श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 941–950
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 941–950
पृष्ठ 941
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अपने मा - बापको देखातक न था और इनके पिताने धरोहरके रूपमें इन्हें आप दोनोंके पास रख छोड़ा था, उस समय आपने इन दोनोंकी इस प्रकार रक्षा की, जैसे पलकें पुतलियोंकी रक्षा करती हैं । तथा आपलोगोंने ही इन्हें खिलाया-पिलाया, दुलार किया और रिझाया; इनके मंगलके लिये अनेकों प्रकारके उत्सव मनाये । सच पूछिये, तो इनके मा- बाप आप ही लोग हैं । आपलोगोंकी देख - रेखमें इन्हें किसीकी आँचतक न लगी, ये सर्वथा निर्भय रहे, ऐसा करना आपलोगोंके अनुरूप ही था । क्योंकि सत्पुरुषोंकी दृष्टिमें अपने- परायेका भेद- भाव नहीं रहता । नन्दरानीजी! सचमुच आपलोग परम संत हैं ॥३९ ॥
वसुदेवः परिष्वज्य सम्प्रीतः प्रेमविह्वलः ।
स्मरन् कंसकृतान् क्लेशान् पुत्रन्यासं च गोकुले ॥ ३४
कृष्णारामौ परिष्वज्य पितरावभिवाद्य च ।
न किंचनोचतुः प्रेम्णा साश्रुकण्ठौ कुरूद्वह ॥ ३५
तावात्मासनमारोप्य बाहुभ्यां परिरभ्य च ।
यशोदा च महाभागा सुतौ विजहतुः शुचः ॥ ३६
रोहिणी देवकी चाथ परिष्वज्य व्रजेश्वरीम् ।
स्मरन्त्यौ तत्कृतां मैत्रीं बाष्पकण्ठ्यौ समूचतुः ॥ ३७
का विस्मरेत वां मैत्रीमनिवृत्तां व्रजेश्वरि ।
अवाप्याप्यैन्द्रमैश्वर्यं यस्या नेह प्रतिक्रिया ॥३८
एतावदृष्टपितरौ युवयोः स्म पित्रोः सम्प्रीणनाभ्युदयपोषणपालनानि । प्राप्योषतुर्भवति पक्ष्म ह यद्वदक्ष्णो- र्न्यस्तावकुत्र च भयौ न सतां परः स्वः ॥ ३ ९ श्रीशुक उवाच गोप्यश्च कृष्णमुपलभ्य चिरादभीष्टं
यत्प्रेक्षणे दृशिषु पक्ष्मकृतं शपन्ति ।
दृग्भिर्हृदीकृतमलं परिरभ्य सर्वा- स्तद्भावमापुरपि नित्ययुजां दुरापम् ॥४०
भगवांस्तास्तथाभूता विविक्त उपसंगतः ।
आश्लिष्यानामयं पृष्ट्वा प्रहसन्निदमब्रवीत् ॥४१
******ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 942
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अपि स्मरथ नः सख्यः स्वानामर्थचिकीर्षया ।
गतांश्चिरायिताञ्छत्रुपक्षक्षपणचेतसः ॥४२
अप्यवध्यायथास्मान् स्विदकृतज्ञाविशंकया ।
नूनं भूतानि भगवान् युनक्ति वियुनक्ति च ॥४३
वायुर्यथा घनानीकं तृणं तूलं रजांसि च ।
संयोज्याक्षिपते भूयस्तथा भूतानि भूतकृत् ॥४४
मयि भक्तिर्हि भूतानाममृतत्वाय कल्पते ।
दिष्ट्या यदासीन्मत्स्नेहो भवतीनां मदापनः ॥४५
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! मैं कह चुका हूँ कि गोपियोंके परम प्रियतम्, जीवनसर्वस्व श्रीकृष्ण ही थे । जब उनके दर्शनके समय नेत्रोंकी पलकें गिर पड़तीं, तब वे पलकोंको बनानेवालेको ही कोसने लगतीं । उन्हीं प्रेमकी मूर्ति गोपियोंको आज बहुत दिनोंके बाद भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन हुआ । उनके मनमें इसके लिये कितनी लालसा थी, इसका अनुमान भी नहीं किया जा सकता । उन्होंने नेत्रोंके रास्ते अपने प्रियतम श्रीकृष्णको हृदयमें ले जाकर गाढ़ आलिंगन किया और मन-ही-मन आलिंगन करते-करते तन्मय हो गयीं । परीक्षित्! कहाँतक कहूँ, वे उस भावको प्राप्त हो गयीं, जो नित्य निरन्तर अभ्यास करनेवाले योगियोंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है ॥४० ॥ जब भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि गोपियाँ मुझसे
तादात्म्यको प्राप्त —एक हो रही हैं, तब वे एकान्तमें उनके पास गये, उनको हृदयसे लगाया, कुशल- मंगल पूछा और हँसते हुए यों बोले – ॥४१ ॥ 'सखियो! हमलोग अपने स्वजन-सम्बन्धियोंका काम करनेके लिये व्रजसे बाहर चले आये और इस प्रकार तुम्हारी - जैसी
प्रेयसियोंको छोड़कर हम शत्रुओंका विनाश करनेमें उलझ गये । बहुत दिन बीत गये, क्या कभी तुमलोग हमारा स्मरण भी करती हो? ॥ ४२ ॥ मेरी प्यारी गोपियो! कहीं तुमलोगोंके
मनमें यह आशंका तो नहीं हो गयी है कि मैं अकृतज्ञ हूँ और ऐसा समझकर तुमलोग हमसे बुरा तो नहीं मानने लगी हो? निस्सन्देह भगवान् ही प्राणियोंके संयोग और वियोगके कारण ॥४३ ॥ जैसे वायु बादलों, तिनकों, रूई और धूलके कणोंको एक- दूसरेसे मिला देती है
और फिर स्वच्छन्दरूपसे उन्हें अलग- अलग कर देती है, वैसे ही समस्त पदार्थोंके निर्माता भगवान् भी सबका संयोग - वियोग अपनी इच्छानुसार करते रहते हैं ॥ ४४ ॥ सखियो! यह बड़े
सौभाग्यकी बात है कि तुम सब लोगोंको मेरा वह प्रेम प्राप्त हो चुका है, जो मेरी ही प्राप्ति करानेवाला है । क्योंकि मेरे प्रति की हुई प्रेम- भक्ति प्राणियोंको अमृतत्व ( परमानन्द- धाम ) प्रदान करनेमें समर्थ है ॥४५ ॥ प्यारी गोपियो! जैसे घट, पट आदि जितने भी भौतिक पदार्थ
हैं, उनके आदि, अन्त और मध्यमें, बाहर और भीतर, उनके मूल कारण पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि तथा आकाश ही ओतप्रोत हो रहे हैं, वैसे ही जितने भी पदार्थ हैं, उनके पहले, पीछे, बीचमें, बाहर और भीतर केवल मैं ही मैं हूँ ॥ ४६ ॥ इसी प्रकार सभी प्राणियोंके शरीरमें यही
****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 943
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पाँचों भूत कारणरूपसे स्थित हैं और आत्मा भोक्ताके रूपसे अथवा जीवके रूपसे स्थित है । परन्तु मैं इन दोनोंसे परे अविनाशी सत्य हूँ । ये दोनों मेरे ही अंदर प्रतीत हो रहे हैं, तुमलोग ऐसा अनुभव करो ॥४७ ॥
अहं हि सर्वभूतानामादिरन्तोऽन्तरं बहिः ।
भौतिकानां यथा खं वार्भूर्वायुर्ज्योतिरंगनाः ॥४६
एवं ह्येतानि भूतानि भूतेष्वात्माऽऽत्मना ततः ।
उभयं मय्यथ परे पश्यताभातमक्षरे ॥४७
श्रीशुक उवाच
अध्यात्मशिक्षया गोप्य एवं कृष्णेन शिक्षिताः ।
तदनुस्मरणध्वस्तजीवकोशास्तमध्यगन् ॥ ४८
आहुश्च ते नलिननाभ पदारविन्दं योगेश्वरैर्हृदि विचिन्त्यमगाधबोधैः । संसारकूपपतितोत्तरणावलम्बं गेहञ्जुषामपि मनस्युदियात् सदा नः ॥४९ श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार गोपियोंको अध्यात्मज्ञानकी शिक्षासे शिक्षित किया । उसी उपदेशके बार- बार स्मरणसे गोपियोंका जीवकोश — लिंगशरीर नष्ट हो गया और वे भगवान् से एक हो गयीं, भगवान्को ही सदा-सर्वदाके लिये प्राप्त हो गयीं ॥४८ ॥
उन्होंने कहा— ' हे कमलनाभ! अगाधबोध- सम्पन्न बड़े - बड़े योगेश्वर अपने हृदयकमलमें आपके चरणकमलोंका चिन्तन करते रहते हैं । जो लोग संसारके कुएँमें गिरे हुए हैं, उन्हें उससे निकलनेके लिये आपके चरणकमल ही एकमात्र अवलम्बन हैं । प्रभो! आप ऐसी कृपा कीजिये कि आपका वह चरणकमल, घर-गृहस्थके काम करते रहनेपर भी सदा - सर्वदा हमारे हृदयमें विराजमान रहे, हम एक क्षणके लिये भी उसे न भूलें ॥ ४ ९ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे वृष्णिगोपसंगमो नाम द्वयशीतितमोऽध्यायः ॥८२ ॥
१. शैव्यो धृष्टकेतुश्च काशि० । २. यदुश्चावन्तिकादयः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 944
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 945
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अथ त्र्यशीतितमोऽध्यायः भगवान्की पटरानियोंके साथ द्रौपदीकी बातचीत श्रीशुक उवाच
तथानुगृह्य भगवान् गोपीनां स गुरुर्गतिः ।
युधिष्ठिरमथापृच्छत् सर्वांश्च सुहृदोऽव्ययम् ॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण ही गोपियोंको शिक्षा देनेवाले हैं और वही उस शिक्षाके द्वारा प्राप्त होनेवाली वस्तु हैं । इसके पहले, जैसा कि वर्णन किया गया है, भगवान् श्रीकृष्णने उनपर महान् अनुग्रह किया । अब उन्होंने धर्मराज युधिष्ठिर तथा अन्य समस्त सम्बन्धियोंसे कुशल- मंगल पूछा ॥१ ॥ भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंका दर्शन
करनेसे ही उनके सारे अशुभ नष्ट हो चुके थे । अब जब भगवान् श्रीकृष्णने उनका सत्कार किया, कुशल- मंगल पूछा, तब वे अत्यन्त आनन्दित होकर उनसे कहने लगे— ॥ २ ॥
‘ भगवन्! बड़े बड़े महापुरुष मन- ही -मन आपके चरणारविन्दका मकरन्द रस पान करते रहते हैं । कभी - कभी उनके मुखकमलसे लीला- कथाके रूपमें वह रस छलक पड़ता है । प्रभो! वह इतना अद्भुत दिव्य रस है कि कोई भी प्राणी उसको पी ले तो वह जन्म- मृत्युके चक्करमें डालनेवाली विस्मृति अथवा अविद्याको नष्ट कर देता है । उसी रसको जो लोग अपने कानोंके दोनोंमें भर- भरकर जी -भर पीते हैं, उनके अमंगलकी आशंका ही क्या है? ॥३ ॥ भगवन्!
आप एकरस ज्ञानस्वरूप और अखण्ड आनन्दके समुद्र हैं । बुद्धि - वृत्तियोंके कारण होनेवाली जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति- ये तीनों अवस्थाएँ आपके स्वयंप्रकाश स्वरूपतक पहुँच ही नहीं पातीं, दूरसे ही नष्ट हो जाती हैं । आप परमहंसोंकी एकमात्र गति हैं । समयके फेरसे वेदोंका ह्रास होते देखकर उनकी रक्षाके लिये आपने अपनी अचिन्त्य योगमायाके द्वारा मनुष्यका - सा शरीर ग्रहण किया है । हम आपके चरणोंमें बार- बार नमस्कार करते हैं ' ॥४ ॥
त एवं लोकनाथेन परिपृष्टाः सुसत्कृताः ।
प्रत्यूचुर्हृष्टमनसस्तत्पादेक्षाहतांहसः ॥२
कुतोऽशिवं त्वच्चरणाम्बुजासवं महन्मनस्तो मुखनिःसृतं क्वचित् । पिबन्ति ये कर्णपुटैरलं प्रभो देहम्भृतां देहकृदस्मृतिच्छिदम् ॥३ हित्वाऽऽत्मधामविधुतात्मकृतत्र्यवस्थ- मानन्दसम्प्लवमखण्डमकुण्ठबोधम् । कालोपसृष्टनिगमावन आत्तयोग- ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 946
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
मायाकृतिं परमहंसगतिं नताः स्म ॥४ ऋषिरुवाच
इत्युत्तमश्लोकशिखामणिं जने- ष्वभिष्टुवत्स्वन्धककौरवस्त्रियः ।
समेत्य गोविन्दकथा मिथोऽगृणं- स्त्रिलोकगीताः शृणु वर्णयामि ते ॥५
द्रौपद्युवाच
हे वैदर्भ्यच्युतो भद्रे हे जाम्बवति कौसले ।
हे सत्यभामे कालिन्दि शैब्ये रोहिणि लक्ष्मणे ॥६
हे कृष्णपत्न्य एतन्नो ब्रूत वो भगवान् स्वयम् ।
उपयेमे यथा लोकमनुकुर्वन् स्वमायया ॥७
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! जिस समय दूसरे लोग इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति कर रहे थे, उसी समय यादव और कौरव-कुलकी स्त्रियाँ एकत्र होकर आपसमें भगवान्की त्रिभुवन -विख्यात लीलाओंका वर्णन कर रही थीं । अब मैं तुम्हें उन्हींकी बातें सुनाता हूँ ॥५ ॥
द्रौपदीने कहा-हे रुक्मिणी,II भद्रे, हे जाम्बवती, सत्ये, हे सत्यभामे, कालिन्दी, शैव्ये, लक्ष्मणे, रोहिणी और अन्यान्य श्रीकृष्णपत्नियो! तुमलोग हमें यह तो बताओ कि स्वयं भगवान् श्रीकृष्णने अपनी मायासे लोगोंका अनुकरण करते हुए तुमलोगोंका किस प्रकार पाणिग्रहण किया? ॥६-७ ॥ रुक्मिण्युवाच चैद्याय मार्पयितुमुद्यतकार्मुकेषु राजस्वजेयभटशेखरिताङ्घ्रिरेणुः । निन्ये मृगेन्द्र इव भागमजावियूथात् तच्छ्रीनिकेतचरणोऽस्तु ममार्चनाय ॥ ८ सत्यभामोवाच यो मे सनाभिवधतप्तहृदा ततेन लिप्ताभिशापमपमार्टुमुपाजहार । जित्वर्क्षराजमथ रत्नमदात् स तेन भीतः पितादिशत मां प्रभवेऽपि दत्ताम् ॥९ जाम्बवत्युवाच ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 947
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्राज्ञाय देहकृदमुं निजनाथदेवं सीतापतिं त्रिणवहान्यमुनाभ्ययुध्यत् । ज्ञात्वा परीक्षित उपाहरदर्हणं मां पादौ प्रगृह्य मणिनाहममुष्य दासी ॥१० कालिन्द्युवाच
तपश्चरन्तीमाज्ञाय स्वपादस्पर्शनाशया ।
सख्योपेत्याग्रहीत् पाणिं योऽहं तद्गृहमार्जनी ॥ ११
रुक्मिणीजीने कहा- द्रौपदीजी! जरासन्ध आदि सभी राजा चाहते थे कि मेरा विवाह शिशुपालके साथ हो; इसके लिये सभी शस्त्रास्त्रसे सुसज्जित होकर युद्धके लिये तैयार थे । परन्तु भगवान् मुझे वैसे ही हर लाये, जैसे सिंह बकरी और भेड़ोंके झुंडमेंसे अपना भाग छीन ले जाय । क्यों न हो–जगत्में जितने भी अजेय वीर हैं, उनके मुकुटोंपर इन्हींकी चरणधूलि शोभायमान होती है । द्रौपदीजी! मेरी तो यही अभिलाषा है कि भगवान्के वे ही समस्त सम्पत्ति और सौन्दर्योंके आश्रय चरणकमल जन्म-जन्म मुझे आराधना करनेके लिये प्राप्त होते रहे, मैं उन्हींकी सेवामें लगी रहूँ ॥ ८ ॥
सत्यभामाने कहा — द्रौपदीजी! मेरे पिताजी अपने भाई प्रसेनकी मृत्युसे बहुत दुःखी हो रहे थे, अतः उन्होंने उनके वधका कलंक भगवान्पर ही लगाया । उस कलंकको दूर करनेके लिये भगवान्ने ऋक्षराज जाम्बवान्पर विजय प्राप्त की और वह रत्न लाकर मेरे पिताको दे दिया । अब तो मेरे पिताजी मिथ्या कलंक लगानेके कारण डर गये । अतः यद्यापि वे दूसरेको मेरा वाग्दान कर चुके थे, फिर भी उन्होंने मुझे स्यमन्तकमणिके साथ भगवान्के चरणोंमें ही समर्पित कर दिया ॥९ ॥
जाम्बवतीने कहा- द्रौपदीजी! मेरे पिता ऋक्षराज जाम्बवान्को इस बातका पता न था कि यही मेरे स्वामी भगवान् सीतापति हैं । इसलिये वे इनसे सत्ताईस दिनतक लड़ते रहे । परन्तु जब परीक्षा पूरी हुई, उन्होंने जान लिया कि ये भगवान् राम ही हैं, तब इनके चरणकमल पकड़कर स्यमन्तकमणिके साथ उपहारके रूपमें मुझे समर्पित कर दिया। मैं यही चाहती हूँ कि जन्म - जन्म इन्हींकी दासी बनी रहूँ ॥१० ॥
कालिन्दीने कहा —द्रौपदीजी! जब भगवान्को यह मालूम हुआ कि मैं उनके चरणोंका स्पर्श करनेकी आशा - अभिलाषासे तपस्या कर रही हूँ, तब वे अपने सखा अर्जुनके साथ यमुना- तटपर आये और मुझे स्वीकार कर लिया। मैं उनका घर बुहारनेवाली उनकी दासी ॥११ ॥
मित्रविन्दोवाच यो मां स्वयंवर उपेत्य विजित्य भूपान् निन्ये श्वयूथगमिवात्मबलिं द्विपारिः । भ्रातॄंश्च मेऽपकुरुतः स्वपुरं श्रियौक- ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 948
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
स्तस्यास्तु मेऽनुभवमङ्घ्यवनेजनत्वम् ॥ १२ सत्योवाच सप्तोक्षणोऽतिबलवीर्यसुतीक्ष्णशृंगान् पित्रा कृतान् क्षितिपवीर्यपरीक्षणाय । तान् वीरदुर्मदहनस्तरसा निगृह्य क्रीडन् बबन्ध ह यथा शिशवोऽजतोकान् ॥१३
य इत्थं वीर्यशुक्लां मां दासीभिश्चतुरंगिणीम् ।
पथि निर्जित्य राजन्यान् निन्ये तद्दास्यमस्तु मे ॥१४
भद्रोवाच
पिता मे मातुलेयाय स्वयमाहूय दत्तवान् ।
कृष्णे कृष्णाय तच्चित्तामक्षौहिण्या सखीजनैः ॥१५
अस्य मे पादसंस्पर्शो भवेज्जन्मनि जन्मनि ।
कर्मभिर्भ्राम्यमाणाया येन तच्छ्रेय आत्मनः ॥१६
लक्ष्मणोवाच ममापि राज्ञ्यच्युतजन्मकर्म श्रुत्वा मुहुर्नारदगीतमास ह । चित्तं मुकुन्दे किल पद्महस्तया वृतः सुसंमृश्य विहाय लोकपान् ॥१७ मित्रविन्दाने कहा—द्रौपदीजी! मेरा स्वयंवर हो रहा था । वहाँ आकर भगवान्ने सब राजाओंको जीत लिया और जैसे सिंह झुंड के झुंड कुत्तोंमेंसे अपना भाग ले जाय, वैसे ही मुझे अपनी शोभामयी द्वारका - पुरीमें ले आये । मेरे भाइयोंने भी मुझे भगवान्से छुड़ाकर मेरा अपकार करना चाहा, परन्तु उन्होंने उन्हें भी नीचा दिखा दिया । मैं ऐसा चाहती हूँ कि मुझे जन्म- जन्म उनके पाँव पखारनेका सौभाग्य प्राप्त होता रहे ॥१२ ॥
सत्याने कहा—द्रौपदीजी! मेरे पिताजीने मेरे स्वयंवरमें आये हुए राजाओंके बल-पौरुषकी परीक्षाके लिये बड़े बलवान् और पराक्रमी, तीखे सींगवाले सात बैल रख छोड़े थे । उन बैलोंने बड़े -बड़े वीरोंका घमंड चूर- चूर कर दिया था । उन्हें भगवान्ने खेल- खेलमें ही झपटकर पकड़ लिया, नाथ लिया और बाँध दिया; ठीक वैसे ही, जैसे छोटे -छोटे बच्चे बकरीके बच्चोंको पकड़ लेते हैं ॥१३ ॥ इस प्रकार भगवान् बल- पौरुषके द्वारा मुझे प्राप्त
कर चतुरंगिणी सेना और दासियोंके साथ द्वारका ले आये । मार्गमें जिन क्षत्रियोंने विघ्न डाला, उन्हें जीत भी लिया । मेरी यही अभिलाषा है कि मुझे इनकी सेवाका अवसर सदा - सर्वदा प्राप्त होता रहे ॥१४ ॥
****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 949
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
भद्राने कहा —द्रौपदीजी! भगवान् मेरे मामाके पुत्र हैं । मेरा चित्त इन्हींके चरणोंमें अनुरक्त हो गया था । जब मेरे पिताजीको यह बात मालूम हुई, तब उन्होंने स्वयं ही भगवान्को बुलाकर अक्षौहिणी सेना और बहुत - सी दासियोंके साथ मुझे इन्हींके चरणोंमें समर्पित कर दिया ॥१५ ॥ मैं अपना परम कल्याण इसीमें समझती हूँ कि कर्मके अनुसार मुझे जहाँ- जहाँ
जन्म लेना पड़े, सर्वत्र इन्हींके चरणकमलोंका संस्पर्श प्राप्त होता रहे ॥१६ ॥
लक्ष्मणाने कहा— रानीजी! देवर्षि नारद बार- बार भगवान्के अवतार और लीलाओंका गान करते रहते थे । उसे सुनकर और यह सोचकर कि लक्ष्मीजीने समस्त लोकपालोंका त्याग करके भगवान्का ही वरण किया, मेरा चित्त भगवान्के चरणोंमें आसक्त हो गया ॥१७ ॥
ज्ञात्वा मम मतं साध्वि पिता दुहितृवत्सलः ।
बृहत्सेन इति ख्यातस्तत्रोपायमचीकरत् ॥१८
यथा स्वयंवरे राज्ञि मत्स्यः पार्थेप्सया कृतः ।
अयं तु बहिराच्छन्नो दृश्यते स जले परम् ॥१९
श्रुत्वैतत् सर्वतो भूपा आययुर्मत्पितुः पुरम् ।
सर्वास्त्रशस्त्रतत्त्वज्ञाः सोपाध्यायाः सहस्रशः ॥२०
पित्रा सम्पूजिताः सर्वे यथावीर्यं यथावयः ।
आददुः सशरं चापं वेद्धुं पर्षदि मद्धियः ॥२१
आदाय व्यसृजन् केचित् सज्यं कर्तुमनीश्वराः ।
आकोटि ज्यां समुत्कृष्य पेतुरेकेऽमुना हताः ॥ २२
सज्यं कृत्वा परे वीरा मागधाम्बष्ठचेदिपाः ।
भीमो दुर्योधनः कर्णो नाविन्दंस्तदवस्थितिम् ॥२३
मत्स्याभासं जले वीक्ष्य ज्ञात्वा च तदवस्थितिम् ।
पार्थो यत्तोऽसृजद् बाणं नाच्छिनत् पस्पृशे परम् ॥ २४
राजन्येषु निवृत्तेषु भग्नमानेषु मानिषु ।
भगवान् धनुरादाय सज्यं कृत्वाथ लीलया ॥२५
तस्मिन् सन्धाय विशिखं मत्स्यं वीक्ष्य सकृज्जले ।
छित्त्वेषुणापातयत्तं सूर्ये चाभिजिति स्थिते ॥ २६
****** ebook converter DEMO Watermarks *******
पृष्ठ 950
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
साध्वी! मेरे पिता बृहत्सेन मुझपर बहुत प्रेम रखते थे । जब उन्हें मेरा अभिप्राय मालूम हुआ, तब उन्होंने मेरी इच्छाकी पूर्तिके लिये यह उपाय किया ॥ १८ ॥ महारानी! जिस प्रकार
पाण्डववीर अर्जुनकी प्राप्तिके लिये आपके पिताने स्वयंवरमें मत्स्यवेधका आयोजन किया था, उसी प्रकार मेरे पिताने भी किया । आपके स्वयंवरकी अपेक्षा हमारे यहाँ यह विशेषता थी कि मत्स्य बाहरसे ढका हुआ था, केवल जलमें ही उसकी परछाईं दीख पड़ती थी ॥१९ ॥
जब यह समाचार राजाओंको मिला, तब सब ओरसे समस्त अस्त्र - शस्त्रोंके तत्त्वज्ञ हजारों राजा अपने - अपने गुरुओंके साथ मेरे पिताजीकी राजधानीमें आने लगे ॥२० ॥ मेरे पिताजीने
आये हुए सभी राजाओंका बल- पौरुष और अवस्थाके अनुसार भलीभाँति स्वागत- सत्कार किया । उन लोगोंने मुझे प्राप्त करनेकी इच्छासे स्वयंवर- सभामें रखे हुए धनुष और बाण उठाये ॥२१ ॥ उनमेंसे कितने ही राजा तो धनुषपर ताँत भी न चढ़ा सके । उन्होंने धनुषको
ज्यों -का - त्यों रख दिया । कइयोंने धनुषकी डोरीको एक सिरेसे बाँधकर दुसरे सिरेतक खींच तो लिया, परन्तु वे उसे दूसरे सिरेसे बाँध न सके, उसका झटका लगनेसे गिर पड़े ॥२२ ॥
रानीजी! बड़े - बड़े प्रसिद्ध वीर - जैसे जरासन्ध, अम्बष्ठनरेश, शिशुपाल, भीमसेन, दुर्योधन और कर्ण— इन लोगोंने धनुषपर डोरी तो चढ़ा ली; परन्तु उन्हें मछलीकी स्थितिका पता न चला ॥२३ ॥ पाण्डववीर अर्जुनने जलमें उस मछलीकी परछाईं देख ली और यह भी जान
लिया कि वह कहाँ है । बड़ी सावधानीसे उन्होंने बाण छोड़ा भी; परन्तु उससे लक्ष्यवेध न हुआ, उनके बाणने केवल उसका स्पर्शमात्र किया ॥२४ ॥
रानीजी! इस प्रकार बड़े- बड़े अभिमानियोंका मान मर्दन हो गया । अधिकांश नरपतियोंने मुझे पानेकी लालसा एवं साथ- ही -साथ लक्ष्यवेधकी चेष्टा भी छोड़ दी । तब भगवान्ने धनुष उठाकर खेल- खेलमें- अनायास ही उसपर डोरी चढ़ा दी, बाण साधा और जलमें केवल एक बार मछलीकी परछाईं देखकर बाण मारा तथा उसे नीचे गिरा दिया । उस समय ठीक दोपहर हो रहा था, सर्वार्थसाधक ' अभिजित्' नामक मुहूर्त बीत रहा था ॥ २५-२६ ॥ देवीजी! उस समय पृथ्वीमें जय -जयकार होने लगा और आकाशमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं । बड़े - बड़े देवता आनन्द-विह्वल होकर पुष्पोंकी वर्षा करने लगे ॥२७ ॥ रानीजी! उसी समय मैंने रंगशालामें
प्रवेश किया । मेरे पैरोंके पायजेब रुनझुन -रुनझुन बोल रहे थे । मैंने नये - नये उत्तम रेशमी वस्त्र धारण कर रखे थे । मेरी चोटियोंमें मालाएँ गुँथी हुई थीं और मुँहपर लज्जामिश्रित मुसकराहट थी । मैं अपने हाथोंमें रत्नोंका हार लिये हुए थी, जो बीच - बीचमें लगे हुए सोनेके कारण और भी दमक रहा था । रानीजी! उस समय मेरा मुखमण्डल घनी घुँघराली अलकोंसे सुशोभित हो रहा था तथा कपोलोंपर कुण्डलोंकी आभा पड़नेसे वह और भी दमक उठा था । मैंने एक बार अपना मुख उठाकर चन्द्रमाकी किरणोंके समान सुशीतल हास्यरेखा और तिरछी चितवनसे चारों ओर बैठे हुए राजाओंकी और देखा, फिर धीरेसे अपनी वरमाला भगवान्के गलेमें डाल दी । यह तो कह ही चुकी हूँ कि मेरा हृदय पहलेसे ही भगवान्के प्रति अनुरक्त था ॥२८-२९ ॥ मैंने ज्यों ही वरमाला पहनायी त्यों ही मृदंग, पखावज, शंख, ढोल, नगारे आदि बाजे बजने
लगे । नट और नर्तकियाँ नाचने लगीं । गवैये गाने लगे ॥ ३० ॥
****** ebook converter DEMO Watermarks *******