श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 951–960

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 951–960

पृष्ठ 951

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दिवि दुन्दुभयो नेदुर्जयशब्दयुता भुवि ।

देवाश्च कुसुमासारान् मुमुचुर्हर्षविह्वलाः ॥२७

तद् रंगमाविशमहं कलनूपुराभ्यां पद्भ्यां प्रगृह्य कनकोज्ज्वलरत्नमालाम् । नूत्ने निवीय परिधाय च कौशिकाग्र्ये सव्रीडहासवदना कबरीधृतस्रक् ॥२८ उन्नीय वक्त्रमुरुकुन्तलकुण्डलत्विड्

गण्डस्थलं शिशिरहासकटाक्षमोक्षैः ।

राज्ञो निरीक्ष्य परितः शनकैर्मुरारे- सेऽनुरक्तहृदया निदधे स्वमालाम् ॥२९

तावन्मृदंगपटहाः शंखभेर्यानकादयः ।

निनेदुर्नटनर्तक्यो ननृतुर्गायका जगुः ॥३०

एवं वृते भगवति मयेशे' नृपयूथपाः ।

न सेहिरे याज्ञसेनि स्पर्धन्तो हृच्छयातुराः ॥३१

मां तावद् रथमारोप्य हयरत्नचतुष्टयम् ।

शार्ङ्गमुद्यम्य सन्नद्धस्तस्थावाजौ चतुर्भुजः ॥३२

दारुकश्चोदयामास कांचनोपस्करं रथम् ।

मिषतां भूभुजां राज्ञि मृगाणां मृगराडिव ॥३३

तेऽन्वसज्जन्त राजन्या निषेद्धु ' पथि केचन ।

संयत्ता उद्धृतेष्वासा ग्रामसिंहा यथा हरिम् ॥३४

द्रौपदीजी! जब मैंने इस प्रकार अपने स्वामी प्रियतम भगवान्‌को वरमाला पहना दी, उन्हें

वरण कर लिया, तब कामातुर राजाओंको बड़ा डाह हुआ । वे बहुत ही चिढ़ गये ॥ ३१ ॥

चतुर्भुज भगवान्ने अपने श्रेष्ठ चार घोड़ोंवाले रथपर मुझे चढ़ा लिया और हाथमें शार्ङ्गधनुष लेकर तथा कवच पहनकर युद्ध करनेके लिये वे रथपर खड़े हो गये ॥३२ ॥ पर रानीजी!

दारुकने सोनेके साज- सामानसे लदे हुए रथको सब राजाओंके सामने ही द्वारकाके लिये हाँक दिया, जैसे कोई सिंह हरिनोंके बीचसे अपना भाग ले जाय ॥३३ ॥ उनमेंसे कुछ राजाओं

धनुष लेकर युद्धके लिये सज- धजकर इस उद्देश्यसे रास्तेमें पीछा किया कि हम भगवान्को रोक लें; परन्तु रानीजी! उनकी चेष्टा ठीक वैसी ही थी, जैसे कुत्ते सिंहको रोकना ******ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 952

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चाहें ॥ ३४ ॥ शार्ङ्गधनुषके छूटे हुए तीरोंसे किसीकी बाँह कट गयी तो किसीके पैर कटे और

किसीकी गर्दन ही उतर गयी । बहुत से लोग तो उस रणभूमिमें ही सदाके लिये सो गये और बहुत - से युद्धभूमि छोड़कर भाग खड़े हुए ॥ ३५ ॥

ते शार्ङ्गच्युतबाणौघैः कृत्तबाह्वङ्घ्रिकन्धराः ।

निपेतुः प्रधने केचिदेके सन्त्यज्य दुद्रुवुः ॥३५

ततः पुरीं यदुपतिरत्यलंकृतां रविच्छदध्वजपटचित्रतोरणाम् । कुशस्थलीं दिवि भुवि चाभिसंस्तुतां’ समाविशत्तरणिरिव स्वकेतनम् ॥३६

पिता मे पूजयामास सुहृत्सम्बन्धिबान्धवान् ।

महार्हवासोऽलंकारैः शय्यासनपरिच्छदैः ॥३७

दासीभिः सर्वसम्पद्भिर्भटेभरथवाजिभिः ।

आयुधानि महार्हाणि ददौ पूर्णस्य भक्तितः ॥३८

आत्मारामस्य तस्येमा वयं वै गृहदासिकाः ।

सर्वसंगनिवृत्त्याद्धा तपसा च बभूविम ॥३९

महिष्य ऊचुः भौमं निहत्य सगणं युधि तेन रुद्धा ज्ञात्वाथ नः क्षितिजये जितराजकन्याः । निर्मुच्य संसृतिविमोक्षमनुस्मरन्तीः पादाम्बुजं परिणिनाय य आप्तकामः ॥४० _तदनन्तर यदुवंशशिरोमणि भगवान्ने सूर्यकी भाँति अपने निवासस्थान स्वर्ग और पृथ्वीमें सर्वत्र प्रशंसित द्वारका नगरीमें प्रवेश किया । उस दिन वह विशेषरूपसे सजायी गयी थी । इतनी इंडियाँ, पताकाएँ और तोरण लगाये गये थे कि उनके कारण सूर्यका प्रकाश धरतीतक नहीं आ पाता था ॥३६ ॥ मेरी अभिलाषा पूर्ण हो जानेसे पिताजीको बहुत प्रसन्नता हुई ।

उन्होंने अपने हितैषी- सुहृदों, सगे - सम्बन्धियों और भाई-बन्धुओंको बहुमूल्य वस्त्र, आभूषण, शय्या, आसन और विविध प्रकारकी सामग्रियाँ देकर सम्मानित किया || ३७ || भगवान् परिपूर्ण हैं — तथापि मेरे पिताजीने प्रेमवश उन्हें बहुत- सी दासियाँ, सब प्रकारकी सम्पत्तियाँ, सैनिक, हाथी, रथ, घोड़े एवं बहुत से बहुमूल्य अस्त्र- शस्त्र समर्पित किये ॥ ३८ ॥ रानीजी!

हमने पूर्वजन्ममें सबकी आसक्ति छोड़कर कोई बहुत बड़ी तपस्या की होगी । तभी तो हम ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 953

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इस जन्ममें आत्माराम भगवान्की गृह - दासियाँ हुई हैं ॥ ३ ९ ॥ सोलह हजार पत्नियोंकी ओरसे रोहिणीजीने कहा- भौमासुरने दिग्विजयके समय बहुत- से राजाओंको जीतकर उनकी कन्या हमलोगोंको अपने महलमें बंदी बना रखा था । भगवान्ने यह जानकर युद्धमें भौमासुर और उसकी सेनाका संहार कर डाला और स्वयं पूर्णकाम होनेपर भी उन्होंने हमलोगोंको वहाँसे छुड़ाया तथा पाणिग्रहण करके अपनी दासी बना लिया । रानीजी! हम सदा-सर्वदा उनके उन्हीं चरणकमलोंका चिन्तन करती रहती थीं, जो जन्म- मृत्युरूप संसारसे मुक्त करनेवाले हैं || ४० || साध्वी द्रौपदीजी! हम साम्राज्य, इन्द्रपद अथवा इन दोनोंके भोग, अणिमा आदि ऐश्वर्य, ब्रह्माका पद, मोक्ष अथवा सालोक्य, सारूप्य आदि मुक्तियाँ— कुछ भी नहीं चाहतीं । हम केवल इतना ही चाहती हैं कि अपने प्रियतम प्रभुके सुकोमल चरणकमलोंकी वह श्रीरज सर्वदा अपने सिरपर वहन किया करें, जो लक्ष्मीजीके वक्षःस्थलपर लगी हुई केशरकी सुगन्धसे युक्त है ॥४१-४२ ॥ उदारशिरोमणि भगवान्के जिन चरणकमलोंका स्पर्श उनके गौ चराते समय गोप, गोपियाँ, भीलिनें, तिनके और घास लताएँतक करना चाहती थीं, उन्हींकी हमें भी चाह है ॥४३ ॥

न वयं साध्वि साम्राज्यं स्वाराज्यं भौज्यमप्युत ।

वैराज्यं पारमेष्ठ्यं च आनन्त्यं वा हरेः पदम् ॥४१

कामयामह एतस्य श्रीमत्पादरजः श्रियः ।

कुचकुंकुमगन्धाढ्यं मूर्ध्ना वोढुं गदाभृतः ॥४२

व्रजस्त्रियो यद् वाञ्छन्ति पुलिन्द्यस्तृणवीरुधः ।

गावश्चारयतो गोपाः पादस्पर्शं महात्मनः ॥४३

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥८३ ॥

१. मयेमे । २. नियोद्धुं । १. सम्मतां । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 954

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अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः वसुदेवजीका यज्ञोत्सव श्रीशुक उवाच श्रुत्वा पृथा सुबलपुत्र्यथ याज्ञसेनी माधव्यथ क्षितिपपत्न्य उत स्वगोप्यः । कृष्णेऽखिलात्मनि हरी प्रणयानुबन्धं सर्वा विसिस्म्युरलमश्रुकलाकुलाक्ष्यः ॥१

इति सम्भाषमाणासु स्त्रीभिः स्त्रीषु नृभिर्नृषु ।

आययुर्मुनयस्तत्र कृष्णरामदिदृक्षया ॥ २

द्वैपायनो नारदश्च च्यवनो देवलोऽसितः ।

विश्वामित्रः शतानन्दो भरद्वाजोऽथ गौतमः ॥ ३

रामः सशिष्यो भगवान् वसिष्ठो गालवो भृगुः ।

पुलस्त्यः कश्यपोऽत्रिश्च मार्कण्डेयो बृहस्पतिः ॥ ४

द्वितस्त्रितश्चैकतश्च ब्रह्मपुत्रास्तथांगिराः ।

अगस्त्यो याज्ञवल्क्यश्च वामदेवादयोऽपरे ॥५

तान् दृष्ट्वा सहसोत्थाय प्रागासीना नृपादयः ।

पाण्डवाः कृष्णरामौ च प्रणेमुर्विश्ववन्दितान् ॥६

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! सर्वात्मा भक्तभयहारी भगवान् श्रीकृष्णके प्रति उनकी पत्नियोंका कितना प्रेम है - यह बात कुन्ती, गान्धारी, द्रौपदी, सुभद्रा, दूसरी राजपत्नियों और भगवान्‌की प्रियतमा गोपियोंने भी सुनी । सब- की- सब उनका यह अलौकिक प्रेम देखकर अत्यन्त मुग्ध, अत्यन्त विस्मित हो गयीं । सबके नेत्रोंमें प्रेमके आँसू छलक आये ॥१ ॥ इस प्रकार जिस समय स्त्रियोंसे स्त्रियाँ और पुरुषोंसे पुरुष बातचीत कर

रहे थे, उसी समय बहुत से ऋषि- मुनि भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीका दर्शन करनेके लिये वहाँ आये ॥२ ॥ उनमें प्रधान ये थे - श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, देवर्षि नारद, च्यवन,

देवल, असित, विश्वामित्र, शतानन्द, भरद्वाज, गौतम, अपने शिष्योंके सहित भगवान् परशुराम, वसिष्ठ, गालव, भृगु, पुलस्त्य, कश्यप, अत्रि, मार्कण्डेय, बृहस्पति, द्वित, त्रित, एकत, सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार, अंगिरा, अगस्त्य, याज्ञवल्क्य और वामदेव इत्यादि ॥३-५ ॥ ऋषियोंको देखकर पहलेसे बैठे हुए नरपतिगण, युधिष्ठिर आदि पाण्डव, भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी सहसा उठकर खड़े हो गये और सबने उन विश्ववन्दित ऋषियोंको प्रणाम किया ॥ ६ ॥

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पृष्ठ 955

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तानानर्चुर्यथा सर्वे सहरामोऽच्युतोऽर्चयत् ।

स्वागतासनपाद्यार्घ्यमाल्यधूपानुलेपनैः ॥७

उवाच सुखमासीनान् भगवान् धर्मगुप्तनुः ।

सदसस्तस्य महतो यतवाचोऽनुशृण्वतः ॥८

श्रीभगवानुवाच

अहो वयं जन्मभृतो लब्धं कार्त्स्न्येन तत्फलम् ।

देवानामपि दुष्प्रापं यद् योगेश्वरदर्शनम् ॥९

किं स्वल्पतपसां नृणामर्चायां देवचक्षुषाम् ।

दर्शनस्पर्शनप्रश्नप्रह्वपादार्चनादिकम् ॥१०

नाम्यानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः ।

ते पुनन्त्युरुकालेन दर्शनादेव साधवः ॥११

नाग्निर्न सूर्यो न च चन्द्रतारका न भूर्जलं खं श्वसनोऽथ वाङ्मनः । उपासिता भेदकृतो हरन्त्यघं विपश्चितो घ्नन्ति मुहूर्तसेवया ॥१२ यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके

स्वधीः कलत्रादिषु भौम इज्यधीः ।

यत्तीर्थबुद्धिः सलिले न कर्हिचि- ज्जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखरः ॥१३

इसके बाद स्वागत, आसन, पाद्य, अर्घ्य, पुष्पमाला, धूप और चन्दन आदिसे सब राजाओंने तथा बलरामजीके साथ स्वयं भगवान् श्रीकृष्णने उन सब ऋषियोंकी विधिपूर्वक पूजा की ॥७ ॥ जब सब ऋषि- मुनि आरामसे बैठ गये, तब धर्मरक्षाके लिये अवतीर्ण भगवान्

श्रीकृष्णने उनसे कहा । उस समय वह बहुत बड़ी सभा चुपचाप भगवान्‌का भाषण सुन रही थी ॥८ ॥

भगवान् श्रीकृष्णने कहा- धन्य है! हमलोगोंका जीवन सफल हो गया, आज जन्म लेनेका हमें पूरा -पूरा फल मिल गया; क्योंकि जिन योगेश्वरोंका दर्शन बड़े -बड़े देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है, उन्हींका दर्शन हमें प्राप्त हुआ है || ९ || जिन्होंने बहुत थोड़ी तपस्या की है और जो लोग अपने इष्टदेवको समस्त प्राणियोंके हृदयमें न देखकर केवल मूर्तिविशेषमें ही उनका दर्शन करते हैं, उन्हें आपलोगोंके दर्शन, स्पर्श, कुशल- प्रश्न, प्रणाम ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 956

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और पादपूजन आदिका सुअवसर भला कब मिल सकता है? ॥१० ॥

केवल जलमय तीर्थ ही तीर्थ नहीं कहलाते और केवल मिट्टी या पत्थरकी प्रतिमाएँ ही दे॒वता नहीं होतीं; संत पुरुष ही वास्तवमें तीर्थ और देवता हैं; क्योंकि उनका बहुत समयतक सेवन किया जाय, तब वे पवित्र करते हैं; परंतु संत पुरुष तो दर्शनमात्रसे ही कृतार्थ कर देते हैं ॥११ ॥ अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, तारे, पृथ्वी, जल, आकाश, वायु, वाणी और मनके अधिष्ठातृ-देवता उपासना करनेपर भी पापका पूरा - पूरा नाश नहीं कर सकते; क्योंकि उनकी उपासनासे

भेद-बुद्धिका नाश नहीं होता, वह और भी बढ़ती है । परन्तु यदि घड़ी - दो- घड़ी भी ज्ञानी महापुरुषोंकी सेवा की जाय तो वे सारे पाप ताप मिटा देते हैं; क्योंकि वे भेद- बुद्धिके विनाशक हैं ॥१२ ॥ महात्माओ और सभासदो! जो मनुष्य वात, पित्त और कफ– इन तीन

धातुओंसे बने हुए शवतुल्य शरीरको ही आत्मा- अपना ' मैं ', स्त्री- पुत्र आदिको ही अपना और मिट्टी, पत्थर, काष्ठ आदि पार्थिव विकारोंको ही इष्टदेव मानता है तथा जो केवल जलको ही तीर्थ समझता है — ज्ञानी महापुरुषोंको नहीं, वह मनुष्य होनेपर भी पशुओंमें भी नीच गधा ही है ॥१३ ॥

श्रीशुक उवाच

निशम्येत्थं भगवतः कृष्णस्याकुण्ठमेधसः ।

वचो दुरन्वयं विप्रास्तूष्णीमासन् भ्रमद्धियः ॥१४

चिरं विमृश्य मुनय ईश्वरस्येशितव्यताम् ।

जनसङ्ग्रह इत्यूचुः स्मयन्तस्तं जगद्गुरुम् ॥१५

मुनय ऊचुः यन्मायया तत्त्वविदुत्तमा वयं विमोहिता विश्वसृजामधीश्वराः । यदीशितव्यायति गूढ ईहया अहो विचित्रं भगवद्विचेष्टितम् ॥ १६ अनीह एतद् बहुधैक आत्मना सृजत्यवत्यत्ति न बध्यते यथा । भौमैर्हि भूमिर्बहुनामरूपिणी अहो विभूम्नश्चरितं विडम्बनम् ॥१७ अथापि काले स्वजनाभिगुप्तये बिभर्षि सत्त्वं खलनिग्रहाय च । स्वलीलया वेदपथं सनातनं वर्णाश्रमात्मा पुरुषः परो भवान् ॥१८ ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 957

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ब्रह्म ते हृदयं शुक्लं तपःस्वाध्यायसंयमैः ।

यत्रोपलब्धं सद् व्यक्तमव्यक्तं च ततः परम् ॥१९

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण अखण्ड ज्ञानसम्पन्न हैं । उनका यह गूढ भाषण सुनकर सब - के - सब ऋषि - मुनि चुप रह गये । उनकी बुद्धि चक्करमें पड़ गयी, वे समझ न सके कि भगवान् यह क्या कह रहे हैं ॥ १४ ॥ उन्होंने बहुत देरतक विचार करनेके

बाद यह निश्चय किया कि भगवान् सर्वेश्वर होनेपर भी जो इस प्रकार सामान्य, कर्म- परतन्त्र जीवकी भाँति व्यवहार कर रहे हैं - यह केवल लोकसंग्रहके लिये ही है । ऐसा समझकर वे मुसकराते हुए जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्णसे कहने लगे ॥१५ ॥

मुनियोंने कहा - भगवन्! आपकी मायासे प्रजापतियोंके अधीश्वर मरीचि आदि तथा बड़े - बड़े तत्त्वज्ञानी हमलोग मोहित हो रहे हैं । आप स्वयं ईश्वर होते हुए भी मनुष्यकी- सी चेष्टाओंसे अपनेको छिपाये रखकर जीवकी भाँति आचरण करते हैं । भगवन्! सचमुच आपकी लीला अत्यन्त विचित्र है। परम आश्चर्यमयी है ॥१६ ॥ जैसे पृथ्वी अपने विकारों—

वृक्ष, पत्थर, घट आदिके द्वारा बहुत से नाम और रूप ग्रहण कर लेती है, वास्तवमें वह एक ही है, वैसे ही आप एक और चेष्टाहीन होनेपर भी अनेक रूप धारण कर लेते हैं और अपने-आपसे ही इस जगत्की रचना, रक्षा और संहार करते हैं । पर यह सब करते हुए भी इन कर्मोंसे लिप्त नहीं होते । जो सजातीय, विजातीय और स्वगत भेदशून्य एकरस अनन्त है, उसका यह चरित्र लीलामात्र नहीं तो और क्या है? धन्य है आपकी यह लीला! ॥१७ ॥

भगवन्! यद्यपि आप प्रकृतिसे परे, स्वयं परब्रह्म परमात्मा हैं; तथापि समय- समयपर भक्तजनोंकी रक्षा और दुष्टोंका दमन करनेके लिये विशुद्ध सत्त्वमय श्रीविग्रह प्रकट करते हैं और अपनी लीलाके द्वारा सनातन वैदिक मार्गकी रक्षा करते हैं; क्योंकि सभी वर्गों और आश्रमोंके रूपमें आप स्वयं ही प्रकट हैं || १८ || भगवन्! वेद आपका विशुद्ध हृदय है; तपस्या, स्वाध्याय, धारणा, ध्यान और समाधिके द्वारा उसीमें आपके साकार- निराकाररूप और दोनोंके अधिष्ठान - स्वरूप परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार होता है ॥१९ ॥ परमात्मन्!

ब्राह्मण ही वेदोंके आधारभूत आपके स्वरूपकी उपलब्धिके स्थान हैं; इसीसे आप ब्राह्मणोंका सम्मान करते हैं और इसीसे आप ब्राह्मणभक्तोंमें अग्रगण्य भी हैं || २० || आप सर्वविध कल्याण- साधनोंकी चरमसीमा हैं और संत पुरुषोंकी एकमात्र गति हैं । आपसे मिलकर आज हमारे जन्म, विद्या, तप और ज्ञान सफल हो गये । वास्तवमें सबके परम फल आप ही हैं ॥२१ ॥ प्रभो! आपका ज्ञान अनन्त है, आप स्वयं सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्मा

भगवान् हैं । आपने अपनी अचिन्त्य शक्ति योगमायाके द्वारा अपनी महिमा छिपा रखी है, हम आपको नमस्कार करते हैं ॥२२ ॥ ये सभामें बैठे हुए राजालोग और दूसरोंकी तो बात ही

क्या, स्वयं आपके साथ आहार- विहार करनेवाले यदुवंशी लोग भी आपको वास्तवमें नहीं जानते; क्योंकि आपने अपने स्वरूपको –जो सबका आत्मा, जगत्का आदिकारण और नियन्ता है — मायाके परदेसे ढक रखा है ॥२३ ॥ जब मनुष्य स्वप्न देखने लगता है, उस समय

स्वप्नके मिथ्या पदार्थोंको ही सत्य समझ लेता है और नाममात्रकी इन्द्रियोंसे प्रतीत होनेवाले अपने स्वप्नशरीरको ही वास्तविक शरीर मान बैठता है । उसे उतनी देरके लिये इस बातका ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 958

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बिलकुल ही पता नहीं रहता कि स्वप्नशरीरके अतिरिक्त एक जाग्रत् - अवस्थाका शरीर भी है ॥२४ ॥ ठीक इसी प्रकार, जाग्रत् अवस्थामें भी इन्द्रियोंकी प्रवृत्तिरूप मायासे चित्त मोहित

होकर नाममात्रके विषयोंमें भटकने लगता है । उस समय भी चित्तके चक्करसे विवेकशक्ति ढक जाती है और जीव यह नहीं जान पाता कि आप इस जाग्रत् संसारसे परे हैं ॥२५ ॥

प्रभो! बड़े - बड़े ऋषि - मुनि अत्यन्त परिपक्व योग - साधनाके द्वारा आपके उन चरणकमलोंको -राशिकोI नष्ट, - -हृदयमें धारण करते हैं जो समस्त पाप करनेवाले गंगाजलके भी आश्रय स्थान हैं। यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि आज हमें उन्हींका दर्शन हुआ है । प्रभो! हम आपके भक्त हैं, आप हमपर अनुग्रह कीजिये; क्योंकि आपके परम पदकी प्राप्ति उन्हीं लोगोंको होती है, जिनका लिंगशरीररूप जीव- कोश आपकी उत्कृष्ट भक्तिके द्वारा नष्ट हो जाता है ॥२६ ॥

तस्माद् ब्रह्मकुलं ब्रह्मन् शास्त्रयोनेस्त्वमात्मनः ।

सभाजयसि सद्धाम' तद् ब्रह्मण्याग्रणीर्भवान् ॥२०

अद्य नो जन्मसाफल्यं विद्यायास्तपसो दृशः ।

त्वया संगम्य सद्गत्या यदन्तः श्रेयसां परः ॥२१

नमस्तस्मै भगवते कृष्णायाकुण्ठमेधसे ।

स्वयोगमाययाच्छन्नमहिम्ने परमात्मने ॥२२

न यं विदन्त्यमी भूपा एकारामाश्च वृष्णयः ।

मायाजवनिकाच्छन्नमात्मानं कालमीश्वरम् ॥२३

यथा शयानः पुरुष आत्मानं गुणतत्त्वदृक् ।

नाममात्रेन्द्रियाभातं न वेद रहितं परम् ॥२४

एवं त्वा नाममात्रेषु विषयेष्विन्द्रियेहया ।

मायया विभ्रमच्चित्तो न वेद स्मृत्युपप्लवात् ॥२५

तस्याद्य ते ददृशिमाङ्घ्रिमघौघमर्ष- तीर्थास्पदं हृदि कृतं सुविपक्वयोगैः । उत्सिक्तभक्त्युपहताशयजीवकोशा आपुर्भवद्गतिमथोऽनुगृहाण भक्तान् ॥ २६ श्रीशुक उवाच इत्यनुज्ञाप्य दाशार्हं धृतराष्ट्रं युधिष्ठिरम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 959

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राजर्षे स्वाश्रमान् गन्तुं मुनयो दधिरे मनः ॥२७

तद् वीक्ष्य तानुपव्रज्य वसुदेवो महायशाः ।

प्रणम्य चोपसंगृह्य बभाषेदं सुयन्त्रितः ॥२८

वसुदेव उवाच

नमो वः सर्वदेवेभ्य ऋषयः श्रोतुमर्हथ ।

कर्मणा कर्मनिर्हारो यथा स्यान्नस्तदुच्यताम् ॥२९

नारद उवाच

नातिचित्रमिदं विप्रा वसुदेवो बुभुत्सया ।

कृष्णं मत्वार्भकं यन्नः पृच्छति श्रेय आत्मनः ॥ ३०

सन्निकर्षो हि मर्त्यानामनादरणकारणम् ।

गाङ्गं हित्वा यथान्याम्भस्तत्रत्यो याति शुद्धये ॥ ३१

यस्यानुभूतिः कालेन लयोत्पत्त्यादिनास्य वै ।

स्वतोऽन्यस्माच्च गुणतो न कुतश्चन रिष्यति ॥ ३२

तं क्लेशकर्मपरिपाकगुणप्रवाहै- रव्याहतानुभवमीश्वरमद्वितीयम् । प्राणादिभिः स्वविभवैरुपगूढमन्यो मन्येत सूर्यमिव मेघहिमोपरागैः ॥३३

अथोचुर्मुनयो राजन्नाभाष्यानकदुन्दुभिम् ।

सर्वेषां शृण्वतां राज्ञां तथैवाच्युतरामयोः ॥३४

कर्मणा कर्मनिर्हार एष साधु निरूपितः ।

यच्छ्रद्धया यजेद् विष्णुं सर्वयज्ञेश्वरं मखैः ॥ ३५

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - राजर्षे! भगवान्‌की इस प्रकार स्तुति करके और उनसे, राजा धृतराष्ट्रसे तथा धर्मराज युधिष्ठिरजीसे अनुमति लेकर उन लोगोंने अपने - अपने आश्रमपर जानेका विचार किया ॥ २७ ॥ परम यशस्वी वसुदेवजी उनका जानेका विचार देखकर उनके

पास आये और उन्हें प्रणाम किया और उनके चरण पकड़कर बड़ी नम्रतासे निवेदन करने लगे ॥२८ ॥

वसुदेवजीने कहा –ऋषियो! आपलोग सर्वदेवस्वरूप हैं । मैं आपलोगोंको नमस्कार ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 960

श्रीमद्भागवत महापुराण - २, पृष्ठ 960 का मूल पृष्ठ
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करता हूँ । आपलोग कृपा करके मेरी एक प्रार्थना सुन लीजिये। वह यह कि जिन कर्मोंके अनुष्ठानसे कर्मों और कर्मवासनाओंका आत्यन्तिक नाश- मोक्ष हो जाय, उनका आप मुझे उपदेश कीजिये ॥२९ ॥

नारदजीने कहा –ऋषियो! यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है कि वसुदेवजी श्रीकृष्णको अपना बालक समझकर शुद्ध जिज्ञासाके भावसे अपने कल्याणका साधन हमलोगोंसे पूछ रहे हैं ॥३० ॥ संसारमें बहुत पास रहना मनुष्योंके अनादरका कारण हुआ करता है । देखते हैं,

गंगातटपर रहनेवाला पुरुष गंगाजल छोड़कर अपनी शुद्धिके लिये दूसरे तीर्थमें जाता है ॥ ३१ ॥ श्रीकृष्णकी अनुभूति समयके फेरसे होनेवाली जगत्की सृष्टि, स्थिति और प्रलयसे

मिटनेवाली नहीं है । वह स्वतः किसी दूसरे निमित्तसे गुणोंसे और किसीसे भी क्षीण नहीं होती ॥३२ ॥ उनका ज्ञानमय स्वरूप अविद्या, राग-द्वेष आदि क्लेश, पुण्य- पापमय कर्म,

सुख-दुःखादि कर्मफल तथा सत्त्व आदि गुणोंके प्रवाहसे खण्डित नहीं है । वे स्वयं अद्वितीय परमात्मा हैं । जब वे अपनेको अपनी ही शक्तियों - प्राण आदिसे ढक लेते हैं, तब मूर्खलोग ऐसा समझते हैं कि वे ढक गये; जैसे बादल, कुहरा या ग्रहणके द्वारा अपने नेत्रोंके ढक जानेपर सूर्यको ढका हुआ मान लेते हैं ॥३३ ॥

परीक्षित्! इसके बाद ऋषियोंने भगवान् श्रीकृष्ण, बलरामजी और अन्यान्य राजाओंके सामने ही वसुदेवजीको सम्बोधित करके कहा- ॥ ३४ ॥ ' कर्मोंके द्वारा कर्मवासनाओं और

कर्मफलोंका आत्यन्तिक नाश करनेका सबसे अच्छा उपाय यह है कि यज्ञ आदिके द्वारा समस्त यज्ञोंके अधिपति भगवान् विष्णुकी श्रद्धा - पूर्वक आराधना करे ॥ ३५ ॥

चित्तस्योपशमोऽयं वै कविभिः शास्त्रचक्षुषा ।

दर्शितः सुगमो योगो धर्मश्चात्ममुदावहः ॥ ३६

अयं स्वस्त्ययनः पन्था द्विजातेर्गृहमेधिनः ।

यच्छ्रद्धयाऽऽप्तवित्तेन' शुक्लेनेज्येत पूरुषः ॥ ३७

वित्तैषणां यज्ञदानैर्गृहैर्दारसुतैषणाम् ।

आत्मलोकैषणां देव कालेन विसृजेद् बुधः ।

ग्रामे त्यक्तैषणाः सर्वे ययुर्धीरास्तपोवनम् ॥३८

ऋणैस्त्रिभिर्द्विजो जातो देवर्षिपितॄणां प्रभो ।

यज्ञाध्ययनपुत्रैस्तान्यनिस्तीर्य त्यजन् पतेत् ॥३९

त्वं त्वद्य मुक्तो द्वाभ्यां वै ऋषिपित्रोर्महामते ।

यज्ञैर्देवर्णमुन्मुच्य निरृणोऽशरणो भव ॥४०

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