श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 601–610
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 601–610
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दन्तमुत्याट्य तेनेभं हस्तिपांश्चाहनद्धरिः ॥ १४ मृतकं द्विपमुत्सृज्य दन्तपाणिः समाविशत् ।
अंसन्यस्तविषाणोऽसृङ्मदबिन्दुभिरंकितः ।
विरूढस्वेदकणिकावदनाम्बुरुहो बभौ ॥ १५
परीक्षित्! मरे हुए हाथीको छोड़कर भगवान् श्रीकृष्णने हाथमें उसके दाँत लिये - लिये ही रंगभूमिमें प्रवेश किया । उस समय उनकी शोभा देखने ही योग्य थी । उनके कंधेपर हाथीका दाँत रखा हुआ था, शरीर रक्त और मदकी बूँदोंसे सुशोभित था और मुखकमलपर पसीनेकी बूँदें झलक रही थीं ॥१५ ॥
वृतौ गोपैः कतिपयैर्बलदेवजनार्दनौ ।
रंगं विविशतु राजन् गजदन्तवरायुधौ ॥१६
मल्लानामशनिर्नृणां नरवरः स्त्रीणां स्मरो मूर्तिमान् गोपानां स्वजनोऽसतां क्षितिभुजां शास्ता स्वपित्रोः शिशुः । मृत्युर्भोजपतेर्विराडविदुषां तत्त्वं परं योगिनां वृष्णीनां परदेवतेति विदितो रंगं गतः साग्रजः ॥१७
हतं कुवलयापीडं दृष्ट्वा तावपि दुर्जयौ ।
कंसो मनस्व्यपि तदा भृशमुद्विविजे नृप ॥१८
तौ रेजतू रंगगती महाभुजौ विचित्रवेषाभरणस्रगम्बरौ । यथा नटावुत्तमवेषधारिणी मनः क्षिपन्तौ प्रभया निरीक्षताम् ॥१९ निरीक्ष्य तावुत्तमपूरुषौ जना मंचस्थिता नागरराष्ट्रका नृप । प्रहर्षवेगोत्कलितेक्षणाननाः पपुर्न तृप्ता नयनैस्तदाननम् ॥२० पिबन्त इव चक्षुर्भ्यां लिहन्त इव जिह्वया ।
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जिघ्रन्त इव नासाभ्यां श्लिष्यन्त इव बाहुभिः ॥२१
ऊचुः परस्परं ते वै यथादृष्टं यथाक्षुतम् ।
तद्रूपगुणमाधुर्यप्रागल्भ्यस्मारिता इव ॥ २२
परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम दोनोंके ही हाथोंमें कुवलयापीडके बड़े - बड़े दाँत शस्त्रके रूपमें सुशोभित हो रहे थे और कुछ ग्वालबाल उनके साथ-साथ चल रहे थे । इस प्रकार उन्होंने रंगभूमिमें प्रवेश किया || १६|| जिस समय भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजीके साथ रंगभूमिमें पधारे, उस समय वे पहलवानोंको वज्रकठोर शरीर, साधारण मनुष्योंको नर-रत्न, स्त्रियोंको मूर्तिमान् कामदेव, गोपोंको स्वजन, दुष्ट राजाओंको दण्ड देनेवाले शासक, माता-- पिता समान बड़े - बूढ़ोंको शिशु, कंसको मृत्यु, अज्ञानियोंको विराट्, योगियोंको परम तत्त्व और भक्तशिरोमणि वृष्णिवंशियोंको अपने इष्टदेव जान पड़े ( सबने अपने - अपने भावानुरूप क्रमशः रौद्र, अद्भुत, शृंगार, हास्य, वीर, वात्सल्य, भयानक, बीभत्स, शान्त और प्रेमभक्तिरसका अनुभव किया) ॥ १७ ॥ राजन्! वैसे तो कंस बड़ा धीर- वीर था; फिर भी जब
उसने देखा कि इन दोनोंने कुवलयापीडको मार डाला, तब उसकी समझमें यह बात आयी कि इनको जीतना तो बहुत कठिन है । उस समय वह बहुत घबड़ा गया ॥ १८ ॥ श्रीकृष्ण और
बलरामकी बाँहें बड़ी लम्बी- लम्बी थीं । पुष्पोंके हार, वस्त्र और आभूषण आदिसे उनका वेष विचित्र हो रहा था; ऐसा जान पड़ता था, मानो उत्तम वेष धारण करके दो नट अभिनय करनेके लिये आये हों । जिनके नेत्र एक बार उनपर पड़ जाते, बस, लग ही जाते । यही नहीं, वे अपनी कान्तिसे उसका मन भी चुरा लेते । इस प्रकार दोनों रंगभूमिमें शोभायमान हुए ॥१९ ॥ परीक्षित्! मंचोंपर जितने लोग बैठे थे - वे मथुराके नागरिक और राष्ट्रके जन-समुदाय पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीको देखकर इतने प्रसन्न हुए कि उनके
नेत्र और मुखकमल खिल उठे । उत्कण्ठासे भर गये । वे नेत्रोंके द्वारा उनकी मुखमाधुरीका पान करते - करते तृप्त ही नहीं होते थे ॥२० ॥ मानो वे उन्हें नेत्रोंसे पी रहे हों, जिह्वासे चाट रहे हों,
नासिकासे सूँघ रहे हों और भुजाओंसे पकड़कर हृदयसे सटा रहे हों ॥२१ ॥ उनके सौन्दर्य,
गुण, माधुर्य और निर्भयताने मानो दर्शकोंको उनकी लीलाओंका स्मरण करा दिया और वे लोग आपसमें उनके सम्बन्धकी देखी- सुनी बातें कहने - सुनने लगे ॥२२ ॥ ‘ ये दोनों साक्षात्
भगवान् नारायणके अंश हैं । इस पृथ्वीपर वसुदेवजीके घरमें अवतीर्ण हुए हैं ॥२३ ॥
एतौ भगवतः साक्षाद्धरेर्नारायणस्य हि ।
अवतीर्णाविहांशेन वसुदेवस्य वेश्मनि ॥ २३
एष वै किल देवक्यां जातो नीतश्च गोकुलम् ।
कालमेतं वसन् गूढो ववृधे नन्दवेश्मनि ॥२४
पूतनानेन नीतान्तं चक्रवातश्च दानवः ।
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अर्जुनौ गुह्यकः केशी धेनुकोऽन्ये च तद्विधाः ॥ २५
गावः सपाला एतेन दावाग्नेः परिमोचिताः ।
कालियो दमितः सर्प इन्द्रश्च विमदः कृतः ॥ २६
सप्ताहमेकहस्तेन धृतोऽद्रिप्रवरोऽमुना ।
वर्षवाताशनिभ्यश्च परित्रातं च गोकुलम् ॥२७
गोप्योऽस्य नित्यमुदितहसितप्रेक्षणं मुखम् ।
पश्यन्त्यो विविधांस्तापांस्तरन्ति स्माश्रमं मुदा ॥२८
वदन्त्यनेन वंशोऽयं यदोः सुबहुविश्रुतः ।
श्रियं यशो महत्त्वं च लप्स्यते परिरक्षितः ॥२९
अयं चास्याग्रजः श्रीमान् रामः कमललोचनः ।
प्रलम्बो निहतो येन वत्सको ये बकादयः ॥३०
जनेष्वेवं ब्रुवाणेषु तूर्येषु निनदत्सु च ।
कृष्णरामौ समाभाष्य चाणूरो वाक्यमब्रवीत् ॥ ३१
हे नन्दसूनो हे राम भवन्तौ वीरसंमतौ ।
नियुद्धकुशलौ श्रुत्वा राज्ञाऽऽहूतौ दिदृक्षुणा ॥३२
प्रियं राज्ञः प्रकुर्वन्त्यः श्रेयो विन्दन्ति वै प्रजाः ।
मनसा कर्मणा वाचा विपरीतमतोऽन्यथा ॥३३
[ अँगुलीसे दिखलाकर ] ये साँवले - सलोने कुमार देवकीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे । जन्मते ही वसुदेवजीने इन्हें गोकुल पहुँचा दिया था । इतने दिनोंतक ये वहाँ छिपकर रहे और नन्दजीके घरमें ही पलकर इतने बड़े हुए || २४ || इन्होंने ही पूतना, तृणावर्त, शंखचूड़, केशी और धेनुक आदिका तथा और भी दुष्ट दैत्योंका वध तथा यमलार्जुनका उद्धार किया है ॥२५ ॥ इन्होंने ही
गौ और ग्वालोंको दावानलकी ज्वालासे बचाया था । कालियनागका दमन और इन्द्रका मान-मर्दन भी इन्होंने ही किया था || २६ || इन्होंने सात दिनोंतक एक ही हाथपर गिरिराज गोवर्धनको उठाये रखा और उसके द्वारा आँधी-पानी तथा वज्रपातसे गोकुलको बचा लिया ॥२७ ॥ गोपियाँ इनकी मन्द मन्द मुसकान, मधुर चितवन और सर्वदा एकरस प्रसन्न
रहनेवाले मुखारविन्दके दर्शनसे आनन्दित रहती थीं और अनायास ही सब प्रकारके तापोंसे मुक्त हो जाती थीं ॥२८ ॥ कहते हैं कि ये यदुवंशकी रक्षा करेंगे । यह विख्यात वंश इनके द्वारा
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महान् समृद्धि, यश और गौरव प्राप्त करेगा ॥ २ ९ ॥ ये दूसरे इन्हीं श्यामसुन्दरके बड़े भाई कमलनयन श्रीबलरामजी हैं। हमने किसी -किसीके मुँहसे ऐसा सुना है कि इन्होंने ही प्रलम्बासुर, वत्सासुर और बकासुर आदिको मारा है ' ॥३० ॥
जिस समय दर्शकोंमें यह चर्चा हो रही थी और अखाड़ेमें तुरही आदि बाजे बज रहे थे, उस समय चाणूरने भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामको सम्बोधन करके यह बात कही ॥३१ ॥ ‘ नन्दनन्दन श्रीकृष्ण और बलरामजी! तुम दोनों वीरोंके आदरणीय हो । हमारे
महाराजने यह सुनकर कि तुमलोग कुश्ती लड़ने में बड़े निपुण हो, तुम्हारा कौशल देखनेके लिये तुम्हें यहाँ बुलवाया है ॥ ३२ ॥ देखो भाई! जो प्रजा मन, वचन और कर्मसे राजाका प्रिय
कार्य करती है, उसका भला होता है और जो राजाकी इच्छाके विपरीत काम करती है, उसे हानि उठानी पड़ती है || ३३ || यह सभी जानते हैं कि गाय और बछड़े चरानेवाले ग्वालिये प्रतिदिन आनन्दसे जंगलोंमें कुश्ती लड़- लड़कर खेलते रहते हैं और गायें चराते रहते हैं ॥३४ ॥
नित्यं प्रमुदिता गोपा वत्सपाला यथा स्फुटम् ।
वनेषु मल्लयुद्धेन क्रीडन्तश्चारयन्ति गाः ॥ ३४
तस्माद् राज्ञः प्रियं यूयं वयं च करवाम हे ।
भूतानि नः प्रसीदन्ति सर्वभूतमयो नृपः ॥३५
तन्निशम्याब्रवीत् कृष्णो देशकालोचितं वचः ।
नियुद्धमात्मनोऽभीष्टं मन्यमानोऽभिनन्द्य च ॥३६
प्रजा भोजपतेरस्य वयं चापि वनेचराः ।
करवाम प्रियं नित्यं तन्नः परमनुग्रहः ॥३७
बाला वयं तुल्यबलैः क्रीडिष्यामो यथोचितम् ।
भवेन्नियुद्धं माधर्मः स्पृशेन्मल्ल सभासदः ॥३८
चाणूर उवाच
न बालो न किशोरस्त्वं बलश्च बलिनां वरः ।
लीलयेभो हतो येन सहस्रद्विपसत्त्वभृत् ॥३९
तस्माद् भवद्भ्यां बलिभिर्योद्धव्यं नानयोऽत्र वै ।
मयि विक्रम वार्ष्णेय बलेन सह मुष्टिकः ॥४०
इसलिये आओ, हम और तुम मिलकर महाराजको प्रसन्न करनेके लिये कुश्ती लड़ें । ऐसा
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करनेसे हमपर सभी प्राणी प्रसन्न होंगे, क्योंकि राजा सारी प्रजाका प्रतीक है ' ॥३५ ॥
परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण तो चाहते ही थे कि इनसे दो - दो हाथ करें । इसलिये उन्होंने चाणूरकी बात सुनकर उसका अनुमोदन किया और देश- कालके अनुसार यह बात कही ॥३६ ॥ 'चाणूर! हम भी इन भोजराज कंसकी वनवासी प्रजा हैं । हमें इनको प्रसन्न
करनेका प्रयत्न अवश्य करना चाहिये । इसीमें हमारा कल्याण है ॥ ३७ ॥ किन्तु चाणूर!
हमलोग अभी बालक हैं । इसलिये हम अपने समान बलवाले बालकोंके साथ ही कुश्ती लड़नेका खेल करेंगे । कुश्ती समान बलवालोंके साथ ही होनी चाहिये, जिससे देखनेवाले सभासदोंको अन्यायके समर्थक होनेका पाप न लगे ' ॥ ३८ ॥
चाणूरने कहा - अजी! तुम और बलराम न बालक हो और न तो किशोर । तुम दोनों बलवानोंमें श्रेष्ठ हो, तुमने अभी- अभी हजार हाथियोंका बल रखनेवाले कुवलयापीडको खेल-ही- खेलमें मार डाला || ३ ९ || इसलिये तुम दोनोंको हम जैसे बलवानोंके साथ ही लड़ना चाहिये । इसमें अन्यायकी कोई बात नहीं है । इसलिये श्रीकृष्ण! तुम मुझपर अपना जोर आजमाओ और बलरामके साथ मुष्टिक लड़ेगा ॥४० ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे कुवलयापीडवधो नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४३ ॥
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अथ चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः चाणूर, मुष्टिक आदि पहलवानोंका तथा कंसका उद्धार श्रीशुक उवाच
एवं चर्चितसंकल्पो भगवान् मधुसूदनः ।
आससादाथ चाणूरं मुष्टिकं रोहिणीसुतः ॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने चाणूर आदिके वधका निश्चित संकल्प कर लिया । जोड़ बद दिये जानेपर श्रीकृष्ण चाणूरसे और बलरामजी मुष्टिकसे जा भिड़े ॥१ ॥
हस्ताभ्यां हस्तयोर्बद्ध्वा पद्भ्यामेव च पादयोः ।
विचकर्षतुरन्योन्यं प्रसह्य विजिगीषया ॥ २
अरत्नी द्वे अरत्निभ्यां जानुभ्यां चैव जानुनी ।
शिरः शीर्णोरसोरस्तावन्योन्यमभिजघ्नतुः ॥३
परिभ्रामणविक्षेपपरिरम्भावपातनैः ।
उत्सर्पणापसर्पणैश्चान्योन्यं प्रत्यरुन्धताम् ॥४
उत्थापनैरुन्नयनैश्चालनैः स्थापनैरपि ।
परस्परं जिगीषन्तावपचक्रतुरात्मनः ॥ ५
तद् बलाबलवद्युद्धं समेताः सर्वयोषितः ।
ऊचुः परस्परं राजन् सानुकम्पा वरूथशः ॥६
महानयं बताधर्म एषां राजसभासदाम् ।
ये बलाबलवद्युद्धं राज्ञोऽन्विच्छन्ति पश्यतः ॥७
क्व वज्रसारसर्वांगौ मल्लौ शैलेन्द्रसन्निभौ ।
क्व चातिसुकुमारांगौ किशोरौ नाप्तयौवनौ ॥८
धर्मव्यतिक्रमो ह्यस्य समाजस्य ध्रुवं भवेत् ।
यत्राधर्मः समुत्तिष्ठेन्न स्थेयं तत्र कर्हिचित् ॥९
न सभां प्रविशेत् प्राज्ञः सभ्यदोषाननुस्मरन् ।
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अब्रुवन् विब्रुवन्नज्ञो नरः किल्बिषमश्नुते ॥ १० वे लोग एक- दूसरेको जीत लेनेकी इच्छासे हाथसे हाथ बाँधकर और पैरोंमें पैर अड़ाकर बलपूर्वक अपनी - अपनी ओर खींचने लगे || २ || वे पंजोंसे पंजे, घुटनोंसे घुटने, माथेसे माथा और छातीसे छाती भिड़ाकर एक-दूसरेपर चोट करने लगे || ३ || इस प्रकार दाँव- पेंच करते-करते अपने - अपने जोड़ीदारको पकड़कर इधर- उधर घुमाते, दूर ढकेल देते, जोरसे जकड़ लेते, लिपट जाते, उठाकर पटक देते, छूटकर निकल भागते और कभी छोड़कर पीछे हट जाते थे । इस प्रकार एक- दूसरेको रोकते, प्रहार करते और अपने जोड़ीदारको पछाड़ देनेकी चेष्टा करते । कभी कोई नीचे गिर जाता, तो दूसरा उसे घुटनों और पैरोंमें दबाकर उठा लेता । हाथोंसे पकड़कर ऊपर ले जाता । गलेमें लिपट जानेपर ढकेल देता और आवश्यकता होनेपर हाथ - पाँव इकट्ठे करके गाँठ बाँध देता ॥४-५ ॥ परीक्षित्! इस दंगलको देखनेके लिये नगरकी बहुत- सी महिलाएँ भी आयी हुई थीं । उन्होंने जब देखा कि बड़े - बड़े पहलवानोंके साथ ये छोटे - छोटे बलहीन बालक लड़ाये जा रहे हैं, तब वे अलग- अलग टोलियाँ बनाकर करुणावश आपसमें बातचीत करने लगीं— ॥ ६॥
‘ यहाँ राजा कंसके सभासद् बड़ा अन्याय और अधर्म कर रहे हैं । कितने खेदकी बात है कि राजाके सामने ही ये बली पहलवानों और निर्बल बालकोंके युद्धका अनुमोदन करते हैं || ७ || बहिन! देखो, इन पहलवानोंका एक-एक अंग वज्रके समान कठोर है । ये देखनेमें बड़े भारी पर्वत- से मालूम होते हैं । परन्तु श्रीकृष्ण और बलराम अभी जवान भी नहीं हुए हैं । इनकी
किशोरावस्था है । इनका एक-एक अंग अत्यन्त सुकुमार है । कहाँ ये और कहाँ वे? ॥ ८ ॥
जितने लोग यहाँ इकट्ठे हुए हैं, देख रहे हैं, उन्हें अवश्य अवश्य धर्मोल्लंघनका पाप लगेगा । सखी! अब हमें भी यहाँसे चल देना चाहिये । जहाँ अधर्मकी प्रधानता हो, वहाँ कभी न रहे; यही शास्त्रका नियम है || ९ || देखो, शास्त्र कहता है कि बुद्धिमान् पुरुषको सभासदोंके दोषोंको जानते हुए सभामें जाना ठीक नहीं है। क्योंकि वहाँ जाकर उन अवगुणोंको कहना, चुप रह जाना अथवा मैं नहीं जानता ऐसा कह देना –ये तीनों ही बातें मनुष्यको दोषभागी बनाती हैं ॥१० ॥ देखो, देखो, श्रीकृष्ण शत्रुके चारों ओर पैंतरा बदल रहे हैं । उनके मुखपर
पसीनेकी बूँदें ठीक वैसे ही शोभा दे रही हैं, जैसे कमलकोशपर जलकी बूँदें ॥११ ॥ सखियो!
क्या तुम नहीं देख रही हो कि बलरामजीका मुख मुष्टिकके प्रति क्रोधके कारण कुछ- कुछ लाल लोचनोंसे युक्त हो रहा है! फिर भी हास्यका अनिरुद्ध आवेग कितना सुन्दर लग रहा है ॥१२ ॥
वल्गतः शत्रुमभितः कृष्णस्य वदनाम्बुजम् ।
वीक्ष्यतां श्रमवार्युप्तं पद्मकोशमिवाम्बुभिः ॥११
किं न पश्यत रामस्य मुखमाताम्रलोचनम् ।
मुष्टिकं प्रति सामर्षं हाससंरम्भशोभितम् ॥१२
पुण्या बत व्रजभुवो यदयं नृलिंग-
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गूढः पुराणपुरुषो वनचित्रमाल्यः । गाः पालयन् सहबलः क्यणयंश्च वेणुं विक्रीडयाञ्चति गिरित्ररमार्चिताङ्घ्रिः ॥ १३ गोप्यस्तपः किमचरन् यदमुष्य रूपं
लावण्यसारमसमोर्ध्वमनन्यसिद्धम् ।
दृग्भिः पिबन्त्यनुसवाभिनवं दुराप- मेकान्तधाम यशसः श्रिय ऐश्वरस्य ॥ १४
या दोहनेऽवहनने मथनोपलेप- प्रेङ्खङ्खनार्भरुदितोक्षणमार्जनादौ । गायन्ति चैनमनुरक्तधियोऽश्रुकण्ठ्यो धन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयानाः ॥ १५ सखी! सच पूछो तो व्रजभूमि ही परम पवित्र और धन्य है। क्योंकि वहाँ ये पुरुषोत्तम मनुष्यके वेषमें छिपकर रहते हैं । स्वयं भगवान् शंकर और लक्ष्मीजी जिनके चरणोंकी पूजा करती हैं, वे ही प्रभु वहाँ रंग -बिरंगे जंगली पुष्पोंकी माला धारण कर लेते हैं तथा बलरामजीके साथ बाँसुरी बजाते, गौएँ चराते और तरह- तरहके खेल खेलते हुए आनन्दसे विचरते हैं ॥१३ ॥
सखी! पता नहीं, गोपियोंने कौन - सी तपस्या की थी, जो नेत्रोंके दोनोंसे नित्य- निरन्तर इनकी रूप- माधुरीका पान करती रहती हैं । इनका रूप क्या है, लावण्यका सार! संसारमें या उससे परे किसीका भी रूप इनके रूपके समान नहीं है, फिर बढ़कर होनेकी तो बात ही क्या है! सो भी किसीके सँवारने सजानेसे नहीं, गहने - कपड़ेसे भी नहीं, बल्कि स्वयंसिद्ध है । इस रूपको देखते - देखते तृप्ति भी नहीं होती । क्योंकि यह प्रतिक्षण नया होता जाता है, नित्य नूतन है । समग्र यश, सौन्दर्य और ऐश्वर्य इसीके आश्रित हैं । सखियो! परन्तु इसका दर्शन तो
औरोंके लिये बड़ा ही दुर्लभ है । वह तो गोपियोंके ही भाग्यमें बदा है ॥ १४ ॥
सखी! व्रजकी गोपियाँ धन्य हैं । निरन्तर श्रीकृष्णमें ही चित्त लगा रहनेके कारण प्रेमभरे हृदयसे, आँसुओंके कारण गद्गद कण्ठसे वे इन्हींकी लीलाओंका गान करती रहती हैं । वे दूध दुहते, दही मथते, धान कूटते, घर लीपते, बालकोंको झूला झुलाते, रोते हुए बालकोंको चुप कराते, उन्हें नहलाते- धुलाते, घरोंको झाड़ते- बुहारते - कहाँतक कहें, सारे काम-काज करते समय श्रीकृष्णके गुणोंके गानमें ही मस्त रहती हैं ॥१५ ॥
प्रातर्व्रजाद् व्रजत आविशतश्च सायं गोभिः समं क्वणयतोऽस्य निशम्य वेणुम् । निर्गम्य तूर्णमबलाः पथि भूरिपुण्याः पश्यन्ति सस्मितमुखं सदयावलोकम् ॥१६
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एवं प्रभाषमाणासु स्त्रिषु योगेश्वरो हरिः ।
शत्रुं हन्तुं मनश्चक्रे भगवान् भरतर्षभ ॥१७
सभयाः स्त्रीगिरः श्रुत्वा पुत्रस्नेहशुचाऽऽतुरौ ।
पितरावन्वतप्येतां पुत्रयोरबुधौ बलम् ॥१८
तैस्तैर्नियुद्धविधिभिर्विविधैरच्युतेतरौ ।
युयुधाते यथान्योन्यं तथैव बलमुष्टिकौ ॥१९
भगवद्गात्रनिष्पातैर्वज्रनिष्पेषनिष्ठुरैः ।
चाणूरो भज्यमानांगो मुहुर्लानिमवाप ह ॥२०
स श्येनवेग उत्पत्य मुष्टीकृत्य करावुभौ ।
भगवन्तं वासुदेवं क्रुद्धो वक्षस्यबाधत ॥२१
नाचलत्तत्प्रहारेण मालाहत इव द्विपः ।
बाह्वोर्निगृह्य चाणूरं बहुशो भ्रामयन् हरिः ॥ २२
भूपृष्ठे पोथयामास तरसा क्षीणजीवितम् ।
विस्रस्ताकल्पकेशस्रगिन्द्रध्वज इवापतत् ॥२३
ये श्रीकृष्ण जब प्रातःकाल गौओंको चरानेके लिये व्रजसे वनमें जाते हैं और सायंकाल उन्हें लेकर व्रजमें लौटते हैं, तब बड़े मधुर स्वरसे बाँसुरी बजाते हैं । उसकी टेर सुनकर गोपियाँ घरका सारा कामकाज छोड़कर झटपट रास्तेमें दौड़ आती हैं और श्रीकृष्णका मन्द मन्द मुसकान एवं दयाभरी चितवनसे युक्त मुखकमल निहार- निहारकर निहाल होती हैं । सचमुच गोपियाँ ही परम पुण्यवती हैं' ॥१६ ॥
भरतवंशशिरोमणे! जिस समय पुरवासिनी स्त्रियाँ इस प्रकार बातें कर रही थीं, उसी समय योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णने मन- ही- मन शत्रुको मार डालनेका निश्चय किया ॥१७ ॥
स्त्रियोंकी ये भयपूर्ण बातें माता - पिता देवकी- वसुदेव भी सुन रहे थे । वे पुत्रस्नेहवश शोकसे विह्वल हो गये । उनके हृदयमें बड़ी जलन, बड़ी पीड़ा होने लगी । क्योंकि वे अपने पुत्रोंके बल-वीर्यको नहीं जानते थे ॥१८ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण और उनसे भिड़नेवाला चाणूर दोनों ही
भिन्न-भिन्न प्रकारके दाँव-पेंचका प्रयोग करते हुए परस्पर जिस प्रकार लड़ रहे थे, वैसे ही बलरामजी और मुष्टिक भी भिड़े हुए थे || १ ९ || भगवान् के अंग- प्रत्यंग वज्रसे भी कठोर हो रहे थे । उनकी रगड़से चाणूरकी रग - रग ढीली पड़ गयी । बार- बार उसे ऐसा मालूम हो रहा था मानो उसके शरीरके सारे बन्धन टूट रहे हैं । उसे बड़ी ग्लानि, बड़ी व्यथा हुई || २० || अब वह अत्यन्त क्रोधित होकर बाजकी तरह झपटा और दोनों हाथोंके घूँसे बाँधकर उसने भगवान्
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श्रीकृष्णकी छातीपर प्रहार किया ॥ २१ ॥ परन्तु उसके प्रहारसे भगवान् तनिक भी विचलित
न हुए, जैसे फूलोंके गजरेकी मारसे गजराज । उन्होंने चाणूरकी दोनों भुजाएँ पकड़ लीं और उसे अन्तरिक्षमें बड़े वेगसे कई बार घुमाकर धरतीपर दे मारा । परीक्षित्! चाणूरके प्राण तो घुमानेके समय ही निकल गये थे । उसकी वेष--भूषा अस्त- व्यस्त हो गयी, केश और मालाएँ बिखर गयीं, वह इन्द्रध्वज ( इन्द्रकी पूजाके लिये खड़े किये गये बड़े झंडे ) के समान गिर पड़ा ॥२२-२३ ॥
तथैव मुष्टिकः पूर्वं स्वमुष्टयाभिहतेन वै ।
बलभद्रेण बलिना तलेनाभिहतो भृशम् ॥२४
प्रवेपितः स रुधिरमुद्वमन् मुखतोऽर्दितः ।
व्यसुः पपातोर्व्युपस्थे वाताहत इवाङ्घ्रिपः ॥ २५
ततः कूटमनुप्राप्तं रामः प्रहरतां वरः ।
अवधील्लीलया राजन् सावज्ञं वाममुष्टिना ॥२६
तर्ह्येव हि शलः कृष्णपदापहतशीर्षकः ।
द्विधा विदीर्णस्तोशलक उभावपि निपेततुः ॥ २७
चाणूरे मुष्टिके कूटे शले तोशलके हते ।
शेषाः प्रदुद्रुवुर्मल्लाः सर्वे प्राणपरीप्सवः ॥२८
गोपान् वयस्यानाकृष्य तैः संसृज्य विजह्रतुः ।
वाद्यमानेषु तूर्येषु वल्गन्तौ रुतनूपुरौ ॥२९
जनाः प्रजहृषुः सर्वे कर्मणा रामकृष्णयोः ।
ऋते कंसं विप्रमुख्याः साधवः साधु साध्विति ॥३०
हतेषु मल्लवर्येषु विद्रुतेषु च भोजराट् ।
न्यवारयत् स्वतूर्याणि वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ ३१
निःसारयत दुर्वृत्तौ वसुदेवात्मजौ पुरात् ।
धनं हरत गोपानां नन्दं बध्नीत दुर्मतिम् ॥३२
वसुदेवस्तु दुर्मेधा हन्यतामाश्वसत्तमः ।
उग्रसेनः पिता चापि सानुगः परपक्षगः ॥३३