श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 931–940

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 931–940

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वहाँ क्या देखते हैं कि सब का सब स्थान सूर्य, अग्नि और चन्द्रमाके समान तेजस्वी रत्ननिर्मित महलोंसे घिरा हुआ है । ठौर- ठौर चित्र -विचित्र उपवन और उद्यान बने हुए हैं तथा उनमें झुंड- के - झुंड रंग- बिरंगे पक्षी कलरव कर रहे हैं । सरोवरोंमें कुमुदिनी तथा श्वेत, नील और सौगन्धिक — भाँति- भाँतिके कमल खिले हुए हैं; सुन्दर-सुन्दर स्त्री- पुरुष बन -ठनकर इधर- उधर विचर रहे हैं । उस स्थानको देखकर ब्राह्मणदेवता सोचने लगे – ' मैं यह क्या देख रहा हूँ? यह किसका स्थान है? यदि यह वही स्थान है, जहाँ मैं रहता था तो यह ऐसा कैसे हो गया ' ॥२१-२३ ॥ इस प्रकार वे सोच ही रहे थे कि देवताओंके समान सुन्दर- सुन्दर स्त्री--पुरुषपु गाजे - बाजेके साथ मंगलगीत गाते हुए उस महाभाग्यवान् ब्राह्मणकी अगवानी करनेके लिये आये ॥२४ ॥ पतिदेवका शुभागमन सुनकर ब्राह्मणीको अपार आनन्द हुआ और वह

हड़बड़ाकर जल्दी- जल्दी घरसे निकल आयी, वह ऐसी मालूम होती थी मानो मूर्तिमती लक्ष्मीजी ही कमलवनसे पधारी हों ॥ २५ ॥ पतिदेवको देखते ही पतिव्रता पत्नीके नेत्रोंमें प्रेम

और उत्कण्ठाके आवेगसे आँसू छलक आये । उसने अपने नेत्र बंद कर लिये । ब्राह्मणीने बड़े प्रेमभावसे उन्हें नमस्कार किया और मन- ही-मन आलिंगन भी ॥ २६ ॥

प्रिय परीक्षित्! ब्राह्मणपत्नी सोनेका हार पहनी हुई दासियोंके बीचमें विमानस्थित देवांगनाके समान अत्यन्त शोभायमान एवं देदीप्यमान हो रही थी । उसे इस रूपमें देखकर वे विस्मित हो गये ॥२७ ॥ उन्होंने अपनी पत्नीके साथ बड़े प्रेमसे अपने महलमें प्रवेश किया ।

उनका महल क्या था, मानो देवराज इन्द्रका निवासस्थान । इसमें मणियोंके सैकड़ों खंभे खड़े थे ॥२८ ॥ हाथीके दाँतके बने हुए और सोनेके पातसे मँढ़े हुए पलंगोंपर दूधके फेनकी तरह

श्वेत और कोमल बिछौने बिछ रहे थे । बहुत - से चँवर वहाँ रखे हुए थे, जिनमें सोनेकी डंडियाँ लगी हुई थीं ॥२९ ॥ सोनेके सिंहासन शोभायमान हो रहे थे, जिनपर बड़ी कोमल- कोमल

गद्दियाँ लगी हुई थीं! ऐसे चंदोवे भी झिलमिला रहे थे जिनमें मोतियोंकी लड़ियाँ लटक रही थीं ॥३० ॥ स्फटिकमणिकी स्वच्छ भीतोंपर पन्नेकी पच्चीकारी की हुई थी । रत्ननिर्मित

स्त्रीमूर्तियोंके हाथोंमें रत्नोंके दीपक जगमगा रहे थे ॥३१ ॥

आसनानि च हैमानि मृदूपस्तरणानि च ।

मुक्तादामविलम्बीनि वितानानि द्युमन्ति च ॥३०

स्वच्छस्फटिककुड्येषु महामारकतेषु च ।

रत्नदीपा भ्राजमाना ललनारत्नसंयुताः ॥३१

विलोक्य ब्राह्मणस्तत्र समृद्धीः सर्वसम्पदाम् ।

तर्कयामास निर्व्यग्रः स्वसमृद्धिमहैतुकीम् ॥३२

नूनं बतैतन्मम दुर्भगस्य शश्वद्दरिद्रस्य समृद्धिहेतुः । महाविभूतेरवलोकतोऽन्यो ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

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नैवोपपद्येत यदूत्तमस्य ॥३३ नन्वब्रुवाणो दिशते समक्षं याचिष्णवे भूर्यपि भूरिभोजः । पर्जन्यवत्तत् स्वयमीक्षमाणो दाशार्हकाणामृषभः सखा मे ॥३४ किंचित्करोत्युर्वपि यत् स्वदत्तं सुहृत्कृतं फल्गवपि भूरिकारी । मयोपनीतां पृथुकैकमुष्टिं प्रत्यग्रहीत् प्रीतियुतो महात्मा ॥३५ तस्यैव मे सौहृदसख्यमैत्री दास्यं पुनर्जन्मनि जन्मनि स्यात् । महानुभावेन गुणालयेन विषज्जतस्तत्पुरुषप्रसंग: ॥३६ इस प्रकार समस्त सम्पत्तियोंकी समृद्धि देखकर और उसका कोई प्रत्यक्ष कारण न पाकर, बड़ी गम्भीरतासे ब्राह्मणदेवता विचार करने लगे कि मेरे पास इतनी सम्पत्ति कहाँसे आ गयी ॥३२ ॥ वे मन - ही - मन कहने लगे - ' मैं जन्मसे ही भाग्यहीन और दरिद्र हूँ । फिर मेरी

इस सम्पत्ति - समृद्धिका कारण क्या है? अवश्य ही परमैश्वर्यशाली यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णके कृपाकटाक्षके अतिरिक्त और कोई कारण नहीं हो सकता ॥३३ ॥ यह सब कुछ

उनकी करुणाकी ही देन है । स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण पूर्णकाम और लक्ष्मीपति होनेके कारण अनन्त भोग- सामग्रियोंसे युक्त हैं । इसलिये वे याचक भक्तको उसके मनका भाव जानकर बहुत कुछ दे देते हैं, परन्तु उसे समझते हैं बहुत थोड़ा; इसलिये सामने कुछ कहते नहीं । मेरे यदुवंशशिरोमणि सखा श्यामसुन्दर सचमुच उस मेघसे भी बढ़कर उदार हैं, जो समुद्रको भर देनेकी शक्ति रखनेपर भी किसानके सामने न बरसकर उसके सो जानेपर रातमें बरसता है और बहुत बरसनेपर भी थोड़ा ही समझता है || ३४ || मेरे प्यारे सखा श्रीकृष्ण देते हैं बहुत, पर उसे मानते हैं बहुत थोड़ा! और उनका प्रेमी भक्त यदि उनके लिये कुछ भी कर दे, तो वे उसको बहुत मान लेते हैं । देखो तो सही! मैंने उन्हें केवल एक मुट्ठी चिउड़ा भेंट किया था, पर उदारशिरोमणि श्रीकृष्णने उसे कितने प्रेमसे स्वीकार किया || ३५ || मुझे जन्म-जन्म उन्हींका प्रेम, उन्हींकी हितैषिता, उन्हींकी मित्रता और उन्हींकी सेवा प्राप्त हो । मुझे सम्पत्तिकी आवश्यकता नहीं, सदा-सर्वदा उन्हीं गुणोंके एकमात्र निवासस्थान महानुभाव भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें मेरा अनुराग बढ़ता जाय और उन्हींके प्रेमी भक्तोंका सत्संग प्राप्त हो ॥३६ ॥ अजन्मा भगवान् श्रीकृष्ण सम्पत्ति आदिके दोष जानते हैं । वे देखते हैं कि

बड़े - बड़े धनियोंका धन और ऐश्वर्यके मदसे पतन हो जाता है । इसलिये वे अपने अदूरदर्शी ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

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भक्तको उसके माँगते रहनेपर भी तरह- तरहकी सम्पत्ति, राज्य और ऐश्वर्य आदि नहीं देते । यह उनकी बड़ी कृपा है' ॥ ३७ ॥ परीक्षित्! अपनी बुद्धिसे इस प्रकार निश्चय करके वे

ब्राह्मणदेवता त्यागपूर्वक अनासक्तभावसे अपनी पत्नीके साथ भगवत्प्रसादस्वरूप विषयोंको ग्रहण करने लगे और दिनोंदिन उनकी प्रेम- भक्ति बढ़ने लगी ॥३८ ॥

भक्ताय चित्रा भगवान् हि सम्पदो राज्यं विभूतीर्न समर्थयत्यजः । अदीर्घबोधाय विचक्षणः स्वयं पश्यन् निपातं धनिनां मदोद्भवम् ॥३७

इत्थं व्यवसितो बुद्धया भक्तोऽतीव जनार्दने ।

विषयाञ्जायया त्यक्ष्यन् बुभुजे नातिलम्पटः ॥ ३८

तस्य वै देवदेवस्य हरेर्यज्ञपतेः प्रभोः ।

ब्राह्मणाः प्रभवो दैवं न तेभ्यो विद्यते परम् ॥३९

एवं स विप्रो भगवत्सुहृत्तदा

दृष्ट्वा स्वभृत्यैरजितं पराजितम् ।

तद्धयानवेगोद्ग्रथितात्मबन्धन- स्तद्धाम लेभेऽचिरतः सतां गतिम् ॥४०

एतद् ब्रह्मण्यदेवस्य श्रुत्वा ब्रह्मण्यतां नरः ।

लब्धभावो भगवति कर्मबन्धाद् विमुच्यते ॥४१

प्रिय परीक्षित्! देवताओंके भी आराध्यदेव भक्त- भयहारी यज्ञपति सर्वशक्तिमान् भगवान् स्वयं ब्राह्मणोंको अपना प्रभु, अपना इष्टदेव मानते हैं । इसलिये ब्राह्मणोंसे बढ़कर और कोई भी प्राणी जगत्में नहीं है ॥ ३ ९ ॥ इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णके प्यारे सखा उस ब्राह्मणने देखा कि ‘ यद्यपि भगवान् अजित हैं, किसीके अधीन नहीं हैं; फिर भी वे अपने सेवकोंके अधीन हो जाते हैं, उनसे पराजित हो जाते हैं, ' अब वे उन्हींके ध्यानमें तन्मय हो गये । ध्यानके आवेगसे उनकी अविद्याकी गाँठ कट गयी और उन्होंने थोड़े ही समयमें भगवान्का धाम, जो कि संतोंका एकमात्र आश्रय है, प्राप्त किया || ४० || परीक्षित्! ब्राह्मणोंको अपना इष्टदेव माननेवाले भगवान् श्रीकृष्णकी इस ब्राह्मणभक्तिको जो सुनता है, उसे भगवान्‌के चरणोंमें प्रेमभाव प्राप्त हो जाता है और वह कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ ४१ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे पृथुकोपाख्यानं नामैकाशीतितमोऽध्यायः ॥८१ ॥

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पृष्ठ 934

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अथ द्वयशीतितमोऽध्यायः भगवान् श्रीकृष्ण - बलरामसे गोप - गोपियोंकी भेंट श्रीशुक उवाच

अथैकदा द्वारवत्यां वसतो रामकृष्णयोः ।

सूर्योपरागः सुमहानासीत् कल्पक्षये यथा ॥ १

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी द्वारकामें निवास कर रहे थे । एक बार सर्वग्रास सूर्यग्रहण लगा, जैसा कि प्रलयके समय लगा करता है ॥१ ॥ परीक्षित्! मनुष्योंको ज्योतिषियोंके द्वारा उस ग्रहणका पता पहलेसे ही चल

गया था, इसलिये सब लोग अपने- अपने कल्याणके उद्देश्यसे पुण्य आदि उपार्जन करनेके लिये समन्तपंचक - तीर्थ कुरुक्षेत्रमें आये || २ || समन्तपंचक क्षेत्र वह है, जहाँ शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ परशुरामजीने सारी पृथ्वीको क्षत्रियहीन करके राजाओंकी रुधिरधारासे पाँच बड़े - बड़े कुण्ड बना दिये थे ॥३ ॥ जैसे कोई साधारण मनुष्य अपने पापकी निवृत्तिके लिये प्रायश्चित्त

करता है, वैसे ही सर्वशक्तिमान् भगवान् परशुरामने अपने साथ कर्मका कुछ सम्बन्ध न होनेपर भी लोकमर्यादाकी रक्षाके लिये वहींपर यज्ञ किया था ॥४ ॥

तं ज्ञात्वा मनुजा राजन् पुरस्तादेव सर्वतः ।

समन्तपंचकं क्षेत्रं ययुः श्रेयोविधित्सया ॥२

निःक्षत्रियां महीं कुर्वन् रामः शस्त्रभृतां वरः ।

नृपाणां रुधिरौघेण यत्र चक्रे महाह्रदान् ॥३

ईजे च भगवान् रामो यत्रास्पृष्टोऽपि कर्मणा ।

लोकस्य ग्राहयन्नीशो यथान्योऽघापनुत्तये ॥ ४

महत्यां तीर्थयात्रायां तत्रागन् भारतीः प्रजाः ।

वृष्णयश्च तथाक्रूरवसुदेवाहुकादयः ॥ ५

ययुर्भारत तत् क्षेत्रं स्वमघं क्षपयिष्णवः ।

गदप्रद्युम्नसाम्बाद्याः सुचन्द्रशुकसारणैः ॥६

आस्तेऽनिरुद्धो रक्षायां कृतवर्मा च यूथपः ।

ते रथैर्देवधिष्ण्याभैर्हयैश्च तरलप्लवैः ॥७

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पृष्ठ 936

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गजैर्नदद्भिरभ्राभैर्नृभिर्विद्याधरद्युभिः ।

व्यरोचन्त महातेजाः पथि कांचनमालिनः ॥८

दिव्यस्रग्वस्त्रसन्नाहाः कलत्रैः खेचरा इव ।

तत्र स्नात्वा महाभागा उपोष्य सुसमाहिताः ॥ ९

परीक्षित्! इस महान् तीर्थयात्राके अवसरपर भारतवर्षके सभी प्रान्तोंकी जनता कुरुक्षेत्र आयी थी । उनमें अक्रूर, वसुदेव, उग्रसेन आदि बड़े - बूढ़े तथा गद, प्रद्युम्न, साम्ब आदि अन्य यदुवंशी भी अपने - अपने पापोंका नाश करनेके लिये कुरुक्षेत्र आये थे । प्रद्युम्ननन्दन अनिरुद्ध और यदुवंशी सेनापति कृतवर्मा -ये दोनों सुचन्द्र, शुक, सारण आदिके साथ नगरकी रक्षाके लिये द्वारकामें रह गये थे । यदुवंशी एक तो स्वभावसे ही परम तेजस्वी थे; दूसरे गलेमें सोनेकी माला, दिव्य पुष्पोंके हार, बहुमूल्य वस्त्र और कवचोंसे सुसज्जित होनेके कारण उनकी शोभा और भी बढ़ गयी थी । वे तीर्थयात्राके पथमें देवताओंके विमानके समान रथों, समुद्रकी तरंगके समान चलनेवाले घोड़ों, बादलोंके समान विशालकाय एवं गर्जना करते हुए हाथियों तथा विद्याधरोंके समान मनुष्योंके द्वारा ढोयी जानेवाली पालकियोंपर अपनी पत्नियोंके साथ इस प्रकार शोभायमान हो रहे थे, मानो स्वर्गके देवता ही यात्रा कर रहे हों । महाभाग्यवान् यदुवंशियोंने कुरुक्षेत्रमें पहुँचकर एकाग्रचित्तसे संयमपूर्वक स्नान किया और ग्रहणके उपलक्ष्यमें निश्चित कालतक उपवास किया ॥५ - ९ ॥

ब्राह्मणेभ्यो ददुर्धेनूर्वासःस्रग्रुक्ममालिनीः ।

रामह्रदेषु विधिवत् पुनराप्लुत्य वृष्णयः ॥१०

ददुः स्वन्नं द्विजाग्र्येभ्यः कृष्णे नो भक्तिरस्त्विति ।

स्वयं च तदनुज्ञाता वृष्णयः कृष्णदेवताः ॥११

भुक्त्वोपविविशुः कामं स्निग्धच्छायाङ्घ्रिपाङ्घ्रिषु ।

तत्रागतांस्ते ददृशुः सुहृत्सम्बन्धिनो नृपान् ॥१२

मत्स्योशीनरकौसल्यविदर्भकुरुसृजयान् ।

काम्बोजकैकयान् मद्रान् कुत्तीनानर्तकेरलान् ॥१३

अन्यांश्चैवात्मपक्षीयान् परांश्च शतशो नृप ।

नन्दादीन् सुहृदो गोपान् गोपीश्चोत्कण्ठिताश्चिरम् ॥१४

अन्योन्यसन्दर्शनहर्षरंहसा प्रोत्फुल्लहृद्वक्त्रसरोरुहश्रियः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

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आश्लिष्य गाढं नयनैः स्रवज्जला हृष्यत्त्वचो रुद्धगिरो ययुर्मुदम् ॥१५ स्त्रियश्च संवीक्ष्य मिथोऽतिसौहृद- स्मितामलापांगदृशोऽभिरेभिरे । स्तनैः स्तनान् कुंकुमपंकरूषितान् निहत्य दोर्भिः प्रणयाश्रुलोचनाः ॥ १६ उन्होंने ब्राह्मणोंको गोदान किया । ऐसी गौओंका दान किया जिन्हें वस्त्रोंकी सुन्दर- सुन्दर झूलें, पुष्पमालाएँ एवं सोनेकी जंजीरें पहना दी गयी थीं। इसके बाद ग्रहणका मोक्ष हो जानेपर परशुरामजीके बनाये हुए कुण्डों में यदुवंशियोंने विधिपूर्वक स्नान किया और सत्पात्र ब्राह्मणोंको सुन्दर- सुन्दर पकवानोंका भोजन कराया । उन्होंने अपने मनमें यह संकल्प किया था कि भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें हमारी प्रेमभक्ति बनी रहे । भगवान् श्रीकृष्णको ही अपना आदर्श और इष्टदेव माननेवाले यदुवंशियोंने ब्राह्मणोंसे अनुमति लेकर तब स्वयं भोजन किया और फिर घनी एवं ठंडी छायावाले वृक्षोंके नीचे अपनी- अपनी इच्छाके अनुसार डेरा डालकर ठहर गये । परीक्षित्! विश्राम कर लेनेके बाद यदुवंशियोंने अपने सुहृद् और सम्बन्धी राजाओंसे मिलना- भेंटना शुरू किया ॥१०-१२ । वहाँ मत्स्य, उशीनर, कोसल, विदर्भ, कुरु, संजय, काम्बोज, कैकय, मद्र, कुन्ति, आनर्त, केरल एवं दूसरे अनेकों देशोंके — अपने पक्षके तथा शत्रुपक्षके — सैकड़ों नरपति आये हुए थे । परीक्षित्! इनके अतिरिक्त यदुवंशियोंके परम हितैषी बन्धु नन्द आदि गोप तथा भगवान्‌के दर्शनके लिये चिरकालसे उत्कण्ठित गोपियाँ भी वँहा आयी हुई थीं । यादवोंने इन सबको देखा ॥१३-१४ ॥ परीक्षित्! एक- दूसरेके दर्शन, मिलन और वार्तालापसे सभीको बड़ा आनन्द हुआ । सभीके हृदय कमल एवं मुख- कमल खिल उठे । सब एक - दूसरेको भुजाओं में भरकर हृदयसे लगाते, उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी झड़ी लग जाती, रोम- रोम खिल उठता, प्रेमके आवेगसे बोली बंद हो जाती और सब- के - सब आनन्द -समुद्रमें डूबने - उतराने लगते ॥१५ ॥

पुरुषोंकी भाँति स्त्रियाँ भी एक- दूसरेको देखकर प्रेम और आनन्दसे भर गयीं । वे अत्यन्त सौहार्द, मन्द- मन्द मुसकान, परम पवित्र तिरछी चितवनसे देख - देखकर परस्पर भेंट - अँकवार भरने लगीं । वे अपनी भुजाओंमें भरकर केसर लगे हुए वक्षःस्थलोंको दूसरी स्त्रियोंके वक्षःस्थलोंसे दबातीं और अत्यन्त आनन्दका अनुभव करतीं । उस समय उनके नेत्रोंसे प्रेमके आँसू छलकने लगते ॥१६ ॥ अवस्था आदिमें छोटोंने बड़े - बूढ़ोंको प्रणाम किया और उन्होंने

अपनेसे छोटोंका प्रणाम स्वीकार किया । वे एक-दूसरेका स्वागत करके तथा कुशल - मंगल आदि पूछकर फिर श्रीकृष्णकी मधुर लीलाएँ आपसमें कहने - सुनने लगे ॥१७ ॥ परीक्षित्!

कुन्ती वसुदेव आदि अपने भाइयों, बहिनों, उनके पुत्रों, माता - पिता, भाभियों और भगवान् श्रीकृष्णको देखकर तथा उनसे बातचीत करके अपना सारा दुःख भूल गयीं ॥ १८ ॥

ततोऽभिवाद्य ते वृद्धान् यविष्ठैरभिवादिताः ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

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स्वागतं कुशलं पृष्ट्वा चक्रुः कृष्णकथा मिथः ॥ १७

पृथा भ्रातॄन् स्वसृर्वीक्ष्य तत्पुत्रान् पितरावपि ।

भ्रातृपत्नीर्मुकुन्दं च जहौ संकथया शुचः ॥१८

कुन्त्युवाच

आर्य भ्रातरहं मन्ये आत्मानमकृताशिषम् ।

यद् वा आपत्सु मद्वार्तां नानुस्मरथ सत्तमाः ॥१९

सुहृदो ज्ञातयः पुत्रा भ्रातरः पितरावपि ।

नानुस्मरन्ति स्वजनं यस्य दैवमदक्षिणम् ॥२०

वसुदेव उवाच

अम्ब मास्मानसूयेथा दैवक्रीडनकान् नरान् ।

ईशस्य हि वशे लोकः कुरुते कार्यतेऽथवा ॥२१

कंसप्रतापिताः सर्वे वयं याता दिशं दिशम् ।

एतर्ह्येव पुनः स्थानं दैवेनासादिताः स्वसः ॥२२

श्रीशुक उवाच

वसुदेवोग्रसेनाद्यैर्यदुभिस्तेऽर्चिता नृपाः ।

आसन्नच्युतसन्दर्शपरमानन्दनिर्वृताः ॥२३

भीष्मो द्रोणोऽम्बिकापुत्रो गान्धारी ससुता तथा ।

सदाराः पाण्डवाः कुन्ती सृजयो विदुरः कृपः ॥२४

कुन्तिभोजो विराटश्च भीष्मको नग्नजिन्महान् ।

पुरुजिद् द्रुपदः शल्यो धृष्टकेतुः सकाशिराट् ॥२५

दमघोषो विशालाक्षो मैथिलो मद्रकेकयौ ।

युधामन्युः सुशर्मा च ससुता बाह्लिकादयः ॥ २६

राजानो ये च राजेन्द्र युधिष्ठिरमनुव्रताः ।

श्रीनिकेतं वपुः शौरेः सस्त्रीकं वीक्ष्य विस्मिताः ॥२७

कुन्तीने वसुदेवजीसे कहा- भैया! मैं सचमुच बड़ी अभागिन हूँ । मेरी एक भी साध पूरी न हुई । आप- जैसे साधु -स्वभाव सज्जन भाई आपत्तिके समय मेरी सुधि भी न लें, इससे बढ़कर दुःखकी बात क्या होगी? || १ ९ || भैया! विधाता जिसके बाँयें हो जाता है उसे स्वजन- सम्बन्धी, पुत्र और माता-पिता भी भूल जाते हैं। इसमें आपलोगोंका कोई दोष नहीं ॥२० ॥

वसुदेवजीने कहा-बहिन! उलाहना मत दो । हमसे बिलग न मानो । सभी मनुष्य दैवके ******ebook converter DEMO Watermarks *******

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खिलौने हैं । यह सम्पूर्ण लोक ईश्वरके वशमें रहकर कर्म करता है और उसका फल भोगता

है ॥२१ ॥ बहिन! कंससे सताये जाकर हमलोग इधर- उधर अनेक दिशाओंमें भगे हुए थे ।

अभीकुछ ही दिन हुए, ईश्वरकृपा से हम सब पुनः अपना स्थान प्राप्त कर सके हैं ॥ २२ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! वहाँ जितने भी नरपति आये थे - वसुदेव, उग्रसेन आदि यदुवंशियोंने उनका खूब सम्मान-सत्कार किया । वे सब भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन पाकर परमानन्द और शान्तिका अनुभव करने लगे || २३ || परीक्षित्! भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य, धृतराष्ट्र, दुर्योधनादि पुत्रोंके साथ गान्धारी, पत्नियोंके सहित युधिष्ठिर आदि पाण्डव, कुन्ती, संजय, विदुर, कृपाचार्य, कुन्तिभोज, विराट, भीष्मक, महाराज नग्नजित्, पुरुजित् द्रुपद, शल्य, धृष्टकेतु, काशीनरेश, दमघोष, विशालाक्ष, मिथिलानरेश, मद्रनरेश, केकयनरेश, युधामान्यु, सुशर्मा, अपने पुत्रोंके साथ बाह्लीक और दूसरे भी युधिष्ठिरके अनुयायी नृपति भगवान् श्रीकृष्णका परम सुन्दर श्रीनिकेतन विग्रह और उनकी रानियोंको देखकर अत्यन्त विस्मित हो गये ॥२४-२७ ॥

अथ ते रामकृष्णाभ्यां सम्यक् प्राप्तसमर्हणाः ।

प्रशशंसुर्मुदा युक्ता वृष्णीन् कृष्णपरिग्रहान् ॥२८

अहो भोजपते यूयं जन्मभाजो नृणामिह ।

यत् पश्यथासकृत् कृष्णं दुर्दर्शमपि योगिनाम् ॥२९

यद्विश्रुतिः श्रुतिनुतेदमलं पुनाति

पादावनेजनपयश्च वचश्च शास्त्रम् ।

भूः कालभर्जितभगापि यदङ्घ्रिपद्म- स्पर्शोत्थशक्तिरभिवर्षति नोऽखिलार्थान् ॥३०

तद्दर्शनस्पर्शनानुपथप्रजल्प- शय्यासनाशनसयौनसपिण्डबन्धः । येषां गृहे निरयवर्त्मनि वर्ततां वः स्वर्गापवर्गविरमः स्वयमास विष्णुः ॥३१ श्रीशुक उवाच

नन्दस्तत्र यदून् प्राप्तान् ज्ञात्वा कृष्णपुरोगमान् ।

तत्रागमद् वृतो गोपैरनःस्थार्थैर्दिदृक्षया ॥३२

तं दृष्ट्वा वृष्णयो हृष्टास्तन्वः प्राणमिवोत्थिताः ।

परिषस्वजिरे गाढं चिरदर्शनकातराः ॥३३

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पृष्ठ 940

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अब वे बलरामजी तथा भगवान् श्रीकृष्णसे भलीभाँति सम्मान प्राप्त करके बड़े आनन्दसे श्रीकृष्णके स्वजनों — यदुवंशियोंकी प्रशंसा करने लगे ॥२८ ॥ उन लोगोंने मुख्यतया

उग्रसेनजीको सम्बोधित कर कहा - ' भोजराज उग्रसेनजी! सच पूछिये तो इस जगत्के मनुष्योंमें आपलोगोंका जीवन ही सफल है, धन्य है! धन्य है! क्योंकि जिन श्रीकृष्णका दर्शन बड़े - बड़े योगियोंके लिये भी दुर्लभ है, उन्हींको आपलोग नित्य - निरन्तर देखते रहते हैं ॥२९ ॥

वेदोंने बड़े आदरके साथ भगवान् श्रीकृष्णकी कीर्तिका गान किया है। उनके चरणधोवनका जल गंगाजल, उनकी वाणी- शास्त्र और उनकी कीर्ति इस जगत्‌को अत्यन्त पवित्र कर रही है । अभी हमलोगोंके जीवनकी ही बात है, समयके फेरसे पृथ्वीका सारा सौभाग्य नष्ट हो चुका था; परन्तु उनके चरणकमलोंके स्पर्शसे पृथ्वीमें फिर समस्त शक्तियोंका संचार हो गया और अब वह फिर हमारी समस्त अभिलाषाओं - मनोरथोंको पूर्ण करने लगी ॥ ३० ॥

उग्रसेनजी! आपलोगोंका श्रीकृष्णके साथ वैवाहिक एवं गोत्रसम्बन्ध है । यही नहीं, आप हर समय उनका दर्शन और स्पर्श प्राप्त करते रहते हैं । उनके साथ चलते हैं, बोलते हैं, सोते हैं, बैठते हैं और खाते - पीते हैं । यों तो आपलोग गृहस्थीकी झंझटोंमें फँसे रहते हैं — जो नरकका मार्ग है, परन्तु आपलोगोंके घर वे सर्वव्यापक विष्णु भगवान् मूर्तिमान् रूपसे निवास करते हैं, जिनके दर्शनमात्रसे स्वर्ग और मोक्षतककी अभिलाषा मिट जाती है ' ॥३१ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! जब नन्दबाबाको यह बात मालूम हुई कि श्रीकृष्ण आदि यदुवंशी कुरुक्षेत्रमें आये हुए हैं, तब वे गोपोंके साथ अपनी सारी सामग्री गाड़ियोंपर लादकर अपने प्रिय पुत्र श्रीकृष्ण- बलराम आदिको देखनेके लिये वहाँ आये || ३२ || नन्द आदि गोपोंको देखकर सब- के - सब यदुवंशी आनन्दसे भर गये । वे इस प्रकार उठ खड़े हुए, मानो मृत शरीरमें प्राणोंका संचार हो गया हो । वे लोग एक- दूसरेसे मिलनेके लिये बहुत दिनोंसे आतुर हो रहे थे । इसलिये एक-दूसरेको बहुत देरतक अत्यन्त गाढ़भावसे आलिंगन करते रहे ॥३३ ॥ वसुदेवजीने अत्यन्त प्रेम और आनन्दसे विह्वल होकर नन्दजीको हृदयसे

लगा लिया । उन्हें एक-एक करके सारी बातें याद हो आयीं - कंस किस प्रकार उन्हें सताता था और किस प्रकार उन्होंने अपने पुत्रको गोकुलमें ले जाकर नन्दजीके घर रख दिया था ॥३४ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने माता यशोदा और पिता नन्दजीके हृदयसे

लगकर उनके चरणोंमें प्रणाम किया । परीक्षित्! उस समय प्रेमके उद्रेकसे दोनों भाइयोंका गला रुँध गया, वे कुछ भी बोल न सके || ३५ || महाभाग्यवती यशोदाजी और नन्दबाबाने दोनों पुत्रोंको अपनी गोदमें बैठा लिया और भुजाओंसे उनका गाढ़ आलिंगन किया । उनके हृदयमें चिरकालतक न मिलनेका जो दुःख था, वह सब मिट गया || ३६ || रोहिणी और देवकीजीने व्रजेश्वरी यशोदाको अपनी अँकवारमें भर लिया । यशोदाजीने उन लोगोंके साथ मित्रताका जो व्यवहार किया था, उसका स्मरण करके दोनोंका गला भर आया । वे यशोदाजीसे कहने लगीं- ॥ ३७ ॥ ' यशोदारानी! आपने और व्रजेश्वर नन्दजीने हमलोगोंके

साथ जो मित्रताका व्यवहार किया है, वह कभी मिटनेवाला नहीं है, उसका बदला इन्द्रका ऐश्वर्य पाकर भी हम किसी प्रकार नहीं चुका सकतीं । नन्दरानीजी! भला ऐसा कौन कृतघ्न है, जो आपके उस उपकारको भूल सके? ॥ ३८ ॥ देवि! जिस समय बलराम और श्रीकृष्णने

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