श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 761–770
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 761–770
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तयोर्विवाहो मैत्री च नोत्तमाधमयोः क्वचित् ॥१५
वैदर्म्येतदविज्ञाय त्वयादीर्घसमीक्षया ।
वृता वयं गुणैर्हीना भिक्षुभिः श्लाघिता मुधा ॥ १६
अथात्मनोऽनुरूपं वै भजस्व क्षत्रियर्षभम् ।
येन त्वमाशिषः सत्या इहामुत्र च लप्स्यसे ॥१७
चैद्यशाल्वजरासन्धदन्तवक्त्रादयो नृपाः ।
मम द्विषन्ति वामोरु रुक्मी चापि तवाग्रजः ॥१८
तेषां वीर्यमदान्धानां दृप्तानां स्मयनुत्तये ।
आनीतासि मया भद्रे तेजोऽपहरतासताम् ॥१९
उदासीना वयं नूनं न स्त्र्यपत्यार्थकामुकाः ।
आत्मलब्ध्याऽऽस्महे पूर्णा गेहयोर्ज्योतिरक्रियाः ॥ २०
श्रीशुक उवाच
एतावदुक्त्वा भगवानात्मानं वल्लभामिव ।
मन्यमानामविश्लेषात् तद्दर्पघ्न उपारमत् ॥२१
इति त्रिलोकेशपतेस्तदाऽऽत्मनः
प्रियस्य देव्यश्रुतपूर्वमप्रियम् ।
आश्रुत्य भीता हृदि जातवेपथु- श्चिन्तां दुरन्तां रुदती जगाम ह ॥२२
पदा सुजातेन नखारुणश्रिया भुवं लिखन्त्यश्रुभिरंजनासितैः । आसिंचती कुंकुमरूषितौ स्तनौ तस्थावधोमुख्यतिदुःखरुद्धवाक् ॥२३ तस्याः सुदुःखभयशोकविनष्टबुद्धे- र्हस्ताच्छ्लथद्वलयतो व्यजनं पपात । देहश्च विक्लवधियः सहसैव मुह्यन् रम्भेव वायुविहता प्रविकीर्य केशान् ॥२४ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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तद् दृष्ट्वा भगवान् कृष्णः प्रियायाः प्रेमबन्धनम् ।
हास्यप्रौढिमजानन्त्याः करुणः सोऽन्वकम्पत ॥२५
पर्यंकादवरुह्याशु तामुत्थाप्य चतुर्भुजः ।
केशान् समुह्य तद्वक्त्रं प्रामृजत् पद्मपाणिना ॥२६
प्रमृज्याश्रुकले नेत्रे स्तनौ चोपहतौ शुचा ।
आश्लिष्य बाहुना राजन्ननन्यविषयां सतीम् ॥२७
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके क्षणभरके लिये भी अलग न होनेके कारण रुक्मिणीजीको यह अभिमान हो गया था कि मैं इनकी सबसे अधिक प्यारी हूँ । इसी गर्वकी शान्तिके लिये इतना कहकर भगवान् चुप हो गये || २१ || परीक्षित्! जब रुक्मिणीजीने अपने परम प्रियतम पति त्रिलोकेश्वर भगवान्की यह अप्रिय वाणी सुनी– जो पहले कभी नहीं सुनी थी, तब वे अत्यन्त भयभीत हो गयीं; उनका हृदय धड़कने लगा, वे रोते - रोते चिन्ताके अगाध समुद्रमें डूबने - उतराने लगीं ॥२२ ॥ वे अपने कमलके समान
कोमल और नखोंकी लालिमासे कुछ- कुछ लाल प्रतीत होनेवाले चरणोंसे धरती कुरेदने लगीं । अंजनसे मिले हुए काले- काले आँसू केशरसे रँगे हुए वक्षःस्थलको धोने लगे। मुँह नीचेको लटक गया । अत्यन्त दुःखके कारण उनकी वाणी रुक गयी और वे ठिठकी - सी रह गयीं ॥२३ ॥ अत्यन्त व्यथा, भय और शोकके कारण विचारशक्ति लुप्त हो गयी, वियोगकी
सम्भावनासे वे तत्क्षण इतनी दुबली हो गयीं कि उनकी कलाईका कंगनतक खिसक गया । हाथका चँवर गिर पड़ा, बुद्धिकी विकलताके कारण वे एकाएक अचेत हो गयीं, केश बिखर गये और वे वायुवेगसे उखड़े हुए केलेके खंभेकी तरह धरतीपर गिर पड़ीं ॥ २४ ॥ भगवान्
श्रीकृष्णने देखा कि मेरी प्रेयसी रुक्मिणीजी हास्य - विनोदकी गम्भीरता नहीं समझ रही हैं और प्रेम- पाशकी दृढ़ताके कारण उनकी यह दशा हो रही है । स्वभावसे ही परम कारुणिक भगवान् श्रीकृष्णका हृदय उनके प्रति करुणासे भर गया ॥ २५ ॥ चार भुजाओंवाले वे
भगवान् उसी समय पलँगसे उतर पड़े और रुक्मिणीजीको उठा लिया तथा उनके खुले हुए केशपाशोंको बाँधकर अपने शीतल करकमलोंसे उनका मुँह पोंछ दिया || २६ || भगवान्ने उनके नेत्रोंके आँसू और शोकके आँसुओंसे भींगे हुए स्तनोंको पोंछकर अपने प्रति अनन्य प्रेमभाव रखनेवाली उन सती रुक्मिणीजीको बाँहोंमें भरकर छातीसे लगा लिया ॥ २७ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण समझाने - बुझानेमें बड़े कुशल और अपने प्रेमी भक्तोंके एकमात्र आश्रय हैं । जब उन्होंने देखा कि हास्यकी गम्भीरताके कारण रुक्मिणीजीकी बुद्धि चक्करमें पड़ गयी है और वे अत्यन्त दीन हो रही हैं, तब उन्होंने इस अवस्थाके अयोग्य अपनी प्रेयसी रुक्मिणीजीको समझाया ॥२८ ॥
सान्त्वयामास सान्त्वज्ञः कृपया कृपणां प्रभुः ।
हास्यप्रौढिभ्रमच्चित्तामतदर्हां सतां गतिः ॥२८
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श्रीभगवानुवाच
मा मा वैदर्भ्यसूयेथा जाने त्वां मत्परायणाम् ।
त्वद्वचः श्रोतुकामेन क्ष्वेल्याऽऽचरितमंगने ॥२९
मुखं च प्रेमसंरम्भस्फुरिताधरमीक्षितुम् ।
कटाक्षेपारुणापांगं सुन्दरभ्रुकुटीतटम् ॥३०
अयं हि परमो लाभो गृहेषु गृहमेधिनाम् ।
यन्नर्मैर्नीयते यामः प्रियया भीरु भामिनि ॥३१
श्रीशुक उवाच
सैवं भगवता राजन् वैदर्भी परिसान्त्विता ।
ज्ञात्वा तत्परिहासोक्तिं प्रियत्यागभयं जहौ ॥३२
बभाष ऋषभं पुंसां वीक्षन्ती भगवन्मुखम् ।
सव्रीडहासरुचिरस्निग्धापांगेन भारत ॥३३
रुक्मिण्युवाच नन्वेवमेतदरविन्दविलोचनाद । यद् वै भवान् भगवतोऽसदृशी विभूम्नः । क्व स्वे महिम्न्यभिरतो भगवांस्त्र्यधीशः क्वाहं गुणप्रकृतिरज्ञगृहीतपादा ॥३४ भगवान् श्रीकृष्णने कहा – विदर्भनन्दिनी! तुम मुझसे बुरा मत मानना । मुझसे रूठना नहीं । मैं जानता हूँ कि तुम एकमात्र मेरे ही परायण हो । मेरी प्रिय सहचरी! तुम्हारी प्रेमभरी बात सुननेके लिये ही मैंने हँसी- हँसीमें यह छलना की थी ॥ २ ९ ॥ मैं देखना चाहता था कि मेरे यों कहनेपर तुम्हारे लाल-लाल होठ प्रणय- कोपसे किस प्रकार फड़कने लगते हैं । तुम्हारे कटाक्षपूर्वक देखनेसे नेत्रोंमें कैसी लाली छा जाती है और भौंहें चढ़ जानेके कारण तुम्हारा मुँह कैसा सुन्दर लगता है | | ३० || मेरी परमप्रिये! सुन्दरी! घरके काम- धंधोंमें रात - दिन लगे रहनेवाले गृहस्थोंके लिये घर-गृहस्थीमें इतना ही तो परम लाभ है कि अपनी प्रिय अर्द्धांगिनीके साथ हास- परिहास करते हुए कुछ घड़ियाँ सुखसे बिता ली जाती हैं ॥३१ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - राजन्! जब भगवान् श्रीकृष्णने अपनी प्राणप्रियाको इस प्रकार समझाया बुझाया, तब उन्हें इस बातका विश्वास हो गया कि मेरे प्रियतमने केवल परिहासमें ही ऐसा कहा था । अब उनके हृदयसे यह भय जाता रहा कि प्यारे हमें छोड़ देंगे ॥३२ ॥ परीक्षित्! अब वे सलज्ज हास्य और प्रेमपूर्ण मधुर चितवनसे पुरुषभूषण
भगवान् श्रीकृष्णका मुखारविन्द निरखती हुई उनसे कहने लगीं- ॥ ३३ ॥
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रुक्मिणीजीने कहा- कमलनयन! आपका यह कहना ठीक है कि ऐश्वर्य आदि समस्त गुणोंसे युक्त, अनन्त भगवान्के अनुरूप मैं नहीं हूँ। आपकी समानता मैं किसी प्रकार नहीं कर सकती । कहाँ तो अपनी अखण्ड महिमामें स्थित, तीनों गुणोंके स्वामी तथा ब्रह्मा आदि देवताओंसे सेवित आप भगवान; और कहाँ तीनों गुणोंके अनुसार स्वभाव रखनेवाली गुणमयी प्रकृति मैं, जिसकी सेवा कामनाओंके पीछे भटकनेवाले अज्ञानी लोग ही करते ॥३४ ॥ भला, मैं आपके समान कब हो सकती हूँ। स्वामिन्! आपका यह कहना भी ठीक
ही है कि आप राजाओंके भयसे समुद्रमें आ छिपे हैं । परन्तु राजा शब्दका अर्थ पृथ्वीके राजा नहीं, तीनों गुणरूप राजा हैं । मानो आप उन्हींके भयसे अन्तःकरणरूप समुद्रमें चैतन्यघन अनुभूतिस्वरूप आत्माके रूपमें विराजमान रहते हैं । इसमें सन्देह नहीं कि आप राजाओंसे वैर रखते हैं, परन्तु वे राजा कौन हैं? यही अपनी दुष्ट इन्द्रियाँ । इनसे तो आपका वैर है ही । और प्रभो! आप राजसिंहासनसे रहित हैं, यह भी ठीक ही है; क्योंकि आपके चरणोंकी सेवा करनेवालोंने भी राजाके पदको घोर अज्ञानान्धकार समझकर दूरसे ही दुत्कार रखा है । फिर आपके लिये तो कहना ही क्या है || ३५ || आप कहते हैं कि हमारा मार्ग स्पष्ट नहीं है और हम लौकिक पुरुषों - जैसा आचरण भी नहीं करते; यह बात भी निस्सन्देह सत्य है । क्योंकि जो ऋषि- मुनि आपके पादपद्मोंका मकरन्द - रस सेवन करते हैं, उनका मार्ग भी अस्पष्ट रहता है और विषयोंमें उलझे हुए नरपशु उसका अनुमान भी नहीं लगा सकते । और हे अनन्त! आपके मार्गपर चलनेवाले आपके भक्तोंकी भी चेष्टाएँ जब प्रायः अलौकिक ही होती हैं, तब समस्त शक्तियों और ऐश्वर्योंके आश्रय आपकी चेष्टाएँ अलौकिक हों इसमें तो कहना ही क्या है? ॥३६ ॥ आपने अपनेको अकिंचन बतलाया है; परन्तु आपकी अकिंचनता दरिद्रता नहीं
है । उसका अर्थ यह है कि आपके अतिरिक्त और कोई वस्तु न होनेके कारण आप ही सब कुछ हैं । आपके पास रखनेके लिये कुछ नहीं है । परन्तु जिन ब्रह्मा आदि देवताओंकी पूजा सब लोग करते हैं, भेंट देते हैं, वे ही लोग आपकी पूजा करते रहते हैं । आप उनके प्यारे हैं और वे आपके प्यारे हैं । ( आपका यह कहना भी सर्वथा उचित है कि धनाढ्य लोग मेरा भजन नहीं करते; ) जो लोग अपनी धनाढ्यताके अभिमानसे अंधे हो रहे हैं और इन्द्रियोंको तृप्त करनेमें ही लगे हैं, वे न तो आपका भजन- सेवन ही करते और न तो यह जानते हैं कि आप मृत्युके रूपमें उनके सिरपर सवार हैं || ३७ || जगत्में जीवके लिये जितने भी वाञ्छनीय पदार्थ हैं — धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष - उन सबके रूपमें आप ही प्रकट हैं । आप समस्त वृत्तियों – प्रवृत्तियों, साधनों, सिद्धियों और साध्योंके फलस्वरूप हैं । विचारशील पुरुष आपको प्राप्त करनेके लिये सब कुछ छोड़ देते हैं। भगवन्! उन्हीं विवेकी पुरुषोंका आपके साथ सम्बन्ध होना चाहिये । जो लोग स्त्री - पुरुषके सहवाससे प्राप्त होनेवाले सुख या दुःखके वशीभूत हैं, वे कदापि आपका सम्बन्ध प्राप्त करनेके योग्य नहीं हैं || ३८ || यह ठीक है कि भिक्षुकोंने आपकी प्रशंसा की है । परन्तु किन भिक्षुकोंने? उन परमशान्त संन्यासी महात्माओंने आपकी महिमा और प्रभावका वर्णन किया है, जिन्होंने अपराधी- से - अपराधी व्यक्तिको भी दण्ड न देनेका निश्चय कर लिया है । मैंने अदूरदर्शितासे नहीं, इस बातको समझते हुए आपको वरण किया है कि आप सारे जगत्के आत्मा हैं और अपने प्रेमियोंको आत्मदान करते हैं । मैंने ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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जान- बूझकर उन ब्रह्मा और देवराज इन्द्र आदिका भी इसलिये परित्याग कर दिया है कि आपकी भौंहोंके इशारेसे पैदा होनेवाला काल अपने वेगसे उनकी आशा - अभिलाषाओंपर पानी फेर देता है । फिर दूसरोंकी -शिशुपाल, दन्तवक्त्र या जरासन्धकी तो बात ही क्या है? ॥३९ ॥
सत्यं भयादिव गुणेभ्य उरुक्रमान्तः शेते'समुद्र उपलम्भनमात्र आत्मा । नित्यं कदिन्द्रियगणैः कृतविग्रहस्त्वं त्वत्सेवकैर्नृपपदं विधुतं तमोऽन्धम् ॥३५ त्वत्पादपद्ममकरन्दजुषां मुनीनां वर्त्मास्फुटं नृपशुभिर्ननु दुर्विभाव्यम् । यस्मादलौकिकमिवेहितमीश्वरस्य भूमंस्तवेहितमथो अनु ये भवन्तम् ॥३६ निष्किंचनो ननु भवान् न यतोऽस्ति किंचिद् यस्मै बलिं बलिभुजोऽपि हरन्त्यजाद्याः । न त्वा विदन्त्यसुतृपोऽन्तकमाढ्यतान्धाः प्रेष्ठो भवान् बलिभुजामपि तेऽपि तुभ्यम् ॥३७ त्वं वै समस्तपुरुषार्थमयः फलात्मा यद्वाञ्छया सुमतयो विसृजन्ति कृत्स्नम् । तेषां विभो समुचितो भवतः समाजः पुंसः स्त्रियाश्च रतयोः सुखदुःखिनोर्न ॥३८ त्वं न्यस्तदण्डमुनिभिर्गदितानुभाव
आत्माऽऽत्मदश्च जगतामिति मे वृतोऽसि ।
हित्वा`भवद्भुव` उदीरितकालवेग- ध्वस्ताशिषोऽब्जभवनाकपतीन् कुतोऽन्ये ॥३९
जाड्यं वचस्तव गदाग्रज यस्तु भूपान् विद्राव्य शार्ङ्गनिनदेन जहर्थ मां त्वम् । सिंहो यथा स्वबलिमीश पशून् स्वभागं तेभ्यो भयाद् यदुदधिं शरणं प्रपन्नः ॥४० यद्वाञ्छया नृपशिखामणयोऽङ्गवैन्य-****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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जायन्तनाहुषगयादय ऐकपत्यम् राज्यं विसृज्य विविशुर्वनमम्बुजाक्ष सीदन्ति तेऽनुपदवीं त इहास्थिताः किम् ॥४१ सर्वेश्वर आर्यपुत्र! आपकी यह बात किसी प्रकार युक्तिसंगत नहीं मालूम होती कि आप राजाओंसे भयभीत होकर समुद्रमें आ बसे हैं । क्योंकि आपने केवल अपने शार्ङ्गधनुषके टंकारसे मेरे विवाहके समय आये हुए समस्त राजाओंको भगाकर अपने चरणोंमें समर्पित मुझ दासीको उसी प्रकार हरण कर लिया, जैसे सिंह अपनी कर्कश ध्वनिसे वन- पशुओंको भगाकर अपना भाग ले आवे ॥४० ॥ कमलनयन! आप कैसे कहते हैं कि जो मेरा अनुसरण
करता है, उसे प्रायः कष्ट ही उठाना पड़ता है । प्राचीन कालके अंग, पृथु, भरत, ययाति और गय आदि जो बड़े - बड़े राजराजेश्वर अपना- अपना एकछत्र साम्राज्य छोड़कर आपको पानेकी अभिलाषासे तपस्या करने वनमें चले गये थे, वे आपके मार्गका अनुसरण करनेके कारण क्या किसी प्रकारका कष्ट उठा रहे हैं ॥४१ ॥ आप कहते हैं कि तुम और किसी राजकुमारका
वरण कर लो । भगवन्! आप समस्त गुणोंके एकमात्र आश्रय हैं। बड़े -बड़े संत आपके चरणकमलोंकी सुगन्धका बखान करते रहते हैं । उसका आश्रय लेनेमात्रसे लोग संसारके पाप - तापसे मुक्त हो जाते हैं । लक्ष्मी सर्वदा उन्हींमें निवास करती हैं । फिर आप बतलाइये कि अपने स्वार्थ और परमार्थको भलीभाँति समझनेवाली ऐसी कौन- सी स्त्री है, जिसे एक बार उन चरणकमलोंकी सुगन्ध सूँघनेको मिल जाय और फिर वह उनका तिरस्कार करके ऐसे लोगोंको वरण करे जो सदा मृत्यु, रोग, जन्म, जरा आदि भयोंसे युक्त हैं! कोई भी बुद्धिमती स्त्री ऐसा नहीं कर सकती ॥ ४२ ॥ प्रभो! आप सारे जगत्के एकमात्र स्वामी हैं । आप ही इस
लोक और परलोकमें समस्त आशाओंको पूर्ण करनेवाले एवं आत्मा हैं। मैंने आपको अपने अनुरूप समझकर ही वरण किया है । मुझे अपने कर्मोंके अनुसार विभिन्न योनियोंमें भटकना पड़े, इसकी मुझको परवा नहीं है । मेरी एकमात्र अभिलाषा यही है कि मैं सदा अपना भजन करनेवालोंका मिथ्या संसारभ्रम निवृत्त करनेवाले तथा उन्हें अपना स्वरूपतक दे डालनेवाले आप परमेश्वरके चरणोंकी शरणमें रहूँ ॥४३ ॥ अच्युत! शत्रुसूदन! गधोंके समान घरका बोझा
ढोनेवाले, बैलोंके समान गृहस्थीके व्यापारोंमें जुते रहकर कष्ट उठानेवाले, कुत्तोंके समान तिरस्कार सहनेवाले, बिलावके समान कृपण और हिंसक तथा क्रीत दासोंके समान स्त्रीकी सेवा करनेवाले शिशुपाल आदि राजालोग, जिन्हें वरण करनेके लिये आपने मुझे संकेत किया है — उसी अभागिनी स्त्रीके पति हों, जिनके कानोंमें भगवान् शंकर, ब्रह्मा आदि देवेश्वरोंकी सभामें गायी जानेवाली आपकी लीलाकथाने प्रवेश नहीं किया है ॥ ४४ ॥ यह मनुष्यका शरीर
जीवित होनेपर भी मुर्दा ही है । ऊपरसे चमड़ी, दाढ़ी -मूँछ, रोएँ, नख और केशोंसे ढका हुआ है; परन्तु इसके भीतर मांस, हड्डी, खून, कीड़े, मल- मूत्र, कफ, पित्त और वायु भरे पड़े हैं । इसे वही मूढ़ स्त्री अपना प्रियतम पति समझकर सेवन करती है, जिसे कभी आपके चरणारविन्दके मकरन्दकी सुगन्ध सूँघनेको नहीं मिली है ॥ ४५ ॥ कमलनयन! आप
आत्माराम हैं । मैं सुन्दरी अथवा गुणवती हूँ, इन बातोंपर आपकी दृष्टि नहीं जाती । अतः आपका उदासीन रहना स्वाभाविक है, फिर भी आपके चरणकमलोंमें मेरा सुदृढ़ अनुराग हो, ******ebook converter DEMO Watermarks *******
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यही मेरी अभिलाषा है । जब आप इस संसारकी अभिवृद्धिके लिये उत्कट रजोगुण स्वीकार करके मेरी ओर देखते हैं, तब वह भी आपका परम अनुग्रह ही है ॥ ४६ ॥ मधुसूदन! आपने
कहा कि किसी अनुरूप वरको वरण कर लो । मैं आपकी इस बातको भी झूठ नहीं मानती । क्योंकि कभी - कभी एक पुरुषके द्वारा जीती जानेपर भी काशी-नरेशकी कन्या अम्बाके समान किसी - किसीकी दूसरे पुरुषमें भी प्रीति रहती है ॥४७ ॥ कुलटा स्त्रीका मन तो विवाह
हो जानेपर भी नये - नये पुरुषोंकी ओर खिंचता रहता है । बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह ऐसी कुलटा स्त्रीको अपने पास न रखे । उसे अपनानेवाला पुरुष लोक और परलोक दोनों खो बैठता है, उभयभ्रष्ट हो जाता है ॥४८ ॥
कान्यं श्रयेत तव पादसरोजगन्ध- माघ्राय सन्मुखरितं जनतापवर्गम् । लक्ष्म्यालयं त्वविगणय्य गुणालयस्य मर्त्या सदोरुभयमर्थविविक्तदृष्टिः ॥४२ तं त्वानुरूपमभजं जगतामधीश- मात्मानमत्र च परत्र च कामपूरम् । स्यान्मे तवाङ्घ्रिररणं सृतिभिर्भ्रमन्त्या यो वै भजन्तमुपयात्यनृतापवर्गः ॥४३ तस्याः स्युरच्युत नृपा भवतोपदिष्टाः स्त्रीणां गृहेषु खरगोश्वबिडालभृत्याः । यत्कर्णमूलमरिकर्षण नोपयायाद् युष्मत्कथा मृडविरिंचसभासु गीता ॥ ४४ त्वक्श्मश्रुरोमनखकेशपिनद्धमन्त- र्मांसास्थिरक्तकृमिविट्कफपित्तवातम् । जीवच्छवं भजति कान्तमतिर्विमूढा या ते पदाब्जमकरन्दमजिघ्रती स्त्री ॥४५ अस्त्वम्बुजाक्ष मम ते चरणानुराग आत्मन् रतस्य मयि चानतिरिक्तदृष्टेः । यर्ह्यस्य वृद्धय उपात्तरजोऽतिमात्रो मामीक्षसे तदु ह नः परमानुकम्पा ॥४६ नैवालीकमहं मन्ये वचस्ते मधुसूदन । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अम्बाया इव हिप्रायः कन्यायाः स्याद् रतिः क्वचित् ॥४७
व्यूढायाश्चापि पुंश्चल्या मनोऽभ्येति नवं नवम् ।
sed तां बिभ्रदुभयच्युतः ॥४८
श्रीभगवानुवाच
साध्व्येतच्छ्रोतुकामैस्त्वं राजपुत्रि प्रलम्भिता ।
मयोदितं यदन्वात्थ सर्वं तत् सत्यमेव हि ॥४९
यान् यान् कामयसे कामान् मय्यकामाय भामिनि ।
सन्ति ह्येकान्तभक्तायास्तव कल्याणि नित्यदा ॥५०
उपलब्धं पतिप्रेम पातिव्रत्यं च तेऽनघे ।
यद्वाक्यैश्चाल्यमानाया न धीर्मय्यपकर्षिता ॥५१
ये मां भजन्ति दाम्पत्ये तपसा व्रतचर्यया ।
कामात्मानोऽपवर्गेशं मोहिता मम मायया ॥५२
भगवान् श्रीकृष्णने कहा - साध्वी! राजकुमारी! यही बातें सुननेके लिये तो मैंने तुमसे हँसी- हँसीमें तुम्हारी वंचना की थी, तुम्हें छकाया था । तुमने मेरे वचनोंकी जैसी व्याख्या की है, वह अक्षरशः सत्य है ॥ ४ ९ ॥ सुन्दरी! तुम मेरी अनन्य प्रेयसी हो । मेरे प्रति तुम्हारा अनन्य प्रेम है । तुम मुझसे जो -जो अभिलाषाएँ करती हो, वे तो तुम्हें सदा-सर्वदा प्राप्त ही हैं । और यह बात भी है कि मुझसे की हुई अभिलाषाएँ सांसारिक कामनाओंके समान बन्धनमें डालनेवाली नहीं होतीं, बल्कि वे समस्त कामनाओंसे मुक्त कर देती हैं ॥ ५० ॥ पुण्यमयी
प्रिये! मैंने तुम्हारा पतिप्रेम और पातिव्रत्य भी भलीभाँति देख लिया । मैंने उलटी -सीधी बात कह- कहकर तुम्हें विचलित करना चाहा था; परन्तु तुम्हारी बुद्धि मुझसे तनिक भी इधर- उधर न हुई ॥५१ ॥ प्रिये! मैं मोक्षका स्वामी हूँ । लोगोंको संसार सागर से पार करता हूँ । जो सकाम
पुरुष अनेक प्रकारके व्रत और तपस्या करके दाम्पत्य- जीवनके विषय - सुखकी अभिलाषासे मेरा भजन करते हैं, वे मेरी मायासे मोहित हैं ॥ ५२ ॥ मानिनी प्रिये! मैं मोक्ष तथा सम्पूर्ण
सम्पदाओंका आश्रय हूँ, अधीश्वर हूँ। मुझ परमात्माको प्राप्त करके भी जो लोग केवल विषयसुखके साधन सम्पत्तिकी ही अभिलाषा करते हैं, मेरी पराभक्ति नहीं चाहते, वे बड़े मन्दभागी हैं, क्योंकि विषयसुख तो नरकमें और नरकके ही समान सूकर कूकर आदि योनियोंमें भी प्राप्त हो सकते हैं । परन्तु उन लोगोंका मन तो विषयोंमें ही लगा रहता है, इसलिये उन्हें नरकमें जाना भी अच्छा जान पड़ता है ॥ ५३ ॥ गृहेश्वरी प्राणप्रिये! यह बड़े
आनन्दकी बात है कि तुमने अबतक निरन्तर संसार- बन्धन से मुक्त करनेवाली मेरी सेवा की है । दुष्ट पुरुष ऐसा कभी नहीं कर सकते । जिन स्त्रियोंका चित्त दूषित कामनाओंसे भरा हुआ ******ebook converter DEMO Watermarks *******
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है और जो अपनी इन्द्रियोंकी तृप्तिमें ही लगी रहनेके कारण अनेकों प्रकारके छल- छन्द रचती रहती हैं, उनके लिये तो ऐसा करना और भी कठिन है ॥ ५४ ॥ मानिनि! मुझे अपने घरभरमें
तुम्हारे समान प्रेम करनेवाली भार्या और कोई दिखायी नहीं देती । क्योंकि जिस समय तुमने मुझे देखा न था, केवल मेरी प्रशंसा सुनी थी, उस समय भी अपने विवाहमें आये हुए राजाओंकी उपेक्षा करके ब्राह्मणके द्वारा मेरे पास गुप्त सन्देश भेजा था ॥ ५५ ॥ तुम्हारा हरण
करते समय मैंने तुम्हारे भाईको युद्धमें जीतकर उसे विरूप कर दिया था और अनिरुद्धके विवाहोत्सवमें चौसर खेलते समय बलरामजीने तो उसे मार ही डाला । किन्तु हमसे वियोग हो जानेकी आशंकासे तुमने चुपचाप वह सारा दुःख सह लिया । मुझसे एक बात भी नहीं कही । तुम्हारे इस गुणसे मैं तुम्हारे वश हो गया हूँ ॥ ५६ ॥ तुमने मेरी प्राप्तिके लिये दूतके द्वारा
अपना गुप्त सन्देश भेजा था; परन्तु जब तुमने मेरे पहुँचनेमें कुछ विलम्ब होता देखा; तब तुम्हें यह सारा संसार सूना दीखने लगा । उस समय तुमने अपना यह सर्वांगसुन्दर शरीर किसी दूसरेके योग्य न समझकर इसे छोड़नेका संकल्प कर लिया था । तुम्हारा यह प्रेमभाव तुम्हारे ही अंदर रहे । हम इसका बदला नहीं चुका सकते । तुम्हारे इस सर्वोच्च प्रेम- भावका केवल अभिनन्दन करते हैं ॥५७ ॥
मां प्राप्य मानिन्यपवर्गसम्पदं वाञ्छन्ति ये सम्पद एव तत्पतिम् । ते मन्दभाग्या निरयेऽपि ये नृणां मात्रात्मकत्वान्निरयः सुसंगमः ॥५३ दिष्ट्या गृहेश्वर्यसकृन्मयि त्वया कृतानुवृत्तिर्भवमोचनी खलैः । सुदुष्करासौ सुतरां दुराशिषो ह्यसुम्भराया निकृतिंजुषः स्त्रियाः ॥५४ न त्वादृशीं प्रणयिनीं गृहिणीं गृहेषु पश्यामि मानिनि यया स्वविवाहकाले । प्राप्तान् नृपानवगणय्य रहोहरो मे प्रस्थापितो द्विज उपश्रुतसत्कथस्य ॥५५ भ्रातुर्विरूपकरणं युधि निर्जितस्य प्रोद्वाहपर्वणि च तद्वधमक्षगोष्ठ्याम् । दुःखं समुत्थमसहोऽस्मदयोगभीत्या नैवाब्रवीः किमपि तेन वयं जितास्ते ॥५६ दूतस्त्वयाऽऽत्मलभने सुविविक्तमन्त्रः ******ebook converter DEMO Watermarks *******
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प्रस्थापितो मयि चिरायति शून्यमेतत् । मत्वा जिहास इदमंगमनन्ययोग्यं तिष्ठेत तत्त्वयि वयं प्रतिनन्दयामः ॥५७ श्रीशुक उवाच
एवं सौरतसंलापैर्भगवान् जगदीश्वरः ।
स्वरतो रमया रेमे नरलोकं विडम्बयन् ॥५८
तथान्यासामपि विभुर्गृहेषु गृहवानिव ।
आस्थितो गृहमेधीयान् धर्मांल्लोकगुरुर्हरिः ॥५९
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्ण आत्माराम हैं । वे जब मनुष्योंकी - सी लीला कर रहे हैं, तब उसमें दाम्पत्य- प्रेमको बढ़ानेवाले विनोदभरे वार्तालाप भी करते हैं और इस प्रकार लक्ष्मीरूपिणी रुक्मिणीजीके साथ विहार करते हैं ॥ ५८ ॥ भगवान्
श्रीकृष्ण समस्त जगत्को शिक्षा देनेवाले और सर्वव्यापक हैं । वे इसी प्रकार दूसरी पत्नियोंके महलोंमें भी गृहस्थोंके समान रहते और गृहस्थोचित धर्मका पालन करते थे ॥५९ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे कृष्णरुक्मिणीसंवादो नाम षष्टितमोऽध्यायः ॥६० ॥
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