्ण, नेत्र, सिर, मस्तक आदिके स्पर्शसे, बिना ही स्पर्शके केवल दृष्टिमात्रसे अथवा बिना देखे केवल संकल्पसे ही उत्पन्न हो । ये मैथुनी-अमैथुनी ( अथवा कभी - कभी स्त्री या पुरुष- शरीरके बिना भी उत्पन्न होनेवाले) सभी शरीर हैं योनि और बिन्दुके संयोगजनित ही । ये सभी प्राकृत शरीर हैं । इसी प्रकार योगियोंके द्वारा निर्मित ‘ निर्माणकाय ' यद्यपि अपेक्षाकृत शुद्ध हैं, परन्तु वे भी हैं प्राकृत ही । पितर या देवोंके दिव्य कहलानेवाले शरीर भी प्राकृत ही हैं । अप्राकृत शरीर इन सबसे विलक्षण हैं, जो महाप्रलयमें भी नष्ट नहीं होते । और भगवद्देह तो साक्षात् भगवत्स्वरूप ही है । देव- शरीर प्रायः रक्त - मांस - मेद- अस्थिवाले नहीं होते । अप्राकृत शरीर भी नहीं होते । फिर भगवान् श्रीकृष्णका भगवत्स्वरूप शरीर तो रक्त - मांस- अस्थिमय होता ही कैसे । वह तो सर्वथा चिदानन्दमय है । उसमें देह- देही, गुण-गुणी, रूप-रूपी, नाम- नामी और लीला तथा लीलापुरुषोत्तमका भेद नहीं है । श्रीकृष्णका एक-एक अंग पूर्ण श्रीकृष्ण है । श्रीकृष्णका मुखमण्डल जैसे पूर्ण श्रीकृष्ण है, वैसे ही श्रीकृष्णका पदनख भी पूर्ण श्रीकृष्ण है । श्रीकृष्णकी सभी इन्द्रियसे सभी काम हो सकते हैं । उनके कान देख सकते हैं, उनकी आँखें सुन सकती हैं, उनकी नाक स्पर्श कर सकती है, उनकी रसना सूँघ सकती है, उनकी त्वचा स्वाद ले सकती है । वे हाथोंसे ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 517

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 517 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

देख सकते हैं, आँखोंसे चल सकते हैं । श्रीकृष्णका सब कुछ श्रीकृष्ण होनेके कारण वह सर्वथा पूर्णतम है । इसीसे उनकी रूपमाधुरी नित्यवर्द्धनशील, नित्य नवीन सौन्दर्यमयी है । उसमें ऐसा चमत्कार है कि वह स्वयं अपनेको ही आकर्षित कर लेती है । फिर उनके सौन्दर्य- माधुर्यसे गौ- हरिन और वृक्ष-बेल पुलकित हो जायँ, इसमें तो कहना ही क्या है । भगवान्के ऐसे स्वरूपभूत शरीरसे गंदा मैथुनकर्म सम्भव नहीं । मनुष्य जो कुछ खाता है, उससे क्रमशः रस, रक्त, मांस, मेद, मज्जा और अस्थि बनकर अन्तमें शुक्र बनता है; इसी शुक्रके आधारपर शरीर रहता है और मैथुनक्रियामें इसी शुक्रका क्षरण हुआ करता है । भगवान्‌का शरीर न तो कर्मजन्य है, न मैथुनी सृष्टिका है और न दैवी ही है । वह तो इन सबसे परे सर्वथा विशुद्ध भगवत्स्वरूप है । उसमें रक्त, मांस, अस्थि आदि नहीं हैं; अतएव उसमें शुक्र भी नहीं है । इसलिये उसमें प्राकृत पांचभौतिक शरीरोंवाले स्त्री- पुरुषोंके रमण या मैथुनकी कल्पना भी नहीं हो सकती । इसीलिये भगवान्‌को उपनिषद्में ' अखण्ड ब्रह्मचारी ' बतलाया गया है और इसीसे भागवतमें उनके लिये ' अवरुद्धसौरत ' आदि शब्द आये हैं । फिर कोई शंका करे कि उनके सोलह हजार एक सौ आठ रानियोंके इतने पुत्र कैसे हुए तो इसका सीधा उत्तर यही है कि यह सारी भागवती सृष्टि थी, भगवान्‌के संकल्पसे हुई थी । भगवान्के शरीरमें जो रक्त-मांस आदि दिखलायी पड़ते हैं, वह तो भगवान्की योगमायाका चमत्कार है । इस विवेचनसे भी यही सिद्ध होता है कि गोपियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णका जो रमण हुआ वह सर्वथा दिव्यभगवत्-- राज्यकी लीला है, लौकिक काम -क्रीडा नहीं । इन गोपियोंकी साधना पूर्ण हो चुकी है । भगवान्ने अगली रात्रियोंमें उनके साथ विहार करनेका प्रेम- संकल्प कर लिया है । इसीके साथ उन गोपियोंको भी जो नित्यसिद्धा हैं, जो लोकदृष्टिमें विवाहिता भी हैं, इन्हीं रात्रियोंमें दिव्य -लीलामें सम्मिलित करना है । वे अगली रात्रियाँ कौन - सी हैं, यह बात भगवान्‌की दृष्टिके सामने है । उन्होंने शारदीय रात्रियोंको देखा । ‘ भगवान्ने देखा ’ –इसका अर्थ सामान्य नहीं, विशेष है । जैसे सृष्टिके प्रारम्भमें ' स ऐक्षत एकोऽहं बहु स्याम्। ' - भगवान् के इस ईक्षणसे जगत्की उत्पत्ति होती है, वैसे ही रासके प्रारम्भमें भगवान्के प्रेमवीक्षणसे शरत्कालकी दिव्य रात्रियोंकी सृष्टि होती है । मल्लिका - पुष्प, चन्द्रिका आदि समस्त उद्दीपनसामग्री भगवान्के द्वारा वीक्षित है अर्थात् लौकिक नहीं, अलौकिक— अप्राकृत है । गोपियोंने अपना मन श्रीकृष्णके मनमें मिला दिया था । उनके पास स्वयं मन न था । अब प्रेमदान करनेवाले श्रीकृष्णने विहारके लिये नवीन मनकी, दिव्य मनकी सृष्टि की । योगेश्वरेश्वर भगवान् श्रीकृष्णकी यही योगमाया है, जो रासलीलाके लिये दिव्य स्थल, दिव्य सामग्री एवं दिव्य मनका निर्माण किया करती है । इतना होनेपर भगवान्की बाँसुरी बजती है । भगवान्‌की बाँसुरी जडको चेतन, चेतनको जड, चलको अचल और अचलको चल, विक्षिप्तको समाधिस्थ और समाधिस्थको विक्षिप्त बनाती रहती है । भगवान्का प्रेमदान प्राप्त करके गोपियाँ निस्संकल्प, निश्चिन्त होकर घरके काममें लगी हुई थीं । कोई गुरुजनोंकी सेवा- ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 518

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 518 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शुश्रूषा– धर्मके काममें लगी हुई थी, कोई गो- दोहन आदि अर्थके काममें लगी हुई थी, कोई साज- ज- शृंगार आदि कामके साधनमें व्यस्त थी, कोई पूजा - पाठ आदि मोक्षसाधनमें लगी हुई थी । सब लगी हुई थीं अपने- अपने काममें, परन्तु वास्तवमें वे उनमेंसे एक भी पदार्थ चाहती न थीं। यही उनकी विशेषता थी और इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि वंशीध्वनि सुनते ही कर्मकी पूर्णतापर उनका ध्यान नहीं गया; काम पूरा करके चलें, ऐसा उन्होंने नहीं सोचा । वे चल पड़ीं उस साधक संन्यासीके समान, जिसका हृदय वैराग्यकी प्रदीप्त ज्वालासे परिपूर्ण है । किसीने किसीसे पूछा नहीं, सलाह नहीं की; अस्त- व्यस्त गतिसे जो जैसे थी, वैसे ही श्रीकृष्णके पास पहुँच गयी । वैराग्यकी पूर्णता और प्रेमकी पूर्णता एक ही बात है, दो नहीं । गोपियाँ व्रज और श्रीकृष्णके बीचमें मूर्तिमान् वैराग्य हैं या मूर्तिमान् प्रेम, क्या इसका निर्णय कोई कर सकता है? साधनाके दो भेद हैं - १ -मर्यादापूर्ण वैध साधना और २ – मर्यादारहित अवैध प्रेमसाधना । दोनोंके ही अपने - अपने स्वतन्त्र नियम हैं । वैध साधनामें जैसे नियमोंके बन्धनका, सनातन पद्धतिका, कर्तव्योंका और विविध पालनीय कर्मोंका त्याग साधनासे भ्रष्ट करनेवाला और महान् हानिकर है, वैसे ही अवैध प्रेमसाधनामें इनका पालन कलंकरूप होता है । यह बात नहीं कि इन सब आत्मोन्नतिके साधनोंको वह अवैध प्रेमसाधनाका साधक जान-बूझकर छोड़ देता है । बात यह है कि वह स्तर ही ऐसा है, जहाँ इनकी आवश्यकता नहीं है । ये वहाँ अपने - आप वैसे ही छूट जाते हैं, जैसे नदीके पार पहुँच जानेपर स्वाभाविक ही नौकाकी सवारी छूट जाती है । जमीनपर न तो नौकापर बैठकर चलनेका प्रश्न उठता है और न ऐसा चाहने या करनेवाला बुद्धिमान् ही माना जाता है । ये सब साधन वहींतक रहते हैं, जहाँतक सारी वृत्तियाँ सहज स्वेच्छासे सदा- सर्वदा एकमात्र भगवान्‌की ओर दौड़ने नहीं लग जातीं । इसीलिये भगवान्ने गीतामें एक जगह तो अर्जुनसे कहा है— न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन । नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥ यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् । संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥ सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो भारत यथा कुर्वन्ति कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥ (३।२२-२५) ' अर्जुन! यद्यपि तीनों लोकोंमें मुझे कुछ भी करना नहीं है और न मुझे किसी वस्तुको प्राप्त ही करना है, जो मुझे न प्राप्त हो; तो भी मैं कर्म करता ही हूँ । यदि मैं सावधान होकर कर्म न करूँ तो अर्जुन! मेरी देखा- देखी लोग कर्मोंको छोड़ बैठें और यों मेरे कर्म न करनेसे ये सारे लोक भ्रष्ट हो जायँ तथा मैं इन्हें वर्णसंकर बानानेवाला और सारी प्रजाका नाश ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 519

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 519 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

करनेवाला बनूँ । इसलिये मेरे इस आदर्शके अनुसार अनासक्त ज्ञानी पुरुषको भी लोकसंग्रहके लिये वैसे ही कर्म करना चाहिये, जैसे कर्ममें आसक्त अज्ञानी लोग करते हैं । ' यहाँ भगवान् आदर्श लोकसंग्रही महापुरुषके रूपमें बोलते हैं, लोकनायक बनकर सर्वसाधारणको शिक्षा देते हैं । इसलिये स्वयं अपना उदाहरण देकर लोगोंको कर्ममें प्रवृत्त करना चाहते हैं । ये ही भगवान् उसी गीतामें जहाँ अन्तरंगताकी बात कहते हैं, वहाँ स्पष्ट कहते हैं- सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । ( १८।६६) ‘ सारे धर्मोंका त्याग करके तू केवल एक मेरी शरणमें आ जा । ' यह बात सबके लिये नहीं है । इसीसे भगवान् १८६४ में इसे सबसे बढ़कर छिपी हुई गुप्त बात ( सर्वगुह्यतम ) कहकर इसके बादके ही श्लोकमें कहते हैं- इदं ते नातपस्काय नाभक्तायकदाचन । न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥ ( १८/६७) ‘ भैया अर्जुन! इस सर्वगुह्यतम बातको जो इन्द्रिय- विजयी तपस्वी न हो, मेरा भक्त न हो, सुनना न चाहता हो और मुझमें दोष लगाता हो, उसे न कहना । ' श्रीगोपीजन साधनाके इसी उच्च स्तरमें परम आदर्श थीं । इसीसे उन्होंने देह - गेह, पति-पुत्र, लोक- परलोक, कर्तव्य- धर्म - सबको छोड़कर, सबका उल्लंघन कर, एकमात्र परमधर्मस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णको ही पानेके लिये अभिसार किया था । उनका यह पति-पुत्रोंका त्याग, यह सर्वधर्मका त्याग ही उनके स्तरके अनुरूप स्वधर्म है । इस ‘ सर्वधर्मत्याग ’ रूप स्वधर्मका आचरण गोपियों- जैसे उच्च स्तरके साधकोंमें ही सम्भव है । क्योंकि सब धर्मोंका यह त्याग वही कर सकते हैं, जो इसका यथाविधि पूरा पालन कर चुकनेके बाद इसके परमफल अनन्य और अचिन्त्य देवदुर्लभ भगवत्प्रेमको प्राप्त कर चुकते हैं, वे भी जान-बूझकर त्याग नहीं करते। सूर्यका प्रखर प्रकाश हो जानेपर तैलदीपककी भाँति स्वतः ही ये धर्म उसे त्याग देते हैं । यह त्याग तिरस्कारमूलक नहीं, वरं तृप्तिमूलक है । भगवत्प्रेमकी ऊँची स्थितिका यही स्वरूप है । देवर्षि नारदजीका एक सूत्र है ‘ वेदानपि संन्यस्यति, केवलमविच्छिन्नानुरागं लभते । ' ' जो वेदोंका ( वेदमूलक समस्त धर्ममर्यादाओंका ) भी भलीभाँति त्याग कर देता है, वह अखण्ड, असीम भगवत्प्रेमको प्राप्त करता है । ' जिसको भगवान् अपनी वंशीध्वनि सुनाकर- नाम ले- लेकर बुलायें, वह भला, किसी दूसरे धर्मकी ओर ताककर कब और कैसे रुक सकता है । रोकनेवालोंने रोका भी, परन्तु हिमालयसे निकलकर समुद्रमें गिरनेवाली ब्रह्मपुत्र नदीकी प्रखर धाराको क्या कोई रोक सकता है? वे न रुकीं, नहीं रोकी जा सकीं । जिनके चित्तमें कुछ प्राक्तन संस्कार अवशिष्ट थे, वे अपने अनधिकारके कारण सशरीर जानेमें समर्थ न हुईं । उनका शरीर घरमें पड़ा रह गया, भगवान्‌के वियोग- दुःखसे उनके सारे कलुष धुल गये, ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 520

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 520 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

ध्यानमें प्राप्त भगवान्के प्रेमालिंगनसे उनके समस्त सौभाग्यका परमफल प्राप्त हो गया और वे भगवान्के पास सशरीर जानेवाली गोपियोंके पहुँचनेसे पहले ही भगवान्के पास पहुँच गयीं । भगवान्में मिल गयीं । यह शास्त्रका प्रसिद्ध सिद्धान्त है कि पाप - पुण्यके कारण ही बन्धन होता है और शुभाशुभका भोग होता है । शुभाशुभ कर्मोंके भोगसे जब पाप- पुण्य दोनों नष्ट हो जाते हैं, तब जीवकी मुक्ति हो जाती है। यद्यपि गोपियाँ पाप - पुण्यसे रहित श्रीभगवान्की प्रेम- प्रतिमास्वरूपा थीं, तथापि लीलाके लिये यह दिखाया गया है कि अपने प्रियतम श्रीकृष्णके पास न जा सकनेसे, उनके विरहानलसे उनको इतना महान् सन्ताप हुआ कि उससे उनके सम्पूर्ण अशुभका भोग हो गया, उनके समस्त पाप नष्ट हो गये । और प्रियतम भगवान्के ध्यानसे उन्हें इतना आनन्द हुआ कि उससे उनके सारे पुण्योंका फल मिल गया । इस प्रकार पाप- पुण्योंका पूर्णरूपसे अभाव होनेसे उनकी मुक्ति हो गयी । चाहे किसी भी भावसे हो— कामसे, क्रोधसे, लोभसे - जो भगवान्‌के मंगलमय श्रीविग्रहका चिन्तन करता है, उसके भावकी अपेक्षा न करके वस्तुशक्तिसे ही उसका कल्याण हो जाता है । यह भगवान्के श्रीविग्रहकी विशेषता है । भावके द्वारा तो एक प्रस्तरमूर्ति भी परम कल्याणका दान कर सकती है, बिना भावके ही कल्याणदान भगवद्विग्रहका सहज दान है । भगवान् हैं बड़े लीलामय । जहाँ वे अखिल विश्वके विधाता ब्रह्मा -शिव आदिके भी वन्दनीय, निखिल जीवोंके प्रत्यगात्मा हैं, वहीं वे लीलानटवर गोपियोंके इशारेपर नाचनेवाले भी हैं । उन्हींकी इच्छासे, उन्हींके प्रेमाह्वानसे, उन्हींके वंशी - निमन्त्रणसे प्रेरित होकर गोपियाँ उनके पास आयीं; परंतु उन्होंने ऐसी भावभंगी प्रकट की, ऐसा स्वाँग बनाया, मानो उन्हें गोपियोंके आनेका कुछ पता ही न हो । शायद गोपियोंके मुँहसे वे उनके हृदयकी बात, प्रेमकी बात सुनना चाहते हों । सम्भव है, वे विप्रलम्भके द्वारा उनके मिलन भावको परिपुष्ट करना चाहते हों । बहुत करके तो ऐसा मालूम होता है कि कहीं लोग इसे साधारण बात न समझ लें, इसलिये साधारण लोगोंके लिये उपदेश और गोपियोंका अधिकार भी उन्होंने सबके सामने रख दिया । उन्होंने बतलाया— ' गोपियो! व्रजमें कोई विपत्ति तो नहीं आयी, घोर रात्रिमें यहाँ आनेका कारण क्या है? घरवाले ढूँढ़ते होंगे, अब यहाँ ठहरना नहीं चाहिये । वनकी शोभा देख ली, अब बच्चों और बछड़ोंका भी ध्यान करो । धर्मके अनुकूल मोक्षके खुले हुए द्वार अपने सगे - सम्बन्धियोंकी सेवा छोड़कर वनमें दर- दर भटकना स्त्रियोंके लिये अनुचित है । स्त्रीको अपने पतिकी ही सेवा करनी चाहिये, वह कैसा भी क्यों न हो । यही सनातन धर्म है। इसीके अनुसार तुम्हें चलना चाहिये । मैं जानता हूँ कि तुम सब मुझसे प्रेम करती हो । परन्तु प्रेममें शारीरिक सन्निधि आवश्यक नहीं है । श्रवण, स्मरण, दर्शन और ध्यानसे सान्निध्यकी अपेक्षा अधिक प्रेम बढ़ता है । जाओ, तुम सनातन सदाचारका पालन करो । इधर- उधर मनको मत भटकने दो । ' श्रीकृष्णकी यह शिक्षा गोपियोंके लिये नहीं, सामान्य नारी - जातिके लिये है । गोपियोंका अधिकार विशेष था और उसको प्रकट करनेके लिये ही भगवान् श्रीकृष्णने ऐसे वचन कहे थे । इन्हें सुनकर गोपियोंकी क्या दशा हुई और इसके उत्तरमें उन्होंने श्रीकृष्णसे क्या प्रार्थना की; वे श्रीकृष्णको मनुष्य नहीं मानतीं, उनके पूर्णब्रह्म सनातन स्वरूपको भलीभाँति जानती हैं ****** ebook converter DEMO Watermarks *******