श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 521–530
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 521–530
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और यह जानकर ही उनसे प्रेम करती हैं - इस बातका कितना सुन्दर परिचय दिया; यह सब विषय मूलमें ही पाठ करनेयोग्य है । सचमुच जिनके हृदयमें भगवान्के परमतत्त्वका वैसा अनुपम ज्ञान और भगवान्के प्रति वैसा महान् अनन्य अनुराग है और सचाईके साथ जिनकी वाणीमें वैसे उद्गार हैं, वे ही विशेष अधिकारवान् हैं । गोपियोंकी प्रार्थनासे यह बात स्पष्ट है कि वे श्रीकृष्णको अन्तर्यामी, योगेश्वरेश्वर परमात्माके रूपमें पहचानती थीं और जैसे दूसरे लोग गुरु, सखा या माता- पिताके रूपमें श्रीकृष्णकी उपासना करते हैं, वैसे ही वे पतिके रूपमें श्रीकृष्णसे प्रेम करती थीं, जो कि शास्त्रोंमें मधुर भावके— उज्ज्वल परम रसके नामसे कहा गया है । जब प्रेमके सभी भाव पूर्ण होते हैं और साधकोंको स्वामि-सखादिके रूपमें भगवान् मिलते हैं, तब गोपियोंने क्या अपराध किया था कि उनका यह उच्चतम भाव - जिसमें शान्त, दास्य, सख्य और वात्सल्य सब- के - सब अन्तर्भूत हैं और जो सबसे उन्नत एवं सबका अन्तिम रूप है –न पूर्ण हो? भगवान्ने उनका भाव पूर्ण किया और अपनेको असंख्य रूपोंमें प्रकट करके गोपियोंके साथ क्रीडा की । उनकी क्रीडाका स्वरूप बतलाते हुए कहा गया है— ' रेमे रमेशो व्रजसुन्दरीभिर्यथार्भकः स्वप्रतिबिम्बविभ्रमः । ' जैसे नन्हा सा शिशु दर्पण अथवा जलमें पड़े हुए अपने प्रतिबिम्बके साथ खेलता है, वैसे ही रमेश भगवान् और व्रजसुन्दरियोंने रमण किया । अर्थात् सच्चिदानन्दघन सर्वान्तर्यामी प्रेमरस- स्वरूप, लीलारसमय परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णने अपनी ह्लादिनी- शक्तिरूपा आनन्द- चिन्मयरस- प्रतिभाविता अपनी ही प्रतिमूर्तिसे उत्पन्न अपनी प्रतिबिम्ब- स्वरूपा गोपियोंसे आत्मक्रीडा की । पूर्णब्रह्म सनातन रसस्वरूप रसराज रसिक- शेखर रसपरब्रह्म अखिलरसामृतविग्रह भगवान् श्रीकृष्णकी इस चिदानन्द-रसमयी दिव्य क्रीडाका नाम ही रास है । इसमें न कोई जड शरीर था, न प्राकृत अंग- संग था और न इसके सम्बन्धकी प्राकृत और स्थूल कल्पनाएँ ही थीं । यह था चिदानन्दमय भगवान्का दिव्य विहार, जो दिव्य लीलाधाममें सर्वदा होते रहनेपर भी कभी - कभी प्रकट होता है । वियोग ही संयोगका पोषक है, मान और मद ही भगवान्की लीलामें बाधक भगवान्की दिव्य लीलामें मान और मद भी, जो कि दिव्य हैं, इसीलिये होते हैं कि उनसे लीलामें रसकी और भी पुष्टि हो । भगवान्की इच्छासे ही गोपियोंमें लीलानुरूप मान और मदका संचार हुआ और भगवान् अन्तर्धान हो गये । जिनके हृदयमें लेशमात्र भी मद अवशेष है, नाममात्र भी मानका संस्कार शेष है, वे भगवान्के सम्मुख रहनेके अधिकारी नहीं । अथवा वे भगवानुका, पास रहनेपर भी, दर्शन नहीं कर सकते । परन्तु गोपियाँ गोपियाँ थीं, उनसे जगत्के किसी प्राणीकी तिलमात्र भी तुलना नहीं है। भगवान्के वियोगमें गोपियोंकी क्या दशा हुई, इस बातको रासलीलाका प्रत्येक पाठक जानता है । गोपियोंके शरीर-मन-प्राण, वे जो कुछ थीं - सब श्रीकृष्णमें एकतान हो गये । उनके प्रेमोन्मादका वह गीत, जो उनके प्राणोंका प्रत्यक्ष प्रतीक है, आज भी भावुक भक्तोंको भावमग्न करके भगवान्के लीलालोकमें पहुँचा देता है। एक बार सरस हृदयसे हृदयहीन होकर नहीं, पाठ करनेमात्रसे ही यह गोपियोंकी महत्ता सम्पूर्ण हृदयमें भर देता है । गोपियोंके उस ' महाभाव’ — उस ‘ अलौकिक
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प्रेमोन्माद' को देखकर श्रीकृष्ण भी अन्तर्हित न रह सके, उनके सामने ‘ साक्षान्मन्मथमन्मथः' रूपसे प्रकट हुए और उन्होंने मुक्तकण्ठसे स्वीकार किया कि ' गोपियो! मैं तुम्हारे प्रेमभावका चिर-ऋणी हूँ । यदि मैं अनन्तकालतक तुम्हारी सेवा करता रहूँ, तो भी तुमसे उऋण नहीं हो सकता । मेरे अन्तर्धान होनेका प्रयोजन तुम्हारे चित्तको दुखाना नहीं था, बल्कि तुम्हारे प्रेमको और भी उज्ज्वल एवं समृद्ध करना था । ' इसके बाद रासक्रीडा प्रारम्भ हुई । जिन्होंने अध्यात्मशास्त्रका स्वाध्याय किया है, वे जानते हैं कि योगसिद्धिप्राप्त साधारण योगी भी कायव्यूहके द्वारा एक साथ अनेक शरीरोंका निर्माण कर सकते हैं और अनेक स्थानोंपर उपस्थित रहकर पृथक्- पृथक् कार्य कर सकते हैं । इन्द्रादि देवगण एक ही समय अनेक स्थानोंपर उपस्थित होकर अनेक यज्ञोंमें युगपत् आहुति स्वीकार कर सकते हैं । निखिल योगियों और योगेश्वरोंके ईश्वर सर्वसमर्थ भगवान् श्रीकृष्ण यदि एक ही साथ अनेक गोपियोंके साथ क्रीडा करें, तो इसमें आश्चर्यकी कौन-सी बात है? जो लोग भगवान्को भगवान् नहीं स्वीकार करते, वही अनेकों प्रकारकी शंका - कुशंकाएँ करते हैं । भगवान्की निज लीलामें इन तर्कोंका सर्वथा प्रवेश नहीं है । गोपियाँ श्रीकृष्णकी स्वकीया थीं या परकीया, यह प्रश्न भी श्रीकृष्णके स्वरूपको भुलाकर ही उठाया जाता है । श्रीकृष्ण जीव नहीं हैं कि जगत्की वस्तुओंमें उनका हिस्सेदार दूसरा भी जीव हो । जो कुछ भी था, है और आगे होगा - उसके एकमात्र पति श्रीकृष्ण ही हैं । अपनी प्रार्थनामें गोपियोंने और परीक्षित्के प्रश्नके उत्तरमें श्रीशुकदेवजीने यही बात कही है। कि गोपी, गोपियोंके पति, उनके पुत्र, सगे - सम्बन्धी और जगत् के समस्त प्राणियोंके हृदयमें आत्मारूपसे, परमात्मारूपसे जो प्रभु स्थित हैं - वही श्रीकृष्ण हैं । कोई भ्रमसे, अज्ञानसे, भले ही श्रीकृष्णको पराया समझे; वे किसीके पराये नहीं हैं, सबके अपने हैं, सब उनके हैं । श्रीकृष्णकी दृष्टिसे, जो कि वास्तविक दृष्टि है, कोई परकीया है ही नहीं; सब स्वकीया हैं, सब केवल अपना ही लीलाविलास हैं, सभी स्वरूपभूता अन्तरंगा शक्ति हैं । गोपियाँ इस बातको जानती थीं और स्थान- स्थानपर उन्होंने ऐसा कहा है । ऐसी स्थितिमें ‘ जारभाव' और ' औपपत्य ' का कोई लौकिक अर्थ नहीं रह जाता । जहाँ काम नहीं है, अंग - संग नहीं है, वहाँ ' औपपत्य ' और ' जारभाव' की कल्पना ही कैसे हो सकती है? गोपियाँ परकीया नहीं थीं, स्वकीया थीं; परन्तु उनमें परकीयाभाव था । परकीया होनेमें और परकीयाभाव होनेमें आकाश- पातालका अन्तर है । परकीयाभावमें तीन बातें बड़े महत्त्वकी होती हैं— अपने प्रियतमका निरन्तर चिन्तन, मिलनकी उत्कट उत्कण्ठा और दोषदृष्टिका सर्वथा अभाव । स्वकीयाभावमें निरन्तर एक साथ रहनेके कारण ये तीनों बातें गौण हो जाती हैं; परन्तु परकीयाभावमें ये तीनों भाव बने रहते हैं । कुछ गोपियाँ जारभावसे श्रीकृष्णको चाहती थीं, इसका इतना ही अर्थ है कि वे श्रीकृष्णका निरन्तर चिन्तन करती थीं, मिलनेके लिये उत्कण्ठित रहती थीं और श्रीकृष्णके प्रत्येक व्यवहारको प्रेमकी आँखोंसे ही देखती थीं । चौथा भाव विशेष महत्त्वका और है- वह यह कि स्वकीया अपने घरका, अपना और अपने पुत्र एवं कन्याओंका पालन- पोषण, रक्षणावेक्षण पतिसे चाहती है । वह समझती है
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कि इनकी देखरेख करना पतिका कर्तव्य है; क्योंकि ये सब उसीके आश्रित हैं, और वह पतिसे ऐसी आशा भी रखती है । कितनी ही पतिपरायणा क्यों न हो, स्वकीयामें यह सकामभाव छिपा रहता ही है । परन्तु परकीया अपने प्रियतमसे कुछ नहीं चाहती, कुछ भी आशा नहीं रखती; वह तो केवल अपनेको देकर ही उसे सुखी करना चाहती है । श्रीगोपियोंमें यह भाव भी भलीभाँति प्रस्फुटित था । इसी विशेषताके कारण संस्कृत - साहित्यके कई ग्रन्थोंमें निरन्तर चिन्तनके उदाहरणस्वरूप परकीयाभावका वर्णन आता है । गोपियोंके इस भावके एक नहीं, अनेक दृष्टान्त श्रीमद्भागवतमें मिलते हैं; इसलिये गोपियोंपर परकीयापनका आरोप उनके भावको न समझनेके कारण है । जिसके जीवनमें साधारण धर्मकी एक हलकी - सी प्रकाशरेखा आ जाती है, उसीका जीवन परम पवित्र और दूसरोंके लिये आदर्श- स्वरूप बन जाता है । फिर वे गोपियाँ, जिनका जीवन साधनाकी चरम सीमापर पहुँच चुका है, अथवा जो नित्यसिद्धा एवं भगवान्की स्वरूपभूता हैं, या जिन्होंने कल्पोंतक साधना करके श्रीकृष्णकी कृपासे उनका सेवाधिकार प्राप्त कर लिया है, सदाचारका उल्लंघन कैसे कर सकती हैं और समस्त धर्म- मर्यादाओंके संस्थापक श्रीकृष्णपर धर्मोल्लंघनका लाञ्छन कैसे लगाया जा सकता है? श्रीकृष्ण और गोपियोंके सम्बन्धमें इस प्रकारकी कुकल्पनाएँ उनके दिव्य स्वरूप और दिव्यलीलाके विषयमें अनभिज्ञता ही प्रकट करती हैं । श्रीमद्भागवतपर, दशम स्कन्धपर और रासपंचाध्यायीपर अबतक अनेकानेक भाष्य और टीकाएँ लिखी जा चुकी हैं जिनके लेखकोंमें जगद्गुरु श्रीवल्लभाचार्य, श्रीश्रीधरस्वामी, श्रीजीवगोस्वामी आदि हैं । उन लोगोंने बड़े विस्तारसे रासलीलाकी महिमा समझायी है । किसीने इसे कामपर विजय बतलाया है, किसीने भगवान्का दिव्य विहार बतलाया है और किसीने इसका आध्यात्मिक अर्थ किया है । भगवान् श्रीकृष्ण आत्मा हैं, आत्माकार वृत्ति श्रीराधा हैं और शेष आत्माभिमुख वृत्तियाँ गोपियाँ हैं । उनका धाराप्रवाहरूपसे निरन्तर आत्मरमण ही रास है । किसी भी दृष्टिसे देखें, रासलीलाकी महिमा अधिकाधिक प्रकट होती है । परन्तु इससे ऐसा नहीं मानना चाहिये कि श्रीमद्भागवतमें वर्णित रास या रमण - प्रसंग केवल रूपक या कल्पनामात्र है । वह सर्वथा सत्य है और जैसा वर्णन है, वैसा ही मिलन-विलासादिरूप शृंगारका रसास्वादन भी हुआ था । भेद इतना ही है कि वह लौकिक स्त्री- पुरुषोंका मिलन न था । उनके नायक थे सच्चिदानन्दविग्रह, परात्परतत्त्व, पूर्णतम स्वाधीन और निरंकुश स्वेच्छाविहारी गोपीनाथ भगवान् नन्दनन्दन; और नायिका थीं स्वयं ह्लादिनीशक्ति श्रीराधाजी और उनकी कायव्यूहरूपा, उनकी घनीभूत मूर्तियाँ श्रीगोपीजन! अतएव इनकी यह लीला अप्राकृत थी । सर्वथा मीठी मिश्रीकी अत्यन्त कडुए इन्द्रायण ( तूंबे ) -जैसी कोई आकृति बना ली जाय, जो देखनेमें ठीक तूंबे-जैसी ही मालूम हो; परन्तु इससे असलमें क्या वह मिश्रीका तूंबा कडुआ थोड़े ही हो जाता है? क्या तूंबेके आकारकी होनेसे ही मिश्रीके स्वाभाविक गुण मधुरताका अभाव हो जाता है? नहीं नहीं, वह किसी भी आकारमें हो — सर्वत्र, सर्वदा और सर्वथा केवल मिश्री-ही-मिश्री है बल्कि इसमें लीला-
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चमत्कारकी बात जरूर है । लोग समझते हैं कडुआ तूंबा, और होती है वह मधुर मिश्री । इसी प्रकार अखिलरसामृतसिन्धु सच्चिदानन्दविग्रह भगवान् श्रीकृष्ण और उनकी अन्तरंगा अभिन्नस्वरूपा गोपियोंकी लीला भी देखनेमें कैसी ही क्यों न हो, वस्तुतः वह सच्चिदानन्दमयी ही है । उसमें सांसारिक गंदे कामका कडुआ स्वाद है ही नहीं । हाँ, यह अवश्य है कि इस लीलाकी नकल किसीको नहीं करनी चाहिये, करना सम्भव भी नहीं है । मायिक पदार्थोंके द्वारा मायातीत भगवान्का अनुकरण कोई कैसे कर सकता है? कड़ुए तँबेको चाहे जैसी सुन्दर मिठाईकी आकृति दे दी जाय, उसका कड़ुआपन कभी मिट नहीं सकता । इसीलिये जिन मोहग्रस्त मनुष्योंने श्रीकृष्णकी रास आदि अन्तरंगलीलाओंका अनुकरण करके नायक- नायिकाका रसास्वादन करना चाहा या चाहते हैं, उनका घोर पतन हुआ है और होगा । श्रीकृष्णकी इन लीलाओंका अनुकरण तो केवल श्रीकृष्ण ही कर सकते हैं । इसीलिये शुकदेवजीने रासपंचाध्यायीके अन्तमें सबको सावधान करते हुए कह दिया है कि भगवान्के उपदेश तो सब मानने चाहिये, परन्तु उनके सभी आचरणोंका अनुकरण नहीं करना चाहिये । जो लोग भगवान् श्रीकृष्णको केवल मनुष्य मानते हैं और केवल मानवीय भाव एवं आदर्शकी कसौटीपर उनके चरित्रको कसना चाहते हैं, वे पहले ही शास्त्रसे विमुख हो जाते हैं, उनके चित्तमें धर्मकी कोई धारणा ही नहीं रहती और वे भगवान्को भी अपनी बुद्धिके पीछे चलाना चाहते हैं । इसलिये साधकोंके सामने उनकी युक्तियोंका कोई महत्त्व ही नहीं रहता । जो शास्त्रके ‘ श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं ' इस वचनको नहीं मानता, वह उनकी लीलाओंको किस आधारपर सत्य मानकर उनकी आलोचना करता है - यह समझमें नहीं आता । जैसे मानवधर्म, देवधर्म और पशुधर्म पृथक् - पृथक् होते हैं, वैसे ही भगवद्धर्म भी पृथक् होता है और भगवान्के चरित्रका परीक्षण उसकी ही कसौटीपर होना चाहिये । भगवान्का एकमात्र धर्म है — प्रेमपरवशता, दयापरवशता और भक्तोंकी अभिलाषाकी पूर्ति । यशोदाके हाथोंसे ऊखलमें बँध जानेवाले श्रीकृष्ण अपने निजजन गोपियोंके प्रेमके कारण उनके साथ नाचें, यह उनका सहज धर्म है । यदि यह हठ ही हो कि श्रीकृष्णका चरित्र मानवीय धारणाओं और आदर्शोंके अनुकूल ही होना चाहिये, तो इसमें भी कोई आपत्तिकी बात नहीं है । श्रीकृष्णकी अवस्था उस समय दस वर्षके लगभग थी, जैसा कि भागवतमें स्पष्ट वर्णन मिलता है । गाँवोंमें रहनेवाले बहुत - से दस वर्षके बच्चे तो नंगे ही रहते हैं । उन्हें कामवृत्ति और स्त्री- पुरुष सम्बन्धका कुछ ज्ञान ही नहीं रहता । लड़के - लड़की एक साथ खेलते हैं, नाचते हैं, गाते हैं, त्योहार मनाते हैं, गुड़ुई- गुड़ुएकी शादी करते हैं, बारात ले जाते हैं और आपसमें भोज- भात भी करते हैं । गाँवके बड़े - बूढ़े लोग बच्चोंका यह मनोरंजन देखकर प्रसन्न ही होते हैं, उनके मनमें किसी प्रकारका दुर्भाव नहीं आता। ऐसे बच्चोंको युवती स्त्रियाँ भी बड़े प्रेमसे देखती हैं, आदर करती हैं, नहलाती हैं, खिलाती हैं । यह तो साधारण बच्चोंकी बात है । श्रीकृष्ण -जैसे असाधारण धी - शक्तिसम्पन्न बालक जिनके अनेक सद्गुण बाल्यकालमें ही प्रकट हो चुके थे; जिनकी सम्मति, चातुर्य्य और शक्तिसे बड़ी - बड़ी विपत्तियोंसे व्रजवासियोंने त्राण पाया था; उनके प्रति वहाँकी स्त्रियों,
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बालिकाओं और बालकोंका कितना आदर रहा होगा- इसकी कल्पना नहीं की जा सकती । उनके सौन्दर्य, माधुर्य और ऐश्वर्यसे आकृष्ट होकर गाँवकी बालक - बालिकाएँ उनके साथ ही रहती थीं और श्रीकृष्ण भी अपनी मौलिक प्रतिभासे राग, ताल आदि नये - नये ढंगसे उनका मनोरंजन करते थे और उन्हें शिक्षा देते थे । ऐसे ही मनोरंजनोंमेंसे रासलीला भी एक थी, ऐसा समझना चाहिये । जो श्रीकृष्णको केवल मनुष्य समझते हैं, उनकी दृष्टिमें भी यह दोषकी बात नहीं होनी चाहिये । वे उदारता और बुद्धिमानीके साथ भागवतमें आये हुए काम- रति आदि शब्दोंका ठीक वैसा ही अर्थ समझें, जैसा कि उपनिषद् और गीतामें इन शब्दोंका अर्थ होता है। वास्तवमें गोपियोंके निष्कपट प्रेमका ही नामान्तर काम है और भगवान् श्रीकृष्णका आत्मरमण अथवा उनकी दिव्य क्रीडा ही रति है । इसीलिये स्थान - स्थानपर उनके लिये विभु, परमेश्वर, लक्ष्मीपति, भगवान्, योगेश्वरेश्वर, आत्माराम, मन्मथमन्मथ आदि शब्द आये हैं— जिससे किसीको कोई भ्रम न हो जाय । जब गोपियाँ श्रीकृष्णकी वंशीध्वनि सुनकर वनमें जाने लगी थीं, तब उनके सगे- सम्बन्धियोंने उन्हें जानेसे रोका था । रातमें अपनी बालिकाओंको भला, कौन बाहर जाने देता । फिर भी वे चली गयीं और इससे घरवालोंको किसी प्रकारकी अप्रसन्नता नहीं हुई । और न तो उन्होंने श्रीकृष्णपर या गोपियोंपर किसी प्रकारका लाञ्छन ही लगाया । उनका श्रीकृष्णपर, गोपियोंपर विश्वास था और वे उनके बचपन और खेलोंसे परिचित थे । उन्हें तो ऐसा मालूम हुआ मानो गोपियाँ हमारे पास ही हैं । इसको दो प्रकारसे समझ सकते हैं । एक तो यह कि श्रीकृष्णके प्रति उनका इतना विश्वास था कि श्रीकृष्णके पास गोपियोंका रहना भी अपने ही पास रहना है । यह तो मानवीय दृष्टि है । दूसरी दृष्टि यह है कि श्रीकृष्णकी योगमायाने ऐसी व्यवस्था कर रखी थी, गोपोंको वे घरमें ही दीखती थीं । किसी भी दृष्टिसे रासलीला दूषित प्रसंग नहीं है, बल्कि अधिकारी पुरुषोंके लिये तो यह सम्पूर्ण मनोमलको नष्ट करनेवाला है । रासलीलाके अन्तमें कहा गया है कि जो पुरुष श्रद्धा - भक्तिपूर्वक रासलीलाका श्रवण और वर्णन करता है, उसके हृदयका रोग- काम बहुत ही शीघ्र नष्ट हो जाता है और उसे भगवान्का प्रेम प्राप्त होता है । भागवतमें अनेक स्थानपर ऐसा वर्णन आता है कि जो भगवान्की मायाका वर्णन करता है, वह मायासे पार हो जाता है । जो भगवान्के कामजयका वर्णन करता है, वह कामपर विजय प्राप्त करता है । राजा परीक्षित्ने अपने प्रश्नोंमें जो शंकाएँ की हैं, उनका उत्तर प्रश्नोंके अनुरूप ही अध्याय २ ९ के श्लोक १३ से १६ तक और अध्याय ३३ के
श्लोक ३० से ३७ तक श्रीशुकदेवजीने दिया है ।
उस उत्तरसे वे शंकाएँ तो हट गयी हैं, परन्तु भगवान्की दिव्यलीलाका रहस्य नहीं खुलने पाया; सम्भवतः उस रहस्यको गुप्त रखनेके लिये ही ३३ वें अध्यायमें रासलीलाप्रसंग समाप्त कर दिया गया । वस्तुतः इस लीलाके गूढ़ रहस्यकी प्राकृत जगत् में व्याख्या की भी नहीं जा सकती क्योंकि यह इस जगत्की क्रीडा ही नहीं है । यह तो उस दिव्य आनन्दमय रसमय राज्यकी चमत्कारमयी लीला है, जिसके श्रवण और दर्शनके लिये परमहंस मुनिगण भी सदा उत्कण्ठित रहते हैं । कुछ लोग इस लीलाप्रसंगको भागवतमें क्षेपक मानते हैं, वे वास्तवमें दुराग्रह करते हैं । क्योंकि प्राचीन से प्राचीन प्रतियोंमें भी यह प्रसंग मिलता है और जरा विचार
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करके देखनेसे यह सर्वथा सुसंगत और निर्दोष प्रतीत होता है। भगवान् श्रीकृष्ण कृपा करके ऐसी विमल बुद्धि दें, जिससे हमलोग इसका कुछ रहस्य समझनेमें समर्थ हों । भगवान्के इस दिव्य- लीलाके वर्णनका यही प्रयोजन है कि जीव गोपियोंके उस अहैतुक प्रेमका, जो कि श्रीकृष्णको ही सुख पहुँचानेके लिये था, स्मरण करे और उसके द्वारा भगवान्के रसमय दिव्यलीलालोकमें भगवान्के अनन्त प्रेमका अनुभव करे । हमें रासलीलाका अध्ययन करते समय किसी प्रकारकी भी शंका न करके इस भावको जगाये रखना चाहिये । -हनुमानप्रसाद पोद्दार
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अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः सुदर्शन और शंखचूडका उद्धार श्रीशुक उवाच
एकदा देवयात्रायां गोपाला जातकौतुकाः ।
अनोभिरनडुद्युक्तैः प्रययुस्तेऽम्बिकावनम् ॥१
तत्र स्नात्वा सरस्वत्यां देवं पशुपतिं विभुम् ।
आनर्चुरर्हणैर्भक्त्या देवीं च नृपतेऽम्बिकाम् ॥२
गावो हिरण्यं वासांसि मधु मध्वन्नमादृताः ।
ब्राह्मणेभ्यो ददुः सर्वे देवो नः प्रीयतामिति ॥३
ऊषुः सरस्वतीतीरे जलं प्राश्य धृतव्रताः ।
रजनीं तां महाभागा नन्दसुनन्दकादयः ॥४
कश्चिन्महानहिस्तस्मिन् विपिनेऽतिबुभुक्षितः ।
यदृच्छयाऽऽगतो नन्दं शयानमुरगोऽग्रसीत् ॥ ५
स चुक्रोशाहिना ग्रस्तः कृष्ण कृष्ण महानयम् ।
सर्पो मां ग्रसते तात प्रपन्नं परिमोचय ॥६
तस्य चाक्रन्दितं श्रुत्वा गोपालाः सहसोत्थिताः ।
ग्रस्तं च दृष्ट्वा विभ्रान्ताः सर्पं विव्यधुरुल्मुकैः ॥७
अलातैर्दह्यमानोऽपि नामुञ्चत्तमुरङ्गमः ।
तमस्पृशत् पदाभ्येत्य भगवान् सात्वतां पतिः ॥८
स वै भगवतः श्रीमत्पादस्पर्शहताशुभः ।
भेजे सर्पवपुर्हित्वा रूपं विद्याधरार्चितम् ॥९
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! एक बार नन्दबाबा आदि गोपोंने शिवरात्रिके अवसरपर बड़ी उत्सुकता, कौतूहल और आनन्दसे भरकर बैलोंसे जुती हुई गाड़ियोंपर सवार होकर अम्बिकावनकी यात्रा की ॥१ ॥ राजन्! वहाँ उन लोगोंने सरस्वती नदीमें स्नान किया
और सर्वान्तर्यामी पशुपति भगवान् शंकरजीका तथा भगवती अम्बिकाजीका बड़ी भक्तिसे
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अनेक प्रकारकी सामग्रियोंके द्वारा पूजन किया || २ || वहाँ उन्होंने आदरपूर्वक गौएँ, सोना, वस्त्र, मधु और मधुर अन्न ब्राह्मणोंको दिये तथा उनको खिलाया पिलाया। वे केवल यही चाहते थे कि इनसे देवाधिदेव भगवान् शंकर हमपर प्रसन्न हों ॥३ ॥ उस दिन परम भाग्यवान्
नन्द-सुनन्द आदि गोपोंने उपवास कर रखा था, इसलिये वे लोग केवल जल पीकर रातके समय सरस्वती नदीके तटपर ही बेखटके सो गये ॥४ ॥
उस अम्बिकावनमें एक बड़ा भारी अजगर रहता था । उस दिन वह भूखा भी बहुत था । दैववश वह उधर ही आ निकला और उसने सोये हुए नन्दजीको पकड़ लिया || ५ || अजगरके पकड़ लेनेपर नन्दरायजी चिल्लाने लगे – ' बेटा कृष्ण! कृष्ण! दौड़ो, दौड़ो । देखो बेटा! यह अजगर मुझे निगल रहा है । मैं तुम्हारी शरणमें हूँ। जल्दी मुझे इस संकटसे बचाओ ' ॥६ ॥
नन्दबाबाका चिल्लाना सुनकर सब- के - सब गोप एकाएक उठ खड़े हुए और उन्हें अजगरके मुँहमें देखकर घबड़ा गये। अब वे लुकाठियों ( अधजली लकड़ियों ) से उस अजगरको मारने लगे ॥७ ॥ किन्तु लुकाठियोंसे मारे जाने और जलनेपर भी अजगरने नन्दबाबाको छोड़ा नहीं ।
इतनेमें ही भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्णने वहाँ पहुँचकर अपने चरणोंसे उस अजगरको छू दिया ॥८ ॥ भगवान्के श्रीचरणोंका स्पर्श होते ही अजगरके सारे अशुभ भस्म हो गये और
वह उसी क्षण अजगरका शरीर छोड़कर विद्याधरार्चित सर्वांग- सुन्दर रूपवान् बन गया ॥९ ॥
तमपृच्छद्धृषीकेशः प्रणतं समुपस्थितम् ।
दीप्यमानेन वपुषा पुरुषं हेममालिनम् ॥ १०
को भवान् परया लक्ष्म्या रोचतेऽद्भुतदर्शनः ।
कथं जुगुप्सितामेतां गतिं वा प्रापितोऽवशः ॥ ११
सर्प उवाच
अहं विद्याधरः कश्चित् सुदर्शन इति श्रुतः ।
श्रिया स्वरूपसम्पत्त्या विमानेनाचरं दिशः ॥१२
ऋषीन् विरूपानंगिरसः प्राहसं रूपदर्पितः ।
तैरिमां प्रापितो योनिं प्रलब्धैः स्वेन पाप्मना ॥१३
शापो मेऽनुग्रहायैव कृतस्तैः करुणात्मभिः ।
यदहं लोकगुरुणा पदा स्पृष्टो हताशुभः ॥ १४
तं त्वाहं भवभीतानां प्रपन्नानां भयापहम् ।
आपृच्छे शापनिर्मुक्तः पादस्पर्शादमीवहन् ॥१५
प्रपन्नोऽस्मि महायोगिन् महापुरुष सत्पते ।
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अनुजानीहि मां देव सर्वलोकेश्वरेश्वर ॥ १६ ब्रह्मदण्डाद् विमुक्तोऽहं सद्यस्तेऽच्युत दर्शनात् ।
यन्नाम गृह्णन्नखिलान् श्रोतॄनात्मानमेव च ।
सद्यः पुनाति किं भूयस्तस्य स्पृष्टः पदा हि ते ॥१७
उस पुरुषके शरीरसे दिव्य ज्योति निकल रही थी । वह सोनेके हार पहने हुए था । जब वह प्रणाम करनेके बाद हाथ जोड़कर भगवान्के सामने खड़ा हो गया, तब उन्होंने उससे पूछा ॥१० ॥ ‘ तुम कौन हो? तुम्हारे अंग- अंगसे सुन्दरता फूटी पड़ती है । तुम देखनेमें बड़े
अद्भुत जान पड़ते हो । तुम्हें यह अत्यन्त निन्दनीय अजगरयोनि क्यों प्राप्त हुई थी? अवश्य ही तुम्हें विवश होकर इसमें आना पड़ा होगा' ॥११ ॥
अजगरके शरीरसे निकला हुआ पुरुष बोला- भगवन्! मैं पहले एक विद्याधर था । मेरा नाम था सुदर्शन । मेरे पास सौन्दर्य तो था ही, लक्ष्मी भी बहुत थी । इससे मैं विमानपर चढ़कर यहाँ- से - वहाँ घूमता रहता था ॥ १२ ॥ एक दिन मैंने अंगिरा गोत्रके कुरूप ऋषियोंको
देखा । अपने सौन्दर्यके घमंडसे मैंने उनकी हँसी उड़ायी। मेरे इस अपराधसे कुपित होकर उन लोगोंने मुझे अजगरयोनिमें जानेका शाप दे दिया । यह मेरे पापोंका ही फल था ॥१३ ॥ उन
कृपालु ऋषियोंने अनुग्रहके लिये ही मुझे शाप दिया था । क्योंकि यह उसीका प्रभाव है कि आज चराचरके गुरु स्वयं आपने अपने चरणकमलोंसे मेरा स्पर्श किया है, इससे मेरे सारे अशुभ नष्ट हो गये ॥१४ ॥ समस्त पापोंका नाश करनेवाले प्रभो! जो लोग जन्म- मृत्युरूप
संसारसे भयभीत होकर आपके चरणोंकी शरण ग्रहण करते हैं, उन्हें आप समस्त भयोंसे मुक्त कर देते हैं । अब मैं आपके श्रीचरणोंके स्पर्शसे शापसे छूट गया हूँ और अपने लोकमें जानेकी अनुमति चाहता हूँ ॥१५ ॥ भक्तवत्सल! महायोगेश्वर पुरुषोत्तम! मैं आपकी शरणमें
हूँ । इन्द्रादि समस्त लोकेश्वरोंके परमेश्वर! स्वयंप्रकाश परमात्मन्! मुझे आज्ञा दीजिये ॥१६ ॥
अपने स्वरूपमें नित्य- निरन्तर एकरस रहनेवाले अच्युत! आपके दर्शनमात्रसे मैं ब्राह्मणोंके शापसे मुक्त हो गया, यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि जो पुरुष आपके नामोंका उच्चारण करता है, वह अपने - आपको और समस्त श्रोताओंको भी तुरंत पवित्र कर देता है । फिर मुझे तो आपने स्वयं अपने चरणकमलोंसे स्पर्श किया है । तब भला, मेरी मुक्तिमें क्या सन्देह हो सकता है? ॥१७ ॥ इस प्रकार सुदर्शनने भगवान् श्रीकृष्णसे विनती की, परिक्रमा
की और प्रणाम किया । फिर उनसे आज्ञा लेकर वह अपने लोकमें चला गया और नन्दबाबा इस भारी संकटसे छुट गये ॥१८ ॥ राजन्! जब व्रजवासियोंने भगवान् श्रीकृष्णका यह
अद्भुत प्रभाव देखा, तब उन्हें बड़ा विस्मय हुआ । उन लोगोंने उस क्षेत्रमें जो नियम ले रखे थे, उनको पूर्ण करके वे बड़े आदर और प्रेमसे श्रीकृष्णकी उस लीलाका गान करते हुए पुनः व्रजमें लौट आये ॥१९ ॥
इत्यनुज्ञाप्य दाशार्हं परिक्रम्याभिवन्द्य च ।
सुदर्शनो दिवं यातः कृच्छ्रान्नन्दश्च मोचितः ॥१८
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निशाम्यकृष्णस्य तदात्मवैभवं व्रजौकसो विस्मितचेतसस्ततः । समाप्य तस्मिन् नियमं पुनर्व्रजं नृपाययुस्तत् कथयन्त आदृताः ॥१९
कदाचिदथ गोविन्दो रामश्चाद्भुतविक्रमः ।
विजह्रतुर्वने रात्र्यां मध्यगौ व्रजयोषिताम् ॥२०
उपगीयमानौ ललितं स्त्रीजनैर्बद्धसौहृदैः ।
स्वलंकृतानुलिप्ताङ्गौ स्रग्विणौ विरजोऽम्बरौ ॥२१
निशामुखं मानयन्तावुदितोडुपतारकम् ।
मल्लिकागन्धमत्तालिजुष्टं कुमुदवायुना ॥२२
जगतुः सर्वभूतानां मनःश्रवणमङ्गलम् ।
तौ कल्पयन्तौ युगपत् स्वरमण्डलमूर्च्छितम् ॥२३
गोप्यस्तद्गीतमाकर्ण्य मूर्च्छिता नाविदन् नृप ।
स्रंसद्दुकूलमात्मानं स्रस्तकेशस्रजं ततः ॥२४
एवं विक्रीडतोः स्वैरं गायतोः सम्प्रमत्तवत् ।
शंखचूड इति ख्यातो धनदानुचरोऽभ्यगात् ॥२५
एक दिनकी बात है, अलौकिक कर्म करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी रात्रिके समय वनमें गोपियोंके साथ विहार कर रहे थे || २० || भगवान् श्रीकृष्ण निर्मल पीताम्बर और बलरामजी नीलाम्बर धारण किये हुए थे । दोनोंके गलेमें फूलोंके सुन्दर- सुन्दर हार लटक रहे थे तथा शरीरमें अंगराग, सुगन्धित चन्दन लगा हुआ था और सुन्दर- सुन्दर आभूषण पहने हुए थे । गोपियाँ बड़े प्रेम और आनन्दसे ललित स्वरमें उन्हींके गुणोंका गान कर रही थीं || २१ || अभी - अभी सायंकाल हुआ था । आकाशमें तारे उग आये थे और चाँदनी छिटक रही थी । बेलाके सुन्दर गन्धसे मतवाले होकर भौंरे इधर- उधर गुनगुना रहे थे तथा जलाशयमें खिली हुई कुमुदिनीकी सुगन्ध लेकर वायु मन्द मन्द चल रही थी । उस समय उनका सम्मान करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने एक ही साथ मिलकर राग अलापा । उनका राग आरोह - अवरोह स्वरोंके चढ़ाव उतारसे बहुत ही सुन्दर लग रहा था । वह जगत्के समस्त प्राणियोंके मन और कानोंको आनन्दसे भर देनेवाला था ॥ २२-२३ ॥ उनका वह गान सुनकर गोपियाँ मोहित हो गयीं । परीक्षित्! उन्हें अपने शरीरकी भी सुधि नहीं रही कि वे उसपरसे खिसकते हुए वस्त्रों और चोटियोंसे बिखरते हुए पुष्पोंको सँभाल सकें ॥२४ ॥