श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 781–790
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 781–790
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मैंने बहुतसे पहाड़ोंको तोड़- फोड़ डाला था' ॥९ ॥ बाणासुरकी यह प्रार्थना सुनकर भगवान्
शंकरने तनिक क्रोधसे कहा - ' रे मूढ़! जिस समय तेरी ध्वजा टूटकर गिर जायगी, उस समय मेरे ही समान योद्धासे तेरा युद्ध होगा और वह युद्ध तेरा घमंड चूर-चूर कर देगा' ॥१० ॥
परीक्षित्! बाणासुरकी बुद्धि इतनी बिगड़ गयी थी कि भगवान् शंकरकी बात सुनकर उसे बड़ा हर्ष हुआ और वह अपने घर लौट गया । अब वह मूर्ख भगवान् शंकरके आदेशानुसार उस युद्धकी प्रतीक्षा करने लगा, जिसमें उसके बल- वीर्यका नाश होनेवाला था ॥११ ॥
परीक्षित्! बाणासुरकी एक कन्या थी, उसका नाम था ऊषा। अभी वह कुमारी ही थी कि एक दिन स्वप्नमें उसने देखा कि ' परम सुन्दर अनिरुद्धजीके साथ मेरा समागम हो रहा है । ' आश्चर्यकी बात तो यह थी कि उसने अनिरुद्धजीको न तो कभी देखा था और न सुना ही था ॥१२ ॥ स्वप्नमें ही उन्हें न देखकर वह बोल उठी- ' प्राणप्यारे! तुम कहाँ हो? ' और
उसकी नींद टूट गयी । वह अत्यन्त विह्वलताके साथ उठ बैठी और यह देखकर कि मैं सखियोंके बीचमें हूँ, बहुत ही लज्जित हुई || १३ || परीक्षित्! बाणासुरके मन्त्रीका नाम था कुम्भाण्ड । उसकी एक कन्या थी, जिसका नाम था चित्रलेखा । ऊषा और चित्रलेखा एक-दूसरेकी सहेलियाँ थीं। चित्रलेखाने ऊषासे कौतूहलवश पूछा- || १४ || 'सुन्दरी! राजकुमारी! मैं देखती हूँ कि अभीतक किसीने तुम्हारा पाणिग्रहण भी नहीं किया है । फिर तुम किसे ढूँढ़ रही हो और तुम्हारे मनोरथका क्या स्वरूप है? ' ॥१५ ॥
बाणस्य मन्त्री कुम्भाण्डश्चित्रलेखा च तत्सुता ।
सख्यपृच्छत् सखीमूषां कौतूहलसमन्विता ॥ १४
कं त्वं मृगयसे सुभ्रूः कीदृशस्ते मनोरथः ।
हस्तग्राहं न तेऽद्यापि राजपुत्र्युपलक्षये ॥१५
ऊषोवाच
दृष्टः कश्चिन्नरः स्वप्ने श्यामः कमललोचनः ।
पीतवासा बृहद्बाहुर्योषितां हृदयंगमः ॥१६
तमहं मृगये कान्तं पाययित्वाधरं मधु ।
क्वापि यातः स्पृहयतीं क्षिप्त्वा मां वृजिनार्णवे ॥ १७
चित्रलेखोवाच
व्यसनं तेऽपकर्षामित्रिलोक्यां यदि भाव्यते ।
तमानेष्ये नरं यस्ते मनोहर्ता तमादिश ॥ १८
इत्युक्त्वा देवगन्धर्वसिद्धचारणपन्नगान् ।
दैत्यविद्याधरान् यक्षान् मनुजांश्च यथालिखत् ॥१९
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मनुजेषु च सा वृष्णीन् शूरमानकदुन्दुभिम् ।
व्यलिखद् रामकृष्णौ च प्रद्युम्नं वीक्ष्य लज्जिता ॥२०
अनिरुद्धं विलिखितं वीक्ष्योषावाङ्मुखी ह्रिया ।
सोऽसावसाविति प्राह स्मयमाना महीपते ॥२१
ऊषाने कहा — सखी! मैंने स्वप्नमें एक बहुत ही सुन्दर नवयुवकको देखा है । उसके शरीरका रंग साँवला- साँवला-सा है । नेत्र कमलदलके समान हैं । शरीरपर पीला - पीला पीताम्बर फहरा रहा है । भुजाएँ लम्बी- लम्बी हैं और वह स्त्रियोंका चित्त चुरानेवाला है ॥१६ ॥
उसने पहले तो अपने अधरोंका मधुर मधु मुझे पिलाया, परन्तु मैं उसे अघाकर पी ही न पायी
थी कि वह मुझे दुःखके सागरमें डालकर न जाने कहाँ चला गया । मैं तरसती ही रह गयी ।
सखी! मैं अपने उसी प्राणवल्लभको ढूँढ़ रही हूँ ॥१७ ॥
चित्रलेखाने कहा — ‘ सखी! यदि तुम्हारा चित्तचोर त्रिलोकीमें कहीं भी होगा, और उसे तुम पहचान सकोगी, तो मैं तुम्हारी विरह- व्यथा अवश्य शान्त कर दूँगी । मैं चित्र बनाती हूँ, तुम अपने चित्तचोर प्राणवल्लभको पहचानकर बतला दो । फिर वह चाहे कहीं भी होगा, मैं उसे तुम्हारे पास ले आऊँगी ' ॥१८ ॥ यों कहकर चित्रलेखाने बात - की- बातमें बहुत - से देवता,
गन्धर्व, सिद्ध, चारण, पन्नग, दैत्य, विद्याधर, यक्ष और मनुष्योंके चित्र बना दिये ॥१९ ॥
मनुष्योंमें उसने वृष्णिवंशी वसुदेवजीके पिता शूर, स्वयं वसुदेवजी, बलरामजी और भगवान् श्रीकृष्ण आदिके चित्र बनाये। प्रद्युम्नका चित्र देखते ही ऊषा लज्जित हो गयी || २० || परीक्षित्! जब उसने अनिरुद्धका चित्र देखा, तब तो लज्जाके मारे उसका सिर नीचा हो गया । फिर मन्द - मन्द मुसकराते हुए उसने कहा- ' मेरा वह प्राणवल्लभ यही है, यही है ' ॥२१ ॥
चित्रलेखा तमाज्ञाय पौत्रं कृष्णस्य योगिनी ।
ययौ विहायसा राजन् द्वारकां कृष्णपालिताम् ॥२२
तत्र सुप्तं सुपर्यंके प्राद्युम्निं योगमास्थिता ।
गृहीत्वा शोणितपुरं सख्यै प्रियमदर्शयत् ॥२३
सा च तं सुन्दरवरं विलोक्य मुदितानना दुष्प्रेक्ष्ये स्वगृहे पुम्भी रेमे प्राद्युम्निना समम् ॥२४
परार्घ्यवासःस्रग्गन्धधूपदीपासनादिभिः ।
पानभोजनभक्ष्यैश्च वाक्यैः शुश्रूषयार्चितः ॥ २५
गूढः कन्यापुरे शश्वत्प्रवृद्धस्नेहया तया ।
नाहर्गणान् स बुबुधे ऊषयापहृतेन्द्रियः ॥२६
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तां तथा यदुवीरेण भुज्यमानां हतव्रताम् ।
हेतुभिर्लक्षयांचक्रुराप्रीतां दुरवच्छदैः ॥२७
भटा आवेदयांचक्रू राजंस्ते दुहितुर्वयम् ।
विचेष्टितं लक्षयामः कन्यायाः कुलदूषणम् ॥२८
परीक्षित्! चित्रलेखा योगिनी थी । वह जान गयी कि ये भगवान् श्रीकृष्णके पौत्र हैं । अब वह आकाशमार्गसे रात्रिमें ही भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा सुरक्षित द्वारकापुरीमें पहुँची ॥२२ ॥
वहाँ अनिरुद्धजी बहुत ही सुन्दर पलंगपर सो रहे थे । चित्रलेखा योगसिद्धिके प्रभावसे उन्हें उठाकर शोणितपुर ले आयी और अपनी सखी ऊषाको उसके प्रियतमका दर्शन करा दिया ॥२३ ॥ अपने परम सुन्दर प्राण- वल्लभको पाकर आनन्दकी अधिकतासे उसका
मुखकमल प्रफुल्लित हो उठा और वह अनिरुद्धजीके साथ अपने महलमें विहार करने लगी । परीक्षित्! उसका अन्तःपुर इतना सुरक्षित था कि उसकी ओर कोई पुरुष झाँकतक नहीं सकता था ॥२४ ॥ ऊषाका प्रेम दिन दूना रात चौगुना बढ़ता जा रहा था । वह बहुमूल्य वस्त्र,
पुष्पोंके हार, इत्र- फुलेल, धूप-दीप, आसन आदि सामग्रियोंसे, सुमधुर पेय ( पीनेयोग्य पदार्थ – दूध, शरबत आदि ), भोज्य ( चबाकर खाने योग्य) और भक्ष्य ( निगल जानेयोग्य ) पदार्थोंसे तथा मनोहर वाणी एवं सेवा- शुश्रूषासे अनिरुद्धजीका बड़ा सत्कार करती । ऊषाने अपने प्रेमसे उनके मनको अपने वशमें कर लिया । अनिरुद्धजी उस कन्याके अन्तःपुरमें छिपे रहकर अपने - आपको भूल गये । उन्हें इस बातका भी पता न चला कि मुझे यहाँ आये कितने दिन बीत गये ॥२५-२६ ॥ परीक्षित्! यदुकुमार अनिरुद्धजीके सहवाससे ऊषाका कुआँरपन नष्ट हो चुका था । उसके शरीरपर ऐसे चिह्न प्रकट हो गये, जो स्पष्ट इस बातकी सूचना दे रहे थे और जिन्हें किसी प्रकार छिपाया नहीं जा सकता था । ऊषा बहुत प्रसन्न भी रहने लगी । पहरेदारोंने समझ लिया कि इसका किसी - न- किसी पुरुषसे सम्बन्ध अवश्य हो गया है । उन्होंने जाकर बाणासुरसे निवेदन किया —‘ राजन्! हमलोग आपकी अविवाहिता राजकुमारीका जैसा रंग - ढंग देख रहे हैं, वह आपके कुलपर बट्टा लगानेवाला है ॥२७-२८ ॥ प्रभो! इसमें सन्देह नहीं कि हमलोग बिना क्रम टूटे, रात - दिन महलका पहरा देते रहते हैं । आपकी कन्याको बाहरके मनुष्य देख भी नहीं सकते । फिर भी वह कलंकित कैसे हो गयी? इसका कारण हमारी समझमें नहीं आ रहा है ' ॥२९ ॥
अनपायिभिरस्माभिर्गुप्तायाश्च गृहे प्रभो ।
कन्याया दूषणं पुम्भिर्दुष्प्रेक्षाया न विद्महे ॥२९
ततः प्रव्यथितो बाणो दुहितुः श्रुतदूषणः ।
त्वरितः कन्यकागारं प्राप्तोऽद्राक्षीद् यदूद्वहम् ॥३०
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कामात्मजं तं भुवनैकसुन्दरं श्यामं पिशंगाम्बरमम्बुजेक्षणम् । बृहद्भुजं कुण्डलकुन्तलत्विषा स्मितावलोकेन च मण्डिताननम् ॥३१ दीव्यन्तमक्षैः प्रिययाभिनृम्णया तदंगसंगस्तनकुंकुमस्रजम् । बाह्वोर्दधानं मधुमल्लिकाश्रितां तस्याग्र आसीनमवेक्ष्य विस्मितः ॥३२ स तं प्रविष्टं वृतमाततायिभि- र्भटैरनीकैरवलोक्य माधवः । उद्यम्य मौर्वं परिघं व्यवस्थितो यथान्तको दण्डधरो जिघांसया ॥३३ जिघृक्षया तान् परितः प्रसर्पतः शुनो यथा सूकरयूथपोऽहनत् । ते हन्यमाना भवनाद् विनिर्गता निर्भिन्नमूर्धोरुभुजाः प्रदुद्रुवुः ॥ ३४ परीक्षित्! पहरेदारोंसे यह समाचार जानकर कि कन्याका चरित्र दूषित हो गया है, बाणासुरके हृदयमें बड़ी पीड़ा हुई । वह झटपट ऊषाके महलमें जा धमका और देखा कि अनिरुद्धजी वहाँ बैठे हुए हैं ॥ ३० ॥ प्रिय परीक्षित्! अनिरुद्धजी स्वयं कामावतार प्रद्युम्नजीके
पुत्र थे । त्रिभुवनमें उनके जैसा सुन्दर और कोई न था । साँवरा- सलोना शरीर और उसपर पीताम्बर फहराता हुआ, कमलदलके समान बड़ी- बड़ी कोमल आँखें, लम्बी- लम्बी भुजाएँ, कपोलोंपर घुँघराली अलकें और कुण्डलोंकी झिलमिलाती हुई ज्योति, होठोंपर मन्द- मन्द मुसकान और प्रेमभरी चितवनसे मुखकी शोभा अनूठी हो रही थी || ३१ || अनिरुद्धजी उस समय अपनी सब ओरसे सज- धजकर बैठी हुई प्रियतमा ऊषाके साथ पासे खेल रहे थे । उनके गलेमें बसंती बेलाके बहुत सुन्दर पुष्पोंका हार सुशोभित हो रहा था और उस हारमें ऊषाके अंगका सम्पर्क होनेसे उसके वक्षःस्थलकी केशर लगी हुई थी । उन्हें ऊषाके सामने ही बैठा देखकर बाणासुर विस्मित-चकित हो गया || ३२ || जब अनिरुद्धजीने देखा कि बाणासुर बहुत - से आक्रमणकारी शस्त्रास्त्रसे सुसज्जित वीर सैनिकोंके साथ महलोंमें घुस आया है, तब वे उन्हें धराशायी कर देनेके लिये लोहेका एक भयंकर परिघ लेकर डट गये, मानो स्वयं कालदण्ड लेकर मृत्यु ( यम) खड़ा हो ॥ ३३ ॥ बाणासुरके साथ आये हुए सैनिक
उनको पकड़नेके लिये ज्यों- ज्यों उनकी ओर झपटते, त्यों- त्यों वे उन्हें मार - मारकर गिराते जाते — ठीक वैसे ही, जैसे सूअरोंके दलका नायक कुत्तोंको मार डाले! अनिरुद्धजीकी चोटसे ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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उन सैनिकोंके सिर, भुजा, जंघा आदि अंग टूट - फूट गये और वे महलोंसे निकल भागे ॥३४ ॥
जब बली बाणासुरने देखा कि यह तो मेरी सारी सेनाका संहार कर रहा है, तब वह क्रोधसे तिलमिला उठा और उसने नागपाशसे उन्हें बाँध लिया । ऊषाने जब सुना कि उसके प्रियतमको बाँध लिया गया है, तब वह अत्यन्त शोक और विषादसे विह्वल हो गयी; उसके नेत्रोंसे आँसूकी धारा बहने लगी, वह रोने लगी ॥ ३५ ॥
तं नागपाशैर्बलिनन्दनो बली घ्नन्तं स्वसैन्यं कुपितो बबन्ध ह । ऊषा भृशं शोकविषादविह्वला बद्धं निशम्याश्रुकलाक्ष्यरौदिषीत् ॥३५ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे ऽनिरुद्धबन्धो नाम द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥६२ ॥
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अथ त्रिषष्टितमोऽध्यायः भगवान् श्रीकृष्णके साथ बाणासुरका युद्ध श्रीशुक उवाच
अपश्यतां चानिरुद्धं तद्बन्धूनां च भारत ।
चत्वारो वार्षिका मासा व्यतीयुरनुशोचताम् ॥१
नारदात्तदुपाकर्ण्य वार्तां बद्धस्य कर्म च ।
प्रययुः शोणितपुरं वृष्णयः कृष्णदेवताः ॥ २
प्रद्युम्नो युयुधानश्च गदः साम्बोऽथ सारणः ।
नन्दोपनन्दभद्राद्या रामकृष्णानुवर्तिनः ॥ ३
अक्षौहिणीभिर्द्वादशभिः समेताः सर्वतोदिशम् ।
रुरुधुर्बाणनगरं समन्तात् सात्वतर्षभाः ॥ ४
भज्यमानपुरोद्यानप्राकाराट्टालगोपुरम् ।
प्रेक्षमाणो रुषाविष्टस्तुल्यसैन्योऽभिनिर्ययौ ॥५
बाणार्थे भगवान् रुद्रः ससुतैः प्रमथैर्वृतः ।
आरुह्य नन्दिवृषभं युयुधे रामकृष्णयोः ॥ ६
आसीत् सुतुमुलं युद्धमद्भुतं रोमहर्षणम् ।
कृष्णशंकरयो राजन् प्रद्युम्नगुहयोरपि ॥७
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! बरसातके चार महीने बीत गये। परन्तु अनिरुद्धजीका कहीं पता न चला । उनके घरके लोग, इस घटनासे बहुत ही शोकाकुल हो रहे थे ॥१ ॥ एक दिन नारदजीने आकर अनिरुद्धका शोणितपुर जाना, वहाँ बाणासुरके
सैनिकोंको हराना और फिर नागपाशमें बाँधा जाना - यह सारा समाचार सुनाया । तब श्रीकृष्णको ही अपना आराध्यदेव माननेवाले यदुवंशियोंने शोणितपुरपर चढ़ाई कर दी || २ || अब श्रीकृष्ण और बलरामजीके साथ उनके अनुयायी सभी यदुवंशी - प्रद्युम्न, सात्यकि, गद, साम्ब, सारण, नन्द, उपनन्द और भद्र आदिने बारह अक्षौहिणी सेनाके साथ व्यूह बनाकर चारों ओरसे बाणासुरकी राजधानीको घेर लिया ॥३ -४ ॥ जब बाणासुरने देखा कि यदुवंशियोंकी सेना नगरके उद्यान, परकोटों, बुर्जों और सिंहद्वारोंको तोड़- फोड़ रही है, तब उसे बड़ा क्रोध आया और वह भी बारह अक्षौहिणी सेना लेकर नगरसे निकल पड़ा ॥५ ॥
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बाणासुरकी ओरसे साक्षात् भगवान् शंकर वृषभराज नन्दीपर सवार होकर अपने पुत्र कार्तिकेय और गणोंके साथ रणभूमिमें पधारे और उन्होंने भगवान् श्रीकृष्ण तथा बलरामजीसे युद्ध किया ॥६ ॥ परीक्षित्! वह युद्ध इतना अद्भुत और घमासान हुआ कि उसे देखकर
रोंगटे खड़े हो जाते थे । भगवान् श्रीकृष्णसे शंकरजीका और प्रद्युम्नसे स्वामिकार्तिकका युद्ध हुआ ॥७ ॥ बलरामजीसे कुम्भाण्ड और कूपकर्णका युद्ध हुआ । बाणासुरके पुत्रके साथ
साम्ब और स्वयं बाणासुरके साथ सात्यकि भिड़ गये || ८ || ब्रह्मा आदि बड़े -बड़े देवता, ऋषि- मुनि, सिद्ध - चारण, गन्धर्व- अप्सराएँ और यक्ष विमानोंपर चढ़- चढ़कर युद्ध देखनेके लिये आ पहुँचे || ९ || भगवान् श्रीकृष्णने अपने शार्ङ्गधनुषके तीखी नोकवाले बाणोंसे शंकरजीके अनुचरों — भूत, प्रेत, प्रमथ, गुह्यक, डाकिनी, यातुधान, वेताल, विनायक, प्रेतगण, मातृगण, पिशाच, कूष्माण्ड और ब्रह्म राक्षसोंको मार-मारकर खदेड़ दिया ॥१०-११ ॥ पिनाकपाणि शंकरजीने भगवान् श्रीकृष्णपर भाँति- भाँतिके अगणित अस्त्र- शस्त्रोंका प्रयोग किया, परन्तु भगवान् श्रीकृष्णने बिना किसी प्रकारके विस्मयके उन्हें विरोधी शस्त्रास्त्रोंसे शान्त कर दिया ॥१२ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने ब्रह्मास्त्रकी शान्तिके लिये ब्रह्मास्त्रका,
वायव्यास्त्रके लिये पार्वतास्त्रका, आग्नेयास्त्रके लिये पर्जन्यास्त्रका और पाशुपतास्त्रके लिये नारायणास्त्रका प्रयोग किया ॥१३ ॥ इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने जृम्भणास्त्रसे (जिससे
मनुष्यको जँभाई-पर - जँभाई आने लगती है ) महादेवजीको मोहित कर दिया । वे युद्धसे विरत होकर जँभाई लेने लगे, तब भगवान् श्रीकृष्ण शंकरजीसे छुट्टी पाकर तलवार, गदा और बाणोंसे बाणासुरकी सेनाका संहार करने लगे ॥१४ ॥ इधर प्रद्युम्नने बाणोंकी बौछारसे
स्वामिकार्तिकको घायल कर दिया, उनके अंग- अंगसे रक्तकी धारा बह चली, वे रणभूमि छोड़कर अपने वाहन मयूरद्वारा भाग निकले || १५ || बलरामजीने अपने मूसलकी चोटसे कुम्भाण्ड और कूपकर्णको घायल कर दिया, वे रणभूमिमें गिर पड़े । इस प्रकार अपने सेनापतियोंको हताहत देखकर बाणासुरकी सारी सेना तितर- बितर हो गयी ॥१६ ॥
कुम्भाण्डकूपकर्णाभ्यां बलेन सह संयुगः ।
साम्बस्य बाणपुत्रेण बाणेन सह सात्यकेः ॥ ८
ब्रह्मादयः सुराधीशा मुनयः सिद्धचारणाः ।
गन्धर्वाप्सरसो यक्षा विमानैर्द्रष्टुमागमन् ॥९
शंकरानुचराञ्छौरिर्भूतप्रमथगुह्यकान् ।
डाकिनीर्यातुधानांश्च वेतालान् सविनायकान् ॥१०
प्रेतमातृपिशाचांश्च कूष्माण्डान् ब्रह्मराक्षसान् ।
द्रावयामास तीक्ष्णाग्रैः शरैः शार्ङ्गधनुश्च्युतैः ॥११
पृथग्विधानि प्रायुङ्क्त पिनाक्यस्त्राणि शार्ङ्गिणे । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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प्रत्यस्त्रैः शमयामास शार्ङ्गपाणिरविस्मितः ॥१२
ब्रह्मास्त्रस्य च ब्रह्मास्त्रं वायव्यस्य च पार्वतम् ।
आग्नेयस्य च पार्जन्यं नैजं पाशुपतस्य च ॥१३
मोहयित्वा तु गिरिशं जृम्भणास्त्रेण जृम्भितम् ।
बाणस्य पृतनां शौरिर्जघानासिगदेषुभिः ॥१४
स्कन्दः प्रद्युम्नबाणौघैरर्द्यमानः समन्ततः ।
असृग् विमुंचन् गात्रेभ्यः शिखिनापाक्रमद् रणात् ॥१५
कुम्भाण्डः कूपकर्णश्च पेततुर्मुसलार्दितौ ।
दुद्रुवुस्तदनीकानि हतनाथानि सर्वतः ॥ १६
विशीर्यमाणं स्वबलं दृष्ट्वा बाणोऽत्यमर्षणः ।
कृष्णमभ्यद्रवत् संख्ये रथी हित्वैव सात्यकिम् ॥१७
जब रथपर सवार बाणासुरने देखा कि श्रीकृष्ण आदिके प्रहारसे हमारी सेना तितर - बितर और तहस - नहस हो रही है, तब उसे बड़ा क्रोध आया । उसने चिढ़कर सात्यकिको छोड़ दिया और वह भगवान् श्रीकृष्णपर आक्रमण करनेके लिये दौड़ पड़ा ॥१७ ॥ परीक्षित्! रणोन्मत्त
बाणासुरने अपने एक हजार हाथोंसे एक साथ ही पाँच सौ धनुष खींचकर एक- एकपर दो -दो बाण चढ़ाये ॥१८ ॥ परन्तु भगवान् श्रीकृष्णने एक साथ ही उसके सारे धनुष काट डाले और
सारथि, रथ तथा घोड़ोंको भी धराशायी कर दिया एवं शंखध्वनि की ॥१९ ॥ कोटरा नामकी
एक देवी बाणासुरकी धर्ममाता थी । वह अपने उपासक पुत्रके प्राणोंकी रक्षाके लिये बाल बिखेरकर नंग- धड़ंग भगवान् श्रीकृष्णके सामने आकर खड़ी हो गयी ॥२० ॥ भगवान्
श्रीकृष्णने इसलिये कि कहीं उसपर दृष्टि न पड़ जाय, अपना मुँह फेर लिया और वे दूसरी ओर देखने लगे । तबतक बाणासुर धनुष कट जाने और रथहीन हो जानेके कारण अपने नगरमें चला गया ॥२१ ॥ इधर जब भगवान् शंकरके भूतगण इधर- उधर भाग गये, तब
उनका छोड़ा हुआ तीन सिर और तीन पैरवाला ज्वर दसों दिशाओंको जलाता हुआ-सा भगवान् श्रीकृष्णकी ओर दौड़ा || २२ || भगवान् श्रीकृष्णने उसे अपनी ओर आते देखकर उसका मुकाबला करनेके लिये अपना ज्वर छोड़ा । अब वैष्णव और माहेश्वर दोनों ज्वर आपसमें लड़ने लगे ॥२३ ॥ अन्तमें वैष्णव ज्वरके तेजसे माहेश्वर ज्वर पीड़ित होकर
चिल्लाने लगा और अत्यन्त भयभीत हो गया । जब उसे अन्यत्र कहीं त्राण न मिला, तब वह अत्यन्त नम्रतासे हाथ जोड़कर शरणमें लेनेके लिये भगवान् श्रीकृष्णसे प्रार्थना करने लगा ॥२४ ॥
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धनूंष्याकृष्य युगपद् बाणः पंचशतानि वै ।
एकैकस्मिञ्छरौ द्वौ द्वौ सन्दधे रणदुर्मदः ॥ १८
तानि चिच्छेद भगवान् धनूंषि युगपद्धरिः ।
सारथिं रथमश्वांश्च हत्वा शंखमपूरयत् ॥१९
तन्माता कोटरा नाम नग्ना मुक्तशिरोरुहा ।
पुरोऽवतस्थे कृष्णस्य पुत्रप्राणरिरक्षया ॥ २०
ततस्तिर्यङ्मुखो नग्नामनिरीक्षन् गदाग्रजः ।
बाणश्च तावद् विरथश्छिन्नधन्वाविशत् पुरम् ॥२१
विद्राविते भूतगणे ज्वरस्तु त्रिशिरास्त्रिपात् ।
अभ्यधावत दाशार्हं दहन्निव दिशो दश ॥२२
अथ नारायणो देवस्तं दृष्ट्वा व्यसृजज्ज्वरम् ।
माहेश्वरो वैष्णवश्च युयुधाते ज्वरावुभौ ॥२३
माहेश्वरः समाक्रन्दन् वैष्णवेन बलार्दितः ।
अलब्ध्वाभयमन्यत्र भीतो माहेश्वरो ज्वरः ।
शरणार्थी हृषीकेशं तुष्टाव प्रयतांजलिः ॥२४
ज्वर उवाच नमामि त्वानन्तशक्तिं परेशं सर्वात्मानं केवलं ज्ञप्तिमात्रम् । विश्वोत्पत्तिस्थानसंरोधहेतुं यत्तद् ब्रह्म ब्रह्मलिंगं प्रशान्तम् ॥२५ कालो दैवं कर्म जीवः स्वभावो
द्रव्यं क्षेत्रं प्राण आत्मा विकारः ।
तत्संघातो बीजरोहप्रवाह- स्त्वन्मायैषा तन्निषेधं प्रपद्ये ॥२६
ज्वरने कहा — प्रभो! आपकी शक्ति अनन्त है । आप ब्रह्मादि ईश्वरोंके भी परम महेश्वर हैं । आप सबके आत्मा और सर्वस्वरूप हैं । आप अद्वितीय और केवल ज्ञानस्वरूप हैं। संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और संहारके कारण आप ही हैं । श्रुतियोंके द्वारा आपका ही वर्णन ******ebook converter DEMO Watermarks *******
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और अनुमान किया जाता है । आप समस्त विकारोंसे रहित स्वयं ब्रह्म हैं । मैं आपको प्रणाम करता हूँ ॥२५ ॥ काल, दैव ( अदृष्ट ), कर्म, जीव, स्वभाव, सूक्ष्मभूत, शरीर, सूत्रात्मा प्राण,
अहंकार, एकादश इन्द्रियाँ और पंचभूत - इन सबका संघात लिंगशरीर और बीजांकुर -न्यायके अनुसार उससे कर्म और कर्मसे फिर लिंग - शरीरकी उत्पत्ति- यह सब आपकी माया है । आप मायाके निषेधकी परम अवधि हैं । मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ ॥२६ ॥ प्रभो!
आप अपनी लीलासे ही अनेकों रूप धारण कर लेते हैं और देवता, साधु तथा लोकमर्यादाओंका पालन- पोषण करते हैं । साथ ही उन्मार्गगामी और हिंसक असुरोंका संहार भी करते हैं । आपका यह अवतार पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ही हुआ है ॥ २७ ॥ प्रभो!
आपके शान्त, उग्र और अत्यन्त भयानक दुस्सह तेज ज्वरसे मैं अत्यन्त सन्तप्त हो रहा हूँ । भगवन्! देहधारी जीवोंको तभीतक ताप- सन्ताप रहता है, जबतक वे आशाके फंदोंमें फँसे रहनेके कारण आपके चरण- कमलोंकी शरण नहीं ग्रहण करते ॥२८ ॥
नानाभावैर्लीलयैवोपपन्नै- देवान् साधूँल्लोकसेतून् बिभर्षि । हंस्युन्मार्गान् हिंसया वर्तमानान् जन्मैतत्ते भारहाराय भूमेः ॥२७ तप्तोऽहं ते तेजसा दुःसहेन शान्तोग्रेणात्युल्बणेन ज्वरेण । तावत्तापो देहिनां तेऽङ्घ्रिमूलं नो सेवेरन् यावदाशानुबद्धाः ॥२८ श्रीभगवानुवाच
त्रिशिरस्ते प्रसन्नोऽस्मि व्येतु तेते मज्ज्वराद् भयम् ।
यो नौ स्मरति संवादं तस्य त्वन्न भवेद् भयम् ॥२९
इत्युक्तोऽच्युतमानम्य गतो माहेश्वरो ज्वरः ।
बाणस्तु रथमारूढः प्रागाद्योत्स्यंजनार्दनम् ॥३०
ततो बाहुसहस्रेण नानायुधधरोऽसुरः ।
मुमोच परमक्रुद्धो बाणांश्चक्रायुधे नृप ॥ ३१
तस्यास्यतोऽस्त्राण्यसकृच्चक्रेण क्षुरनेमिना ।
चिच्छेद भगवान् बाहून् शाखा इव वनस्पतेः ॥३२
बाहुषुच्छिद्यमानेषु बाणस्य भगवान् भवः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *********