श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 71–80
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 71–80
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तत्र तप्त्वा तपस्तीक्ष्णमात्मकर्शनमात्मवान् ।
सहैवाग्निभिरात्मानं युयोज परमात्मनि ॥५४
ऋग्वेदाचार्य सौभरिजी एक दिन स्वस्थ चित्तसे बैठे हुए थे । उस समय उन्होंने देखा कि मत्स्यराजके क्षणभरके संगसे मैं किस प्रकार अपनी तपस्या तथा अपना आपातक खो बैठा ॥४९ ॥ वे सोचने लगे – ' अरे, मैं तो बड़ा तपस्वी था । मैंने भलीभाँति अपने व्रतोंका
अनुष्ठान भी किया था । मेरा यह अधःपतन तो देखो! मैंने दीर्घकालसे अपने ब्रह्मतेजको अक्षुण्ण रखा था, परन्तु जलके भीतर विहार करती हुई एक मछलीके संसर्गसे मेरा वह ब्रह्मतेज नष्ट हो गया ॥ ५० ॥ अतः जिसे मोक्षकी इच्छा है, उस पुरुषको चाहिये कि वह भोगी
प्राणियोंका संग सर्वथा छोड़ दे और एक क्षणके लिये भी अपनी इन्द्रियोंको बहिर्मुख न होने दे । अकेला ही रहे और एकान्तमें अपने चित्तको सर्वशक्तिमान् भगवान्में ही लगा दे । यदि संग करनेकी आवश्यकता ही हो तो भगवान्के अनन्यप्रेमी निष्ठावान् महात्माओंका ही संग करे ॥५१ ॥ मैं पहले एकान्तमें अकेला ही तपस्यामें संलग्न था । फिर जलमें मछलीका संग
होनेसे विवाह करके पचास हो गया और फिर सन्तानोंके रूपमें पाँच हजार । विषयोंमें सत्यबुद्धि होनेसे मायाके गुणोंने मेरी बुद्धि हर ली । अब तो लोक और परलोकके सम्बन्धमें मेरा मन इतनी लालसाओंसे भर गया है कि मैं किसी तरह उनका पार ही नहीं पाता ॥ ५२ ॥
इस प्रकार विचार करते हुए वे कुछ दिनोंतक तो घरमें ही रहे । फिर विरक्त होकर उन्होंने संन्यास ले लिया और वे वनमें चले गये । अपने पतिको ही सर्वस्व माननेवाली उनकी पत्नियोंने भी उनके साथ ही वनकी यात्रा की ॥ ५३ ॥ वहाँ जाकर परम संयमी सौभरिजीने
बड़ी घोर तपस्या की, शरीरको सुखा दिया तथा आहवनीय आदि अग्नियोंके साथ ही अपने-आपको परमात्मामें लीन कर दिया || ५४ || परीक्षित्! उनकी पत्नियोंने जब अपने पति सौभरि मुनिकी आध्यात्मिक गति देखी, तब जैसे ज्वालाएँ शान्त अग्निमें लीन हो जाती हैं— वैसे ही वे उनके प्रभावसे सती होकर उन्हीं में लीन हो गयीं, उन्हींकी गतिको प्राप्त हुईं ॥५५ ॥
ताः स्वपत्युर्महाराज निरीक्ष्याध्यात्मिकीं गतिम् ।
अन्वीयुस्तत्प्रभावेण अग्निं शान्तमिवार्चिषः ॥५५
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे सौभर्याख्याने षष्ठोऽध्यायः ॥६ ॥
१. क्षेत्रप्रसू० । २. ह्यपाहरन् । १. च प्रोक्तः । २. स गन्धर्वैः । १. बार्हश्वासो । २. शाश्वश्चास्य । ३. ह्यजायत । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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१. यस्य । २. मजीजनत् । १. संगदोषं । २. कामं । ३. तीव्र ० । ४. वित् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथ सप्तमोऽध्यायः राजा त्रिशङ्कु और हरिश्चन्द्रकी कथा श्रीशुक उवाच मान्धातुः पुत्रप्रवरो योऽम्बरीषः प्रकीर्तितः ।
पितामहेन प्रवृतो यौवनाश्वश्च' तत्सुतः । २
हारीतस्तस्य पुत्रोऽभून्मान्धातृप्रवरा इमे ॥ १
नर्मदा भ्रातृभिर्दत्ता पुरुकुत्साय योरगैः ।
तया रसातलं नीतो भुजगेन्द्रप्रयुक्तया ॥२
गन्धर्वानवधीत् तत्र वध्यान् वै विष्णुशत्तिधृक् ।
नागाल्लब्धवरः सर्पादभयं स्मरतामिदम् ॥३
त्रसद्दस्युः पौरुकुत्सो योऽनरण्यस्य देहकृत् ।
हर्यश्वस्तत्सुतस्तस्मादरुणोऽथ त्रिबन्धनः ॥ ४
तस्य सत्यव्रतः पुत्रस्त्रिशंकुरिति विश्रुतः ।
प्राप्तश्चाण्डालतां शापाद् गुरोः कौशिकतेजसा ॥५
सशरीरो गतः स्वर्गमद्यापि दिवि दृश्यते ।
पातितोऽवाक्शिरा देवैस्तेनैव स्तम्भितो बलात् ॥६
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! मैं वर्णन कर चुका हूँ कि मान्धाताके पुत्रोंमें सबसे श्रेष्ठ अम्बरीष थे । उनके दादा युवनाश्वने उन्हें पुत्ररूपमें स्वीकार कर लिया । उनका पुत्र हुआ यौवनाश्व और यौवनाश्वका हारीत । मान्धाताके वंशमें ये तीन अवान्तर गोत्रोंके प्रवर्तक हुए ॥१ ॥ नागोंने अपनी बहिन नर्मदाका विवाह पुरुकुत्ससे कर दिया था । नागराज
वासुकिकी आज्ञासे नर्मदा अपने पतिको रसातलमें ले गयी || २ || वहाँ भगवान्की शक्तिसे सम्पन्न होकर पुरुकुत्सने वध करनेयोग्य गन्धर्वोंको मार डाला । इसपर नागराजने प्रसन्न होकर पुरुकुत्सको वर दिया कि जो इस प्रसंगका स्मरण करेगा, वह सर्पोंसे निर्भय हो जायगा ॥३ ॥
राजा पुरुकुत्सका पुत्र त्रसद्दस्यु था । उसके पुत्र हुए अनरण्य । अनरण्यके हर्यश्व, उसके अरुण और अरुणके त्रिबन्धन हुए || ४ || त्रिबन्धनके पुत्र सत्यव्रत हुए। यही सत्यव्रत त्रिशंकुके नामसे विख्यात हुए । यद्यपि त्रिशंकु अपने पिता और गुरुके शापसे चाण्डाल हो गये थे, परन्तु विश्वामित्रजीके प्रभावसे वे सशरीर स्वर्गमें चले गये । देवताओंने उन्हें वहाँसे ढकेल दिया और ******ebook converter DEMO Watermarks *******
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वे नीचेको सिर किये हुए गिर पड़े; परन्तु विश्वामित्रजीने अपने तपोबलसे उन्हें आकाशमें ही स्थिर कर दिया । वे अब भी आकाशमें लटके हुए दीखते हैं ॥ ५-६ ॥
त्रैशंकवो हरिश्चन्द्रो विश्वामित्रवसिष्ठयोः ।
यन्निमित्तमभूद् युद्धं पक्षिणोर्बहुवार्षिकम् ॥७
सोऽनपत्यो विषण्णात्मा नारदस्योपदेशतः ।
वरुणं शरणं यातः पुत्रो मे जायतां प्रभो ॥८
यदि वीरो महाराज तेनैव त्वां यजे इति ।
तथेति वरुणेनास्य पुत्रो जातस्तु रोहितः ॥९
जातः सुतो ह्यनेनांग मां यजस्वेति सोऽब्रवीत् ।
यदा पशुर्निर्देशः स्यादथ मेध्यो भवेदिति ॥१०
निर्दशे च स आगत्य यजस्वेत्याह सोऽब्रवीत् ।
दन्ताः पशोर्यज्जायेरन्नथ मेध्यो भवेदिति ॥११
जाता दन्ता यजस्वेति स प्रत्याहाथ सोऽब्रवीत् ।
यदा पतन्त्यस्य दन्ता अथ मेध्यो भवेदिति ॥१२
पशोर्निपतिता दन्ता यजस्वेत्याह सोऽब्रवीत् ।
यदा पशोः पुनर्दन्ता जायन्तेऽथ पशुः शुचिः ॥ १३
पुनर्जाता यजस्वेति स प्रत्याहाथ सोऽब्रवीत् ।
सान्नाहिको यदा राजन् राजन्योऽथ पशुः शुचिः ॥१४
इति पुत्रानुरागेण स्नेहयन्त्रितचेतसा ।
कालं वंचयता तं तमुक्तो देवस्तमैक्षत ॥१५
रोहितस्तदभिज्ञाय पितुः कर्म चिकीर्षितम् ।
प्राणप्रेप्सुर्धनुष्पाणिररण्यं प्रत्यपद्यत ॥ १६
त्रिशंकुके पुत्र थे हरिश्चन्द्र । उनके लिये विश्वामित्र और वसिष्ठ एक-दूसरेको शाप देकर पक्षी हो गये और बहुत वर्षोंतक लड़ते रहे || ७|| हरिश्चन्द्रके कोई सन्तान न थी । इससे वे बहुत उदास रहा करते थे । नारदके उपदेशसे वे वरुणदेवताकी शरणमें गये और उनसे प्रार्थना की कि ' प्रभो! मुझे पुत्र प्राप्त हो || ८ || महाराज! यदि मेरे वीर पुत्र होगा तो मैं उसीसे ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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आपका यजन करूँगा । ' वरुणने कहा- ' ठीक है । ' तब वरुणकी कृपासे हरिश्चन्द्रके रोहित नामका पुत्र हुआ ॥९ ॥ पुत्र होते ही वरुणने आकर कहा– 'हरिश्चन्द्र! तुम्हें पुत्र प्राप्त हो
गया । अब इसके द्वारा मेरा यज्ञ करो । ' हरिश्चन्द्रने कहा- ' जब आपका यह यज्ञपशु ( रोहित ) दस दिनसे अधिकका हो जायगा, तब यज्ञके योग्य होगा' ॥ १० ॥ दस दिन बीतनेपर वरुणने
आकर फिर कहा — ‘ अब मेरा यज्ञ करो । ' हरिश्चन्द्रने कहा- ' जब आपके यज्ञपशुके मुँहमें दाँत निकल आयेंगे, तब वह यज्ञके योग्य होगा' ॥ ११ ॥ दाँत उग आनेपर वरुणने कहा
- ' अब इसके दाँत निकल आये, मेरा यज्ञ करो । ' हरिश्चन्द्रने कहा – ' जब इसके दूधके दाँत गिर जायँगे, तब यह यज्ञके योग्य होगा ' ॥१२ ॥ दूधके दाँत गिर जानेपर वरुणने कहा — ' अब
इस यज्ञपशुके दाँत गिर गये, मेरा यज्ञ करो । ' हरिश्चन्द्रने कहा — ' जब इसके दुबारा दाँत आ जायँगे, तब यह पशु यज्ञके योग्य हो जायगा ' ॥१३ ॥ दाँतोंके फिर उग आनेपर वरुणने कहा
- ' अब मेरा यज्ञ करो । ' हरिश्चन्द्रने कहा – ' वरुणजी महाराज! क्षत्रियपशु तब यज्ञके योग्य होता है जब वह कवच धारण करने लगे ' || १४ || परीक्षित्! इस प्रकार राजा हरिश्चन्द्र पुत्रके प्रेमसे हीला - हवाला करके समय टालते रहे । इसका कारण यह था कि पुत्र- स्नेहकी फाँसीने उनके हृदयको जकड़ लिया था । वे जो- जो समय बताते वरुणदेवता उसीकी बाट देखते ॥१५ ॥ जब रोहितको इस बातका पता चला कि पिताजी तो मेरा बलिदान करना
चाहते हैं, तब वह अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये हाथमें धनुष लेकर वनमें चला गया ॥१६ ॥
कुछ दिनके बाद उसे मालूम हुआ कि वरुणदेवताने रुष्ट होकर मेरे पिताजीपर आक्रमण किया है — जिसके कारण वे महोदर रोगसे पीड़ित हो रहे हैं, तब रोहित अपने नगरकी ओर चल पड़ा । परन्तु इन्द्रने आकर उसे रोक दिया ॥१७ ॥ उन्होंने कहा – ' बेटा रोहित! यज्ञपशु
बनकर मरनेकी अपेक्षा तो पवित्र तीर्थ और क्षेत्रोंका सेवन करते हुए पृथ्वीमें विचरना ही अच्छा है । ' इन्द्रकी बात मानकर वह एक वर्षतक और वनमें ही रहा ॥१८ ॥
पितरं वरुणग्रस्तं श्रुत्वा जातमहोदरम् ।
रोहितो ग्राममेयाय तमिन्द्रः प्रत्यषेधत ॥१७
भूमेः पर्यटनं पुण्यं तीर्थक्षेत्रनिषेवणैः ।
रोहितायादिशच्छक्रः सोऽप्यरण्येऽवसत् समाम् ॥१८
एवं द्वितीये तृतीये चतुर्थे पंचमे तथा ।
अभ्येत्याभ्येत्य स्थविरो विप्रो भूत्वाऽऽह वृत्रहा ॥१९
षष्ठं संवत्सरं तत्र चरित्वा रोहितः पुरीम् ।
उपव्रजन्नजीगर्तादक्रीणान्मध्यमं सुतम् ॥२०
शुनःशेपं पशुं पित्रे प्रदाय समवन्दत ।
ततः पुरुषमेधेन हरिश्चन्द्रो महायशाः ॥ २१
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मुक्तोदरोऽयजद् देवान् वरुणादीन् महत्कथः ।
विश्वामित्रोऽभवत् तस्मिन् होता चाध्वर्युरात्मवान् ॥२२
जमदग्निरभूद् ब्रह्मा वसिष्ठोऽयास्यसामगः ।
तस्मै तुष्टो ददाविन्द्रः शातकौम्भमयं रथम् ॥२३
शुनःशेपस्य माहात्म्यमुपरिष्टात् प्रचक्ष्यते ।
सत्यसारां धृतिं दृष्ट्वा सभार्यस्य च भूपतेः ॥२४
विश्वामित्रो भृशं प्रीतो ददावविहतां गतिम् ।
मनः पृथिव्यां तामद्भिस्तेजसापोऽनिलेन तत् ॥२५
खे वायुं धारयंस्तच्च भूतादौ तं महात्मनि ।
तस्मिन् ज्ञानकलां ध्यात्वा तयाज्ञानं विनिर्दहन् ॥२६
इसी प्रकार दूसरे, तीसरे, चौथे और पाँचवें वर्ष भी रोहितने अपने पिताके पास जानेका विचार किया; परन्तु बूढ़े ब्राह्मणका वेश धारण कर हर बार इन्द्र आते और उसे रोक देते ॥१९ ॥ इस प्रकार छः वर्षतक रोहित वनमें ही रहा । सातवें वर्ष जब वह अपने नगरको
लौटने लगा, तब उसने अजीगर्तसे उनके मझले पुत्र शुनःशेपको मोल ले लिया और उसे यज्ञपशु बनानेके लिये अपने पिताको सौंपकर उनके चरणोंमें नमस्कार किया । तब परम यशस्वी एवं श्रेष्ठ चरित्रवाले राजा हरिश्चन्द्रने महोदर रोगसे छूटकर पुरुषमेध यज्ञद्वारा वरुण आदि देवताओंका यजन किया । उस यज्ञमें विश्वामित्रजी होता हुए। परम संयमी जमदग्निने अध्वर्युका काम किया । वसिष्ठजी ब्रह्मा बने और अयास्य मुनि सामगान करनेवाले उद्गाता बने । उस समय इन्द्रने प्रसन्न होकर हरिश्चन्द्रको एक सोनेका रथ दिया था ॥२०-२३ ॥ परीक्षित्! आगे चलकर मैं शुनःशेपका माहात्म्य वर्णन करूँगा । हरिश्चन्द्रको अपनी पत्नीके साथ सत्यमें दृढ़तापूर्वक स्थित देखकर विश्वामित्रजी बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने उन्हें उस ज्ञानका उपदेश किया जिसका कभी नाश नहीं होता । उसके अनुसार राजा हरिश्चन्द्रने अपने मनको पृथ्वीमें, पृथ्वीको जलमें, जलको तेजमें, तेजको वायुमें और वायुको आकाशमें स्थिर करके, आकाशको अहंकारमें लीन कर दिया । फिर अहंकारको महत्तत्त्वमें लीन करके उसमें ज्ञान-कलाका ध्यान किया और उससे अज्ञानको भस्म कर दिया ॥ २४- २६ ॥ इसके बाद निर्वाण- सुखकी अनुभूतिसे उस ज्ञान-कलाका भी परित्याग कर दिया और समस्त बन्धनोंसे मुक्त होकर वे अपने उस स्वरूपमें स्थित हो गये, जो न तो किसी प्रकार बतलाया जा सकता है और न उसके सम्बन्धमें किसी प्रकारका अनुमान ही किया जा सकता है ॥२७ ॥
हित्वा तां स्वेन भावेन निर्वाणसुखसंविदा ।
अनिर्देश्याप्रतर्व्येण तस्थौ विध्वस्तबन्धनः ॥२७
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इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे हरिश्चन्द्रोपाख् सप्तमोऽध्यायः ॥७ ॥
१. युव ० । २. हरीत० । ३. क्तिभृत् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथाष्टमोऽध्यायः सगर -चरित्र श्रीशुक' उवाच
हरितो रोहितसुतश्चम्पस्तस्माद् विनिर्मिता ।
चम्पापुरी सुदेवोऽतो विजयो यस्य चात्मजः ॥१
भरुकस्तत्सुतस्तस्माद् वृकस्तस्यापि बाहुकः ।
सोऽरिभिर्हृतभू राजा सभार्यो वनमाविशत् ॥२
वृद्धं तं पंचतां प्राप्तं महिष्यनु मरिष्यती ।
और्वेण जानताऽऽत्मानं प्रजावन्तं निवारिता ॥३
आज्ञायास्यै सपत्नीभिर्गरी दत्तोऽन्धसा सह ।
सह३ तेनैव संजातः सगराख्यो महायशाः ॥४
सगरश्चक्रवर्त्यासीत् सागरो यत्सुतैः कृतः ।
यस्तालजंघान् यवनाञ्छकान् हैहयबर्बरान् ॥५
नावधीद् गुरुवाक्येन चक्रे विकृतवेषिणः ।
मुण्डाञ्छ्मश्रुधरान् कांश्चिन्मुक्तकेशार्धमुण्डितान् ॥६
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - रोहितका पुत्र था हरित । हरितसे चम्प हुआ । उसीने चम्पापुरी बसायी थी । चम्पसे सुदेव और उसका पुत्र विजय हुआ ॥ १ ॥ विजयका भरुक, भरुकका
वृक और वृकका पुत्र हुआ बाहुक । शत्रुओंने बाहुकसे राज्य छीन लिया, तब वह अपनी पत्नीके साथ वनमें चला गया || २ || वनमें जानेपर बुढ़ापेके कारण जब बाहुककी मृत्यु हो गयी, तब उसकी पत्नी भी उसके साथ सती होनेको उद्यत हुई । परन्तु महर्षि और्वको यह मालूम था कि इसे गर्भ है । इसलिये उन्होंने उसे सती होनेसे रोक दिया ॥३ ॥ जब उसकी
सौतोंको यह बात मालूम हुई तो उन्होंने उसे भोजनके साथ गर ( विष ) दे दिया । परन्तु गर्भपर उस विषका कोई प्रभाव नहीं पड़ा; बल्कि उस विषको लिये हुए ही एक बालकका जन्म हुआ
जो गरके साथ पैदा होनेके कारण ' सगर ' कहलाया । सगर बड़े यशस्वी राजा हुए ॥४ ॥
सगर चक्रवर्ती सम्राट् थे । उन्हींके पुत्रोंने पृथ्वी खोदकर समुद्र बना दिया था । सगरने अपने गुरुदेव और्वकी आज्ञा मानकर तालजंघ, यवन, शक, हैहय और बर्बर जातिके लोगोंका वध नहीं किया, बल्कि उन्हें विरूप बना दिया । उनमेंसे कुछके सिर मुड़वा दिये, कुछके मूँछ- ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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दाढ़ी रखवा दी, कुछको खुले बालोंवाला बना दिया तो कुछको आधा मुँडवा दिया ॥५-६ ॥ कुछ लोगोंको सगरने केवल वस्त्र ओढ़नेकी ही आज्ञा दी, पहननेकी नहीं । और कुछको केवल लँगोटी पहननेको ही कहा, ओढ़नेको नहीं । इसके बाद राजा सगरने और्व ऋषिके उपदेशानुसार अश्वमेध यज्ञके द्वारा सम्पूर्ण वेद एवं देवतामय, आत्मस्वरूप, सर्वशक्तिमान् भगवान्की आराधना की । उसके यज्ञमें जो घोड़ा छोड़ा गया था, उसे इन्द्रने चुरा लिया ॥७-८ ॥ उस समय महारानी सुमतिके गर्भसे उत्पन्न सगरके पुत्रोंने अपने पिताके आज्ञानुसार घोड़ेके लिये सारी पृथ्वी छान डाली । जब उन्हें कहीं घोड़ा न मिला, तब उन्होंने बड़े घमण्डसे सब ओरसे पृथ्वीको खोद डाला ॥९ ॥ खोदते खोदते उन्हें पूर्व और उत्तरके
कोनेपर कपिलमुनिके पास अपना घोड़ा दिखायी दिया । घोड़ेको देखकर वे साठ हजार राजकुमार शस्त्र उठाकर यह कहते हुए उनकी ओर दौड़ पड़े कि ' यही हमारे घोड़ेको चुरानेवाला चोर है । देखो तो सही, इसने इस समय कैसे आँखें मूँद रखी हैं! यह पापी है । इसको मार डालो, मार डालो! ' उसी समय कपिलमुनिने अपनी पलकें खोलीं ॥१०-११ ॥ इन्द्रने राजकुमारोंकी बुद्धि हर ली थी, इसीसे उन्होंने कपिलमुनि- जैसे महापुरुषका तिरस्कार किया । इस तिरस्कारके फलस्वरूप उनके शरीरमें ही आग जल उठी जिससे क्षणभरमें ही वे सब - के - सब जलकर खाक हो गये ॥१२ ॥ परीक्षित्! सगरके लड़के कपिलमुनिके क्रोधसे
जल गये, ऐसा कहना उचित नहीं है । वे तो शुद्ध सत्त्वगुणके परम आश्रय हैं । उनका शरीर तो जगत्को पवित्र करता रहता है । उनमें भला क्रोधरूप तमोगुणकी सम्भावना कैसे की जा सकती है । भला, कहीं पृथ्वीकी धूलका भी आकाशसे सम्बन्ध होता है? ॥१३ ॥ यह संसार-सागर एक मृत्युमय पथ है । इसके पार जाना अत्यन्त कठिन है । परन्तु कपिलमुनिने इस
जगत्में सांख्यशास्त्रकी एक ऐसी दृढ़ नाव बना दी है जिससे मुक्तिकी इच्छा रखनेवाला कोई भी व्यक्ति उस समुद्रके पार जा सकता है । वे केवल परम ज्ञानी ही नहीं, स्वयं परमात्मा हैं । उनमें भला, यह शत्रु है और यह मित्र - इस प्रकारकी भेदबुद्धि कैसे हो सकती है? ॥१४ ॥
अनन्तर्वाससः कांश्चिदबहिर्वाससोऽपरान् ।
सोऽश्वमेधैरयजत सर्ववेदसुरात्मकम् ॥७
और्वोपदिष्टयोगेन हरिमात्मानमीश्वरम् ।
तस्योत्सृष्टं पशुं यज्ञे जहाराश्वं पुरन्दरः ॥८
सुमत्यास्तनया दृप्ताः पितुरादेशकारिणः ।
हयमन्वेषमाणास्ते समन्तान्न्यखनन् महीम् ॥९
प्रागुदीच्यां दिशि हयं ददृशुः कपिलान्तिके ।
एष वाजिहरश्चौर आस्ते मीलितलोचनः ॥ १०
हन्यतां हन्यतां पाप इति षष्टिसहस्रिणः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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उदायुधा अभिययुरुन्मिमेष तदा मुनिः ॥११
स्वशरीराग्निना तावन्महेन्द्रहृतचेतसः ।
महद्व्यतिक्रमहता भस्मसादभवन् क्षणात् ॥१२
न साधुवादो मुनिकोपभर्जिता नृपेन्द्रपुत्रा इति सत्त्वधामनि । कथं तमो रोषमयं विभाव्यते जगत्पवित्रात्मनि खे रजो भुवः ॥१३ यस्येरिता सांख्यमयी दृढेह नौ- र्यया मुमुक्षुस्तरते दुरत्ययम् । भवार्णवं मृत्युपथं विपश्चितः परात्मभूतस्य कथं पृथङ्मतिः ॥१४
योऽसमंजस इत्युक्तः स केशिन्या नृपात्मजः ।
तस्य पुत्रोंऽशुमान् नाम पितामहहिते रतः ॥१५
असमंजस आत्मानं दर्शयन्नसमंजसम् ।
जातिस्मरः पुरा संगाद् योगी योगाद् विचालितः ॥१६
आचरन् गर्हितं लोके ज्ञातीनां कर्म विप्रियम् ।
सरय्वां क्रीडतो बालान् प्रास्यदुद्वेजयञ्जनम् ॥१७
एवंवृत्तः परित्यक्तः पित्रा स्नेहमपोह्य वै ।
योगैश्वर्येण बालांस्तान् दर्शयित्वा ततो ययौ ॥१८
अयोध्यावासिनः सर्वे बालकान् पुनरागतान् ।
दृष्ट्वा विसिस्मिरे राजन् राजा चाप्यन्वतप्यत' ॥१९
अंशुमांश्चोदितो राज्ञा तुरंगान्वेषणे ययौ ।
पितृव्यखातानुपथं भस्मान्ति ददृशे हयम् ॥ २०
तत्रासीनं मुनिं वीक्ष्य कपिलाख्यमधोक्षजम् ।
अस्तौत् समाहितमनाः प्रांजलिः प्रणतो महान् ॥२१
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