श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 561–570

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 561–570

पृष्ठ 561

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रथेन गोकुलं प्राप्तः सूर्यश्चास्तगिरिं नृप ॥२४ मैं उनके कुटुम्बका हूँ और उनका अत्यन्त हित चाहता हूँ। उनके सिवा और कोई मेरा आराध्यदेव भी नहीं है । ऐसी स्थितिमें वे अपनी लंबी- लंबी बाँहोंसे पकड़कर मुझे अवश्य अपने हृदयसे लगा लेंगे । अहा! उस समय मेरी तो देह पवित्र होगी ही, वह दूसरोंको पवित्र करनेवाली भी बन जायगी और उसी समय —उनका आलिंगन प्राप्त होते ही— मेरे कर्ममय बन्धन, जिनके कारण मैं अनादिकालसे भटक रहा हूँ, टूट जायँगे ॥२० ॥ जब वे मेरा

आलिंगन कर चुकेंगे और मैं हाथ जोड़, सिर झुकाकर उनके सामने खड़ा हो जाऊँगा तब वे मुझे ' चाचा अक्रूर! ' इस प्रकार कहकर सम्बोधन करेंगे! क्यों न हो, इसी पवित्र और मधुर यशका विस्तार करनेके लिये ही तो वे लीला कर रहे हैं । तब मेरा जीवन सफल हो जायगा । भगवान् श्रीकृष्णने जिसको अपनाया नहीं, जिसे आदर नहीं दिया- उसके उस जन्मको, जीवनको धिक्कार है ॥२१ ॥ न तो उन्हें कोई प्रिय है और न तो अप्रिय । न तो उनका कोई

आत्मीय सुहृद् है और न तो शत्रु । उनकी उपेक्षाका पात्र भी कोई नहीं है । फिर भी जैसे कल्पवृक्ष अपने निकट आकर याचना करनेवालोंको उनकी मुँहमाँगी वस्तु देता है, वैसे ही भगवान् श्रीकृष्ण भी, जो उन्हें जिस प्रकार भजता है, उसे उसी रूपमें भजते हैं -वे अपने प्रेमी भक्तोंसे ही पूर्ण प्रेम करते हैं || २२ || मैं उनके सामने विनीत भावसे सिर झुकाकर खड़ा हो जाऊँगा और बलरामजी मुसकराते हुए मुझे अपने हृदयसे लगा लेंगे और फिर मेरे दोनों हाथ पकड़कर मुझे घरके भीतर ले जायँगे । वहाँ सब प्रकारसे मेरा सत्कार करेंगे । इसके बाद मुझसे पूछेंगे कि ‘ कंस हमारे घरवालोंके साथ कैसा व्यवहार करता है? ' ॥२३ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! श्वफल्क - नन्दन अक्रूर मार्गमें इसी चिन्तनमें डूबे - डूबे रथसे नन्द -गाँव पहुँच गये और सूर्य अस्ताचलपर चले गये || २४ || जिनके चरणकमलकी रजका सभी लोकपाल अपने किरीटोंके द्वारा सेवन करते हैं, अक्रूरजीने गोष्ठमें उनके चरणचिह्नोंके दर्शन किये । कमल, यव, अंकुश आदि असाधारण चिह्नोंके द्वारा उनकी पहचान हो रही थी और उनसे पृथ्वीकी शोभा बढ़ रही थी ॥२५ ॥ उन चरणचिह्नोंके दर्शन करते ही

अक्रूरजीके हृदयमें इतना आह्लाद हुआ कि वे अपनेको सँभाल न सके, विह्वल हो गये । प्रेमके आवेगसे उनका रोम - रोम खिल उठा, नेत्रोंमें आँसू भर आये और टप टप टपकने लगे । वे रथसे कूद - कर उस धूलिमें लोटने लगे और कहने लगे- ' अहो! यह हमारे प्रभुके चरणोंकी रज है ' ॥२६ ॥

पदानि तस्याखिललोकपाल- किरीटजुष्टामलपादरेणोः । ददर्श गोष्ठे क्षितिकौतुकानि विलक्षितान्यब्जयवांकुशाद्यैः ॥२५ तद्दर्शनाह्लादविवृद्धसम्भ्रमः प्रेम्णोर्ध्वरोमाश्रुकलाकुलेक्षणः । रथादवस्कन्द्य स तेष्वचेष्टत

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प्रभोरमून्यङ्घ्रिरजांस्यहो इति ॥ २६

देहभृतामियानर्थो हित्वा दम्भं भियं शुचम् ।

संदेशाद् यो हरेर्लिंगदर्शनश्रवणादिभिः ॥२७

ददर्श कृष्णं रामं च व्रजे गोदोहनं गतौ ।

पीतनीलाम्बरधरौ शरदम्बुरुहेक्षणौ ॥२८

किशोरी श्यामलश्वेती श्रीनिकेतौ बृहद्भुजी ।

सुमुखौ सुन्दरवरी बालद्विरदविक्रमी ॥२९

ध्वजवज्रांकुशाम्भोजैश्चिह्नितैरङ्घ्रिभिर्व्रजम् ।

शोभयन्तौ महात्मानावनुक्रोशस्मितेक्षणी ॥ ३०

उदाररुचिरक्रीडौ स्रग्विणौ वनमालिनौ ।

पुण्यगन्धानुलिप्तांगौ स्नातौ विरजवाससौ ॥ ३१

परीक्षित्! कंसके सन्देशसे लेकर यहाँतक अक्रूरजीके चित्तकी जैसी अवस्था रही है, यही जीवोंके देह धारण करनेका परम लाभ है । इसलिये जीवमात्रका यही परम कर्तव्य है कि दम्भ, भय और शोक त्यागकर भगवान्की मूर्ति ( प्रतिमा, भक्त आदि ) चिह्न, लीला, स्थान तथा गुणोंके दर्शन- श्रवण आदिके द्वारा ऐसा ही भाव सम्पादन करें ॥ २७ ॥

व्रजमें पहुँचकर अक्रूरजीने श्रीकृष्ण और बलराम दोनों भाइयोंको गाय दुहनेके स्थानमें विराजमान देखा । श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण पीताम्बर धारण किये हुए थे और गौरसुन्दर बलराम नीलाम्बर । उनके नेत्र शरत्कालीन कमलके समान खिले हुए थे ॥ २८ ॥ उन्होंने अभी किशोर-अवस्थामें प्रवेश ही किया था । वे दोनों गौर- श्याम निखिल सौन्दर्यकी खान थे । घुटनोंका स्पर्श

करनेवाली लंबी- लंबी भुजाएँ, सुन्दर बदन, परम मनोहर और गजशावकके समान ललित चाल थी ॥२९ ॥ उनके चरणोंमें ध्वजा, वज्र, अंकुश और कमलके चिह्न थे । जब वे चलते थे,

उनसे चिह्नित होकर पृथ्वी शोभायमान हो जाती थी । उनकी मन्द मन्द मुसकान और चितवन ऐसी थी मानो दया बरस रही हो । वे उदारताकी तो मानो मूर्ति ही थे ॥३० ॥ उनकी एक- एक

लीला उदारता और सुन्दर कलासे भरी थी । गलेमें वनमाला और मणियोंके हार जगमगा रहे थे । उन्होंने अभी- अभी स्नान करके निर्मल वस्त्र पहने थे और शरीरमें पवित्र अंगराग तथा चन्दनका लेप किया था ॥ ३१ ॥

प्रधानपुरुषावाद्यौ जगद्धेतू जगत्पती ।

अवतीर्णौ जगत्यर्थे स्वांशेन बलकेशवौ ॥३२

दिशो वितिमिरा राजन् कुर्वाणौ प्रभया स्वया ।

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यथा मारकतः शैलो रौप्यश्च कनकाचितौ ॥३३

रथात्तूर्णमवप्लुत्य सोऽक्रूरः स्नेहविह्वलः ।

पपात चरणोपान्ते दण्डवद् रामकृष्णयोः ॥३४

भगवद्दर्शनाह्लादबाष्पपर्याकुलेक्षणः ।

पुलकाचितांग औत्कण्ठ्यात् स्वाख्याने नाशकन् नृप ॥३५

भगवांस्तमभिप्रेत्य रथांगाङ्कितपाणिना ।

परिरेभेऽभ्युपाकृष्य प्रीतः प्रणतवत्सलः ॥३६

संकर्षणश्च प्रणतमुपगुह्य महामनाः ।

गृहीत्वा पाणिना पाणी अनयत् सानुजो गृहम् ॥३७

पृष्ट्वाथ स्वागतं तस्मै निवेद्य च वरासनम् ।

प्रक्षाल्य विधिवत् पादौ मधुपर्कार्हणमाहरत् ॥ ३८

निवेद्य गां चातिथये संवाह्य श्रान्तमादृतः ।

अन्नं बहुगुणं मेध्यं श्रद्धयोपाहरद् विभुः ॥३९

तस्मै भुक्तवते प्रीत्या रामः परमधर्मवित् ।

मुखवासैर्गन्धमाल्यैः परां प्रीतिं व्यधात् पुनः ॥४०

पप्रच्छ सत्कृतं नन्दः कथं स्थ निरनुग्रहे ।

कंसे जीवति दाशार्ह सौनपाला इवावयः ॥४१

परीक्षित्! अक्रूरने देखा कि जगत्के आदिकारण, जगत्के परमपति, पुरुषोत्तम ही संसारकी रक्षाके लिये अपने सम्पूर्ण अंशोंसे बलरामजी और श्रीकृष्णके रूपमें अवतीर्ण होकर अपनी अंगकान्तिसे दिशाओंका अन्धकार दूर कर रहे हैं । वे ऐसे भले मालूम होते थे, जैसे सोनेसे मढ़े हुए मरकतमणि और चाँदीके पर्वत जगमगा रहे हों ॥ ३२-३३ ॥ उन्हें देखते ही अक्रूरजी प्रेमावेगसे अधीर होकर रथसे कूद पड़े और भगवान् श्रीकृष्ण तथा बलरामके चरणोंके पास साष्टांग लोट गये || ३४ || परीक्षित्! भगवान्‌के दर्शनसे उन्हें इतना आह्लाद हुआ कि उनके नेत्र आँसूसे सर्वथा भर गये । सारे शरीरमें पुलकावली छा गयी । उत्कण्ठावश गला भर आनेके कारण वे अपना नाम भी न बतला सके ॥ ३५ ॥ शरणागतवत्सल भगवान्

श्रीकृष्ण उनके मनका भाव जान गये । उन्होंने बड़ी प्रसन्नतासे चक्रांकित हाथोंके द्वारा उन्हें खींचकर उठाया और हृदयसे लगा लिया ॥ ३६ ॥ इसके बाद जब वे परम मनस्वी

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श्रीबलरामजीके सामने विनीत भावसे खड़े हो गये, तब उन्होंने उनको गले लगा लिया और उनका एक हाथ श्रीकृष्णने पकड़ा तथा दूसरा बलरामजीने । दोनों भाई उन्हें घर ले गये ॥३७ ॥

घर ले जाकर भगवान्ने उनका बड़ा स्वागत- सत्कार किया । कुशल- मंगल पूछकर श्रेष्ठ आसनपर बैठाया और विधिपूर्वक उनके पाँव पखारकर मधुपर्क ( शहद मिला हुआ दही ) आदि पूजाकी सामग्री भेंट की ॥ ३८ ॥ इसके बाद भगवान्ने अतिथि अक्रूरजीको एक गाय

दी और पैर दबाकर उनकी थकावट दूर की तथा बड़े आदर एवं श्रद्धासे उन्हें पवित्र और अनेक गुणोंसे युक्त अन्नका भोजन कराया || ३ ९ || जब वे भोजन कर चुके, तब धर्मके परम मर्मज्ञ भगवान् बलरामजीने बड़े प्रेमसे मुखवास ( पान -इलायची आदि) और सुगन्धित माला आदि देकर उन्हें अत्यन्त आनन्दित किया || ४० || इस प्रकार सत्कार हो चुकनेपर नन्दरायजीने उनके पास आकर पूछा- ' अक्रूरजी! आपलोग निर्दयी कंसके जीते - जी किस प्रकार अपने दिन काटते हैं? अरे! उसके रहते आपलोगोंकी वही दशा है जो कसाईद्वारा पाली हुई भेड़ोंकी होती है ॥४१ ॥ जिस इन्द्रियाराम पापीने अपनी बिलखती हुई बहनके

नन्हे - नन्हे बच्चोंको मार डाला । आपलोग उसकी प्रजा हैं । फिर आप सुखी हैं, यह अनुमान तो हम कर ही कैसे सकते हैं? ॥ ४२ ॥ अक्रूरजीने नन्दबाबासे पहले ही कुशल- मंगल पूछ लिया

था । जब इस प्रकार नन्दबाबाने मधुर वाणीसे अक्रूरजीसे कुशल- मंगल पूछा और उनका सम्मान किया तब अक्रूरजीके शरीरमें रास्ता चलनेकी जो कुछ थकावट थी, वह सब दूर हो गयी ॥४३ ॥

योऽवधीत् स्वस्वसुस्तोकान् क्रोशन्त्या असुतृप् खलः ।

किं नु स्वित्तत्प्रजानां वः कुशलं विमृशामहे ॥ ४२

इत्थं सूनृतया वाचा नन्देन सुसभाजितः ।

अक्रूरः परिपृष्टेन जहावध्वपरिश्रमम् ॥४३

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धेऽक्रूरागमनं नामाष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥

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अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः श्रीकृष्ण- बलरामका मथुरागमन श्रीशुक उवाच

सुखोपविष्टः पर्यंके रामकृष्णोरुमानितः ।

लेभे मनोरथान् सर्वान् पथि यान् स चकार ॥१

किमलभ्यं भगवति प्रसन्ने श्रीनिकेतने ।

तथापि तत्परा राजन्न हि वाञ्छन्ति किंचन ॥२

सायंतनाशनं कृत्वा भगवान् देवकीसुतः ।

सुहृत्सु वृत्तं कंसस्य पप्रच्छान्यच्चिकीर्षितम् ॥३

श्रीभगवानुवाच

तात सौम्यागतः कच्चित् स्वागतं भद्रमस्तु वः ।

अपि स्वज्ञातिबन्धूनामनमीवमनामयम् ॥४

किं नु नः कुशलं पृच्छे एधमाने कुलामये ।

कंसे मातुलनाम्न्यङ्ग स्वानां नस्तत्प्रजासु च ॥५

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने अक्रूरजीका भलीभाँति सम्मान किया । वे आरामसे पलँगपर बैठ गये । उन्होंने मार्गमें जो - जो अभिलाषाएँ की थीं, वे सब पूरी हो गयीं ॥१ ॥ परीक्षित्! लक्ष्मीके आश्रयस्थान भगवान् श्रीकृष्णके प्रसन्न होनेपर

ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो प्राप्त नहीं हो सकती? फिर भी भगवान्‌के परमप्रेमी भक्तजन किसी भी वस्तुकी कामना नहीं करते ॥ २ ॥

देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने सायंकालका भोजन करनेके बाद अक्रूरजीके पास जाकर अपने स्वजन - सम्बन्धियोंके साथ कंसके व्यवहार और उसके अगले कार्यक्रमके सम्बन्धमें पूछा ॥३ ॥

भगवान् श्रीकृष्णने कहा- चाचाजी! आपका हृदय बड़ा शुद्ध है । आपको यात्रामें कोई कष्ट तो नहीं हुआ? स्वागत है । मैं आपकी मंगलकामना करता हूँ। मथुराके हमारे आत्मीय सुहृद्, कुटुम्बी तथा अन्य सम्बन्धी सब सकुशल और स्वस्थ हैं न? || ४ || हमारा नाममात्रका मामा कंस तो हमारे कुलके लिये एक भयंकर व्याधि है । जबतक उसकी बढ़ती हो रही है, तबतक हम अपने वंशवालों और उनके बाल- बच्चोंका कुशल- मंगल क्या पूछें ॥५ ॥

चाचाजी! हमारे लिये यह बड़े खेदकी बात है कि मेरे ही कारण मेरे निरपराध और सदाचारी माता- पिताको अनेकों प्रकारकी यातनाएँ झेलनी पड़ीं - तरह-तरहके कष्ट उठाने पड़े । और

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तो क्या कहूँ, मेरे ही कारण उन्हें हथकड़ी - बेड़ीसे जकड़कर जेलमें डाल दिया गया तथा मेरे ही कारण उनके बच्चे भी मार डाले गये || ६ || मैं बहुत दिनोंसे चाहता था कि आप-लोगोंमेंसे किसी--न-किसीका दर्शन हो । यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि आज मेरी वह अभिलाषा पूरी हो गयी । सौम्य - स्वभाव चाचाजी! अब आप कृपा करके यह बतलाइये कि आपका शुभागमन किस निमित्तसे हुआ? ॥७ ॥

अहो अस्मदभूद् भूरि पित्रोर्वृजिनमार्ययोः ।

यद्धेतोः पुत्रमरणं यद्धेतोर्बन्धनं तयोः ॥६

दिष्ट्याद्य दर्शनं स्वानां मह्यं वः सौम्य कांक्षितम् ।

संजातं वर्ण्यतां तात तवागमनकारणम् ॥७

श्रीशुक उवाच

पृष्टो भगवता सर्वं वर्णयामास माधवः ।

वैरानुबन्धं यदुषु वसुदेववधोद्यमम् ॥८

यत्संदेशो यदर्थं वा दूतः संप्रेषितःस्वयम् ।

यदुक्तं नारदेनास्य स्वजन्मानकदुन्दुभेः ॥ ९

श्रुत्वाक्रूरवचः कृष्णो बलश्च परवीरहा ।

प्रहस्य नन्दं पितरं राज्ञाऽऽदिष्टं विजज्ञतुः ॥ १०

गोपान् समादिशत् सोऽपि गृह्यतां सर्वगोरसः ।

उपायनानि गृह्णीध्वं युज्यन्तां शकटानि च ॥११

यास्यामः श्वो मधुपुरीं दास्यामो नृपते रसान् ।

द्रक्ष्यामः सुमहत् पर्व यान्ति जानपदाः किल ।

एवमाघोषयत् क्षत्त्रा नन्दगोपः स्वगोकुले ॥१२

गोप्यस्तास्तदुपश्रुत्य बभूवुर्व्यथिता भृशम् ।

रामकृष्णौ पुरीं नेतुमक्रूरं व्रजमागतम् ॥१३

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! जब भगवान् श्रीकृष्णने अक्रूरजीसे इस प्रकार प्रश्न किया, तब उन्होंने बतलाया कि ' कंसने तो सभी यदुवंशियोंसे घोर वैर ठान रखा है । वह वसुदेवजीको मार डालनेका भी उद्यम कर चुका है ' II ८ II अक्रूरजीने कंसका सन्देश और जिस उद्देश्यसे उसने स्वयं अक्रूरजीको दूत बनाकर भेजा था और नारदजीने जिस प्रकार वसुदेवजीके घर श्रीकृष्णके जन्म लेनेका वृत्तान्त उसको बता दिया था, सो सब कह

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सुनाया ॥९ ॥ अक्रूरजीकी यह बात सुनकर विपक्षी शत्रुओंका दमन करनेवाले भगवान्

श्रीकृष्ण और बलरामजी हँसने लगे और इसके बाद उन्होंने अपने पिता नन्दजीको कंसकी आज्ञा सुना दी ॥१० ॥ तब नन्दबाबाने सब गोपोंको आज्ञा दी कि ' सारा गोरस एकत्र करो ।

भेंटकी सामग्री ले लो और छकड़े जोड़ो ॥११ ॥ कल प्रातःकाल ही हम सब मथुराकी यात्रा

करेंगे और वहाँ चलकर राजा कंसको गोरस देंगे । वहाँ एक बहुत बड़ा उत्सव हो रहा है । उसे देखनेके लिये देशकी सारी प्रजा इकट्ठी हो रही है । हमलोग भी उसे देखेंगे । ' नन्दबाबाने गाँवके कोतवालके द्वारा यह घोषणा सारे व्रजमें करवा दी ॥ १२ ॥

परीक्षित्! जब गोपियोंने सुना कि हमारे मनमोहन श्यामसुन्दर और गौरसुन्दर बलरामजीको मथुरा ले जानेके लिये अक्रूरजी व्रजमें आये हैं तब उनके हृदयमें बड़ी व्यथा हुई । वे व्याकुल हो गयीं || १३ || भगवान् श्रीकृष्णके मथुरा जानेकी बात सुनते ही बहुतोंके हृदयमें ऐसी जलन हुई कि गरम साँस चलने लगी, मुखकमल कुम्हला गया । और बहुतोंकी ऐसी दशा हुई- वे इस प्रकार अचेत हो गयीं कि उन्हें खिसकी हुई ओढ़नी, गिरते हुए कंगन और ढीले हुए जूड़ोंतकका पता न रहा ॥१४ ॥ भगवान् के स्वरूपका ध्यान आते ही बहुत - सी

गोपियोंकी चित्तवृत्तियाँ सर्वथा निवृत्त हो गयीं, मानो वे समाधिस्थ - आत्मामें स्थित हो गयी हों, और उन्हें अपने शरीर और संसारका कुछ ध्यान ही न रहा ॥१५ ॥ बहुत- सी गोपियोंके

सामने भगवान् श्रीकृष्णका प्रेम, उनकी मन्द मन्द मुसकान और हृदयको स्पर्श करनेवाली विचित्र पदोंसे युक्त मधुर वाणी नाचने लगी । वे उसमें तल्लीन हो गयीं । मोहित हो गयीं ॥१६ ॥ गोपियाँ मन- ही- मन भगवान्‌की लटकीली चाल, भाव- भंगी, प्रेमभरी मुसकान,

चितवन, सारे शोकोंको मिटा देनेवाली ठिठोलियाँ तथा उदारता -भरी लीलाओंका चिन्तन करने लगीं और उनके विरहके भयसे कातर हो गयीं । उनका हृदय, उनका जीवन - सब कुछ भगवान्के प्रति समर्पित था । उनकी आँखोंसे आँसू बह रहे थे । वे झुंड - की - झुंड इकट्ठी होकर इस प्रकार कहने लगीं ॥१७-१८ ॥

काश्चित्तत्कृतहृत्तापश्वासम्लानमुखश्रियः ।

स्रंसदुकूलवलयकेशग्रन्थ्यश्च' काश्चन ॥ १४

अन्याश्च तदनुध्याननिवृत्ताशेषवृत्तयः ।

नाभ्यजानन्निमं लोकमात्मलोकं गता इव ॥१५

स्मरन्त्यश्चापराः शौरेरनुरागस्मितेरिताः ३ ।

हृदिस्पृशश्चित्रपदा गिरः संमुमुहुः स्त्रियः ॥१६

गतिं सुललितां चेष्टां स्निग्धहासावलोकनम् ।

शोकापहानि नर्माणि प्रोद्दामचरितानि च ॥ १७

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चिन्तयन्त्यो मुकुन्दस्य भीता विरहकातराः ।

समेताः संघशः प्रोचुरश्रुमुख्यो ऽच्युताशयाः४ ॥ १८

गोप्य ऊचुः अहो विधातस्तव न क्वचिद् दया संयोज्य मैत्र्या प्रणयेन देहिनः । तांश्चाकृतार्थान् वियुनङ्क्ष्यपार्थकं विक्रीडितं तेऽर्भकचेष्टितं यथा ॥१९ यस्त्वं प्रदर्थ्यासितकुन्तलावृतं मुकुन्दवक्त्रं सुकपोलमुन्नसम् । शोकापनोदस्मितलेशसुन्दरं करोषि पारोक्ष्यमसाधु ते कृतम् ॥२० गोपियोंने कहा — धन्य हो विधाता! तुम सब कुछ विधान तो करते हो, परन्तु तुम्हारे हृदयमें दयाका लेश भी नहीं है । पहले तो तुम सौहार्द और प्रेमसे जगत्के प्राणियोंको एक-दूसरेके साथ जोड़ देते हो, उन्हें आपसमें एक कर देते हो; मिला देते हो परन्तु अभी उनकी आशा- अभिलाषाएँ पूरी भी नहीं हो पातीं, वे तृप्त भी नहीं हो पाते कि तुम उन्हें व्यर्थ ही अलग- अलग कर देते हो! सच है, तुम्हारा यह खिलवाड़ बच्चोंके खेलकी तरह व्यर्थ ही है ॥१९ ॥ यह कितने दुःखकी बात है! विधाता! तुमने पहले हमें प्रेमका वितरण करनेवाले

श्यामसुन्दरका मुखकमल दिखलाया । कितना सुन्दर है वह! काले-काले घुँघराले बाल कपोलोंपर झलक रहे हैं । मरकतमणि - से चिकने सुस्निग्ध कपोल और तोतेकी चौंच- सी सुन्दर नासिका तथा अधरोंपर मन्द मन्द मुसकानकी सुन्दर रेखा, जो सारे शोकोंको तत्क्षण भगा देती है । विधाता! तुमने एक बार तो हमें वह परम सुन्दर मुखकमल दिखाया और अब उसे ही हमारी आँखोंसे ओझल कर रहे हो! सचमुच तुम्हारी यह करतूत बहुत ही अनुचित है ॥२० ॥

हम जानती हैं, इसमें अक्रूरका दोष नहीं है; यह तो साफ तुम्हारी क्रूरता है । वास्तवमें तुम्हीं अक्रूरके नामसे यहाँ आये हो और अपनी ही दी हुई आँखें तुम हमसे मूर्खकी भाँति छीन रहे हो । इनके द्वारा हम श्यामसुन्दरके एक-एक अंगमें तुम्हारी सृष्टिका सम्पूर्ण सौन्दर्य निहारती रहती थीं । विधाता! तुम्हें ऐसा नहीं चाहिये ॥ २१ ॥

क्रूरस्त्वमक्रूरसमाख्यया स्म न- श्चक्षुर्हि दत्तं हरसे बताज्ञवत् । येनैकदेशेऽखिलसर्गसौष्ठवं त्वदीयमद्राक्ष्म वयं मधुद्विषः ॥ २१ न नन्दसूनुः क्षणभंगसौहृदः

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समीक्षते नः स्वकृतातुरा बत ।

विहाय गेहान् स्वजनान् सुतान् पतीं- स्तद्दास्यमद्धोपगता नवप्रियः ॥२२

सुखं प्रभाता रजनीयमाशिषः सत्या बभूवुः पुरयोषितां ध्रुवम् । याः संप्रविष्टस्य मुखं व्रजस्पतेः पास्यन्त्यपांगोत्कलितस्मितासवम् ॥२३ तासां मुकुन्दो मधुमंजुभाषितै- र्गृहीतचित्तः परवान् मनस्व्यपि । कथं पुनर्नः प्रतियास्यतेऽबला ग्राम्याः सलज्जस्मितविभ्रमैर्भ्रमन् ॥२४ अद्य ध्रुवं तत्र दृशो भविष्यते दाशार्हभोजान्धकवृष्णिसात्वताम् । महोत्सवः श्रीरमणं गुणास्पदं द्रक्ष्यन्ति ये चाध्वनि देवकीसुतम् ॥२५ अहो! नन्दनन्दन श्यामसुन्दरको भी नये - नये लोगोंसे नेह लगानेकी चाट पड़ गयी है । देखो तो सही — इनका सौहार्द, इनका प्रेम एक क्षणमें ही कहाँ चला गया? हम तो अपने घर-द्वार, स्वजन - सम्बन्धी, पति- पुत्र आदिको छोड़कर इनकी दासी बनीं और इन्हींके लिये आज हमारा हृदय शोकातुर हो रहा है, परन्तु ये ऐसे हैं कि हमारी ओर देखतेतक नहीं || २२ || आजकी रातका प्रातःकाल मथुराकी स्त्रियोंके लिये निश्चय ही बड़ा मंगलमय होगा । आज उनकी बहुत दिनोंकी अभिलाषाएँ अवश्य ही पूरी हो जायँगी । जब हमारे व्रजराज श्यामसुन्दर अपनी तिरछी चितवन और मन्द मन्द मुसकानसे युक्त मुखारविन्दका मादक मधु वितरण करते हुए मथुरापुरीमें प्रवेश करेंगे, तब वे उसका पान करके धन्य- धन्य हो जायँगी || २३ ॥ यद्यपि हमारे श्यामसुन्दर धैर्यवान् होनेके साथ ही नन्दबाबा आदि गुरुजनोंकी आज्ञामें रहते हैं, तथापि मथुराकी युवतियाँ अपने मधुके समान मधुर वचनोंसे इनका चित्त बरबस अपनी ओर खींच लेंगी और ये उनकी सलज्ज मुसकान तथा विलासपूर्ण भाव- भंगीसे वहीं रम जायँगे । फिर हम गँवार ग्वालिनोंके पास ये लौटकर क्यों आने लगे || २४ || धन्य है आज हमारे श्यामसुन्दरका दर्शन करके मथुराके दाशार्ह, भोज, अन्धक और वृष्णिवंशी यादवोंके नेत्र अवश्य ही परमानन्दका साक्षात्कार करेंगे । आज उनके यहाँ महान् उत्सव होगा । साथ ही जो लोग यहाँसे मथुरा जाते हुए रमारमण गुणसागर नटनागर देवकीनन्दन श्यामसुन्दरका मार्गमें दर्शन करेंगे, वे भी निहाल हो जायँगे ॥ २५ ॥

पृष्ठ 570

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मैतद्विधस्याकरुणस्य नाम भू- दक्रूर इत्येतदतीव दारुणः । योऽसावनाश्वास्य सुदुःखितं जनं प्रियात्प्रियं नेष्यति पारमध्वनः ॥२६ अनार्द्रधीरेष समास्थितो रथं तमन्वमी च त्वरयन्ति दुर्मदाः गोपा अनोभिः स्थविरैरुपेक्षितं दैवं च नोऽद्य प्रतिकूलमीहते ॥ २७ निवारयामः समुपेत्य माधवं किं नोऽकरिष्यन् कुलवृद्धबान्धवाः । मुकुन्दसंगान्निमिषार्धदुस्त्यजाद् दैवेन विध्वंसितदीनचेतसाम् ॥२८ यस्यानुरागललितस्मितवल्गुमन्त्र- लीलावलोकपरिरम्भणरासगोष्ठ्याम् । नीताः स्म नः क्षणमिव क्षणदा विना तं गोप्यः कथं न्वतितरेम तमो दुरन्तम् ॥२९ योऽह्नः क्षये व्रजमनन्तसखः परीतो गोपैर्विशन् खुररजश्छुरितालकस्रक् । वेणुं क्वणन् स्मितकटाक्षनिरीक्षणेन चित्तं क्षिणोत्यमुमृते नु कथं भवेम ॥३० देखो सखी! यह अक्रूर कितना निठुर, कितना हृदयहीन है । इधर तो हम गोपियाँ इतनी दुःखित हो रही हैं और यह हमारे परम प्रियतम नन्ददुलारे श्यामसुन्दरको हमारी आँखोंसे ओझल करके बहुत दूर ले जाना चाहता है और दो बात कहकर हमें धीरज भी नहीं बँधाता, आश्वासन भी नहीं देता । सचमुच ऐसे अत्यन्त क्रूर पुरुषका ' अक्रूर' नाम नहीं होना चाहिये था ॥२६ ॥ सखी! हमारे ये श्यामसुन्दर भी तो कम निठुर नहीं हैं । देखो -देखो, वे भी रथपर

बैठ गये । और मतवाले गोपगण छकड़ोंद्वारा उनके साथ जानेके लिये कितनी जल्दी मचा रहे हैं । सचमुच ये मूर्ख हैं । और हमारे बड़े - बूढ़े! उन्होंने तो इन लोगोंकी जल्दबाजी देखकर उपेक्षा कर दी है कि ' जाओ जो मनमें आवे, करो! ' अब हम क्या करें? आज विधाता सर्वथा हमारे प्रतिकूल चेष्टा कर रहा है ॥२७॥ चलो, हम स्वयं ही चलकर अपने प्राणप्यारे

श्यामसुन्दरको रोकेंगी; कुलके बड़े - बूढ़े और बन्धुजन हमारा क्या कर लेंगे? अरी सखी! हम आधे क्षणके लिये भी प्राणवल्लभ नन्दनन्दनका संग छोड़नेमें असमर्थ थीं । आज हमारे