श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 751–760

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 751–760

पृष्ठ 751

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र्वसुर्नभस्वानरुणश्च सप्तमः । पीठं पुरस्कृत्य चमूपतिं मृधे भौमप्रयुक्ता निरगन् धृतायुधाः ॥१२ प्रायुंजतासाद्य शरानसीन् गदाः

शक्त्यृष्टिशूलान्यजिते रुषोल्बणाः ।

तच्छस्त्रकूटं भगवान् स्वमार्गणै- रमोघवीर्यस्तिलशश्चकर्त ह ॥१३

तान् पीठमुख्याननयद् यमक्षयं

निकृत्तशीर्षोरुभुजाङ्घ्रिवर्मणः ।

स्वानीकपानच्युतचक्रसायकै- स्तथा निरस्तान् नरको धरासुतः ॥१४

निरीक्ष्य दुर्मर्षण आस्रवन्मदै- र्गजैः पयोधिप्रभवैर्निराक्रमत् । दृष्ट्वा सभार्यं गरुडोपरि स्थितं सूर्योपरिष्टात् सतडिद्धनं यथा । कृष्णं स तस्मै व्यसृजच्छतघ्नीं योधाश्च सर्वे युगपत् स्म विव्यधुः ॥१५ तद् भौमसैन्यं भगवान् गदाग्रजो विचित्रवाजैर्निशितैः शिलीमुखैः । निकृत्तबाहूरुशिरोध्रविग्रहं चकार तर्ह्येव हताश्वकुञ्जरम् ॥१६

यानि योधैः प्रयुक्तानि शस्त्रास्त्राणि कुरूद्वह ।

हरिस्तान्यच्छिनत्तीक्ष्णैः शरैरेकैकशस्त्रिभिः ॥१७

उह्यमानः सुपर्णेन पक्षाभ्यां निघ्नता गजान् ।

गरुत्मता हन्यमानास्तुण्डपक्षनखैर्गजाः ॥१८

पुरमेवाविशन्नार्ता नरको युध्ययुध्यत ।

दृष्ट्वा विद्रावितं सैन्यं गरुडेनार्दितं स्वकम् ॥१९

पृष्ठ 752

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तं भौमः प्राहरच्छक्त्या वज्रः प्रतिहतो यतः ।

नाकम्पत तया विद्धो मालाहत इव द्विपः ॥२०

शूलं भौमो ऽच्युतं हन्तुमाददे वितथोद्यमः ।

तद्विसर्गात् पूर्वमेव नरकस्य शिरो हरिः ।

अपाहरद् गजस्थस्य चक्रेण क्षुरनेमिना ॥२१

सकुण्डलं चारुकिरीटभूषणं बभौ पृथिव्यां पतितं समुज्ज्वलत् । हाहेति साध्वित्यृषयः सुरेश्वरा माल्यैर्मुकुन्दं विकिरन्त ईडिरे ॥२२ ततश्च भूः कृष्णमुपेत्य कुण्डले प्रतप्तजाम्बूनदरत्नभास्वरे । सवैजयन्त्या वनमालयार्पयत् प्राचेतसं छत्रमथो महामणिम् ॥२३ परीक्षित्! भौमासुरके सैनिकोंने भगवान्पर जो-जो अस्त्र- शस्त्र चलाये थे, उनमेंसे प्रत्येकको भगवान्ने तीन- तीन तीखे बाणोंसे काट गिराया ॥१७॥ उस समय भगवान्

श्रीकृष्ण गरुड़जीपर सवार थे और गरुड़जी अपने पंखोंसे हाथियोंको मार रहे थे । उनकी चोंच, पंख और पंजोंकी मारसे हाथियोंको बड़ी पीड़ा हुई और वे सब- के - सब आर्त होकर युद्धभूमिसे भागकर नगरमें घुस गये । अब वहाँ अकेला भौमासुर ही लड़ता रहा । जब उसने देखा कि गरुड़जीकी मारसे पीड़ित होकर मेरी सेना भाग रही है, तब उसने उनपर वह शक्ति चलायी, जिसने वज्रको भी विफल कर दिया था । परन्तु उसकी चोटसे पक्षिराज गरुड़ तनिक भी विचलित न हुए, मानो किसीने मतवाले गजराजपर फूलोंकी मालासे प्रहार किया हो ॥१८-२० ॥ अब भौमासुरने देखा कि मेरी एक भी चाल नहीं चलती, सारे उद्योग विफल होते जा रहे हैं, तब उसने श्रीकृष्णको मार डालनेके लिये एक त्रिशूल उठाया । परन्तु उसे अभी वह छोड़ भी न पाया था कि भगवान् श्रीकृष्णने छुरेके समान तीखी धारवाले चक्रसे हाथीपर बैठे हुए भौमासुरका सिर काट डाला ॥ २१ ॥ उसका जगमगाता हुआ सिर कुण्डल

और सुन्दर किरीटके सहित पृथ्वीपर गिर पड़ा । उसे देखकर भौमासुरके सगे - सम्बन्धी हाय-हाय पुकार उठे, ऋषिलोग 'साधु साधु' कहने लगे और देवतालोग भगवान्पर पुष्पोंकी वर्षा करते हुए स्तुति करने लगे ॥२२ ॥

अब पृथ्वी भगवान्के पास आयी । उसने भगवान् श्रीकृष्णके गलेमें वैजयन्तीके साथ वनमाला पहना दी और अदिति माताके जगमगाते हुए कुण्डल, जो तपाये हुए सोनेके एवं रत्नजटित थे, भगवान्को दे दिये तथा वरुणका छत्र और साथ ही एक महामणि भी उनको दी ॥२३ ॥ राजन्! इसके बाद पृथ्वीदेवी बड़े - बड़े देवताओंके द्वारा पूजित विश्वेश्वर भगवान्

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श्रीकृष्णको प्रणाम करके हाथ जोड़कर भक्तिभावभरे हृदयसे उनकी स्तुति करने लगीं ॥२४ ॥

अस्तौषीदथ विश्वेशं देवी देववरार्चितम् ।

प्रांजलिः प्रणता राजन् भक्तिप्रवणया धिया ॥२४

भूमिरुवाच

नमस्ते देवदेवेश शंखचक्रगदाधर ।

भक्तेच्छोपात्तरूपाय परमात्मन् नमोऽस्तु ते ॥२५

नमः पंकजनाभाय नमः पंकजमालिने ।

नमः पंकजनेत्राय नमस्ते पंकजाङ्घ्रये ॥२६

नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय विष्णवे ।

पुरुषायादिबीजाय पूर्णबोधाय ते नमः ॥२७

अजाय जनयित्रेऽस्य ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये ।

परावरात्मन् भूतात्मन् परमात्मन् नमोऽस्तु ते ॥२८

त्वं वै सिसृक्षू रज उत्कटं प्रभो तमो निरोधाय बिभर्ष्यसंवृतः । स्थानाय सत्त्वं जगतो जगत्पते कालः प्रधानं पुरुषो भवान् परः ॥२९ अहं पयो ज्योतिरथानिलो नभो मात्राणि देवा मन इन्द्रियाणि । कर्ता महानित्यखिलं चराचरं त्वय्यद्वितीये भगवन्नयं भ्रमः ॥३० पृथ्वीदेवीने कहा— शंखचक्रगदाधारी देव-देवेश्वर! मैं आपको नमस्कार करती हूँ । परमात्मन्! आप अपने भक्तोंकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये उसीके अनुसार रूप प्रकट किया करते हैं । आपको मैं नमस्कार करती हूँ ॥ २५ ॥ प्रभो! आपकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है ।

आप कमलकी माला पहनते हैं । आपके नेत्र कमलसे खिले हुए और शान्तिदायक हैं । आपके चरण कमलके समान सुकुमार और भक्तोंके हृदयको शीतल करनेवाले हैं । आपको मैं बार-बार नमस्कार करती हूँ ॥ २६ ॥ आप समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, सम्पत्ति, ज्ञान और वैराग्यके

आश्रय हैं । आप सर्वव्यापक होनेपर भी स्वयं वसुदेवनन्दनके रूपमें प्रकट हैं । मैं आपको

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नमस्कार करती हूँ । आप ही पुरुष हैं और समस्त कारणोंके भी परम कारण हैं । आप स्वयं पूर्ण ज्ञानस्वरूप हैं । मैं आपको नमस्कार करती हूँ ॥ २७ ॥ आप स्वयं तो हैं जन्मरहित, परन्तु

इस जगत्के जन्मदाता आप ही हैं । आप ही अनन्त शक्तियोंके आश्रय ब्रह्म हैं । जगत्का जो कुछ भी कार्य - कारणमय रूप है, जितने भी प्राणी या अप्राणी हैं - सब आपके ही स्वरूप हैं । परमात्मन्! आपके चरणोंमें मेरे बार- बार नमस्कार ॥२८ ॥

प्रभो! जब आप जगत्की रचना करना चाहते हैं, तब उत्कट रजोगुणको, और जब इसका प्रलय करना चाहते हैं तब तमोगुणको, तथा जब इसका पालन करना चाहते हैं तब सत्त्वगुणको स्वीकार करते हैं । परन्तु यह सब करनेपर भी आप इन गुणोंसे ढकते नहीं, लिप्त नहीं होते । जगत्पते! आप स्वयं ही प्रकृति, पुरुष और दोनोंके संयोग - वियोगके हेतु काल हैं तथा उन तीनोंसे परे भी हैं ॥ २ ९ ॥ भगवन्! मैं ( पृथ्वी ), जल, अग्नि, वायु, आकाश, पंचतन्मात्राएँ, मन, इन्द्रिय और इनके अधिष्ठातृ - देवता, अहंकार और महत्तत्त्व- कहाँतक कहूँ, यह सम्पूर्ण चराचर जगत् आपके अद्वितीय स्वरूपमें भ्रमके कारण ही पृथक् प्रतीत हो रहा है ॥३० ॥ शरणागत- भय- भंजन प्रभो! मेरे पुत्र भौमासुरका यह पुत्र भगदत्त अत्यन्त

भयभीत हो रहा है । मैं इसे आपके चरणकमलोंकी शरणमें ले आयी हूँ । प्रभो! आप इसकी रक्षा कीजिये और इसके सिरपर अपना वह करकमल रखिये जो सारे जगत्के समस्त पाप-तापोंको नष्ट करनेवाला है ॥३१ ॥

तस्यात्मजोऽयं तव पादपंकजं भीतः प्रपन्नार्तिहरोपसादितः । तत् पालयैनं कुरु हस्तपंकजं शिरस्यमुष्याखिलकल्मषापहम् ॥ ३१ श्रीशुक उवाच

इति भूम्यार्थितो वाग्भिर्भगवान् भक्तिनम्रया ।

दत्त्वाभयं भौमगृहं प्राविशत् सकलर्द्धिमत् ॥३२

तत्र राजन्यकन्यानां षट्सहस्राधिकायुतम् ।

भौमाहृतानां विक्रम्य राजभ्यो ददृशे हरिः ॥ ३३

तं प्रविष्टं स्त्रियो वीक्ष्य नरवीरं विमोहिताः ।

मनसा वव्रिरेऽभीष्टं पतिं दैवोपसादितम् ॥३४

भूयात् पतिरयं मह्यं धाता तदनुमोदताम् ।

इति सर्वाः पृथक् कृष्णे भावेन हृदयं दधुः ॥ ३५

ताः प्राहिणोद् द्वारवतीं सुमृष्टविरजोऽम्बराः ।

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नरयानैर्महाकोशान् रथाश्वान् द्रविणं महत् ॥३६

ऐरावतकुलेभांश्च चतुर्दन्तांस्तरस्विनः ।

पाण्डुरांश्च चतुःषष्टिं प्रेषयामास केशवः ॥३७

गत्वा सुरेन्द्रभवनं दत्त्वादित्यै च कुण्डले ।

पूजितस्त्रिदशेन्द्रेण सहेन्द्राण्या च सप्रियः ॥३८

चोदितो भार्ययोत्पाट्य पारिजातं गरुत्मति ।

आरोप्य सेन्द्रान् विबुधान् निर्जित्योपानयत् पुरम् ॥३९

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! जब पृथ्वीने भक्तिभावसे विनम्र होकर इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति-प्रार्थना की, तब उन्होंने भगदत्तको अभयदान दिया और भौमासुरके समस्त सम्पत्तियोंसे सम्पन्न महलमें प्रवेश किया || ३२ || वहाँ जाकर भगवान्ने देखा कि भौमासुरने बलपूर्वक राजाओंसे सोलह हजार राजकुमारियाँ छीनकर अपने यहाँ रख छोड़ी थीं ॥३३ ॥ जब उन राजकुमारियोंने अन्तःपुरमें पधारे हुए नरश्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्णको

देखा, तब वे मोहित हो गयीं और उन्होंने उनकी अहैतुकी कृपा तथा अपना सौभाग्य समझकर मन- ही - मन भगवान्‌को अपने परम प्रियतम पतिके रूपमें वरण कर लिया ॥३४ ॥

उन राजकुमारियोंमेंसे प्रत्येकने अलग- अलग अपने मनमें यही निश्चय किया कि ‘ ये श्रीकृष्ण ही मेरे पति हों और विधाता मेरी इस अभिलाषाको पूर्ण करें । ' इस प्रकार उन्होंने प्रेम- भावसे अपना हृदय भगवान्के प्रति निछावर कर दिया || ३५ || तब भगवान् श्रीकृष्णने उन राजकुमारियोंको सुन्दर- सुन्दर निर्मल वस्त्राभूषण पहनाकर पालकियोंसे द्वारका भेज दिया और उनके साथ ही बहुत-से खजाने, रथ, घोड़े तथा अतुल सम्पत्ति भी भेजी ॥ ३६ ॥

ऐरावतके वंशमें उत्पन्न हुए अत्यन्त वेगवान् चार-चार दाँतोंवाले सफेद रंगके चौंसठ हाथी भी भगवान्ने वहाँसे द्वारका भेजे ॥३७ ॥

इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण अमरावतीमें स्थित देवराज इन्द्रके महलोंमें गये । वहाँ देवराज इन्द्रने अपनी पत्नी इन्द्राणीके साथ सत्यभामाजी और भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा की, तब भगवान्ने अदितिके कुण्डल उन्हें दे दिये || ३८ || वहाँसे लौटते समय सत्यभामाजीकी प्रेरणासे भगवान् श्रीकृष्णने कल्पवृक्ष उखाड़कर गरुड़पर रख लिया और देवराज इन्द्र तथा समस्त देवताओंको जीतकर उसे द्वारकामें ले आये ॥ ३ ९ ॥ भगवान्ने उसे सत्यभामाके महलके बगीचेमें लगा दिया । इससे उस बगीचेकी शोभा अत्यन्त बढ़ गयी । कल्पवृक्षके साथ उसके गन्ध और मकरन्दके लोभी भौंरे स्वर्गसे द्वारकामें चले आये थे || ४० ॥ परीक्षित्! देखो तो सही, जब इन्द्रको अपना काम बनाना था, तब तो उन्होंने अपना सिर झुकाकर मुकुटकी नोकसे भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंका स्पर्श करके उनसे सहायताकी भिक्षा माँगी थी, परन्तु जब काम बन गया, तब उन्होंने उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णसे लड़ाई ठान ली । सचमुच ये देवता भी बड़े तमोगुणी हैं और सबसे बड़ा दोष तो उनमें धनाढ्यताका है । धिक्कार है ऐसी

पृष्ठ 756

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धनाढ्यताको ॥४१ ॥

स्थापितः सत्यभामाया गृहोद्यानोपशोभनः ।

अन्वगुर्भ्रमराः स्वर्गात् तद्गन्धासवलम्पटाः ॥४०

ययाच आनम्य किरीटकोटिभिः

पादौ स्पृशन्नच्युतमर्थसाधनम् ।

सिद्धार्थ एतेन विगृह्यते महा- नहो सुराणां च तमो धिगाढ्यताम् ॥४१

अथो मुहूर्त एकस्मिन् नानागारेषु ताः स्त्रियः ।

यथोपयेमे भगवांस्तावद्रूपधरोऽव्ययः ॥४२

गृहेषु तासामनपाय्यतर्क्यकृ- न्निरस्तसाम्यातिशयेष्ववस्थितः । रेमे रमाभिर्निजकामसंप्लुतो यथेतरो गार्हकमेधिकांश्चरन् ॥४३ इत्थं रमापतिमवाप्य पतिं स्त्रियस्ता

ब्रह्मादयोऽपि न विदुः पदवीं यदीयाम् ।

भेजुर्मुदाविरतमेधितयानुराग- हासावलोकनवसंगमजल्पलज्जाः ॥ ४४

तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने एक ही मुहूर्तमें अलग- अलग भवनोंमें अलग - अलग रूप धारण करके एक ही साथ सब राजकुमारियोंका शास्त्रोक्त विधिसे पाणिग्रहण किया । सर्वशक्तिमान् अविनाशी भगवान्‌के लिये इसमें आश्चर्यकी कौन- सी बात है ॥४२ ॥ परीक्षित्!

भगवान्की पत्नियोंके अलग-अलग महलोंमें ऐसी दिव्य सामग्रियाँ भरी हुई थीं, जिनके बराबर जगत्में कहीं भी और कोई भी सामग्री नहीं है; फिर अधिककी तो बात ही क्या है । उन महलोंमें रहकर मति- गतिके परेकी लीला करनेवाले अविनाशी भगवान् श्रीकृष्ण अपने आत्मानन्दमें मग्न रहते हुए लक्ष्मीजीकी अंशस्वरूपा उन पत्नियोंके साथ ठीक वैसे ही विहार करते थे, जैसे कोई साधारण मनुष्य घर- गृहस्थीमें रहकर गृहस्थ धर्मके अनुसार आचरण करता हो ॥४३ ॥ परीक्षित्! ब्रह्मा आदि बड़े - बड़े देवता भी भगवान्‌के वास्तविक स्वरूपको

और उनकी प्राप्तिके मार्गको नहीं जानते । उन्हीं रमारमण भगवान् श्रीकृष्णको उन स्त्रियोंने पतिके रूपमें प्राप्त किया था । अब नित्य- निरन्तर उनके प्रेम और आनन्दकी अभिवृद्धि होती रहती थी और वे प्रेमभरी मुसकराहट, मधुर चितवन, नवसमागम, प्रेमालाप तथा भाव बढ़ानेवाली लज्जासे युक्त होकर सब प्रकारसे भगवान्की सेवा करती रहती थीं । ४४ ॥ उनमेंसे सभी पत्नियोंके साथ सेवा करनेके लिये सैकड़ों दासियाँ रहतीं, फिर भी जब उनके

पृष्ठ 757

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महलमें भगवान् पधारते तब वे स्वयं आगे जाकर आदरपूर्वक उन्हें लिवा लातीं, श्रेष्ठ आसनपर बैठातीं, उत्तम सामग्रियोंसे पूजा करतीं, चरणकमल पखारतीं, पान लगाकर खिलातीं, पाँव दबाकर थकावट दूर करतीं, पंखा झलतीं, इत्र-फुलेल, चन्दन आदि लगातीं, फूलोंके हार पहनातीं, केश सँवारतीं, सुलातीं, स्नान करातीं और अनेक प्रकारके भोजन कराकर अपने ही हाथों भगवान्की सेवा करतीं ॥४५ ॥

प्रत्युद्गमासनवरार्हणपादशीच- ताम्बूलविश्रमणवीजनगन्धमाल्यैः ।

केशप्रसारशयनस्नपनोपहार्यै- र्दासीशता अपि विभोर्विदधुः स्म दास्यम् ॥ ४५

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे पारिजातहरणनरकवधो नाम एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥५९ ॥

पृष्ठ 758

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अथ षष्टितमोऽध्यायः श्रीकृष्ण - रुक्मिणी - संवाद श्रीशुक उवाच

कर्हिचित् सुखमासीनं स्वतल्पस्थं जगद्गुरुम् ।

पतिं पर्यचरद् भैष्मी व्यजनेन सखीजनैः ॥१

यस्त्वेतल्लीलया विश्वं सृजत्यत्त्यवतीश्वरः ।

स हि जातः स्वसेतूनां गोपीथाय यदुष्वजः ॥ २

तस्मिन्नन्तर्गृहे भ्राजन्मुक्तादामविलम्बिना ।

विराजिते वितानेन दीपैर्मणिमयैरपि ॥३

मल्लिकादामभिः पुष्पैर्द्विरेफकुलनादितैः ।

जालरन्ध्रप्रविष्टैश्च गोभिश्चन्द्रमसोऽमलैः ॥ ४

पारिजातवनामोदवायुनोद्यानशालिना ।

धूपैरगुरुजे राजन् जालरन्ध्रविनिर्गतैः ॥५

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! एक दिन समस्त जगत्के परमपिता और ज्ञानदाता भगवान् श्रीकृष्ण रुक्मिणीजीके पलँगपर आरामसे बैठे हुए थे । भीष्मकनन्दिनी श्रीरुक्मिणीजी सखियोंके साथ अपने पतिदेवकी सेवा कर रही थीं, उन्हें पंखा झल रही थीं ॥१ ॥ परीक्षित्! जो सर्वशक्तिमान् भगवान् खेल- खेलमें ही इस जगत्की रचना, रक्षा और

प्रलय करते हैं - वही अजन्मा प्रभु अपनी बनायी हुई धर्म-मर्यादाओंकी रक्षा करनेके लिये यदुवंशियोंमें अवतीर्ण हुए हैं ॥२ ॥ रुक्मिणीजीका महल बड़ा ही सुन्दर था । उसमें ऐसे - ऐसे

चँदोवे तने हुए थे, जिनमें मोतियोंकी लड़ियोंकी झालरें लटक रही थीं । मणियोंके दीपक जगमगा रहे थे ॥३ ॥ बेला- चमेलीके फूल और हार मँह मँह मँहक रहे थे । फूलोंपर झुंड- के-झुंड भौरे गुंजार कर रहे थे । सुन्दर- सुन्दर झरोखोंकी जालियोंमेंसे चन्द्रमाकी शुभ्र किरणें

महलके भीतर छिटक रही थीं ॥४ ॥ उद्यानमें पारिजातके उपवनकी सुगन्ध लेकर मन्द मन्द

शीतल वायु चल रही थी । झरोखोंकी जालियोंमेंसे अगरके धूपका धूआँ बाहर निकल रहा था ॥५ ॥ ऐसे महलमें दूधके फेनके समान कोमल और उज्ज्वल बिछौनोंसे युक्त सुन्दर

पलँगपर भगवान् श्रीकृष्ण बड़े आनन्दसे विराजमान थे और रुक्मिणीजी त्रिलोकीके स्वामीको पतिरूपमें प्राप्त करके उनकी सेवा कर रही थीं || ६ || रुक्मिणीजीने अपनी सखीके हाथसे वह चँवर ले लिया, जिसमें रत्नोंकी डाँडी लगी थी और परमरूपवती लक्ष्मीरूपिणी देवी रुक्मिणीजी उसे डुला-डुलाकर भगवान्‌की सेवा करने लगीं || ७|| उनके

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करकमलोंमें जड़ाऊ अंगूठियाँ, कंगन और चँवर शोभा पा रहे थे । चरणोंमें मणिजटित पायजेब रुनझुन - रुनझुन कर रहे थे । अंचलके नीचे छिपे हुए स्तनोंकी केशरकी लालिमासे हार लाल- लाल जान पड़ता था और चमक रहा था । नितम्बभागमें बहुमूल्य करधनीकी लड़ियाँ लटक रही थीं । इस प्रकार वे भगवान्‌के पास ही रहकर उनकी सेवामें संलग्न थीं ॥८ ॥ रुक्मिणीजीकी घुँघराली अलकें, कानोंके कुण्डल और गलेके स्वर्णहार अत्यन्त

विलक्षण थे। उनके मुखचन्द्रसे मुसकराहटकी अमृतवर्षा हो रही थी । ये रुक्मिणीजी अलौकिक रूपलावण्यवती लक्ष्मीजी ही तो हैं । उन्होंने जब देखा कि भगवान्ने लीलाके लिये मनुष्यका- सा शरीर ग्रहण किया है, तब उन्होंने भी उनके अनुरूप रूप प्रकट कर दिया । भगवान् श्रीकृष्ण यह देखकर बहुत प्रसन्न हुए कि रुक्मिणीजी मेरे परायण हैं, मेरी अनन्य प्रेयसी हैं । तब उन्होंने बड़े प्रेमसे मुसकराते हुए उनसे कहा ॥९ ॥

पयःफेननिभे शुभ्रे पर्यंके कशिपूत्तमे ।

उपतस्थे सुखासीनं जगतामीश्वरं पतिम् ॥६

वालव्यजनमादाय रत्नदण्डं सखीकरात् ।

तेन वीजयती देवी उपासांचक्र ईश्वरम् ॥७

सोपाच्युतं क्वणयती मणिनूपुराभ्यां

रेजेऽङ्गुलीयवलयव्यजनाग्रहस्ता ।

वस्त्रान्तगूढकुचकुंकुमशोणहार- भासा नितम्बधृतया च परार्घ्यकाञ्चया ॥ ८

तां रूपिणीं श्रियमनन्यगतिं निरीक्ष्य

या लीलया धृततनोरनुरूपरूपा ।

प्रीतः स्मयन्नलककुण्डलनिष्ककण्ठ- वक्त्रोल्लसत्स्मितसुधां हरिराबभाषे ॥९

श्रीभगवानुवाच

राजपुत्रीप्सिता भूपैर्लोकपालविभूतिभिः ।

महानुभावैः श्रीमद्भी रूपौदार्यबलोर्जितैः ॥ १०

तान् प्राप्तानर्थिनो हित्वा चैद्यादीन् स्मरदुर्मदान् ।

दत्ता भ्रात्रा स्वपित्रा च कस्मान्नो ववृषेऽसमान् ॥११

भगवान् श्रीकृष्णने कहा - राजकुमारी! बड़े -बड़े नरपति, जिनके पास लोकपालोंके समान ऐश्वर्य और सम्पत्ति है, जो बड़े महानुभाव और श्रीमान् हैं तथा सुन्दरता, उदारता और बलमें भी बहुत आगे बढ़े हुए हैं, तुमसे विवाह करना चाहते थे || १० || तुम्हारे पिता और भाई

पृष्ठ 760

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भी उन्हींके साथ तुम्हारा विवाह करना चाहते थे, यहाँतक कि उन्होंने वाग्दान भी कर दिया था। शिशुपाल आदि बड़े -बड़े वीरोंको, जो कामोन्मत्त होकर तुम्हारे याचक बन रहे थे, तुमने छोड़ दिया और मेरे - जैसे व्यक्तिको, जो किसी प्रकार तुम्हारे समान नहीं है, अपना पति स्वीकार किया । ऐसा तुमने क्यों किया? ॥ ११ ॥ सुन्दरी! देखो, हम जरासन्ध आदि

राजाओंसे डरकर समुद्रकी शरणमें आ बसे हैं । बड़े-बड़े बलवानोंसे हमने वैर बाँध रखा है और प्रायः राजसिंहासनके अधिकारसे भी हम वंचित ही हैं ॥१२ ॥ सुन्दरी! हम किस मार्गके

अनुयायी हैं, हमारा कौन - सा मार्ग है, यह भी लोगोंको अच्छी तरह मालूम नहीं है । हमलोग लौकिक व्यवहारका भी ठीक-ठीक पालन नहीं करते, अनुनय- विनयके द्वारा स्त्रियोंको रिझाते भी नहीं । जो स्त्रियाँ हमारे- जैसे पुरुषोंका अनुसरण करती हैं, उन्हें प्रायः क्लेश- ही-क्लेश भोगना पड़ता है ॥ १३ ॥ सुन्दरी! हम तो सदाके अकिंचन हैं । न तो हमारे पास कभी

कुछ था और न रहेगा । ऐसे ही अकिंचन लोगों से हम प्रेम भी करते हैं और वे लोग भी हमसे प्रेम करते हैं । यही कारण है कि अपनेको धनी समझनेवाले लोग प्रायः हमसे प्रेम नहीं करते, हमारी सेवा नहीं करते ॥१४ ॥ जिनका धन, कुल, ऐश्वर्य, सौन्दर्य और आय अपने समान

होती है— उन्हींसे विवाह और मित्रताका सम्बन्ध करना चाहिये । जो अपनेसे श्रेष्ठ या अधम हों, उनसे नहीं करना चाहिये ॥ १५ ॥ विदर्भराजकुमारी! तुमने अपनी अदूरदर्शिताके कारण

इन बातोंका विचार नहीं किया और बिना जाने -बूझे भिक्षुकोंसे मेरी झूठी प्रशंसा सुनकर मुझ गुणहीनको वरण कर लिया ॥१६ ॥ अब भी कुछ बिगड़ा नहीं है । तुम अपने अनुरूप किसी

श्रेष्ठ क्षत्रियको वरण कर लो । जिसके द्वारा तुम्हारी इहलोक और परलोककी सारी आशा-अभिलाषाएँ पूरी हो सकें || १७ || सुन्दरी! तुम जानती ही हो कि शिशुपाल, शाल्व, जरासन्ध, दन्तवक्त्र आदि नरपति और तुम्हारा बड़ा भाई रुक्मी-सभी मुझसे द्वेष करते थे ॥१८ ॥

कल्याणी! वे सब बल - पौरुषके मदसे अंधे हो रहे थे, अपने सामने किसीको कुछ नहीं गिनते थे । उन दुष्टोंका मान मर्दन करनेके लिये ही मैंने तुम्हारा हरण किया था और कोई कारण नहीं था ॥१९ ॥ निश्चय ही हम उदासीन हैं । हम स्त्री, सन्तान और धनके लोलुप नहीं हैं । निष्क्रिय

और देह- गेहसे सम्बन्धरहित दीपशिखाके समान साक्षीमात्र हैं । हम अपने आत्माके साक्षात्कारसे ही पूर्णकाम हैं, कृतकृत्य हैं ॥२० ॥

राजभ्यो बिभ्यतः सुभ्रूः समुद्रं शरणं गतान् ।

बलवद्भिः कृतद्वेषान् प्रायस्त्यक्तनृपासनान् ॥१२

अस्पष्टवर्त्मनां पुंसामलोकपथमीयुषाम् ।

आस्थिताः पदवीं सुभ्रूः प्रायः सीदन्ति योषितः ॥१३

निष्किंचना वयं शश्वन्निष्किंचनजनप्रियाः ।

तस्मात् प्रायेण न ह्याढ्या मां भजन्ति सुमध्यमे ॥१४

ययोरात्मसमं वित्तं जन्मैश्वर्याकृतिर्भवः ।