श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 81–90
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 81–90
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अंशुमानुवाच न पश्यति त्वां परमात्मनोऽजनो
न बुध्यतेऽद्यापि समाधियुक्तिभिः ।
कुतोऽपरे तस्य मनःशरीरधी- विसर्गसृष्टा वयमप्रकाशाः ॥२२
सगरकी दूसरी पत्नीका नाम था केशिनी । उसके गर्भसे उन्हें असमंजस नामका पुत्र हुआ था । असमंजसके पुत्रका नाम था अंशुमान् । वह अपने दादा सगरकी आज्ञाओंके पालन तथा उन्हींकी सेवामें लगा रहता ॥१५ ॥ असमंजस पहले जन्ममें योगी थे । संगके कारण वे योगसे
विचलित हो गये थे, परन्तु अब भी उन्हें अपने पूर्वजन्मका स्मरण बना हुआ था । इसलिये वे ऐसे काम किया करते थे, जिनसे भाई- बन्धु उन्हें प्रिय न समझें । वे कभी- कभी तो अत्यन्त निन्दित कर्म कर बैठते और अपनेको पागल- सा दिखलाते - यहाँतक कि खेलते हुए बच्चोंको सरयूमें डाल देते! इस प्रकार उन्होंने लोगोंको उद्विग्न कर दिया था ॥१६-१७ ॥ अन्तमें उनकी ऐसी करतूत देखकर पिताने पुत्र - स्नेहको तिलांजलि दे दी और उन्हें त्याग दिया । तदनन्तर असमंजसने अपने योगबलसे उन सब बालकोंको जीवित कर दिया और अपने पिताको दिखाकर वे वनमें चले गये || १८ || अयोध्याके नागरिकोंने जब देखा कि हमारे बालक तो फिर लौट आये तब उन्हें असीम आश्चर्य हुआ और राजा सगरको भी बड़ा पश्चात्ताप हुआ ॥१९ ॥ इसके बाद राजा सगरकी आज्ञासे अंशुमान् घोड़ेको ढूँढ़नेके लिये निकले ।
उन्होंने अपने चाचाओंके द्वारा खोदे हुए समुद्रके किनारे- किनारे चलकर उनके शरीरके भस्मके पास ही घोड़ेको देखा ॥ २० ॥ वहीं भगवान्के अवतार कपिलमुनि बैठे हुए थे । उनको
देखकर उदारहृदय अंशुमान्ने उनके चरणोंमें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर एकाग्र मनसे उनकी स्तुति की ॥२१ ॥
अंशुमान्ने कहा- भगवन्! आप अजन्मा ब्रह्माजीसे भी परे हैं । इसीलिये वे आपको प्रत्यक्ष नहीं देख पाते । देखनेकी बात तो अलग रही- वे समाधि करते - करते एवं युक्ति लड़ाते - लड़ाते हार गये, किन्तु आजतक आपको समझ भी नहीं पाये । हमलोग तो उनके मन, शरीर और बुद्धिसे होनेवाली सृष्टिके द्वारा बने हुए अज्ञानी जीव हैं । तब भला, हम आपको कैसे समझ सकते हैं ॥२२ ॥ संसारके शरीरधारी सत्त्वगुण, रजोगुण या तमोगुण-प्रधान हैं । वे
जाग्रत् और स्वप्न अवस्थाओंमें केवल गुणमय पदार्थों, विषयोंको और सुषुप्ति अवस्थामें केवल अज्ञान- ही - अज्ञान देखते हैं । इसका कारण यह है कि वे आपकी मायासे मोहित हो रहे हैं । वे बहिर्मुख होनेके कारण बाहरकी वस्तुओंको तो देखते हैं, पर अपने ही हृदयमें स्थित आपको नहीं देख पाते ॥ २३ ॥ आप एकरस, ज्ञानघन हैं । सनन्दन आदि मुनि, जो
आत्मस्वरूपके अनुभवसे मायाके गुणोंके द्वारा होनेवाले भेदभावको और उसके कारण अज्ञानको नष्ट कर चुके हैं, आपका निरन्तर चिन्तन करते रहते हैं । मायाके गुणोंमें ही भूला हुआ मैं मूढ़ किस प्रकार आपका चिन्तन करूँ? || २४ || माया, उसके गुण और गुणोंके कारण होनेवाले कर्म एवं कर्मोंके संस्कारसे बना हुआ लिंगशरीर आपमें है ही नहीं । न तो आपका नाम है और न तो रूप । आपमें न कार्य है और न तो कारण । आप सनातन आत्मा
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हैं । ज्ञानका उपदेश करनेके लिये ही आपने यह शरीर धारण कर रखा है । हम आपको नमस्कार करते हैं ॥ २५ ॥ प्रभो! यह संसार आपकी मायाकी करामात है । इसको सत्य
समझकर काम, लोभ, ईर्ष्या और मोहसे लोगोंका चित्त शरीर तथा घर आदिमें भटकने लगता है । लोग इसीके चक्करमें फँस जाते हैं || २६ || समस्त प्राणियोंके आत्मा प्रभो! आज आपके दर्शनसे मेरे मोहकी वह दृढ़ फाँसी कट गयी जो कामना, कर्म और इन्द्रियोंको जीवनदान देती है ॥२७ ॥
ये देहभाजस्त्रिगुणप्रधाना गुणान् विपश्यन्त्युत' वा तमश्च । यन्मायया मोहितचेतसस्ते विदुः स्वसंस्थं न बहिःप्रकाशाः ॥२३ तं त्वामहं ज्ञानघनं स्वभाव- प्रध्वस्तमायागुणभेदमोहैः । सनन्दनाद्यैर्मुनिभिर्विभाव्यं कथं हि मूढः परिभावयामि ॥२४ प्रशान्तमायागुणकर्मलिंग- मनामरूपं सदसद्विमुक्तम् । ज्ञानोपदेशाय गृहीतदेहं४ नमामहे त्वां पुरुषं पुराणम् ॥२५
त्वन्मायारचिते “ लोके वस्तुबुद्ध्या गृहादिषु ।
भ्रमन्ति कामलोभेर्ष्यामोहविभ्रान्तचेतसः ॥२६
अद्य नः सर्वभूतात्मन् कामकर्मेन्द्रियाशयः ।
मोहपाशो दृढश्छिन्नो भगवंस्तव दर्शनात् ॥२७
श्रीशुक उवाच
इत्थं गीतानुभावस्तं भगवान् कपिलो मुनिः ।
अंशुमन्तमुवाचेदमनुगृह्य धिया नृप ॥२८
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! जब अंशुमान्ने भगवान् कपिलमुनिके प्रभावका इस प्रकार गान किया, तब उन्होंने मन- ही- मन अंशुमान्पर बड़ा अनुग्रह किया और कहा ॥२८ ॥
श्रीभगवानुवाच
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अश्वोऽयं नीयतां वत्स पितामहपशुस्तव ।
इमे च पितरो दग्धा गंगाम्भोऽर्हन्ति नेतरत् ॥२९
तं परिक्रम्य शिरसा प्रसाद्य हयमानयत् ।
सगरस्तेन पशुना क्रतुशेषं समापयत् ॥३०
राज्यमंशुमति न्यस्य निःस्पृहो मुक्तबन्धनः ।
और्वोपदिष्टमार्गेण लेभे गतिमनुत्तमाम् ॥३१
श्रीभगवान्ने कहा — ' बेटा! यह घोड़ा तुम्हारे पितामहका यज्ञपशु है । इसे तुम ले जाओ । तुम्हारे जले हुए चाचाओंका उद्धार केवल गंगाजलसे होगा, और कोई उपाय नहीं है ' ॥२९ ॥
अंशुमान्ने बड़ी नम्रतासे उन्हें प्रसन्न करके उनकी परिक्रमा की और वे घोड़ेको ले आये । सगरने उस यज्ञपशुके द्वारा यज्ञकी शेष क्रिया समाप्त की ॥३० ॥
तब राजा सगरने अंशुमान्को राज्यका भार सौंप दिया और वे स्वयं विषयोंसे निःस्पृह एवं बन्धनमुक्त हो गये । उन्होंने महर्षि और्वके बतलाये हुए मार्गसे परमपदकी प्राप्ति की ॥ ३१ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे सगरोपाख्यानेऽष्टमोऽध्यायः ॥८ ॥
१. बादरायणिरुवाच । २. करुक० । ३. न हतस्तेन । १. चाथान्व ० । २. सृष्टावयवप्रकाशकाः । १. प्रपश्य ० । २. मयमोहभेदैः । ३. द्वियुक्तम्। ४. तलिंगं । ५. यत्त्वया रचि ० ।
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अथ नवमोऽध्यायः भगीरथ - चरित्र और गंगावतरण श्रीशुक उवाच
अंशुमांश्च तपस्तेपे गंगानयनकाम्यया ।
कालं महान्तं नाशक्नोत् ततः कालेन संस्थितः ॥१
दिलीपस्तत्सुतस्तद्वदशक्तः कालमेयिवान् ।
भगीरथस्तस्य पुत्रस्तेपे स सुमहत् तपः ॥२
दर्शयामास तं देवी प्रसन्ना वरदास्मि ते ।
इत्युक्तः स्वमभिप्रायं शशंसावनतो नृपः ॥३
कोऽपि धारयिता वेगं पतन्त्या मे महीतले ।
अन्यथा भूतलं भित्त्वा नृप यास्ये रसातलम् ॥४
किं चाहं न भुवं यास्ये नरा मय्यामृजन्त्यघम् ।
मृजामि तदघं कुत्र राजंस्तत्र विचिन्त्यताम् ॥५
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! अंशुमान्ने गंगाजीको लानेकी कामनासे बहुत वर्षोंतक घोर तपस्या की; परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली, समय आनेपर उनकी मृत्यु हो गयी ॥१ ॥ अंशुमान्के पुत्र दिलीपने भी वैसी ही तपस्या की; परन्तु वे भी असफल ही रहे,
समयपर उनकी भी मृत्यु हो गयी । दिलीपके पुत्र थे भगीरथ। उन्होंने बहुत बड़ी तपस्या की ॥२ ॥ उनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवती गंगाने उन्हें दर्शन दिया और कहा कि— ‘ मैं
तुम्हें वर देनेके लिये आयी हूँ । ' उनके ऐसा कहनेपर राजा भगीरथने बड़ी नम्रतासे अपना अभिप्राय प्रकट किया कि ' आप मर्त्यलोकमें चलिये ' ॥३ ॥
[ गंगाजीने कहा- ] ' जिस समय मैं स्वर्गसे पृथ्वीतलपर गिरूँ उस समय मेरे वेगको कोई धारण करनेवाला होना चाहिये । भगीरथ! ऐसा न होनेपर मैं पृथ्वीको फोड़कर रसातलमें चली जाऊँगी ॥४ ॥ इसके अतिरिक्त इस कारणसे भी मैं पृथ्वीपर नहीं जाऊँगी कि लोग मुझमें
अपने पाप धोयेंगे । फिर मैं उस पापको कहाँ धोऊँगी । भगीरथ! इस विषयमें तुम स्वयं विचार कर लो ' ॥५ ॥
भगीरथ उवाच
साधवो न्यासिनः शान्ता ब्रह्मिष्ठा लोकपावनाः ।
हरन्त्यघं तेऽङ्गसंगात् तेष्वास्ते ह्यघभिद्धरिः ॥६
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धारयिष्यति ते वेगं रुद्रस्त्वात्मा शरीरिणाम् ।
यस्मिन्नोतमिदं प्रोतं विश्वं शाटीव तन्तुषु ॥७
इत्युक्त्वा स नृपो देवं तपसातोषयच्छिवम् ।
कालेनाल्पीयसा राजंस्तस्येशः १ समतुष्यत ॥८
तथेति राज्ञाभिहितं सर्वलोकहितः शिवः ।
दधारावहितो गंगां पादपूतजलां हरेः ॥ ९
भगीरथः स राजर्षिर्निन्ये भुवनपावनीम् ।
यत्र स्वपितृणां देहा भस्मीभूताः स्म शेरते ॥१०
रथेन वायुवेगेन प्रयान्तमनुधावती ।
देशान् पुनन्ती निर्दग्धानासिंचत् सगरात्मजान् ॥११
यज्जलस्पर्शमात्रेण ब्रह्मदण्डहता अपि ।
सगरात्मजा दिवं जग्मुः केवलं देहभस्मभिः ॥ १२
भस्मीभूतांगसंगेन स्वर्याताः सगरात्मजाः ।
किं पुनः श्रद्धया देवीं ये सेवन्ते धृतव्रताः ॥१३
भगीरथने कहा - ' माता! जिन्होंने लोक-परलोक, धन- सम्पत्ति और स्त्री-पुत्रकी कामनाका संन्यास कर दिया है, जो संसारसे उपरत होकर अपने - आपमें शान्त हैं, जो ब्रह्मनिष्ठ और लोकोंको पवित्र करनेवाले परोपकारी सज्जन हैं - वे अपने अंगस्पर्शसे तुम्हारे पापोंको नष्ट कर देंगे । क्योंकि उनके हृदयमें अघरूप अघासुरको मारनेवाले भगवान् सर्वदा निवास करते हैं ॥६ ॥ समस्त प्राणियोंके आत्मा रुद्रदेव तुम्हारा वेग धारण कर लेंगे । क्योंकि
जैसे साड़ी सूतोंमें ओत- प्रोत है, वैसे ही यह सारा विश्व भगवान् रुद्रमें ही ओत- प्रोत है ' ॥७ ॥
परीक्षित्! गंगाजीसे इस प्रकार कहकर राजा भगीरथने तपस्याके द्वारा भगवान् शंकरको प्रसन्न किया । थोड़े ही दिनोंमें महादेवजी उनपर प्रसन्न हो गये || ८ ॥ भगवान् शंकर तो सम्पूर्ण विश्वके हितैषी हैं, राजाकी बात उन्होंने ' तथास्तु' कहकर स्वीकार कर ली । फिर शिवजीने सावधान होकर गंगाजीको अपने सिरपर धारण किया । क्यों न हो, भगवान्के चरणोंका सम्पर्क होनेके कारण गंगाजीका जल परम पवित्र जो है ॥९ ॥ इसके बाद राजर्षि
भगीरथ त्रिभुवनपावनी गंगाजीको वहाँ ले गये जहाँ उनके पितरोंके शरीर राखके ढेर बने पड़े थे ॥१० ॥ वे वायुके समान वेगसे चलनेवाले रथपर सवार होकर आगे - आगे चल रहे थे और
उनके पीछे - पीछे मार्गमें पड़नेवाले देशोंको पवित्र करती हुई गंगाजी दौड़ रही थीं । इस प्रकार गंगासागर- संगमपर पहुँचकर उन्होंने सगरके जले हुए पुत्रोंको अपने जलमें डुबा
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दिया ॥११ ॥ यद्यपि सगरके पुत्र ब्राह्मणके तिरस्कारके कारण भस्म हो गये थे, इसलिये
उनके उद्धारका कोई उपाय न था - फिर भी केवल शरीरकी राखके साथ गंगाजलका स्पर्श हो जानेसे ही वे स्वर्गमें चले गये ॥१२ ॥ परीक्षित्! जब गंगाजलसे शरीरकी राखका स्पर्श हो
जानेसे सगरके पुत्रोंको स्वर्गकी प्राप्ति हो गयी तब जो लोग श्रद्धाके साथ नियम लेकर श्रीगंगाजीका सेवन करते हैं, उनके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है ॥१३ ॥
न ह्येतत् परमाश्चर्यं स्वर्धुन्या यदिहोदितम् ।
अनन्तचरणाम्भोजप्रसूताया भवच्छिदः ॥१४
संनिवेश्य मनो यस्मिञ्छ्रद्धया मुनयोऽमलाः ।
त्रैगुण्यं दुस्त्यजं हित्वा सद्यो यातास्तदात्मताम् ॥१५
श्रुतो भगीरथाज्जज्ञे तस्य नाभोऽपरोऽभवत् ।
सिन्धुद्वीपस्ततस्तस्मादयुतायुस्ततोऽभवत् ॥१६
ऋतुपर्णो नलसखो योऽश्वविद्यामयान्नलात् ।
दत्त्वाक्षहृदयं चास्मै सर्वकामस्तु तत्सुतः ॥१७
ततः सुदासस्तत्पुत्रो मदयन्तीपतिर्नृप ।
आहुर्मित्रसहं यं वै कल्माषाङ्घ्रिमुत क्वचित् ।
वसिष्ठशापाद् रक्षोऽभूदनपत्यः स्वकर्मणा ॥१८
राजोवाच
किं निमित्तो गुरोः शापः सौदासस्य महात्मनः ।
एतद् वेदितुमिच्छामः कथ्यतां न रहो यदि ॥१९
श्रीशुक उवाच
सौदासो मृगयां कञ्चिच्चरन् रक्षो जघान ह ।
मुमोच भ्रातरं सोऽथ गतः प्रतिचिकीर्षया ॥२०
स चिन्तयन्नघं राज्ञः सूदरूपधरो गृहे ।
गुरवे भोक्तुकामाय पक्त्वा निन्ये नरामिषम् ॥२१
मैंने गंगाजीकी महिमाके सम्बन्धमें जो कुछ कहा है, उसमें आश्चर्यकी कोई बात नहीं है । क्योंकि गंगाजी भगवान्के उन चरणकमलोंसे निकली हैं, जिनका श्रद्धाके साथ चिन्तन करके बड़े - बड़े मुनि निर्मल हो जाते हैं और तीनों गुणोंके कठिन बन्धनको काटकर तुरन्त भगवत्स्वरूप बन जाते हैं । फिर गंगाजी संसारका बन्धन काट दें, इसमें कौन बड़ी बात
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है ॥१४-१५ ॥ भगीरथका पुत्र था श्रुत, श्रुतका नाभ । यह नाभ पूर्वोक्त नाभसे भिन्न है । नाभका पुत्र था सिन्धुद्वीप और सिन्धुद्वीपका अयुतायु। अयुतायुके पुत्रका नाम था ऋतुपर्ण । वह नलका मित्र था । उसने नलको पासा फेंकनेकी विद्याका रहस्य बतलाया था और बदलेमें उससे अश्व - विद्या सीखी थी । ऋतुपर्णका पुत्र सर्वकाम हुआ ॥१६-१७ ॥ परीक्षित्! सर्वकामके पुत्रका नाम था सुदास । सुदासके पुत्रका नाम था सौदास और सौदासकी पत्नीका नाम था मदयन्ती । सौदासको ही कोई- कोई मित्रसह कहते हैं और कहीं -कहीं उसे कल्माषपाद भी कहा गया है । वह वसिष्ठके शापसे राक्षस हो गया था और फिर अपने कर्मोंके कारण सन्तानहीन हुआ ॥१८ ॥
राजा परीक्षित्ने पूछा - भगवन्! हम यह जानना चाहते हैं कि महात्मा सौदासको गुरु
वसिष्ठजीने शाप क्यों दिया । यदि कोई गोपनीय बात न हो तो कृपया बतलाइये ॥१९ ॥
श्रीशुकदेवजीने कहा- परीक्षित्! एक बार राजा सौदास शिकार खेलने गये हुए थे । वहाँ उन्होंने किसी राक्षसको मार डाला और उसके भाईको छोड़ दिया । उसने राजाके इस कामको अन्याय समझा और उनसे भाईकी मृत्युका बदला लेनेके लिये वह रसोइयेका रूप धारण करके उनके घर गया । जब एक दिन भोजन करनेके लिये गुरु वसिष्ठजी राजाके यहाँ आये, तब उसने मनुष्यका मांस राँधकर उन्हें परस दिया ॥२०-२१ ॥
परिवेक्ष्यमाणं भगवान् विलोक्याभक्ष्यमंजसा ।
राजानमशपत् क्रुद्धो रक्षो ह्येवं भविष्यसि ॥२२
रक्षः कृतं तद् विदित्वा चक्रे द्वादशवार्षिकम् ।
सोऽप्यपोऽञ्जलिनाऽऽदाय गुरुं शप्तुं समुद्यतः ॥२३
वारितो मदयन्त्यापो रुशतीः पादयोर्जहौ ।
दिशः खमवनीं सर्वं पश्यंजीवमयं नृपः ॥ २४
राक्षसं भावमापन्नः पादे कल्माषतां गतः ।
व्यवायकाले ददृशे वनौकोदम्पती द्विजौ ॥२५
क्षुधार्तो जगृहे विप्रं तत्पत्न्याहाकृतार्थवत् ।
न भवान् राक्षसः साक्षादिक्ष्वाकूणां महारथः ॥२६
मदयन्त्याः पतिर्वीर नाधर्मं कर्तुमर्हसि' ।
देहि मेऽपत्यकामाया अकृतार्थं पतिं द्विजम् ॥ २७
देहोऽयं मानुषो राजन् पुरुषस्याखिलार्थदः ।
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तस्मादस्य वधो वीर सर्वार्थवध उच्यते ॥ २८ एष हि ब्राह्मणो विद्वांस्तपःशीलगुणान्वितः ।
आरिराधयिषुर्ब्रह्म महापुरुषसंज्ञितम् ।
सर्वभूतात्मभावेन भूतेष्वन्तर्हितं गुणैः ॥२९
जब सर्वसमर्थ वसिष्ठजीने देखा कि परोसी जानेवाली वस्तु तो नितान्त अभक्ष्य है, तब उन्होंने क्रोधित होकर राजाको शाप दिया कि ' जा, इस कामसे तू राक्षस हो जायगा' || २२ ॥ जब उन्हें यह बात मालूम हुई कि यह काम तो राक्षसका है - राजाका नहीं, तब उन्होंने उस शापको केवल बारह वर्षके लिये कर दिया । उस समय राजा सौदास भी अपनी अंजलिमें जल लेकरगुरु वसिष्ठको शाप देनेके लिये उद्यत हुए || २३ || परन्तु उनकी पत्नी मदयन्तीने उन्हें ऐसा करनेसे रोक दिया । इसपर सौदासने विचार किया कि 'दिशाएँ, आकाश और पृथ्वी– सब - के - सब तो जीवमय ही हैं । तब यह तीक्ष्ण जल कहाँ छोडूं? ' अन्तमें उन्होंने उस जलको अपने पैरोंपर डाल लिया । [ इसीसे उनका नाम 'मित्रसह ' हुआ] ॥२४ ॥ उस जलसे उनके पैर
काले पड़ गये थे, इसलिये उनका नाम ' कल्माषपाद' भी हुआ । अब वे राक्षस हो चुके थे । एक दिन राक्षस बने हुए राजा कल्माषपादने एक वनवासी ब्राह्मण- दम्पतिको सहवासके समय देख लिया ॥२५ ॥ कल्माषपादको भूख तो लगी ही थी, उसने ब्राह्मणको पकड़ लिया ।
ब्राह्मण - पत्नीकी कामना अभी पूर्ण नहीं हुई थी । उसने कहा- ' राजन्! आप राक्षस नहीं हैं । आप महारानी मदयन्तीके पति और इक्ष्वाकुवंशके वीर महारथी हैं । आपको ऐसा अधर्म नहीं करना चाहिये । मुझे सन्तानकी कामना है और इस ब्राह्मणकी भी कामनाएँ अभी पूर्ण नहीं हुई हैं इसलिये आप मुझे मेरा यह ब्राह्मण पति दे दीजिये ॥२६-२७ ॥ राजन्! यह मनुष्य- शरीर जीवको धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्ति करानेवाला है । इसलिये वीर! इस शरीरको नष्ट कर देना सभी पुरुषार्थोंकी हत्या कही जाती है || २८ || फिर यह ब्राह्मण तो विद्वान् है । तपस्या, शील और बड़े- बड़े गुणोंसे सम्पन्न है। यह उन पुरुषोत्तम परब्रह्मकी समस्त प्राणियोंके आत्माके रूपमें आराधना करना चाहता है, जो समस्त पदार्थोंमें विद्यमान रहते हुए भी उनके पृथक् - पृथक् गुणोंसे छिपे हुए हैं ॥ २ ९ ॥ राजन्! आप शक्तिशाली हैं । आप धर्मका मर्म भलीभाँति जानते हैं । जैसे पिताके हाथों पुत्रकी मृत्यु उचित नहीं, वैसे ही आप- जैसे श्रेष्ठ राजर्षिके हाथों मेरे श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि पतिका वध किसी प्रकार उचित नहीं है ॥३० ॥ आपका साधु -समाजमें बड़ा सम्मान है । भला आप मेरे परोपकारी, निरपराध,
श्रोत्रिय एवं ब्रह्मवादी पतिका वध कैसे ठीक समझ रहे हैं? ये तो गौके समान निरीह हैं ॥३१ ॥ फिर भी यदि आप इन्हें खा ही डालना चाहते हैं, तो पहले मुझे खा डालिये ।
क्योंकि अपने पतिके बिना मैं मुर्देके समान हो जाऊँगी और एक क्षण भी जीवित न रह सकूँगी’ ॥३२ ॥ ब्राह्मणपत्नी बड़ी ही करुणापूर्ण वाणीमें इस प्रकार कहकर अनाथकी भाँति
रोने लगी । परन्तु सौदासने शापसे मोहित होनेके कारण उसकी प्रार्थनापर कुछ भी ध्यान न दिया और वह उस ब्राह्मणको वैसे ही खा गया, जैसे बाघ किसी पशुको खा जाय ॥ ३३ ॥
जब ब्राह्मणीने देखा कि राक्षसने मेरे गर्भाधानके लिये उद्यत पतिको खा लिया, तब उसे बड़ा
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शोक हुआ । सती ब्राह्मणीने क्रोध करके राजाको शाप दे दिया || ३४ ॥ ' रे पापी! मैं अभी कामसे पीड़ित हो रही थी । ऐसी अवस्थामें तूने मेरे पतिको खा डाला है । इसलिये मूर्ख! जब तु स्त्रीसे सहवास करना चाहेगा, तभी तेरी मृत्यु हो जायगी, यह बात मैं तुझे सुझाये देती ॥३५ ॥ इस प्रकार मित्रसहको शाप देकर ब्राह्मणी अपने पतिकी अस्थियोंको धधकती हुई
चितामें डालकर स्वयं भी सती हो गयी और उसने वही गति प्राप्त की, जो उसके पतिदेवको मिली थी । क्यों न हो, वह अपने पतिको छोड़कर और किसी लोकमें जाना भी तो नहीं चाहती थी ॥३६ ॥
सोऽयं ब्रह्मर्षिवर्यस्ते राजर्षिप्रवराद् विभो ।
कथमर्हति धर्मज्ञ वधं पितुरिवात्मजः ॥३०
तस्य साधोरपापस्य भ्रूणस्य ब्रह्मवादिनः ।
कथं वधं यथा बभ्रोर्मन्यते १ सन्मतो भवान् ॥३१
यद्ययं क्रियते भक्षस्तर्हि मां खाद पूर्वतः ।
न जीविष्ये विना येन क्षणं च मृतकं यथा ॥३२
एवं करुणभाषिण्या विलपन्त्या अनाथवत् ।
व्याघ्रः पशुमिवाखादत् सौदासः शापमोहितः ॥ ३३
ब्राह्मणी वीक्ष्य दिधिषं पुरुषादेन भक्षितम् ।
शोचन्त्यात्मानमुर्वीशमशपत् कुपिता सती ॥ ३४
यस्मान्मे भक्षितः पाप कामार्तायाः पतिस्त्वया ।
तवापि मृत्युराधानादकृतप्रज्ञ दर्शितः ॥३५
एवं मित्रसहं शप्त्वा पतिलोकपरायणा ।
तदस्थीनि समिद्धेऽग्नौ प्रास्य भर्तुर्गतिं गता ॥ ३६
विशापो द्वादशाब्दान्ते मैथुनाय समुद्यतः ।
विज्ञाय ब्राह्मणीशापं महिष्या स निवारितः ॥ ३७
बारह वर्ष बीतनेपर राजा सौदास शापसे मुक्त हो गये । जब वे सहवासके लिये अपनी पत्नीके पास गये, तब उसने इन्हें रोक दिया । क्योंकि उसे उस ब्राह्मणीके शापका पता था ॥३७ ॥ इसके बाद उन्होंने स्त्री- सुखका बिलकुल परित्याग ही कर दिया । इस प्रकार
अपने कर्मके फलस्वरूप वे सन्तानहीन हो गये । तब वसिष्ठजीने उनके कहनेसे मदयन्तीको
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गर्भाधान कराया ॥ ३८ ॥ मदयन्ती सात वर्षतक गर्भ धारण किये रही, परन्तु बच्चा पैदा नहीं
हुआ । तब वसिष्ठजीने पत्थरसे उसके पेटपर आघात किया । इससे जो बालक हुआ, वह अश्म ( पत्थर ) की चोटसे पैदा होनेके कारण ' अश्मक' कहलाया ॥ ३ ९ ॥ अश्मकसे मूलकका जन्म हुआ । जब परशुरामजी पृथ्वीको क्षत्रियहीन कर रहे थे, तब स्त्रियोंने उसे छिपाकर रख लिया था । इसीसे उसका एक नाम 'नारीकवच' भी हुआ । उसे मूलक इसलिये कहते हैं कि वह पृथ्वीके क्षत्रियहीन हो जानेपर उस वंशका मूल ( प्रवर्तक ) बना || ४० || मूलकके पुत्र हुए दशरथ, दशरथके ऐडविड और ऐडविडके राजा विश्वसह। विश्वसहके पुत्र ही चक्रवर्ती सम्राट् खट्वांग हुए ॥४१ ॥ युद्धमें उन्हें कोई जीत नहीं सकता था । उन्होंने देवताओंकी प्रार्थनासे
दैत्योंका वध किया था । जब उन्हें देवताओंसे यह मालूम हुआ कि अब मेरी आयु केवल दो ही घड़ी बाकी है, तब वे अपनी राजधानी लौट आये और अपने मनको उन्होंने भगवान्में लगा दिया ॥४२ ॥ वे मन - ही- मन सोचने लगे कि ' मेरे कुलके इष्ट देवता हैं ब्राह्मण! उनसे बढ़कर
मेरा प्रेम अपने प्राणोंपर भी नहीं है । पत्नी, पुत्र, लक्ष्मी, राज्य और पृथ्वी भी मुझे उतने प्यारे नहीं लगते ॥४३ ॥ मेरा मन बचपनमें भी कभी अधर्मकी ओर नहीं गया । मैंने पवित्रकीर्ति
भगवान्के अतिरिक्त और कोई भी वस्तु कहीं नहीं देखी ॥४४ ॥ तीनों लोकोंके स्वामी
देवताओंने मुझे मुँहमाँगा वर देनेको कहा । परन्तु मैंने उन भोगोंकी लालसा बिलकुल नहीं की । क्योंकि समस्त प्राणियोंके जीवनदाता श्रीहरिकी भावनामें ही मैं मग्न हो रहा था ॥ ४५ ॥ जिन
देवताओंकी इन्द्रियाँ और मन विषयोंमें भटक रहे हैं, वे सत्त्वगुणप्रधान होनेपर भी अपने हृदयमें विराजमान, सदा-सर्वदा प्रियतमके रूपमें रहनेवाले अपने आत्मस्वरूप भगवान्को नहीं जानते । फिर भला जो रजोगुणी और तमोगुणी हैं, वे तो जान ही कैसे सकते हैं ॥ ४६ ॥
इसलिये अब इन विषयोंमें मैं नहीं रमता । ये तो मायाके खेल हैं । आकाशमें झूठ - मूठ प्रतीत होनेवाले गन्धर्वनगरोंसे बढ़कर इनकी सत्ता नहीं है । ये तो अज्ञानवश चित्तपर चढ़ गये थे । संसारके सच्चे रचयिता भगवान्की भावनामें लीन होकर मैं विषयोंको छोड़ रहा हूँ और केवल उन्हींकी शरण ले रहा हूँ ॥४७ ॥ परीक्षित्! भगवान्ने राजा खट्वांगकी बुद्धिको पहलेसे ही
अपनी ओर आकर्षित कर रखा था । इसीसे वे अन्त समयमें ऐसा निश्चय कर सके। अब उन्होंने शरीर आदि अनात्म पदार्थोंमें जो अज्ञानमूलक आत्मभाव था, उसका परित्याग कर दिया और अपने वास्तविक आत्मस्वरूपमें स्थित हो गये ॥४८ ॥ वह स्वरूप साक्षात् परब्रह्म
है। वह सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, शून्यके समान ही है । परन्तु वह शून्य नहीं, परम सत्य है । भक्तजन उसी वस्तुको ‘ भगवान् वासुदेव' इस नामसे वर्णन करते हैं ॥४९ ॥
तत ऊर्ध्वं स तत्याज स्त्रीसुखं कर्मणाप्रजाः१ ।
वसिष्ठस्तदनुज्ञातो मदयन्त्यां प्रजामधात् ॥३८
सा वै सप्त समा गर्भमबिभ्रन्न व्यजायत ।
जघ्नेऽश्मनोदरं तस्याः सोऽश्मकस्तेन कथ्यते ॥३९
अश्मकान्मूलको जज्ञे यः स्त्रीभिः परिरक्षितः ।