श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 581–590
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 581–590
पृष्ठ 581
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रभो! आप केवल विज्ञानस्वरूप हैं, विज्ञान- घन हैं । जितनी भी प्रतीतियाँ होती हैं, जितनी भी वृत्तियाँ हैं, उन सबके आप ही कारण और अधिष्ठान हैं । जीवके रूपमें एवं जीवोंके सुख - दुःख आदिके निमित्त काल, कर्म, स्वभाव तथा प्रकृतिके रूपमें भी आप ही हैं तथा आप ही उन सबके नियन्ता भी हैं । आपकी शक्तियाँ अनन्त हैं । आप स्वयं ब्रह्म हैं । मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥२९ ॥ प्रभो! आप ही वासुदेव, आप ही समस्त जीवोंके आश्रय ( संकर्षण ) हैं; तथा
आप ही बुद्धि और मनके अधिष्ठातृ -देवता हृषीकेश ( प्रद्युम्न और अनिरुद्ध ) हैं । मैं आपको
बार- बार नमस्कार करता हूँ । प्रभो! आप मुझ शरणागतकी रक्षा कीजिये ॥३० ॥
यथाबुधो जलं हित्वा प्रतिच्छन्नं तदुद्भवैः ।
अभ्येति मृगतृष्णां वै तद्वत्त्वाहं पराङ्मुखः ॥२६
नोत्सहेऽहं कृपणधीः कामकर्महतं मनः ।
रोद्धुं प्रमाथिभिश्चाक्षैर्ह्रियमाणमितस्ततः ॥ २७
सोऽहं तवाङ्घ्रयुपगतोऽस्म्यसतां दुरापं
तच्चाप्यहं भवदनुग्रह ईश मन्ये ।
पुंसो भवेद् यर्हि संसरणापवर्ग- स्त्वस्यब्जनाभ सदुपासनया मतिः स्यात् ॥२८
नमो विज्ञानमात्राय सर्वप्रत्ययहेतवे ।
पुरुषेशप्रधानाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये ॥२९
नमस्ते वासुदेवाय सर्वभूतक्षयाय च ।
हृषीकेश नमस्तुभ्यं प्रपन्नं पाहि मां प्रभो ॥ ३०
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धेऽक्रूरस्तुतिर्नाम चत्वारिंशोऽध्यायः ॥४० ॥
****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 582
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः श्रीकृष्णका मथुराजीमें प्रवेश श्रीशुक उवाच
स्तुवतस्तस्य भगवान् दर्शयित्वा जले वपुः ।
भूयः समाहरत् कृष्णो नटो नाट्यमिवात्मनः ॥१
सोऽपि चान्तर्हितं वीक्ष्य जलादुन्मज्ज्य सत्वरः ।
कृत्वा चावश्यकं सर्वं विस्मितो रथमागमत् ॥२
तमपृच्छद्धृषीकेशः किं ते दृष्टमिवाद्भुतम् ।
भूमौ वियति तोये वा तथा त्वां लक्षयामहे ॥३
अक्रूर उवाच
अद्भुतानीह यावन्ति भूमौ वियति वा जले ।
त्वयि विश्वात्मके तानि किं मेऽदृष्टं विपश्यतः ॥४
यत्राद्भुतानि सर्वाणि भूमौ वियति वा जले ।
तं त्वानुपश्यतो ब्रह्मन् किं मे दृष्टमिहाद्भुतम् ॥५
इत्युक्त्वा चोदयामास स्यन्दनं गान्दिनीसुतः ।
मथुरामनयद् रामं कृष्णं चैव दिनात्यये ॥६
मार्गे ग्रामजना राजंस्तत्र तत्रोपसंगताः ।
वसुदेवसुतौ वीक्ष्य प्रीता दृष्टिं न चाददुः ॥७
तावद् व्रजौकसस्तत्र नन्दगोपादयोऽग्रतः ।
पुरोपवनमासाद्य प्रतीक्षन्तोऽवतस्थिरे ॥ ८
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! अक्रूरजी इस प्रकार स्तुति कर रहे थे । उन्हें भगवान् श्रीकृष्णने जलमें अपने दिव्यरूपके दर्शन कराये और फिर उसे छिपा लिया, ठीक वैसे ही जैसे कोई नट अभिनयमें कोई रूप दिखाकर फिर उसे परदेकी ओटमें छिपा दे || १ || जब अक्रूरजीने देखा कि भगवान्का वह दिव्यरूप अन्तर्धान हो गया, तब वे जलसे बाहर निकल आये और फिर जल्दी - जल्दी सारे आवश्यक कर्म समाप्त करके रथपर चले आये । उस समय वे बहुत ही विस्मित हो रहे थे || २ || भगवान् श्रीकृष्णने उनसे पूछा — 'चाचाजी! आपने ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 583
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पृथ्वी, आकाश या जलमें कोई अद्भुत वस्तु देखी है क्या? क्योंकि आपकी आकृति देखनेसे ऐसा ही जान पड़ता है ' ॥३ ॥
अक्रूरजीने कहा — ' प्रभो! पृथ्वी, आकाश या जलमें और सारे जगत्में जितने भी अद्भुत पदार्थ हैं, वे सब आपमें ही हैं । क्योंकि आप विश्वरूप हैं । जब मैं आपको ही देख रहा हूँ तब ऐसी कौन -सी अद्भुत वस्तु रह जाती है, जो मैंने न देखी हो || ४ || भगवन्! जितनी भी अद्भुत वस्तुएँ हैं, वे पृथ्वीमें हों या जल अथवा आकाशमें - सब की सब जिनमें हैं, उन्हीं आपको मैं देख रहा हूँ! फिर भला मैंने यहाँ अद्भुत वस्तु कौन -सी देखी? ॥५ ॥ गान्दिनी-नन्दन अक्रूरजीने यह कहकर रथ हाँक दिया और भगवान् श्रीकृष्ण तथा बलरामजीको लेकर
दिन ढलते - ढलते वे मथुरापुरी जा पहुँचे || ६ || परीक्षित्! मार्गमें स्थान- स्थानपर गाँवोंके लोग मिलनेके लिये आते और भगवान् श्रीकृष्ण तथा बलरामजीको देखकर आनन्द -मग्न हो जाते । वे एकटक उनकी ओर देखने लगते, अपनी दृष्टि हटा न पाते ॥७ ॥ नन्दबाबा आदि व्रज-वासी तो पहलेसे ही वहाँ पहुँच गये थे, और मथुरापुरीके बाहरी उपवनमें रुककर उनकी
प्रतीक्षा कर रहे थे ॥ ८ ॥
तान् समेत्याह भगवानक्रूरं जगदीश्वरः ।
गृहीत्वा पाणिना पाणिं प्रश्रितं प्रहसन्निव ॥९
भवान् प्रविशतामग्रे सहयानः पुरीं गृहम् ।
वयं त्विहावमुच्याथ ततो द्रक्ष्यामहे पुरीम् ॥१०
अक्रूर उवाच
नाहं भवद्भ्यां रहितः प्रवेक्ष्ये मथुरां प्रभो ।
त्यक्तुं नार्हसि मां नाथ भक्तं ते भक्तवत्सल ॥११
आगच्छ याम गेहान् नः सनाथान् कुर्वधोक्षज ।
सहाग्रजः सगोपालैः सुहृद्भिश्च सुहृत्तम ॥१२
पुनीहि पादरजसा गृहान् नो गृहमेधिनाम् ।
यच्छौचेनानुतृप्यन्ति पितरः साग्नयः सुराः ॥ १३
अवनिज्याङ्घ्रियुगलमासीच्छ्लोक्यो बलिर्महान् ।
ऐश्वर्यमतुलं लेभे गतिं चैकान्तिनां तु या ॥१४
आपस्तेऽङ्घ्रयवनेजन्यस्त्रीँल्लोकाञ्छुचयोऽपुनन् ।
शिरसाधत्त याः शर्वः स्वर्याताः सगरात्मजाः ॥१५
****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 584
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
देवदेव जगन्नाथ पुण्यश्रवणकीर्तन ।
यदूत्तमोत्तमश्लोक नारायण नमोऽस्तु ते ॥१६
श्रीभगवानुवाच
आयास्ये भवतो गेहमहमार्यसमन्वितः ।
यदुचक्रद्रुहं हत्वा वितरिष्ये सुहृत्प्रियम् ॥१७
श्रीशुक उवाच
एवमुक्तो भगवता सोऽक्रूरो विमना इव ।
पुरीं प्रविष्टः कंसाय कर्मावेद्य गृहं ययौ ॥१८
उनके पास पहुँचकर जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्णने विनीतभावसे खड़े अक्रूरजीका हाथ अपने हाथमें लेकर मुसकराते हुए कहा - || ९ || 'चाचाजी! आप रथ लेकर पहले मथुरापुरीमें प्रवेश कीजिये और अपने घर जाइये । हमलोग पहले यहाँ उतरकर फिर नगर देखनेके लिये आयेंगे ' ॥१० ॥
अक्रूरजीने कहा – प्रभो! आप दोनोंके बिना मैं मथुरामें नहीं जा सकता । स्वामी! मैं आपका भक्त हूँ! भक्तवत्सल प्रभो! आप मुझे मत छोड़िये ॥११ ॥ भगवन्! आइये, चलें । मेरे
परम हितैषी और सच्चे सुहृद् भगवन्! आप बलरामजी, ग्वालबालों तथा नन्दरायजी आदि आत्मीयोंके साथ चलकर हमारा घर सनाथ कीजिये ॥१२ ॥ हम गृहस्थ हैं। आप अपने
चरणोंकी धूलिसे हमारा घर पवित्र कीजिये । आपके चरणोंकी धोवन ( गंगाजल या चरणामृत ) से अग्नि, देवता, पितर - सब- के - सब तृप्त हो जाते हैं ॥ १३ ॥ प्रभो! आपके युगल चरणको
पखारकर महात्मा बलिने वह यश प्राप्त किया, जिसका गान सन्त पुरुष करते हैं । केवल यश ही नहीं—उन्हें अतुलनीय ऐश्वर्य तथा वह गति प्राप्त हुई, जो अनन्य प्रेमी भक्तोंको प्राप्त होती है ॥१४ ॥ आपके चरणोदक- गंगाजीने तीनों लोक पवित्र कर दिये । सचमुच वे मूर्तिमान्,
पवित्रता हैं । उन्हींके स्पर्शसे सगरके पुत्रोंको सद्गति प्राप्त हुई और उसी जलको स्वयं भगवान् शंकरने अपने सिरपर धारण किया || १५|| यदुवंशशिरोमणे! आप देवताओंके भी आराध्यदेव हैं । जगत्के स्वामी हैं । आपके गुण और लीलाओंका श्रवण तथा कीर्तन बड़ा ही मंगलकारी है । उत्तम पुरुष आपके गुणोंका कीर्तन करते रहते हैं । नारायण! मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥१६ ॥
श्रीभगवान्ने कहा— चाचाजी! मैं दाऊ भैयाके साथ आपके घर आऊँगा और पहले इस यदुवंशियोंके द्रोही कंसको मारकर तब अपने सभी सुहृद्- स्वजनोंका प्रिय करूँगा ॥१७ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! भगवान्के इस प्रकार कहनेपर अक्रूरजी कुछ अनमने - से हो गये । उन्होंने पुरीमें प्रवेश करके कंससे श्रीकृष्ण और बलरामके ले आनेका समाचार निवेदन किया और फिर अपने घर गये || १८ || दूसरे दिन तीसरे पहर बलरामजी और ग्वालबालोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णने मथुरापुरीको देखनेके लिये नगरमें प्रवेश किया ॥१९ ॥ भगवान्ने देखा कि नगरके परकोटेमें स्फटिकमणि ( बिल्लौर) के बहु ऊँचे-
****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 585
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ऊँचे गोपुर ( प्रधान दरवाजे ) तथा घरों में भी बड़े - बड़े फाटक बने हुए हैं । उनमें सोनेके बड़े - बड़े किंवाड़ लगे हैं और सोनेके ही तोरण ( बाहरी दरवाजे ) बने हुए हैं । नगरके चारों ओर ताँबे और पीतलकी चहारदीवारी बनी हुई है । खाईंके कारण और कहींसे उस नगरमें प्रवेश करना बहुत कठिन है । स्थान- स्थानपर सुन्दर- सुन्दर उद्यान और रमणीय उपवन ( केवल स्त्रियोंके उपयोगमें आनेवाले बगीचे ) शोभायमान हैं || २० || सुवर्णसे सजे हुए चौराहे, धनियोंके महल, उन्हींके साथके बगीचे, कारीगरोंके बैठनेके स्थान या प्रजावर्गके सभा भवन ( टाउनहाल) और साधारण लोगोंके निवासगृह नगरकी शोभा बढ़ा रहे हैं । वैदूर्य, हीरे, स्फटिक ( बिल्लौर ), नीलम, मूँगे, मोती और पन्ने आदिसे जड़े हुए छज्जे, चबूतरे, झरोखे एवं फर्श आदि जगमगा रहे हैं । उनपर बैठे हुए कबूतर, मोर आदि पक्षी भाँति- भाँतिकी बोली बोल रहे हैं । सड़क, बाजार, गली एवं चौराहोंपर खूब छिड़काव किया गया है । स्थान - स्थानपर फूलोंके गजरे, जवारे ( जौके अंकुर ), खील और चावल बिखरे हुए हैं ॥२१-२२ ॥ घरोंके दरवाजोंपर दही और चन्दन आदिसे चर्चित जलसे भरे हुए कलश रखे हैं और वे फूल, दीपक, नयी- नयी कोंपलें फलसहित केले और सुपारीके वृक्ष, छोटी-छोटी झंडियों और रेशमी वस्त्रोंसे भलीभाँति सजाए हुए हैं ॥२३ ॥
अथापराह्णे भगवान् कृष्णः संकर्षणान्वितः ।
मथुरां प्राविशद् गोपैर्दिदृक्षुः परिवारितः ॥१९
ददर्श तां स्फाटिकतुंगगोपुर- द्वारा बृहद्धेमकपाटतोरणाम् ।
ताम्रारकोष्ठां परिखादुरासदा- मुद्यानरम्योपवनोपशोभिताम् ॥ २०
सौवर्णशृंगाटकहर्म्यनिष्कुटैः
श्रेणीसभाभिर्भवनैरुपस्कृताम् ।
वैदूर्यवज्रामलनीलविद्रुमै- र्मुक्ताहरिद्भिर्वलभीषु वेदिषु ॥२१
जुष्टेषु जालामुखरन्ध्रकुट्टिमे- ष्वाविष्टपारावतबर्हिनादिताम् । संसिक्तरथ्यापणमार्गचत्वरां प्रकीर्णमाल्यांकुरलाजतण्डुलाम् ॥२२ आपूर्णकुम्भैर्दधिचन्दनोक्षितैः प्रसूनदीपावलिभिः सपल्लवैः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 586
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सवृन्दरम्भाक्रमुकैः सकेतुभिः स्वलंकृतद्वारगृहां सपट्टिकैः ॥२३ तां सम्प्रविष्टौ वसुदेवनन्दनौ वृतौ वयस्यैर्नरदेववर्त्मना । द्रष्टुं समीयुस्त्वरिताः पुरस्त्रियो हर्म्याणि चैवारुरुहुर्नृपोत्सुकाः ॥ २४ परीक्षित्! वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने ग्वालबालोंके साथ राजपथसे मथुरा नगरीमें प्रवेश किया । उस समय नगरकी नारियाँ बड़ी उत्सुकतासे उन्हें देखनेके लिये झटपट अटारियोंपर चढ़ गयीं || २४ || किसी- किसीने जल्दीके कारण अपने वस्त्र और गहने उलटे पहन लिये । किसीने भूलसे कुण्डल, कंगन आदि जोड़ेसे पहने जानेवाले आभूषणोंमेंसे एक ही पहना और चल पड़ी । कोई एक ही कानमें पत्र नामक आभूषण धारण कर पायी थी तो किसीने एक ही पाँवमें पायजेब पहन रखा था । कोई एक ही आँखमें अंजन आँज पायी थी और दूसरीमें बिना आँजे ही चल पड़ी || २५ || कई रमणियाँ तो भोजन कर रही थीं, वे हाथका कौर फेंककर चल पड़ीं । सबका मन उत्साह और आनन्दसे भर रहा था । कोई- कोई उबटन लगवा रही थीं, वे बिना स्नान किये ही दौड़ पड़ीं । जो सो रही थीं, वे कोलाहल सुनकर उठ खड़ी हुईं और उसी अवस्थामें दौड़ चलीं । जो माताएँ बच्चोंको दूध पिला रही थीं, वे उन्हें गोदसे हटाकर भगवान् श्रीकृष्णको देखनेके लिये चल पड़ीं || २६ || कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण मत-वाले गजराजके समान बड़ी मस्तीसे चल रहे थे । उन्होंने लक्ष्मीको भी आनन्दित करनेवाले अपने श्यामसुन्दर विग्रहसे नगरनारियोंके नेत्रोंको बड़ा आनन्द दिया और अपनी विलासपूर्ण प्रगल्भ हँसी तथा प्रेमभरी चितवनसे उनके मन चुरा लिये ॥२७ ॥ मथुराकी
स्त्रियाँ बहुत दिनोंसे भगवान् श्रीकृष्णकी अद्भुत लीलाएँ सुनती आ रही थीं । उनके चित्त चिरकालसे श्रीकृष्णके लिये चंचल, व्याकुल हो रहे थे । आज उन्होंने उन्हें देखा । भगवान् श्रीकृष्णने भी अपनी प्रेमभरी चितवन और मन्द मुसकानकी सुधासे सींचकर उनका सम्मान किया । परीक्षित्! उन स्त्रियोंने नेत्रोंके द्वारा भगवान्को अपने हृदयमें ले जाकर उनके आनन्दमय स्वरूपका आलिंगन किया । उनका शरीर पुलकित हो गया और बहुत दिनोंकी विरह - व्याधि शान्त हो गयी ॥ २८ ॥ मथुराकी नारियाँ अपने - अपने महलोंकी अटारियोंपर
चढ़कर बलराम और श्रीकृष्णपर पुष्पोंकी वर्षा करने लगीं । उस समय उन स्त्रियोंके मुखकमल प्रेमके आवेगसे खिल रहे थे ॥ २ ९ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंने स्थान -स्थानपर दही, अक्षत, जलसे भरे पात्र, फूलोंके हार, चन्दन और भेंटकी सामग्रियोंसे आनन्दमग्न होकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीकी पूजा की ॥३० ॥ भगवान्को देखकर सभी पुरवासी
आपसमें कहने लगे—' धन्य है! धन्य है! ' गोपियोंने ऐसी कौन-सी महान तपस्या की है, जिसके कारण वे मनुष्यमात्रको परमानन्द देनेवाले इन दोनों मनोहर किशोरोंको देखती रहती हैं ॥३१ ॥
****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 587
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
काश्चिद् विपर्यग्धृतवस्त्रभूषणा विस्मृत्य चैकं युगलेष्वथापराः । कृतैकपत्रश्रवणैकनूपुरा नाङ्क्त्वा द्वितीयं त्वपराश्च लोचनम् ॥२५ अश्नन्त्य एकास्तदपास्य सोत्सवा अभ्यज्यमाना अकृतोपमज्जनाः । स्वपन्त्य उत्थाय निशम्य निःस्वनं प्रपाययन्त्योऽर्भमपोह्य मातरः ॥२६ मनांसि तासामरविन्दलोचनः प्रगल्भलीलाहसितावलोकनैः । जहार मत्तद्विरदेन्द्रविक्रमो दृशां ददच्छ्रीरमणात्मनोत्सवम् ॥२७ दृष्ट्वा मुहुःश्रुतमनुद्रुतचेतसस्तं तत्प्रेक्षणोत्स्मितसुधोक्षणलब्धमानाः । आनन्दमूर्तिमुपगुह्य दृशाऽऽत्मलब्धं हृष्यत्त्वचो जहुरनन्तमरिन्दमाधिम् ॥२८
प्रासादशिखरारूढाः प्रीत्युत्फुल्लमुखाम्बुजाः ।
अभ्यवर्षन् सौमनस्यैः प्रमदा बलकेशवौ ॥२९
दध्यक्षतैः सोदपात्रैः स्रग्गन्धैरभ्युपायनैः ।
तावानर्चुः प्रमुदितास्तत्र तत्र द्विजातयः ॥३०
ऊचुः पौरा अहो गोप्यस्तपः किमचरन् महत् ।
या ह्येतावनुपश्यन्ति नरलोकमहोत्सवौ ॥३१
रजकं कंचिदायान्तं रंगकारं गदाग्रजः ।
दृष्ट्वायाचत वासांसि धौतान्यत्युत्तमानि च ॥ ३२
देह्यावयोः समुचितान्यंग वासांसि चार्हतोः ।
भविष्यति परं श्रेयो दातुस्ते नात्र संशयः ॥३३
****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 588
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
स याचितो भगवता परिपूर्णेन सर्वतः ।
साक्षेपं रुषितः प्राह भृत्यो राज्ञः सुदुर्मदः ॥३४
ईदृशान्येव वासांसि नित्यं गिरिवनेचराः ।
परिधत्त किमुद्वृत्ता राजद्रव्याण्यभीप्सथ ॥३५
याताशु बालिशा मैवं प्रार्थ्यं यदि जिजीविषा ।
बध्नन्ति घ्नन्ति लुम्पन्ति दृप्तं राजकुलानि वै ॥३६
एवं विकत्थमानस्य कुपितो देवकीसुतः ।
रजकस्य कराग्रेण शिरः कायादपातयत् ॥३७
तस्यानुजीविनः सर्वे वासः१ कोशान् विसृज्य वै ।
दुद्रुवुः सर्वतो मार्गं वासांसि जगृहेऽच्युतः ॥ ३८
इसी समय भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि एक धोबी, जो कपड़े रँगनेका भी काम करता था, उनकी ओर आ रहा है । भगवान् श्रीकृष्णने उससे धुले हुए उत्तम उत्तम कपड़े माँगे ॥३२ ॥ भगवान्ने कहा -' भाई! तुम हमें ऐसे वस्त्र दो, जो हमारे शरीरमें पूरे - पूरे आ
जायँ । वास्तवमें हमलोग उन वस्त्रोंके अधिकारी हैं । इसमें सन्देह नहीं कि यदि तुम हमलोगोंको वस्त्र दोगे तो तुम्हारा परम कल्याण होगा' || ३३ || परीक्षित्! भगवान् सर्वत्र परिपूर्ण हैं । सब कुछ उन्हींका है । फिर भी उन्होंने इस प्रकार माँगनेकी लीला की । परन्तु वह मूर्ख राजा कंसका सेवक होनेके कारण मतवाला हो रहा था । भगवान्की वस्तु भगवान्को देना तो दूर रहा, उसने क्रोधमें भरकर आक्षेप करते हुए कहा- || ३४ || ' तुमलोग रहते हो सदा पहाड़ और जंगलोंमें । क्या वहाँ ऐसे ही वस्त्र पहनते हो? तुमलोग बहुत उद्दण्ड हो गये हो तभी तो ऐसी बढ़ - बढ़कर बातें करते हो । अब तुम्हें राजाका धन लूटनेकी इच्छा हुई है ॥३५ ॥ अरे, मूर्खो! जाओ, भाग जाओ! यदि कुछ दिन जीनेकी इच्छा हो तो फिर इस
तरह मत माँगना । राजकर्मचारी तुम्हारे जैसे उच्छृंखलोंको कैद कर लेते हैं, मार डालते हैं और जो कुछ उनके पास होता है, छीन लेते हैं ' || ३६ || जब वह धोबी इस प्रकार बहुत कुछ बहक-बहककर बातें करने लगा, तब भगवान् श्रीकृष्णने तनिक कुपित होकर उसे एक तमाचा जमाया और उसका सिर धड़ामसे धड़से नीचे जा गिरा ॥ ३७ ॥ यह देखकर उस
धोबीके अधीन काम करनेवाले सब- के - सब कपड़ोंके गट्ठर वहीं छोड़कर इधर- उधर भाग गये । भगवान्ने उन वस्त्रोंको ले लिया ॥ ३८ ॥
वसित्वाऽऽत्मप्रिये वस्त्रे कृष्णः संकर्षणस्तथा ।
शेषाण्यादत्त गोपेभ्यो विसृज्य भुवि कानिचित् ॥३९
****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 589
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ततस्तु वायकः प्रीतस्तयोर्वेषमकल्पयत् विचित्रवर्णैश्चैलेयैराकल्पैरनुरूपतः ॥४०
नानालक्षणवेषाभ्यां कृष्णरामौ विरेजतुः ।
स्वलंकृतौ बालगजौ पर्वणीव सितेतरौ ॥४१
तस्य प्रसन्नो भगवान् प्रादात् सारूप्यमात्मनः ।
श्रियं च परमां लोके बलैश्वर्यस्मृतीन्द्रियम् ॥४२
ततः सुदाम्नो भवनं मालाकारस्य जग्मतुः ।
तौ दृष्ट्वा स समुत्थाय ननाम शिरसा भुवि ॥४३
तयोरासनमानीय पाद्यं चार्ध्यार्हणादिभिः ।
पूजां सानुगयोश्चक्रे स्रक्ताम्बूलानुलेपनैः ॥४४
प्राह नः सार्थकं जन्म पावितं च कुलं प्रभो ।
पितृदेवर्षयो मह्यं तुष्टा ह्यागमनेन वाम् ॥४५
भवन्तौ किल विश्वस्य जगतः कारणं परम् ।
अवतीर्णाविहांशेन क्षेमाय च भवाय च ॥ ४६
न हि वां विषमा दृष्टिः सुहृदोर्जगदात्मनोः ।
समयोः सर्वभूतेषु भजन्तं भजतोरपि ॥४७
भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने मनमाने वस्त्र पहन लिये तथा बचे हुए वस्त्रोंमेंसे बहुत -से अपने साथी ग्वाल- बालोंको भी दिये । बहुत- से कपड़े तो वहीं जमीनपर ही छोड़कर चल दिये || ३ ९ || भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम जब कुछ आगे बढ़े, तब उन्हें एक दर्जी मिला । भगवान्का अनुपम सौन्दर्य देखकर उसे बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने उन रंग- बिरंगे सुन्दर वस्त्रोंको उनके शरीरपर ऐसे ढंगसे सजा दिया कि वे सब ठीक- ठीक फब गये ॥४० ॥ अनेक प्रकारके
वस्त्रोंसे विभूषित होकर दोनों भाई और भी अधिक शोभायमान हुए ऐसे जान पड़ते, मानो उत्सवके समय श्वेत और श्याम गजशावक भलीभाँति सजा दिये गये हों || ४१ || भगवान् श्रीकृष्ण उस दर्जीपर बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने उसे इस लोकमें भरपूर धन - सम्पत्ति, बल-ऐश्वर्य, अपनी स्मृति और दूरतक देखने - सुनने आदिकी इन्द्रियसम्बन्धी शक्तियाँ दीं और मृत्युके बादके लिये अपना सारूप्य मोक्ष भी दे दिया ॥४२ ॥
इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण सुदामा मालीके घर गये । दोनों भाइयोंको देखते ही सुदामा ******ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 590
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उठ खड़ा हुआ और पृथ्वीपर सिर रखकर उन्हें प्रणाम किया || ४३ || फिर उनको आसनपर बैठाकर उनके पाँव पखारे, हाथ धुलाये और तदनन्तर ग्वालबालोंके सहित सबकी फूलोंके हार, पान, चन्दन आदि सामग्रियोंसे विधिपूर्वक पूजा की ॥४४ ॥ इसके पश्चात् उसने प्रार्थना
की — ' प्रभो! आप दोनोंके शुभागमनसे हमारा जन्म सफल हो गया । हमारा कुल पवित्र हो गया । आज हम पितर, ऋषि और देवताओंके ऋणसे मुक्त हो गये । वे हमपर परम सन्तुष्ट हैं ॥४५ ॥ आप दोनों सम्पूर्ण जगत्के परम कारण हैं । आप संसारके अभ्युदय- उन्नति और
-निःश्रेयस — मोक्षके लिये ही इस पृथ्वीपर अपने ज्ञान, बल आदि अंशोंके साथ अवतीर्ण हुए हैं ॥४६ ॥ यद्यपि आप प्रेम करनेवालोंसे ही प्रेम करते हैं, भजन करनेवालोंको ही भजते हैं-फिर भी आपकी दृष्टिमें विषमता नहीं है । क्योंकि आप सारे जगत्के परम सुहृद् और आत्मा
हैं । आप समस्त प्राणियों और पदार्थोंमें समरूपसे स्थित हैं ॥४७ ॥
तावाज्ञापयतं भृत्यं किमहं करवाणि वाम् ।
पुंसोऽत्यनुग्रहो ह्येष भवद्भिर्यन्नियुज्यते ॥४८
इत्यभिप्रेत्य राजेन्द्र सुदामा प्रीतमानसः ।
शस्तैः सुगन्धैः कुसुमैर्माला विरचिता ददौ ॥४९
ताभिः स्वलंकृतौ प्रीतौ कृष्णरामौ सहानुगौ ।
प्रणताय प्रपन्नाय ददतुर्वरदौ वरान् ॥५०
सोऽपि वव्रेऽचलां भक्तिं तस्मिन्नेवाखिलात्मनि ।
तद्भक्तेषु च सौहार्दं भूतेषु च दयां पराम् ॥५१
इति तस्मै वरं दत्त्वा श्रियं चान्वयवर्धिनीम् ।
बलमायुर्यशः कान्तिं निर्जगाम सहाग्रजः ॥५२
मैं आपका दास हूँ । आप दोनों मुझे आज्ञा दीजिये कि मैं आपलोगोंकी क्या सेवा करूँ । भगवन्! जीवपर आपका यह बहुत बड़ा अनुग्रह है, पूर्ण कृपाप्रसाद है कि आप उसे आज्ञा देकर किसी कार्यमें नियुक्त करते हैं ॥४८ ॥ राजेन्द्र! सुदामा मालीने इस प्रकार प्रार्थना
करनेके बाद भगवान्का अभिप्राय जानकर बड़े प्रेम और आनन्दसे भरकर अत्यन्त सुन्द्र-सुन्दर तथा सुगन्धित पुष्पोंसे गुँथे हुए हार उन्हें पहनाये ॥४९ ॥ जब ग्वालबाल और
बलरामजीके साथ भगवान् श्रीकृष्ण उन सुन्दर- सुन्दर मालाओंसे अलंकृत हो चुके, तब उन वरदायक प्रभुने प्रसन्न होकर विनीत और शरणागत सुदामाको श्रेष्ठ वर दिये ॥५० ॥ सुदामा
मालीने उनसे यही वर माँगा कि ' प्रभो! आप ही समस्त प्राणियोंके आत्मा हैं । सर्वस्वरूप आपके चरणोंमें मेरी अविचल भक्ति हो । आपके भक्तोंसे मेरा सौहार्द, मैत्रीका सम्बन्ध हो और समस्त प्राणियोंके प्रति अहैतुक दयाका भाव बना रहे ' ॥५१ ॥
****** ebook converter DEMO Watermarks *******