श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 971–980

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 971–980

पृष्ठ 971

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आत्मा ह्येकः स्वयंज्योतिर्नित्योऽन्यो निर्गुणो गुणैः ।

आत्मसृष्टैस्तत्कृतेषु भूतेषु बहुधेयते ॥२४

खं वायुर्ज्योतिरापो भूस्तत्कृतेषु यथाशयम् ।

आविस्तिरोऽल्पभूर्येको नानात्वं यात्यसावपि ॥२५

श्रीशुक उवाच

एवं भगवता राजन् वसुदेव उदाहृतम् ।

श्रुत्वा विनष्टनानाधीस्तूष्णीं प्रीतमना अभूत् ॥२६

अथ तत्र कुरुश्रेष्ठ देवकी सर्वदेवता ।

श्रुत्वाऽऽनीतं गुरोः पुत्रमात्मजाभ्यां सुविस्मिता ॥ २७

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! वसुदेवजीके ये वचन सुनकर यदुवंशशिरोमणि भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण मुसकराने लगे। उन्होंने विनयसे झुककर मधुर वाणीसे कहा ॥२१ ॥

भगवान् श्रीकृष्णने कहा - पिताजी! हम तो आपके पुत्र ही हैं । हमें लक्ष्य करके आपने

यह ब्रह्मज्ञानका उपदेश किया है । हम आपकी एक-एक बात युक्तियुक्त मानते हैं ॥२२ ॥

पिताजी! आपलोग, मैं, भैया बलरामजी, सारे द्वारकावासी, सम्पूर्ण चराचर जगत्— सब--के-सब आपने जैसा कहा, वैसे ही हैं, सबको ब्रह्मरूप ही समझना चाहिये || २३ || पिताजी! आत्मा तो एक ही है । परन्तु वह अपनेमें ही गुणोंकी सृष्टि कर लेता है और गुणोंके द्वारा बनाये हुए पंचभूतोंमें एक होनेपर भी अनेक, स्वयंप्रकाश होनेपर भी दृश्य, अपना स्वरूप होनेपर भी अपनेसे भिन्न, नित्य होनेपर भी अनित्य और निर्गुण होनेपर भी सगुणके रूपमें प्रतीत होता है ॥२४ ॥ जैसे आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी - ये पंचमहाभूत अपने

कार्य घट, कुण्डल आदिमें प्रकट- अप्रकट, बड़े - छोटे, अधिक- थोड़े, एक और अनेक -से प्रतीत होते हैं— परन्तु वास्तवमें सत्तारूपसे वे एक ही रहते हैं; वैसे ही आत्मामें भी उपाधियोंके भेदसे ही नानात्वकी प्रतीति होती है । इसलिये जो मैं हूँ, वही सब हैं - इस दृष्टिसे आपका कहना ठीक ही है ॥२५ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके इन वचनोंको सुनकर वसुदेवजीने नानात्व-बुद्धि छोड़ दी; वे आनन्दमें मग्न होकर वाणीसे मौन और मनसे निस्संकल्प हो गये ॥२६ ॥ कुरुश्रेष्ठ! उस समय वहाँ सर्वदेवमयी देवकीजी भी बैठी हुई थीं ।

वे बहुत पहले से ही यह सुनकर अत्यन्त विस्मित थीं कि श्रीकृष्ण और बलरामजीने अपने मरे हुए गुरुपुत्रको यमलोकसे वापस ला दिया ॥२७ ॥ अब उन्हें अपने उन पुत्रोंकी याद आ गयी,

जिन्हें कंसने मार डाला था । उनके स्मरणसे देवकीजीका हृदय आतुर हो गया, नेत्रोंसे आँसू बहने लगे । उन्होंने बड़े ही करुणस्वरसे श्रीकृष्ण और बलरामजीको सम्बोधित करके कहा ॥२८ ॥

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पृष्ठ 972

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कृष्णरामौ समाश्राव्य पुत्रान् कंसविहिंसितान् ।

स्मरन्ती कृपणं प्राह वैक्लव्यादश्रुलोचना ॥ २८

देवक्युवाच

राम रामाप्रमेयात्मन् कृष्ण योगेश्वरेश्वर ।

वेदाहं वां विश्वसृजामीश्वरावादिपूरुषौ ॥२९

कालविध्वस्तसत्त्वानां राज्ञामुच्छास्त्रवर्तिनाम् ।

भूमेर्भारायमाणानामवतीर्णौ किलाद्य मे ॥३०

यस्यांशांशांशभागेन विश्वोत्पत्तिलयोदयाः ।

भवन्ति किल विश्वात्मंस्तं त्वाद्याहं गतिं गता ॥३१

चिरान्मृतसुतादाने गुरुणा कालचोदितौ ।

आनिन्यथुः पितृस्थानाद् गुरवे गुरुदक्षिणाम् ॥३२

तथा मे कुरुतं कामं युवां योगेश्वरेश्वरौ ।

भोजराजहतान् पुत्रान् कामये द्रष्टुमाहृतान् ॥३३

ऋषिरुवाच

एवं संचोदितौ मात्रा रामः कृष्णश्च भारत ।

सुतलं संविविशतुर्योगमायामुपाश्रितौ ॥३४

तस्मिन् प्रविष्टावुपलभ्य दैत्यराड् विश्वात्मदैवं सुतरां तथाऽऽत्मनः । तद्दर्शनाह्लादपरिप्लुताशयः सद्यः समुत्थाय ननाम सान्वयः ॥ ३५ देवकीजीने कहा - लोकाभिराम राम! तुम्हारी शक्ति मन और वाणीके परे है । श्रीकृष्ण! तुम योगेश्वरोंके भी ईश्वर हो । मैं जानती हूँ कि तुम दोनों प्रजापतियोंके भी ईश्वर, आदिपुरुष नारायण हो ॥२९ ॥ यह भी मुझे निश्चत रूपसे मालूम है कि जिन लोगोंने कालक्रमसे अपना

धैर्य, संयम और सत्त्वगुण खो दिया है तथा शास्त्रकी आज्ञाओंका उल्लंघन करके जो स्वेच्छाचारपरायण हो रहे हैं, भूमिके भारभूत उन राजाओंका नाश करनेके लिये ही तुम दोनों मेरे गर्भसे अवतीर्ण हुए हो ॥ ३० ॥

विश्वात्मन्! तुम्हारे पुरुषरूप अंशसे उत्पन्न हुई मायासे गुणोंकी उत्पत्ति होती है और उनके लेशमात्रसे जगत्की उत्पत्ति, विकास तथा प्रलय होता है । आज मैं सर्वान्तःकरणसे ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 973

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तुम्हारी शरण हो रही हूँ || ३१ || मैंने सुना है कि तुम्हारे गुरु सान्दीपनिजीके पुत्रको मरे बहुत दिन हो गये थे । उनको गुरुदक्षिणा देनेके लिये उनकी आज्ञा तथा कालकी प्रेरणासे तुम दोनोंने उनके पुत्रको यमपुरीसे वापस ला दिया ॥ ३२ ॥ तुम दोनों योगीश्वरोंके भी ईश्वर हो । इसलिये

आज मेरी भी अभिलाषा पूर्ण करो । मैं चाहती हूँ कि तुम दोनों मेरे उन पुत्रोंको, जिन्हें कंसने मार डाला था, ला दो और उन्हें मैं भर आँख देख लूँ ॥३३ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - प्रिय परीक्षित्! माता देवकीजीकी यह बात सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम दोनोंने योगमायाका आश्रय लेकर सुतल लोकमें प्रवेश किया ॥ ३४ ॥

जब दैत्यराज बलिने देखा कि जगत्के आत्मा और इष्टदेव तथा मेरे परम स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी सुतल लोकमें पधारे हैं, तब उनका हृदय उनके दर्शनके आनन्दमें निमग्न हो गया । उन्होंने झटपट अपने कुटुम्बके साथ आसनसे उठकर भगवान्के चरणोंमें प्रणाम किया || ३५ ॥ तयोः समानीय वरासनं मुदा निविष्टयोस्तत्र महात्मनोस्तयोः । दधार पादाववनिज्य तज्जलं सवृन्द आब्रह्म पुनद् यदम्बु ह ॥३६ समर्हयामास स तौ विभूतिभि- र्महार्हवस्त्राभरणानुलेपनैः । ताम्बूलदीपामृतभक्षणादिभिः स्वगोत्रवित्तात्मसमर्पणेन च ॥३७ स इन्द्रसेनो भगवत्पदाम्बुजं बिभ्रन्मुहुः प्रेमविभिन्नया धिया । उवाच हानन्दजलाकुलेक्षणः प्रहृष्टरोमा नृप गद्गदाक्षरम् ॥३८ बलिरुवाच

नमोऽनन्ताय बृहते नमः कृष्णाय वेधसे ।

सांख्ययोगवितानाय ब्रह्मणे परमात्मने ॥३९

दर्शनं वां हि भूतानां दुष्प्रापं चाप्यदुर्लभम् ।

रजस्तमःस्वभावानां यन्नः प्राप्तौ यदृच्छया ॥४०

दैत्यदानवगन्धर्वाः सिद्धविद्याध्रचारणाः । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 974

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यक्षरक्षःपिशाचाश्च भूतप्रमथनायकाः ॥४१

विशुद्धसत्त्वधान्यद्धा त्वयि शास्त्रशरीरिणि ।

नित्यं निबद्धवैरास्ते वयं चान्ये च तादृशाः ॥४२

केचनोद्बद्धवैरेण भक्त्या केचन कामतः ।

न तथा सत्त्वसंरब्धाः सन्निकृष्टाः सुरादयः ॥४३

अत्यन्त आनन्दसे भरकर दैत्यराज बलिने भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीको श्रेष्ठ आसन दिया और जब वे दोनों महापुरुष उसपर विराज गये, तब उन्होंने उनके पाँव पखारकर उनका चरणोदक परिवारसहित अपने सिरपर धारण किया । परीक्षित्! भगवान्के चरणोंका जल ब्रह्मापर्यन्त सारे जगत्को पवित्र कर देता है ॥ ३६ ॥ इसके बाद दैत्यराज बलिने बहुमूल्य

वस्त्र, आभूषण, चन्दन, ताम्बूल, दीपक, अमृतके समान भोजन एवं अन्य विविध सामग्रियोंसे उनकी पूजा की और अपने समस्त परिवार, धन तथा शरीर आदिको उनके चरणोंमें समर्पित कर दिया ॥३७ ॥ परीक्षित्! दैत्यराज बलि बार- बार भगवान्‌के चरणकमलोंको अपने

वक्षःस्थल और सिरपर रखने लगे, उनका हृदय प्रेमसे विह्वल हो गया । नेत्रोंसे आनन्दके आँसू

बहने लगे । रोम- रोम खिल उठा । अब वे गद्गद स्वरसे भगवान्‌की स्तुति करने लगे ॥३८ ॥

दैत्यराज बलिने कहा— बलरामजी! आप अनन्त हैं । आप इतने महान् हैं कि शेष आदि सभी विग्रह आपके अन्तर्भूत हैं । सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण! आप सकल जगत्के निर्माता हैं । ज्ञानयोग और भक्तियोग दोनोंके प्रवर्तक आप ही हैं । आप स्वयं ही परब्रह्म परमात्मा हैं । हम आप दोनोंको बार-बार नमस्कार करते हैं ॥ ३ ९ ॥ भगवन्! आप दोनोंका दर्शन प्राणियोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ है । फिर भी आपकी कृपासे वह सुलभ हो जाता है । क्योंकि आज आपने कृपा करके हम रजोगुणी एवं तमोगुणी स्वभाववाले दैत्योंको भी दर्शन दिया है ॥४० ॥ प्रभो! हम और हमारे ही समान दूसरे दैत्य, दानव, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर, चारण,

यक्ष, राक्षस, पिशाच, भूत और प्रमथनायक आदि आपका प्रेमसे भजन करना तो दूर रहा, आपसे सर्वदा दृढ़ वैरभाव रखते हैं; परन्तु आपका श्रीविग्रह साक्षात् वेदमय और विशुद्ध सत्त्वस्वरूप है । इसलिये हमलोगोंमेंसे बहुतोंने दृढ़ वैरभावसे, कुछने भक्तिसे और कुछने कामनासे आपका स्मरण करके उस पदको प्राप्त किया है, जिसे आपके समीप रहनेवाले सत्त्वप्रधान देवता भी नहीं प्राप्त कर सकते ॥४०-४३ ॥ योगेश्वरोंके अधीश्वर! बड़े - बड़े योगेश्वर भी प्रायः यह बात नहीं जानते कि आपकी योगमाया यह है और ऐसी है; फिर हमारी तो बात ही क्या है? ॥४४ ॥ इसलिये स्वामी! मुझपर ऐसी कृपा कीजिये कि मेरी चित्त - वृत्ति

आपके उन चरणकमलोंमें लग जाय, जिसे किसीकी अपेक्षा न रखनेवाले परमहंस लोग ढूँढ़ा करते हैं; और उनका आश्रय लेकर मैं उससे भिन्न इस घर- गृहस्थीके अँधेरे कूएँसे निकल जाऊँ । प्रभो! इस प्रकार आपके उन चरणकमलोंकी, जो सारे जगत्के एकमात्र आश्रय हैं, शरण लेकर शान्त हो जाऊँ और अकेला ही विचरण करूँ । यदि कभी किसीका संग करना ही पड़े तो सबके परम हितैषी संतोंका ही ॥ ४५ ॥ प्रभो! आप समस्त चराचर जगत्के नियन्ता

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पृष्ठ 975

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और स्वामी हैं । आप हमें आज्ञा देकर निष्पाप बनाइये, हमारे पापोंका नाश कर दीजिये; क्योंकि जो पुरुष श्रद्धाके साथ आपकी आज्ञाका पालन करता है, वह विधि - निषेधके बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥४६ ॥

इदमित्थमिति प्रायस्तव योगेश्वरेश्वर ।

न विदन्त्यपि योगेशा योगमायां कुतो वयम् ॥ ४४

तन्नः प्रसीद निरपेक्षविमृग्ययुष्मत्- पादारविन्दधिषणान्यगृहान्धकूपात् । निष्क्रम्य विश्वशरणायुपलब्धवृत्तिः शान्तो यथैक उत सर्वसखैश्चरामि ॥४५

शाध्यस्मानीशितव्येश निष्पापान् कुरु नः प्रभो ।

पुमान् यच्छ्रद्धयाऽऽतिष्ठंश्चोदनाया विमुच्यते ॥ ४६

श्रीभगवानुवाच

आसन् मरीचेः षट् पुत्रा ऊर्णायां प्रथमेऽन्तरे ।

देवाः कं जहसुर्वीक्ष्य सुतां यभितुमुद्यतम् ॥४७

तेनासुरीमगन् योनिमधुनावद्यकर्मणा ।

हिरण्यकशिपोर्जाता नीतास्ते योगमायया ॥४८

देवक्या उदरे जाता राजन् कंसविहिंसिताः ।

सा ताञ्छोचत्यात्मजान् स्वांस्त इमेऽध्यासतेऽन्तिके ॥४९

इत एतान् प्रणेष्यामो मातृशोकापनुत्तये ।

ततः शापाद् विनिर्मुक्ता लोकं यास्यन्ति विज्वराः ॥५०

स्मरोद्गीथः परिष्वंगः पतंगः क्षुद्रभृद् घृणी ।

षडिमे मत्प्रसादेन पुनर्यास्यन्ति सद्गतिम् ॥५१

इत्युक्त्वा तान् समादाय इन्द्रसेनेन पूजितौ ।

पुनर्द्वारवतीमेत्य मातुः पुत्रानयच्छताम् ॥५२

भगवान् श्रीकृष्णने कहा — ' दैत्यराज! स्वायम्भुव मन्वन्तरमें प्रजापति मरीचिकी पत्नी ऊर्णाके गर्भसे छः पुत्र उत्पन्न हुए थे । वे सभी देवता थे । वे यह देखकर कि ब्रह्माजी अपनी ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 976

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पुत्रीसे समागम करनेके लिये उद्यत हैं, हँसने लगे ॥४७ ॥ इस परिहासरूप अपराधके कारण

उन्हें ब्रह्माजीने शाप दे दिया और वे असुर- योनिमें हिरण्यकशिपुके पुत्ररूपसे उत्पन्न हुए । अब योगमायाने उन्हें वहाँसे लाकर देवकीके गर्भमें रख दिया और उनको उत्पन्न होते ही कंसने मार डाला । दैत्यराज! माता देवकीजी अपने उन पुत्रोंके लिये अत्यन्त शोकातुर हो रही हैं और वे तुम्हारे पास हैं ॥४८-४९ ॥ अतः हम अपनी माताका शोक दूर करनेके लिये इन्हें यहाँसे ले जायँगे । इसके बाद ये शापसे मुक्त हो जायँगे और आनन्दपूर्वक अपने लोकमें चले जायँगे ॥५० ॥ इनके छः नाम हैं - स्मर, उद्गीथ, परिष्वंग, पतंग, क्षुद्रभृत् और घृणि । इन्हें

मेरी कृपासे पुनः सद्गति प्राप्त होगी' ॥ ५१ ॥ परीक्षित्! इतना कहकर भगवान् श्रीकृष्ण चुप

हो गये । दैत्यराज बलिने उनकी पूजा की; इसके बाद श्रीकृष्ण और बलरामजी बालकोंको लेकर फिर द्वारका लौट आये तथा माता देवकीको उनके पुत्र सौंप दिये ॥ ५२ ॥ उन

बालकोंको देखकर देवी देवकीके हृदयमें वात्सल्य- स्नेहकी बाढ़ आ गयी । उनके स्तनोंसे दूध बहने लगा । वे बार- बार उन्हें गोदमें लेकर छातीसे लगातीं और उनका सिर सूँघतीं ॥ ५३ ॥

पुत्रोंके स्पर्शके आनन्दसे सराबोर एवं आनन्दित देवकीने उनको स्तन- पान कराया । वे विष्णुभगवान्की उस मायासे मोहित हो रही थीं, जिससे यह सृष्टि चक्र चलता है ॥५४ ॥

परीक्षित्! देवकीजीके स्तनोंका दूध साक्षात् अमृत था; क्यों न हो, भगवान् श्रीकृष्ण जो उसे पी चुके थे! उन बालकोंने वही अमृतमय दूध पिया । उस दूधके पीनेसे और भगवान् श्रीकृष्णके अंगोंका संस्पर्श होनेसे उन्हें आत्मसाक्षात्कार हो गया ॥ ५५ ॥ इसके बाद उन

लोगोंने भगवान् श्रीकृष्ण, माता देवकी, पिता वसुदेव और बलरामजीको नमस्कार किया । तदनन्तर सबके सामने ही वे देवलोकमें चले गये ॥ ५६॥ परीक्षित्! देवी देवकी यह देखकर

अत्यन्त विस्मित हो गयीं कि मरे हुए बालक लौट आये और फिर चले भी गये । उन्होंने ऐसा निश्चय किया कि यह श्रीकृष्णका ही कोई लीला- कौशल है ॥५७ ॥ परीक्षित्! भगवान्

श्रीकृष्ण स्वयं परमात्मा हैं, उनकी शक्ति अनन्त है । उनके ऐसे - ऐसे अद्भुत चरित्र इतने हैं कि किसी प्रकार उनका पार नहीं पाया जा सकता ॥५८ ॥

तान् दृष्ट्वा बालकान् देवी पुत्रस्नेहस्नुतस्तनी ।

परिष्वज्यांकमारोप्य मूर्म्यजिघ्रदभीक्ष्णशः ॥५३

अपाययत् स्तनं प्रीता सुतस्पर्शपरिप्लुता ।

मोहिता मायया विष्णोर्यया सृष्टिः प्रवर्तते ॥५४

पीत्वामृतं पयस्तस्याः पीतशेषं गदाभृतः ।

नारायणांगसंस्पर्शप्रतिलब्धात्मदर्शनाः ॥५५

ते नमस्कृत्य गोविन्दं देवकीं पितरं बलम् ।

मिषतां सर्वभूतानां ययुर्धाम दिवौकसाम् ॥५६

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पृष्ठ 977

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तं दृष्ट्वा देवकी देवी मृतागमननिर्गमम् ।

मेने सुविस्मिता मायां कृष्णस्य रचितां नृप ॥५७

एवंविधान्यद्भुतानि कृष्णस्य परमात्मनः ।

वीर्याण्यनन्तवीर्यस्य सन्त्यनन्तानि भारत ॥५८

सूत उवाच य इदमनुशृणोति श्रावयेद् वा मुरारे- श्चरितममृतकीर्तेर्वर्णितं व्यासपुत्रैः । जगदघभिदलं तद्भक्तसत्कर्णपूरं भगवति कृतचित्तो याति तत्क्षेमधाम ॥५९ सूतजी कहते हैं— शौनकादि ऋषियो! भगवान् श्रीकृष्णकी कीर्ति अमर है, अमृतमयी है । उनका चरित्र जगत्के समस्त पाप-तापोंको मिटानेवाला तथा भक्तजनोंके कर्णकुहरोंमें आनन्दसुधा प्रवाहित करनेवाला है । इसका वर्णन स्वयं व्यासनन्दन भगवान् श्रीशुकदेवजीने किया है । जो इसका श्रवण करता है अथवा दूसरोंको सुनाता है, उसकी सम्पूर्ण चित्तवृत्ति भगवान्में लग जाती है और वह उन्हींके परम कल्याणस्वरूप धामको प्राप्त होता है ॥५९ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे मृताग्रजानयनं नाम पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥८५ ॥

१. प्रियो ममाचार्य । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 978

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अथ षडशीतितमोऽध्यायः सुभद्राहरण और भगवान्‌का मिथिलापुरीमें राजा जनक श्रुतदेव ब्राह्मणके घर एक ही साथ जाना राजोवाच

ब्रह्मन् वेदितुमिच्छामः स्वसारं रामकृष्णयोः ।

यथोपयेमे विजयो या ममासीत् पितामही ॥१

श्रीशुक उवाच

अर्जुनस्तीर्थयात्रायां पर्यटन्नवनीं प्रभुः ।

गतः प्रभासमशृणोन्मातुलेयीं स आत्मनः ॥२

दुर्योधनाय रामस्तां दास्यतीति न चापरे ।

तल्लिप्सुः स यतिर्भूत्वा त्रिदण्डी द्वारकामगात् ॥३

तत्र वै वार्षिकान् मासानवात्सीत् स्वार्थसाधकः ।

पौरैः सभाजितोऽभीक्ष्णं रामेणाजानता च सः ॥४

एकदा गृहमानीय आतिथ्येन निमन्त्र्य तम् ।

श्रद्धयोपहृतं भैक्ष्यं बलेन बुभुजे किल ॥५

सोऽपश्यत्तत्र महतीं कन्यां वीरमनोहराम् ।

प्रीत्युत्फुल्ले क्षणस्तस्यां भावक्षुब्धं मनो दधे ॥ ६

सापि तं चकमे वीक्ष्य नारीणां हृदयंगमम् ।

हसन्ती व्रीडितापांगी तन्न्यस्तहृदयेक्षणा ॥७

राजा परीक्षित्ने पूछा– भगवन्! मेरे दादा अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीकी बहिन सुभद्राजीसे, जो मेरी दादी थीं, किस प्रकार विवाह किया? मैं यह जाननेके लिये बहुत उत्सुक हूँ ॥१ ॥

श्रीशुकदेवजीने कहा- परीक्षित्! एक बार अत्यन्त शक्तिशाली अर्जुन तीर्थयात्राके लिये पृथ्वीपर विचरण करते हुए प्रभासक्षेत्र पहुँचे । वहाँ उन्होंने यह सुना कि बलरामजी मेरे मामाकी पुत्री सुभद्राका विवाह दुर्योधनके साथ करना चाहते हैं और वसुदेव, श्रीकृष्ण आदि उनसे इस विषयमें सहमत नहीं हैं । अब अर्जुनके मनमें सुभद्राको पानेकी लालसा जग आयी। वे त्रिदण्डी वैष्णवका वेष धारण करके द्वारका पहुँचे ॥ २-३ ॥ अर्जुन सुभद्राको प्राप्त करनेके ******ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 979

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लिये वहाँ वर्षाकालमें चार महीनेतक रहे । वहाँ पुरवासियों और बलरामजीने उनका खूब सम्मान किया । उन्हें यह पता न चला कि ये अर्जुन हैं ॥४ ॥

एक दिन बलरामजीने आतिथ्यके लिये उन्हें निमन्त्रित किया और उनको वे अपने घर ले आये । त्रिदण्डी - वेषधारी अर्जुनको बलरामजीने अत्यन्त श्रद्धाके साथ भोजन - सामग्री निवेदित की और उन्होंने बड़े प्रेमसे भोजन किया || ५ || अर्जुनने भोजनके समय वहाँ विवाहयोग्य परम सुन्दरी सुभद्राको देखा । उसका सौन्दर्य बड़े -बड़े वीरोंका मन हरनेवाला था । अर्जुनके नेत्र प्रेमसे प्रफुल्लित हो गये । उनका मन उसे पानेकी आकांक्षासे क्षुब्ध हो गया और उन्होंने उसे पत्नी बनानेका दृढ़ निश्चय कर लिया || ६ || परीक्षित्! तुम्हारे दादा अर्जुन भी बड़े ही सुन्दर थे । उनके शरीरकी गठन, भाव- भंगी स्त्रियोंका हृदय स्पर्श कर लेती थी । उन्हें देखकर सुभद्राने भी मनमें उन्हींको पति बनानेका निश्चय किया। वह तनिक मुसकराकर लजीली चितवनसे उनकी ओर देखने लगी । उसने अपना हृदय उन्हें समर्पित कर दिया ॥७ ॥ अब

अर्जुन केवल उसीका चिन्तन करने लगे और इस बातका अवसर ढूँढ़ने लगे कि इसे कब हर ले जाऊँ । सुभद्राको प्राप्त करनेकी उत्कट कामनासे उनका चित्त चक्कर काटने लगा, उन्हें तनिक भी शान्ति नहीं मिलती थी ॥ ८ ॥

तां परं समनुध्यायन्नन्तरं प्रेप्सुरर्जुनः ।

न लेभे शं भ्रमच्चित्तः कामेनातिबलीयसा ॥८

महत्यां देवयात्रायां रथस्थां दुर्गनिर्गताम् ।

जहारानुमतः पित्रोः कृष्णस्य च महारथः ॥९

रथस्थो धनुरादाय शूरांश्चारुन्धतो भटान् ।

विद्राव्य क्रोशतां स्वानां स्वभागं मृगराडिव ॥ १०

तच्छ्रुत्वा क्षुभितो रामः पर्वणीव महार्णवः ।

गृहीतपादः कृष्णेन सुहृद्भिश्चान्वशाम्यत' ॥११

प्राहिणोत् पारिबर्हाणि वरवध्वोर्मुदा बलः ।

महाधनोपस्करेभरथाश्वनरयोषितः ॥१२

श्रीशुक उवाच

कृष्णस्यासीद् द्विजश्रेष्ठः श्रुतदेव इति श्रुतः ।

कृष्णैकभक्त्या पूर्णार्थः शान्तः कविरलम्पटः ॥ १३

स उवास विदेहेषु मिथिलायां गृहाश्रमी । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******

पृष्ठ 980

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अनीहयाऽऽगताहार्यनिर्वर्तितनिजक्रियः ॥ १४

यात्रामात्रं त्वहरहर्दैवादुपनमत्युत ।

नाधिकं तावता तुष्टः क्रियाश्चक्रे यथोचिताः ॥ १५

तथा तद्राष्ट्रपालोऽङ्ग बहुलाश्व इति श्रुतः ।

मैथिलो निरहम्मान उभावप्यच्युतप्रियौ ॥१६

एक बार सुभद्राजी देव -दर्शनके लिये रथपर सवार होकर द्वारका -दुर्गसे बाहर निकलीं । उसी समय महारथी अर्जुनने देवकी - वसुदेव और श्रीकृष्णकी अनुमतिसे सुभद्राका हरण कर लिया ॥९ ॥ रथपर सवार होकर वीर अर्जुनने धनुष उठा लिया और जो सैनिक उन्हें रोकनेके

लिये आये, उन्हें मार- पीटकर भगा दिया । सुभद्राके निज- जन रोते - चिल्लाते रह गये और अर्जुन जिस प्रकार सिंह अपना भाग लेकर चल देता है, वैसे ही सुभद्राको लेकर चल पड़े ॥१० ॥ यह समाचार सुनकर बलरामजी बहुत बिगड़े । वे वैसे ही क्षुब्ध हो उठे, जैसे

पूर्णिमाके दिन समुद्र । परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण तथा अन्य सुहृद्- सम्बन्धियोंने उनके पैर पकड़कर उन्हें बहुत कुछ समझाया - बुझाया, तब वे शान्त हुए ॥११ ॥ इसके बाद

बलरामजीने प्रसन्न होकर वर- वधूके लिये बहुत सा धन, सामग्री, हाथी, रथ, घोड़े और दासी-दास दहेजमें भेजे ॥१२ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! विदेहकी राजधानी मिथिलामें एक गृहस्थ ब्राह्मण थे । उनका नाम था श्रुतदेव । वे भगवान् श्रीकृष्णके परम भक्त थे । वे एकमात्र भगवद्भक्तिसे ही पूर्णमनोरथ, परम शान्त, ज्ञानी और विरक्त थे ॥१३ ॥ वे गृहस्थाश्रममें रहते हुए भी किसी

प्रकारका उद्योग नहीं करते थे; जो कुछ मिल जाता, उसीसे अपना निर्वाह कर लेते थे ॥१४ ॥

प्रारब्धवश प्रतिदिन उन्हें जीवन - निर्वाहभरके लिये सामग्री मिल जाया करती थी, अधिक नहीं । वे उतनेसे ही सन्तुष्ट भी थे, और अपने वर्णाश्रमके अनुसार धर्म- पालनमें तत्पर रहते थे ॥१५ ॥ प्रिय परीक्षित्! उस देशके राजा भी ब्राह्मणके समान ही भक्तिमान् थे ।

मैथिलवंशके उन प्रतिष्ठित नरपतिका नाम था बहुलाश्व । उनमें अहंकारका लेश भी न था ।

श्रुतदेव और बहुलाश्व दोनों ही भगवान् श्रीकृष्णके प्यारे भक्त थे ॥१६ ॥

तयोः प्रसन्नो भगवान् दारुकेणाहृतं रथम् ।

आरुह्य साकं मुनिभिर्विदेहान् प्रययौ प्रभुः ॥१७

नारदो वामदेवोऽत्रिः कृष्णो रामोऽसितोऽरुणिः ।

अहं बृहस्पतिः कण्वो मैत्रेयश्च्यवनादयः ॥१८

तत्र तत्र तमायान्तं पौरा जानपदा नृप ।

उपतस्थुः सार्घ्यहस्ता ग्रहैः सूर्यमिवोदितम् ॥ १ ९

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