श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 501–510

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 501–510

पृष्ठ 501

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 501 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

जंगलमें छिपे - छिपे भटक रहे हो! क्या कंकड़, पत्थर आदिकी चोट लगने से उनमें पीड़ा नहीं होती? हमें तो इसकी सम्भावनामात्रसे ही चक्कर आ रहा है । हम अचेत होती जा रही हैं । श्रीकृष्ण! श्यामसुन्दर! प्राणनाथ! हमारा जीवन तुम्हारे लिये है, हम तुम्हारे लिये जी रही हैं, हम तुम्हारी हैं ॥१९ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे रासक्रीडायां गोपीगीतं नामैकत्रिंशोऽध्यायः ॥३१ ॥

पृष्ठ 502

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 502 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः भगवान्का प्रकट होकर गोपियोंको सान्त्वना देना श्रीशुक उवाच

इति गोप्यः प्रगायन्त्यः प्रलपन्त्यश्च चित्रधा ।

रुरुदुः सुस्वरं राजन् कृष्णदर्शनलालसाः ॥ १

तासामाविरभूच्छौरिः स्मयमानमुखाम्बुजः ।

पीताम्बरधरः स्रग्वी साक्षान्मन्मथमन्मथः ॥२

तं विलोक्यागतं प्रेष्ठं प्रीत्युत्फुल्लदृशोऽबलाः ।

उत्तस्थुर्युगपत् सर्वास्तन्वः प्राणमिवागतम् ॥३

काचित् कराम्बुजं शौरेर्जगृहेऽञ्जलिना मुदा ।

काचिद् दधार तद्बाहुमंसे चन्दनरूषितम् ॥४

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! भगवान्‌की प्यारी गोपियाँ विरहके आवेशमें इस प्रकार भाँति - भाँतिसे गाने और प्रलाप करने लगीं । अपने कृष्ण- प्यारेके दर्शनकी लालसासे वे अपनेको रोक न सकीं, करुणाजनक सुमधुर स्वरसे फूट- फूटकर रोने लगीं ॥१ ॥ ठीक उसी

समय उनके बीचोबीच भगवान् श्रीकृष्ण प्रकट हो गये। उनका मुखकमल मन्द- मन्द मुसकानसे खिला हुआ था । गलेमें वनमाला थी, पीताम्बर धारण किये हुए थे । उनका यह रूप क्या था, सबके मनको मथ डालनेवाले कामदेवके मनको भी मथनेवाला था ॥२ ॥ कोटि-कोटि कामोंसे भी सुन्दर परम मनोहर प्राणवल्लभ श्यामसुन्दरको आया देख गोपियोंके नेत्र

प्रेम और आनन्दसे खिल उठे । वे सब की सब एक ही साथ इस प्रकार उठ खड़ी हुईं, मानो प्राणहीन शरीरमें दिव्य प्राणोंका संचार हो गया हो, शरीरके एक-एक अंगमें नवीन चेतना— नूतन स्फूर्ति आ गयी हो ॥३ ॥ एक गोपीने बड़े प्रेम और आनन्दसे श्रीकृष्णके करकमलको

अपने दोनों हाथोंमें ले लिया और वह धीरे- धीरे उसे सहलाने लगी । दूसरी गोपीने उनके चन्दनचर्चित भुजदण्डको अपने कंधेपर रख लिया || ४ || तीसरी सुन्दरीने भगवान्का चबाया हुआ पान अपने हाथोंमें ले लिया । चौथी गोपी, जिसके हृदयमें भगवान्‌के विरहसे बड़ी जलन हो रही थी, बैठ गयी और उनके चरणकमलोंको अपने वक्षःस्थलपर रख लिया || ५ || पाँचवीं गोपी प्रणयकोपसे विह्वल होकर, भौंहें चढ़ाकर, दाँतोंसे होठ दबाकर अपने कटाक्ष- बाणोंसे बींधती हुई उनकी ओर ताकने लगी || ६ || छठी गोपी अपने निर्निमेष नयनोंसे उनके मुखकमलका मकरन्द - रस पान करने लगी । परन्तु जैसे संत पुरुष भगवान्के चरणोंके दर्शनसे कभी तृप्त नहीं होते, वैसे ही वह उनकी मुख- माधुरीका निरन्तर पान करते रहनेपर भी तृप्त नहीं होती थी ॥७ ॥ सातवीं गोपी नेत्रोंके मार्गसे भगवान्‌को अपने हृदयमें ले गयी और फिर

पृष्ठ 503

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 503 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उसने आँखें बंद कर लीं । अब मन- ही- मन भगवान्‌का आलिंगन करनेसे उसका शरीर पुलकित हो गया, रोम - रोम खिल उठा और वह सिद्ध योगियोंके समान परमानन्दमें मग्न हो गयी ॥८ ॥ परीक्षित्! जैसे मुमुक्षुजन परम ज्ञानी संत पुरुषको प्राप्त करके संसारकी पीड़ासे

मुक्त हो जाते हैं, वैसे ही सभी गोपियोंको भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनसे परम आनन्द और परम उल्लास प्राप्त हुआ । उनके विरहके कारण गोपियोंको जो दुःख हुआ था, उससे वे मुक्त हो गयीं और शान्तिके समुद्रमें डूबने- उतराने लगीं ॥९ ॥ परीक्षित्! यों तो भगवान् श्रीकृष्ण

अच्युत और एकरस हैं, उनका सौन्दर्य और माधुर्य निरतिशय है; फिर भी विरह- व्यथासे मुक्त हुई गोपियोंके बीचमें उनकी शोभा और भी बढ़ गयी । ठीक वैसे ही, जैसे परमेश्वर अपने नित्य ज्ञान, बल आदि शक्तियोंसे सेवित होनेपर और भी शोभायमान होता है ॥१० ॥

काचिदञ्जलिनागृह्णात्तन्वी ताम्बूलचर्वितम् ।

एका तदङ्घ्रिकमलं सन्तप्ता स्तनयोरधात् ॥५

एका भ्रुकुटिमाबध्य प्रेमसंरम्भविह्वला ।

घ्नतीवैक्षत् कटाक्षेपैः संदष्टदशनच्छदा ॥६

अपरानिमिषदृग्भ्यां जुषाणा तन्मुखाम्बुजम् ।

आपीतमपि नातृप्यत् सन्तस्तच्चरणं यथा ॥७

तं काचिन्नेत्ररन्ध्रेण हृदिकृत्य निमील्य च ।

पुलकाङ्गयुपगुह्यास्ते योगीवानन्दसम्प्लुता ॥८

सर्वास्ताः केशवालोकपरमोत्सवनिर्वृताः ।

जहुर्विरहजं तापं प्राज्ञं प्राप्य यथा जनाः ॥९

ताभिर्विधूतशोकाभिर्भगवानच्युतो वृतः ।

व्यरोचताधिकं तात पुरुषः शक्तिभिर्यथा ॥ १०

ताः समादाय कालिन्द्या निर्विश्य पुलिनं विभुः ।

विकसत्कुन्दमन्दारसुरभ्यनिलषट्पदम् ॥११

इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने उन व्रजसुन्दरियोंको साथ लेकर यमुनाजीके पुलिनमें प्रवेश किया । उस समय खिले हुए कुन्द और मन्दारके पुष्पोंकी सुरभि लेकर बड़ी ही शीतल और सुगन्धित मन्द- मन्द वायु चल रही थी और उसकी महँकसे मतवाले होकर भौंरे इधर-उधर मँडरा रहे थे ॥११ ॥ शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी चाँदनी अपनी निराली ही छटा दिखला

रही थी । उसके कारण रात्रिके अन्धकारका तो कहीं पता ही न था, सर्वत्र आनन्द- मंगलका ही

पृष्ठ 504

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 504 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

साम्राज्य छाया था । वह पुलिन क्या था, यमुनाजीने स्वयं अपनी लहरोंके हाथों भगवान्की लीलाके लिये सुकोमल बालुकाका रंगमंच बना रखा था ॥१२ ॥ परीक्षित्! भगवान्

श्रीकृष्णके दर्शनसे गोपियोंके हृदयमें इतने आनन्द और इतने रसका उल्लास हुआ कि उनके हृदयकी सारी आधि- व्याधि मिट गयी। जैसे कर्मकाण्डकी श्रुतियाँ उसका वर्णन करते - करते अन्तमें ज्ञानकाण्डका प्रतिपादन करने लगती हैं और फिर वे समस्त मनोरथोंसे ऊपर उठ जाती हैं, कृतकृत्य हो जाती हैं - वैसे ही गोपियाँ भी पूर्णकाम हो गयीं । अब उन्होंने अपने वक्षःस्थलपर लगी हुई रोली- केसरसे चिह्नित ओढ़नीको अपने परम प्यारे सुहृद् श्रीकृष्णके विराजनेके लिये बिछा दिया ॥१३ ॥ बड़े - बड़े योगेश्वर अपने योगसाधनसे पवित्र किये हुए

हृदयमें जिनके लिये आसनकी कल्पना करते रहते हैं, किंतु फिर भी अपने हृदय - सिंहासनपर बिठा नहीं पाते, वही सर्वशक्तिमान् भगवान् यमुनाजीकी रेतीमें गोपियोंकी ओढ़नीपर बैठ गये । सहस्र- सहस्र गोपियोंके बीचमें उनसे पूजित होकर भगवान् बड़े ही शोभायमान हो रहे थे । परीक्षित्! तीनों लोकोंमें- तीनों कालोंमें जितना भी सौन्दर्य प्रकाशित होता है, वह सब

तो भगवान्के बिन्दुमात्र सौन्दर्यका आभासभर है । वे उसके एकमात्र आश्रय हैं ॥१४ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण अपने इस अलौकिक सौन्दर्यके द्वारा उनके प्रेम और आकांक्षाको और भी उभाड़ रहे थे । गोपियोंने अपनी मन्द मन्द मुसकान, विलासपूर्ण चितवन और तिरछी भौंहोंसे उनका सम्मान किया । किसीने उनके चरणकमलोंको अपनी गोदमें रख लिया, तो किसीने उनके करकमलोंको । वे उनके संस्पर्शका आनन्द लेती हुई कभी-कभी कह उठती थीं— कितना सुकुमार है, कितना मधुर है! इसके बाद श्रीकृष्णके छिप जानेसे मन -ही - मन तनिक रूठकर उनके मुँहसे ही उनका दोष स्वीकार करानेके लिये वे कहने लगीं ॥१५ ॥

शरच्चन्द्रांशुसन्दोहध्वस्तदोषातमः शिवम् ।

कृष्णाया हस्ततरलाचितकोमलवालुकम् ॥१२

तद्दर्शनाह्लादविधूतहृद्रुजो

मनोरथान्तं श्रुतयो यथा ययुः ।

स्वैरुत्तरीयैः कुचकुंकुमांकितै- रचीक्लृपन्नासनमात्मबन्धवे ॥१३

तत्रोपविष्टो भगवान् स ईश्वरो

योगेश्वरान्तर्हृदि कल्पितासनः ।

चकास गोपीपरिषद्गतोऽर्चित- स्त्रैलोक्यलक्ष्म्येकपदं वपुर्दधत् ॥१४

सभाजयित्वा तमनङ्गदीपनं सहासलीले क्षणविभ्रमभ्रुवा ।

पृष्ठ 505

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 505 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

संस्पर्शनेनाङ्कङ्कृताङ्घ्रिहस्तयोः संस्तुत्य ईषत्कुपिता बभाषिरे ॥१५ गोप्य ऊचुः

भजतोऽनुभजन्त्येक एक एतद्विपर्ययम् ।

नोभयांश्च भजन्त्येक एतन्नो ब्रूहि साधु भोः ॥ १६

श्रीभगवानुवाच

मिथो भजन्ति ये सख्यः स्वार्थैकान्तोद्यमा हि ते ।

न तत्र सौहृदं धर्मः स्वार्थार्थं तद्धि नान्यथा ॥१७

भजन्त्यभजतो ये वै करुणाः पितरो यथा ।

धर्मो निरपवादोऽत्र सौहृदं च सुमध्यमाः ॥ १८

भजतोऽपि न वै केचिद् भजन्त्यभजतः कुतः ।

आत्मारामा ह्याप्तकामा अकृतज्ञा गुरुद्रुहः ॥१९

नाहं तु सख्यो भजतोऽपि जन्तून् भजाम्यमीषामनुवृत्तिवृत्तये । यथाधनो लब्धधने विनष्टे तच्चिन्तयान्यन्निभृतो न वेद ॥ २० एवं मदर्थोज्झितलोकवेद- स्वानां हि वो मय्यनुवृत्तयेऽबलाः । मया परोक्षं भजता तिरोहितं मासूयितुं मार्हथ तत् प्रियं प्रियाः ॥२१ गोपियोंने कहा — नटनागर! कुछ लोग तो ऐसे होते हैं, जो प्रेम करनेवालोंसे ही प्रेम करते हैं और कुछ लोग प्रेम न करनेवालोंसे भी प्रेम करते हैं । परंतु कोई - कोई दोनोंसे ही प्रेम नहीं करते । प्यारे! इन तीनोंमें तुम्हें कौन-सा अच्छा लगता है? ॥१६ ॥

भगवान् श्रीकृष्णने कहा- मेरी प्रिय सखियो! जो प्रेम करनेपर प्रेम करते हैं, उनका तो सारा उद्योग स्वार्थको लेकर है । लेन- देनमात्र है । न तो उनमें सौहार्द है और न तो धर्म । उनका प्रेम केवल स्वार्थके लिये ही है; इसके अतिरिक्त उनका और कोई प्रयोजन नहीं है ॥१७ ॥

सुन्दरियो! जो लोग प्रेम न करनेवालेसे भी प्रेम करते हैं- जैसे स्वभावसे ही करुणाशील सज्जन और माता - पिता - उनका हृदय सौहार्दसे, हितैषितासे भरा रहता है और सच पूछो, तो उनके व्यवहारमें निश्छल सत्य एवं पूर्ण धर्म भी है ॥१८ ॥ कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो प्रेम

पृष्ठ 506

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 506 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

करनेवालोंसे भी प्रेम नहीं करते, न प्रेम करनेवालोंका तो उनके सामने कोई प्रश्न ही नहीं है । ऐसे लोग चार प्रकारके होते हैं । एक तो वे, जो अपने स्वरूपमें ही मस्त रहते हैं— जिनकी दृष्टिमें कभी द्वैत भासता ही नहीं । दूसरे वे, जिन्हें द्वैत तो भासता है, परन्तु जो कृतकृत्य हो चुके हैं; उनका किसीसे कोई प्रयोजन ही नहीं है । तीसरे वे हैं, जो जानते ही नहीं कि हमसे कौन प्रेम करता है; और चौथे वे हैं, जो जान-बूझकर अपना हित करनेवाले परोपकारी गुरुतुल्य लोगोंसे भी द्रोह करते हैं, उनको सताना चाहते है ॥ १ ९ ॥ गोपियो! मैं तो प्रेम करने-वालोंसे भी प्रेमका वैसा व्यवहार नहीं करता, जैसा करना चाहिये । मैं ऐसा केवल इसीलिये करता हूँ कि उनकी चित्तवृत्ति और भी मुझमें लगे, निरन्तर लगी ही रहे । जैसे निर्धन पुरुषको कभी बहुत- सा धन मिल जाय और फिर खो जाय तो उसका हृदय खोये हुए धनकी चिन्तासे भर जाता है, वैसे ही मैं भी मिल- मिलकर छिप- छिप जाता हूँ ॥२० ॥ गोपियो! इसमें सन्देह

नहीं कि तुमलोगोंने मेरे लिये लोक मर्यादा, वेदमार्ग और अपने सगे- सम्बन्धियोंको भी छोड़ दिया है । ऐसी स्थितिमें तुम्हारी मनोवृत्ति और कहीं न जाय, अपने सौन्दर्य और सुहागकी चिन्ता न करने लगे, मुझमें ही लगी रहे - इसीलिये परोक्षरूपसे तुमलोगोंसे प्रेम करता हुआ ही मैं छिप गया था । इसलिये तुमलोग मेरे प्रेममें दोष मत निकालो । तुम सब मेरी प्यारी हो और मैं तुम्हारा प्यारा हूँ ॥ २१ ॥ मेरी प्यारी गोपियो! तुमने मेरे लिये घर-गृहस्थीकी उन

बेड़ियोंको तोड़ डाला है, जिन्हें बड़े - बड़े योगी- यति भी नहीं तोड़ पाते । मुझसे तुम्हारा यह मिलन, यह आत्मिक संयोग सर्वथा निर्मल और सर्वथा निर्दोष है । यदि मैं अमर शरीरसे-अमर जीवनसे अनन्त कालतक तुम्हारे प्रेम, सेवा और त्यागका बदला चुकाना चाहूँ तो भी नहीं चुका सकता । मैं जन्म - जन्मके लिये तुम्हारा ऋणी हूँ । तुम अपने सौम्य स्वभावसे, प्रेमसे

मुझे उऋण कर सकती हो । परन्तु मैं तो तुम्हारा ऋणी ही हूँ ॥२२ ॥

न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि वः या माभजन् दुर्जरगेहशृंखलाः संवृश्च्य तद् वः प्रतियातु साधुना ॥२२ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे रासक्रीडायां गोपीसान्त्वनं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥

पृष्ठ 507

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 507 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः महारास श्रीशुक उवाच

इत्थं भगवतो गोप्यः श्रुत्वा वाचः सुपेशलाः ।

जहुर्विरहजं तापं तदङ्गोपचिताशिषः ॥ १

तत्रारभत गोविन्दो रासक्रीडामनुव्रतैः ।

स्त्रीरत्नैरन्वितः प्रीतैरन्योन्याबद्धबाहुभिः ॥२

रासोत्सवः सम्प्रवृत्तो गोपीमण्डलमण्डितः ।

योगेश्वरेण कृष्णेन तासां मध्ये द्वयोर्द्वयोः ।

प्रविष्टेन गृहीतानां कण्ठे स्वनिकटं स्त्रियः ॥३

यं मन्येरन् नभस्तावद् विमानशतसंकुलम ।

दिवौकसां सदाराणामौत्सुक्यापहृतात्मनाम् ॥४

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - राजन्! गोपियाँ भगवान्की इस प्रकार प्रेमभरी सुमधुर वाणी सुनकर जो कुछ विरहजन्य ताप शेष था, उससे भी मुक्त हो गयीं और सौन्दर्य - माधुर्यनिधि प्राणप्यारेके अंग- संगसे सफल- मनोरथ हो गयीं || १ || भगवान् श्रीकृष्णकी प्रेयसी और सेविका गोपियाँ एक- दूसरेकी बाँह में बाँह डाले खड़ी थीं । उन स्त्रीरत्नोंके साथ यमुनाजीके पुलिनपर भगवान्‌ने अपनी रसमयी रासक्रीड़ा प्रारम्भ की || २|| सम्पूर्ण योगोंके स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण दो - दो गोपियोंके बीचमें प्रकट हो गये और उनके गलेमें अपना हाथ डाल दिया । इस प्रकार एक गोपी और एक श्रीकृष्ण, यही क्रम था । सभी गोपियाँ ऐसा अनुभव करती थीं कि हमारे प्यारे तो हमारे ही पास हैं । इस प्रकार सहस्र - सहस्र गोपियोंसे शोभायमान भगवान् श्रीकृष्णका दिव्य रासोत्सव प्रारम्भ हुआ । उस समय आकाशमें शत- शत विमानोंकी भीड़ लग गयी । सभी देवता अपनी- अपनी पत्नियोंके साथ वहाँ आ पहुँचे । रासोत्सवके दर्शनकी लालसासे, उत्सुकतासे उनका मन उनके वशमें नहीं था ॥ ३-४ ॥ स्वर्गकी दिव्य दुन्दुभियाँ अपने - आप बज उठीं । स्वर्गीय पुष्पोंकी वर्षा होने लगी । गन्धर्वगण अपनी - अपनी पत्नियोंके साथ भगवान्‌के निर्मल यशका गान करने लगे || ५ || रासमण्डलमें सभी गोपियाँ अपने प्रियतम श्यामसुन्दरके साथ नृत्य करने लगीं । उनकी कलाइयोंके कंगन, पैरोंके पायजेब और करधनीके छोटे - छोटे घुँघरू एक साथ बज उठे । असंख्य गोपियाँ थीं, इसलिये यह मधुर ध्वनि भी बड़े ही जोरकी हो रही थी ॥ ६ ॥ यमुनाजीकी रमणरेतीपर व्रजसुन्दरियोंके बीचमें

भगवान् श्रीकृष्णकी बड़ी अनोखी शोभा हुई । ऐसा जान पड़ता था, मानो अगणित पीली-पीली दमकती हुई सुवर्ण- मणियोंके बीचमें ज्योतिर्मयी नीलमणि चमक रही हो ॥७ ॥ नृत्यके

पृष्ठ 508

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 508 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

समय गोपियाँ तरह -तरहसे ठुमक ठुमुककर अपने पाँव कभी आगे बढ़ातीं और कभी पीछे हटा लेतीं । कभी गतिके अनुसार धीरे- धीरे पाँव रखतीं, तो कभी बड़े वेगसे; कभी चाककी तरह घूम जातीं, कभी अपने हाथ उठा- उठाकर भाव बतातीं, तो कभी विभिन्न प्रकारसे उन्हें चमकातीं । कभी बड़े कलापूर्ण ढंगसे मुसकरातीं, तो कभी भौंहें मटकातीं । नाचते - नाचते उनकी पतली कमर ऐसी लचक जाती थी, मानो टूट गयी हो । झुकने, बैठने, उठने और चलनेकी फुर्तीसे उनके स्तन हिल रहे थे तथा वस्त्र उड़े जा रहे थे । कानोंके कुण्डल हिल-हिलकर कपोलोंपर आ जाते थे । नाचनेके परिश्रमसे उनके मुँहपर पसीनेकी बूँदें झलकने लगी थीं । केशोंकी चोटियाँ कुछ ढीली पड़ गयी थीं। नीवीकी गाँठें खुली जा रही थीं । इस प्रकार नटवर नन्दलालकी परम प्रेयसी गोपियाँ उनके साथ गा - गाकर नाच रही थीं । परीक्षित्! उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो बहुत- से श्रीकृष्ण तो साँवले - साँवले मेघ मण्डल हैं और

उनके बीच- बीचमें चमकती हुई गोरी गोपियाँ बिजली हैं । उनकी शोभा असीम थी ॥ ८ ॥

गोपियोंका जीवन भगवान्की रति है, प्रेम है । वे श्रीकृष्णसे सटकर नाचते - नाचते ऊँचे स्वरसे मधुर गान कर रही थीं । श्रीकृष्णका संस्पर्श पा- पाकर और भी आनन्दमग्न हो रही थीं । उनके राग - रागिनियोंसे पूर्ण गानसे यह सारा जगत् अब भी गूँज रहा है ॥९ ॥ कोई गोपी भगवान्के

साथ — उनके स्वरमें स्वर मिलाकर गा रही थी । वह श्रीकृष्णके स्वरकी अपेक्षा और भी ऊँचे स्वरसे राग अलापने लगी । उसके विलक्षण और उत्तम स्वरको सुनकर वे बहुत ही प्रसन्न हुए और वाह - वाह करके उसकी प्रशंसा करने लगे। उसी रागको एक दूसरी सखीने ध्रुपदमें गाया । उसका भी भगवान्ने बहुत सम्मान किया ॥ १० ॥ एक गोपी नृत्य करते - करते थक गयी ।

उसकी कलाइयोंसे कंगन और चोटियोंसे बेलाके फूल खिसकने लगे । तब उसने अपने बगलमें ही खड़े मुरलीमनोहर श्यामसुन्दरके कंधेको अपनी बाँहसे कसकर पकड़ लिया ॥११ ॥

भगवान् श्रीकृष्णने अपना एक हाथ दूसरी गोपीके कंधेपर रख रखा था । वह स्वभावसे तो कमलके समान सुगन्धसे युक्त था ही, उसपर बड़ा सुगन्धित चन्दनका लेप भी था । उसकी सुगन्धसे वह गोपी पुलकित हो गयी, उसका रोम- रोम खिल उठा। उसने झटसे उसे चूम लिया ॥१२ ॥ एक गोपी नृत्य कर रही थी । नाचनेके कारण उसके कुण्डल हिल रहे थे, उनकी

छटासे उसके कपोल और भी चमक रहे थे । उसने अपने कपोलोंको भगवान् श्रीकृष्णके कपोलसे सटा दिया और भगवान्ने उसके मुँहमें अपना चबाया हुआ पान दे दिया ॥१३ ॥

कोई गोपी नूपुर और करधनीके घुंघरुओंको झनकारती हुई नाच और गा रही थी । वह जब बहुत थक गयी, तब उसने अपने बगलमें ही खड़े श्यामसुन्दरके शीतल करकमलको अपने दोनों स्तनोंपर रख लिया ॥१४ ॥

ततो दुन्दुभयो नेदुर्निपेतुः पुष्पवृष्टयः ।

जगुर्गन्धर्वपतयः सस्त्रीकास्तद्यशोऽमलम् ॥५

वलयानां नूपुराणां किंकिणीनां च योषिताम् ।

सप्रियाणामभूच्छब्दस्तुमुलो रासमण्डले ॥६

पृष्ठ 509

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 509 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तत्रातिशुशुभे ताभिर्भगवान् देवकीसुतः ।

मध्ये मणीनां हैमानां महामरकतो यथा ॥७

पादन्यासैर्भुजविधुतिभिः सस्मितैर्भूविलासै- र्भज्यन्मध्यैश्चलकुचपटैः कुण्डलैर्गण्डलोलैः । स्विद्यन्मुख्यः कबररशना- ग्रन्थयः कृष्णवध्वो गायन्त्यस्तं तडित इव ता मेघचक्रे विरेजुः ॥८

उच्चैर्जगुर्नृत्यमाना रक्तकण्ठ्यो रतिप्रियाः ।

कृष्णाभिमर्शमुदिता यद्गीतेनेदमावृतम् ॥९

काचित् समं मुकुन्देन स्वरजातीरमिश्रिताः ।

उन्निन्ये पूजिता तेन प्रीयता साधु साध्विति ।

तदेव ध्रुवमुन्निन्ये तस्यै मानं च बह्वदात् ॥१०

काचिद् रासपरिश्रान्ता पार्श्वस्थस्य गदाभृतः ।

जग्राह बाहुना स्कन्धं श्लथद्वलयमल्लिका ॥११

तत्रैकांसगतं बाहुं कृष्णस्योत्पलसौरभम् ।

चन्दनालिप्तमाघ्राय हृष्टरोमा चुचुम्ब ह ॥१२

कस्याश्चिन्नाट्यविक्षिप्तकुण्डलत्विषमण्डितम् ।

गण्डं गण्डे सन्दधत्या अदात्ताम्बूलचर्वितम् ॥१३

नृत्यन्ती गायती काचित् कूजन्नूपुरमेखला ।

पार्श्वस्थाच्युतहस्ताब्जं श्रान्ताधात् स्तनयोः शिवम् ॥१४

गोप्यो लब्ध्वाच्युतं कान्तं श्रिय एकान्तवल्लभम् ।

गृहीतकण्ठ्यस्तद्दोर्भ्यां गायन्त्यस्तं विजह्रिरे ॥१५

कर्णोत्पलालकविटंककपोलघर्म-

पृष्ठ 510

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 510 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वक्त्रश्रियो वलयनूपुरघोषवाद्यैः ।

गोप्यः समं भगवता ननृतुः स्वकेश- स्रस्तस्रजो भ्रमरगायकरासगोष्ठ्याम् ॥१६

परीक्षित्! गोपियोंका सौभाग्य लक्ष्मीजीसे भी बढ़कर है । लक्ष्मीजीके परम प्रियतम एकान्तवल्लभ भगवान् श्रीकृष्णको अपने परम प्रियतमके रूपमें पाकर गोपियाँ गान करती हुई उनके साथ विहार करने लगीं । भगवान् श्रीकृष्णने उनके गलोंको अपने भुजपाशमें बाँध रखा था, उस समय गोपियोंकी बड़ी अपूर्व शोभा थी ॥ १५ ॥ उनके कानोंमें कमलके कुण्डल

शोभायमान थे । घुँघराली अलकें कपोलोंपर लटक रही थीं । पसीनेकी बूँदें झलकनेसे उनके मुखकी छटा निराली ही हो गयी थी । वे रासमण्डलमें भगवान् श्रीकृष्णके साथ नृत्य कर रही थीं । उनके कंगन और पायजेबोंके बाजे बज रहे थे । भौंरे उनके ताल- सुरमें अपना सुर मिलाकर गा रहे थे । और उनके जूड़ों तथा चोटियोंमें गुँथे हुए फूल गिरते जा रहे थे ॥१६ ॥

परीक्षित्! जैसे नन्हा- सा शिशु निर्विकारभावसे अपनी परछाईंके साथ खेलता है, वैसे ही रमारमण भगवान् श्रीकृष्ण कभी उन्हें अपने हृदयसे लगा लेते, कभी हाथसे उनका अंगस्पर्श करते, कभी प्रेमभरी तिरछी चितवनसे उनकी ओर देखते तो कभी लीलासे उन्मुक्त हँसी हँसने लगते । इस प्रकार उन्होंने व्रजसुन्दरियोंके साथ क्रीडा की, विहार किया ॥१७ ॥

परीक्षित्! भगवान्के अंगोंका संस्पर्श प्राप्त करके गोपियोंकी इन्द्रियाँ प्रेम और आनन्दसे विह्वल हो गयीं । उनके केश बिखर गये । फूलोंके हार टूट गये और गहने अस्त- व्यस्त हो गये । वे अपने केश, वस्त्र और कंचुकीको भी पूर्णतया सँभालनेमें असमर्थ हो गयीं ॥१८ ॥ भगवान्

श्रीकृष्णकी यह रासक्रीडा देखकर स्वर्गकी देवांगनाएँ भी मिलनकी कामनासे मोहित हो गयीं और समस्त तारों तथा ग्रहोंके साथ चन्द्रमा चकित, विस्मित हो गये ॥१९ ॥ परीक्षित्! यद्यपि

भगवान् आत्माराम हैं— उन्हें अपने अतिरिक्त और किसीकी भी आवश्यकता नहीं है— फिर भी उन्होंने जितनी गोपियाँ थीं, उतने ही रूप धारण किये और खेल- खेलमें उनके साथ इस प्रकार विहार किया ॥२० ॥ जब बहुत देरतक गान और नृत्य आदि विहार करनेके कारण

गोपियाँ थक गयीं, तब करुणामय भगवान् श्रीकृष्णने बड़े प्रेमसे स्वयं अपने सुखद करकमलोंके द्वारा उनके मुँह पोंछे ॥२१ ॥ परीक्षित्! भगवान्‌के करकमल और नखस्पर्शसे

गोपियोंको बड़ा आनन्द हुआ । उन्होंने अपने उन कपोलोंके सौन्दर्यसे, जिनपर सोनेके कुण्डल झिल- मिला रहे थे और घुँघराली अलकें लटक रही थीं, तथा उस प्रेमभरी चितवनसे, जो सुधासे भी मीठी मुसकानसे उज्ज्वल हो रही थी, भगवान् श्रीकृष्णका सम्मान किया और प्रभुकी परम पवित्र लीलाओंका गान करने लगीं ॥ २२ ॥ इसके बाद जैसे थका हुआ गजराज

किनारोंको तोड़ता हुआ हथिनियोंके साथ जलमें घुसकर क्रीडा करता है, वैसे ही लोक और वेदकी मर्यादाका अतिक्रमण करनेवाले भगवान्ने अपनी थकान दूर करनेके लिये गोपियोंके साथ जलक्रीडा करनेके उद्देश्यसे यमुनाके जलमें प्रवेश किया। उस समय भगवान्की वनमाला गोपियोंके अंगकी रगड़से कुछ कुचल- सी गयी थी और उनके वक्षःस्थलकी केसरसे वह रँग भी गयी थी । उसके चारों ओर गुनगुनाते हुए भौंरे उनके पीछे - पीछे इस प्रकार चल रहे थे, मानो गन्धर्वराज उनकी कीर्तिका गान करते हुए पीछे - पीछे चल रहे हों ॥ २३ ॥ परीक्षित्!