श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 961–970

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 961–970

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वसुदेव भवान् नूनं भक्त्या परमया हरिम् ।

जगतामीश्वरं प्रार्चः स यद् वां पुत्रतां गतः ॥४१

श्रीशुक उवाच

इति तद्वचनं श्रुत्वा वसुदेवो महामनाः ।

तानृषीनृत्विजो वव्रे मूर्ध्नाऽऽनम्य' प्रसाद्य च ॥ ४२

त एनमृषयो राजन् वृता धर्मेण धार्मिकम् ।

तस्मिन्नयाजयन् क्षेत्रे मखैरुत्तमकल्पकैः ॥४३

तद्दीक्षायां प्रवृत्तायां वृष्णयः पुष्करस्रजः ।

स्नाताः सुवाससो राजन् राजानः सुष्ठ्वलंकृताः ॥४४

त्रिकालदर्शी ज्ञानियोंने शास्त्रदृष्टिसे यही चित्तकी शान्तिका उपाय, सुगम मोक्षसाधन और चित्तमें आनन्दका उल्लास करनेवाला धर्म बतलाया है || ३६ || अपने न्यायार्जित धनसे श्रद्धापूर्वक पुरुषोत्तमभगवान्‌की आराधना करना ही द्विजाति -ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य गृहस्थके लिये परम कल्याणका मार्ग है ॥ ३७ ॥ वसुदेवजी! विचारवान् पुरुषको चाहिये कि

यज्ञ, दान आदिके द्वारा धनकी इच्छाको, गृहस्थोचित भोगोंद्वारा स्त्री- पुत्रकी इच्छाको और कालक्रमसे स्वर्गादि भोग भी नष्ट हो जाते हैं - इस विचारसे लोकैषणाको त्याग दे । इस प्रकार धीर पुरुष घरमें रहते हुए ही तीनों प्रकारकी एषणाओं - इच्छाओंका परित्याग करके तपोवनका रास्ता लिया करते थे || ३८ || समर्थ वसुदेवजी! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य - ये तीनों देवता, ऋषि और पितरोंका ऋण लेकर ही पैदा होते हैं । इनके ऋणोंसे छुटकारा मिलता है यज्ञ, अध्ययन और सन्तानोत्पत्तिसे । इनसे उऋण हुए बिना ही जो संसारका त्याग करता है, उसका पतन हो जाता है ॥ ३ ९ ॥ परम बुद्धिमान् वसुदेवजी! आप अबतक ऋषि और पितरोंके ऋणसे तो मुक्त हो चुके हैं । अब यज्ञोंके द्वारा देवताओंका ऋण चुका दीजिये; और इस प्रकार सबसे उऋण होकर गृहत्याग कीजिये, भगवान्‌की शरण हो जाइये ॥४० ॥

वसुदेवजी! आपने अवश्य ही परम भक्तिसे जगदीश्वरभगवान्‌की आराधना की है; तभी तो वे आप दोनोंके पुत्र हुए हैं ॥४१ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! परम मनस्वी वसुदेवजीने ऋषियोंकी यह बात सुनकर, उनके चरणोंमें सिर रखकर प्रणाम किया, उन्हें प्रसन्न किया और यज्ञके लिये ऋत्विजोंके रूपमें उनका वरण कर लिया ॥४२ ॥ राजन्! जब इस प्रकार वसुदेवजीने

धर्मपूर्वक ऋषियोंको वरण कर लिया, तब उन्होंने पुण्यक्षेत्र कुरुक्षेत्रमें परम धार्मिक वसुदेवजीके द्वारा उत्तमोत्तम सामग्रीसे युक्त यज्ञ करवाये ॥४३ ॥ परीक्षित्! जब वसुदेवजीने

यज्ञकी दीक्षा ले ली, तब यदुवंशियोंने स्नान करके सुन्दर वस्त्र और कमलोंकी मालाएँ धारण कर लीं, राजालोग वस्त्राभूषणोंसे खूब सुसज्जित हो गये ॥ ४४ ॥ वसुदेवजीकी पत्नियोंने

सुन्दर वस्त्र, अंगराग और सोनेके हारोंसे अपनेको सजा लिया और फिर वे सब बड़े आनन्दसे

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अपने - अपने हाथोंमें मांगलिक सामग्री लेकर यज्ञशालामें आयीं ॥४५ ॥

तन्महिष्यश्च मुदिता निष्ककण्ठ्यः सुवाससः ।

दीक्षाशालामुपाजग्मुरालिप्ता वस्तुपाणयः ॥ ४५

दुर्मृदंगपटहशंख भेर्यानकादयः ।

ननृतुर्नटनर्तक्यस्तुष्टुवुः सूतमागधाः ।

जगुः सुकण्ठ्यो गन्धर्व्यः संगीतं सहभर्तृकाः ॥४६

तमभ्यषिंचन् विधिवदक्तमभ्यक्तमृत्विजः ।

पत्नीभिरष्टादशभिः सोमराजमिवोडुभिः ॥४७

ताभिर्दुकूलवलयैर्हारनूपुरकुण्डलैः ।

स्वलंकृताभिर्विबभौ दीक्षितोऽजिनसंवृतः ॥४८

तस्यर्त्विजो महाराज रत्नकौशेयवाससः ।

ससदस्या विरेजुस्ते यथा वृत्रहणोऽध्वरे ॥४९

तदा रामश्च कृष्णश्च स्वैः स्वैर्बन्धुभिरन्वितौ ।

रेजतुः स्वसुतैदरैिर्जीवेशौ स्वविभूतिभिः ॥५०

ईजेऽनुयज्ञं विधिना अग्निहोत्रादिलक्षणैः ।

प्राकृतैर्वैकृतैर्यज्ञैर्द्रव्यज्ञानक्रियेश्वरम् ॥५१

अथर्त्विग्भ्योऽददात् काले यथाम्नातं स दक्षिणाः ।

स्वलंकृतेभ्योऽलंकृत्य गोभूकन्या महाधनाः ॥ ५२

उस समय मृदंग, पखावज, शंख, ढोल और नगारे आदि बाजे बजने लगे । नट और नर्तकियाँ नाचने लगीं । सूत और मागध स्तुतिगान करने लगे । गन्धर्वोंके साथ सुरीले गलेवाली गन्धर्वपत्नियाँ गान करने लगीं । ४६ ॥ वसुदेवजीने पहले नेत्रोंमें अंजन और शरीरमें मक्खन लगा लिया; फिर उनकी देवकी आदि अठारह पत्नियोंके साथ उन्हें ऋत्विजोंने महाभिषेककी विधिसे वैसे ही अभिषेक कराया, जिस प्रकार प्राचीन कालमें नक्षत्रोंके साथ चन्द्रमाका अभिषेक हुआ था ॥४७ ॥ उस समय यज्ञमें दीक्षित होनेके कारण वसुदेवजी तो मृगचर्म

धारण किये हुए थे; परन्तु उनकी पत्नियाँ सुन्दर- सुन्दर साड़ी, कंगन, हार, पायजेब और कर्णफूल आदि आभूषणोंसे खूब सजी हुई थीं । वे अपनी पत्नियोंके साथ भलीभाँति शोभायमान हुए ॥४८ ॥ महाराज! वसुदेवजीके ऋत्विज् और सदस्य रत्नजटित आभूषण

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थेतथा रेशमी वस्त्र धारण करके वैसे ही सुशोभित हुए, जैसे पहले इन्द्रके य॒ज्ञमें हुए ॥४९ ॥

उस समय भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी अपने - अपने भाई- बन्धु और स्त्री - पुत्रोंके साथ इस प्रकार शोभायमान हुए, जैसे अपनी शक्तियोंके साथ समस्त जीवोंके ईश्वर स्वयं भगवान् समष्टि जीवोंके अभिमानी श्रीसंकर्षण तथा अपने विशुद्ध नारायणस्वरूपमें शोभायमान होते हैं ॥५० ॥

वसुदेवजीने प्रत्येक यज्ञमें ज्योतिष्टोम, दर्श, पूर्णमास आदि प्राकृत यज्ञों, सौरसत्रादि वैकृत यज्ञों और अग्निहोत्र आदि अन्यान्य यज्ञोंके द्वारा द्रव्य, क्रिया और उनके ज्ञानके— मन्त्रोंके स्वामी विष्णु - भगवान्‌की आराधना की ॥ ५१ ॥ इसके बाद उन्होंने उचित समयपर

ऋत्विजोंको वस्त्रालंकारोंसे सुसज्जित किया और शास्त्रके अनुसार बहुत - सी दक्षिणा तथा प्रचुर धनके साथ अलंकृत गौएँ, पृथ्वी और सुन्दरी कन्याएँ दीं ॥५२ ॥

पत्नीसंयाजावभृथ्यैश्चरित्वा ते महर्षयः ।

सस्नू रामह्रदे विप्रा यजमानपुरःसराः ॥५३

स्नातोऽलंकारवासांसि वन्दिभ्योऽदात्तथा स्त्रियः ।

ततः स्वलंकृतो वर्णानाश्वभ्योऽन्नेन पूजयत् ॥५४

बन्धून् सदारान् ससुतान् पारिबर्हेण भूयसा ।

विदर्भकोसलकुरून् काशिकेकयसृजयान् ॥ ५५

सदस्यर्त्विक्सुरगणान् नृभूतपितृचारणान् ।

श्रीनिकेतमनुज्ञाप्य शंसन्तः प्रययुः क्रतुम् ॥५६

धृतराष्ट्रोऽनुजः पार्था भीष्मो द्रोणः पृथा यमौ ।

नारदो भगवान् व्यासः सुहृत्सम्बन्धिबान्धवाः ॥ ५७

बन्धून् परिष्वज्य यदून् सौहृदात् क्लिन्नचेतसः ।

ययुर्विरहकृच्छ्रेण स्वदेशांश्चापरे जनाः ॥५८

नन्दस्तु सह गोपालैर्बृहत्या पूजयार्चितः ।

कृष्णरामोग्रसेनाद्यैर्न्यवात्सीद् बन्धुवत्सलः ॥५९

वसुदेवोऽञ्जसोत्तीर्य मनोरथमहार्णवम् ।

सुहृद्वृतः प्रीतमना नन्दमाह करे स्पृशन् ॥ ६०

वसुदेव उवाच

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भ्रातरीशकृतः पाशो नृणां यः स्नेहसंज्ञितः ।

तं दुस्त्यजमहं मन्ये शूराणामपि योगिनाम् ॥६१

इसके बाद महर्षियोंने पत्नीसंयाज नामक यज्ञांग और अवभृथस्नान अर्थात् यज्ञान्त-स्नानसम्बन्धी अवशेष कर्म कराकर वसुदेवजीको आगे करके परशुरामजीके बनाये ह्रदमें— रामह्रदमें स्नान किया ॥ ५३ ॥ स्नान करनेके बाद वसुदेवजी और उनकी पत्नियोंने वंदी-जनोंको अपने सारे वस्त्राभूषण दे दिये तथा स्वयं नये वस्त्राभूषणसे सुसज्जित होकर उन्होंने

ब्राह्मणोंसे लेकर कुत्तोंतकको भोजन कराया ॥५४ ॥ तदनन्तर अपने भाई- बन्धुओं, उनके

स्त्री- पुत्रों तथा विदर्भ, कोसल, कुरु, काशी, केकय और संजय आदि देशोंके राजाओं, सदस्यों, ऋत्विजों, देवताओं, मनुष्यों, भूतों, पितरों और चारणोंको विदाईके रूपमें बहुत - सी भेंट देकर सम्मानित किया । वे लोग लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्णकी अनुमति लेकर यज्ञकी प्रशंसा करते हुए अपने - अपने घर चले गये ॥ ५५-५६ ॥ परीक्षित्! उस समय राजा धृतराष्ट्र, विदुर, युधिष्ठिर्, भीम, अर्जुन, भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य, कुन्ती, नकुल, सहदेव, नारद, भगवान् व्यासदेव तथा दूसरे स्वजन, सम्बन्धी और बान्धव अपने हितैषी बन्धु यादवोंको छोड़कर जानेमें अत्यन्त विरह- व्यथाका अनुभव करने लगे । उन्होंने अत्यन्त स्नेहार्द्र चित्तसे यदुवंशियोंका आलिंगन किया और बड़ी कठिनाईसे किसी प्रकार अपने - अपने देशको गये । दूसरे लोग भी इनके साथ ही वहाँसे रवाना हो गये ॥ ५७-५८ ॥ परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण, बलरामजी तथा उग्रसेन आदिने नन्दबाबा एवं अन्य सब गोपोंकी बहुत बड़ी - बड़ी सामग्रियोंसे अर्चा-1-पूजा की; उनका सत्कार किया; और वे प्रेम-परवश होकर बहुत दिनोंतक वहीं रहे ॥५९ ॥ वसुदेवजी अनायास ही अपने बहुत बड़े मनोरथका महासागर पार कर गये थे ।

उनके आनन्दकी सीमा न थी । सभी आत्मीय स्वजन उनके साथ थे । उन्होंने नन्दबाबाका हाथ पकड़कर कहा ॥६० ॥

वसुदेवजीने कहा- भाईजी! भगवान्ने मनुष्योंके लिये एक बहुत बड़ा बन्धन बना दिया है । उस बन्धनका नाम है स्नेह, प्रेमपाश । मैं तो ऐसा समझता हूँ कि बड़े - बड़े शूरवीर और योगी - यति भी उसे तोड़नेमें असमर्थ हैं ॥६१ ॥

अस्मास्वप्रतिकल्पेयं यत् कृताज्ञेषु सत्तमैः ।

मैत्र्यर्पिताफला वापि न निवर्तेत कर्हिचित् ॥ ६२

प्रागकल्पाच्च कुशलं भ्रातर्वो नाचराम हि ।

अधुना श्रीमदान्धाक्षा न पश्यामः पुरः सतः ॥६३

मा राज्यश्रीरभूत् पुंसः श्रेयस्कामस्य मानद ।

स्वजनानुत बन्धून् वा न पश्यति ययान्धदृक् ॥ ६४

श्रीशुक उवाच

पृष्ठ 965

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एवं सौहृदशैथिल्यचित्त आनकदुन्दुभिः ।

रुरोद तत्कृतां मैत्रीं स्मरन्नश्रुविलोचनः ॥६५

नन्दस्तु सख्युः प्रियकृत् प्रेम्णा गोविन्दरामयोः ।

अद्य श्व इति मासांस्त्रीन् यदुभिर्मानितोऽवसत् ॥६६

ततः कामैः पूर्यमाणः सव्रजः सहबान्धवः ।

परार्ध्याभरणक्षौमनानानर्घ्यपरिच्छदैः ॥ ६७

वसुदेवोग्रसेनाभ्यां कृष्णोद्धवबलादिभिः ।

दत्तमादाय पारिबर्हं यापितो यदुभिर्ययौ ॥६८

नन्दो गोपाश्च गोप्यश्च गोविन्दचरणाम्बुजे ।

मनः क्षिप्तं पुनर्हर्तुमनीशा मथुरां ययुः ॥६९

आपने हम अकृतज्ञोंके प्रति अनुपम मित्रताका व्यवहार किया है । क्यों न हो, आप-सरीखे संत शिरोमणियोंका तो ऐसा स्वभाव ही होता है । हम इसका कभी बदला नहीं चुका सकते, आपको इसका कोई फल नहीं दे सकते । फिर भी हमारा यह मैत्री- सम्बन्ध कभी टूटनेवाला नहीं है । आप इसको सदा निभाते रहेंगे ॥ ६२ ॥ भाईजी! पहले तो बंदीगृहमें बंद

होनेके कारण हम आपका कुछ भी प्रिय और हित न कर सके । अब हमारी यह दशा हो रही है कि हम धन- सम्पत्तिके नशेसे- श्रीमदसे अंधे हो रहे हैं; आप हमारे सामने हैं तो भी हम आपकी ओर नहीं देख पाते ॥ ६३ ॥ दूसरोंको सम्मान देकर स्वयं सम्मान न चाहनेवाले

भाईजी! जो कल्याणकामी है उसे राज्यलक्ष्मी न मिले- इसीमें उसका भला है; क्योंकि मनुष्य राज्यलक्ष्मीसे अंधा हो जाता है और अपने भाई-बन्धु, स्वजनोंतकको नहीं देख पाता ॥६४ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! इस प्रकार कहते - कहते वसुदेवजीका हृदय प्रेमसे गद्गद हो गया । उन्हें नन्दबाबाकी मित्रता और उपकार स्मरण हो आये । उनके नेत्रोंमें प्रेमाश्रु उमड़ आये, वे रोने लगे ॥ ६५ ॥ नन्दजी अपने सखा वसुदेवजीको प्रसन्न करनेके लिये एवं

भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीके प्रेमपाशमें बँधकर आज- कल करते - करते तीन महीनेतक वहीं रह गये । यदुवंशियोंने जीभर उनका सम्मान किया ॥ ६६ ॥ इसके बाद बहुमूल्य

आभूषण, रेशमी वस्त्र, नाना प्रकारकी उत्तमोत्तम सामग्रियों और भोगोंसे नन्दबाबाको, उनके व्रजवासी साथियोंको और बन्धु बान्धवोंको खूब तृप्त किया ॥ ६७ ॥ वसुदेवजी, उग्रसेन,

श्रीकृष्ण, बलराम, उद्धव आदि यदुवंशियोंने अलग- अलग उन्हें अनेकों प्रकारकी भेंटें दीं । उनके विदा करनेपर उन सब सामग्रियोंको लेकर नन्दबाबा, अपने व्रजके लिये रवाना हुए ॥६८ ॥ नन्दबाबा, गोपों और गोपियोंका चित्त भगवान् श्रीकृष्णके चरण- कमलोंमें इस

प्रकार लग गया कि वे फिर प्रयत्न करनेपर भी उसे वहाँसे लौटा न सके । सुतरां बिना ही

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मनके उन्होंने मथुराकी यात्रा की ॥६९ ॥

बन्धुषु प्रतियातेषु वृष्णयः कृष्णदेवताः ।

वीक्ष्य प्रावृषमासन्नां ययुर्द्वारवतीं पुनः ॥७०

जनेभ्यः कथयांचक्रुर्यदुदेवमहोत्सवम् ।

यदासीत्तीर्थयात्रायां सुहृत्सन्दर्शनादिकम् ॥७१

जब सब बन्धु - बान्धव वहाँसे विदा हो चुके, तब भगवान् श्रीकृष्णको ही एकमात्र इष्टदेव मानने - वाले यदुवंशियोंने यह देखकर कि अब वर्षा ऋतु आ पहुँची है, द्वारकाके लिये प्रस्थान किया ॥७० ॥ वहाँ जाकर उन्होंने सब लोगोंसे वसुदेवजीके यज्ञमहोत्सव, स्वजन-सम्बन्धियोंके दर्शन - मिलन आदि तीर्थयात्राके प्रसंगोंको कह सुनाया ॥७१ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे तीर्थयात्रानुवर्णनं नाम चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥८४ ॥

१. यः सर्वांस्तस्माद्ब्रह्माग्र० । १. चित्ते ० । २. नम्योपसर्प्य च ।

पृष्ठ 967

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अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः श्रीभगवान्‌के द्वारा वसुदेवजीको ब्रह्मज्ञानका उपदेश तथा देवकीजीके छः पुत्रोंको लौटा लाना श्रीबादरायणिरुवाच

अथैकदाऽऽत्मजी प्राप्तौ कृतपादाभिवन्दनौ ।

वसुदेवोऽभिनन्द्याह प्रीत्या संकर्षणाच्युतौ ॥ १

मुनीनां स वचः श्रुत्वा पुत्रयोर्धामसूचकम् ।

तद्वीर्यैर्जातविश्रम्भः परिभाष्याभ्यभाषत ॥२

कृष्ण कृष्ण महायोगिन् संकर्षण सनातन ।

जाने वामस्य यत् साक्षात् प्रधानपुरुषौ परौ ॥३

यत्र येन यतो यस्य यस्मै यद् यद् यथा यदा ।

स्यादिदं भगवान् साक्षात् प्रधानपुरुषेश्वरः ॥४

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! इसके बाद एक दिन भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी प्रातःकालीन प्रणाम करनेके लिये माता-पिताके पास गये । प्रणाम कर लेनेपर वसुदेवजी बड़े प्रेमसे दोनों भाइयोंका अभिनन्दन करके कहने लगे || १ || वसुदेवजीने बड़े-बड़े ऋषियोंके मुँहसे भगवान्‌की महिमा सुनी थी तथा उनके ऐश्वर्यपूर्ण चरित्र भी देखे थे । इससे उन्हें इस बातका दृढ़ विश्वास हो गया था कि ये साधारण पुरुष नहीं, स्वयं भगवान् हैं । इसलिये उन्होंने अपने पुत्रोंको प्रेमपूर्वक सम्बोधित करके यों कहा— ॥२ ॥

‘ सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण! महायोगीश्वर संकर्षण! तुम दोनों सनातन हो । मैं जानता हूँ कि तुम दोनों सारे जगत्के साक्षात् कारणस्वरूप प्रधान और पुरुषके भी नियामक परमेश्वर हो ॥३ ॥ इस जगत्के आधार, निर्माता और निर्माणसामग्री भी तुम्हीं हो । इस सारे जगत्के

स्वामी तुम दोनों हो और तुम्हारी ही क्रीडाके लिये इसका निर्माण हुआ है । यह जिस समय, जिस रूपमें जो कुछ रहता है, होता है - वह सब तुम्हीं हो । इस जगत् में प्रकृति- रूपसे भोग्य और पुरुषरूपसे भोक्ता तथा दोनोंसे परे दोनोंके नियामक साक्षात् भगवान् भी तुम्हीं हो ॥४ ॥

एतन्नानाविधं विश्वमात्मसृष्टमधोक्षज ।

आत्मनानुप्रविश्यात्मन् प्राणो जीवो बिभर्ष्यजः ॥ ५

प्राणादीनां विश्वसृजां शक्तयो याः परस्य ताः ।

पृष्ठ 968

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पारतन्त्र्याद् वैसादृश्याद् द्वयोश्चेष्टैव चेष्टताम् ॥ ६

कान्तिस्तेजः प्रभा सत्ता चन्द्राग्न्यर्कर्क्षविद्युताम् ।

यत् स्थैर्यं भूभृतां भूमेर्वृत्तिर्गन्धोऽर्थतो भवान् ॥७

तर्पणं प्राणनमपां देव त्वं ताश्च तद्रसः ।

ओजः सहो बलं चेष्टा गतिर्वायोस्तवेश्वर ॥ ८

दिशां त्वमवकाशोऽसि दिशः खं स्फोट आश्रयः ।

नादो वर्णस्त्वमोंकार आकृतीनां पृथक्कृतिः ॥९

इन्द्रियं त्विन्द्रियाणां त्वं देवाश्च तदनुग्रहः ।

अवबोधो भवान् बुद्धेर्जीवस्यानुस्मृतिः सती ॥१०

भूतानामसि भूतादिरिन्द्रियाणां च तैजसः ।

वैकारिको विकल्पानां प्रधानमनुशायिनाम् ॥११

नश्वरेष्विह भावेषु तदसि त्वमनश्वरम् ।

यथा द्रव्यविकारेषु द्रव्यमात्रं निरूपितम् ॥१२

इन्द्रियातीत! जन्म, अस्तित्व आदि भावविकारोंसे रहित परमात्मन्! इस चित्र - विचित्र जगत्का तुम्हींने निर्माण किया है और इसमें स्वयं तुमने ही आत्मारूपसे प्रवेश भी किया है । तुम प्राण ( क्रियाशक्ति ) और जीव ( ज्ञानशक्ति) के रूपमें इसका पालन - पोषण कर रहे हो ॥५ ॥ क्रियाशक्तिप्रधान प्राण आदिमें जो जगत्की वस्तुओंकी सृष्टि करनेकी सामर्थ्य है,

वह उनकी अपनी सामर्थ्य नहीं, तुम्हारी ही है । क्योंकि वे तुम्हारे समान चेतन नहीं, अचेतन हैं; स्वतन्त्र नहीं, परतन्त्र हैं । अतः उन चेष्टाशील प्राण आदिमें केवल चेष्टामात्र होती है, शक्ति नहीं । शक्ति तो तुम्हारी है ॥६॥ प्रभो! चन्द्रमाकी कान्ति, अग्निका तेज, सूर्यकी प्रभा, नक्षत्र

और विद्युत् आदिकी स्फुरणरूपसे सत्ता, पर्वतोंकी स्थिरता, पृथ्वीकी साधारणशक्तिरूप वृत्ति और गन्धरूप गुण – ये सब वास्तवमें तुम्हीं हो || ७ || परमेश्वर! जलमें तृप्त करने, जीवन देने और शुद्ध करनेकी जो शक्तियाँ हैं, वे तुम्हारा ही स्वरूप हैं । जल और उसका रस भी तुम्हीं हो । प्रभो! इन्द्रियशक्ति, अन्तःकरणकी शक्ति, शरीरकी शक्ति, उसका हिलना-डोलना, चलना- फिरना — ये सब वायुकी शक्तियाँ तुम्हारी ही हैं || ८ || दिशाएँ और उनके अवकाश भी तुम्हीं हो । आकाश और उसका आश्रयभूत स्फोट- शब्दतन्मात्रा या परा वाणी, नाद-पश्यन्ती, ओंकार – मध्यमा तथा वर्ण ( अक्षर ) एवं पदार्थोंका अलग- अलग निर्देश करनेवाले पद, रूप, वैखरी वाणी भी तुम्हीं हो ॥९ ॥ इन्द्रियाँ, उनकी विषयप्रकाशिनी शक्ति और

अधिष्ठातृ- देवता तुम्हीं हो! बुद्धिकी निश्चयात्मिका शक्ति और जीवकी विशुद्ध स्मृति भी तुम्हीं

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हो ॥१० ॥ भूतोंमें उनका कारण तामस अहंकार, इन्द्रियोंमें उनका कारण तैजस अहंकार

और इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ - देवताओंमें उनका कारण सात्त्विक अहंकार तथा जीवोंके आवागमनका कारण माया भी तुम्हीं हो ॥ ११ ॥ भगवन्! जैसे मिट्टी आदि वस्तुओंके विकार

घड़ा, वृक्ष आदिमें मिट्टी निरन्तर वर्तमान है और वास्तवमें वे कारण ( मृत्तिका ) रूप ही हैं— उसी प्रकार जितने भी विनाशवान् पदार्थ हैं, उनमें तुम कारणरूपसे अविनाशी तत्त्व हो । वास्तवमें वे सब तुम्हारे ही स्वरूप हैं ॥१२ ॥

सत्त्वं रजस्तम इति गुणास्तद्वृत्तयश्च याः ।

त्वय्यद्धा ब्रह्मणि परे कल्पिता योगमायया ॥१३

तस्मान्न सन्त्यमी भावा यर्हि त्वयि विकल्पिताः ।

त्वं चामीषु विकारेषु ह्यन्यदा व्यावहारिकः ॥ १४

गुणप्रवाह एतस्मिन्नबुधास्त्वखिलात्मनः ।

गतिं सूक्ष्मामबोधेन संसरन्तीह कर्मभिः ॥१५

यदृच्छया नृतां प्राप्य सुकल्पामिह दुर्लभाम् ।

स्वार्थे प्रमत्तस्य वयो गतं त्वन्माययेश्वर ॥१६

असावहं ममैवैते देहे चास्यान्वयादिषु ।

स्नेहपाशैर्निबध्नाति भवान् सर्वमिदं जगत् ॥१७

युवां न नः सुतौ साक्षात् प्रधानपुरुषेश्वरौ ।

भूभारक्षत्रक्षपण अवतीर्णौ तथाऽऽत्थ ह ॥१८

तत्ते गतोऽस्म्यरणमद्य पदारविन्द- मापन्नसंसृतिभयापहमार्तबन्धो । एतावतालमलमिन्द्रियलालसेन मर्त्यात्मदृक् त्वयि परे यदपत्यबुद्धिः ॥१९ सूतीगृहे ननु जगाद भवानजो नौ संजज्ञ इत्यनुयुगं निजधर्मगुप्त्यै । प्रभो! सत्त्व, रज, तम- ये तीनों गुण और उनकी वृत्तियाँ ( परिणाम) – महत्तत्त्वादि परब्रह्म परमात्मामें, तुममें योगमायाके द्वारा कल्पित हैं ॥१३ ॥ इसलिये ये जितने भी जन्म,

अस्ति, वृद्धि, परिणाम आदि भाव- विकार हैं, वे तुममें सर्वथा नहीं हैं । जब तुममें इनकी

पृष्ठ 970

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कल्पना कर ली जाती है, तब तुम इन विकारोंमें अनुगत जान पड़ते हो । कल्पनाकी निवृत्ति हो जानेपर तो निर्विकल्प परमार्थस्वरूप तुम्हीं तुम रह जाते हो ॥१४ ॥ यह जगत् सत्त्व, रज,

तम— इन तीनों गुणोंका प्रवाह है; देह, इन्द्रिय, अन्तःकरण, सुख, दुःख और राग- लोभादि उन्हींके कार्य हैं । इनमें जो अज्ञानी तुम्हारा, सर्वात्माका सूक्ष्मस्वरूप नहीं जानते, वे अपने देहाभिमानरूप अज्ञानके कारण ही कर्मोंके फंदे में फँसकर बार- बार जन्म- मृत्युके चक्करमें भटकते रहते हैं ॥१५ ॥ परमेश्वर! मुझे शुभ प्रारब्धके अनुसार इन्द्रियादिकी सामर्थ्यसे युक्त

अत्यन्त दुर्लभ मनुष्य - शरीर प्राप्त हुआ। किन्तु तुम्हारी मायाके वश होकर मैं अपने सच्चे स्वार्थ- परमार्थसे ही असावधान हो गया और मेरी सारी आयु यों ही बीत गयी ॥ १६ ॥ प्रभो!

यह शरीर मैं हूँ और इस शरीरके सम्बन्धी मेरे अपने हैं, इस अहंता एवं ममतारूप स्नेहकी फाँसीसे तुमने इस सारे जगत्को बाँध रखा है ॥१७ ॥ मैं जानता हूँ कि तुम दोनों मेरे पुत्र नहीं

हो, सम्पूर्ण प्रकृति और जीवोंके स्वामी हो । पृथ्वीके भारभूत राजाओंके नाशके लिये ही तुमने अवतार ग्रहण किया है । यह बात तुमने मुझसे कही भी थी ॥ १८ ॥ इसलिये दीनजनोंके

हितैषी, शरणागतवत्सल! मैं अब तुम्हारे चरणकमलोंकी शरणमें हूँ; क्योंकि वे ही शरणागतोंके संसारभयको मिटानेवाले हैं । अब इन्द्रियोंकी लोलुपतासे भर पाया! इसीके कारण मैंने मृत्युके ग्रास इस शरीरमें आत्मबुद्धि कर ली और तुममें, जो कि परमात्मा हो, पुत्रबुद्धि ॥१९ ॥ प्रभो! तुमने प्रसव-गृहमें ही हमसे कहा था कि ' यद्यपि मैं अजन्मा हूँ, फिर

भी मैं अपनी ही बनायी हुई धर्म - मर्यादाकी रक्षा करनेके लिये प्रत्येक युगमें तुम दोनोंके द्वारा अवतार ग्रहण करता रहा हूँ। ' भगवन्! तुम आकाशके समान अनेकों शरीर ग्रहण करते और छोड़ते रहते हो । वास्तवमें तुम अनन्त, एकरस सत्ता हो। तुम्हारी आश्चर्यमयी शक्ति योगमायाका रहस्य भला कौन जान सकता है? सब लोग तुम्हारी कीर्तिका ही गान करते रहते हैं ॥२० ॥

नानातनूर्गगनवद् विदधज्जहासि को वेद भूम्न उरुगाय विभूतिमायाम् ॥२० श्रीशुक उवाच

आकर्ण्येत्थं पितुर्वाक्यं भगवान् सात्वतर्षभः ।

प्रत्याह प्रश्रयानम्रः प्रहसश्लक्ष्णया गिरा ॥२१

श्रीभगवानुवाच

वचो वः समवेतार्थं तातैतदुपमन्महे ।

यन्नः पुत्रान् समुद्दिश्य तत्त्वग्राम उदाहृतः ॥२२

अहं यूयमसावार्य' इमे च द्वारकौकसः ।

सर्वेऽप्येवं यदुश्रेष्ठ विमृश्याः सचराचरम् ॥२३