श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 981–990
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 981–990
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आनर्तधन्वकुरुजांगलकंकमत्स्य- पांचालकुन्तिमधुकेकयकोसलार्णाः ।
अन्ये च तन्मुखसरोजमुदारहास- स्निग्धेक्षणं नृप पपुर्दृशिभिर्नृनार्यः ॥२०
तेभ्यः स्ववीक्षणविनष्टतमिस्रदृग्भ्यः क्षेमं त्रिलोकगुरुरर्थदृशं च यच्छन् शृण्वन् दिगन्तधवलं स्वयशोऽशुभघ्नं गीतं सुरैर्नृभिरगाच्छनकैर्विदेहान् ॥२१
तेऽच्युतं प्राप्तमाकर्ण्य पौरा जानपदा नृप ।
अभीयुर्मुदितास्तस्मै गृहीतार्हणपाणयः ॥२२
दृष्ट्वा त उत्तमश्लोकं प्रीत्युत्फुल्लाननाशयाः ।
कैर्धृतांजलिभिर्नेमुः श्रुतपूर्वांस्तथा मुनीन् ॥२३
स्वानुग्रहाय सम्प्राप्तं मन्वानौ तं जगद्गुरुम् ।
मैथिलः श्रुतदेवश्च पादयोः पेततुः प्रभोः ॥ २४
एक बार भगवान् श्रीकृष्णने उन दोनोंपर प्रसन्न होकर दारुकसे रथ मँगवाया और उसपर सवार होकर द्वारकासे विदेह देशकी ओर प्रस्थान किया || १७ || भगवान्के साथ नारद, वामदेव, अत्रि, वेदव्यास, परशुराम, असित, आरुणि, मैं ( शुकदेव ), बृहस्पति, कण्व, मैत्रेय, च्यवन आदि ऋषि भी थे ॥ १८ ॥ परीक्षित्! वे जहाँ-जहाँ पहुँचते, वहाँ-वहाँकी नागरिक और
ग्रामवासी प्रजा पूजाकी सामग्री लेकर उपस्थित होती । पूजा करनेवालोंको भगवान् ऐसे जान पड़ते, मानो ग्रहोंके साथ साक्षात् सूर्यनारायण उदय हो रहे हों ॥१९ ॥ परीक्षित्! उस यात्रामें
आनर्त, धन्व, कुरुजांगल, कंक, मत्स्य, पांचाल, कुन्ति, मधु, केकय, कोसल, अर्ण आदि अनेक देशोंके नर-नारियोंने अपने नेत्ररूपी दोनोंसे भगवान् श्रीकृष्णके उन्मुक्त हास्य और प्रेमभरी चितवनसे युक्त मुखारविन्दके मकरन्द-रसका पान किया || २० || त्रिलोकगुरु भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनसे उन लोगोंकी अज्ञानदृष्टि नष्ट हो गयी । प्रभु- दर्शन करनेवाले नर-नारियोंको अपनी दृष्टिसे परम कल्याण और तत्त्वज्ञानका दान करते चल रहे थे । स्थान-स्थानपर मनुष्य और देवता भगवान्की उस कीर्तिका गान करके सुनाते, जो समस्त दिशाओंको उज्ज्वल बनानेवाली एवं समस्त अशुभोंका विनाश करनेवाली है । इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण धीरे - धीरे विदेह देशमें पहुँचे ॥२१ ॥
परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके शुभागमनका समाचार सुनकर नागरिक और ग्रामवासियोंके आनन्दकी सीमा न रही । वे अपने हाथोंमें पूजाकी विविध सामग्रियाँ लेकर उनकी अगवानी करने आये ॥२२ ॥ भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करके उनके हृदय और
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मुखकमल प्रेम और आनन्दसे खिल उठे । उन्होंने भगवान्को तथा उन मुनियोंको, जिनका नाम केवल सुन रखा था, देखा न था- हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर प्रणाम किया ॥२३ ॥
मिथिलानरेश बहुलाश्व और श्रुतदेवने, यह समझकर कि जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण हम-लोगोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही पधारे हैं, उनके चरणोंपर गिरकर प्रणाम किया ॥२४ ॥
न्यमन्त्रयेतां दाशार्हमातिथ्येन सह द्विजैः ।
मैथिलः श्रुतदेवश्च युगपत् संहतांजली ॥२५
भगवांस्तदभिप्रेत्य द्वयोः प्रियचिकीर्षया ।
उभयोराविशद् गेहमुभाभ्यां तदलक्षितः ॥ २६
श्रोतुमप्यसतां दूरान् जनकः स्वगृहागतान् ।
आनीतेष्वासनाग्र्येषु सुखासीनान् महामनाः ॥२७
प्रवृद्धभक्त्या उद्धर्षहृदयास्राविलेक्षणः ।
नत्वा तदङ्घ्रीन् प्रक्षाल्य तदपो लोकपावनीः ॥ २८
सकुटुम्बो वहन् मूर्ध्ना पूजयांचक्र ईश्वरान् ।
गन्धमाल्याम्बराकल्पधूपदीपार्घ्यगोवृषैः ॥२९
वाचा मधुरया प्रीणन्निदमाहान्नतर्पितान् ।
पादावंकगती विष्णोः संस्पृशञ्छ्नकैर्मुदा ॥ ३०
राजोवाच
भवान् हि सर्वभूतानामात्मा साक्षी स्वदृग् विभो ।
अथ नस्त्वत्पदाम्भोजं स्मरतां दर्शनं गतः ॥ ३१
स्ववचस्तदृतं कर्तुमस्मद्दृग्गोचरो भवान् ।
यदात्थैकान्तभक्तान्मे नानन्तः श्रीरजः प्रियः ॥३२
बहुलाश्व और श्रुतदेव दोनोंने ही एक साथ हाथ जोड़कर मुनि- मण्डलीके सहित भगवान् श्रीकृष्णको आतिथ्य ग्रहण करनेके लिये निमन्त्रित किया ॥२५ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण दोनोंकी प्रार्थना स्वीकार करके दोनोंको ही प्रसन्न करनेके लिये एक ही समय पृथक् - पृथक् रूपसे दोनोंके घर पधारे और यह बात एक-दूसरेको मालूम न हुई कि भगवान् श्रीकृष्ण मेरे घरके अतिरिक्त और कहीं भी जा रहे हैं || २६ || विदेहराज बहुलाश्व बड़े मनस्वी थे; उन्होंने यह देखकर कि दुष्ट - दुराचारी पुरुष जिनका नाम भी नहीं सुन सकते, वे ही ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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भगवान् श्रीकृष्ण और ऋषि- मुनि मेरे घर पधारे हैं, सुन्दर- सुन्दर आसन मँगाये और भगवान् श्रीकृष्ण तथा ऋषि - मुनि आरामसे उनपर बैठ गये। उस समय बहुलाश्वकी विचित्र दशा थी । प्रेम - भक्तिके उद्रेकसे उनका हृदय भर आया था । नेत्रोंमें आँसू उमड़ रहे थे । उन्होंने अपने पूज्यतम अतिथियोंके चरणोंमें नमस्कार करके पाँव पखारे और अपने कुटुम्बके साथ उनके चरणोंका लोकपावन जल सिरपर धारण किया और फिर भगवान् एवं भगवत्स्वरूप ऋषियोंको गन्ध, माला, वस्त्र, अलंकार, धूप, दीप, अर्घ्य, गौ, बैल आदि समर्पित करके उनकी पूजा की ॥२७-२९ ॥ जब सब लोग भोजन करके तृप्त हो गये, तब राजा बहुलाश्व भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंको अपनी गोदमें लेकर बैठ गये । और बड़े आनन्दसे धीरे - धीरे उन्हें सहलाते हुए बड़ी मधुर वाणीसे भगवान्की स्तुति करने लगे ॥३० ॥
राजा बहुलाश्वने कहा —' प्रभो! आप समस्त प्राणियोंके आत्मा, साक्षी एवं स्वयंप्रकाश हैं । हम सदा - सर्वदा आपके चरणकमलोंका स्मरण करते रहते हैं । इसीसे आपने हमलोगोंको दर्शन देकर कृतार्थ किया है ॥ ३१ ॥ भगवन्! आपके वचन हैं कि मेरा अनन्यप्रेमी भक्त मुझे
अपने स्वरूप बलरामजी, अर्द्धांगिनी लक्ष्मी और पुत्र ब्रह्मासे भी बढ़कर प्रिय है। अपने उन वचनोंको सत्य करनेके लिये ही आपने हमलोगोंको दर्शन दिया है ॥३२ ॥
को नु त्वच्चरणाम्भोजमेवंविद् विसृजेत् पुमान् ।
निष्किंचनानां शान्तानां मुनीनां यस्त्वमात्मदः ॥३३
योऽवतीर्य यदोर्वंशे नृणां संसरतामिह ।
यशो वितेने तच्छान्त्यै त्रैलोक्यवृजिनापहम् ॥३४
नमस्तुभ्यं भगवते कृष्णायाकुण्ठमेधसे ।
नारायणाय ऋषये सुशान्तं तप ईयुषे ॥३५
दिनानि कतिचिद् भूमन् गृहान् नो निवस द्विजैः ।
समेतः पादरजसा पुनीहीदं निमेः कुलम् ॥ ३६
इत्युपामन्त्रितो राज्ञा भगवाँल्लोकभावनः ।
उवास कुर्वन् कल्याणं मिथिलानरयोषिताम् ॥३७
श्रुतदेवोऽच्युतं प्राप्तं स्वगृहांजनको यथा ।
नत्वा मुनीन् सुसंहृष्टो धुन्वन् वासो ननर्त ह ॥ ३८
तृणपीठबृसीष्वेतानानीतेषूपवेश्य सः ।
स्वागतेनाभिनन्द्याङ्घ्रीन् सभार्योऽवनिजे मुदा ॥ ३ ९
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तदम्भसा महाभाग आत्मानं सगृहान्वयम् ।
स्नापयांचक्र उद्धर्षो लब्धसर्वमनोरथः ॥४०
भला, ऐसा कौन पुरुष है, जो आपकी इस परम दयालुता और प्रेमपरवशताको जानकर भी आपके चरणकमलोंका परित्याग कर सके? प्रभो! जिन्होंने जगत्की समस्त वस्तुओंका एवं शरीर आदिका भी मनसे परित्याग कर दिया है, उन परम शान्त मुनियोंको आप अपनेतकको भी दे डालते हैं ॥ ३३ ॥ आपने यदुवंशमें अवतार लेकर जन्म- मृत्युके चक्करमें
पड़े हुए मनुष्योंको उससे मुक्त करनेके लिये जगत् में ऐसे विशुद्ध यशका विस्तार किया है, जो त्रिलोकीके पाप- तापको शान्त करनेवाला है ॥ ३४ ॥ प्रभो! आप अचिन्त्य, अनन्त ऐश्वर्य और
माधुर्यकी निधि हैं; सबके चित्तको अपनी ओर आकर्षित करनेके लिये आप सच्चिदानन्दस्वरूप परमब्रह्म हैं । आपका ज्ञान अनन्त है । परम शान्तिका विस्तार करनेके लिये आप ही नारायण ऋषिके रूपमें तपस्या कर रहे हैं । मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥३५ ॥ एकरस अनन्त! आप कुछ दिनोंतक मुनिमण्डलीके साथ हमारे यहाँ निवास
कीजिये और अपने चरणोंकी धूलसे इस निमिवंशको पवित्र कीजिये ॥ ३६ ॥ परीक्षित्!
सबके जीवनदाता भगवान् श्रीकृष्ण राजा बहुलाश्वकी यह प्रार्थना स्वीकार करके मिथिलावासी नर- नारियोंका कल्याण करते हुए कुछ दिनोंतक वहीं रहे ॥ ३७ ॥
प्रिय परीक्षित्! जैसे राजा बहुलाश्व भगवान् श्रीकृष्ण और मुनि- मण्डलीके पधारनेपर आनन्दमग्न हो गये थे, वैसे ही श्रुतदेव ब्राह्मण भी भगवान् श्रीकृष्ण और मुनियोंको अपने घर आया देखकर आनन्दविह्वल हो गये; वे उन्हें नमस्कार करके अपने वस्त्र उछाल- उछालकर नाचने लगे ॥ ३८ ॥ श्रुतदेवने चटाई, पीढ़े और कुशासन बिछाकर उनपर भगवान् श्रीकृष्ण
और मुनियोंको बैठाया, स्वागत भाषण आदिके द्वारा उनका अभिनन्दन किया तथा अपनी पत्नीके साथ बड़े आनन्दसे सबके पाँव पखारे ॥ ३ ९ ॥ परीक्षित्! महान् सौभाग्यशाली श्रुतदेवने भगवान् और ऋषियोंके चरणोदकसे अपने घर और कुटुम्बियोंको सींच दिया । इस समय उनके सारे मनोरथ पूर्ण हो गये थे । वे हर्षातिरेकसे मतवाले हो रहे थे ॥४० ॥ तदनन्तर
उन्होंने फल, गन्ध, खससे सुवासित निर्मल एवं मधुर जल, सुगन्धित मिट्टी, तुलसी, कुश, कमल आदि अनायास प्राप्त पूजा सामग्री और सत्त्वगुण बढ़ानेवाले अन्नसे सबकी आराधना की ॥४१ ॥ उस समय श्रुतदेवजी मन-ही- मन तर्कना करने लगे कि ' मैं तो घर- गृहस्थीके
अँधेरे कूएँमें गिरा हुआ हूँ, अभागा हूँ; मुझे भगवान् श्रीकृष्ण और उनके निवासस्थान ऋषि-मुनियोंका, जिनके चरणोंकी धूल ही समस्त तीर्थोंको तीर्थ बनानेवाली है, समागम कैसे प्राप्त हो गया? ' ॥४२ ॥ जब सब लोग आतिथ्य स्वीकार करके आरामसे बैठ गये, तब श्रुतदेव
अपने स्त्री- पुत्र तथा अन्य सम्बन्धियोंके साथ उनकी सेवामें उपस्थित हुए । वे भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंका स्पर्श करते हुए कहने लगे ॥४३ ॥
फलार्हणोशीरशिवामृताम्बुभि- मृदा सुरभ्या तुलसीकुशाम्बुजैः । आराधयामास यथोपपन्नया ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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सपर्यया सत्त्वविवर्धनान्धसा ॥४१ स तर्कयामास कुतो ममान्वभूद् गृहान्धकूपे पतितस्य संगमः । यः सर्वतीर्थास्पदपादरेणुभिः कृष्णेन चास्यात्मनिकेतभूसुरैः ॥४२
सूपविष्टान् कृतातिथ्याञ्छ्रुतदेव उपस्थितः ।
सभार्यस्वजनापत्य उवाचाङ्घ्यभिमर्शनः ॥४३
श्रुतदेव उवाच
नाद्य नो दर्शनं प्राप्तः परं परमपूरुषः ।
यर्हीदं शक्तिभिः सृष्ट्वा प्रविष्टो ह्यात्मसत्तया ॥४४
यथा शयानः पुरुषो मनसैवात्ममायया ।
सृष्ट्वा लोकं परं स्वाप्नमनुविश्यावभासते ॥४५
शृण्वतां गदतां शश्वदर्चतां त्वाभिवन्दताम् ।
नृणां संवदतामन्तर्हृदि भास्यमलात्मनाम् ॥४६
हृदिस्थोऽप्यतिदूरस्थः कर्मविक्षिप्तचेतसाम् ।
आत्मशक्तिभिरग्राह्योऽप्यन्त्युपेतगुणात्मनाम् ॥ ४७
श्रुतदेवने कहा — प्रभो! आप व्यक्त- अव्यक्तरूप प्रकृति और जीवोंसे परे पुरुषोत्तम हैं । मुझे आपने आज ही दर्शन दिया हो, ऐसी बात नहीं है। आप तो तभीसे सब लोगोंसे मिले हुए जबसे आपने अपनी शक्तियोंके द्वारा इस जगत्की रचना करके आत्मसत्ताके रूपमें इसमें प्रवेश किया है ॥४४ ॥ जैसे सोया हुआ पुरुष स्वप्नावस्थामें अविद्यावश मन- ही-मन स्वप्न-जगत्की सृष्टि कर लेता है और उसमें स्वयं उपस्थित होकर अनेक रूपोंमें अनेक कर्म करता
हुआ प्रतीत होता है, वैसे ही आपने अपनेमें ही अपनी मायासे जगत्की रचना कर ली है और अब इसमें प्रवेश करके अनेकों रूपोंसे प्रकाशित हो रहे हैं || ४५ || लोग सर्वदा आपकी लीलाकथाका श्रवण - कीर्तन तथा आपकी प्रतिमाओंका अर्चन- वन्दन करते हैं और आपसमें आपकी ही चर्चा करते हैं, उनका हृदय शुद्ध हो जाता है और आप उसमें प्रकाशित हो जाते हैं ॥४६ ॥ जिन लोगोंका चित्त लौकिक - वैदिक आदि कर्मोंकी वासनासे बहिर्मुख हो रहा है,
उनके हृदयमें रहनेपर भी आप उनसे बहुत दूर हैं । किन्तु जिन लोगोंने आपके गुणगानसे अपने अन्तःकरणको सद्गुणसम्पन्न बना लिया है, उनके लिये चित्तवृत्तियोंसे अग्राह्य होनेपर भी आप अत्यन्त निकट हैं ॥ ४७॥ प्रभो! जो लोग आत्मतत्त्वको जाननेवाले हैं, उनके
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आत्माके रूपमें ही आप स्थित हैं और जो शरीर आदिको ही अपना आत्मा मान बैठे हैं, उनके लिये आप अनात्माको प्राप्त होनेवाली मृत्युके रूपमें हैं । आप महत्तत्त्व आदि कार्यद्रव्य और प्रकृतिरूप कारणके नियामक हैं - शासक हैं । आपकी माया आपकी अपनी दृष्टिपर पर्दा नहीं डाल सकती, किन्तु उसने दूसरोंकी दृष्टिको ढक रखा है । आपको मैं नमस्कार करता हूँ ॥४८ ॥ स्वयंप्रकाश प्रभो! हम आपके सेवक हैं । हमें आज्ञा दीजिये कि हम आपकी
क्या सेवा करें? नेत्रोंके द्वारा आपका दर्शन होनेतक ही जीवोंके क्लेश रहते हैं । आपके दर्शनमें ही समस्त क्लेशोंकी परिसमाप्ति है ॥४९ ॥
नमोऽस्तु तेऽध्यात्मविदां परात्मने अनात्मने स्वात्मविभक्तमृत्यवे । सकारणाकारणलिंगमीयुषे स्वमाययासंवृतरुद्धदृष्टये ॥४८
स त्वं शाधि स्वभृत्यान् नः किं देव करवामहे ।
एतदन्तो नृणां क्लेशो यद् भवानक्षिगोचरः ॥४९
श्रीशुक उवाच
तदुक्तमित्युपाकर्ण्य भगवान् प्रणतार्तिहा ।
गृहीत्वा पाणिना पाणिं प्रहसंस्तमुवाच ह ॥५०
श्रीभगवानुवाच
ब्रह्मंस्तेऽनुग्रहार्थाय सम्प्राप्तान् विद्धयमून् मुनीन् ।
संचरन्ति मया लोकान् पुनन्तः पादरेणुभिः ॥ ५१
देवाः क्षेत्राणि तीर्थानि दर्शनस्पर्शनार्चनैः ।
शनैः पुनन्ति कालेन तदप्यर्हत्तमेक्षया ॥ ५२
ब्राह्मणो जन्मना श्रेयान् सर्वेषां प्राणिनामिह ।
तपसा विद्यया तुष्ट्या किमु मत्कलया युतः ॥५३
न ब्राह्मणान्मे दयितं रूपमेतच्चतुर्भुजम् ।
सर्ववेदमयो विप्रः सर्वदेवमयो ह्यहम् ॥५४
दुष्प्रज्ञा अविदित्वैवमवजानन्त्यसूयवः ।
गुरुं मां विप्रमात्मानमर्चादाविज्यदृष्टयः ॥ ५५
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! शरणागत- भयहारी भगवान् श्रीकृष्णने श्रुतदेवकी ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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प्रार्थना सुनकर अपने हाथसे उनका हाथ पकड़ लिया और मुसकराते हुए कहा ॥५० ॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा – प्रिय श्रुतदेव! ये बड़े - बड़े ऋषि- मुनि तुमपर अनुग्रह करनेके लिये ही यहाँ पधारे हैं । ये अपने चरणकमलोंकी धूलसे लोगों और लोकोंको पवित्र करते हुए मेरे साथ विचरण कर रहे हैं ॥ ५१ ॥ देवता, पुण्यक्षेत्र और तीर्थ आदि तो दर्शन, स्पर्श, अर्चन
आदिके द्वारा धीरे - धीरे बहुत दिनोंमें पवित्र करते हैं; परन्तु संत पुरुष अपनी दृष्टिसे ही सबको पवित्र कर देते हैं । यही नहीं; देवता आदिमें जो पवित्र करनेकी शक्ति है, वह भी उन्हें संतोंकी दृष्टिसे ही प्राप्त होती है ॥ ५२ ॥ श्रुतदेव! जगत्में ब्राह्मण जन्मसे ही सब प्राणियोंसे श्रेष्ठ हैं ।
यदि वह तपस्या, विद्या, सन्तोष और मेरी उपासना- मेरी भक्तिसे युक्त हो तब तो कहना ही क्या है ॥५३ ॥
मुझे अपना यह चतुर्भुजरूप भी ब्राह्मणोंकी अपेक्षा अधिक प्रिय नहीं है । क्योंकि ब्राह्मण सर्ववेदमय है और मैं सर्वदेवमय हूँ ॥ ५४ ॥ दुर्बुद्धि मनुष्य इस बातको न जानकर केवल मूर्ति
आदिमें ही पूज्यबुद्धि रखते हैं और गुणोंमें दोष निकालकर मेरे स्वरूप जगद्गुरु ब्राह्मणका, जो कि उनका आत्मा ही है, तिरस्कार करते हैं ॥५५ ॥
चराचरमिदं विश्वं भावा ये चास्य हेतवः ।
मद्रूपाणीति चेतस्याधत्ते विप्रो मदीक्षया ॥५६
तस्माद् ब्रह्मऋषीनेतान् ब्रह्मन् मच्छ्रद्धयार्चय ।
एवं चेदर्चितोऽस्म्यद्धा नान्यथा भूरिभूतिभिः ॥ ५७
श्रीशुक उवाच
स इत्थं प्रभुणाऽऽदिष्टः सहकृष्णान् द्विजोत्तमान् ।
आराध्यैकात्मभावेन मैथिलश्चाप सद्गतिम् ॥५८
एवं स्वभक्तयो राजन् भगवान् भक्तभक्तिमान् ।
उषित्वाऽऽदिश्य सन्मार्गं पुनर्द्वारवतीमगात् ॥५९
ब्राह्मण मेरा साक्षात्कार करके अपने चित्तमें यह निश्चय कर लेता है कि यह चराचर जगत्, इसके सम्बन्धकी सारी भावनाएँ और इसके कारण प्रकृति- महत्तत्त्वादि सब- के --सबस आत्मस्वरूप भगवान्के ही रूप हैं ॥ ५६ ॥ इसलिये श्रुतदेव! तुम इन ब्रह्मर्षियोंको मेरा ही
स्वरूप समझकर पूरी श्रद्धासे इनकी पूजा करो । यदि तुम ऐसा करोगे, तब तो तुमने साक्षात् अनायास ही मेरा पूजन कर लिया; नहीं तो बड़ी - बड़ी बहुमूल्य सामग्रियोंसे भी मेरी पूजा नहीं हो सकती ॥५७ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णका यह आदेश प्राप्त करके श्रुतदेवने भगवान् श्रीकृष्ण और उन ब्रह्मर्षियोंकी एकात्मभावसे आराधना की तथा उनकी कृपासे वे भगवत्स्वरूपको प्राप्त हो गये । राजा बहुलाश्वने भी वही गति प्राप्त की ॥५८ ॥
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प्रिय परीक्षित्! जैसे भक्त भगवान्की भक्ति करते हैं, वैसे ही भगवान् भी भक्तोंकी भक्ति करते हैं । वे अपने दोनों भक्तोंको प्रसन्न करनेके लिये कुछ दिनोंतक मिथिलापुरीमें रहे और उन्हें साधु पुरुषोंके मार्गका उपदेश करके वे द्वारका लौट आये ॥५९ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे श्रुतदेवानुग्रहो नाम षडशीतितमोऽध्यायः ॥८६ ॥
१. स्मरक्षु० । १. श्चानुसान्त्वितः । २. मत्ययम् । ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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अथ सप्ताशीतितमोऽध्यायः वेदस्तुति परीक्षिदुवाच
ब्रह्मन् ब्रह्मण्यनिर्देश्ये निर्गुणे गुणवृत्तयः ।
कथं चरन्ति श्रुतयः साक्षात् सदसतः परे ॥१
राजा परीक्षित्ने पूछा- भगवन्! ब्रह्म कार्य और कारणसे सर्वथा परे है । सत्त्व, रज और तम – ये तीनों गुण उसमें हैं ही नहीं । मन और वाणी से संकेतरूपमें भी उसका निर्देश नहीं किया जा सकता । दूसरी ओर समस्त श्रुतियोंका विषय गुण ही है । ( वे जिस विषयका वर्णन करती हैं उसके गुण, जाति, क्रिया अथवा रूढिका ही निर्देश करती हैं ) ऐसी स्थितिमें श्रुतियाँ निर्गुण ब्रह्मका प्रतिपादन किस प्रकार करती हैं? क्योंकि निर्गुण वस्तुका स्वरूप तो उनकी पहुँचके परे है ॥१ ॥
श्रीशुक उवाच
बुद्धीन्द्रियमनःप्राणान् जनानामसृजत् प्रभुः ।
मात्रार्थं च भवार्थं च आत्मनेऽकल्पनाय च ॥२
सैषा ह्युपनिषद् ब्राह्मी पूर्वेषां पूर्वजैर्धृता ।
श्रद्धया धारयेद् यस्तां क्षेमं गच्छेदकिंचनः ॥३
अत्र ते वर्णयिष्यामि गाथां नारायणान्विताम् ।
नारदस्य च संवादमृषेर्नारायणस्य च ॥४
एकदा नारदो लोकान् पर्यटन् भगवत्प्रियः ।
सनातनमृषिं द्रष्टुं ययौ नारायणाश्रमम् ॥५
यो वै भारतवर्षेऽस्मिन् क्षेमाय स्वस्तये नृणाम् ।
धर्मज्ञानशमोपेतमाकल्पादास्थितस्तपः ॥६
तत्रोपविष्टमृषिभिः कलापग्रामवासिभिः ।
परीतं प्रणतोऽपृच्छदिदमेव कुरूद्वह ॥७
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! ( भगवान् सर्वशक्तिमान् और गुणोंके निधान हैं । श्रुतियाँ स्पष्टतः सगुणका ही निरूपण करती हैं, परन्तु विचार करनेपर उनका तात्पर्य निर्गुण ही निकलता है। विचार करनेके लिये ही ) भगवान्ने जीवोंके लिये बुद्धि, ****** ebook converter DEMO Watermarks *******
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इन्द्रिय, मन और प्राणोंकी सृष्टि की है । इनके द्वारा वे स्वेच्छासे अर्थ, धर्म, काम अथवा मोक्षका अर्जन कर सकते हैं (प्राणोंके द्वारा जीवन- धारण, श्रवणादि इन्द्रियोंके द्वारा महावाक्य आदिका श्रवण, मनके द्वारा मनन और बुद्धिके द्वारा निश्चय करनेपर श्रुतियोंके तात्पर्य निर्गुण स्वरूपका साक्षात्कार हो सकता है । इसलिये श्रुतियाँ सगुणका प्रतिपादन करनेपर भी वस्तुतः निर्गुणपरक हैं ) ॥२ ॥
ब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली उपनिषद्का यही स्वरूप है । इसे पूर्वजोंके भी पूर्वज सनकादि ऋषियोंने आत्मनिश्चयके द्वारा धारण किया है । जो भी मनुष्य इसे श्रद्धापूर्वक धारण करता है, वह बन्धनके कारण समस्त उपाधियों - अनात्मभावोंसे मुक्त होकर अपने परम कल्याणस्वरूप परमात्माको प्राप्त हो जाता है ॥ ३ ॥
इस विषयमें मैं तुम्हें एक गाथा सुनाता हूँ। उस गाथाके साथ स्वयं भगवान् नारायणका सम्बन्ध है । वह गाथा देवर्षि नारद और ऋषिश्रेष्ठ नारायणका संवाद है ॥४ ॥
एक समयकी बात है, भगवान्के प्यारे भक्त देवर्षि नारदजी विभिन्न लोकोंमें विचरण करते हुए सनातनऋषि भगवान् नारायणका दर्शन करनेके लिये बदरिकाश्रम गये || ५ || भगवान् नारायण मनुष्योंके अभ्युदय ( लौकिक कल्याण ) और परम निःश्रेयस ( भगवत्स्वरूप अथवा मोक्षकी प्राप्ति) के लिये इस भारतवर्षमें कल्पके प्रारम्भसे ही धर्म, ज्ञान और संयमके साथ महान् तपस्या कर रहे हैं ॥६ ॥
परीक्षित्! एक दिन वे कलापग्रामवासी सिद्ध ऋषियोंके बीचमें बैठे हुए थे । उस समय नारदजीने उन्हें प्रणाम करके बड़ी नम्रतासे यही प्रश्न पूछा, जो तुम मुझसे पूछ रहे हो ॥७ ॥
तस्मै वोचद् भगवानृषीणां शृण्वतामिदम् ।
यो ब्रह्मवादः पूर्वेषां जनलोकनिवासिनाम् ॥८
श्रीभगवानुवाच
स्वायम्भुव ब्रह्मसत्रं जनलोकेऽभवत् पुरा ।
तत्रस्थानां मानसानां मुनीनामूर्ध्वरेतसाम् ॥ ९
श्वेतद्वीपं गतवति त्वयि द्रष्टुं तदीश्वरम् ।
ब्रह्मवादः सुसंवृत्तः श्रुतयो यत्र शेरते ।
तत्र हायमभूत् प्रश्नस्त्वं मां यमनुपृच्छसि ॥१०
तुल्यश्रुततपःशीलास्तुल्यस्वीयारिमध्यमाः ।
अपि चक्रुः प्रवचनमेकं शुश्रूषवोऽपरे ॥११
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