श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 591–600
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 591–600
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भगवान् श्रीकृष्णने सुदामाको उसके माँगे हुए वर तो दिये ही- ऐसी लक्ष्मी भी दी जो वंशपरम्पराके साथ- साथ बढ़ती जाय; और साथ ही बल, आयु, कीर्ति तथा कान्तिका भी वरदान दिया । इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजीके साथ वहाँसे बिदा हुए ॥५२ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे पुरप्रवेशो नाम एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४१ ॥
१. बाह्यघोषैर्वितत्रसुः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथ द्विचत्वारिंशोऽध्यायः कुब्जापर कृपा, धनुषभंग और कंसकी घबड़ाहट श्रीशुक उवाच अथ व्रजन् राजपथेन माधवः स्त्रियं गृहीताङ्गविलेपभाजनाम् । विलोक्य कुब्जां युवतीं वराननां पप्रच्छ यान्तीं प्रहसन् रसप्रदः ॥१ श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण जब अपनी मण्डलीके साथ राजमार्गसे आगे बढ़े, तब उन्होंने एक युवती स्त्रीको देखा । उसका मुँह तो सुन्दर था, परन्तु वह शरीरसे कुबड़ी थी। इसीसे उसका नाम पड़ गया था ' कुब्जा ' । वह अपने हाथमें चन्दनका पात्र लिये हुए जा रही थी । भगवान् श्रीकृष्ण प्रेमरसका दान करनेवाले हैं, उन्होंने कुब्जापर कृपा करनेके लिये हँसते हुए उससे पूछा- || १ || ' सुन्दरी! तुम कौन हो? यह चन्दन किसके लिये ले जा रही हो? कल्याणि! हमें सब बात सच- सच बतला दो । यह उत्तम
चन्दन, यह अंगराग हमें भी दो । इस दानसे शीघ्र ही तुम्हारा परम कल्याण होगा ' ॥२ ॥
का त्वं वरोर्वेतदु हानुलेपनं कस्यांगने वा कथयस्व साधु नः । देह्यावयोरंगविलेपमुत्तमं श्रेयस्ततस्ते नचिराद् भविष्यति ॥२ सैरन्ध्रयुवाच दास्यस्म्यहं सुन्दर कंससम्मता त्रिवक्रनामा ह्यनुलेपकर्मणि । मद्भावितं भोजपतेरतिप्रियं विना युवां कोऽन्यतमस्तदर्हति ॥३
रूपपेशलमाधुर्यहसितालापवीक्षितैः ।
धर्षितात्मा ददौ सान्द्रमुभयोरनुलेपनम् ॥ ४
ततस्तावङ्गरागेण स्ववर्णेतरशोभिना ।
सम्प्राप्तपरभागेन शुशुभातेऽनुरञ्जिती ॥५
प्रसन्नो भगवान् कुब्जां त्रिवक्रां रुचिराननाम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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ऋज्वीं कर्तुं मनश्चक्रे दर्शयन् दर्शने फलम् ॥६
पद्भयामाक्रम्य प्रपदे द्वयंगुल्युत्तानपाणिना ।
प्रगृह्य चुबुकेऽध्यात्ममुदनीनमदच्युतः ॥७
सा तदर्जुसमानांगी बृहच्छ्रोणिपयोधरा ।
मुकुन्दस्पर्शनात् सद्यो बभूव प्रमदोत्तमा ॥ ८
ततो रूपगुणौदार्यसम्पन्ना प्राह केशवम् ।
उत्तरीयान्तमाकृष्य स्मयन्ती जातहृच्छया ॥९
उबटन आदि लगानेवाली सैरन्ध्री कुब्जाने कहा - ' परम सुन्दर! मैं कंसकी प्रिय दासी हूँ । महाराज मुझे बहुत मानते हैं । मेरा नाम त्रिवक्रा ( कुब्जा ) है । मैं उनके यहाँ चन्दन, अंगराग लगानेका काम करती हूँ । मेरे द्वारा तैयार किये हुए चन्दन और अंगराग भोजराज कंसको बहुत भाते हैं । परन्तु आप दोनोंसे बढ़कर उसका और कोई उत्तम पात्र नहीं है ' || ३ || भगवान्के सौन्दर्य, सुकुमारता, रसिकता, मन्दहास्य, प्रेमालाप और चारु चितवनसे कुब्जाका मन हाथसे निकल गया । उसने भगवान्पर अपना हृदय न्योछावर कर दिया । उसने दोनों भाइयोंको वह सुन्दर और गाढ़ा अंगराग दे दिया ॥४ ॥
तब भगवान् श्रीकृष्णने अपने साँवले शरीरपर पीले रंगका और बलरामजीने अपने गोरे शरीरपर लाल रंगका अंगराग लगाया तथा नाभिसे ऊपरके भागमें अनुरंजित होकर वे अत्यन्त सुशोभित हुए || ५ || भगवान् श्रीकृष्ण उस कुब्जापर बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने अपने दर्शनका प्रत्यक्ष फल दिखलानेके लिये तीन जगहसे टेढ़ी किन्तु सुन्दर मुखवाली कुब्जाको सीधी करनेका विचार किया || ६ || भगवान्ने अपने चरणोंसे कुब्जाके पैरके दोनों पंजे दबा लिये और हाथ ऊँचा करके दो अँगुलियाँ उसकी ठोड़ीमें लगायीं तथा उसके शरीरको तनिक उचका दिया ॥७ ॥ उचकाते ही उसके सारे अंग सीधे और समान हो गये । प्रेम और मुक्तिके
दाता भगवान्के स्पर्शसे वह तत्काल विशाल नितम्ब तथा पीन पयोधरोंसे युक्त एक उत्तम युवती बन गयी || ८ || उसी क्षण कुब्जा रूप, गुण और उदारतासे सम्पन्न हो गयी । उसके मनमें भगवान्के मिलनकी कामना जाग उठी । उसने उनके दुपट्टेका छोर पकड़कर मुसकराते हुए कहा - ॥९ ॥
एहि वीर गृहं यामो न त्वां त्यक्तुमिहोत्सहे ।
त्वयोन्मथितचित्तायाः प्रसीद पुरुषर्षभ ॥ १०
एवं स्त्रिया याच्यमानः कृष्णो रामस्य पश्यतः ।
मुखं वीक्ष्यानुगानां च प्रहसंस्तामुवाच ह ॥ ११
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एष्यामि ते गृहं सुभ्रूः पुंसामाधिविकर्शनम् ।
साधितार्थोऽगृहाणां नः पान्थानां त्वं परायणम् ॥१२
विसृज्य माध्व्या वाण्या तां व्रजन् मार्गे वणिक्पथैः ।
नानोपायनताम्बूलस्रग्गन्धैः साग्रजोऽर्चितः ॥१३
तद्दर्शनस्मरक्षोभादात्मानं नाविदन् स्त्रियः ।
विस्रस्तवासःकबरवलयालेख्यमूर्तयः ॥१४
ततः पौरान् पृच्छमानो धनुषः स्थानमच्युतः ।
तस्मिन् प्रविष्टो ददृशे धनुरेन्द्रमिवाद्भुतम् ॥१५
पुरुषैर्बहुभिर्गुप्तमर्चितं परमर्द्धिमत् ।
वार्यमाणो नृभिः कृष्णः प्रसह्य धनुराददे ॥१६
करेण वामेन सलीलमुद्धृतं सज्यं च कृत्वा निमिषेण पश्यताम् । नृणां विकृष्य प्रबभंज मध्यतो यथेक्षुदण्डं मदकर्युरुक्रमः ॥१७
धनुषो भज्यमानस्य शब्दः खं रोदसी दिशः ।
पूरयामास यं श्रुत्वा कंसस्त्रासमुपागमत् ॥१८
‘ वीरशिरोमणे! आइये, घर चलें । अब मैं आपको यहाँ नहीं छोड़ सकती । क्योंकि आपने मेरे चित्तको मथ डाला है । पुरुषोत्तम! मुझ दासीपर प्रसन्न होइये ' || १० || जब बलरामजीके सामने ही कुब्जाने इस प्रकार प्रार्थना की, तब भगवान् श्रीकृष्णने अपने साथी ग्वालबालोंके मुँहकी ओर देखकर हँसते हुए उससे कहा- ॥११ ॥ ' सुन्दरी! तुम्हारा घर संसारी लोगोंके
लिये अपनी मानसिक व्याधि मिटानेका साधन है । मैं अपना कार्य पूरा करके अवश्य वहाँ आऊँगा । हमारे - जैसे बेघरके बटोहियोंको तुम्हारा ही तो आसरा है ' ॥१२ ॥ इस प्रकार मीठी-मीठी बातें करके भगवान् श्रीकृष्णने उसे विदा कर दिया । जब वे व्यापारियोंके बाजारमें
पहुँचे, तब उन व्यापारियोंने उनका तथा बलरामजीका पान, फूलोंके हार, चन्दन और तरह-तरहकी भेंट— उपहारोंसे पूजन किया || १३ || उनके दर्शनमात्रसे स्त्रियोंके हृदयमें प्रेमका आवेग, मिलनकी आकांक्षा जग उठती थी । यहाँतक कि उन्हें अपने शरीरकी भी सुध न रहती । उनके वस्त्र, जूड़े और कंगन ढीले पड़ जाते थे तथा वे चित्रलिखित मूर्तियोंके समान ज्यों- की- त्यों खड़ी रह जाती थीं ॥१४ ॥
इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण पुरवासियोंसे धनुष यज्ञका स्थान पूछते हुए रंगशालामें ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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पहुँचे और वहाँ उन्होंने इन्द्रधनुषके समान एक अद्भुत धनुष देखा ॥१५ ॥ उस धनुषमें
बहुत - सा धन लगाया गया था, अनेक बहुमूल्य अलंकारोंसे उसे सजाया गया था । उसकी खूब पूजा की गयी थी और बहुत - से सैनिक उसकी रक्षा कर रहे थे । भगवान् श्रीकृष्णने रक्षकोंके रोकनेपर भी उस धनुषको बलात् उठा लिया ॥१६॥ उन्होंने सबके देखते - देखते उस
धनुषको बायें हाथसे उठाया, उसपर डोरी चढ़ायी और एक क्षणमें खींचकर बीचो -बीच से उसी प्रकार उसके दो टुकड़े कर डाले, जैसे बहुत बलवान् मतवाला हाथी खेल-ही- खेलमें ईखको तोड़ डालता है ॥१७ ॥ जब धनुष टूटा तब उसके शब्दसे आकाश, पृथ्वी और दिशाएँ
भर गयीं; उसे सुनकर कंस भी भयभीत हो गया || १८ || अब धनुषके रक्षक आततायी असुर अपने सहायकोंके साथ बहुत ही बिगड़े । वे भगवान् श्रीकृष्णको घेरकर खड़े हो गये और उन्हें पकड़ लेनेकी इच्छासे चिल्लाने लगे- ' पकड़ लो, बाँध लो, जाने न पावे' ॥१९ ॥ उनका दुष्ट
अभिप्राय जानकर बलरामजी और श्रीकृष्ण भी तनिक क्रोधित हो गये और उस धनुषके टुकड़ोंको उठाकर उन्हींसे उनका काम तमाम कर दिया ॥२० ॥ उन्हीं धनुषखण्डोंसे उन्होंने
उन असुरोंकी सहायताके लिये कंसकी भेजी हुई सेनाका भी संहार कर डाला । इसके बाद वे यज्ञशालाके प्रधान द्वारसे होकर बाहर निकल आये और बड़े आनन्दसे मथुरापुरीकी शोभा देखते हुए विचरने लगे ॥२१ ॥ जब नगरनिवासियोंने दोनों भाइयोंके इस अद्भुत पराक्रमकी
बात सुनी और उनके तेज, साहस तथा अनुपम रूपको देखा तब उन्होंने यही निश्चय किया कि हो- न- हो ये दोनों कोई श्रेष्ठ देवता हैं ॥ २२ ॥ इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी
पूरी स्वतन्त्रतासे मथुरापुरीमें विचरण करने लगे । जब सूर्यास्त हो गया तब दोनों भाई ग्वालबालोंसे घिरे हुए नगरसे बाहर अपने डेरेपर, जहाँ छकड़े थे, लौट आये ॥२३ ॥ तीनों
लोकोंके बड़े - बड़े देवता चाहते थे कि लक्ष्मी हमें मिलें, परन्तु उन्होंने सबका परित्याग कर दिया और न चाहनेवाले भगवान्का वरण किया । उन्हींको सदाके लिये अपना निवासस्थान बना लिया । मथुरावासी उन्हीं पुरुषभूषण भगवान् श्रीकृष्णके अंग- अंगका सौन्दर्य देख रहे हैं । उनका कितना सौभाग्य है! व्रजमें भगवान्की यात्राके समय गोपियोंने विरहातुर होकर मथुरावासियोंके सम्बन्धमें जो -जो बातें कही थीं, वे सब यहाँ अक्षरशः सत्य हुईं। सचमुच वे परमानन्दमें मग्न हो गये ॥२४ ॥
तद्रक्षिणः सानुचराः कुपिता आततायिनः ।
ग्रहीतुकामा आवव्रुर्गृह्यतां बध्यतामिति ॥१९
अथ तान् दुरभिप्रायान् विलोक्य बलकेशवौ ।
क्रुद्धौ धन्वन आदाय शकले तांश्च जघ्नतुः ॥ २०
बलं च कंसप्रहितं हत्वा शालामुखात्ततः ।
निष्क्रम्य चेरतुर्हृष्टौ निरीक्ष्य पुरसम्पदः ॥२१
तयोस्तदद्भुतं वीर्यं निशाम्य पुरवासिनः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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तेजः प्रागल्भ्यं रूपं च मेनिरे विबुधोत्तमौ ॥२२
तयोर्विचरतोः स्वैरमादित्योऽस्तमुपेयिवान् ।
कृष्णरामौ वृतौ गोपैः पुराच्छकटमीयतुः ॥ २३
गोप्यो मुकुन्दविगमे विरहातुरा या आशासताशिष ऋता मधुपुर्यभूवन् । सम्पश्यतां पुरुषभूषणगात्रलक्ष्मीं हित्वेतरान् नु भजतश्चकमेऽयनं श्रीः ॥२४
अवनिक्ताङ्घ्रियुगलौ भुक्त्वा क्षीरोपसेचनम् ।
ऊषतुस्तां सुखं रात्रिं ज्ञात्वा कंसचिकीर्षितम् ॥२५
कंसस्तु धनुषो भंगं रक्षिणां स्वबलस्य च ।
वधं निशम्य गोविन्दरामविक्रीडितं परम् ॥२६
फिर हाथ - पैर धोकर श्रीकृष्ण और बलरामजीने दूधमें बने हुए खीर आदि पदार्थोंका भोजन किया और कंस आगे क्या करना चाहता है, इस बातका पता लगाकर उस रातको वहीं आरामसे सो गये ॥२५ ॥
जब कंसने सुना कि श्रीकृष्ण और बलरामने धनुष तोड़ डाला, रक्षकों तथा उनकी सहायताके लिये भेजी हुई सेनाका भी संहार कर डाला और यह सब उनके लिये केवल एक खिलवाड़ ही था—-इसके लिये उन्हें कोई श्रम या कठिनाई नहीं उठानी पड़ी || २६ || तब वह बहुत ही डर गया, उस दुर्बुद्धिको बहुत देरतक नींद न आयी । उसे जाग्रत्- अवस्थामें तथा स्वप्नमें भी बहुत - से ऐसे अपशकुन हुए जो उसकी मृत्युके सूचक थे || २७ ॥ जाग्रत्- अवस्थामें उसने देखा कि जल या दर्पणमें शरीरकी परछाईं तो पड़ती है, परन्तु सिर नहीं दिखायी देता; अँगुली आदिकी आड़ न होनेपर भी चन्द्रमा, तारे और दीपक आदिकी ज्योतियाँ उसे दो - दो दिखायी पड़ती हैं ॥२८ ॥ छायामें छेद दिखायी पड़ता है और कानोंमें अँगुली डालकर
सुननेपर भी प्राणोंका घूँ- घूँ शब्द नहीं सुनायी पड़ता । वृक्ष सुनहले प्रतीत होते हैं और बालू या कीचड़में अपने पैरोंके चिह्न नहीं दीख पड़ते || २ ९ || कंसने स्वप्नावस्थामें देखा कि वह प्रेतोंके गले लग रहा है, गधेपर चढ़कर चलता है और विष खा रहा है । उसका सारा शरीर तेलसे तर है, गलेमें जपाकुसुम ( अड़हुल) की माला है और नग्न होकर कहीं जा रहा है ॥ ३० ॥ स्वप्न
और जाग्रत्- अवस्थामें उसने इसी प्रकारके और भी बहुत -से अपशकुन देखे । उनके कारण उसे बड़ी चिन्ता हो गयी, वह मृत्युसे डर गया और उसे नींद न आयी ॥३१ ॥
दीर्घप्रजागरो भीतो दुर्निमित्तानि दुर्मतिः ।
बहून्यचष्टोभयथा मृत्योर्दीत्यकराणि च ॥२७
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अदर्शनं स्वशिरसः प्रतिरूपे च सत्यपि ।
असत्यपि द्वितीये च द्वैरूप्यं ज्योतिषां तथा ॥२८
छिद्रप्रतीतिश्छायायां प्राणघोषानुपश्रुतिः ।
स्वर्णप्रतीतिर्वृक्षेषु स्वपदानामदर्शनम् ॥२९
स्वप्ने प्रेतपरिष्वंगः खरयानं विषादनम् ।
यायान्नलदमाल्येकस्तैलाभ्यक्तो दिगम्बरः ॥३०
अन्यानि चेत्थंभूतानि स्वप्नजागरितानि च ।
पश्यन् मरणसन्त्रस्तो निद्रां लेभे न चिन्तया ॥ ३१
व्युष्टायां निशि कौरव्य सूर्ये चाद्भयः समुत्थिते ।
कारयामास वै कंसो मल्लक्रीडामहोत्सवम् ॥३२
आनचुः पुरुषा रंगं तूर्यभेर्यश्च जघ्निरे ।
मंचाश्चालंकृताः स्रग्भिः पताकाचैलतोरणैः ॥ ३३
तेषु पौरा जानपदा ब्रह्मक्षत्रपुरोगमाः ।
यथोपजोषं विविशू राजानश्च कृतासनाः ॥३४
कंसः परिवृतोऽमात्यै राजमंच उपाविशत् ।
मण्डलेश्वरमध्यस्थो हृदयेन विदूयता ॥३५
वाद्यमानेषु तूर्येषु मल्लतालोत्तरेषु च ।
मल्लाः स्वलंकृता दृप्ताः सोपाध्यायाः समाविशन् ॥३६
परीक्षित्! जब रात बीत गयी और सूर्यनारायण पूर्व समुद्रसे ऊपर उठे, तब राजा कंसने मल्ल-क्रीड़ा ( दंगल) -का महोत्सव प्रारम्भ कराया ॥३२ ॥ राजकर्मचारियोंने रंगभूमिको
भलीभाँति सजाया । तुरही, भेरी आदि बाजे बजने लगे । लोगोंके बैठनेके मंच फूलोंके गजरों, झंडियों, वस्त्र और बंदनवारोंसे सजा दिये गये ॥ ३३ ॥ उनपर ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि नागरिक
तथा ग्रामवासी— सब यथास्थान बैठ गये । राजालोग भी अपने - अपने निश्चित स्थानपर जा डटे ॥३४ ॥ राजा कंस अपने मन्त्रियोंके साथ मण्डलेश्वरों (छोटे- छोटे राजाओं) के बीचमें
सबसे श्रेष्ठ राजसिंहासनपर जा बैठा । इस समय भी अपशकुनोंके कारण उसका चित्त घबड़ाया हुआ था ॥३५ ॥ तब पहलवानोंके ताल ठोंकनेके साथ ही बाजे बजने लगे और
गरबीले पहलवान खूब सज- धजकर अपने- अपने उस्तादोंके साथ अखाड़ेमें आ उतरे ॥३६ ॥
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चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल और तोशल आदि प्रधान- प्रधान पहलवान बाजोंकी सुमधुर ध्वनिसे उत्साहित होकर अखाड़ेमें आ- आकर बैठ गये ॥ ३७ ॥ इसी समय भोजराज कंसने नन्द
आदि गोपोंको बुलवाया । उन लोगोंने आकर उसे तरह- तरहकी भेंटें दीं और फिर जाकर वे एक मंचपर बैठ गये ॥ ३८ ॥
चाणूरो मुष्टिकः कूटः शलस्तोशल एव च ।
त आसेदुरुपस्थानं वल्गुवाद्यप्रहर्षिताः ॥ ३७
नन्दगोपादयो गोपा भोजराजसमाहुताः ।
निवेदितोपायनास्ते एकस्मिन् मंच आविशन् ॥३८
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे मल्लरंगोपवर्णनं नाम द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४२ ॥
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अथ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः कुवलयापीडका उद्धार और अखाड़ेमें प्रवेश श्रीशुक उवाच
अथ कृष्णश्च रामश्च कृतशौचौ परन्तप ।
मल्लदुन्दुभिनिर्घोषं श्रुत्वा द्रष्टुमुपेयतुः ॥ १
रंगद्वारं समासाद्य तस्मिन् नागमवस्थितम् ।
अपश्यत् कुवलयापीडं कृष्णोऽम्बष्ठप्रचोदितम् ॥२
बद्ध्वा परिकरं शौरिः समुह्य कुटिलालकान् ।
उवाच हस्तिपं वाचा मेघनादगभीरया ॥ ३
अम्बष्ठाम्बष्ठ मार्गं नौ देह्यपक्रम मा चिरम् ।
नो चेत् सकुंजरं त्वाद्य नयामि यमसादनम् ॥४
एवं निर्भर्त्सितोऽम्बष्ठः कुपितः कोपितं गजम् ।
चोदयामास कृष्णाय कालान्तकयमोपमम् ॥५
करीन्द्रस्तमभिद्रुत्य करेण तरसाग्रहीत् ।
कराद् विगलितः सोऽमुं निहत्याङ्घ्रिष्वलीयत ॥ ६
संक्रुद्धस्तमचक्षाणो घ्राणदृष्टिः स केशवम् ।
परामृशत् पुष्करेण स प्रसह्य विनिर्गतः ॥७
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - काम-क्रोधादि शत्रुओंको पराजित करनेवाले परीक्षित्! अब श्रीकृष्ण और बलराम भी स्नानादि नित्यकर्मसे निवृत्त हो दंगलके अनुरूप नगाड़ेकी ध्वनि सुनकर रंगभूमि देखनेके लिये चल पड़े || १ || भगवान् श्रीकृष्णने रंग- भूमिके दरवाजेपर पहुँचकर देखा कि वहाँ महावतकी प्रेरणासे कुवलयापीड नामका हाथी खड़ा है || २ || तब भगवान् श्रीकृष्णने अपनी कमर कस ली और घुँघराली अलकें समेट लीं तथा मेघके समान गम्भीर वाणीसे महावतको ललकारकर कहा || ३ || ' महावत, ओ महावत! हम दोनोंको रास्ता दे दे । हमारे मार्गसे हट जा । अरे, सुनता नहीं? देर मत कर । नहीं तो मैं हाथीके साथ अभी तुझे यमराजके घर पहुँचाता हूँ' || ४ || भगवान् श्रीकृष्णने महावतको जब इस प्रकार धमकाया, तब वह क्रोधसे तिलमिला उठा और उसने काल, मृत्यु तथा यमराजके समान अत्यन्त भयंकर कुवलयापीडको अंकुशकी मारसे क्रुद्ध करके श्रीकृष्णकी ओर बढ़ाया ॥५ ॥
कुवलयापीडने भगवान्की ओर झपटकर उन्हें बड़ी तेजीसे सूँड़में लपेट लिया; परन्तु भगवान् सूँड़से बाहर सरक आये और उसे एक घूँसा जमाकर उसके पैरोंके बीचमें जा छिपे ॥६ ॥ उन्हें अपने सामने न देखकर कुवलयापीडको बड़ा क्रोध हुआ । उसने सूँघकर
भगवान्को अपनी सूँड़से टटोल लिया और पकड़ा भी; परन्तु उन्होंने बलपूर्वक अपनेको ******ebook converter DEMO Watermarks *******
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उससेछुड़ालिया ॥७ ॥ इसके बाद भगवान् उस बलवान् हाथीकी पूँछ पकड़कर खेल- खेलमें
ही उसे सौ हाथतक पीछे घसीट लाये; जैसे गरुड़ साँपको घसीट लाते हैं ॥८ ॥ जिस प्रकार
घूमते हुए बछडे़के साथ बालक घूमता है अथवा स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण जिस प्रकार बछड़ोंसे खेलते थे, वैसे ही वे उसकी पूँछ पकड़कर उसे घुमाने और खेलने लगे । जब वह दायेंसे घूमकर उनको पकड़ना चाहता, तब वे बायें आ जाते और जब वह बायेंकी ओर घूमता, तब वे दायें घूम जाते ॥९ ॥ इसके बाद हाथीके सामने आकर उन्होंने उसे एक घूँसा जमाया और
वे उसे गिरानेके लिये इस प्रकार उसके सामनेसे भागने लगे, मानो वह अब छू लेता है, तब छू लेता है ॥१० ॥ भगवान् श्रीकृष्णने दौड़ते -दौड़ते एक बार खेल- खेल में ही पृथ्वीपर गिरनेका
अभिनय किया और झट वहाँसे उठकर भाग खड़े हुए। उस समय वह हाथी क्रोधसे जल- भुन रहा था । उसने समझा कि वे गिर पड़े और बड़े जोरसे अपने दोनों दाँत धरतीपर मारे ॥११ ॥
जब कुवलयापीडका यह आक्रमण व्यर्थ हो गया, तब वह और भी चिढ़ गया । महावतोंकी प्रेरणासे वह क्रुद्ध होकर भगवान् श्रीकृष्णपर टूट पड़ा ॥१२ ॥ भगवान् मधुसूदनने जब उसे
अपनी ओर झपटते देखा, तब उसके पास चले गये और अपने एक ही हाथसे उसकी सूँड़ पकड़कर उसे धरतीपर पटक दिया ॥१३ ॥ उसके गिर जानेपर भगवान्ने सिंहके समान
खेल- ही- खेलमें उसे पैरोंसे दबाकर उसके दाँत उखाड़ लिये और उन्हींसे हाथी और महावतोंका काम तमाम कर दिया ॥१४ ॥
पुच्छे प्रगृह्यातिबलं धनुषः पंचविंशतिम् ।
विचकर्ष यथा नागं सुपर्ण इव लीलया ॥८
स पर्यावर्तमानेन सव्यदक्षिणतोऽच्युतः ।
बभ्राम भ्राम्यमाणेन गोवत्सेनेव बालकः ॥ ९
ततोऽभिमुखमभ्येत्य पाणिनाऽऽहत्य वारणम् ।
प्राद्रवन् पातयामास स्पृश्यमानः पदे पदे ॥ १०
स धावन् क्रीडया भूमौ पतित्वा सहसोत्थितः ।
तं मत्वा पतितं क्रुद्धो दन्ताभ्यां सोऽहनत्क्षितिम् ॥११
स्वविक्रमे प्रतिहते कुंजरेन्द्रोऽत्यमर्षितः ।
चोद्यमनो महामात्रैः कृष्णमभ्यद्रवद् रुषा ॥१२
तमापतन्तमासाद्य भगवान् मधुसूदनः ।
निगृह्य पाणिना हस्तं पातयामास भूतले ॥१३
पतितस्य पदाऽऽक्रम्य मृगेन्द्र इव लीलया । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******