श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 571–580
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 571–580
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दुर्भाग्यने हमारे सामने उनका वियोग उपस्थित करके हमारे चित्तको विनष्ट एवं व्याकुल कर दिया है ॥२८ ॥ सखियो! जिनकी प्रेमभरी मनोहर मुसकान, रहस्यकी मीठी - मीठी बातें,
विलासपूर्ण चितवन और प्रेमालिंगनसे हमने रासलीलाकी वे रात्रियाँ- जो बहुत विशाल थीं –एक क्षणके समान बिता दी थीं । अब भला, उनके बिना हम उन्हींकी दी हुई अपार विरहव्यथाका पार कैसे पावेंगी ॥२९ ॥ एक दिनकी नहीं, प्रतिदिनकी बात है, सायंकालमें
प्रतिदिन वे ग्वालबालोंसे घिरे हुए बलरामजीके साथ वनसे गौएँ चराकर लौटते हैं । उनकी काली काली घुँघराली अलकें और गलेके पुष्पहार गौओंके खुरकी रजसे ढके रहते हैं । वे बाँसुरी बजाते हुए अपनी मन्द मन्द मुसकान और तिरछी चितवनसे देख-देखकर हमारे
हृदयको बेध डालते हैं । उनके बिना भला, हम कैसे जी सकेंगी? ॥ ३० ॥
श्रीशुक उवाच एवं ब्रुवाणा विरहातुरा भृशं व्रजस्त्रियः कृष्णविषक्तमानसाः । विसृज्य लज्जां रुरुदुः स्म सुस्वरं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥३१
स्त्रीणामेवं रुदन्तीनामुदिते सवितर्यथ ।
अक्रूरश्चोदयामास कृतमैत्रादिको रथम् ॥ ३२
गोपास्तमन्वसज्जन्त नन्दाद्याः शकटैस्ततः ।
आदायोपायनं भूरि कुम्भान् गोरससम्भृतान् ॥ ३३
गोप्यश्च दयितं कृष्णमनुव्रज्यानुरंजिताः ।
प्रत्यादेशं भगवतः कांक्षन्त्यश्चावतस्थिरे ॥ ३४
तास्तथा तप्यतीर्वीक्ष्य स्वप्रस्थाने यदूत्तमः ।
सान्त्वयामास सप्रेमैरायास्य इति दौत्यकैः ॥३५
यावदालक्ष्यते केतुर्यावद् रेणू रथस्य च ।
अनुप्रस्थापितात्मानो लेख्यानीवोपलक्षिताः ॥३६
ता निराशा निववृतुर्गोविन्दविनिवर्तने ।
विशोका अहनी निन्युर्गायन्त्यः प्रियचेष्टितम् ॥३७
भगवानपि सम्प्राप्तो रामाक्रूरयुतो नृप ।
रथेन वायुवेगेन कालिन्दीमघनाशिनीम् ॥३८
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श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! गोपियाँ वाणीसे तो इस प्रकार कह रही थीं; परन्तु उनका एक- एक मनोभाव भगवान् श्रीकृष्णका स्पर्श, उनका आलिंगन कर रहा था । विरहकी सम्भावनासे अत्यन्त व्याकुल हो गयीं और लाज छोड़कर ' हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! —— इस प्रकार ऊँची आवाजसे पुकार-पुकारकर सुललित स्वरसे रोने लगीं ॥३१ ॥
गोपियाँ इस प्रकार रो रही थीं! रोते - रोते सारी रात बीत गयी, सूर्योदय हुआ । अक्रूरजी सन्ध्या-वन्दन आदि नित्य कर्मोंसे निवृत्त होकर रथपर सवार हुए और उसे हाँक ले चले || ३२ || नन्दबाबा आदि गोपोंने भी दूध, दही, मक्खन, घी आदिसे भरे मटके और भेंटकी बहुत - सी सामग्रियाँ ले लीं तथा वे छकड़ोंपर चढ़कर उनके पीछे- पीछे चले ॥ ३३ ॥ इसी समय
अनुरागके रंगमें रँगी हुई गोपियाँ अपने प्राणप्यारे श्रीकृष्णके पास गयीं और उनकी चितवन, मुसकान आदि निरखकर कुछ- कुछ सुखी हुईं । अब वे अपने प्रियतम श्यामसुन्दरसे कुछ सन्देश पानेकी आकांक्षासे वहीं खड़ी हो गयीं ॥ ३४ ॥ यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णने
देखा कि मेरे मथुरा जानेसे गोपियोंके हृदयमें बड़ी जलन हो रही है, वे सन्तप्त हो रही हैं, तब उन्होंने दूतके द्वारा ‘ मैं आऊँगा' यह प्रेम- सन्देश भेजकर उन्हें धीरज बँधाया ॥३५ ॥
गोपियोंको जबतक रथकी ध्वजा और पहियोंसे उड़ती हुई धूल दीखती रही तबतक उनके शरीर चित्रलिखित- से वहीं ज्यों - के - त्यों खड़े रहे । परन्तु उन्होंने अपना चित्त तो मनमोहन प्राणवल्लभ श्रीकृष्णके साथ ही भेज दिया था || ३६|| अभी उनके मनमें आशा थी कि शायद श्रीकृष्ण कुछ दूर जाकर लौट आयें! परन्तु जब नहीं लौटे, तब वे निराश हो गयीं और अपने - अपने घर चली आयीं । परीक्षित्! वे रात - दिन अपने प्यारे श्यामसुन्दरकी लीलाओंका गान करती रहतीं और इस प्रकार अपने शोकसन्तापको हलका करतीं ॥३७ ॥
परीक्षित्! इधर भगवान् श्रीकृष्ण भी बलरामजी और अक्रूरजीके साथ वायुके समान वेगवाले रथपर सवार होकर पापनाशिनी यमुनाजीके किनारे जा पहुँचे ॥३८ ॥ वहाँ उन
लोगोंने हाथ -मुँह धोकर यमुनाजीका मरकत-I-मणिके समान नीला और अमृतके समान मीठा जल पिया । इसके बाद बलरामजीके साथ भगवान् वृक्षोंके झुरमुटमें खड़े रथपर सवार हो गये ॥३९ ॥ अक्रूरजीने दोनों भाइयोंको रथपर बैठाकर उनसे आज्ञा ली और यमुनाजीके
कुण्ड ( अनन्त – तीर्थ या ब्रह्मद) पर आकर वे विधिपूर्वक स्नान करने लगे ॥४० ॥ उस
कुण्डमें स्नान करनेके बाद वे जलमें डुबकी लगाकर गायत्रीका जप करने लगे । उसी समय जलके भीतर अक्रूरजीने देखा कि श्रीकृष्ण और बलराम दोनों भाई एक साथ ही बैठे हुए हैं ॥४१ ॥ अब उनके मनमें यह शंका हुई कि ' वसुदेवजीके पुत्रोंको तो मैं रथपर बैठा आया
हूँ, अब वे यहाँ जलमें कैसे आ गये? जब यहाँ हैं तो शायद रथपर नहीं होंगे । ' ऐसा सोचकर उन्होंने सिर बाहर निकालकर देखा ॥४२ ॥ वे उस रथपर भी पूर्ववत् बैठे हुए थे । उन्होंने यह
सोचकर कि मैंने उन्हें जो जलमें देखा था, वह भ्रम ही रहा होगा, फिर डुबकी लगायी ॥४३ ॥
परन्तु फिर उन्होंने वहाँ भी देखा कि साक्षात् अनन्तदेव श्रीशेषजी विराजमान हैं और सिद्ध, चारण, गन्धर्व एवं असुर अपने - अपने सिर झुकाकर उनकी स्तुति कर रहे हैं ॥ ४४ ॥
शेषजीके हजार सिर हैं और प्रत्येक फणपर मुकुट सुशोभित है । कमलनालके समान उज्ज्वल शरीरपर नीलाम्बर धारण किये हुए हैं और उनकी ऐसी शोभा हो रही है, मानो सहस्र ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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शिखरोंसे युक्त श्वेतगिरि कैलास शोभायमान हो ॥४५ ॥ अक्रूरजीने देखा कि शेषजीकी गोदमें
श्याम मेघके समान घनश्याम विराजमान हो रहे हैं । वे रेशमी पीताम्बर पहने हुए हैं। बड़ी ही शान्त चतुर्भुज मूर्ति है और कमलके रक्तदलके समान रतनारे नेत्र हैं ॥ ४६ ॥ उनका वदन
बड़ा ही मनोहर और प्रसन्नताका सदन है । उनका मधुर हास्य और चारु चितवन चित्तको चुराये लेती है । भौंहें सुन्दर और नासिका तनिक ऊँची तथा बड़ी ही सुघड़ है । सुन्दर कान, कपोल और लाल - लाल अधरोंकी छटा निराली ही है ॥ ४७ ॥ बाँहें घुटनोंतक लंबी और हृष्ट- पुष्ट हैं । कंधे ऊँचे और वक्षःस्थल लक्ष्मीजीका आश्रय स्थान है । शंखके समान उतार-चढ़ाववाला सुडौल गला, गहरी नाभि और त्रिवलीयुक्त उदर पीपलके पत्तेके समान
शोभायमान है ॥४८ ॥
तत्रोपस्पृश्य पानीयं पीत्वा मृष्टं मणिप्रभम् ।
वृक्षषण्डमुपव्रज्य सरामो रथमाविशत् ॥३९
अक्रूरस्तावुपामन्त्र्य निवेश्य च रथोपरि ।
कालिन्द्या ह्रदमागत्य स्नानं विधिवदाचरत् ॥४०
निमज्ज्य तस्मिन् सलिले जपन् ब्रह्म सनातनम् ।
तावेव ददृशेऽक्रूरो रामकृष्णौ समन्वितौ ॥४१
तौ रथस्थौ कथमिह सुतावानकदुन्दुभेः ।
तर्हि स्वित् स्यन्दने न स्त इत्युन्मज्ज्य व्यचष्ट सः ॥४२
तत्रापि च यथापूर्वमासीनी पुनरेव सः ।
न्यमज्जद् दर्शनं यन्मे मृषा किं सलिले तयोः ॥४३
भूयस्तत्रापि सोऽद्राक्षीत् स्तूयमानमहीश्वरम् ।
सिद्धचारणगन्धर्वैरसुरैर्नतकन्धरैः १ ॥४४
सहस्रशिरसं देवं सहस्रफणमौलिनम् ।
नीलाम्बरं बिसश्वेतं शृङ्गैः श्वेतमिव स्थितम् ॥४५
तस्योत्संगे घनश्यामं पीतकौशेयवाससम् ।
पुरुषं चतुर्भुजं शान्तं पद्मपत्रारुणेक्षणम् ॥४६
चारुप्रसन्नवदनं चारुहासनिरीक्षणम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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सुभ्रून्नसं चारुकर्णं सुकपोलारुणाधरम् ॥४७
प्रलम्बपीवरभुजं तुंगांसोरःस्थलश्रियम् ।
कम्बुकण्ठं निम्ननाभिं वलिमत्पल्लवोदरम् ॥४८
बृहत्कटितट श्रोणिकरभोरुद्वयान्वितम् ।
चारुजानुयुगं चारुजंघायुगलसंयुतम् ॥४९
तुंगगुल्फारुणनखव्रातदीधितिभिर्वृतम्” ।
नवांगुल्यंगुष्ठदलैर्विलसत्पादपंकजम् ॥५०
सुमहार्हमणिव्रातकिरीटकटकांगदैः ।
कटिसूत्रब्रह्मसूत्रहारनूपुरकुण्डलैः ॥ ५१
भ्राजमानं पद्मकरं शंखचक्रगदाधरम् ।
श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभं वनमालिनम् ॥ ५२
सुनन्दनन्दप्रमुखैः पार्षदैः सनकादिभिः ।
सुरेशैर्ब्रह्मरुद्राद्यैर्नवभिश्च द्विजोत्तमैः ॥५३
प्रह्लादनारदव सुप्रमुखैर्भागवतोत्तमैः ।
स्तूयमानं पृथग्भावैर्वचोभिरमलात्मभिः ॥ ५४
श्रिया पुष्ट्या गिरा कान्त्या कीर्त्या तुष्ट्येलयोर्जया ।
विद्ययाविद्यया शक्त्या मायया च निषेवितम् ॥५५
स्थूल कटिप्रदेश और नितम्ब, हाथीकी सूँडके समान जाँघें, सुन्दर घुटने एवं पिंडलियाँ हैं । एड़ीके ऊपरकी गाँठें उभरी हुई हैं और लाल-लाल नखोंसे दिव्य ज्योतिर्मय किरणें फैल रही हैं। चरणकमलकी अंगुलियाँ और अंगूठे नयी और कोमल पँखुड़ियोंके समान सुशोभित हैं ॥४९ -५० ॥ अत्यन्त बहुमूल्य मणियोंसे जड़ा हुआ मुकुट, कड़े, बाजूबंद, करधनी, हार, नूपुर और कुण्डलोंसे तथा यज्ञोपवीतसे वह दिव्य मूर्ति अलंकृत हो रही है । एक हाथमें पद्म शोभा पा रहा है और शेष तीन हाथोंमें शंख, चक्र और गदा, वक्षःस्थलपर श्रीवत्सका चिह्न, गलेमें कौस्तुभमणि और वनमाला लटक रही है ॥ ५१-५२ ॥ नन्द- सुनन्द आदि पार्षद अपने ' स्वामी', सनकादि परमर्षि ' परब्रह्म ', ब्रह्मा, महादेव आदि देवता ' सर्वेश्वर ', मरीचि आदि नौ ब्राह्मण ' प्रजापति' और प्रह्लाद-नारद आदि भगवान्के परम ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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प्रेमी भक्त तथा आठों वसु अपने परम प्रियतम ' भगवान्' समझकर भिन्न -भिन्न भावोंके अनुसार निर्दोष वेदवाणीसे भगवान्की स्तुति कर रहे हैं ॥५३-५४ ॥ साथ ही लक्ष्मी, पुष्टि, सरस्वती, कान्ति, कीर्ति और तुष्टि ( अर्थात् ऐश्वर्य, बल, ज्ञान, श्री, यश और वैराग्य — ये षडैश्वर्यरूप शक्तियाँ), इला ( सन्धिनीरूप पृथ्वी - शक्ति), ऊर्जा ( लीलाशक्ति), विद्या- अविद्या ( जीवोंके मोक्ष और बन्धनमें कारणरूपा बहिरंग शक्ति), ह्लादिनी, संवित् ( अन्तरंगा शक्ति) और माया आदि शक्तियाँ मूर्तिमान् होकर उनकी सेवा कर रही हैं ॥५५ ॥
विलोक्य सुभृशं प्रीतो' भक्त्या परमया युतः ।
हृष्यत्तनूरुहो भावपरिक्लिन्नात्मलोचनः ॥५६
गिरा गद्गदयास्तौषीत् सत्त्वमालम्ब्य सात्वतः ।
प्रणम्य मूर्ध्वावहितः कृतांजलिपुटः शनैः ॥५७
भगवान्की यह झाँकी निरखकर अक्रूरजीका हृदय परमानन्दसे लबालब भर गया । उन्हें परम भक्ति प्राप्त हो गयी । सारा शरीर हर्षावेशसे पुलकित हो गया । प्रेमभावका उद्रेक होनेसे उनके नेत्र आँसूसे भर गये || ५६ || अब अक्रूरजीने अपना साहस बटोरकर भगवान्के चरणोंमें सिर रखकर प्रणाम किया और वे उसके बाद हाथ जोड़कर बड़ी सावधानीसे धीरे- धीरे गद्गद स्वरसे भगवान्की स्तुति करने लगे ॥५७ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे ' पूर्वार्धेऽक्रूरप्रतियाने एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३ ९ ॥ १. संतापाः श्वास ० । २. बन्धाश्च । ३. तेक्षणाः । ४. ताश्रयाः । १. सिद्धैर्भुजंगपतिभिरसु० । १. भिर्नृप। १. शान्तं । २. न्धेऽक्रूरप्रतियानं नामैकोन ० । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथ चत्वारिंशोऽध्यायः अक्रूरजीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति अक्रूर उवाच नतोऽस्म्यहं त्वाखिलहेतुहेतुं नारायणं पूरुषमाद्यमव्ययम् । यन्नाभिजातादरविन्दकोशाद् ब्रह्माऽऽविरासीद् यत एष लोकः ॥ १ भूस्तोयमग्निः पवनः खमादि- र्महानजादिर्मन इन्द्रियाणि । सर्वेन्द्रियार्था विबुधाश्च सर्वे ये तवस्ते जगतोऽङ्गभूताः ॥ २ नैते स्वरूपं विदुरात्मनस्ते ह्यजादयोऽनात्मतया गृहीताः । अजोऽनुबद्धः स गुणैरजाया गुणात् परं वेद न ते स्वरूपम् ॥३ अक्रूरजी बोले- प्रभो! आप प्रकृति आदि समस्त कारणोंके परम कारण हैं । आप ही अविनाशी पुरुषोत्तम नारायण हैं तथा आपके ही नाभिकमलसे उन ब्रह्माजीका आविर्भाव हुआ है, जिन्होंने इस चराचर जगत्की सृष्टि की है । मैं आपके चरणोंमें नमस्कार करता ॥१ ॥ पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, अहंकार, महत्तत्त्व, प्रकृति, पुरुष, मन, इन्द्रिय,
सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषय और उनके अधिष्ठातृदेवता - यही सब चराचर जगत् तथा उसके व्यवहारके कारण हैं और ये सब- के - सब आपके ही अंगस्वरूप हैं ॥२ ॥ प्रकृति और
प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले समस्त पदार्थ 'इदंवृत्ति' के द्वारा ग्रहण किये जाते हैं, इसलिये ये सब अनात्मा हैं । अनात्मा होनेके कारण जड हैं और इसलिये आपका स्वरूप नहीं जान सकते । क्योंकि आप तो स्वयं आत्मा ही ठहरे । ब्रह्माजी अवश्य ही आपके स्वरूप हैं । परन्तु वे प्रकृतिके गुण रजस्से युक्त हैं, इसलिये वे भी आपकी प्रकृतिका और उसके गुणोंसे परेका स्वरूप नहीं जानते ॥३ ॥ साधु योगी स्वयं अपने अन्तःकरणमें स्थित ' अन्तर्यामी ' के रूपमें,
समस्त भूत- भौतिक पदार्थोंमें व्याप्त ' परमात्माके ' रूपमें और सूर्य, चन्द्र, अग्नि आदि देवमण्डलमें स्थित ‘ इष्ट - देवता ' के रूपमें तथा उनके साक्षी महापुरुष एवं नियन्ता ईश्वरके रूपमें साक्षात् आपकी ही उपासना करते हैं || ४ || बहुत से कर्मकाण्डी ब्राह्मण कर्ममार्गका उपदेश करनेवाली त्रयीविद्याके द्वारा, जो आपके इन्द्र, अग्नि आदि अनेक देववाचक नाम तथा वज्रहस्त, सप्तार्चि आदि अनेक रूप बतलाती है, बड़े -बड़े यज्ञ करते हैं और उनसे ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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आपकी ही उपासना करते हैं ॥५ ॥ बहुत- से ज्ञानी अपने समस्त कर्मोंका संन्यास कर देते हैं
और शान्त - भावमें स्थित हो जाते हैं । वे इस प्रकार ज्ञानयज्ञके द्वारा ज्ञानस्वरूप आपकी ही आराधना करते हैं ॥६ ॥ और भी बहुत -से संस्कार- सम्पन्न अथवा शुद्धचित्त वैष्णवजन
आपकी बतलायी हुई पांचरात्र आदि विधियोंसे तन्मय होकर आपके चतुर्व्यूह आदि अनेक और नारायणरूप एक स्वरूपकी पूजा करते हैं ॥७॥ भगवन्! दूसरे लोग शिवजीके द्वारा
बतलाये हुए मार्गसे, जिसके आचार्य भेदसे अनेक अवान्तर भेद भी हैं, शिवस्वरूप आपकी ही पूजा करते हैं || ८ || स्वामिन्! जो लोग दूसरे देवताओंकी भक्ति करते हैं और उन्हें आपसे भिन्न समझते हैं, वे सब भी वास्तवमें आपकी ही आराधना करते हैं; क्योंकि आप ही समस्त देवताओंके रूपमें हैं और सर्वेश्वर भी हैं || ९ || प्रभो! जैसे पर्वतोंसे सब ओर बहुत - सी नदियाँ निकलती हैं और वर्षाके जलसे भरकर घूमती- घामती समुद्रमें प्रवेश कर जाती हैं, वैसे ही सभी प्रकारके उपासना- मार्ग घूम- घामकर देर- सबेर आपके ही पास पहुँच जाते हैं ॥१० ॥
त्वां योगिनो यजन्त्यद्धा महापुरुषमीश्वरम् ।
साध्यात्मं साधिभूतं च साधिदैवं च साधवः ॥४
त्रय्या च विद्यया केचित् त्वां वै वैतानिका द्विजाः ।
यजन्ते विततैर्यज्ञैर्नानारूपामराख्यया ॥ ५
एके त्वाखिलकर्माणि संन्यस्योपशमं गताः ।
ज्ञानिनो ज्ञानयज्ञेन यजन्ति ज्ञानविग्रहम् ॥६
अन्ये च संस्कृतात्मानो विधिनाभिहितेन ते ।
यजन्ति त्वन्मयास्त्वां वै बहुमूर्त्येकमूर्तिकम् ॥७
त्वामेवान्ये शिवोक्तेन मार्गेण शिवरूपिणम् ।
बह्वाचार्यविभेदेन भगवन् समुपासते ॥८
सर्व एव यजन्ति त्वां सर्वदेवमयेश्वरम् ।
येऽप्यन्यदेवताभक्ता यद्यप्यन्यधियः प्रभो ॥९
यथाद्रिप्रभवा नद्यः पर्जन्यापूरिताः प्रभो ।
विशन्ति सर्वतः सिन्धुं तद्वत्त्वां गतयोऽन्ततः ॥ १०
सत्त्वं रजस्तम इति भवतः प्रकृतेर्गुणाः ।
तेषु हि प्राकृताः प्रोता आब्रह्मस्थावरादयः ॥११
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प्रभो! आपकी प्रकृतिके तीन गुण हैं- सत्त्व, रज और तम । ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त सम्पूर्ण चराचर जीव प्राकृत हैं और जैसे वस्त्र सूत्रोंसे ओतप्रोत रहते हैं, वैसे ही ये सब प्रकृतिके उन गुणोंसे ही ओतप्रोत हैं ॥ ११ ॥
तुभ्यं नमस्तेऽस्त्वविषक्तदृष्टये सर्वात्मने सर्वधियां च साक्षिणे । गुणप्रवाहोऽयमविद्यया कृतः प्रवर्तते देवनृतिर्यगात्मसु ॥१२ अग्निर्मुखं तेऽवनिरङ्घ्रिरीक्षणं सूर्यो नभो नाभिरथो दिशः श्रुतिः । द्यौः कं सुरेन्द्रास्तव बाहवोऽर्णवाः कुक्षिर्मरुत् प्राणबलं प्रकल्पितम् ॥१३ रोमाणि वृक्षौषधयः शिरोरुहा
मेघाः परस्यास्थिनखानि तेऽद्रयः ।
निमेषणं रात्र्यहनी प्रजापति- द्रस्तु वृष्टिस्तव वीर्यमिष्यते ॥ १४
त्वय्यव्ययात्मन् पुरुषे प्रकल्पिता
लोकाः सपाला बहुजीवसंकुलाः ।
यथा जले संजिहते जलौकसो- ऽप्युदुम्बरे वा मशका मनोमये ॥१५
यानि यानीह रूपाणि क्रीडनार्थं बिभर्षि हि ।
तैरामृष्टशुचो लोका मुदा गायन्ति ते यशः ॥१६
नमः कारणमत्स्याय प्रलयाब्धिचराय च ।
हयशीर्णे नमस्तुभ्यं मधुकैटभमृत्यवे ॥१७
अकूपाराय बृहते नमो मन्दरधारिणे ।
क्षित्युद्धारविहाराय नमः सूकरमूर्तये ॥ १८
परन्तु आप सर्वस्वरूप होनेपर भी उनके साथ लिप्त नहीं हैं। आपकी दृष्टि निर्लिप्त है, क्योंकि आप समस्त वृत्तियोंके साक्षी हैं । यह गुणोंके प्रवाहसे होनेवाली सृष्टि अज्ञानमूलक है और वह देवता, मनुष्य, पशु -पक्षी आदि समस्त योनियोंमें व्याप्त है; परन्तु आप उससे सर्वथा अलग हैं । इसलिये मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥१२ ॥
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अग्नि आपका मुख है । पृथ्वी चरण है । सूर्य और चन्द्रमा नेत्र हैं । आकाश नाभि है । दिशाएँ कान हैं । स्वर्ग सिर है। देवेन्द्रगण भुजाएँ हैं । समुद्र कोख है और यह वायु ही आपकी प्राणशक्तिके रूपमें उपासनाके लिये कल्पित हुई है ॥१३ ॥
वृक्ष और ओषधियाँ रोम हैं । मेघ सिरके केश हैं । पर्वत आपके अस्थिसमूह और नख हैं । दिन और रात पलकोंका खोलना और मींचना है । प्रजापति जननेन्द्रिय हैं और वृष्टि ही आपका वीर्य है ॥१४ ॥
अविनाशी भगवन्! जैसे जलमें बहुत- से जलचर जीव और गूलरके फलोंमें नन्हें- नन्हें कीट रहते हैं, उसी प्रकार उपासनाके लिये स्वीकृत आपके मनोमय पुरुषरूपमें अनेक प्रकारके जीव - जन्तुओंसे भरे हुए लोक और उनके लोकपाल कल्पित किये गये हैं ॥१५ ॥
प्रभो! आप क्रीडा करनेके लिये पृथ्वीपर जो -जो रूप धारण करते हैं, वे सब अवतार लोगोंके शोक- मोहको धो - बहा देते हैं; और फिर सब लोग बड़े आनन्दसे आपके निर्मल यशका गान करते हैं ॥१६ ॥
प्रभो! आपने वेदों, ऋषियों, ओषधियों और सत्यव्रत आदिकी रक्षा- दीक्षाके लिये मत्स्यरूप धारण किया था और प्रलयके समुद्रमें स्वच्छन्द विहार किया था । आपके मत्स्यरूपको मैं नमस्कार करता हूँ। आपने ही मधु और कैटभ नामके असुरोंका संहार करनेके लिये हयग्रीव अवतार ग्रहण किया था । मैं आपके उस रूपको भी नमस्कार करता ॥१७ ॥
आपने ही वह विशाल कच्छपरूप ग्रहण करके मन्दराचलको धारण किया था, आपको मैं नमस्कार करता हूँ । आपने ही पृथ्वीके उद्धारकी लीला करनेके लिये वराहरूप स्वीकार किया था, आपको मेरा बार - बार नमस्कार ॥१८ ॥
नमस्तेऽद्भुतसिंहाय साधुलोकभयापह ।
वामनाय नमस्तुभ्यं क्रान्तत्रिभुवनाय च ॥१९
नमो भृगूणां पतये दृप्तक्षत्रवनच्छिदे ।
नमस्ते रघुवर्याय रावणान्तकराय च ॥२०
नमस्ते वासुदेवाय नमः संकर्षणाय च ।
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय सात्वतां पतये नमः ॥२१
नमो बुद्धाय शुद्धाय दैत्यदानवमोहिने ।
म्लेच्छप्रायक्षत्रहन्त्रे नमस्ते कल्किरूपिणे ॥२२
भगवञ्जीवलोकोऽयं मोहितस्तव मायया ।
अहंममेत्यसद्ग्राहो भ्राम्यते कर्मवर्त्मसु ॥२३
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अहं चात्मात्मजागारदारार्थस्वजनादिषु ।
भ्रमामि स्वप्नकल्पेषु मूढः सत्यधिया विभो ॥२४
अनित्यानात्मदुःखेषु विपर्ययमतिर्ह्यहम् ।
द्वन्द्वारामस्तमोविष्टो न जाने त्वाऽऽत्मनः प्रियम् ॥२५
प्रह्लाद- जैसे साधुजनोंका भय मिटानेवाले प्रभो! आपके उस अलौकिक नृसिंह- रूपको मैं नमस्कार करता हूँ। आपने वामनरूप ग्रहण करके अपने पगोंसे तीनों लोक नाप लिये थे, आपको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १ ९ ॥ धर्मका उल्लंघन करनेवाले घमंडी क्षत्रियोंके वनका छेदन कर देनेके लिये आपने भृगुपति परशुरामरूप ग्रहण किया था । मैं आपके उस रूपको नमस्कार करता हूँ । रावणका नाश करनेके लिये आपने रघुवंशमें भगवान् रामके रूपसे अवतार ग्रहण किया था । मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥२० ॥ वैष्णवजनों तथा यदु-वंशियोंका पालन - पोषण करनेके लिये आपने ही अपनेको वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और
अनिरुद्ध — इस चतुर्व्यूहके रूपमें प्रकट किया है । मैं आपको बार- बार नमस्कार करता हूँ ॥२१ ॥ दैत्य और दानवोंको मोहित करनेके लिये आप शुद्ध अहिंसा - मार्गके प्रवर्तक
बुद्धका रूप ग्रहण करेंगे । मैं आपको नमस्कार करता हूँ और पृथ्वीके क्षत्रिय जब म्लेच्छप्राय हो जायँगे तब उनका नाश करनेके लिये आप ही कल्किके रूपमें अवतीर्ण होंगे । मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥२२ ॥
भगवन्! ये सब - के - सब जीव आपकी मायासे मोहित हो रहे हैं और इस मोहके कारण ही ‘ यह मैं हूँ और यह मेरा है ' इस झूठे दुराग्रहमें फँसकर कर्मके मार्गोंमें भटक रहे हैं ॥२३ ॥ मेरे
स्वामी! इसी प्रकार मैं भी स्वप्नमें दीखनेवाले पदार्थोंके समान झूठे देह - गेह, पत्नी- पुत्र और धन- स्वजन आदिको सत्य समझकर उन्हींके मोहमें फँस रहा हूँ और भटक रहा हूँ ॥२४ ॥
मेरी मूर्खता तो देखिये, प्रभो! मैंने अनित्य वस्तुओंको नित्य, अनात्माको आत्मा और दुःखको सुख समझ लिया । भला, इस उलटी बुद्धिकी भी कोई सीमा है! इस प्रकार अज्ञानवश सांसारिक सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंमें ही रम गया और यह बात बिलकुल भूल गया कि आप ही हमारे सच्चे प्यारे हैं ॥२५ ॥ जैसे कोई अनजान मनुष्य जलके लिये तालाबपर
जाय और उसे उसीसे पैदा हुए सिवार आदि घासोंसे ढका देखकर ऐसा समझ ले कि यहाँ जल नहीं है, तथा सूर्यकी किरणोंमें झूठ -मूठ प्रतीत होनेवाले जलके लिये मृगतृष्णाकी ओर दौड़ पड़े, वैसे ही मैं अपनी ही मायासे छिपे रहनेके कारण आपको छोड़कर विषयोंमें सुखकी आशासे भटक रहा हूँ || २६ || मैं अविनाशी अक्षर वस्तुके ज्ञानसे रहित हूँ । इसीसे मेरे मनमें अनेक वस्तुओंकी कामना और उनके लिये कर्म करनेके संकल्प उठते ही रहते हैं । इसके अतिरिक्त ये इन्द्रियाँ भी जो बड़ी प्रबल एवं दुर्दमनीय हैं, मनको मथ मथकर बलपूर्वक इधर-उधर घसीट ले जाती हैं । इसीलिये इस मनको मैं रोक नहीं पाता ॥ २७ ॥ इस प्रकार भटकता
हुआ मैं आपके उन चरण- कमलोंकी छत्रछायामें आ पहुँचा हूँ, जो दुष्टोंके लिये दुर्लभ हैं । मेरे स्वामी! इसे भी मैं आपका कृपाप्रसाद ही मानता हूँ । क्योंकि पद्मनाभ! जब जीवके संसारसे मुक्त होनेका समय आता है, तब सत्पुरुषोंकी उपासनासे चित्तवृत्ति आपमें लगती है ॥२८ ॥
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